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Sunday, November 28, 2010

दुविधा डार्लिंग सीएम की


 दिल्ली की डार्लिंग सीएम बार एक बार फिर असमंजस में हैं।  मीडिया के हुक्के और लेंस उनकी इस दुविधा को अपने-अपने तरीके से कैद कर रहे हैं। साथ ही मैडम की इस दुविधाग्रस्त इमेज या फुटेज का मन-माफि नरेशन भी चल रहा है। दरअसल, राजधानी दिल्ली में महिला असुरक्षा का सवाल एक बार फिर से सतह पर आ गया है।  नई घटना एक 23 वर्षीय कॉल सेंटर कर्मी लड़की के साथ गैंगरेप की है। घटना आधी रात के बाद की भले हो लेकिन जिस आसानी से बदमाश अपराध को अंजाम दे पाए, उसे देखकर यह जरूर लगता है कि कानून और पुलिस का खौफ अब राजधानी के अपराधियों को न के बराबर है। गौरतलब है कि इससे पहले ऐसे ही एक मामले में जब एक लड़की की अस्मत लुटी तो यहां की मुख्यमंत्री ने लड़कियों-युवतियों को देर रात घर से बाहर निकलेने से ही परहेज करने की सलाह दे डाली थी। यह अलग बात है कि बाद में मुख्यमंत्री महोदया को अपने बयान के आशय को लेकर सफाई देनी पड़ी ताकि लोगों का भड़का गुस्सा कम हो सके। नई घट सामने आने के बाद शीला दीक्षित की लाचारी देखते ही बनती है। मीडिया के सवाल खड़े करने पर वह मीडिया से ही सलाह मांगने लग जाती हैं कि आखिर वह करें तो क्या। जाहिर है एक महिला होने के बावजूद महिला असुरक्षा का सवाल उनकी चिंता बढ़ाने से ज्यादा झेंप मिटाने भर है।  
दूसरी तरफ, हो यह रहा है कि कि जब भी कोई नया मामला सामने आता है तो मीडिया के साथ सरकार और लोग भी इस मुद्दे पर हाय-तौबा मचाने लगाते हैं। सरकार और पुलिस अपनी तरफ से मुस्तैदी बढ़ाने का संकल्प दोहराती है तो मीडिया और जनता कानून व्यवस्था की बिगड़ती जा रही स्थिति पर लानत भरकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं।  पिछले साल इन्हीं दिनों आए एक सर्वे में बताया गया था कि दिल्ली की 96 फीसद महिलाएं कहीं भी अकेले जाने में घबड़ाती हैं। इस सर्वे का सबसे दिलचस्प पक्ष यह था कि यहां की 82 फीसद महिलाएं बसों को यातायात का सबसे असुरक्षित साधन मानती हैं। ऐसा भी नहीं है कि महिला असुरक्षा को लेकर इस तरह की शिकायतें सिर्फ दिल्ली को लेकर ही बढ़ी हैं। पिछले दिनों मुंबई में एक पुलिस इंस्पेक्टर द्वारा महिला यौन उत्पीड़न का ऐसा ही एक मामला सामने आया। आईटी हब के रूप अपनी शिनाख्त गढ़ चुके बेंगलुरू में बीपीओ कर्मियों के साथ बदसलूकी और यौन उत्पीड़न के मामले आए दिन अखबारों की सुर्खी बनते हैं। दिल्ली से लगे नोएडा के लिए तो ऐसी घटनाएं रुटीन खबरें हैं।
...तो क्या यह मान लेना चाहिए कि महिला अस्मिता और संवेदनशीलता के मामले में महानगरों का नागरिक समाज लगातार असभ्य और बर्बर होता जा रहा है। हालिया एक घटना में दिल्ली में मैराथन दौड़ने आई फिल्म अभिनेत्री गुल पनाग के साथ जब बदसलूकी हुई तो उन्होंने अपनी शिकायत के साथ यह अनुभव भी दोहराया कि नए समय में महानगरों में रहने वाली महिलाओं को ऐसी घटनाओं के साथ जीने की आदत पर चुकी है। जाहिर है सड़कों, फ्लाईओवरों और मॉलों के बहाने जिन महानगरों के विकास की बात हम करते हैं उसका समाज दिनोंदिन ज्यादा असंवेदनशील होता जा रहा है। और यह असंवेदनशीलता परिवार और संबंधों के साथ दफ्तरों और सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं की असुरक्षा के पहलू को चिंताजनक तरीके से बढ़ाता जा रहा है। ऐसे में महानगरों में महिला असुरक्षा के मुद्दे को महज कानून-व्यवस्था का मुद्दा मान लेना इस समस्या का सरलीकरण ही होगा। जरूरत इस बात की है कि महानगरीय जीवन और समाज को सभ्यता और संस्कारगत तरीके से भी पुष्ट बनाने के साझे अभिक्रम हों।

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