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Sunday, November 7, 2010

मरद जाने तो जाने...मेरी बला से


...जानती हूं
ऐसे समाज में रहती हूं
जहां अकेली स्त्री को
बदचलन साबित करना
सबसे आसान काम है
और यह बात मेरा मरद
अच्छी तरह जानता है...
ये पंक्तियां है कवयित्री रंजना जायसवाल की कविता "मेरा मरद जानता है' की। एक कवयित्री की जगह ये बातें और यह स्त्री संवेदना किसी कवि की भी हो सकती है। पर शायद तब अर्थ के बदलने का खतरा होगा क्योंकि यह आत्मकथ्य न होकर चैरिटी जैसी उदारता होगी महिला स्थितियों के प्रति। दरअसल, हमारे आसपास जो दुनिया सबसे तेजी से बदल रही है, वह है स्त्रियों की दुनिया। साथ ही यह भी उतना ही सच है कि इस दुनिया में अब भी कई चीजें पुराने ठेठ रंगो-सूरत में कायम हैं। स्त्री-पुरुष संबंधों के खुलेपन ने पिछले कुछ  दशकों  में चाहे जितनी ताजी हवा को महसूस किया है, उसके बनने और टूटने के साथ उन्हें देखने की कसौटियां न के बराबर बदली हैं। नहीं तो ऐसा कैसा संभव था कि एक तरफ आधुनिकता की चौंध से भरी दुनिया में एक 37 साल की मॉडल को महज इसलिए खुदकुशी के लिए मजबूर होना पड़ता है कि उसके दैहिक कसाव का ढीलापन और उसके करियर की गिरावट उसे अचानक अपने दोस्तों, परिचितों, कारोबारी सहयोगियों के लिए गैरजरूरी और कम फायदेमंद लगने लगा। विवेका की मौत को लेकर अभी कई रहस्यों से परदा उठना बाकी है। पर इतनी सचाई को इस पूरे मामले का प्रस्थान बिंदु के तौर पर मीडिया ही नहीं उसे जानने वाले भी स्वीकार कर रहे हैं।
सहजीवन से डेटिंग और फ्रेंडशिप तक का नया चलन संबंधों के नए सांचों के गठन की जगह पुराने सांचों का तोड़ ज्यादा है। विवाह, परिवार और परंपरा की त्रिवेणी में नहाया भारतीय गृहस्थ आश्रम अपने उद्देश्यों के कारण तो नहीं पर निर्वाह की ईमानदार कोशिशों में कोताही के कारण जरूर टूट-फूट रहा है। और इन सब के पीछे सबसे बड़ी वजह है परस्पर निष्ठाओं की जमीन का लगातार दरकते जाना। शादी के सात फेरे हांे या दोस्ती-यारी की हल्की-फुल्की बांडिंग, महिलाओं ने संबंधों की नई बनावट में अपनी पिछली घुटन से भरसक बचने की गुंजाइश निकालनी शुरू कर दी है। खतरनाक है तो इस गुंजाइश को आजमाने के दौरान पैदा होने वाली स्थितियां और नतीजे।  संबंध के बनते ही उसके "सदेह' होने की व्यग्रता महिलाओं के हिस्से पुरुष छल को जहां और स्वाभाविक बना रहा है, वहीं संबंधों के टूटने पर इसी "सदेह' साक्ष्य का ब्लैकमेलिंग के रूप में भी खूब इस्तेमाल होता है। कई युवतियों को यह ब्लैकमेलिंग इतनी महंगी पड़ती है कि उसका या आत्मविश्वास टूटने लगता है या फिर आत्मसंघर्ष के लिए कई गुनी ज्यादा ऊर्जा मन में भरनी पड़नी पड़ती है। आगे संबंधों के नव और पुननिर्माण की प्रक्रिया में भी देह पर लगी ये खरोंचे उसका पीछा नहीं छोड़ती। इसी पर दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू ने जब कहा था कि लड़कों को अब शादी में वर्जिन लड़की की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। और यह नाउम्मीदी उसी तरह स्वाभाविक है जैसा लड़कों को लेकर लड़कियों की चिंता नहीं बढ़ाती।
ये तो स्थितियां रहीं तब जब संबंधों की किवाड़ एक बार नहीं बार-बार खुलती है। देह शुचिता और इज्जत के नाम पर महिलाओं को बांध कर रखने का पुरुषार्थ पुराना है। घरेलू हिंसा की यह सूरत सबसे पुरानी है। रंजना जायसवाल की कविता भी इसी ओर इशारा करती है। दिलचस्प है कि जिस देह भार से आधी दुनिया को सबसे ज्यादा झुकाया-दबाया जाता रहा है, उसका इस्तेमाल वह लोहे को लोहे से काटने के रूप में खतरनाक तरीके से सीख रही हैं। देह को "क्षण' और संबंध को "प्रायोगिक अनुभव' की नियति देने वाली स्त्री मानसिकता का गठन पुरुषों के आगे चुनौती है। पुरुषों का छल अब महिलाओं का बल बन चुका है। 
हाल में खबर आई कि हॉलीवुड अभिनेत्री हेलेन मिरेन ने "लव रंच' फिल्म के लिए 64 साल की उम्र में न्यूड सीन व पोज दिए हैं।  इस फिल्म में वह अपने से 30 साल छोटे उम्र के लड़के से प्यार करती हैं। दिलचस्प है कि ऐसा करते हुए मिरेन को जितनी परेशानी नहीं हुई, उससे ज्यादा उसकी इस हिमाकत को पचाने में लोगों को हुई। जाहिर है  देह का स्त्रीवादी भाष्य भले प्रतिक्रियावादी हो पर इसने स्त्री जीवन को पुरुषों की दुनिया में ललकार के साथ जीने का हौसला भी कम नहीं दिया है। अब भले मरद सब कुछ जानता हो और उसका यह सब कुछ जानना उसके "सिंदूरी' जीवन को स्याह कर दे, पर उसके हौसले के "लाल' होने का जज्बा कम क्रांतिकारी नहीं है।

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