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Monday, May 23, 2011

बाय-बाय ओबामा


भारत के लिए अमेरिका महज एक सुपर पावर नहीं, एक आईना भी है और एक सपना भी। आईना जिसमें खुद की साज-संवार देखकर मन अघाए और सपना इस मायने में कि हम सब अमेरिका जैसा होना या दिखना चाहते हैं, यह हमारा ख्वाब भी है और मंजिल भी है। पर इस अमेरिकान्मुख सोच और सचाई का दूसरा रुख भी है, जो खासा दिलचस्प है। भूले नहीं होंगे लोग अंकल सैम का वह गुस्सा जो उन्होंने अपने यहां के स्कूलों पर उतारा था। उन्होंने स्कूल मैनेजमेंटों को सरकारी फंडिंग बंद करने की धमकी दी थी क्योंकि वहां बच्चे लगातार अंग्रेजी में फेल हो रहे थे। कितना दिलचस्प है यह जानना कि एक देश जिसकी अंग्रेजी क्या, उसके बोलने तक का लहजा पूरी दुनिया में नकल की जाती हो, वहीं के बच्चे अंग्रेजी की परीक्षा तक न पास कर पाएं। मामला यहीं निपटता तो भी गनीमत थी, अमेरिका की इस स्थिति का लाभ उठाया कुछ भारतीय कोचिंग संस्थानों ने। उन्होंने सस्ते में ट्यूशन आउटसोर्स के जरिए अमेरिकी बच्चों को अंग्रेजी सिखाने का बीड़ा उठाया और यह धंधा रातोंरात चल निकला। 
दरअसल, यह एक शुरुआत थी भारत और अमेरिका में भीतरी तौर पर बदल रही स्थितियों की। गौरतलब है कि आईटी सेक्टर के जरिए जिस इकोनमी बूम ने रातोंरात भारतीय अर्थ जगत की तस्वीर बदल दी, उससे पहले का दौर भारतीय प्रतिभाओं के विदेश पलायन का था। भारतीय प्रतिभा का प्रतिस्पर्धी होना और यहां श्रम का सस्ता होना, दुनियाभर में इनके छाने और भाने का बड़ा कारण रहा है। पर अब सूरत बदल रही है। आलम यह है कि भारत को दुनिया की तरफ देखने के बजाय दुनिया को भारत की तरफ देखने की दरकार सामने आई है। यह नई और विश्व अर्थव्यवस्था में एक क्रांतिकारी स्थिति है।
असल में भारत और चीन ये दो ऐसे देश हैं, जिन्होंने अपनी आर्थिक कुव्वत को पिछले दशकों में जिस तर्ज पर बढ़ाया और मजबूत किया है, वह कई लिहाज से बाकी दुनिया से अलग है। एक तो इन दोनों देशों का विस्तार आबादी और क्षेत्रफल दोनों लिहाज से ज्यादा है, दूसरे ग्लोबल इकोनमी का फंडा यहां स्थानीय प्रभावों और बदलावों के बाद ही सरजमीं पर उतरा है। आलम यह है अमेरिका के राष्ट्रपति को अपनी राजनीतिक स्थिरता के लिए बार-बार अपने लोगों को इस मुद्दे पर भरोसे पर लेना होता है कि भारत और चीन के 'अर्थपूर्ण आकर्षण' से बचाव के लिए सख्त कदम उठाएंगे।
जाहिर है ऐसी सूरत में जब घर के हालात ज्यादा बेहतर और संभावनाओं से भरे दिख रहे हैं, परदेस का रुख करने वाली प्रतिभाओं की दर में तो गिरावट आएगी ही, पहले ही पलायन कर चुके लोगों की वापसी की रफ्तार भी बढ़ जाएगी। इस रुझान को तथ्यगत रूप में मान्यता दी है हाल में ही किए गए एक अध्ययन में। कॅाफमैन फाउंडेशन ने तीन अमेरिकी विश्वविद्यालयों हार्वर्ड, कैलिफोर्निया और ड्यूक की मदद से किए गए अध्ययन में पाया है कि दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति का की शिनाख्त पाने वाले अमेरिका को मौजूदा सूरत में भारी खामियाजा उठाना पड़ रहा है।
दिलचस्प है कि इस अध्ययन का शीर्षक ही है- 'स्वदेश वापसी करने वाले उद्यमियों के लिए वास्तव में भारत और चीन में घास अधिक हरी है'। यह अध्ययन कबूलता है कि एशिया के इन दो बड़े देशों में इन दिनों उद्यमशीलता की लहर चल रही है। किसी समय प्रतिभा पलायन से अपनी अंटी भारी करने वाली अमेरिकी कंपनियों के लिए यह स्थिति सीधे-सीधे गंगा के उलटी बहने जैसी है।
स्वदेश वापसी कर चुके 153  कुशल भारतीय और 111 चीनी कामगारों के बीच कराए गए सर्वेक्षण में तकरीबन आधे ने कहा कि वे अपने देश में अपनी कंपनी स्थापित करेंगे। यह अध्ययन वैसे यह तो साफ नहीं करता कि पिछले दिनों कितने कुशल कामगार स्वदेश लौटे हैं। वैसे इस बाबत इस अध्ययन से ही जुड़े एक लेखक विवेक वाधवा के दावों को अगर सही मानें तो पिछले दो दशकों में डेढ़ लाख लोग भारत और तकरीबन इतने ही लोग चीन वापस लौट चुके हैं। पिछले पांच सालों में इस रुझान में जबरदस्त तेजी दर्ज की गई है। वाधवा इस रुझान को आपवादिक नहीं मानते क्योंकि उनके शब्दों में अब झुंड के झुंड प्रतिभाए एक साथ अमेरिका को गुड बॉय कह रही हैं। कह सकते हैं कि प्रतिभाओं की पसंद और आकर्षण में आया यह बदलाव और कुछ नहीं सीधे-सीधे घर के हालात बेहतर होने के जीते-जागते सबूत हैं। आगे भी ये सबूत यों ही साबुत बने रहेंगे, अभी की सूरत में यही भरोसा भी है। 

Friday, May 20, 2011

बोल भी दो अब कि ना बाबा ना


 पुजारी सर्वनारायण झा या बाबा धर्मदास उर्फ धर्म प्रकाश कपूर ढोंगी संतों-तांत्रिकों की फेहरिस्त में जुड़े कुछ और चमत्कारी नाम हैं। दोनों पर आरोप है महिला के साथ बलात संबंध बनाने का। झा ने तो यह कुकृत्य एक 17 साल की लड़की से उसी के घर में अकेलेपन का फायदा उठाकर किया। मामला खुलता देख वह फरार हो गया। दिल्ली पुलिस ने उसे बिहार में दरभंगा से गिरफ्तार किया है। झा जी की उम्र तकरीबन 60 के करीब है। पुजारी होने के नाते पूजा के विधान में ही वे अब भी अपने पाप को छुपाने का भरसक कोशिश कर रहे हैं। दलील दे रहे हैं गणेश की विशेष पूजा के लिए जांघ से जांघ मिलाना जरूरी होता है और बस यही उसने किया पीडि़त नाबालिग लड़की के साथ।
धर्मदास का रैकेट झा के मुकाबले बड़ा है और वह शातिर भी ज्यादा जान पड़ता है। अब तक कम से कम तीन महिलाओं ने उस पर रेप के आरोप लगाए हैं। पर आलम यह है कि विरोधियों से ज्यादा सक्रिय उनके समर्थक हैं जो उसके समर्थन में अदालत तक नारे लगाते पहुंच गए। बताते हैं कि धर्मदास ने बजाप्ता तैयारी के साथ अपना मंदिर बनवाया और फिर मिनटों में लोगों का कष्ट हरने का झांसा देकर रातोंरात अपने भक्तों की पूरी बिरादरी खड़ी कर ली। भांडा फूटने पर पता चला कि धर्मदास एक यौन अपराधी है और उसने धर्म की आड़ में वह सब कुछ किया, जिसकी इजाजत कम से कम कोई धर्म या पंथ तो नहीं देता।

अब तक जितने खुलासे हुए हैं उसमें धर्मदास या सर्वनारायण झा का अपराधी कद उतना बड़ा नहीं जितना है, जितना धर्म के कई कुख्यात ध्वजावाहकों का रहा है। इसी दिल्ली में पिछले साल हम देख चुके हैं कि धर्म के धुले आवरण में सेक्स दुनिया का 'इच्छाधारी' अपराधी कैसे फन काढ़ता है। देश के दूसरे हिस्सों से भी आए दिन धर्म के नाम पर 'नित्यानंद' के मामले सामने आते रहते हैं। दरअसल, यह एक ऐसे समय का भयावह सच है जिसमें धर्म ने बाजार, व्यापार और विस्तार का नया संसार रचा है। दिलचस्प है कि धर्म-धंधा का यह पूरा साम्राज्य जिस भरोसे के नाम पर खड़ा हुआ है, असल में उस भरोसे को ही उसने सबसे ज्यादा तोड़ा है, कई तरह के समझौते के लिए मोहताज बनाया है। एक धर्मभीरु समय और समाज के लिए धर्म और उसकी प्रवृतियों का क्या और कितना महत्व रह जाता है, उसकी छानबीन अगर कोई तफ्सील से करना चाहे तो उसे धर्मदास जैसे इच्छाधारियों के अपराध रिकार्ड में लंबे समय तक गोते लगाने होंगे।
अगर मौजूदा स्थितियां हमारी संवेदनाओं को झकझोरती हैं तो हमारी चेतना यह भी कबूलने से शायद ही परहेज करे कि परम भोग के चरम दौर की और कोई दूसरी नियति हो भी नहीं सकती। देश का कानून आैर न्याय के मंदिर इन मामलों पर चाहे जो फैसला करें, एक फैसला तो उस समाज को भी करना होगा जो भक्ति, ईश्वर और धर्म को ढोंग और पाखंड के स्वामियों के हाथों सौंपकर अपने कल्याण के सपने देखता है। हम कैसे यह भूल जाते हैं कि विषय-वासना का शमन ही धर्म है और भोगरहित संतोष ही उसकी प्राप्ति का अकेला मंत्र। अगर देश के दूरदराज के इलाकों में धर्म और तंत्र-मंत्र की दुनिया आबाद होती तो वहां की जहालत को भी इसका दोषी ठहरा दिया जाता पर अगर दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरू जैसे महनगरों में यह दुनिया आबाद हो रही है, फल-फूल रही है तो कहीं न कहीं मानना पड़ेगा कि हमारा सभ्य शिक्षित और आधुनिक नागरिक समाज अपनी सोच और चेतना के स्तर पर न सिर्फ तंगहाल है, बल्कि कुत्सित भी है। क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो वह आसानी और सहजता धर्म के इन धंधेबाजों को मुहैया नहीं हो जाती, जो महानगरों की रेशमी दुनिया में इन्हें सहज ही उपलब्ध हैं। लिहाजा, हम सामने देखकर चौकने, चीखने या भन्नाने की बजाय अपने हिस्से की कमजोरी के कबूलनामे से भी न कतराएं। क्योंकि हमारा अपना खालीपन अधर्म के गुरुत्व को संभव कर रहा है और यह बात हम जितनी जल्दी समझ जाएं उतना बेहतर होगा।   

Thursday, May 19, 2011

बिग बी को बताओ, जीती कैसे आशा


ऑक्सफोर्ड की लाइब्रोरी में मैग्ना कार्टा चार्टर देखकर अमिताभ बच्चन जब अभिभूत होते हैं तो अखबारों, टीवी चैनलों के लिए यह न छोड़ी जा सकने वाली खबर होती है। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है कि पूरब में खड़े होकर कोई पश्चिम को सूर्य का घर माने और उसकी लाली से अपनी चेतना और इतिहास बोध को रंग ले। दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र की उन जड़ों की जिसकी डालियों पर झूला डालने वाले परिंदे आपको आज पूरी दुनिया में मिल जाएंगे। पर लोकतंत्र महज एक शासनतंत्र नहीं, एक जीवनशैली और मानवीय इच्छाशक्ति भी है। अगर यह बोध और सोच किसी को भावनात्मक अतिरेक लगे तो उसे भारत के पांच लाख गांवों के सांस्कृतिक गणतंत्र की परंपरा से परिचित होना चाहिए। परंपरा का यह प्रवाह आज जरूर पहले की तरह सजल नहीं रहा, पर है वह आज भी कायम अपने जीवन से भरे बहाव के साथ। अगर यकीन नहीं हो तो चलिए उस छोटे से गांव में जहां गणतंत्र आज भी सबसे बड़ी 'आशा' है, सबसे बड़ा यकीन है कल को आज से बेहतर होने का।
पिछले तीन दशकों में घाटी में उतनी बर्फ नहीं गिरी, जितनी आंच दिल्ली से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वहां के हालात को लेकर महसूस की गई। यह भारत की लोकतांत्रिक निष्ठा की कहीं न कहीं जीत ही है कि उसने अपने इस सबसे अशांत सूबे में भी लोकतांत्रिक शासन को लगातार बहाल रखा। जम्मू कश्मीर के हालात और राजनीति पर फारूख अब्दुल्ला ने कभी कहा था कि उनकी मजबूरी है कि वह हमेशा दिल्ली की सत्ता का साथ दें। पक्ष और विरोध के लोकतंत्र में दरअसल, यह तकाजा महज राजनीति का नहीं बल्कि उस तकाजे का भी है जो जम्मू कश्मीर को देश की मुख्यधारा के साथ एकमेक रहने की दरकार पेश करता है।  पिछले दिनों जब देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां चल रही थी, उसी दौरान जम्मू कश्मीर सहित कई प्रदेशों में लोकतंत्र का एक और बड़ा अनुष्ठान पंचायत चुनाव के रूप में चल रहा था। विधानसभा चुनावों, भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालती कार्रवाई और नागरिक समाज की मांगों और आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन के खात्मे के शोरगुल में इस अनुष्ठान की तरफ कम ही लोगों का ध्यान गया। अलबत्ता स्थानीय लोगों की दिलचस्पी जरूर इसमें बनी रही। दिलचस्प तो यह रहा कि अशांत घाटी में इन चुनावों का औपचारिक निर्वाह ही जहां बड़ी कामयाबी ठहराई जा सकती थी, वहां अस्सी फीसद तक मतदान हुए। यही नहीं बिहार जैसे सूबे में जहां पंचायत की परंपरा को ऐतिहासिक मान्यता हासिल है, वहां भी यह चुनाव संगीनों के साए में होने के बावजूद खून के छीटों से बचे नहीं रहे। वहीं घाटी की वादियों में ये चुनाव तकरीबन शांतिपूर्ण संपन्न हुए।

दरअसल, पंचायत के बहाने इस चुनाव में घाटी के लोगों ने न सिर्फ लोकतांत्रिक सरोकारों की अपनी मिट्टी को एक बार फिर से तर किया है बल्कि दुनिया के आगे यह साफ भी किया है उनका जीवन, उनका समाज, उनकी संस्कृति उतनी उलझी या बंटी हुई नहीं है, जितनी बताई या समझाई जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कहीं से मुमकिन नहीं था कि कश्मीरी पंडित परिवार की एक महिला उस गांव से पंच चुनी जाती, जो पूरी तरह मुस्लिम बहुल है। यहां विख्यात पर्यटन स्थल गुलमर्ग जाने के रास्ते में एक छोटा सा गांव है- वुसान। आशा इसी गांव से पंच चुनी गई है जबकि यहां से इस पद के लिए मैदान में उतरी वह अकेली कश्मीरी पंडित महिला थी। इस सफलता को स्थानीय, आपवादिक या कमतर ठहराने वालों के लिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि घाटी से 1980 में करीब दो लाख कश्मीरी पंडित परिवारों को पलायन कर जाना पड़ा था।
इस बार भी जब यहां पंचायत चुनाव चल रहे थे तो आतंकी धमकियां मिली थी पर यहां के लोगों ने तमाम उन मंसूबों को धूल चटा दिया, जो बंटवारे और कट्टरता की भड़काऊ बातें करते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि वुसान का संदेश घाटी के सच को नए पूर्वाग्रहरहित नजरिए से देखने की जरूरत को तो रेखांकित करेगा ही यहां से बही लोकतंत्र की धारा को देश की मुख्यधारा बनने की प्रेरणा भी देगा।  फिर फारूख साहब भी कहेंगे अपनी लोकतांत्रिक मजबूरी का रोना रोने की बजाय अपनी मजबूती का बखान करेंगे, सगर्व और खुशी-खुशी। 

Tuesday, May 17, 2011

Sunday, May 15, 2011

वाम को प्रणाम...!


लोकतंत्र का सबसे बड़ा अनुष्ठान चुनाव भले है, पर यह व्यवस्था मैदान मारने की राजनीतिक चालाकी भर नहीं सिखाता। चुनावी हार-जीत और पक्ष-विपक्ष के आंकड़ों से ज्यादा वजनी हैं, वे नीतियां और आदर्श जो किसी दल को लोकतंत्र में अपनी राजनीतिक भूमिका की प्रेरणा देते हैं, उसके लिए संघर्ष करने का हौसला बढ़ाते हैं। सैफोलोजी की मास्टरी का दावा करने वाले यह कहकर भूल कर रहे हैं कि वाम राजनीति का पटाक्षेप हो चुका है और निकट भविष्य में उसके बाउंस बैंक होने की संभावना नहीं के बराबर है।
भारतीय राजनीति के कम से कम दो दिग्गजों ने यही सबक सिखाया कि गिनती में बढ़ना या पिछड़ना किसी मुद्दे की जीत या हार नहीं बल्कि समय और समाज की दरकार के साथ उसके सरोकार लोकतंत्र में मुद्दों का कद, उसका जीवनकाल तय करते हैं। लोहिया चुनावी राजनीति में हमेशा संघर्ष करते दिखे तो वहीं जेपी ने संसद और विधानसभा में खुद न प्रवेश कर जनतंत्र और जनमत का सबसे ऐतिहासिक आख्यान लिखा। लिहाजा, न यह बेला वाम राजनीति के शाम की है, न ही लाल सलाम कहने वाले कैडरों और होलटाइमरों का मार्क्स और लेनिन से मोहभंग हुआ है? वैसे सवालिया लहजे में खड़ा पर यह मुद्दा इतना भर नहीं है, जितना जल्दबाजी में समझा-बताया जा रहा है।
भारत दुनिया का वाहिद देश है, जहां वोट की राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने को तारीखी तौर पर शामिल किया, साबित किया है। कम्युनिस्ट राजनीति को सांगठनिक रूप से देखने वाले यह भूल करते हैं कि महज माकपा या भाकपा उसका चेहरा, उसका राजनीतिक औजार नहीं हैं। पूंजी और श्रम का संघर्ष डेवलपमेंट के ग्लोबल होड़ में कम होने के बजाय खतरनाक हुआ है। दुर्भाग्य से इस नई स्थिति में गांव, गरीब और मजदूर की चिंता को रेखांकित करने का दारोमदार जिन जनवादी संगठनों और नेताओं पर रहा, वे उसमें पूरी तरह नाकाम हुए। कह सकते हैं कि पूंजी और बाजार के गठजोड़ के आगे संघर्ष के वाम तकाजे न तो ढंग से आम लोगों की चिंताओं का प्रतिनिधित्व कर सके और न ही अंदरूनी बदलाव के लिए वाम दलों में कोई सामयिक ललक दिखलाई पड़ी। मामला केरल का हो या पश्चिम बंगाल का वहां वाम सरकारें केंद्रित उद्योग ढांचों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आगवानी के लिए ठीक उसी तरह तैयार दिखीं, जैसे देश की दूसरी पार्टियां अपने शासित राज्यों में।
यही नहीं इस दौरान जो अंतर्मंथन जनवादी दलों में दिखा भी वह बगैर किसी बदलाव के अपने कुनबे की बची-खुची जागीरदारी बचाने के लिए। तकरीबन साढ़े तीन दशक की सत्ता की लाली अगर पश्चिम बंगाल ममता की हरियाली के आगे फीकी पड़ गई है, तो यह कई मायने में देश में कम्युनिस्ट राजनीति के लिए ऐतिहासिक वक्त है, जब उसे अपने भविष्य की नीति और रणनीति दोनों के लिए नए सिरे से कमर कसनी होगी। और अगर ऐसा नहीं होता है तो इस सूरत से भी इनकार नहीं किया जा सकता की सांगठनिक रूप में नए वाम अवतार हमारे सामने हों। यहां यह भी समझने की जरूरत है कि देश की सत्ता में सबसे कम स्पेस को भरने वाली वामपंथी दलों में भीतरी बंटवारा बहुत ज्यादा है।
दिलचस्प है कि दंतेवाड़ा से झाड़ग्राम तक जिस नक्सल प्रभाव की चिंता केंद्र सरकार तक के सिरदर्द है, उसक उत्स भी वाम विचारधारा ही है। यही नहीं छात्र राजनीति की जमीन वैसे तो देश में काफी खिसक चुकी है पर अब भी वैचारिक रूप से वहां वाम विचारधारा की नुमाइंदगी बची हुई है। इससे अलग बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों की भूमिका आज भले देश के नए लोकतांत्रिक ढांचे में गौण पड़ गई हो पर इस जमात की सर्वाधिक यकीनी और प्रतिबद्ध चेहरों की शिनाख्त आज भी प्रगतिशील तबके के रूप में ही है। इसका एक रंग अभी पश्चिम बंगाल में भी दिखा, जहां यही प्रगतिशील तबका वाम मोर्चा की सरकार के खिलाफ निर्णायक रूप से खड़ा हुआ। लिहाजा, पोलित ब्यूरो और काडर डिसिप्लीन वाले कम्युनिस्ट दलों के लिए यह वक्त का तकाजा है कि वह अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को सामयिक तकाजों से जोड़ें ताकि जनवादी राजनीति की उसकी परंपरा का आधुनिक कल्प भी सामने आए और आम लोगों का भरोसा उस पर कायम हो। नहीं तो जैसा कि सीपीआई नेता एबी बर्धन कहते हैं कम्युनिस्ट नेता और पार्टियां समय और समाज के हाशिए पर फेंक दिए जाएंगे और इस सिलसिले की बजाप्ता शुरुआत हो चुकी है।

Wednesday, May 11, 2011

जागरण में अन्ना

दूरी हमारी पहचान के गाढ़ेपन को तो हल्का करती है पर उसके दायरे को बढ़ा देती है। नजरिया, मजहब, राजनीति, स्थान और बोली के अंतर देश में जिस अनेकता की लकीरों के रूप में दिखते हैं, देश के बाहर वही अनेकता हमें एकता के सूत्र में बांधती है। दूरी और मनुष्य के रिश्ते का यह मनोवैज्ञानिक सच तो है ही उसके सामाजिक और सार्वजनिक सलूक से जुड़ी बुनियादी बात भी है। जिस अन्ना हजारे को अपने देश में और अपनी सरकार से अपनी बातें कहने-मनवाने के लिए 98 घंटे का अनशन करना पड़ा, उसी को लेकर सरकार को जब देश के बाहर अपनी बातें कहनी होती है तो वह इसे किसी टकराव या मतभेद के बजाय बहुदलीय लोकतंत्र प्रणाली का नया आयाम बताती है...

Tuesday, May 10, 2011

दुष्कर्म पर कामिनी लॉ


देश में कविताई तक के लिए इतनी गरिमा का ध्यान रखा गया  कि वर्णन अगर 'स्वकीया प्रेम' का है तब तो ठीक है, 'परकीया प्रेम' को अवहेलनीय करार दिया गया। रीति और प्रगति की बदलावकारी बेला में हालांकि साहित्य की ये मर्यादाएं भी टूटीं। व्यावहारिकता को सचाई की ऐसी कसौटी माना गया, जिसमें 'क्या हो' की बजाय 'क्या है' का वर्णन जरूरी करार दिया गया। साहित्य जिस समाज से स्याही और कागज लेता है अपनी अक्षर दुनिया रचने के लिए, आज उसका सच तल्ख ही नहीं काफी हद तक क्रूर और वीभत्स हो चुका है। यही वजह है कि प्रेम का सदेह और संदेह भरा होना, स्त्री-पुरुष संबंध की आखिरी इबारत हो गई। संबधों के बांध से छलकी इच्छाओं में क्या कुछ और कितना कुछ डूबा या डूबेगा, आज इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
महिला आयोग से लेकर पुलिस की अपराध शाखा तक दर्जनों रिपोर्ट इस बात की खुली गवाही देती हैं कि महिला यौन उत्पीड़न के सबसे ज्यादा मामले उस परिवार और सामाजिक दायरे के बीच से सामने आ रहे हैं, जहां सुरक्षा और देखरेख की गारंटी सबसे ज्यादा है। नाबालिग से दुष्कर्म के हालिया एक मामले में दिल्ली की एक अदालत की जज कामिनी लॉ ने ऐसे दोषियों का बंध्याकरण तक कराने की मांग को कानूनी मान्यता देने की सिफारिश की है। दिलचस्प है कि जिस मामले में दोषी पुरुष को इस तरह का सबक सिखाने की बात कही गई है, वह कोई और नहीं उस अभागी बेटी का बाप है, जिसके शील को उसके पिता ने ही भंग कर दिया। कहने के लिए अभियुक्त बेटी का पिता तो है लेकिन सौतेला। गौरतलब है कि इस मामले में पीड़ित बेटी की मां को भी पुलिस ने सहअपराधी बनाया था।
साफ है कि अपराध से पहले संबंधों के वे डोर उलझे और टूटे हैं, जिसमें गलती से एक गांठ भी लग जाए तो आजीवन उसकी ऐंठन बनी रहती है। समाज, परिवार और परंपरा की जिस पाकिजगी ने सामाजिकता के सर्वाधिक सुलेख और आख्यान लिखे हैं, मौजूदा दौर में वह त्रियक ही सबसे ज्यादा आहत और क्षिन्न-भिन्न है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि सुविधा और परमभोग की स्वीकार्यता आधुनिकता और विकास की सीढ़ियां बन चुके हैं। ये वही सीढ़ियां हैं, जो हमारे बेडरूम और डायनिंग रूम ही नहीं पहुंचते, सीधे-सीधे मन-मिजाज के भीतरी कोनों तक दाखिल होते हैं। अदालत और कानून के रास्ते जिस न्यायिक सक्रियता ने पिछले दिनों काफी चीजों को लीक पर लाने की कोशिश की है, उसकी भी अपनी सीमा है।
सरकार और समाज के हर दोष या अपराध के लिए कानून की देवी के आगे याचक बन जाना भी कोई बुद्धिमानी नहीं। जज कामिनी लॉ ने जिस सख्ती की वकालत की है, वह दुनिया के कई विकसित देशों में कानूनी तौर पर मान्य भी है। यह भी नहीं कह सकते कि इसका कोई असर वहां अपराध को कम करने पर नहीं पड़ा हो। कानूनी भय की एक अपनी भूमिका है और यह भूमिका जारी रहे, अपराधमुक्त नागरिक समाज के लिए यह जरूरी भी है। पर जिस खास मामले में जज ने इस तरह की दरकार को रेखांकित किया है, वह गंभीर तो है ही कई मायने में विलक्षण भी है। संबंधों के बांध स्वेच्छा से लांघते जाने की छूट अगर बनी रहेगी और विवाह-परिवार जैसी संस्थाओं को विघटनकारी हस्तक्षेपों से बचाने की हमारी तत्परता अगर प्रभावी नहीं होती, तब तक 'परकीया' का पराभव 'स्वकीया' के मुकाबले मुश्किल है।

Sunday, May 8, 2011

देस में मना परदेस में अन्ना


दूर होकर भी हम किसी के बेहद करीब हो सकते हैं और कोई बेहद नजदीक होकर भी हमारा नहीं होता। ये बातें प्रेमाख्यानों और कविताई में ही नहीं, जिंदगी की कई दूसरी सूरतों में भी हम बारहा महसूस करते हैं। असल में दूरी और नजदीकी का सच समय, स्थान और परिवेश के साथ बदलता है। कहा यह भी जाता है कि दूरी हमारी पहचान के गाढ़ेपन को तो हल्का करती है पर उसके दायरे को बढ़ा देती है। नजरिया, मजहब, राजनीति, स्थान और बोली के अंतर देश में जिस अनेकता की लकीरों के रूप में दिखते हैं, देश के बाहर वही अनेकता हमें एकता के सूत्र में बांधती है। दूरी और मनुष्य के रिश्ते का यह मनोवैज्ञानिक सच तो है ही उसके सामाजिक और सार्वजनिक सलूक से जुड़ी बुनियादी बात भी है।
जिस अन्ना हजारे को अपने देश में और अपनी सरकार से अपनी बातें कहने-मनवाने के लिए 98 घंटे का अनशन करना पड़ा, उसी को लेकर सरकार को जब देश के बाहर अपनी बातें कहनी होती है तो वह इसे किसी टकराव या मतभेद के बजाय बहुदलीय लोकतंत्र प्रणाली का नया आयाम बताती है। वित्त मंत्री प्रणव मुख़र्जी उस लोकपाल बिल प्रारूप समिति के अध्यक्ष हैं, जिनमें पांच सदस्य सरकार की तरफ से और पांच सदस्य नागरिक समाज की नुमाइंदगी कर रहे हैं। स्वतंत्र भारत की इतिहास में यह अभिनव प्रयोग है, जब कानून बनान के लिए सामज और सरकार एक साथ बैठी है। चूंकि प्रयोग नया है, लिहाजा इस पर प्रतिक्रियाएं भी कई तरह की हैं। सरकार के साथ राजनीतिक बिरादरी में अभी तक इस बात को लेकर बयानबाजी जारी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का प्रयोग सैद्धांतिक तकाजों पर कितना खरा या खतरनाक है। पर ये बातें देश के भीतर जिस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म दे रही हैं, देश की सीमा से बाहर उसका स्वरूप इससे नितांत भिन्न है। अमेरिका से लेकर यूके और फ्रांस तक में अन्ना के सत्याग्रही प्रयोग के कई प्रशंसक हैं और वे अपने-अपने तरह से इस पहल को ग्लोबल बनाने के लिए प्रयासरत भी हैं।

इस स्थिति से सरकार भी अवगत है और वह इसे लोकतांत्रिक ढांचे के सशक्तिकरण की कोशिश के रूप में ही दुनिया के आगे रखना चाहती है। तभी तो एशियाई विकास बैंक की बैठक के दौरान जब प्रणव मुखर्जी को जब अन्ना हजारे को लेकर प्रतिक्रिया जतानी पड़ी तो वह यह स्वीकार करने में जरा भी नहीं हिचके कि लोकपाल मुद्दे पर सामाजिक संगठनों के दबाव में सरकार को तत्काल कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि कोई भी जिम्मेदार और जवाबदेह सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकती। मुखर्जी एक वरिष्ठ राजनेता हैं। वह यह जानते हैं कि लोकतंत्र की मर्यादाएं क्या हैं और किस तरह असहमतियों के बीच सहमति की गुंजाइश निकालनी पड़ती है। तभी तो वे इस मौके पर यह कहना भी नहीं भूले कि सरकार की कार्यप्रणाली के विभिन्न पहलू पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त तो होना ही चाहिए।
देश के बाहर देश की जिस तस्वीर को हम निहायत ही भावुकता के साथ बनाते हैं, उस तस्वीर का सच देश के भीतर भी प्रकट हो तो विचार और वस्तुस्थिति की अनेकता के बीच एकता कायम होगी। लोकपाल बिल प्रारूप समिति की अभी तीन बैठकें हुई हैं। बैठक के टेबल से सहयोग और सौहार्द का संदेश ही बाहर जाए ऐसी कोशिश दोनों पक्षों की तरफ से रही है। देश के भीतर भी ऐसा ही माहौल रहे तो बड़ी बात होगी। क्योंकि परेदस में देस याद आना और देस में इस याद का बिसर जाना खतरनाक है। यह बात कोई और समझे न समझे प्रणव दा तो जरूर समझते होंगे।

Thursday, May 5, 2011

अमूल बेबी की आरटीआई : जागरण में ‘पूरबिया’

राहुल का  भारतीय राजनीति के सबसे ख्यात और शक्तिशाली परिवार से आते हैं, उनकी पार्टी कांग्रेस भी देश की आज तक नंबर एक राजनीतिक पार्टी है। अगर लोगों के बीच जाना, उनसे जुड़ना, उन्हें समझना और लोक संवाद के जरिए लगातार संघर्ष के लिए तत्पर बने रहना राजनीति की कम से कम वह सीख तो नहीं ही है जिसमें एक तरफ जहां प्याली में क्रांति उबलती है, वहीं दूसरी तरफ लाल बत्ती से नेतृत्व का कद तय होता है। राहुल को लेकर एक राय यह भी है कि धैर्य और सरलता की राह उनकी नीति से ज्यादा रणनीति है। एक ऐसी रणनीति जो उनकी भविष्य में होने वाली ताजपोशी के लिए बनाई गई है। अगर यह बात सही है तो यह जनता के साथ एक और विश्वासघात होगा और लोकतंत्र में लोक की आस्था और भरोसे से खिलवाड़ का खामियाजा बहुत बड़ा है। राहुल को यह भी अभी से समझ लेना होगा...  


Tuesday, May 3, 2011

अमूल बेबी को भाई आरटीआई


संघर्ष लोकतंत्र में हमेशा जारी रहने वाली प्रक्रिया है। जिस राजनीति को हम सिर्फ सत्ता की दखली और बेदखली से जोड़कर देखते हैं, वह उस पूरी राजनीति के औचित्य का लेश मात्र भी नहीं, जिसकी एक बेहतर लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए दरकार है। यह बातें इसलिए भी समझनी होगी क्योंकि हमें यह लगता है कि नेता और जनता हमेशा एक-दूसरे के खिलाफ होते हैं, यही उनकी फितरत भी है और यही मौजूदा हालात में सतह पर आई सचाई भी है। दरअसल, राजनीति और संघर्ष के लोकतांत्रिक तकाजे जनता से जुड़े हैं, जनता के लिए हैं। इसलिए जन सरोकार से अलग या उसके उलट न तो कोई दूसरा सरोकार लोकतंत्र में मान्य है और न ही कोई दूसरा रास्ता। साफ है कि लोकतंत्र की ताकत अगर लोक है तो सत्ता और शक्ति के किसी दूसरे केंद्र का ताकतवर होना खतरनाक है। यही बात लोकतांत्रिक संघर्षों को लेकर भी है।
यह कहीं से मुनासिब नहीं कि 'राजपथ' का महत्व 'जनपथ' से ज्यादा हो। अगर जनता और नेता के संघर्ष के औजार भिन्न होंगे तो इसका मतलब है कि लोक के लोप की कीमत पर नेता नेतागीरी का स्कोप देख रहे हैं। जिन लोगों को भारतीय राजनीति में राहुल गांधी के आगमन और आगे बढ़ने के उनके सीधे-सरल लोकतांत्रिक तरीके पर जरा भी यकीन हो, उन्हें यह जानना अच्छा लगा होगा कि सरकारी योजनाओं में घपलों-घोटालों को उजागर करने के लिए उन्होंने ओरटीआई को हथियार बनाया है। इसके लिए उन्होंने न सिर्फ खुद से अर्जी लगाई बल्कि यह दिखाया भी कि नेतागीरी की धौंस और सत्ता की पागल कर देने वाली राजनीति में उनका कोई यकीन नहीं। कलावती की झोपड़ी में रात बिताकर परिवर्तन के सवेरे की बात करने वाले इस युवा नेता की कथनी और करनी अगर सचमुच एकमेक है तो यह बड़ी बात है।
राहुल भारतीय राजनीति के सबसे ख्यात और शक्तिशाली परिवार से आते हैं, उनकी पार्टी कांग्रेस भी देश की आज तक नंबर एक राजनीतिक पार्टी है। अगर लोगों के बीच जाना, उनसे जुड़ना, उन्हें समझना और लोक संवाद के जरिए लगातार संघर्ष के लिए तत्पर बने रहना राजनीति की कम से कम वह सीख तो नहीं ही है जिसमें एक तरफ जहां प्याली में क्रांति उबलती है, वहीं दूसरी तरफ लाल बत्ती से नेतृत्व का कद तय होता है। राहुल को लेकर एक राय यह भी है कि धैर्य और सरलता की राह उनकी नीति से ज्यादा रणनीति है। एक ऐसी रणनीति जो उनकी भविष्य में होने वाली ताजपोशी के लिए बनाई गई है। अगर यह बात सही है तो यह जनता के साथ एक और विश्वासघात होगा और लोकतंत्र में लोक की आस्था और भरोसे से खिलवाड़ का खामियाजा बहुत बड़ा है। राहुल को यह भी अभी से समझ लेना होगा।  
पिछले दिनों में कई ऐसी पहलें हुई हैं जिसमें आरटीआई सरकार के अपने कामकाज के साथ व्यवस्थापिका की कमजोरियों को तथ्यगत तौर पर उजागर करने का हथियार बना है। इस कारण कई मौके पर जहां जरूरी कदम उठाए गए, वहीं कई मामलों में अदालत तक ने सार्थक हस्तक्षेप किया। अभी नागरिक समाज की सजगता से भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल को लेकर जो मुहिम आगे बढ़ रही है उसके आगाज के पीछे भी आरटीआई कार्यकर्ताओं की सफलता ही है। दरअसल, यह एक ऐसी कानूनी ताकत है जिसके माध्यम से जनता सरकारी कामकाज, उसके खर्च ब्योरे और तौर-तरीकों पर सीधे सवाल उठा सकती है। सरकार और व्यवस्था के कामकाज का इस तरह सार्वजनिक होना, जहां उनकी विश्वसनीयता को बहाल करने का कारगर जरिया बना है, वहीं जनता को भी भरोसा हुआ है कि उसकी योजनाओं और उसके हक के साधनों की गिद्ध लूट अब संभव नहीं।