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Tuesday, July 26, 2011

अब आप सुनेंगे नई आकाशवाणी


समाचार की दुनिया कब सूचना में रातोंरात बदल गई यह खबरिया तंत्र के पंडितों को भी पता पहीं लगा। नहीं तो बात-बात में ब्रोकिंग न्यूज चला देने वाले चैनल मास्टरों को कम से कम संभलने का एक मौका तो जरूर मिलता।  बहरहाल अगर बात करें सूचना के दौर का आगाज की तो यह शुरुआत तकरीबन दो दशक पहले ही हो गया था। दिलचस्प है कि इस दौर की उठान अब भी थमी नहीं है। चौबीसों घंटे के टीवी चैनलों को जहां घरेलू होने का दर्जा मिल गया, वहीं मोबाइल फोनों से हमारे हाथ सूचना के औज़ार से लैश हो गए। इस सब के बीच अनसुनी रह गई तो वह 'आकाशवाणी' जिसने अपनी आवाज के जादू से हमारी कई पीढ़ियों को सम्मोहित किए रखा। यह आवाज जब एफएम के रूप में नई तकनीकी कुशलता से कानों तक पहुंची तो इसके रसियों का एक नया शहरी वर्ग पैदा हुआ।
दिलचस्प है कि आज चारों तरफ धूम टीवी चैनलों के साथ एफएम चैनलों की भी है, पर इस सबके पीछे निजी महारथ के आगे सरकारी कोशिशें मार खाती गईं। दूरदर्शन जहां आज किसी भी टीवी रिमोट का सबसे आखिरी बटन है, वहीं सरकारी एफएम रेडियो बस भूली-बिसरी याद जगाने वाला बहलाव भर। अब लगता है कि सरकार इस मुद्दे पर थोड़े पेशेवर तरीके से सोचने और  पहलकदमी के लिए तैयार हुई है। केंद्रीय कैबिनेट ने एक बड़े फैसले के तहत एफएम के तीसरे चरण के विस्तार को हरी झंडी दे दी है। इसके तहत 227 नए शहरों में निजी एफ रेडियो चैनल शुरू होंगे। और इसी एक साथ पूरा हो जाएगा देश के एक लाख से ज्यादा की आबादी वाले तमाम शहरों में एफएम रेडियो पहुंचाने का संकल्प। फिलहाल देश के महज 86 शहरों के के पास अपना एफएम रेडियो है। अकेले एफएम की बात करें तो सरकार का यह फैसला अब तक का सबसे बड़ा फैसला है क्योंकि इसके तहत न सिर्फ सबसे ज्यादा शहरों को एफएम सर्किट का हिस्सा बनाने का लक्ष्य पूरा होगा बल्कि फैसला यह भी लिया गया है कि निजी एफएम चैनलों को आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले समाचारों की छूट होगी। सरकारी कंटेंट के बाजार में सेलेबल बनाने की यह फैसला नीतिगत रूप से एक क्रांतिकारी कदम है।
अब तक सरकारी और निजी क्षेत्र इस तरह साथ मिलकर और  पेशेवर साझेदारी के साथ बहुत कम क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। जाहिर है कि इस बड़े फैसले का असर भी बड़ा होगा क्योंकि रेडियो और सेलफोन इस मामले में तो जरूर टीवी चैनलों पर भारी पड़ते हैं कि इन्हें आप अपने साथ कहीं भी ले जा सकते हैं। लिहाजा, आगे देश की एक बड्री आबादी के पास ये सुविधा होगी कि वह जहां है, वहीं स्थानीय खबरों, बाजार गतिविधियों और रोजगार की सूचनाओं को पा सकेगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी अपने मंत्रालय की तरफ से इस बड़ी पहल के कारण खासी गदगद हैं। उन्होंने एफएम के तीसरे चरण के विस्तार की जो रूपरेखा देश के सामने रखी है, उसमें पूरी पारदर्शिता के निर्वाह का वचन दिया है। उम्मीद है कि 2जी और 3जी के विवाद के बीच सरकार की ओर से किए गए इस फैसले को निर्विवादित रहने का श्रेय तो मिलेगा ही, जनता भी सरकार के इस असरकारी फैसले से खुश होगी। वैसे जहां तक बात सूचना और प्रसारण मंत्रालय के कामकाज और उपलब्धियों की है तो दूरदर्शन को लेकर कोई दूरदर्शी फैसला लेना अब भी बाकी है। लंबा समय हो गया और इस दौरान कई सरकारें आई- गईं पर प्रसार भारती की स्वायत्तता का एक तरह से तदर्थ रूप ही अब तक चला आ रहा है।
नतीजतन निजी टीवी चैनलों ने जहां इस दौरान अपनी पूंजी और पैठ काफी बढ़ा ली हैं, वहीं सरकार का दूरदर्शन रोज-ब-रोज आम लोगों से दूर होता जा रहा है। पहले तो यह शिकायत थी कि यह सरकार के विज्ञापन एजेंसी की तरह काम कर रहा है, पर अब तो आलम यह है कि इसकी पहुंच का रकबा भी सिकुड़ता जा रहा है। एफएम के विस्तार के बाद सरकार के सुधार और विस्तार एजेंडे पर निश्चित रूप से दूरदर्शन को आना ही चाहिए। और अगर ऐसा नहीं हुआ तो कहना पड़ेगा कि आज भी हमारी सरकार दूरदर्शी नहीं है।  

Sunday, July 24, 2011

इंडिया को पढ़िए फेसबुक पर


फेस टू फेस बात करने में यकीन करने वाले चौक जाएं। जमाना फेस टू फेस होने का नहीं बल्कि फेसबुक में दिखने और दर्ज होने का है। अपने इंडिया को तो यह फेसबुक इतना पसंद है कि इसको इस्तेमाल करने वाले टॉप टेन देशों में न सिर्फ उसका शुमार है बल्कि उसका स्थान भी बहुत नीचे नहीं बल्कि चौथा है।  देश में दस करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर्स बताए जाते हैं जिनमें करीब तीन करोड़ फेसबुक के रसिया हैं। इस सूची में अमेरिका 15 करोड़ से ऊपर की गिनती के  साथ अव्वल है। नए आंकड़ांे के अनुसार दूसरे नंबर पर इंडोनेशिया (3,88,60,460), तीसरे पर यूनाईटेड किंगडम (2,98,80,860) है। भारत में 2,94,75,740 लोगों के पास फेसबुक आईडी है। तीसरे और चौथे स्थान के बीच फासला बहुत मामूली है और जो स्थिति है उसमें भारत कभी भी अपनी पोजिशन सुधार कर चार से तीन नंबर पर आ सकता है।
पूरी दुनिया में फेसबुक के कुल यूजर्स की संख्या लगभग 75 करोड़ है। दरअसल, यह एक नया गणतंत्र है- फेसबुकिया गणतंत्र।  21वीं सदी का अपना नया गणतंत्र। यह अलग बात है कि इस नए डेमोक्रेटिक सोसाइटी के एक्चुअल बिहेवियर को एक्जामिन होना अभी बाकी है। अब तक इस नए डेमोक्रेसी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां एक्शन से ज्यादा तेज रिएक्शन है। बात ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की हो या लीबिया में सत्ता पलट के आंदोलन की, यह रिएक्शन हर जगह दिखता है। लीबिया मामले में तो अभी यह साफ होना भी बाकी है कि फेसबुक पर जनचेतना दिखी या जनचेतना का रिएक्शन फेसबुक पर प्रकट हुआ।  
दिलचस्प है कि संवाद के पुराने बिरसे को बहाल करने वालों में भी कई आधुनिकों ने अपने रुदन और विचार प्रसंग के लिए इंटरनेट को ही आैजार बनाया है। यही नहीं लोक अभियान के बूते चलने वाले लोकपाल बिल को लेकर चलने वाले अभियान का जंतर-मंतर भी इन्हीं फेसबुक, मोबाइल मैसज और इंटरनेट जैसे नए साइबर डाकियों के हवाले है। पर इतना तो आज भी कहना पड़ेगा कि यह सब सच इंडिया का है भारत का कतई नहीं। यह अलग बात है कि इस दौरान जहां इंडिया का साइज बढ़ा है, वहीं भारत के वासी और हिमायती कम हुए हैं, अलग-थलग पड़े हैं। भारत का संघर्ष आज भी 'बसपा' (बिजली, सड़क और पानी) के एजेंडे को ही साधने में पसीना बहा रहा है।  ऐसे में संवाद और मीडिया के माहिरों को बजाय इसके कि साइबर सरमाया कितना बढ़ गया है कुछ सवालों के जवाब जरूर देने चाहिए।
सबसे अहम सवाल तो यही कि संवाद क्रांति के दौर का अगर यह क्लाइमेक्स है तो आगे के सफर का हासिल क्या होगा? क्योंकि भी यही यह आलम है कि अगर हम महज दो मिनट में इंटरनेट पर डाउनलोड हुए वीडियो को देखने बैठें तो पूरे दो दिन का समय निकालना होगा। साफ है कि साइबेर दुनिया में अब पहले की तरह उड़ान संभव नहीं क्योंकि यहां भी अब जाम है, जमावड़ा है और भारी रेलमपेल मची है।  वैसे समझना यह भी होगा कि यह कि ईमेल से शुरू होकर फेसबुक तक पहुंची कामयाबी, क्या मनुष्य की संवादप्रियता के सामाजिक तथ्य पर मुहर लगाता है या फिर यह भीड़ और शोरोगुल से जानबूझकर दूर रहकर दुनिया को अपने तरीके से अकेले देखने-सुनने की स्वच्छंदता का आलम है। एक तकनीकी सवाल यह भी कि फेसबुक पर एकाउंटेबल होने वाली पीढ़ी के गोपन बनाम ओपन के संघर्ष में विजय पताका किसके हाथ लगी। बहरहाल, एक बात तो तय है कि तकनीक और फैटेंसी के मानवीय सरोकारों ने 21वीं सदी के आगाज को काफी हद तक अपने कब्जे में ले लिया है। आगे चलकर यह जिम्मेदारी इतिहास की होगी कि वह इसका अंजाम किसी फेसबुक में दर्ज कराता है कि कहीं और।

साभार : राष्ट्रीय सहारा


Thursday, July 14, 2011

पानी बरसने का सबूत महिलाएं दे रही हैं



बढ़ती गरमी बारिश की याद ही नहीं दिलाती, उसकी शोभा भी बढ़ाती है। केरल तट पर मानसून की दस्तक हो कि राजधानी दिल्ली में उमस भरी गरमी के बीच हल्की बूंदा-बांदी, खबर के लिहाज से दोनों की कद्र है और दोनों के लिए स्पेस भी। अखबारों-टीवी चैनलों पर जिन खबरों में कैमरे की कलात्मकता के साथ स्क्रिप्ट के लालित्य की थोड़ी-बहुत गुंजाइश होती है, वह बारिश की खबरों को लेकर ही। पत्रकारिता में प्रकृति की यह सुकुमार उपस्थिति अब भी बरकरार है, यह गनीमत नहीं बल्कि उपलब्धि जैसी है। पर इसका क्या करें कि इस उपस्थिति को बचाए और बनाए रखने वाली आंखें अब धीरे-धीरे या तो कमजोर पड़ती जा रही हैं या फिर उनके देखने का नजरिया बदल गया है। 
दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ अब तो सूरत, इंदौर, पटना, भोपाल जैसे शहरों में भी बारिश दिखाने और बताने का सबसे आसान तरीका है, किसी किशोरी या युवती को भीगे कपड़ों के साथ दिखाना। कहने को बारिश को लेकर यह सौंदर्यबोध पारंपरिक है। पर यह बोध लगातार सौंदर्य का दैहिक भाष्य बनता जा रहा है। और ऐसा मीडिया और सिनेमा की भीतरी-बाहरी दुनिया को साक्षी मानकर समझा जा सकता है। कई अखबारी फोटोग्राफरों के अपने खिंचे या यहां-वहां से जुगाड़े गये ऐसे फोटो की बाकायदा लाइब्रोरी है। समय-समय पर वे हल्की फेरबदल के साथ इन्हें रिलीज करते रहते हैं और खूब वाहवाही लूटते हैं। नये मॉडल और एक्ट्रेस अपना जो पोर्टफोलियो लेकर प्रोडक्शन हाउसों के चक्कर लगाती हैं, उनमें बारिश या पानी से भीगे कपड़ों वाले फोटोशूट जरूर शामिल होते हैं। बताते हैं कि नम्रता शिरोडकर की बहन शिल्पा शिरोडकर को कई बड़े बैनरों को फिल्में एक दौर में इसलिए मिलीं कि उसे कैमरे के आगे पानी में किसी भी तरह से भीगने से गुरेज नहीं था। खबरें तो यहां तक आर्इं कि उसे एक फिल्म में इतनी बार नहलाया-धुलाया गया कि अगले कई महीनों तक वह निमोनिया से बिस्तर पर पड़ी रही। हीरोइनों के परदे पर भीगने-भिगाने का चलन वैसे बहुत नया भी नहीं है। पर पहले उनका यह भीगना-नहाना ताल-तलैया, गांव-खेत से लेकर प्रेम के पानीदार क्षणों को जीवित करने के भी कलात्मक बहाने थे। 
वह दौर गया, जब रिमझिम फुहारों के बीच धान रोपाई के गीत या सावनी-कजरी की तान फूटे। जिन कुछ लोक अंचलों में यह सांगीतिक-सांस्कृतिक परंपरा थोड़ी-बहुत बची है, वह मीडिया की निगाह से दूर है। इसे उस सनक या समझ का ही कमाल कहेंगे कि टूथपेस्ट बेचना हो या मानसून आने की खबर देनी हो, तरीका चाहे जो भी हो होता दैहिक ही है। बारहमासा गाने वाले देश में आया यह परिवर्तन काफी कुछ सोचने को मजबूर करता है। यह फिनोमना सिर्फ हमारे यहां नहीं पूरी दुनिया का है। पूरी दुनिया में किसी भी पारंपरिक परिधान से बड़ा मार्केट स्विम कॉस्टयूम का है। दिलचस्प तो यह कि अब शहरों में घर तक कमरों की साज-सज्जा या लंबाई-चौड़ाई के हिसाब से नहीं, अपार्टमेंट में स्विमिंग पूल की उपलब्धता की लालच पर खरीदे जाते हैं। इस पानीदार दौर को लेकर इतनी चिंता तो जरूर जायज है कि पानी के नाम पर हमारी आंखों और सोच में कितना पानी बचा है। अगर पानी होने या बरसने का सबूत महिलाएं दे रही हैं तो फिर पुरुषों की दुनिया कितनी प्यासी है। 

Wednesday, July 13, 2011

...तो यशपाल भी करने लगे आंदोलन की बात


सूचना और जानकारी का जितना बोझ आज हम अपने माथे पर धो रहे हैं, उतना इससे पहले शायद ही कभी हमारे पूर्वजों ने ढोया है। यही तो इंफोरमेशन एज का फिनोमेना कि सब सर्वाधिक सूचित हैं। ग्लोबली कनेक्ट रहने की दरकार आज हमारी जरूरत में शुमार है, कम से कम 21वीं सदी का एक जागरूक शहरी नागरिक समाज तो आज जरूर ऐसा कहने और मानने लग गया है। दिलचस्प है कि इस सब में 'ज्ञान' की को कुछ ज्यादा ही आधुनिक हवाओं से मुठभेड़ करना पड़ा और अब इस ज्योति को दोबारा जलाने का जोखिम अव्वल तो कोई लेना नहीं चाहता और अगर लेना चाहे भी तो उसे पुरा प्राच्य संस्कार का अघोरपंथी करार देने वालों की कमी नहीं होगी।
ज्ञान को शिक्षा की औपचारिकता में देखने के हिमायती तो पहले से ही थे। हाल के दशकों में तो ह्यूमन रिसोर्स जैसे पेशवर शब्द इसके लिए ज्यादा सटीक मानकर चल रहे हैं। दरअसल, यह फर्क सिर्फ नजरिए या समझदारी का नहीं, उस दौर का भी है जहां अकेली नियामक शक्ति बाजार है। शिक्षा के कैंपसी और सिलेबसी ढांचें में कई परिवर्तनों के वाहक और कारक रहे प्रो. यशपाल को भी आज लगता है कि जो स्थिति है, उसमें महज सुधारात्मक पहलों से काम नहीं चलेगा बल्कि शिक्षा को लेकर एक स्वतंत्र आंदोलन की दरकार है। गौरतलब है कि  ऐसा कहने वाले यशपाल इतिहास में अकेले शख्स नहीं हैं।
गांधी को उनके सर्वोदयी या रचनात्मक अभिक्रमों के लिए याद करने वालों को पता होगा कि आजादी का अलख जगाने वाले राष्ट्रपिता ने बुनियादी तालीम जैसी अवधारणा आजादी से पहले रखी। यह बात दीगर है कि इस लीक को आगे बढ़ाने वाले तपे-तपाए लोग तो कई आए पर कोई बड़ा आंदोलनात्मक आरोहण सिरे नहीं चढ़ सका। जमनालाल बजाज सम्मान से सम्मानित सर्वोदयी कार्यकर्ता प्रेम भाई तो कुछ दशक पहले तक देश में अक्षर सेना के अभिनव संकल्प को पूरा करने में लगे थे। दुर्भाग्य से संकल्प पूरा होने से पहले ही उनकी आयु पूरी हो गई। आज आलम यह है कि शिक्षा के संस्थान कम दुकान और ठीए ज्यादा हैं। देशभर में चल रही 500 यूनिवर्सिटी और 31 हजार कॉलेज में से 60 फीसद अवैध हैं क्योंकि राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रतिबद्धता परिषद (नैक) ने इन्हें मान्यता के काबिल नहीं समझा है। काले धन की तर्ज पर कहना होगा तो कहेंगे कि देशभर में काली तालीम का धंधा धड़ल्ले से चल रहा है। सरकारी स्कूल-कालेजों के खस्ताहाल होते जाने का फायदा निजी संस्थान उठा रहे हैं और सरस्वती के मंदिरों में धूप-धुम्मन करने का बीड़ा लक्ष्मी के उल्लुओं ने उठा लिया है। 
देश के रचनात्मक निर्माण को लेकर आजीवन संघर्ष करने वाले आचार्य राममूर्ति अकसर इस बहस की गुत्थी को सामाजिक कार्यकताओं के आगे खोलते थे कि पहले शिक्षा या पहले जागरूकता। यह सवाल पहले अंडा कि पहले मुर्गी जैसा है। राममूर्ति जी गुत्थी की फांस खोलते हुए समझाते थे कि दोनों एक-दूसरे से सर्वथा जुदा नहीं, इसलिए पहले कौन का सवाल नहीं। एक जागरूक और शिक्षित समाज का निर्माण दरअसल एक ऐसा लक्ष्य है जिसके लिए पहल एक साथ जरूरी है।
आज सरकार के तमाम मिशनों और कमीशनों की फाइल एक तरफ सरकाते हुए प्रो. यशपाल अगर शिक्षा के लिए क्रांति की बात कर रहे हैं तो उसके पीछे वजह यह है कि जिज्ञासा, शोध और  अविष्कार का सामाजिक रिश्ता कहीं खो सा गया है और जो समाने आया है, वह है करियर, ग्रोथ और सक्सेस जैसे बाजारवादी रास्ते और लक्ष्य। लिहाजा, अगर इस बदले रास्ते और मंजिल के अनुभव अगर अब सचमुच हमें सालने लगे हैं और हम इनसे वाकई उबरना चाहते हैं तो इसके लिए एक क्रांतिकारी संकल्प की दरकार होगी। पर जो स्थिति है, उसमें यह मानना मुश्किल है कि करेज फॉर करियर और पैशन फॉर सक्सेस की युगलबंदी का हॉट रोमांस ठंडा पड़ने लगा है। सो ज्ञान के पिपासुओं को अभी कुछ और दिन पानी से गला तर करने की बजाय रेत ही फांकना पड़ेगा।

Sunday, July 10, 2011

सत्यजीत रे नहीं होना चाहते थे मणि कौल

अभिव्यक्ति की तमाम विधाएं हैं तो अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र और सक्षम  पर इनके भीतरी सरोकार के धागे पूरी तरह सुलझाए नहीं जा सकते। क्योंकि अगर ऐसा सभंव होता तो फिर उमा शर्मा का कत्थक मिर्जा गालिब की गजलों से नहीं थिरकता और न ही हुसैन राममनोहर लोहिया के कहने पर रामायण पर अपनी विख्यात श्रृंखला को कैनवस पर उतारते।  इस लिहाज से माना यही जाता है कि ये माध्यम स्वतंत्र जरूर हैं पर स्वायत्त या पूरी तरह मुक्त नहीं। पर मामला इससे आगे नजर और नजरिए का भी है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर प्रेमचंद तक को सेल्योलाइड तक ले जाने वाले सत्यजीत रे आजीवन यह समझाते रहे कि वह किसी भी कृति पर फिल्म बनाने की शुरुआत शून्य से करते हैं। उनका तकाजा विधा बदलने के साथ कृति के आस्वाद को बदल जाने की जरूरत को खारिज नहीं करता। जबकि मणि कौल जैसे फिल्मकार ने इस तकाजे को दरकिनार कर न सिर्फ कृति को केंद्र में लाया बल्कि साहित्यक रचनाओं के फिल्मांकन का नया व्याकरण भी रचा।
कौल अब हमारे बीच नहीं हैं पर 66 वर्ष का उनका जीवन और उस दौरान की उनकी उपलब्धियां हमारे बीच है। बीप...बीप... और बोल्डनेस की नई कायिक और भाषिक समझ के बीच जिस भारतीय सिने जगत का कद आज ग्लोबली तय हो रहा है, उसमें मणि कौल के फिल्म बनाने के तरीके और उससे जुड़े सरोकार एक जलती मशाल की तरह है, जिससे अंधकार और भटकाव के दौरान हम रौशनी ले सकते हैं। दिलचस्प है कि कौल का फिल्मी सफर निर्देशन के बजाय राजेंद्र यादव की कहानी 'सारा आकाश' में अभिनय से शुरू हुई थी। यह आगाज ही साहित्य से उनको आगे और गहरे जोड़ते चला गया। 'घासीराम कोतवाल' , 'आषाढ़ का एक दिन, 'दुविधा, जैसे इंडियन क्लासिक्स से लेकर दास्तोवस्की के 'इडियट' जैसी महान रचना का फिल्मांकन उन्होंने किया।
कौल की यह खासियत तो रही ही कि वह साहित्यकि कृतियों की मूलात्मा को फिल्म में भी भरसक बहाल रखना चाहते थे, उन्होंने प्रचलित और लोकप्रिय की बजाय विभिन्न शैलियों की कई आपवादिक रचनाओं पर काम करने का जोखिम भी लिया। जिस मुक्तिबोध पर बोलते और लिखते हुए आज भी हिंदी साहित्य के दिग्गजों तक के पसीने छूटते हैं, कौल ने उनकी 'सतह से उठता हुआ आदमी' को परदे पर उतारने का चैलेंज न सिर्फ लिया बल्कि उसे बखूबी पूरा भी किया।  मणि कौल के काम करने के ढ़ंग और उनके सरोकारों की जानकार नए भारतीय सिनेमा के इस बड़े हस्ताक्षर को उनके सौंदर्यबोध के लिए भी याद करते हैं। यह अलग बात है कि यह सौंदर्यबोध सनसनी उभारने के बजाय संवेदना के आत्मिक स्पर्श का धैर्य लिए थे। यही कारण है कि कौल के कई आलोचक यह भी कहते रहे हैं कि उनके साहित्यप्रेम ने उन्हें कभी सौ फीसद फिल्मकार बनने ही नहीं दिया। क्योंकि कैमरे में क्या बेहतर और कितना समा सकता है, इसके उसूलों की उन्होंने कभी परवाह नहीं की।
 अलबत्ता यह भी है कि लैंस की नजरों पर भरोसा करने वाले उसे पीछे से देख रही मानवीय आंखों के चढ़ते-उतरते पानी को अगर खारिज कर सकते हैं तो उन्हें कौल जैसे फिल्मकार को ज्यादा समझने का खतरा भी नहीं लेना चाहिए। दरअसल, कौल इन्हीं आंखों को नम और चमक से भर देने वाले फिल्मकार थे। कौल के जाने के साथ ही नया सिनेमा का मणि भी कहीं खो गया, ऐसा लगता है।

Wednesday, July 6, 2011

किंतु परंतु के साथ उदार हम


भारत विशिष्टताओं से ज्यादा विलक्षणताओं का देश है। इसी तर्ज पर आप चाहे तो यह भी कह सकते हैं अपना देश विविधताओं से ज्यादा अंतर्विरोधों से भरा है। यह बात न सिर्फ सधी जुमलेबाजी में बेखटके चलती है बल्कि समय और समाज के वरिष्ठ टीकाकारों ने भी अपने अनुभव से इस तथ्य पर मुहर लगाई है। यही कारण है कि पूरी दुनिया में जो हवा एक दिशा से बहती है, उसका रुख भी यहां आकर बदल जाता है। दलित राजनीति के कागजी धुरंधरों से लेकर प्रगतिशील समाजविज्ञानियों तक ने माना है सामाजिक गैरबराबरी के पीछे एक बड़ी वजह आर्थिक गैरबराबरी है।
यह भी खासा दिलचस्प ही है कि अपने यहां बाजार और सामाजिक न्याय का मुद्दा एक साथ राजनीति, संसद और समाज के एजेंडे में शुमार हुअा। पिछले तीन दशकों में जहां विकसित और चमकदार भारत के छालीदार इमेज को अपनी सफलता में शामिल करने वाली सरकारें आई, वहीं देश में एक नवसंपन्न वर्ग अचानक शहरों से लेकर कस्बों तक पसरता चला गया। पर कहते हैं न कि लिखावट बदलने से भाषा नहीं बदलती, सो भारतीय समाज का अंतर्विरोध भी इस दौरान कम होने के बजाय नई जटिलताओं के साथ और बढ़ीं। जिस दौर में आप महज एक फोन कॉल पर पिज्जा-बर्गर और आइसक्रीम का स्वाद आप ले सकते हैं, उसी दौर में सिर पर मैला ढ़ोने को अभिशप्त एक समाज हमारे बीच रहता है, यह सचाई हमारे विकास और संपन्नता के हर दावे को धोकर रख देता है।
अच्छा लगता है कि अब भी कुछ लोगों, समूहों और संगठनों को यह लगता है कि नए समय का नया समाज भी सर्वथा विभेदमुक्त होना चाहिए। ऐसे  ही एक प्रयास के तहत दो सौ से ज्यादा अछूत महिलाओं का शिवनगरी काशी ने मुक्त और खुले ह्मदय से न सिर्फ स्वागत किया बल्कि यह संदेश भी दिया कि इंसान और भगवान दोनों की नजर में सब सामान्य हैं। सिर पर मैला ढोने वाली इन महिलाओं ने न सिर्फ जिंदगी में पहली बार मंदिर की देहरी लांघी बल्कि उस पात में बैठकर साथ में खाना भी खाया जिनके बीच अछूत होने की उसकी शिनाख्त न जाने कितनी पीढ़ियों से गाढ़ी होती आ रही थी। यहां यह बात भी गौरतलब है कि भारत की विश्व पहचान में उसके धार्मिक और आध्यात्मिक बिरसे का भी खासा योगदान रहा है। इसलिए अगर किसी कर्मकांडी या सामाजिक जहालत के नाम पर चले आ रही विभेदकारी मध्यकालीन मलीनता अगर आज भी हमारी मानसिकता को घेरता है तो यह सचमुच एक शर्मनाक स्थिति है और इसका बचाव किसी भी सूरत में करना एक बर्बर कार्रवाई होगी। आखिर जिस पूरे दौर को ही उदारवादी और हर स्तर पर खुले होने का ग्लोबल तमगा हासिल है, उस दौर में अनुदारता समाज या विचार के भीतर किसी सूरत बनी रहे, यह मुनासिब नहीं।