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Sunday, November 14, 2010

अमन की मौत


हिमाचल प्रदेश के अमन काचरू रैगिंग मामले में चार दोषी छात्रों को दो साल से भी कम समय में सजा सुनाया जाना सराहनीय तो है ही, यह फैसला आगे के लिए एक बेहतर मिसाल भी साबित हो सकता है। 19 साल के अमन को मेडिकल के सीनियर छात्रों ने रैगिंग के नाम पर बुरी तरह पीटा था। उसने इस घटना की शिकायत कॉलेज अधिकारियों आैर प्रबंधन से भी की थी। पर उसकी हालत इतनी नाजुक हो चुकी थी कि इस मामले में कुछ हो पाता उससे पहले ही उसकी मौत हो गई। अच्छी बात यह रही कि अमन के परिवार वालों ने इस घटना को न्यायिक संघर्ष का मुद्दा बनाया। उन पर काफी दबाव भी था पर वे अपने बच्चे के खिलाफ बरती गई बर्बरता को भूलने को तैयार नहीं थे। सत्र न्यायालय के फैसले के बाद अमन के पिता राजेंद्र काचरू ने कहा भी कि मैं इसे सिर्फ अपनी जीत के रूप में नहीं देखता  बल्कि यह उन लोगों की जीत है, जो न्यायिक सुधारों के लिए आैर रैगिंग के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। दरअसल, रैगिंग का पूरा संदर्भ न सिर्फ शैक्षिक परिसरों के अनुशासन से जुड़ा है बल्कि यह समय आैर शिक्षा के साथ उन तमाम कारकों से जुड़ा है जिसका प्रभाव आज युवाओं के मन-मस्तिष्क पर पड़ रहा है। लिहाजा, इसे सिर्फ ' कैंपस डिसीप्लीन" का मुद्दा मानकर सरलीकृत करना खतरनाक है। दिलचस्प है कि अपने विचारों आैर कई बदलावकारी पहलों के लिए लगातार सुर्खियों में बने रहने वाले मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल का सबसे ज्यादा जोर शिक्षा आैर परीक्षा की रूढ़ता को तोड़ना है। इस परविर्तन की जरूरत शायद इसलिए महसूस हो रही है कि नये परिवेश आैर चुनौतियों के साथ नई पीढ़ी का समन्वयकारी रिश्ता बहाल हो, न कि वे उन पर अचानक हावी हो जाएं। पर यह सब सिर्फ सिलेबस बदलने या एक्जाम फार्मेट के रद्दोबदल मात्र से तो होने से रहा। सेक्स, सक्सेस आैर सेंसेक्स के त्रिफांस में युवा जिस तेजी से आज फंस रहे हैं, वह उनके पूरे मानसिक गठन आैर विकास को प्रभावित कर रहा है। घर का माहौल या शिक्षण परिसर ही अब मात्र उनके स्वभाव को बुनियादी तौर पर नहीं रच रहे बल्कि बाजार के झरोखे उसे  हर कहीं अपने पास बुलाने के लिए खुले हैं। संवेदना आैर संबंधहीनता के खतरों के बीच पल रही पीढ़ी को ज्यादा सहिष्णु बनाए रखने का एक तरीका तो यह है कि उनके परिवेश को भरसक स्वस्थ बनाने के प्रति जागरूकता बढ़े, दूसरे युवा जोश को अपराध मानसकिता की तरफ बढ़ने से रोकने के लिए सख्ती बढ़े, जैसा कि अमन काचरू मामले में देखने को मिलता है। अमन का मामला इस मामले में अहम है कि इसमें दोषियों को न सिर्फ सजा सुनाई गई बल्कि इस तरह की प्रवृत्ति किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है, इसके लिए 38 लोगों ने गवाही दी। यह हमारे समाज की न्यायप्रियता की तो मिसाल है ही, इससे उसकी अपनी चिंताओं से निपटने के प्रति प्रतिबद्धता भी जाहिर होती है। रैंिगंग का चलन एक बर्बर चलन है। कानूनन तो यह अमान्य है ही, मानवीय दृष्टि से भी यह जघन्य प्रवृत्ति है। इसके खिलाफ न सिर्फ सरकारी पहलों की दरकार है बल्कि नई पीढ़ी को संवेदना के खिलाफ सिर उठा रहे मंसूबों से भी बचाने की तैयारी करनी होगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य की पीढ़ी को संवेदनशील वर्तमान देने का संकल्प 'सरकारी" ही नहीं 'असरकारी" भी साबित होगा।

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