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Friday, February 28, 2014

संभावित बदलाव के साथ नई राजनीति का दौर

इस बार के लोकसभा चुनाव में फैसला महज इस बात का नहीं होगा कि दिल्ली में सरकार कौन बनाएगा, बल्कि यह चुनाव देश की राजनीति को भी नए निकष पर कसने जा रहा है। यह इस लिहाज से जरूरी भी है कि बीते कुछ दशकों में जनता को राजनीतिक विचारधारा और उसके प्रति दिखाई जाने वाली प्रतिबद्धता के नाम पर खतरनाक तरीके से बहलाया-भड़काया और बांटा जाता रहा है।
दरअसल, देश की राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व के खिलाफ आई गैरकांग्रेसवाद की डॉ. राममनोहर लोहिया की अवधारणा के बाद जिस तरह सेक्यूलर और अस्मितावादी राजनीति ने अपना रकबा बढ़ाया, उसने भारतीय राजनीति के अखिल चरित्र को क्षेत्र, जाति और वर्ग के खांचों में पूरी तरह बांटकर रख दिया। सोशल इंजीनियरिंग की सामयिकता और दरकार की वकालत करने वालों की नजर में लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक अन्याय के खिलाफ यह एक जरूरी राजनीतिक कार्रवाई है। पर यह कार्रवाई कई तरह की प्रतिक्रियावादी अनीतियों-कुतर्कों की जिस तरह शिकार हुई, वह काफी चिंताजनक है।
चिंता की इस जमीन को समझने के लिए खासतौर पर बीते दो दशकों में उत्तर प्रदेश में बसपा की राजनीति को देखा जा सकता है। दलित या बहुजन समाज की बात करने वाली पार्टी की नेता मायावती ने नई सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर ब्राह्मणों-क्षत्रियों सबके मंच पर गईं और अपने लिए वोट का जुगाड़ किया। बात बनी तो सनक इस तरह सवार हुई की बहनजी सरकार में आने पर सूबे में कई जगहों पर करोड़ों रुपयों की लागत से अपनी मूर्तियां लगवाने लगीं। इसी तरह की राजनीति अपनी-अपनी सुविधा से बिहार में लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान करते रहे हैं। थोड़े किंतु-परंतु के साथ इस सूची में आप चाहें तो नीतीश कुमार को भी गिन सकते हैं।
अब जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव के दिन करीब आते जा रहे हैं अस्मितावाद के नाम पर क्षेत्रवाद की राजनीति करने वालों के पांव के नीचे से जमीन खिसकती जा रही है। इस स्थिति को और समझने के लिए आपको मायावती के पिछले दिनों आए उस बयान पर गौर करना होगा, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए सांप्रदायिकता विरोधी ताकतों की एकजुटता की बात की थी। बहनजी ने कितने दफे भाजपा के साथ आकर यूपी में सत्ता सुख भोगा है, यह कोई ज्यादा पुराना इतिहास नहीं है। अब जब उन्हें लग रहा है कि एक व्यक्ति गुजरात से निकलकर पूरे देश में विकास और देश के नवनिर्माण की बात कर रहा है तो उन्हेंयह खौफ खाए जा रहा है कि कहीं यह लोकप्रियता उनकी सियासी जमीन को ही न हड़प ले।
बात यूपी की निकली है तो राजनीति के पुराने पहलवान मुलायम सिंह यादव का भी जिक्र जरूरी है। अपनी सेक्यूलर छवि के लिए मुस्लिम तुष्टि की हर हद को छूने वाले नेताजी को इन दिनों सबसे ज्यादा आक्रोश इसी बिरादरी से देखने को मिल रहा है। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद 'मुल्ला मुलायम’ का सियासी तिलिस्म किस कदर दरका है, इसकी मिसाल है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जाने का दौरा नेताजी को रद्द करना पड़ा। वहां के छात्र उनके विरोध में सड़कों पर उतर आए थे। छात्रों का आक्रोश मुजफ्फरनगर दंगे को लेकर सपा सरकार के अगंभीर रवैए को लेकर था। दिलचस्प है कि यह वही विश्वविद्यालय है, जहां एक जमाने में मुसलमानों के सबसे बड़े रहनुमा के तौर पर मुलायम की आवभगत होती थी। इस सबसे घबड़ाए नेताजी सांप्रदायिकता का खौफ दिखाकर भरसक कोशिश कर रहे हैं कि मुसलमानों का साथ उन्हें फिर से मिल जाए। तीसरे मोर्चे का तंबू एक बार फिर तानकर वे आखिरी सियासी दांव चल रहे हैं। पर शायद अब बहुत देर हो गई है।
नया ताजा पॉलिटकल ड्रामा बिहार में खेला जा रहा है। उत्तर प्रदेश में दलित नेता उदित राज के भाजपा में शामिल होने के साथ ही खबर आई कि दलित राजनीति के पुराने सूरमा रामविलास पासवान भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ सकते हैं। इन दोनों खबरों ने हिंदी पट्टी में बीते कम से कम से कम दो दशकों से चली आ रही दलित राजनीति के अस्मितावादी तकाजे को एक तरह से अप्रासंगिक ठहरा दिया।
दिलचस्प तो यह रहा कि इस बड़े सियासी उलटफेर के साथ खबर यह भी आई कि बिहार में लालू यादव की राजनीति का लालटेन अचानक बुझने लगा है। एक जमाने में बैलेट बॉक्स से 'जिन्न’ निकालने का दावा करने वाले लालू प्रसाद यादव को अपनी ही पार्टी में
विरोध की आग को ठंडा करने में पसीना बहाना पड़ रहा है।
इन तमाम सियासी घटनाक्रमों को एक सीध में रखकर देखें तो कुछ बातों के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। पहला संकेत तो यही है कि गठबंधन राजनीति के दौर में क्षेत्रीय राजनीति की जो गुंजाइश बढ़ गई थी, वह अब सिमटती जा रही है। न सिर्फ यूपीए और एनडीए बल्कि अब देश की नई राजनीति कांग्रेस और भाजपा के दो ध्रुवों में बंटती नजर आ रही है। भारत की बहुलतावादी एकता के सूत्रों को समझने वालों की नजर में यह एक पॉजिटव पॉलिटकल डेवलपमेंट है।
इससे आगे की बात करें तो पूरे देश में नमो को लेकर आकर्षण है। इस स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पहले जो बात कांग्रेस के कुछ नेता अलग-अलग कह रहे थे, वह बात अब अरविंद केजरीवाल तक कह रहे हैं कि मोदी की कहीं न कहीं लहर तो जरूर है। हालांकि इसे समझने के लिए ग्राउंड रिपोट्र्स का ही भरोसा ज्यादा करना चाहिए क्योंकि ओपिनियन पोल्स पर नए स्टिंग ने इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठा दिए हैं।
अगर यह स्थिति वाकई है तो इसके चुनावी फलित को इस रूप में देखा जा सकता है कि इस बार मोदी की छतरी के नीचे कई ऐसे दल और नेता आ सकते हैं, जो अब तक दलित-पिछड़ा या सेक्यूलरवाद की आड़ में अपनी राजनीति खेलते रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो वाकई देश की राजनीति को देखने-समझने का पिछले दो-तीन दशकों का नजरिया बदल जाएगा। नए नजरिए में न तो कथित अस्मितावादी तकाजों के लिए कोई जगह होगी और न ही छद्म सेक्यूलरवाद के लिए कोई गुंजाइश।
यह नया बदलाव देश में राजनीति के तर्क को जहां और ठोस करेगा, वहीं पक्ष या विरोध की राजनीति के लिए स्टैंड लेने वालों को ज्यादा गंभीर लोकतांत्रिक विवेक दिखलाना होगा। अपने साढ़े छह दशक से भी लंबे सफरनामे के बाद अगर भारतीय राजनीति इस मुकाम तक पहुंची है, तो यह सचमुच काफी सुखद है। कह यह भी सकते हैं कि इस संभावित बदलाव के साथ देश में 21वीं सदी की नई राजनीति का दौर शुरू होगा।
 

Monday, February 24, 2014

केजरीनोमिक्स

कोई भी नया आंदोलन अपनी प्रकृति में बहुत मुक्त होता है। पर यह खुलापन तभी तक रहता है जब तक आंदोलन से जुड़े विचार और संगठन को आकार नहीं मिल जाए। आम आदमी पार्टी (आप) के अभ्युदय और उसके पीछे की पृष्ठभूमि को समझें तो यह बात और साफ होगी। भ्रष्टाचार को लेकर एक सशक्त कानून की मांग के साथ शुरू हुआ आंदोलन देखते-देखते संगठन और विचार के अनुशासन में ढलता गया। इस स्वाभाविकता में किसी तरह की विसंगति देखने की जरूरत नहीं है पर इतनी टिप्पणी तो करनी ही पड़ेगी कि विचारधारा और संगठन की औपचारिकता में ढलने से पहले इस आंदोलन के नेताओं को कोई भी बात कहने में बहुत सोचना नहीं पड़ता था। वे भ्रष्टाचार की बात छेड़कर देश के साढ़े छह दशक की गणतंत्रीय यात्रा और मौजूदा राजनीति व पार्टी सिस्टम पर अंगुली उठा देते थे। पर अब जबकि यह पार्टी चुनावी राजनीति का बकायदा हिस्सा है तो उसे भी अन्य सियासी जमातों की तरह ही देखा जा रहा है और पूछा जा रहा है कि वह देश के विकास के बारे में क्या सोचती है, उसकी अर्थनीति क्या है, वह मुक्त बाजार व्यवस्था की हिमायती है या नहीं आदि।
हमलावर रहे विरोधी दलआप पर उनके विरोधी दलों की तरफ से बार-बार यह हमला किया जाता रहा कि यह एक कन्फ्यूज्ड पार्टी है, इसकी कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है, खासतौर पर आर्थिक मोर्चे पर देश को कैसे तरक्की की राह पर ले जाएं, इस बारे में पार्टी के पास पहले से तैयार कोई ब्लूप्रिंट नहीं है। पर आज स्थिति बदल गई है। एक 'कन्फ्यूज्ड’ और 'अराजक’ ठहराई जाने वाली पार्टी ने धीरे-धीरे देश और समाज से जुड़े तमाम सवालों और सरोकारों पर अपना रुख साफ करना शुरू कर दिया है। अलबत्ता भ्रष्टाचार का पूर्ण निषेध जरूर आज भी आप का कोर एजेंडा है पर पार्टी अब अर्थव्यवस्था, विकास और सरकारी कामकाज को लेकर प्राथमिकताओं पर खुलकर अपनी राय जाहिर कर रही है। यह देश के लिए भी काफी सुखद है। क्योंकि इससे पहले इस पार्टी के गठन और चुनावी राजनीति पर इसके असर को लेकर ही कयासबाजी ज्यादा होती थी, इसके वैचारिक स्टैंड को लेकर बहुत बात नहीं हो पाती थी।
अर्थ से परहेज मुश्किलयहां एक बात और समझने की है मौजूदा दौर में अमेरिका में बराक ओबामा हों या भारत में नरेंद्र मोदी अथवा अरविंद केजरीवाल, उनके नेतृत्व का आकलन इसी बात पर ज्यादा होगा कि उनका इकोनमिक विजन क्या है और वे इसे सरजमीं पर उतारने के लिए क्या कुछ करते हैं। इस दरकार को खारिज कर कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता। यह बात आज देश में सबसे ज्यादा किसी को समझ में आ रही है तो वह हैं अरविंद केजरीवाल।
दिल्ली में जब उन्होंने सरकार बनाई तो उन्होंने मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई को मंजूरी के शीला सरकार के फैसले को पलट दिया था। इसके बाद दिल्ली में बिजली के वितरण के काम में लगी निजी कंपनियों पर भी उन्होंने खुलेआम भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। बाद में कंपनियों के लेखा की जांच का जिम्मा भी उन्होंने कैग को दे दिया। सरकार गिरने से पहले केजरीवाल ने गैस की कीमत में प्रस्तावित बढ़ोत्तरी को लेकर उन्होंने एक साथ केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली और रिलांयस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।
आशंकित थे उद्यमीऐसे में देश भर में खासतौर पर उद्यमियों के बीच यह आशंका तेजी से फैली की कि क्या आप सचमुच इतनी अराजक है कि वह अर्थ और विकास के इंजन को भी पटरी से उतार दे। आप ने भले ये सब कदम ये सोचकर उठाए हों कि इससे उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकप्रियतावादी राजनीति करने में मदद मिलेगी, पर बाद में पार्टी को यह समझने में देर नहीं लगी कि उसे इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। फिर क्या था अरविंद केजरीवाल देश के उन शीर्षस्थ उद्योगपतियों के बीच पहुंच गए, जिनके मंच से अपनी बात कहना नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी से लेकर देश के किसी भी नेता के लिए सर्वाधिक गौरव और संतोष का विषय होता है।
सीआईआई के मंच पर 17 फरवरी को वित्तमंत्री पी. चिदंबरम संसद में अंतरिम बजट पेश कर रहे थे और इसी दिन भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के मंच पर अरविंद केजरीवाल देश के चोटी के उद्यमियों को यह समझा रहे थे कि न तो वे और न उनकी पार्टी उद्योग जगत के खिलाफ है। इसे उन्होंने जानबूझकर किया जाने वाला दुष्प्रचार करार दिया। उन्होंने जो बातें वहां साफ कीं, उनमें सबसे अहम था कि वे निजी क्षेत्र का देश के विकास में अहम रोल मानते हैं।
यही नहीं उन्होंने यहां तक कहा कि यह क्षेत्र अपनी क्षमता और ऊर्जा के मुताबिक आज देश में इसलिए परफॉर्म नहीं कर पा रहा क्योंकि सरकार की व्यवस्था भ्रष्ट है। भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात कहने वाले केजरीवाल ने साफ किया कि उद्यमियों की बिरादरी में महज कुछेक लोग ही हैं जो भ्रष्ट तरीके से काम करते हैं। यही नहीं उन्होंने देशभर के उद्यमियों को आप के साथ जुड़ने का खुला न्योता भी दिया। केजरीवाल की इन बातों से इतना तो साफ है कि खुद को अराजक तक कहने वाले नेता को भी इतना पता है कि उसके अनर्थकारी सोच से परिवर्तन की उसकी मुहिम एक सीमित दूरी से आगे नहीं बढ़ सकती।
गंवाया मौका वैसे ये सब तो रहीं कहने-सुनने भर की बातें। ये ठीक है कि अब एक मौका है कि लोग आप के बारे में बात करते हुए उसके आर्थिक चिंतन की भी बात करेंगे। ऐसा करते हुए तटस्थ मन:स्थिति के लोग जहां आलोचकीय विवेक दिखलाएंगे, वहीं दलीय राजनीति के दिग्गज अब अर्थ के मोर्चे पर भी आप को पटखनी देना चाहेंगे। दिलचस्प है कि आप की सोच और विचारधारा को लेकर अब तक एक ही एसिड टेस्ट हुआ है और वह है दिल्ली में उसकी 49 दिन की सरकार। लिहाजा, निजी कंपनियों को लेकर भरोसा दिखाने और ईमानदार राजनीति की चाहे जितनी बातें केजरीवाल कर लें और उसे अपनी घोषणा में दर्ज दिखा दें, उन पर अमल वे कैसे करते हैं अभी यह देखना बाकी है।
इसलिए गिराई सरकारदिल्ली में कुछ और दिन तक सरकार चलाकर वे अपना परफामेर्ंस रिकार्ड देश के आगे रख सकते थे पर उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया। क्योंकि इतनी सी बात तो अरविंद केजरीवाल भी जानते हैं आदर्श का उद्घोष भले गगनभेदी हो पर उसका आचरण एक मुश्किल चुनौती है। आप इस चुनौती पर खरा उतरने में कितनी अराजक होती है या कितना सफल-
असफल यह पूरे देश के साथ देश का उद्योग जगत भी देखना चाहेगा।
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आप ने समझाया अपना अर्थव्यापार और डकैती
हम पूंजीवाद के खिलाफ नहीं बल्कि साठगांठ वालÞ पूंजीवाद के खिलाफ हैं। हमÞं उस वक्त निराशा हाÞती है जब 1.5 लाख कराÞड़ के स्पÞक्टàम एक हफ्तÞ के भीतर 6,००० कराÞड़ मÞं बÞच दिए जातÞ हैं। इसÞ व्यापार नहीं बल्कि डकैती कहतÞ हैं।
सरकार का कामहमारे दÞश मÞं कुछ ऐसÞ उद्याÞगपति हैं जाÞ असल मÞं उद्याÞगपति या व्यापारी नहीं हैं बल्कि वÞ दÞश काÞ लूट रहÞ हैं । हम उनके खिलाफ हैं, न कि आप सबके खिलाफ। यदि व्यापार पर ताला लगा दिया जाएगा ताÞ राÞजगार कौन पैदा करेगा। व्यापार करना सरकार का काम नहीं है, उसÞ ताÞ प्रशासन पर पूरा ध्यान दÞना चाहिए।
न्याय के नाम पर अन्याय
मुकदमÞबाजी मÞं कमी लानÞ की जरूरत है और खासतौर पर ऐसी मुकदमÞबाजी मÞं कमी की जरूरत है जिसमÞं मुकदमा सरकार की तरफ सÞ दायर किया जाता है। हमारी न्यायिक व्यवस्था काफी जटिल है। इसÞ जानबूझकर लुंज-पुंज बनाया गया है। यह समझना काÞई मुश्किल काम नहीं है कि यदि आप ज्यादा जजाÞं की नियुक्ति करेंगÞ, ज्यादा अदालतÞं खाÞलÞंगÞ ताÞ पिछलÞ 2० साल सÞ लंबित मुकदमÞ छह महीनÞ मÞं निपटाए जा सकतÞ हैं। मैं समझता हूं कि इससÞ स्थिति मÞं काफी हद तक सुधार आएगा।
मनमोहन पर तंज
दुनिया के बÞहतरीन आर्थिक विशÞषज्ञ हमारे प्रधानमंत्री मनमाÞहन सिंह हैं। यूपीए के पिछलÞ 1० साल के शासनकाल मÞं आपनÞ सर्वश्रेष्ठ आर्थिक नीतियां दÞखीं पर सबसÞ बड़ी कमी ईमानदार राजनीति की रही। ईमानदार राजनीति न हाÞनÞ की वजह सÞ उन आर्थिक नीतियाÞं काÞ लागू नहीं किया जा सका।
मंत्रियों पर वार
मनमोहन सिंह की कैबिनÞट मÞं ऐसÞ कई मंत्री हैंं जिन्हाÞंनÞ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी सÞ अर्थशास्त्र की पढ़ाई की है, ताÞ ऐसÞ मÞं अच्छी आर्थिक नीतियाÞं की कमी नहीं थी। पर हमारे दÞश मÞं उद्याÞगपति और व्यापारी दुखी हैं। वÞ दुखी क्याÞं हैं?
ईमानदार राजनीति की कमी रही है। न ताÞ भाजपा और न कांग्रेस नÞ ईमानदार राजनीति की।
अच्छा प्रशासन दे सरकार
पहलÞ दजर्Þ के नागरिकाÞं काÞ तीसरे दजर्Þ का प्रशासन मिल रहा है। आज सबसÞ अहम मुद्दा प्रशासन है। ईमानदार एवं दक्ष प्रशासन वक्त की मांग है। सरकार का काम व्यापार करना नहीं है, उसÞ 'गवर्नेंस’ करना चाहिए।
विकास का मतलब
दÞश की सभी व्यापारिक गतिविधियां निजी हाथाÞं मÞं हाÞनी चाहिए। कई पार्टियां और सरकारें कहती हैं कि वÞ विकास का काम कर रही हैं पर विकास का काम सरकारें नहीं, व्यापार के जरिए लाÞग करतÞ हैं।
सरकार की भूमिका
सरकार की भूमिका की परिभाषा तय करनÞ का वक्त आ गया है। किसी भी सरकार के लिए तीन काम करना काफी जरूरी हाÞता है। पहला, सरकार का काम नागरिकाÞं काÞ सुरक्षा प्रदान करना है । दूसरा, नागरिकाÞं काÞ न्याय प्रदान करना और तीसरा भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन दÞना है। लÞकिन दुर्भाग्यवश काÞई भी पार्टी यÞ बातÞं नहीं कर रही।
दलों के दावों पर सवाल
तमाम पार्टियां ऐसा दावा करती हैं कि वे विकास देंगी। मैं जानना चाहता हूं कि वे ऐसा कैसÞ करंÞगी जबकि नागरिक असुरक्षित महसूस कर रहÞ हैं। ऐसÞ मÞं क्या काÞई विकास हाÞ सकता है? क्या ऐसÞ माहौल मÞं व्यापार किया जा सकता है?
इंस्पेक्टर और लाइसेंस राज
आयकर विभाग का एक इंस्पÞक्टर भी बडÞè-बड़े उद्याÞगपतियाÞं काÞ मुश्किल मÞं डाल सकता है। आप इंस्पÞक्टर और लाइसÞंस राज के सख्त खिलाफ हैं। हम पूरी व्यवस्था पर फिर सÞ विचार करना चाहतÞ हैं।
निजी क्षेत्र से उम्मीद
सरकार के पास नौकरियां नहीं हैं। देश में नई नौकरियां सृजित करना आसान नहीं है, इसलिए हमें अपने युवाओं को कारोबार से जोड़ना होगा। कॉलेजों में ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिससे छात्रों को अपने आइडिया पर काम करने का मौका मिल सके । आने वाले दिनों में निजी क्षेत्र ही देश के युवाओं को नौकरियां देने की स्थिति में होगा।
बेईमानी की वजह
देश के 99 प्रतिशत लोग ईमानदारी से काम-धंधा करना चाहते हैं लेकिन ऐसा माहौल नहीं है इसी वजह से लोगों को बेईमानी करनी पड़ती है। मौजूदा नीतियों और प्रक्रियाओं को सरल बनाना होगा। खुद पहल करके ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिससे कारोबार बढ़े।
निजीकरण से नहीं रुकेगा भ्रष्टाचार
निजीकरण से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। अगर सरकार भ्रष्ट है तो निजी क्षेत्र भी काम नहीं करेगा। भ्रष्टाचार लालच से आता है और लालच मोटी तनख्वाह से भी कम नहीं होती। भ्रष्टाचार की शुरुआत चुनाव के लिए पैसे लेने से होती है। भ्रष्टाचार रोकने के लिए डर जरूरी है। मोटी तनख्वाह के बाद भी हमारे देश में कई ऐसे मंत्री हैं, जो भ्रष्ट हैं। किसी भी मंत्री की सीटीसी एक-दो करोड़ से कम नहीं होगी लेकिन एक मंत्री एक ठेके में 5००-5०० करोड़ रुपये की रिश्वत लेता है। कांग्रेस और बीजेपी का पैसा बेनामी का है और इसी वजह से इन पार्टियों के लोग अपने पैसे का हिसाब देने से डरते हैं।
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करके भी दिखाएं
सीआईआई की बैठक के बाद जब देश के प्रमुख उद्योगपति आदी गोदरेज से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने इतना भर कहा कि अच्छा है कि आप ने अपनी बातें हम लोगों के बीचकर आकर रखीं। पर वे इन तमाम बातों को क्रियान्वित कैसे करते हैं या कितना कर पाते हैं, अभी यह देखना बाकी है। दिलचस्प है कि आदी की प्रतिक्रिया में न तो केजरीवाल के लिए कोई सराहना के शब्द हैं और न ही नाहक आलोचना के। हां, इतना जरूर है कि आप को बात और जज्बात से आगे अब कार्यक्रम और क्रियान्वयन पर जोर देना होगा।
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लगाया जा सकता है दांव
हां, मैं अरविद केजरीवाल का फैन हूं। मैं उनके विचारों से काफी प्रभावित भी हूं। मुझे सच में नहीं पता कि चुनावी हवा किस ओर बह रही है लेकिन मुझे केजरीवाल के नेतृत्व क्षमता पर पूरा भरोसा है। देश भ्रष्टाचार के कारण परेशान है। आपको आरटीओ में अपनी गाड़ी के लिए नंबर रजिस्टर्ड कराने तक के लिए घूस देनी पड़ती है। अंत में नेता पर ही आकर बात रुकती है। मुझे लगता है कि अरविद केजरीवाल ऐसे नेता हैं, जिस पर दांव लगाया जा सकता है।
-राजीव बजाज, बजाज ऑटो के मैनेजिग डायरेक्टर
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भ्रष्टाचार की योजनाएं
 हमें स्वराज चाहिए। हर वर्ष विकास के नाम पर दिल्ली में बैठकर नेता और अफसर बेतुकी योजनाएं बनाते हैं। लाखों, करोड़ों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं। यह पैसा जनता तक पहुंचने के बजाय भ्रष्टाचारियों की जेबों में चला जाता है। हमें ऐसा विकास नहीं चाहिए। स्वराज होगा तो जनता विकास खुद कर लेगी। स्वराज मतलब जनता का राज। अपने गांव, अपने शहर, अपने मोहल्ले के बारे में सीधे जनता निर्णय ले। संसद और विधानसभाओं में पारित होने वाले कानून भी जनता की मर्जी से
बनाए जाएं।
(अपनी पुस्तक 'स्वराज’ में अरविंद केजरीवाल)

कुछ सबक तो लें माननीय

पंद्रहवीं लोकसभा देश के संसदीय लोकतंत्र को लेकर उठने वाले कई सामयिक सवालों और एतराजों की साक्षी रही। लोकसभा सत्र के आखिरी दिन सांसद भावुकता में भले एक-दूसरे के प्रति अपने शिकवे-शिकायतों को दूर कर सौहार्द बढ़ाते दिखे, पर इस बात से कौन इनकार करेगा कि इस लोकसभा का कार्यकाल सदन के अंदर और बाहर सर्वाधिक सवालों के घेरे में रहा। काम के घंटे और पास होने वाले बिलों का लेखा-जोखा अगर छोड़ भी दें तो बीते पांच सालों में सदन के आचरण और उसकी प्राथमिकताओं पर लगातार सवाल उठाए गए। एक तरफ इसे 'दागियों का सदन’ कहा गया तो वहीं दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने की उसकी प्रतिबद्धता को कठघरे में खड़ा किया गया।
भूले नहीं हैं लोग साल 2०11 के उस ऐतिहासिक घटनाक्रम को जब जनलोकपाल बिल को पास कराने को लेकर समाजसेवी अण्णा हजारे दिल्ली के रामलीला मैदान पर अनशन पर बैठे थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उन्हें सदन के अंदर यह कहते हुए सैल्यूट कर रहे थे कि संसद भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक पहल के लिए तैयार है, प्रतिबद्ध है।
लोकसभा के अंतिम सत्र की समाप्ति पर प्रधानमंत्री जब अपनी सरकार की कामयाबी गिना रहे थे तो वे यह कहना भूल गए कि इस देश में लोकशाही इसलिए मजबूत नहीं है कि यह सदन उसके लिए प्रतिबद्ध है बल्कि इस देश की जनता की लोकतांत्रिक आस्था इतनी मजबूत है कि वह विचलन की स्थिति में संसदीय गणतंत्र को भी राह दिखाती है।
15वीं लोकसभा के कार्यकाल को लेकर ये कुछ बातें इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि इससे यह साफ होता है कि इसके कार्यकाल में सरकारी भ्रष्टाचार के कई बड़े मामले खुले और इसकी आंच मंत्रियों से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक पर पहुंची। यही नहीं, इस दौरान कई मामलों की जांच में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई, उसकी कर्तव्यहीनता को शर्मनाक करार दिया।
क्या दाग अच्छे हैं

लोकसभा की कार्यवाही के आखिरी दिन का मंजर देखकर यह नहीं लग रहा था कि यह सदन अपने अमर्यादित आचरण और लोकहित के प्रति अपनी लापरवाही के लिए कहीं से शर्मसार है। सौहार्द के बोल सरकार की तरफ से तो बोले ही गए, विपक्ष ने भी सरकार की विफलता पर हलकी चुटकी लेने से ज्यादा तल्खी दिखाने को तैयार नहीं दिखी।
कई सांसदों ने आत्मावलोकन की बात जरूर की पर इसमें ये बात कहीं से रेखांकित नहीं हुई कि इस लोकसभा के 543 में से 162 यानी तकरीबन 3० फीसदी सांसदों का रिकॉर्ड दागदार है। यही नहीं, जब आपराधिक रिकॉर्ड वाले ऐसे लोगों के चुनाव लड़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए तो इसके खिलाफ बिल लाने की मांग उठी। इस पहल के लिए सबसे पहले सरकार ललक से भरी। फिर विपक्ष भी कहीं न कहीं सरकार के साथ खड़ा दिखा।
वैसे इस बिल को संसद की हरी झंडी नहीं मिली और जब आनन-फानन में सरकार इस पर अध्यादेश लाने को तैयार हुई तो जनता के मूड को भांपते हुए विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। बाद में नाटकीय तरीके से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस अध्यादेश को रद्दी की टोकड़ी में फेंकने की बात कही और सरकार को अपने ही घोषित एजेंडे से यू-टर्न लेना पड़ा।
यह सब देखकर इस लोकसभा के आचरण और संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को बहाल रखने की उसकी प्रतिबद्धता को लेकर अंतिम राय क्या बनेगी, कहने की जरूरत नहीं।
तेलंगाना पर हंगामा

15वीं लोकसभा ने सबसे अशोभनीय आचरण तब दिखाया जब तेलंगाना बिल सदन में आया। सरकार के मंत्री तक वेल में हंगामा मचाते दिखे। हद तो तब हो गई जब माइक तोड़ने से लेकर मिर्ची स्प्रे करकेसदन की कार्यवाही रोकी गई। बाद में जब यह बिल पास भी हुआ तो इस अफरा-तफरी के बीच कि सरकार और विपक्ष दोनों ने अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए । दिलचस्प है कि इस दौरान सदन में क्या चल रहा था लोग लोकसभा चैनल पर देखना चाह रहे थे पर अचानक ब्लैक आउट करके पूरे देश को अंधेरे में रखा गया। यह अंधेरा इतिहास के पन्नों पर भी इस लोकसभा का पीछा शायद ही छोड़े।
 

प्रतिसौंदर्य की नायिका

जिक्र महिला का हो और बात उसकी सुंदरता को लेकर न हो, ऐसा हो नहीं सकता। पर नए दौर में महिला और सुंदरता का यह साझा मिथक दरक रहा है। महिलाएं आज जहां एक तरफ घर से बाहर कई क्षेत्रों में सक्रिय हैं तो वहीं कोमलांगी और सौंदर्य की देवी कहलाने की उसकी ललक पीछे छूटती जा रही है। स्त्री सोच में बदलाव की ऐसी ही एक मिसाल हैं हरनाम कौर। हरनाम के चेहरे पर दाढ़ी और मूछें हैं। ब्रिटेन के बर्कशायर निवासी 23 वर्षीय सिख युवती हरनाम कौर के बारे में जब न्यूज एजेंसियों ने इस हफ्ते खबर चलाई तो उसे लेकर हर तरफ दिलचस्पी दिखी। सोशल मीडिया पर हरनाम को स्त्री सौंदर्य की लंबे समय से चली आ रही मर्दाना सोच के खिलाफ एक बड़ी चुनौती का प्रतीक तक करार दिया जा रहा है।
 दरअसल, हरनाम ने यह सब जानबूझकर किया, ऐसा नहीं है। पॉलिसिस्टिक ओवरी सिड्रोम से ग्रस्त होने के कारण 11 साल की उम्र में ही उसके शरीर पर अनचाहे बाल उगने शुरू हो गए थे। अमृत ग्रहण कर चुकी हरनाम कौर कहती है, 'मैं एक सिखणी हूं। केश कटवाना मेरे धर्म के खिलाफ है। मुझे भगवान ने जैसा बनाया है, मैं उसी में खुश हूं।’ हरनाम कहीं भी जाती है तो सिर पर पगड़ी बांध लेती है। ऐसे में उसे कुछ लोग सरदार तक समझ लेते हैं। पर हरनाम इन स्थितियों से विचलित होने के बजाय इसका आनंद लेती है। इस तरह के तमाम अनुभव अब उसकी जिंदगी का हिस्सा हैं।
दिलचस्प है कि हरनाम आज भले अपनी इस शारीरिक नियति को स्वाभाविकता के तौर पर देखती हैं पर ऐसा नहीं है कि इसके कारण उसे असहज स्थिति का सामना कभी नहीं करना पड़ा। अपने बालों की वजह से उसे स्कूल में खूब ताने सुनने पड़े। इससे उसकी पढ़ाई पर भी असर पड़ा। इतना ही नहीं, कई अनजान लोगों से सोशल वेबसाइट पर उन्हें जान से मारने तक की धमकियां दीं। ये वे दिन थे जब हरनाम अपनी शारीरिक स्थिति को लेकर अस्वाभाविक स्थिति को खुद भी बहुत नहीं समझ पा रही थी और उसके मन में कई तरह की बातें चलती रहती थी। उसे कई बार यह तक लगा कि यह विचित्रता उसके साथ ही आखिर क्यों।
पर हरनाम इन तमाम बातों से घबराई नहीं बल्कि अंदर ही अंदर मजबूत होती गई। शुरू में अनचाहे बालों से परेशान रहने वाली हरनाम हफ्ते में दो बार वैक्सिंग किया करती थी, लेकिन बाद में इरादा बदल गया और उसने हमेशा के लिए दाढ़ी और मूंछ रखने का फैसला कर लिया।
हरनाम कबूलती है कि जब उसके शरीर में अचानक बाल बढ़ने लगे तो उसे शुरू-शुरू में वाकई यह काफी अजीब लगता था। बालों को छिपाने के लिए वह लंबे-लंबे कपड़े पहनती थी। बाद में जब उसने बाल न कटवाने का फैसला किया तो परिवार ने उसका भरपूर साथ दिया। अब तो हरनाम के लिए यह सब असहज जैसा रहा ही नहीं, उलटे वह यहां तक कहती है, 'दाढ़ी-मूंछों के साथ अपने आपको मैं ज्यादा सेक्सी और सुंदर महसूस करती हूं।’
हरनाम ने अपनी अपवादिकता को जिस तरह अपनी स्वाभाविकता और दृढ़ता का हिस्सा बनाया, वह वाकई एक बड़ी मिसाल है। 23 साल की एक युवती जिसके आगे देह, सौंदर्य और फैशन को लेकर तमाम तरह के आकर्षण हों, वह इन सबसे अलग अपने लिए एक अलग स्थिति बनाती है, तो यह वाकई काबिले तारीफ है। हरनाम के मजबूत हौसले और इरादों का ही नतीजा है कि आज जब उसका नाम गूगल के सर्च इंजन पर डाला जाता है तो उसके जीवन से जुड़े तथ्यों के दस लाख से ज्यादा वेब पन्ने खुलते हैं। जाहिर है कि आज यह बहादुर सिखणी अपनी मुश्किलों के कारण नहीं बल्कि
उन मुश्किलों के खिलाफ तनकर खड़े होने के जज्बे के कारण पूरी दुनिया में इतनी लोकप्रिय है।
 

Wednesday, February 19, 2014

स्वराज पर बहस से भागती हैं पार्टियां

आम आदमी पार्टी की दिल्ली की सरकार जनलोकपाल बिल के नाम पर चली गई। वैसे एक और बिल को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की कैबिनेट ने मंजूरी दी थी और अगर जनलोकपाल बिल को विधानसभा की हरी झंडी मिल भी जाती तो पूरी संभावना थी कि कांग्रेस और भाजपा के साथ आप के बीच इस मुद्दे पर रार मचती। जनलोकपाल बिल को तो लेकर खैर देश भर में पिछले कम से कम तीन सालों से चर्चा हो रही है पर स्वराज बिल को लेकर कभी कोई गंभीर बहस नहीं हुई। न ही आप की तरफ से ऐसी कोई पहल हुई और न ही दूसरे दलों ने इस बारे में कोई दिलचस्पी अपनी तरफ से दिखाई।
दरअसल, भ्रष्टाचार के खिलाफ सशक्त कानून की दरकार तो महसूस इसलिए की जा रही है कि बीते कुछ दशकों में सरकारी लूट और घोटाले इतने बढ़ गए कि इसे नवविकास की अवधारणा का एक जरूरी तत्व तक बताया जाने लगा। खासतौर पर यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में जिस तरह भ्रष्टाचार के एक के बाद नए मामले खुले उससे यह बहस आम हो गई कि इसके खिलाफ कठोर कानूनी पहल तो होनी ही चाहिए। यह अलग बात है कि यह मांग सरकार के अंदर स्वाभाविक रूप से उठनी चाहिए थी पर इसके लिए सिविल सोसायटी की अगुआई में जनता सड़कों पर उतरी। सरकार को मजबूरन इसके लिए तैयार होना पड़ा पर सिविल सोसायटी के जनलोकपाल बिल के ड्राफ्ट को मानने के बजाय सरकारी दखल की अनुकूलता वाला बिल संसद ने पास कर दिया।
अब जबकि देश एक बार फिर से पांच साल के लिए केंद्र की अगली सरकार चुनने जा रहा है तो यह सवाल मौजू हो गया है कि भ्रष्टाचार अगर मौजूदा डेमोक्रेटिक सिस्टम का साइड इफेक्ट है, इसे कानूनी तौर पर रोकने के बजाय व्यवस्थागत परिवर्तन के तौर पर क्यों न देखा जाए। आप की सरकार दिल्ली में इसी दरकार को पूरा करने के लिए स्वराज बिल लाना चाहती थी। चूंकि इसका कोई फाइनल या प्रस्तावित ड्राफ्ट लोगों के सामने नहीं है, इसलिए उसके प्रवधानों पर बहुत बारीकी से कोई बात नहीं हो सकती। हां, विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी की तरफ से जो विस्तृत चुनाव घोषणा पत्र लाया गया था, उसमें इस बारे में जरूर कुछ बातें कही गई हैं। आम आदमी पार्टी की सोच इस मामले में तो जरूर सराहनीय कही जाएगी कि वह कम से कम सैद्धांतिक रूप से सत्ता के केंद्रीय वर्चस्व को तोड़कर एक विकेंद्रित ढांचे की बात करती है।
यह सोच पंचायत राज के प्रयोग से आगे की बात इस लिहाज से है कि इसमें मुहल्ला सभाएं या रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशंस (आरडब्ल्यूए) महज कुछ सरकारी योजनाओं को लागू कराने वाले इंस्ट्रÔमेंट भर नहीं होंगे बल्कि अपने इलाके के विकास से लेकर न्याय और सुरक्षा तक का दारोमदार उनके हाथों में होगा। यही नहीं, अगर क्षेत्र के लोग बहुमत से यह तय करते हैं कि उनके पार्षद या विधायक उनकी अपेक्षाओं के मुताबिक काम नहीं करते तो उन्हें वापस भी बुलाया जा सकता है यानी राइट टू रिकॉल।
गौरतलब है कि जनलोकपाल आंदोलन के दौरान समाजसेवी अण्णा हजारे देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जो एजेंडा जनता के साथ शेयर करते थे, उसमें चुनाव सुधार और लोकतंत्र के विकेंद्रित ढांचे की बात खासतौर पर करते थे। बल्कि वे तो यहां तक कहते थे कि जनलोकपाल बिल के बाद इन्हीं मुद्दों को लेकर संघर्ष करेंगे। अण्णा की इन बातों से ही कहींन कहीं देश में 21वीं सदी के दूसरे दशक के आगाज के साथ वैकल्पिक राजनीति को लेकर भी एक बहस शुरू हुई। यह अलग बात है इस बहस में बहुत ज्यादा दिलचस्पी न तो मीडिया ने दिखाई और न ही जनता ने। ऐसा संभवत: इसलिए भी हुआ कि यह मुद्दा भ्रष्टाचार विरोध की तरह 'कैची’ नहीं था।
शुक्र मानना चाहिए आम आदमी पार्टी और उसके कुछ नेताओं का कि उन्होंने विचार और मुद्दे के स्तर पर इस दरकार को न सिर्फ जीवित रखा बल्कि अपने चुनावी एजेंडे में भी इसे शामिल किया। यह अलग बात है कि अवधारणात्मक रूप से आप का स्वराज भी विकेंद्रित लोकतांत्रिक व्यवस्था का सटीक मॉडल नहीं है। यह पहल अपनी बनावट में क्रांतिकारी जरूर ठहराई जा सकती है पर यह उस सोच से काफी दूर है जिसके लिए पहले गांधी ने और फिर विनोबा और जयप्रकाश ने राजनीति की जगह 'लोकनीति’ की बात की थी। आप का स्वराज सैद्धांतिक रूप से इस प्रश्न का तो उत्तर देता है कि संसद या सरकार की सर्वोच्चता जनता के ऊपर नहीं हो सकती। पर केंद्रीय सत्ता अपने अधिकारों में कटौती कर एक विकेंद्रित ढांचा खड़ा करे या विकेंद्रित ढांचे के तहत काम कर रही लोकतांत्रिक संस्थाएं अपने लिए एक नियामक केंद्रीय सत्ता का निर्माण करें, आप इसका न तो उत्तर देती है और न ही यह सवाल उसके लिए जरूरी है। दरअसल, ये दोनों दो स्थितियां हैं और दोनों में एक बड़ा बुनियादी फर्क है।
गांधी जिस तरह के लोकतंत्र की बात करते हैं, उसमें केंद्र से चैरिटी के रूप में लोकतांत्रिक सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं होता बल्कि स्वावलंबी और स्वदेशी की ताकत पर खड़ी हुई ग्राम पंचायतें या स्थानीय निकाय, राष्ट्र और राज्य के रूप में अपनी शिनाख्त को मुकम्मल बनाने के लिए एक केंद्रीय नियामक संस्था का गठन करते हैं। असल में लोकतंत्र को लेकर समझ और सोच का यह फर्क प्रातिनिधिक और प्रतिभाग के लोकतंत्र के बीच का अंतर है।
दुर्भाग्य से देश में लोकतंत्र की बनावट को लेकर बहस और आंदोलन की गुंजाइश को जानबूझकर केंद्रीकृत सत्ता की राजनीति करने वाली सियासी जमातों ने कभी आगे नहीं बढ़ने दिया। कांग्रेस को भंग कर लोक सेवक संघ की गांधी की वसीयत को नेहरू-गांधी परिवार ने याद करने का साहस नहीं दिखाया तो बाद में जयप्रकाश की संपूर्ण क्रांति में शामिल हुए सियासी दलों ने 'जनता सरकार’ की उनकी परिकल्पना को साकार नहीं होने दिया। आप ने इस निराशा से आगे एक आशावादी पहल को जरूर आकार दिया है पर वह जिस तरह की अराजक जल्दबाजी में दिख रही है, उससे उनसे बहुत उम्मीद करना बेमानी होगा।
एक बात और यह कि देश का नया जन-गण-मन परिवर्तन की छटपटाहट से भरा है और यह बीते सालों में कई मौकों पर देखने को मिला है। कमी है तो एक ऐसे सूत्रधार की और समन्वित पहल की जिसमें परिवर्तन का मतलब सरकार बदलने से आगे लोकतांत्रिक तकाजों को नए सिरे से जांचना-परखना और स्थिर करना हो। फिर इसके लिए विधान से लेकर संवधिान तक जो भी बदलना पड़े, उसे बदला जाए। नए भारत का नया गणतंत्र बदलावों की ऐसी बड़ी संभावनाओं को सरजमीं पर उतरने की बाट न जाने कब से जोह रहा है।
 

Saturday, February 15, 2014

प्यार का नया देशकाल

प्यार और दोस्ती जीवन से जुड़े ऐसे सरोकार हैं जिनको निभाने के लिए हमारी आपकी फिक्रमंदी भले कम हुई हो पर इसे उत्सव की तरह मनाने वाली सोच बकायदा संगठित उद्योग का रूप ले चुका है। दिलचस्प यह भी है कि कल तक लक्ष्मी के जिन उल्लुओं की चोंच और आंखें सबसे ज्यादा परिवार और परंपरा का दूध पीकर बलिष्ठ हो रहे संबंधों पर भिंची रहती थी, अब वही कलाई पर दोस्ती और प्यार का धागा बांधने का पोस्टमार्डन फंडा हिट कराने में लगे हैं।
प्यार और दोस्ती के महापर्व
लव, फ्रेंड और फ्रेंडशिप का जो जश्न पूरी दुनिया में वेलेंटाइन डे के नाम पर शुरू हुआ है, उसका अतीत मानवीय संवेदनाओं को खुरचने वाली कई क्रूर सचाइयों पर से परदा उठाता है। सेंट वेलेंटाइन को भी नहीं पता होगा कि उनके बाद की पीढ़ियां उनके प्यार और समर्पण के संदेश को महज प्यार की सनसनाहट और रोमांच तक सीमित कर देंगे।
आज तो आलम यह है कि पिछले कई दशकों से दुनिया के सबसे समृद्ध देशों से लेकर गरीब और पिछड़े मुल्कों में वेलेंटाइन डे को उत्सव दिवस के रूप में मनाने की परंपरा कैलेंडर की कुछ खास तारीखें हैं। पिछले एक-डेढ़ दशक में प्यार और दोस्ती के महापर्व के रूप में वेलेंटाइन डे के साथ फ्रेंडशिप डे का भी प्रचलन काफी बढ़ गया है। अलबत्ता यह बात जरूर थोड़ी चौकाती है कि सेक्स और सेंसेक्स के बीच झूलती दुनिया में संबंधों को कलाई पर बांधकर दिखाने की रस्मी रिवायत से किसका भला ज्यादा हो रहा है।
राजेंद्र यादव कहा करते थे
स्वर्गीय लेखक राजेंद्र यादव दोस्ती की बात छेड़ने पर अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत दोहराते थे- 'बूट्स एंड फ्रेंडशिप शुड बी पॉलिश्ड रेग्युलरली।’ जाहिर है संबंधों को एक दिन के उल्लास और उत्सव की रस्म अदायगी के साथ निपटाने के खतरे को वे बखूबी समझते थे।
बात प्यार और दोस्ती की हो और बात युवाओं की न हो बात पूरी नहीं होती है। आर्चीज जैसी कार्ड और गिफ्ट बनाने और बेचने वाली कंपनियां इन्हीं युवाओं के मानस पर प्रेम, ख्वाब, यादें और दोस्ती जैसे शब्द लिखकर तो अपनी अंटी का वजन रोज ब रोज बढ़ा रही हैं। फिर बात दोस्ती और प्यार के महापर्व की हो तो युवाओं को कैसे भूला जा सकता है।
तुनक गए जावेद साहब
कुछ अर्से पहले टीवी पर दिखाए जा रहे एक शो में जज बने जावेद अख्तर तब तुनक गए जब गायिका वसुंधरा दास ने अपने एक गाने को यूथफूल होने की दलील उनके सामने रखी। जावेद साहब ने थोड़े तल्ख लहजे में उस मानसिकता पर चुटकी ली जिसमें देह की अवधारणा को संदेह से अलगाने की कोशिश हो या किसी बेसिर-पैर के म्यूजिकल कंपोजिशन को मार्डन या यूथफूल ठहराने का कैलकुलेटेड एफर्ट, यूथ सेंटीमेंट की बात छेड़कर सब कुछ जायज और जरूरी ठहरा दिया जाता है। उनके शब्द थे 'इस तरह की दलीलों को सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे यूथ कोई 21वीं सदी का इन्वेंशन हो और इससे पहले ये होते ही नहीं थे।’ इस वाकिए को सामने रखकर यह समझने में थोड़ी सहुलियत हो सकती है कि नई पीढ़ी को सीढ़ी बनाकर संबंधों के केक काटने वाला बाजार किस कदर अपने मकसद में क्रूर है। यहां यह भूल करने से बचना चाहिए कि नई पीढ़ी की संवेदनशीलता कोरी और कच्ची है। हां, यह जरूर है कि उसके आसपास का वातावरण उससे वह मौका भरसक हथिया लेने में सफल हो रहा है जो निभाए जाने वाले मानवीय सरोकारों को दिखाए जाने वाला रोमांच भर बना रहे हैं।
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ग्लोबल नहीं हैं भारतीय युवा

लोक और परंपरा के कल्याणकारी मिथकों पर भरोसा करने वाले आचार्यों की ाातें आ विश्वविद्यालयों के शोधग्रंथों तक सिमट कर रह गई हैं। इन पर मनन-चितन करने का भारतीय समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक विवेक बीते दौर की बात हो चुकी है। ऐसा अगर हम कह रहे हैं तो इसलिए क्योंकि ऐसा मानने वाले आज ज्यादा है। पर तथ्य और सत्य भी यहीं आकर ठहरता है, ऐसा नहीं है। दिलचस्प है कि खुले बाजार ने अपने कपाट जितने नहीं खोले, उससे ज्यादा हमने भारतीय युवाओं के बारे में आग्रहों को खोल दिया। सेक्स, सेंसेक्स और सक्सेस के त्रिकोण में कैद नव भारतीय युवा की छवि और उपलधि पर सरकार और कॉरपोरेट जगत सबसे ज्यादा फिदा है। ऐसा हो भी भला क्यों नहीं क्योंकि इसमें से एक ग्लोबल इंडिया का रास्ता बुहारने और दूसरा रास्ता बनाने में लगा है। यह भूमिका और सचाई उन सब को भाती है जो भारत में विकास और बदलाव की छवि को पिछले दो दशकों में सबसे ज्यादा चमकदार बताने के हिमायती हैं। ऐसे में कोई यह समझे कि देश की युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा न सिर्फ इन बदलावों के प्रति पीठ किए बैठा है बल्किइंडिया शाइनिग का मुहावरा ही उसके लिए अब तक अबूझ है तो हैरानी जरूर होगी।
सर्वे में सामने आया सच
कुछ साल पहले 'इंडियन यूथ इन ए ट्रांसफॉमिग वर्ल्ड : एटीटरूड्स एंड परसेप्शन’ नाम से एक शोध अध्ययन खूब चर्चा में आई थी। इसमें बताया गया था कि देश के 29 फीसदी युवा ग्लोबलाइजेशन या मार्केट इकोनमी जैसे शब्दों और उसके मायने से अपरिचित हैं। यही नहीं देश की जिस युवा पीढ़ी को इस इमîजग फिनोमेना से अकसर जोड़कर देखा जाता है कि उनकी आस्था चुनाव या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं व मूल्यों के प्रति लगातार छीजती जा रही है, उसके विवेक का धरातल इस पूर्वाग्रह से बिल्कुल अलग है। शोध के मुताबिक देश के तकरीबन आधे यानी 48 फीसद युवक ऐसे हैं, जिनका न सिर्फ भरोसा अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रति है बल्कि वे जीवन और विकास को इससे सर्वथा जुड़ा मानते हैं।
साफ है कि पिछले दो दशकों में देश बदला हो कि नहीं बदला हो, हमारा नजरिया समय और समाज को देखने का जरूर बदला है। नहीं तो ऐसा कतई नहीं होता कि अपनी परंपरा की गोद में खेली पीढ़ी को हम महज डॉलर, करियर, पिज्जा-बर्गर और सेलफोन से मिलकर बने परिवेश के हवाले मानकर अपनी समझदारी की पुलिया पर मनचाही आवाजाही करते। जमीनी बदलाव के चरित्र को जब भी सामाजिक और लोकतांत्रिक पुष्टि के साथ गढ़ा गया है, वह कारगर रहा है, कामयाब रहा है।
एक गणतांत्रिक देश के तौर पर छह दशकों के गहन अनुभव और उसके पीछे दासता के सियाह सर्गों ने हमें यह सबक तो कम से कम नहीं सिखाया है कि विविधता और विरोधाभास से भरे इस विशाल भारत में ऊपरी तौर पर किसी बात को बिठाना आसान है। तभी तो हमारे यहां बदलाव या क्रांति की भी जो संकल्पना है, वह जड़मूल से क्रांति की है, संपूर्ण क्रांति की है।
आज पिछले तीस सालों के विकास की अंधाधुंध होड़ के बजबजाते यथार्थ को देखने के बाद यह मानने वालों की तादाद आज ज्यादा है जो यह समझते हैं कि किसानों, दस्तकारों के इस देश को अचानक ग्लोबल छतरी में समाने की नौबत पैदा की गई और यह नौबत इतनी त्रासद रही कि कम से कम ढ़ाई लाख किसान खुदकुशी के मोहताज हुए। साफ है कि ग्लोब पर इंडिया को इमîजग इकोनमी पॉवर के तौर पर देखने के लिए जिन तथ्यों और तर्कों का हम सहारा ले रहे हैं, उसकी विद्रूप सचाई हमें सामने से आईना दिखाती है। सस्ते श्रम की विश्व बाजार में नीलामी कर आंकड़ों के खाने में विदेशी मुद्रा का वजन जरूर बढ़ सकता है पर यह सब देश के हर काबिल युवा के हाथ में काम के लक्ष्य और सपने को पूरा करने की राह में महज कुछ कदम ही हैं। ये कदम भी आगे जाने की बजाय या तो अब ठिठक गए हैं या फिर पीछे जाएंगे क्योंकि मेहरबानी बरसाने वाले अमेरिका जैसे देश एक बार फिर संरक्षणवादी आर्थिक हितों को अमल में लाने लगे हैं।
पब के दौर में लव
आखिर में एक बात और देश की लोक, परंपरा और संस्कृति के हवाले से। रूढ़ियां तोड़ने से ज्यादा सांस्कृतिक स्वीकृतियों को खारिज करने के लिए बदनाम पब और लव को बराबरी का दर्जा देने वाले युवाओं की जो तस्वीर हमारी आंखों के आगे जमा दी गई है, उसके लिए शराब का सुर्ख सुरूर बहुत जरूरी है। पर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चंडीगढ़ आदि से आगे जैसे ही हम इंडिया से भारत की दुनिया में कदम रखते हैं, यह युवा दरकार खारिज होती चली जाती है। नए भारत के युवाओं को लेकर यहां भी एक पूर्वाग्रह टूटता है क्योंकि जिस अध्ययन का हवाला हम पहले दे चुके हैं, उसमें उभरा एक बड़ा तथ्य यह भी है 66 फीसदी युवाओं के लिए आज भी शराब को हाथ लगाना जिदगी का सबसे कठिन फैसला है।
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लद गया सीटियों का जमाना
सीटियों का जमाना लदने को है। सूचना क्रांति ने सीटीमारों के लिए स्पेस नहीं छोड़ी है। इसी के साथ होने वाला है युगांत संकेत भाषा के सबसे लंबे खिचे पॉपुलर युग का। बहरहाल, कुछ बातें सीटियों और उसकी भूमिका को लेकर। कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं पर पहली सीटी किसी लड़की ने नहीं बल्कि किसी लड़के ने किसी लड़की के लिए ही बजाई होगी। बाद के दौर में सीटीमार लड़कों ने सीटी के कई-कई इस्तेमाल आजमाए। जिसे आज ईव-टीðजग कहते हैं, उसका भी सबसे पुराना औजार सीटियां ही रही हैं। वैसे सीटियों का कैरेक्टर शेड ब्लैक या व्हाइट न होकर हमेशा ग्रे ही रहा है। इस ग्रे कलर का परसेंटेज जरूर काल-पात्र-स्थान के मुताबिक बदलता रहा है।
बात किशोर या नौजवान उम्र की लड़के-लड़कियों की करें तो सीटी ऐसी कार्रवाई की तरह रही है, जिसमें 'फिजिकल’ कुछ नहीं है यानी गली-मोहल्लों से शुरू होकर स्कूल-कॉलेजों तक फैली गुंडागर्दी का चेहरा इतना वीभत्स तो कभी नहीं रहा कि असर नाखूनी या तेजाबी हो। फिर भी सीटियों के लिए प्रेरक -उत्प्रेरक न बनने, इससे बचने और भागने का दबाव लड़कियों को हमारे समाज में लंबे समय तक झेलना पड़ा है। सीटियों का स्वर्णयुग तब था, जब नायक और खलनायक, दोनों ही अपने-अपने मतलब से सीटीमार बन जाते थे।
किशोर कुमार की सीटी
इसी दौरान सीटियों को कलात्मक और सांगीतिक शिनाख्त भी मिली। किशोर कुमार की सीटी से लिप्स मूवमेंट मिला कर राजेश खन्ना जैसे परदे के नायकों ने रातोंरात न जाने कितने दिलों में अपनी जगह बना ली। आज भी जब नाच-गाने का कोई आइटमनुमा कार्यक्रम होता है तो सीटियां बजती हैं। स्टेज पर परफॉर्म करने वाले कलाकारों को लगता है कि पब्लिक का थोक रिस्पांस मिल रहा है। वैसे सीटियों को लेकर झीनी गलतफहमी शुरू से बनी रही है। संभ्रांत समाज में इसकी असभ्य पहचान कभी मिटी नहीं। यूं भी कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय के बदले दौर में भी इस कथित अमर्यादा का शुद्धिकरण कभी इतना हुआ नहीं कि सीटियों को बड़ी स्वीकृति स्वीकृति मिल जाए।
सीटियों से लाइन पर आए प्रेम प्रसंगों के कर्ताधताã आज अपनी गृहस्थी की दूसरी-तीसरी पीढ़ी की क्यारी को पानी दे रहे हैं। लिहाजा संबंधों की हरियाली को कायम रखने और इसके रकबे के बढ़ाने में सीटियों ने भी कोई कम योगदान नहीं किया है। यह अलग बात है कि इस तरह की कोशिशें कई बार सिरे नहीं चढ़ने पर बेहूदगी की भी अव्वल मिसालें बनी हैं।

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प्यार का झूठ और लव गुरु
शादी के बाद पति-पत्नी के रिश्ते में कितनी पारदर्शिता रहे, इसका अव्यावहारिक रास्ता निकाला जाना चाहिए। रेडियो-टीवी पर बैठे लव गुरुओं और मैरिटल काउंसलरों की भी सलाह ऐसी ही है। साफ तौर पर हिदायत दी जा रही है कि जो कहने-बताने से रिश्ते पर आंच न आए, वही सही है। पर यहां भी एक पेंच है। शेखी की तरह सचाई बघारने वाले ज्यादातर पुरुषों को अपने पिछले रिलेशन और अफेयर के बावजूद अपनी पत्नियों से परेशानी का खतरा न के बराबर रहता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि महिलाओं को घर-बाहर हर जगह यही हिदायत दी जाती है कि पुरुष तो ऐसे ही होते हैं, यहां-वहां और जहां-तहां मुंह मारने वाले। सो उसके किए पर अफसोस क्यों? चाहे जैसे हो बचा लो रिश्ता और इस तरह पेश आओ कि तुम्हारा पति तुम्हारे काबू में रहे, बहके नहीं और अगर बहके भी तो लौट के बुद्धु घर को आए की तरह।
केस स्टडी
शालिनी टीचर है और उसका पति इंश्योरेंस एजेंट। रजनी ने टीवी पर आने वाले मैरिटल काउंसिलिग के कार्यक्रम में बैठे विशेषज्ञों के आगे अपनी परेशानी रखी। उसकी शादी उसके साथ पढ़ने वाले लड़के से होनी थी। दोनों के बीच तकरीबन चार-पांच साल नजदीकी ताल्लुकात रहे। अफेयर भी कह सकते हैं। पर जब शादी की बात चली तो लड़के के घर वाले नहीं माने। शालिनी आज अपने शादीशुदा जीवन के आगे सब कुछ भूल चुकी है। उसकी एक बेटी स्कूल जाती है। पर उसका पति आज भी उसे अपने प्रति पूरी तरह वफादार नहीं मानता। उसे इस बात पर आए दिन पति से प्रताड़ित होना पड़ता है।
दरअसल, शालिनी ने एक ही गलती कि उसने अपने जीवनसाथी को शादी के कुछ ही दिनों बाद सब कुछ बता दिया। छह साल पहले कहा सच आज भी उसकी शादीशुदा जिदगी को ग्रास रहा है। शालिनी जैसी युवतियों से हमदर्दी रखने वाले भी यही कहते हैं कि पति के साथ सब कुछ शेयर करना जरूरी नहीं है। पुरुषों के लिए तो बदचलनी की गाली भी गिनती के ही हैं, पर महिलाओं की बोलती बंद करने के लिए उन्हें बदचलन ठहराना घर से बाहर क्या घर के अंदर भी सबसे आसान औजार है।
भूले नहीं हैं लोग अब भी टीवी पर स्वयंवर के उस ड्रामे को जिसमें राहुल महाजन शादी रचाते हैं। राहुल के लिए शादी का यह पहला मौका नहीं था। अफेयर के मामले में वह पहले से काफी विवादास्पद रहा था। पर उससे शादी का ख्वाब सजाने वाली किसी भी लड़की को इस बात से शिकायत नहीं थी। इस मुद्दे पर कोई चर्चा भी नहीं हुई।
आप सोचकर देखें, राहुल का सच किसी लड़की का होता तो क्या होता? अव्वल तो उसे इस टीवी शो का हिस्सा ही नहीं बनाया जाता। अगर बनाया भी जाता तो वरमाला कम से कम उसके गले में तो राहुल नहीं डालता। यह एक तरफ तो नए दौर का टीआरपी मार्का मनोरंजन का सच है तो वहीं दूसरी ओर यह रियलिटी उस पुरुष मानसिकता की भी है जिसे अपने ऊपर कभी कोई खरोंच बर्दाश्त नहीं भले खुद उसके नाखून बढ़ते रहें।
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चीनी प्रोडक्ट क्या
रिलेशन भी टिकाऊ नहीं

अखबारों के तकरबीन एक ही पन्ने पर साया हुईं ये दो खबरें हैं। एक तरफ प्राचीन से नवीन होता चीन है तो दूसरी तरफ उत्तर आधुनिकता की जमीन पर परंपराओं और संबंधों के नए सरोकारों को विकसित कर रहा अमेरिका। दुनिया के दोनों महत्वपूर्ण हिस्सों में यह सामाजिक बदलाव का दौर है। लेकिन दिशा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग। एक तरफ खतरे का लाल रंग काफी तेजी से और गाढ़ा होता जा रहा है तो दूसरी तरफ मध्यकालीन बेड़ियों से झूल रहे बचे-खुचे तालों को तोड़ने का संकल्प।
बाजार के साथ हाथ मिलाते हुए भी अपनी लाल ठसक को बनाए रखने वाले चीन की यह बिल्कुल वही तस्वीर नहीं है, जो न सिर्फ सशक्त है बल्कि सर्वाइवल और डेवलपमेंट का एक डिफरेंट मॉडल भी है। चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने सोशल रिसर्चर तंग जुन के हवाले से बताया कि चीन में न सिर्फ अर्थव्यवस्था का बल्कि तलाक का ग्राफ भी बढ़ा है। ढाई दशक पहले तक चीन में हर हजार शादी पर ०.4 मामले तलाक के थे जो कि आ वहां नौबत यह आ गई है कि हर पांचवीं शादी का दुखांत होता है। चीनी समाज में स्थितियां किस तरह बदल रही हैं, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2००9 में चीन में 2.42 करोड़ लोग परिणय सूत्र में बंधे लेकिन 24 लाख लोग अंतत: इस बंधन से बाहर आ गए। अर्थ का विकास जीवन को कुछ सुकूनदेह बनाता हो या न, उसके अनर्थ का खतरा कभी मरता नहीं है।
चीनी विकास का अल्टरनेटिव मॉडल परिवार और समाज के स्तर पर भी कोई वैकल्पिक राह खोज लेता तो सचमुच बड़ी बात होती। लेकिन शायद ऐसा न तो संभव था और न ही ऐसी कोई कोशिश की गई। उलटे विकास और समृद्धि के चमकते आंकड़ों की हिफाजत के लिए वहां पोर्न इंडस्ट्री और सेक्स ट्वॉयज का नया बाजार खड़ा हो गया। दुनिया के जिस भी समाज में सेक्स की सीमा ने सामाजिक संस्थाओं का अतिक्रमण कर सीधे-सीधे निजी आजादी का एजेंडा चलाया है, वहां सामाजिक संस्थाओं की बेड़ियां सबसे पहले झनझनाई हैं। चीन में आज अगर इस झनझनाहट को सुना जा रहा है तो वहां की सरकार को थ्यानमन चौक की घटना से भी बड़े खतरे के लिए तैयार हो जाना चाहिए। क्योंकि बाजार को अगर सामाजिक आधारों को बदलने का छुट्टा लाइसेंस मिल गया तो आगे जीवन और जीवनशैली के लिए सिर्फ क्रेता और विक्रेता के संबंधों का खतरनाक आधार बचेगा।
अमेरिका से आई खबर की प्रकृति बिल्कुल अलग है। वहां शादियों और मां बनने का न सिर्फ जोर बढ़ा है बल्कि इन सबके साथ कई क्रूर रुढ़ताएं भी खंडित हो रही हैं। जिस अमेरिका में राजनीति से लेकर फिल्म और शिक्षण संस्थाओं तक नस्लवाद का अक्स आज भी कायम है, वहां रंग, जाति और बिरादरी से बाहर जाकर प्यार करने और शादी करने का नया चलन जोर पकड़ रहा है। नस्ली सीमाओं को लांघकर विवाह करने का यह चलन कितना मजबूत है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पिछले तीन दशक में ऐसा करने वालों की गिनती दोगुनी हो चुकी है। अमेरिकी समाज के लिए यह एक बड़ी घटना है।
5०-6० के दशक तक अमेरिका में दूसरी नस्ल के लोगों के साथ विवाह करने की इजाजत नहीं थी। बाद में वहां सुप्रीम कोर्ट का आर्डर आया जिसने ऐसे किसी एतराज को गलत ठहराया। बहरहाल, इतना तो कहना ही पड़ेगा कि दुनिया भर में नव पूंजीवाद व उदारवाद का अलांरदार देश अपनी भीतरी बनावट में भी उदार होने के लिए छटपटा रहा है। यह सूरत आशाजनक तो है पर फिलहाल इसे क्रांतिकारी इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि अब भी वहां 37 फीसद सोशल हार्डकोर मेंटेलिटी के लोग हैं, जो विवाह की नस्ली शिनाख्त में किसी फेरबदल के हिमायती नहीं हैं।
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Wednesday, February 12, 2014

ऑटो एक्सपो में क्या करने पहुंचे थे सचिन

सचिन तेंदुलकर को लेकर एक बड़ी दिलचस्प स्थिति है। उन्हें क्रिकेट का भगवान पहले माना गया, भारत रत्न का सम्मान उन्हें बाद में मिला। यही नहीं, भारत रत्न दिए जाने की घोषणा होने और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने से पहले उन्हें राज्यसभा का सांसद मनोनीत किया गया। आज सचिन एक साथ क्रिकेट के भगवान, भारत रत्न और माननीय सांसद हैं।
लिटिल चैंपियन का यह परिचय एक ऐसा विशाल आभामंडल रचता है जिसके आगे देश के तमाम दूसरे क्षेत्रों की प्रतिभाओं की चमक फीकी मालूम पड़ती है। चर्चा निकली है तो यह भी ध्यान दिलाना जरूरी है कि इस दौरान आरटीआई के जरिए हुए एक खुलासे में यह जानकारी सामने आई कि भारत रत्न के लिए खेल मंत्रालय ने ध्यानचंद का नाम अग्रसारित किया था लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसमें अपने स्तर से हस्तक्षेप किया और सचिन तेंदुलकर का नाम फाइनल कर दिया।
गौरतलब है कि सचिन पहले ऐसे शख्स हैं, जिन्हेें खेल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए यह सम्मान दिया गया है। इसके लिए सरकार को सम्मान की अर्हता तय करने वाले प्रवधानों को संशोधित करना पड़ा। पूरे मामले की तफ्सील सामने आने पर खेल की दुनिया के अलावा सड़कों पर यह सवाल उठाया गया कि हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को नजरंदाज कर सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न के लिए क्यों चुना गया।
बहरहाल, इस विवाद में और जाने की बजाय बात अकेले सचिन तेंदुलकर की। उनका जिस तरह का आचरण और अब भी वे जिस तरह से अपनी प्राथमिकताएं तय कर रहे हैं, उससे क्या वह देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान और राज्यसभा सदस्यता पाने की अपनी काबिलियत को सही साबित कर पा रहे हैं। राज्यसभा के लिए चुने जाने के मौके पर सचिन ने कहा था कि फिलहाल तो संसद के लिए बहुत समय नहीं निकाल पाएंगे क्योंकि क्रिकेट में उनका बहुत समय चला जाता है। पर उनके संन्यास की घोषणा के बाद लोगों को लगा कि वे अब राज्यसभा में अपनी सक्रिय मौजूदगी दिखाएंगे। इसी बीच उन्हें भारत रत्न के सम्मान से भी विधिवत नवाजा गया।
पर ऐसा कुछ देखने में आया नहीं। संसद का सत्र अभी चल रहा है। उच्च सदन की प्रस्तावित कार्यवाही में कई महत्वपूर्ण विषय हैं, जिन पर विचार होने हैं। पूरे देश की आंखें इन पर लगी हैं। यह अलग बात है कि विभिन्न दलों के सांसदों के विरोध के कारण संसद की कार्यवाही अच्छी तरह से चल नहीं रही है। पर सचिन इस बीच जहां और जो करते दिखे, वह उनकी शख्सियत से जुड़े तमाम सम्मानों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। दिलचस्प है कि सचिन को इस दौरान ग्रेटर नोएडा के ऑटो एक्सपो में महंगी बीएमडल्यू कार का नया वर्जन लांच करते देखा गया।
सवाल है कि एक व्यक्ति जो भारत रत्न जैसे शीर्ष नागरिक सम्मान से सम्मानित और राज्यसभा सांसद है, उसे प्रोडक्ट लांचिंग या एंडोर्समेंट जैसे काम में शरीक होना चाहिए या नहीं। तकनीकी रूप से भले इसमें कुछ गलत न हो पर यह उस महान मूल्य और परंपरा के खिलाफ है, जिसका अब तक देश में एक तरह से निर्वहन होता रहा है।
इस बात से इनकार नहीं है कि भारत रत्न सम्मान देने में कई बार राजनीतिक पसंद-नापसंद का ध्यान रखा गया है। इसके बावजूद यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वालों में हरेक का कद कम से कम इतना ऊंचा तो जरूर रहा है कि वे देश केे सामने एक आदर्श के रूप में नजर आएं। इस फेहरिस्त में महान दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेेल, जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे, पंडित रविशंकर और उस्ताद विस्मिल्ला खां तक तमाम ऐसी विभूतियों के नाम शामिल हैं, जिनका कृतित्व और व्यक्तित्व काफी बड़ा रहा। दूसरी तरफ उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन के आचरण में इस मूल्य को बनाए रखा कि उनके किसी किए पर कोई विवाद या सवाल नहीं उठे।
सचिन तेंदुलकर को खुद को सौभाग्यशाली मानना चाहिए कि उन्हें यह सम्मान तब दिया गया, जब वे आयु और शरीर से काफी समर्थ हैं, ऊर्जावान हैं, नहीं तो देश की कई विभूतियों को तो जीते-जी यह सम्मान मिला भी नहीं। वैसे मरणोपरांत भारत रत्न से नवाजे जाने की परंपरा एक अलग विवाद को भी जन्म देती है। पर यह कहीं न कहीं यह भी दिखाता है कि कई लोगों के पूरे जीवन को देखने के बाद सरकार इस नतीजे पर पहुंची कि उन्हें भारत रत्न का सम्मान दिया जाना चाहिए। विनोबा और जेपी सहित ऐसे कई नाम हैं।
ग्रेटर नोएडा के ऑटो एक्सपो में सचिन तेंदुलकर जब राज्यसभा की बैठक को छोड़कर बीएमडब्ल्यू कार के नए वर्जन को अनावृत कर रहेे थेे तो उनकी हैसियत एक मॉडल या सेल्समैन से ज्यादा नजर नहीं आ रही थी। यह भारत रत्न का अपमान है कि इससे सम्मानित एक व्यक्ति महज कुछ रुपयों के लिए सार्वजनिक रूप से इस तरह पेश आए।
सचिन ने अपने जीवन में आमतौर पर ज्यादा कुछ सार्वजनिक रूप से कहा नहीं है। जब कभी भी उन्होंने ऐसा कुछ कहा है तो वे काफी संयमित और विवेकशील दिखे हैं। उन्होंने अपना देशप्रेम खेल के मैदान पर तो एकाधिक बार जाहिर किया है। मीडिया के सामने भी उन्होंने बार-बार यह कबूला है कि उनके लिए सबसे सम्मानजनक और संतोषजनक यही रहा कि उन्हें देश के लिए खेलने का मौका मिला और देशवासियों ने उनके खेल को इतना सराहा। अब जबकि सचिन एक खिलाड़ी से भी आगे देश के रत्न मान लिए गए हैं तो उन्हें भरसक इस बात का खयाल रखना पड़ेगा कि वे क्या करें और क्या नहीं।
भारत एक बहुत बड़ा देश है। यहां आज भी तमाम ऐसी समस्याएं और चुनौतियां हैं जो हमें एक खुशहाल और विकसित देश बनने से रोकती हैं। देश के नवनिर्माण में युवकों की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है। सचिन युवाओं के रोल मॉडल रहे हैं। वे युवाओं को राजनीतिक भले न सही पर शिक्षा और खेल के क्षेत्र में आगे लाने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। उनकी किसी पहल का न सिर्फ असर होगा बल्कि वह खासा कारगर भी साबित होगा। देशहित में कई मौकों पर उन्होंने कई ऐसे अभियानों में हिस्सा लिया भी है, जिससे एक स्वस्थ और खुशहाल भारत का निर्माण हो।
हम जीवन में लंबे समय तक पैसा, पद और प्रतिष्ठा के लिए तरसते हैं, इसके लिए कोशिश करते हैं पर ये फिर भी हमें हासिल नहीं होते। कर्म और सौभाग्य का मेल हर बार हो ही, यह जरूरी नहीं पर सचिन के जीवन में यह मेल है। यह उनके लिए गौरव की भी बात है और संतोष की भी। उन्हें इस गौरव और संतोष को मान देना चाहिए और कुछ भी ऐसा करने से बचना चाहिए जो उनके लिए अशोभनीय हो।

Monday, February 10, 2014

कामयाबी का सॉफ्टवेयर

मैं 46 साल का हूं। 22 सालों से शादीशुदा हूं। मेरे तीन बच्चे हैं। जो लोग मुझे जानते हैं वे कहते हैं कि मेरी पहचान मेरी जिज्ञासा और सीखने की उत्कंठा है। मैं जितनी किताबें पढ़ सकता हूं उससे कहीं ज्यादा किताबें खरीदता हूं। मैं जितने ऑनलाइन कोर्सेज कर सकता हूं, उससे कहीं ज्यादा कोर्सेज में दाखिला लेता हूं। परिवार, जिज्ञासा और ज्ञान की भूख ही मुझे परिभाषित करते हैं। ये बातें वह आदमी अपने बारे में अपने साथियों के साथ साझा कर रहा है, जिसे इस बात का फL हासिल होने जा रहा है कि दुनिया के कंप्यूटर और टेक्नॉलाजी के क्षेत्र की दिग्गज कंपनी माइक्रोसॉफ्ट का नया सीईओ होगा। दरअसल, हम बात कर रहे हैं सत्या नडेला की।
दुनिया की इस चौथी बड़ी कंपनी के प्रमुख बिल गेट्स ने सीईओ के रूप में सत्या के नाम की घोषणा करते हुए कहा, 'माइक्रोसॉफ्ट के सामने आज पहले से कहीं ज्यादा चुनौतियां हैं। लेकिन हमारे सामने ढेèरों मौके भी हैं और मुझे खुशी है कि उन मौकों को हासिल करने के लिए हमें एक मजबूत नेता मिला है।’ साफ है कि सत्या ने नाम, सम्मान और सफलता की यह ऊंचाई ऐसे ही नहीं हासिल की है।
पूर्व आईएएस अधकारी के बेटे सत्या 1992 में माइक्रोसॉफ्ट से जुड़े और कंपनी से मिली भूमिकाओं में खुद को साबित करते आए। उनकी अलग सोच और तेज रणनीति के नतीजे से कंपनी को अपनी साख और सफलता का ग्लोबल रकबा बढ़ाने में खासी मदद मिली। उन्होंने सर्च इंजन बिग और माइक्रोसोफ्ट ऑफिस के क्लाउड वर्जन ऑफिस 365 को लांच करने में अहम भूमिका निभाई है।
सत्या नडेला के माइक्रोसॉफ्ट का नया बॉस बनने पर भारत में भी काफी खुशी का आलम है। ऐसा इसलिए क्योंकि सत्या की पैदाइश भारत की है। उनका जन्म 1967 में हैदराबाद में हुआ। वे बचपन से ही काफी तेजस्वी और कुशाग्र थे। उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई से लेकर उच्चतर शिक्षा भी भारत में ही पूरी की। दिलचस्प है कि आज भले सत्या को कंप्यूटर तकनीक के क्षेत्र में एक बेहतरीन प्रतिभा के रूप में देखा जा रहा हो पर उनकी पहली पसंद कभी क्रिकेट खेलना था। अलबत्ता उनकी यही पसंद बाद में उनके लिए अलग तरीके से मददगार भी साबित हुई।
वे खुद कहते भी हैं, 'मुझे लगता है कि क्रिकेट से मैंने टीम में खेलने और नेतृत्व के बारे में सीखा और मेरे पूरे करियर में वह मेरे साथ रहा।’ आज जिस तरह के क्षेत्र में सत्या हैं उसमें प्रतिभा के साथ एकाग्रता और धैर्य की काफी जरूरत है। यही कारण है कि उन्हें आज भी फटाफट क्रिकेट की बजाय टेस्ट क्रिकेट देखना पसंद है। इसकी वजह बताते हुए वे कहते हैं कि दुनिया में कोई भी खेल इतने लंबे समय तक नहीं खेला जाता। यह बिल्कुल किसी रूसी नॉवेल को पढ़ने जैसा है। सत्या को उनकी नई नियुक्ति के लिए खूब सारी शुभकामनाएं।

 

Tuesday, February 4, 2014

खाकी पर भारी खादी

देश में इन दिनों सियासत खूब गरमाई हुई है। लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी दल ही सिर्फ अपने पत्ते फेंटने में नहीं लगे हैं बल्कि समाज के विभिन्न हिस्सों-तबकों में भी इसको लेकर दिलचस्पी खासी बढ़ गई है। सब कह रहे हैं कि इस बार का चुनाव देश की राजनीतिक धारा को वैकल्पिक मोड़ देगा, सो चुनावी मैदान में क्रांतिकारी मंसूबे के साथ कई अराजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग भी कूद रहे हैं। ऐसे ही नामों में एक बड़ा नाम है सत्यपाल सिंह का। सिंह ने अपनी सियासी पारी के लिए मुंबई पुलिस कमिश्नर के पद से इस्तीफा दे दिया है। माना जा रहा है कि वह भाजपा या आम आदमी पार्टी के टिकट पर अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर सत्यपाल सिह का कहना इतना भर है कि वह राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और विश्व शांति के लिए काम करना चाहते हैं। उनके ही शब्दों में, 'मैंने अभी यह तय नहीं किया है कि मैं किस पार्टी में शरीक होऊंगा। आपको दो से तीन दिन में इसके बारे में जानकारी मिल जाएगी।’ वैसे सत्यपाल भले अपने मुंह से कुछ न कहें पर उनको लेकर कयासबाजी खूब चल रही है। सूत्रों की मानें तो वे भाजपा के टच में हैं और पार्टी उन्हें उत्तर प्रदेश के मेरठ या बागपत सीट से लोकसभा उम्मीदवार बना सकती है। बता दें कि इससे पहले उन्होंने इशरतजहां एनकाउंटर केस में गुजरात हाईकोर्ट की एसआईटी की अगुवाई करने से इनकार कर दिया था।
इन संभावनाओं को पर लगने के पीछे कुछ और वजहें भी हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो पार्टी के बड़े नेताओं के साथ सिह की बातचीत पहले ही हो चुकी है। उनका भाजपा में शामिल होना तकरीबन तय है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पिछले दिनों उनकी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिह व पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ बातचीत हो चुकी है। इस बातचीत के बाद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को सिह से संपर्क साधने के लिए कहा था। सत्यपाल सिह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के भी करीबी बताए जाते हैं। वैसे उन्हें आम आदमी पार्टी से भी मुंबई से लोकसभा चुनाव लड़ने का ऑफर मिला है, ऐसी खबरें भी मीडिया के कुछ हल्कों में चल रही हैं।
29 नवंबर 1955 में मेरठ के बसौली में पैदा हुए सत्यपाल सिह की स्कूली पढ़ाई बागपत में हुई। इसके बाद उन्होंने मेरठ से रसायन विज्ञान में एमएससी और फिर एमफिल किया। रसायन शास्त्र के वैज्ञानिक बनने की ओर बढ़ रहे सिह पीएचडी करना चाहते थे, लेकिन अचानक उनका मूड बदल गया और उन्होंने आईपीएस की तैयारी शुरू कर दी। इस बीच वे ऑस्ट्रेलिया चले गए और वहां पर एमबीए करने लगे। एमबीए करने के दौरान भी उन्होंने आईपीएस बनने के लक्ष्य को छोड़ा नहीं। वापस भारत आए तो लोक प्रशासन में एमए किया और फिर इसी विषय में पीएचडी में दाखिला लिया। इसी दौरान उन्होंने आईपीएस की तैयारी तेज कर दी और परीक्षा पास कर ली।
सत्यपाल सिह महाराष्ट्र पुलिस में कई पदों पर रह चुके हैं। मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनाए जाने से पहले वह महाराष्ट्र के एडिशनल डीजीपी (लॉ एंड ऑर्डर) थे। इसके पहले वह पुणे और नागपुर के पुलिस कमिश्नर भी रह चुके हैं। इसके अलावा डेप्युटेशन पर वह सीबीआई में भी काम कर चुके हैं।
धर्म और अध्यात्म में तो खासतौर पर उनकी गहरी रुचि है। उन्होंने अध्यात्म व नैतिक मूल्यों पर कई किताबें भी लिखी हैं। पिछले साल उनकी किताब 'तलाश इंसान की’ का विमोचन अमिताभ बच्चन और जावेद अख्तर ने किया था।
बहरहाल, एक बात तो तय है कि सिंह ने जिस उम्मीद के साथ अपनी सियासी पारी खेलने का मन बनाया होगा, उसके पूरे होने के इस बार के लोकसभा चुनाव में आसार काफी हैं। अलबत्ता यह इस बात पर जरूर निर्भर करेगा कि वह किस पार्टी का झंडा थामते हैं। एक बात और यह कि सत्यपाल सिंह जैसे लोग अगर सियासी मैदान में उतर रहे हैं तो इससे देश की राजनीति के साफ-सुथरा और प्रभावी होने के आसार काफी बढ़
गए हैं।

परिवर्तन का दारोमदार महज आप पर नहीं


संभावनाओं के पूरे होने से ज्यादा जरूरी है, उनका बने रहना। जीवन और समाज का संभावना रहित होना खतरनाक है। ये बातें आज भारतीय राजनीति के संदर्भ में समझनी जरूरी है। इन दिनों देश में राजनीति काफी गरमाई हुई है। दो-तीन महीने में लोकसभा चुनाव होने हैं। दल और विचार की साझा ताकत सत्ता के गणित के आगे कमजोर पड़ रही है। बदलाव और विकल्प की सामयिक दरार को रेखांकित करने से तो किसी सियासी जमात को गुरेज नहीं है, पर इस पर पूरा जोर भी किसी का नहीं है। यह सब संभावनाओं के बड़े कैनवस को फिर से पुराने रंगों और चित्रों से भर जाने के अंदेशे की तरह है।
इस पूरी स्थिति को समझने के लिए थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो कई बातें साफ होंगी। बीते तीन सालों में भ्रष्टाचार को लेकर जो देशभर में आक्रोश दिखा, उसकी अगुवाई करने वाले नागरिक समाज के एक धड़े ने अपने सांगठनिक सामथ्र्य को राजनीतिक दल का रूप दिया। पर सत्ता तक पहुंचकर सत्तावादी आचरण को बदलने की अधीरता ने एक बड़ी कोशिश को कुछ ही महीनों में पटरी से उतार दिया। आम आदमी पार्टी के कार्यकताã और शुभचिंतक भी अब उससे कट रहे हैं। सदस्यता अभियान के नाम पर करोड़ का आंकड़ा छूने का दावा जरूर किया जा रहा है पर कमिटेड वर्क फोर्स के नाम पर पार्टी के पास गिनती के नाम हैं। यही नहीं महिला अस्मिता जैसे मुद्दे पर पार्टी की सोच और उसकीसरकार के मंत्री के आचरण की हर तरफ कठोर निंदा हो रही है। पार्टी के संस्थापक सदस्याओं में से एक मधु भादुड़ी सीधा आरोप लगा रही हैं कि पार्टी को कुछ लोगों ने हाईजैक कर लिया है। पार्टी के अंदर चुनाव जीतने और सत्ता की राजनीति करने का पागलपन इस कदर बढ़ गया है कि भिन्न स्वरों और वैकल्पिक रायों को पार्टी के अंदर कोई सुनने को तैयार नहीं है।
मधु आगे बढ़कर यहां तक कहती हैं कि इस पार्टी में और बातें तो छोड़ दीजिए महिलाओं को 'इंसान’ तक नहीं समझा जा रहा। गौरतलब है कि मधु आप के राष्ट्रीय अधिवेशन में खिड़की एक्सटेंशन में आधी रात को दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की अगुवाई में हुए महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक सलूक के मामले को उठाना चाहती थीं। उनकी मांग और मंशा इतनी भर थी कि पार्टी को इस मामले में अपनी चूक मान लेनी चाहिए और खुद से आगे बढ़कर माफी मांगनी चाहिए। पर माफी की बात तो दूर उन्हें इस मामले में पार्टी फोरम पर अपनी पूरी बात कहने तक से रोका गया।
आप से निकाले गए विधायक विनोद कुमार बिन्नी की राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को देखते हुए उनके उठाए सवालों को अगर एक किनारे कर भी दें तो भी एक बात तो साफ जाहिर हो रही है कि इस पार्टी ने अपने लिए जो उच्च राजनीतिक मानदंड तय किए थे, वह आज उस पर खुद खरी नहीं उतर रही है। ऐसा नहीं होता तो सरकार बनाने और तमाम अहम मुद्दों पर जनता की राय से अपना रुख तय करने वाली पार्टी अपने विधायक को बिना जनता से राय लिए कम से कम बाहर का रास्ता नहीं दिखाती।
आप को लेकर ये सारी बातें इसलिए क्योंकि उसके उदय और संघर्ष की परिघटना ने ही देश में राजनीतिक बदलाव और विकल्प की संभावना को रेखांकित किया था। भूले नहीं हैं लोग कि जब इस पार्टी ने दिल्ली में डेढ़ दशक से चल रही कांग्रेस सरकार को महज आठ सीट तक सीमित कर दिया तो राहुल गांधी ने मीडिया के सामने आकर बयान दिया कि आप से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। खासकर उसने जिस तरह कम समय में लोगों को अपने से जोड़ा। आज उसी राहुल गांधी की तरफ से अखबारों में विज्ञापन छप रहा है- 'अराजकता नहीं प्रशासन सुधार’। साफ है कि निशाने पर सीधे-सीधे खुद को अराजक कहने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार है। इससे पहले गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भी परोक्ष रूप से दिल्ली सरकार के कामकाज पर टिप्पणी कर चुके हैं।
दरअसल, अब सवाल यह नहीं है कि क्या आम आदमी पार्टी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और इतिहास बदलने की जल्दबाजी में देश में लोकतांत्रिक परिवर्तन की एक बड़ी संभावना हाशिए पर खिसकती जा रही है, खारिज होती जा रही है? नया सवाल तो यह है कि क्या संभावना और उसके बूते परिवर्तन की ऐतिहासिक पटकथा लिखने का लाइसेंस सिर्फ आप और उसके मुट्ठी भर नेताओं के पास है। पिछले एक महीने में दिल्ली की सड़कों से लेकर सचिवालय के अंदर-बाहर दिखी नौटंकी ही क्या देश के भविष्य के चित्र हैं? निश्चित रूप से इसका जवाब नहीं है।
देश में परिवर्तन की गहराती संभावनाओं की बात इसलिए नहीं शुरू हुई कि ऐसा सिविल सोसायटी की नुमाइंदगी करने वाले कुछ लोग या कोई पार्टी ऐसा कह रही थी। दरअसल, इसके पीछे बीते कुछ सालों में देश की सड़कों पर बार-बार खुलकर प्रकट हुई वह जनाकांक्षा रही, जिसने लोकतंत्र में जन साझीदारी की दरकार के लिए सियासी जमातों के आगे खासा दबाव बनाया। बाकी दलों औरआप में फर्क बस यह रहा कि बाकी ने इस सामयिक दरकार को गंभीरता से नहीं लिया और आप ने इसे अपना एजेंडा बना लिया। यह अलग बात है कि सत्ता की राजनीति में उतरी यह नई पार्टी भी अब अपने इस एजेंडे को लेकर पहले की तरह गंभीर नहीं है।
यह स्थिति उन तमाम दलों के लिए चूक सुधार के एक मौके की तरह है जो कल तक आप के सियासी उदय को अपने लिए कहीं न कहीं खतरा मान रहे थे। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से लेकर कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय ठहराए जाने वाले नेता राहुल गांधी को इस बाबत खासतौर पर ध्यान देना चाहिए। इन दोनों नेताओं पर ही कहीं न कहीं दारोमदार है कि वे लोकसभा चुनाव के एजेंडे को क्या शक्ल देते हैं। जनता पर नहीं बल्कि जनता के साथ मिलकर शासन चलाना, सत्ता का विकेंद्रीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर पहल के साथ अगर देश की दोनों चोटी की पार्टियां अपनी तैयारी और सोच के साथ इस बार जनता के सामने वोट मांगने जाएं तो यह जनभावना के अनुरूप होगा। साथ ही यह देश में पारंपरिक की जगह वैकल्पिक राजनीति के प्रयोग की बड़ी मुश्किल से बनी संभावना को एक अंजाम तक पहुंचाने के ऐतिहासिक अभिक्रम से जुड़ने जैसा भी होगा।
चुनाव के दौरान स्वार्थपूणã गठजोड़ और एक दूसरे के खिलाफ तीखे व घटिया आरोप-प्रत्यारोप का अतिवाद अब निश्चित रूप से दरकना चाहिए। इतिहास और विचार के तमाम सुलेखों को अपने नाम दर्ज होने का दावा करने वाली देश की दोनों महत्वपूर्ण पार्टियों को यह साहस दिखाना चाहिए कि वे एक-दूसरे से बेहतर संभावना के नाम पर भिड़ें न कि घटिया सियासी सलूक के नाम पर।