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Wednesday, September 17, 2014

सन्निधि संगोष्ठी


सन्निधि संगोष्ठी दिल्ली में होने वाली साहित्यक गतिविधियों का अब एक जरूरी पन्ना बनता जा रहा है। इसका सतत आयोजन एक उपलब्धि की तरह है। मेरे पुराने साथी और वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत की इस आयोजन को सफल और सतत बनाने में बड़ी भूमिका रही है। इस बारे में समय-समय पर उनसे बातचीत भी होती रही। यह मैं अपना दुर्भाग्य या पत्रकारीय पेशे की मजबूरी मानता हूं कि अब तक मैं इस गोष्ठी में शरीक नहीं हो सका।
इस बार 21 सितंबर को यह गोष्ठी होगी। मेरे लिए संतोष और खुशी की बात है इस बार मैं भी इसका हिस्सा बनने जा रहा हूं।
इस बार की गोष्ठी में की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र कर रहे हैं। 'सिनेमा और हिंदी’ विषय पर मुख्य वक्ता हैं विनोद भारद्बाज। मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित हैं प्रसिद्ध कथाकार नासिरा शर्मा।
विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. किरण पाठक और मुझ कलम घसीट को आयोजकों ने बुलाया है। 

Monday, September 15, 2014

पत्थर फेंकने वाला अकवि


वरिष्ठ कवि चंद्रकांत देवताले ने अपने समकालीन कई कवियों के साक्षात्कार लिए हैं, जो अब पुस्ताकार रूप में सामने आया है। इन साक्षात्कारों से गुजरते हुए देवताले के अपने कविकर्म को लेकर कई बातें बरबस जेहन को घेरती चली गईं। देवताले पचास के दशक के आखिर में हिदी कविता जगत में एक हस्तक्षेप के रूप में उभरते हैं और उनका यह हस्तक्षेप आगे चलकर भी न तो कभी स्थगित हुआ और न ही कमजोर पड़ा। उनकी काव्य संवेदना पर वीरेन डंगवाल की चर्चित टिप्पणी है कि वे 'हाशिए’ के नहीं बल्कि 'परिधि’ के कवि हैं।
देवताले की कविताओं में स्वातंत्रोत्तर भारत में जीवनमूल्यों के विघटन और विरोधाभासों को लेकर चिता तो है ही, एक गंभीर आक्रोश और प्रतिकार भी है। अपने रचनाकर्म को लेकर उनकी तत्पर प्रतिबद्धता इस कारण कभी कम नहीं हुई कि उनके कई समकालीनों के मुकाबले आलोचकों ने उनको लेकर एक तंग नजरिया बनाकर रखा। जाहिर है कि इस कारण अर्धशती से भी ज्यादा व्यापक उनके काव्य संसार को लेकर एक मुकम्मल राय तो क्या बनती, उलटे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सरोकारों को लेकर सवाल उठाए गए। किसी ने उन्हें 'अकवि’ ठहराया तो किसी ने उनकी वैचारिक समझ पर अंगुली उठाई। देवताले के मू्ल्यांकन को लेकर रही हर कसर उन्हें 2०12 के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुने जाने के बाद पूरी हो जानी चाहिए थी, पर ऐसा हुआ नहीं।
चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार उनके 2०1० में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूं’ के लिए दिया गया था। यह उनकी एक महत्वपूर्ण काव्य पुस्तक है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं। 'भूखंड तप रहा है’ और 'लकड़बग्घा हंस रहा है’, 'पत्थर की बेंच’ और 'आग हर चीज में बताई गई थी’ जैसे उनके काव्य संकलन उनकी रचनात्मक शिनाख्त को कहीं ज्यादा गढ़ते हैं। बहरहाल, यह विवाद का विषय नहीं है। वैसे भी अकादमी सम्मान के बारे में कहा जाता है कि यह भले किसी एक कृति के लिए दिया जाता हो, पर यह कहीं न कहीं पुरस्कृत साहित्यकार के संपूर्ण कृतित्व का अनुमोदन है। बहरहाल, एक दरकार तो इस विलक्षण कवि को लेकर अब भी शेष है कि उनके काव्य बोध और विपुल कवि कर्म का पुनरावलोकन करने की आलोचकीय चुनौती को आगे बढ़कर कोई गंभीर आलोचकीय स्वीकार्य से भर देगा। इस तरह की दरकारों का जीवित रहना और उनका पूरा होना मौजूदा दौर में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समय, समाज और संवेदना का अंतर्जगत आज सर्वाधिक विपन्नता का संकट झेल रहा है। मानव मूल्यों के विखंडन को नए विकासवादी सरोकारों के लिए जरूरी मान लिया गया है।
हिदी का मौजूदा रचना जगत सार्वकालिकता के बजाय तात्कालिक मूल्य बोधों को पकड़ने के प्रति ज्यादा मोहग्रस्त है। यही कारण है कि टिकाऊ रचनाकर्म का अभाव आज हिदी साहित्य की एक बड़ी चिता है। देवताले इस चिता का समाधान तो देते ही हैं, वे हमें उस चेतना से भी लैस करते हैं, जिसकी दरकार एक जीवंत और तत्पर नागरिक बोध के लिए है- 'मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/ और मैंने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया/ जो घृणित युद्ध में शामिल हैं।’ (पत्थर फेंक रहा हूं)

Monday, September 8, 2014

...तो मैं ही क्यों बदनाम हो गई!


जब इस देश के नेताओं में लूट प्रवृति आम हो गई।
पूछ रही है चंबल घाटी मैं ही क्यों बदनाम हो गई।
यह गीत बिहार के वरिष्ठ सर्वोदयी साथी रामशरण भाई का है। इसे वे जेपी आंदोलन और बाद के दिनों में गाते थे। डफली के साथ झूम-झूमकर जब वे गाते थे...तो लोग बस उनसे जुड़ते चले जाते थे। उनके इस जादू के साक्षी विनोबा-जेपी के दौर के लाखों-हजारों लोगों से लेकर जेएनयू कैंपस तक रहा है। अपने तकरीबन दस साल के सामाजिक सेवा और शोध कार्य के दौरान रामशरण भाई से कई मर्तबा मिला और उन्हें सुना।
एक झोले में एक मोटी बिनाई का कुर्ता-धोती, एक पुरानी डायरी और एक-दो और सामान। उनके साथ उनका जीवन इतना ही सरल और बोझरहित था। जहां तक मुझे याद है, अपने जीवन में वे दर्जनों संस्थाओं के सैकड़ों अभिक्रमों से जुड़े पर कभी वेतनभोगी नहीं बने। जीवन को जीने का यह कबीराई अंदाज ही था, जिसने उन्हें आजीवन तत्पर और कार्यरत तो बनाए रखा पर संलग्नता का मोह कहीं से भी बांध न सका, न परिवार से और न ही संस्थाओं से। तभी तो उनके कंठ से जो स्वर फूटे, वे न सिर्फ धुले हुए थे बल्कि सच्चे भी थे। शादी-ब्याह में दिखावे के बढ़े चलन पर उनका गीत याद आता है-
दुई हाथी के मांगै छै दाम,
बेचै छै कोखी के बेटा के चाम
बड़का कहाबै छै कलजुग के कसाई...
एमफिल के लिए चूंकि मैं 'जयप्रकाश आंदोलन और हिदी कविता’ पर काम कर रहा था, लिहाजा आंदोलन के दौर के कई ऐसे लोगों से मिलने का मौका मिला, जो रामशरण भाई जैसे तो पूरी तरह नहीं, पर थे उनके ही समगोत्रीय।
सर्वोदय-समाजवादी आंदोलन में क्रांति गीतों की भूमिका कार्यकताã तैयार करने में सबसे जरूरी और कारगर रही है। 'जय हो...’ और 'चक दे इंडिया...’ गाकर जो तरुणाई जागती है, उसका 'फेसबुक’ कभी भी इतना विश्वसनीय, दृढ़ और जुझारू नहीं हो सकता, जितना किसी आंदोलन की आंच को बनाए और जिलाए रखने के लिए जरूरी है।
रामचंद्र शुक्ल की शब्दावली में कहें तो 'लोक’ की 'परंपरा’ या तो आज कहीं पीछे छूट गई है या फिर बदले दौर में इसकी दरकार को ही खारिज मान लिया गया है। देश में जनगायकों या लोकगायकों की ऐसी परंपरा का अब सर्वथा अभाव दिखता है। दक्षिण भारत में एक स्वर गदर का सुनाई पड़ता है, जो अपनी सांगठनिक और वैचारिक प्रतिबद्धताओं के कारण जन के बजाय कैडर की आवाज ज्यादा लगता है।
दिलचस्प है कि खुद को प्रगतिशील मानने वाले छात्रों की जमात विश्वविद्यालयों में अपनी सांगठनिक-वैचारिक गतिविधियों के दौरान कुछ कवियों की काव्य पंक्तियां तख्तियों पर लिखकर आज भी लहराती हैं तो इसके जवाब में राष्ट्रवादी या दक्षिणपंथी कहे जाने वाले संगठनों से जुड़े छात्र राष्ट्रीयता से ओतप्रोत काव्य पंक्तियों का सहारा लेते हैं। पिछले दिनों अण्णा के आंदोलन के दौरान भी या तो देशप्रेम के फिल्मी गाने बजे या फिर गिटार पर कुछ बेसधी धुन।
आंदोलन का जन चेहरा जन औजारों से ही गढ़ा जा सकता है। यह बात रामशरण भाई जैसे जनगायकों को देखने-जानने के बाद और ज्यादा समझ में आती है।

Friday, September 5, 2014

सर

(शिक्षक दिवस पर विशेष कविता)


रोकिए नहीं सर
अभी लिखना है
और भी बहुत कुछ
इजाजत नहीं तो वहां
क्लास के बाहर
बैठकर लिख लूंगा
आपकी छड़ी
टिक-टिक घड़ी
दोनों की कद्रदानी
सौभाग्य है मेरा


सौभाग्य यह आज भी
दुविधाग्रस्त नहीं
सुरक्षित है सर
बहुत सिखाया है इसने
बहुत असर है इनका
मेरे ऊपर


लेकिन लिखूंगा
आज तो जरूर लिखूंगा सर
ऐसे कई शब्द
अधूरे-पूरे वाक्य
जिनके हिज्जे
पूरा का पूरा गठन
दुरुस्त नहीं
बस होंगे मौलिक



ये भी बड़ी बात है सर
बताया था आपने ही
पढ़ाते हुए कबीर
इन्हें बस मैं ही लिख सकता हूं
सिर्फ मेरी स्याही ही
उगा सकती हैं इन्हें
ये मेरे शब्द हैं सर
सिर्फ मेरी कॉपी पर ही
हो सकते हैं


इनके होने की दरकार
एक अधूरे आदमी की
पूरे व्यक्तित्व की चाहना है
बहुत जरूरी है
इनका चहकना


बहुत जरूरी है सर
मेरी कॉपी को
मेरा साबित होना
भरोसा है
यह मौका आप देंगे
मेरी कॉपी आप
नहीं लेंगे सर



Wednesday, September 3, 2014

एक शब्द के चोरी होने का दर्द


हिदी का एक शब्द आजकल मुझे बहुत परेशान करता है। खासतौर पर उसका इस्तेमाल। यह शब्द है- 'उदार’। इसी से बना दूसरा शब्द है- 'उदारवाद’। 'उदार’ शब्द का इस्तेमाल हाल तक मानवता के श्रेष्ठ गुण के लिए किया जाता था। ईश्वर और ईश्वर तुल्यों के लिए जिस गुण विशेष का आज तक इस्तेमाल होता रहा, वह शब्द हमारे देखते-देखते समय और परंपरा के सबसे संवेदनहीन दौर के लिए समर्पित कर दिया गया।
दरअसल, शब्दों का भी अपना लोकतंत्र होता है और यह लोकतंत्र किसी भी राजकीय या शासकीय लोकतंत्र के मॉड्यूल से ज्यादा लोकतांत्रिक होता है। शब्दों की दुनिया में वर्चस्व या एकाधिकार की गुंजाइश नहीं। परंपरा और व्यवहार का समर्थन या विरोध ही यह तय करता है कि कौन सा शब्द चलेगा और कौन सा नहीं।
शब्द हमारी अभिव्यक्ति के साथ-साथ हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास, हमारी परंपरा और हमारे समाज से गहरे जुड़े हैं। शब्दों का अध्ययन हमारे चित्त, मानस और काल के कलर और कलई की सचाई को सबसे बारीकी से पकड़ सकता है।
'उदार’ शब्द के अपहरण -चोरी भी कह सकते हैं- की स्थितियों को थोड़ा समझना चाहें तो कई बातें साफ होती हैं। आंखों से काजल चुराने वाले सियाने भले अब पुरानी कहानियों, कविताई और मुहावरों में ही मिलें पर ग्लोबल दौर की चोरी और चोर भी कम नहीं हैं।
चोरी एक ऐसा कर्म है जिसका इस्तेमाल विचार से लेकर संस्कार तक हर क्षेत्र में होता रहा है। जाहिर है, जिस परंपरा का विस्तार और प्रसार इतना व्यापक हो, उसके डाइमेंशन भी एक-दो नहीं बल्कि अनगिनत होंगे। नए दौर में चोरी को लेकर एक फर्क यह जरूर आया है कि अब चोरी अपनी परंपरा से विलग कर आधुनिक और ग्लोबल कार्रवाई हो गई है। इस फर्क ने चोरी के नए और बदलावकारी आयामों को हमारे सामने खोला है।
अब इस काम को करने के लिए किसी तरह के शातिराना तर्जुबे की दरकार नहीं बल्कि इसे ढोल-धमाल के साथ उत्सवी रूप में किया जा रहा है।
जाहिर है कि चोरी अब सभ्य नागरिक समाज के लिए कोई खारिज कर्म नहीं रह गया है और न ही इसका संबंध अब धन-संपदा पर हाथ साफ करने भर से रह गया है। स्वीकार और प्रसार के असंख्य हाथ अब एक साथ चोर-चोर चिल्ला रहे हैं पर खौफ से नहीं बल्कि खुशी-खुशी। वैसे यहां यह गौर करने वाली बात होगी कि 'उदारवाद’ के विरोधी भले विकास के नाम पर बाजार की चालाकी और उपभोक्ता क्रांति के नाम पर चरम भोग की प्रवृत्ति को मुद्दा बनाएं, पर विरोध के उनके एजेंडे में भी इस तरह की चोरी शामिल नहीं है।
बात ज्यादा दूर की नहीं बल्कि अपने ही देश और उसके सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बोली-भाषा की की जाए तो ग्लोबल चोरी सर्ग में इसके कई शब्द देखते-देखते अपने अर्थ को छोड़ अनर्थ के संग हो लिए। मानवीय सुंदरता की जगह, बात सड़कों की और शहरों की सुंदरता की होती है। विकास और बाजार ने मिलकर सबके ऊपर एक ऐसा छाता ताना है कि इसके भीतर समाने के लिए सारे मरे जा रहे हैं। शब्दों से खिलवाड़ हो ही रहा है तो आप खेल-खेल में इसे सबको ललचाने वाली 'ग्लोबल छत्रछाया’भी कह सकते हैं।

Monday, August 25, 2014

फिर मुझे छोड़के जाने के लिए आ...!!


एफएम रेडियो ने माधुर्य की आकाशवाणी को न जाने कहां पहुंचा दिया है। पिछले दिनों यह मुद्दा संसद में भी उठा। शुक्र है अब भी पुराने गीत-संगीत के कुछ रसिया रेडियो स्टेशनों में बैठे हैं। इन्हें मौका कम मिलता है पर इनके कार्यक्रमों का सम्मोहन गजब का है। ऐसे ही एक कार्यक्रम में मेहंदी हसन की गजलें सुनने और उनके बारे में कई सारी बातें जानने-सुनने को मिलीं।
'रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ, आ फिर मुझे छोड़के जाने के लिए आ’ मेहंदी हसन की गाई यह मशहूर गजल उनके इंतकाल के बाद बरबस ही उनके चाहने वालों को याद हो आती है।
उनका जन्म 1927 में हुआ तो था भारत में, राजस्थान के लूणा गांव में। पर 1947 में मुल्क के बंटवारे के वक्त वे पाकिस्तान चले गए। अपनी माटी-पानी से दो दशक का उनका संबंध उन्हें ताउम्र आदर््र करता रहा। बताते हैं कि जब सत्तर के दशक में वे अपने पैतृक गांव को देखने आए तो सड़क न होने के कारण उन्हें गांव तक पहुंचने में काफी परेशानी हुई।
अपनी पुरखों की मिट्टी को लेकर उनके जज्बात किस तरह के थे, यह इस वाकिये से जाहिर होता है कि लूणा तक सड़क का निर्माण हो इसके लिए फंड इकट्ठा करने के लिए उन्होंने तत्काल वहीं अपनी गायकी का एक कार्यक्रम रख दिया। आखिरी बार 2००5 में वे यहां आए थे अपने इलाज के सिलसिले में।
अपने आखिरी दिनों में भारत आने को लेकर वे काफी उत्सुक थे। यहां आकर वे लता मंगेशकर और दिलीप कुमार जैसी शख्सियतों से मिलना चाहते थे। पर उनकी सेहत ने इसकी इजाजत उन्हें आखिर तक नहीं दी। वे लगातार बीमार चल रहे थे। राजस्थान सरकार ने अपनी तरफ से पहल भी की थी कि उन्हें इलाज के लिए भारत लाया जाए। संगीत के जानकारों की नजर में बेगम अख्तर के बाद गजल गायकी की दुनिया को यह सबसे बड़ा आघात है।
कभी लता मंगेशकर ने उनकी गायकी सुनकर कहा था कि यह खुदा की आवाज है। हारमोनियम, तबला और मेहंदी हसन- संगीत की इस संगत को जिसने भी कभी सामने होकर सुना, वह उसकी जिदगी का सबसे खूबसूरत सरमाया बन गया। मेहंदी हसन की गायकी पर राजस्थान के कलावंत घराने का रंग चढ़ा था, जो आखिर तक नहीं उतरा। उन्होंने गजल से पहले ठुमरी-दादरा के आलाप भरे पर आखिर में जाकर मन रमा गजलों में। उन्हें उर्दू शायरी की भी खासी समझ थी। गालिब, मीर से लेकर अहमद फराज और कतील शिफाई तक उन्होंने कई अजीम शायरों की गजलों को अपनी आवाज दी। आज जबकि गजल गायकी के पुराने स्कूल प्रचलन से बाहर हो रहे हैं, मेहंदी की आवाज संगीत के नए होनहारों को बहुत कुछ सीखा सकती है।
बेहद दुर्भाग्यपूणã है कि इस महान कलाकर की मौत के बाद जहां एक तरफ संगीत की दुनिया में एक भारीपन पसरा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के कुछ अखबारों ने उनकी जिदगी के निहायत निजी पन्ने उलटते हुए कुछ अप्रिय विवादों को जन्म देना चाहा है। यह सच है कि मेहंदी की जिदगी पर संघर्ष और मुफलिसी का साया हमेशा रहा। पर इनकी वजहों का सच टटोलने से बड़ी बात है, वह लगन और साधना जिसने उन्हें गजल की दुनिया की शहंशाही तक का जन खिताब दिलाया।

Tuesday, August 19, 2014

अदम की शायरी का दम


अभी मैनेजर पांडे की कई किताबें आई हैं। उन्हीं में एक में अदम गोंडवी पर उनका लेख है। याद हो आया कि अखबार के दफ्तर में काम के दौरान ही अदम के देहांत की खबर मिली थी। अखबार के ही एक साथी ने दौड़कर आकर बताया था। इसे हिदी पत्रकारिता के दिलो-दिमाग में उतरा देशज संस्कार कहें या जमीनी सरोकार कि तमाम अखबारों ने अगले दिन अदम के देहांत की खबर को स्थान देना जरूरी समझा।
अदम जनता के शायर थे और अपनी शख्सियत में भी वे आमजन की तरह ही सरल और साधारण थे। पुराने गढ़न की ठेहुने तक की मटमैली छह-छत्तीस धोती, मोटी बिनाई का कुर्ता और गले में सफेद गमछा लपेटे अदम को जिन लोगों ने कभी मुशायरों-कवि सम्मेलनों में सुना होगा, उन्हें इस निपट गंवई शायर के मुखालफती तेवर के ताव और घाव आज ज्यादा महसूस हो रहे होंगे।
हिदी की कुलीन बिरादरी इस भाषा को किताबों और सभाकक्षों में चाहे जो स्वरूप देकर अपना सारस्वत धर्म निबाहे, इसकी आत्मा तो हमेशा लोक और परंपरा के मेल में ही बसती है। यही कारण है कि अपने समय की सबसे चर्चित और स्मृतियों का हिस्सा बनी काव्य पंक्तियों के रचयिता इस जनकवि को अदबी जमात ने अपने हिस्से के तौर पर मन से कभी नहीं कबूला।
अदम काफी हद तक कबीराई मन-मिजाज के शायर थे। इसलिए उन्हें इस बात का कभी अफसोस रहा भी नहीं कि उन्हें उनके समकालीन साहित्यकार और आलोचक किस खांचे में रखते हैं। कवि सम्मेलनों और मुशायरों का हल्का और बाजारू चरित्र उन्हें खलता तो बहुत था पर वे इन मंचों को जनता तक पहुंचने का जरिया मानकर स्वीकार करते रहे।
अपने करीब 63 साल के जीवन में उन्होंने हिदुस्तान की उम्मीद और तकदीर का वह हश्र सबसे ज्यादा महसूस किया जिसने आमजन के भरोसे और उम्मीद को कुम्हलाकर
रख दिया।
सत्ता, सियासत और दौलत के गठबंधन ने गांव और गरीब को जैसे और जितनी तरह से ठगा, उसका जीवंत चित्र अदम की शायरी का सबसे बड़ा सरमाया है। अपने समय में सत्ता के खिलाफ वे सबसे हिमाकती और मुखालफती आवाज थे।
'काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में/ उतरा है रामराज्य विधायक निवास में’, 'इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया/ सेक्स की रंगीनियां या गोलियां सल्फास की’, 'जो न डलहौजी कर पाया वो ये हुक्मरान कर देंगे/ कमीशन दो तो हिदुस्तान को नीलाम कर देंगे’....जैसे नारे और बगावती बयाननुमा पंक्तियों को लोगों की जुबान पर छोड़ जाने वाले अदम गोंडवी के बाद जनभावनाओं को निर्भीक अभिव्यक्ति
देने वाली जनवादी काव्य परंपरा की निडरता शायद ही कहीं नजर आए।
जहां तक कथन के साथ काव्य शिल्प का सवाल है तो हिदी में दुष्यंत कुमार के बाद अदम गोंडवी अकेले ऐसे शायर हैं, जिन्होंने न सिर्फ हिदी शायरी की जमीन का रकबा बढ़ाया बल्कि उसे मान्यता और लोकप्रियता भी दिलाई। हिदी के काव्य हस्ताक्षरों की कबीराई परंपरा में अदम नागार्जुन और त्रिलोचन की परंपरा के कवि थे।