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Monday, July 28, 2014

तुम सीटी बजाना छोड़ दो


सीटियों का जमाना लदने को है। सूचना क्रांति ने सीटीमारों के लिए स्पेस नहीं छोड़ा है। इसी के साथ होने वाला है युगांत संकेत भाषा के सबसे लंबे खिचे पॉपुलर युग का। बहरहाल, कुछ बातें सीटियों और उसकी भूमिका को लेकर। कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं पर पहली सीटी किसी लड़की ने नहीं बल्कि किसी लड़के ने किसी लड़की के लिए ही बजाई होगी। बाद के दौर में सीटीमार लड़कों ने सीटी के कई-कई इस्तेमाल आजमाए। जिसे आज ईव-टीðजग कहते हैं, उसका भी सबसे पुराना औजार सीटियां ही रही हैं। वैसे सीटियों का कैरेक्टर शेड ब्लैक या व्हाइट न होकर हमेशा ग्रे ही रहा है।
बात किशोर या नौजवान उम्र की लड़के-लड़कियों की करें तो सीटी ऐसी कार्रवाई की तरह रही है, जिसमें 'फिजिकल’ कुछ नहीं है यानी गली-मोहल्लों से शुरू होकर स्कूल-कॉलेजों तक फैली गुंडागर्दी का चेहरा इतना वीभत्स तो कभी नहीं रहा कि असर नाखूनी या तेजाबी हो। फिर भी सीटियों के लिए प्रेरक -उत्प्रेरक न बनने, इससे बचने और भागने का दबाव लड़कियों को हमारे समाज में लंबे समय तक झेलना पड़ा है। सीटियों का स्वर्णयुग तब था जब नायक और खलनायक, दोनों ही अपने-अपने मतलब से सीटीमार बन जाते थे।
इसी दौरान सीटियों को कलात्मक और सांगीतिक शिनाख्त भी मिली। किशोर कुमार की सीटी से लिप्स मूवमेंट मिला कर राजेश खन्ना जैसे परदे के नायकों ने रातोंरात न जाने कितने दिलों में अपनी जगह बना ली। आज भी जब नाच-गाने का कोई आइटम नुमा कार्यक्रम होता है तो सीटियां बजती हैं। स्टेज पर परफॉर्म करने वाले कलाकारों को लगता है कि पब्लिक का थोक रिस्पांस मिल रहा है। वैसे सीटियों को लेकर झीनी गलतफहमी शुरू से बनी रही है। संभ्रांत समाज में इसकी असभ्य पहचान कभी मिटी नहीं। यूं भी कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय के बदले दौर में भी इस कथित अमर्यादा का शुद्धिकरण कभी इतना हुआ नहीं कि सीटियों को शंखनाद जैसी जनेऊधारी स्वीकृति मिल जाए। सीटियों से लाइन पर आए प्रेम प्रसंगों के कर्ताधताã आज अपनी गृहस्थी की दूसरी-तीसरी पीढ़ी की क्यारी को पानी दे रहे हैं।
रेट्रो दौर की मेलोड्रामा मार्का कई फिल्मों के गाने प्रेम में हाथ आजमाने की सीटीमार कला को समर्पित हैं। एक गाने के बोल तो हैं- 'जब लड़का सीटी बजाए और लड़की छत पर आ जाए तो समझो मामला गड़बड़ है।’ 1951 में आई फिल्म 'अलबेला’ में चितलकर और लता मंगेशकर की युगल आवाज में 'शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो’ तो आज भी सुनने को मिल जाता है।
मॉरल पुलिसिग हमारे समाज में अलग-अलग रूप में हमेशा से रही है और इसी पुलिसिग ने सीटी प्रसंगों को गड़बड़ या संदेहास्पद मामला करार दिया। चौक-चौबारों पर कानोंकान फैलने वाली बातें और रातोंरात सरगर्मियां पैदा करने वाली अफवाहों को सबसे ज्यादा जीवनदान हमारे समाज को कथित प्रेमी जोड़ों ने ही दिया है। सीटियां आज गैरजरूरी हो चली हैं। मॉरल पुलिसिग का नया निशाना अब पब और पार्क में मचलते-फुदकते लव बर्डस हैं। सीटियों पर से टेक्नोफ्रेंडी युवाओं का डिगा भरोसा इंस्टैंट मैसेज, रिगटोन और मिसकॉल को ज्यादा भरोसेमंद मानता है।

Monday, July 21, 2014

कश्मीरी आशा और बिग बी


कश्मीर का मुद्दा एक बार फिर गरमाया है। याद आता है तकरीबन तीन साल पहले का एक वाकया। अपने महानायक तब इंग्लैंड के दौरे पर थे। ऑक्सफोर्ड की लाइब्रेरी में मैग्ना कार्टा चार्टर देखकर अमिताभ बच्चन जब अभिभूत होते हैं तो अखबारों, टीवी चैनलों के लिए यह न छोड़ी जा सकने वाली खबर थी। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है कि पूरब में खड़े होकर कोई पश्चिम को सूर्य का घर माने और उसकी लाली से अपनी चेतना और इतिहास बोध को रंग ले।
दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र की उन जड़ों की जिसकी डालियों पर झूला डालने वाले परिदे आपको आज पूरी दुनिया में मिल जाएंगे। पर लोकतंत्र महज एक शासनतंत्र नहीं, एक जीवनशैली और मानवीय इच्छाशक्ति भी है। अगर यह बोध और सोच किसी को भावनात्मक अतिरेक लगे तो उसे भारत के पांच लाख से ज्यादा गांवों के सांस्कृतिक गणतंत्र की परंपरा से परिचित होना चाहिए। परंपरा का यह प्रवाह आज जरूर पहले की तरह सजल नहीं रहा, पर है वह आज भी कायम अपने जीवन से भरे बहाव के साथ।
अमिताभ बच्चन जब आधुनिक विश्व में लोकतंत्र के ऐतिहासिक उद्भव की गाथा को देख-सुनकर गदगद हो रहे थे, उसी समय देश के कुछ सूबों में पंचायत के चुनाव हो रहे थे। इन सूबों में जम्मू कश्मीर भी शामिल था। यह एक बड़ा अनुष्ठान था। लेकिन तब विधानसभा चुनावों, भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालती कार्रवाई और नागरिक समाज की मांगों और आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन के खात्मे के शोरगुल में इसकी तरफ कम ही लोगों का ध्यान गया। अलबत्ता स्थानीय लोगों की दिलचस्पी जरूर इसमें बनी रही।
दिलचस्प तो यह रहा कि अशांत घाटी में इन चुनावों का औपचारिक निर्वाह ही जहां बड़ी कामयाबी ठहराई जा सकती थी, वहां अस्सी फीसद तक मतदान हुए। यही नहीं बिहार जैसे सूबे में जहां पंचायत की परंपरा को ऐतिहासिक मान्यता हासिल है, वहां भी ये चुनाव तब संगीनों के साए में होने के बावजूद खून के छीटों से बचे नहीं रहे थे। जबकि जम्मू-कश्मीर में ये चुनाव तकरीबन शांतिपूर्ण संपन्न हुए थे।
दरअसल, पंचायत के बहाने इस चुनाव में घाटी के लोगों ने न सिर्फ लोकतांत्रिक सरोकारों की अपनी मिट्टी को एक बार फिर से तर किया बल्कि दुनिया के आगे यह साफ भी किया था कि उनका जीवन, उनका समाज, उनकी संस्कृति उतनी उलझी या बंटी हुई नहीं है, जितनी बताई या समझाई जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कहीं से मुमकिन नहीं था कि कश्मीरी पंडित परिवार की एक महिला उस गांव से पंच चुनी जाती, जो पूरी तरह मुस्लिम बहुल है। यहां विख्यात पर्यटन स्थल गुलमर्ग जाने के रास्ते में एक छोटा सा गांव है- वुसान।
आशा इसी गांव से पंच चुनी गई थी जबकि यहां से इस पद के लिए मैदान में उतरी वह अकेली कश्मीरी पंडित महिला थी। इस सफलता को आपवादिक या कमतर ठहराने वालों के लिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि घाटी से 199० के करीब दो लाख कश्मीरी पंडित परिवारों को पलायन करना पड़ा था। दुर्भाग्यपूणã है कि देश में संसदीय परंपरा के धुरर्Þ बिखेर देने वाली खबरें तो मीडिया की आंखों की चमक बढ़ा देती हैं पर इन परंपराओं की जमीन तर करने वाली खबरों पर हम गौर नहीं फरमाते।

Wednesday, July 9, 2014

मां, ममता और दहकता इराक


इराक फिर से त्रासद हिसा की जद में है। इस बार हिसा का लंपट यथार्थ ज्यादा खतरनाक इसलिए भी है कि उसकी जड़ें बाहर कम इराक में ज्यादा हैं। एक देश और उसके साथ वहां के लोगों की बार-बार बर्बर हिसा से मुठभेड़ आधुनिक संवेदना से जुड़े सरोकारों को अंदर तक झकझोर देता है।
याद आता है वह दौर जब अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश, इराक को जंग के मैदान में सद्दाम हुसैन समेत अंतिम तौर पर रौंदने के लिए उतावले थे। अखबार के दफ्तर में रात से खबरें आने लगीं कि अमेरिका बमबारी के साथ इराक पर हमला बोलने जा रहा है। इराक से संवाददाता ने खबर भेजी कि वहां के प्रसूति गृहों में मांएं अपने बच्चों को छोड़कर भाग रही हैं।
खबर की कॉपी अंग्रेजी में थी, लिहाजा आखिरी समय में बिना पूरी खबर पढ़े उसके अनुवाद में जुट जाने का अखबारी दबाव था। अनुवाद करते समय जेहन में लगातार यही सवाल उठ रहा था कि ममता क्या इतनी निष्ठुर भी हो सकती है कि वह युद्ध जैसी आपद स्थिति में बच्चों की छोड़ सिर्फ अपनी फिक्र करने की खुदगर्जी पर उतर आए।
पूरी खबर से गुजरकर यह अहसास हुआ कि यह तो ममता की पराकाष्ठा थी। प्रसूति गृहों में समय से पहले अपने बच्चों को जन्म देने की होड़ मची थी। जिन महिलाओं की डिलीवरी हो चुकी थी, वह अपने बच्चों को छोड़कर जल्द से जल्द घर पहुंचने की हड़बड़ी में थीं क्योंकि उन्हें अपने दूसरे बच्चों और घर के बाकी सदस्यों की फिक्र खाए जा रही थी। वे अस्पताल में नवजात शिशुओं को छोड़ने के फैसले इसलिए नहीं कर रही थीं कि उनके आंचल का दूध सूख गया था। असल में युद्ध या बमबारी की स्थिति में कम से कम वह अपने नवजातों को नहीं खोना चाहती थीं। उन्हें भरोसा था कि अमेरिका इराक के खिलाफ जब हमला बोलेगा तो कम से कम इतनी नैतिकता तो जरूर मानेगा कि वह अस्पतालों और स्कूलों को बख्श दे।
युद्ध छिड़ने से पहले प्रीमैच्योर डिलीवरी का महिलाओं का फैसला भी इसलिए था कि बम धमाकों के बीच कहीं गर्भपात जैसे खतरों का सामना उन्हें न करना पड़े। सचमुच मातृत्व संवेदना की परीक्षा की यह चरम स्थिति थी जिससे गुजरते हुए इराकी महिलाएं मानवता का सर्वथा भावपूर्ण सर्ग रच रही थीं।
आज जब फिर इराक में धमाके हो रहे हैं, लोगों की जानें जा रही हैं, सड़कें और पुल उड़ाए जा रहे हैं, तो इराक युद्ध के पुराने अनुभव आंखों में सजल हो जाते हैं। इस साल हम पहले विश्व युद्ध से एक सदी आगे निकल गए हैं। पर संवेदना और करुणा के मामले में हमारा 'ग्लोबल उछाल’ कितना पिछड़ा है, कहने की जरूरत नहीं। जीवन और समाज के प्रति सोच ने आज एक बर्बर कार्रवाई की शक्ल ले ली है और इसकी सबसे ज्यादा शिकार हैं महिलाएं।
आधी दुनिया ने अपने हक और सुरक्षा के लिए पिछले कुछ सालों में अपनी आवाजें जरूर तेज की हैं। इसके लिए एक तरह की गोलबंदी भी हर तरफ नजर आती है। लेकिन महिलाओं को देखने-समझने और उनके साथ सलूक की लीक इतनी हिसक और बर्बर हो चुकी है कि उस पर खुलकर और पारदर्शी तरीके से बात करने का साहस हममें बचा ही नहीं है। पर वार और ग्लोबल ग्रोथ के साझे के दौर का यह महिला विरोधी यथार्थ हमें बार-बार सामने से आईना दिखाएगा।

Monday, June 23, 2014

सौभाग्य की सिंदूरी रेखा


विवाह संस्था को लेकर बहस इसलिए भी बेमानी है क्योंकि इसके लिए जो भी कच्चे-पक्के विकल्प सुझाए जाते हैं, उनके सरोकार ज्यादा व्यापक नहीं हैं। पर बुरा यह लगता है कि जिस संस्था की बुनियादी शर्तों में लैंगिक समानता भी शामिल होनी चाहिए, वह या तो दिखती नहीं या फिर दिखती भी है तो खासे भद्दे रूप में। सबसे पहले तो यही देखें कि मंगलसूत्र से लेकर सिदूर तक विवाह सत्यापन के जितने भी चिह्न् हैं, वह महिलाओं को धारण करने होते हैं। पुरुष का विवाहित-अविवाहित होना उस तरह चिह्नि्त नहीं होता जिस तरह महिलाओं का। यही नहीं महिलाओं के लिए यह सब उसके सौभाग्य से भी जोड़ दिया गया है, तभी तो एक विधवा की पहचान आसान है पर एक विधुर
की नहीं।
अपनी शादी का एक अनुभव आज तक मन में एक गहरे सवाल की तरह धंसा है। मुझे शादी हो जाने तक नहीं पता था कि मेरी सास कौन है? जबकि ससुराल के ज्यादातर संबंधियों को इस दौरान न सिर्फ उनके नाम से मैं भली भांति जान गया था बल्कि उनसे बातचीत भी हो रही थी। बाद में जब मुझे सचाई का पता चला तो आंखें भर आईं। दरअसल, मेरे ससुर का देहांत कुछ साल पहले हो गया था। लिहाजा, मांगलिक क्षण में किसी अशुभ से बचने के लिए वह शादी मंडप पर नहीं आईं। ऐसा करने का उन पर परिवार के किसी सदस्य की तरफ से दबाव तो नहीं था पर हां यह सब जरूर मान रहे थे कि यही लोक परंपरा है और इसका निर्वाह अगर होता है तो बुरा नहीं है। शादी के बाद मुझे और मेरी पत्नी को एक कमरे में ले जाया गया। जहां एक तस्वीर के आगे चौमुखी दीया जल रहा था। तस्वीर के आगे एक महिला बैठी थी। पत्नी ने आगे बढ़कर उनके पांव छुए। बाद में मैंने भी ऐसा ही किया। तभी बताया गया कि वह और कोई नहीं मेरी सास हैं। सास ने तस्वीर की तरफ इशारा किया। उन्होंने भरी आवाज में कहा कि सब इनका ही आशीर्वाद है, आज वे जहां भी होंगे, सचमुच बहुत खुश होंगे और अपनी बेटी-दामाद को आशीष दे रहे होंगे। दरअसल, वह मेरे दिवंगत ससुर की तस्वीर थी। तब जो बेचैनी इन सारे अनुभवों से मन में उठी थी आज भी मन को भारी कर जाती है। सास-बहू मार्का या पारिवारिक कहे जाने वाले जिन धारावाहिकों की आज टीवी पर भरमार है, उनमें भी कई बार इस तरह के वाकिए दिखाए जाते हैं। मेरे पिता का पिछले साल देहांत हुआ है। पिता चूंकि लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में रहे, सो ऐसी परंपराओं को सीधे-सीधे दकियानूसी ठहरा देते थे। पर आश्चर्य होता था कि मां को इसमें कुछ भी अटपटा क्यों नहीं लगता। उलटे वह कहतीं कि नए लोग अब कहां इन बातों की ज्यादा परवाह करते हैं जबकि उनके समय में तो न सिर्फ शादी-विवाह में बल्कि बाकी समय में भी विधवाओं के बोलने-रहने के अपने विधान थे।
मां अपनी दो बेटियों और दो बेटों की शादी करने के बाद उम्र के सत्तरवें पड़ाव को छूने को हैं। संत विनोबा से लेकर प्रभावती और जयप्रकाश नारायण तक कई लोगों के साथ रहने, मिलने-बात करने का मौका भी मिला है उन्हें। देश-दुनिया भी खूब देखी है। पर पति ही सुहाग-सौभाग्य है और उसके बिना एक ब्याहता के जीवन में अंधेरे के बिना कुछ नहीं बचता, वह सीख मन में नहीं बल्कि नस-नस में दौड़ती है।
किसी पुरुष के साथ होने की प्रामाणिकता की मर्यादा और इसके नाम पर निभती आ रही परंपरा इतनी गाढ़ी और मजबूत है कि स्त्री स्वातं`य के ललकार भरते दौर में भी पुरुष दासता के इन प्रतीकों की न सिर्फ स्वीकृति है बल्कि यह प्रचलन कम होने का नाम भी नहीं ले रहा। उत्सवधर्मी बाजार महिलाओं की नई पीढ़ी को तीज-त्योहारों के नाम पर अपने प्यार और जीवनसाथी के लिए सजने-संवरने की सीख अलग दे रहा है।

Thursday, June 19, 2014

महज यूपी नहीं आधी दुनिया की करें फिक्र

आपकी नजर में कौन सी खबर ज्यादा बड़ी है, बहस की नई मेजें सजने वाली हैं- वह सब जो इन दिनों देश के सबसे बड़े सूबे यूपी में हो रहा है या वह जिसने प्रीति जिंटा और नेस वाडिया के रिश्ते को पुलिस थाने तक ले आई? वैसे इन दोनों खबरों से इतर एक तीसरी खबर भी है, जिसकी चर्चा इन दिनों सोशल मीडिया पर खासा वायरल है। कमाल तो यह कि इंटरनेट खंगालने पर इसके टेक्स्ट अंग्रेजी से ज्यादा हिंदी में मिले। दरअसल, हम बात कर रहे हैं पूर्व अमेरिकी मॉडल सारा वॉकर की।
सारा को हॉट बिकनी गर्ल का खिताब युवाओं ने दे रखा था। वह मॉडलिंग की दुनिया में एक सनसनाता नाम रही। पर अचानक चमक-दमक की यह दुनिया उसे परेशान करने लगी। देह और संदेह के दौर में अपनी पहचान और सुरक्षा को लेकर जिस तरह की परेशानी घर से बाहर काम पर निकली किसी भी एक आम लड़की को हो सकती है, वही परेशानी सारा को भी हुई। पर बाकी लड़कियों की तरह अपनी इन परेशानियों को सहन करने या दबाने के बजाय उसके खिलाफ जाने का निर्णय किया। अलबत्ता यह तेवर बागी कम जुनूनी ज्यादा लगता है। क्योंकि अपनी बगावत में सारा वॉकर ने कुछ और नहीं किया बल्कि अपना धर्म बदल लिया। सारा ने इस्लाम की शरण यह सोचकर ली कि बुर्के और हिजाब की दुनिया महिलाओं के लिए ज्यादा सुरक्षित है। ऐसा है या नहीं इस पर जजमेंटल होने से अच्छा है कि हम सारा के निजी फैसले का स्वागत करें। पर यह फैसला कुछ सवाल तो उठाता ही है, जिन पर चर्चा हो रही है और होनी भी चाहिए।
सारा के जिक्र के बरक्श अगर बात यूपी में महिलाओं के खिलाफ पेड़ से लटकी बर्बरता की करें या प्रीति जिंटा मामले पर शुरू हुई बेहूदी लतीफेबाजी की, तो सबसे बड़ी कसूरवार वह दृष्टि है, जिसने महिलाओं को महज फिगर और आइटम बनाकर रख छोड़ा है।
ऐसा नहीं है कि अपराध यूपी के किसी हिस्से में हो तो उसका एक मतलब होता है और मुंबई-दिल्ली-गुड़गांव-गुवाहाटी में हो तो उसके मायने बदल जाते हैं। आलोचना तो मीडिया की भी होनी चाहिए कि वह अपराध को लेकर एक नए तरह का वर्ग भेद पैदा कर रहा है। यह कैसे हो रहा है, इसकी ताजा मिसाल है फिल्म 'रागिनी एमएमएस-2’ के हिट गाने 'बॉबी डॉल सोने की’ का वीडियो। इस बोल्ड फिल्म पर सेंसर बोर्ड की कितनी कैंचियां चलीं, मालूम नहीं। पर यह तो रोज टीवी पर दिख रहा है कि कुछ दिन पहले तक इस गाने के वीडियो में सनी लियोनी ने अपने शरीर के एक खास हिस्से को कपड़ों से ढक रखा था और इन दिनों चल रहे वीडियो में कपड़े की जगह उसके दोनों हाथों ने ले ली है। फिर क्या... कई छोटे-बड़े शहरों से पर्दे से उतर जाने के बाद भी यह फिल्म टीवी चैनलों पर धूम मचाए हुए है।
इस गाने में सनी के बोल्ड से बोल्डतर अवतार पर आंखंे सेंकने वालों को इंटरटेनमेंट का यह चालाक ओवरडोज खूब रास आ रहा है। पर मीडिया की नजर में इससे न तो कोई कानून व्यवस्था का प्रश्न खड़ा हो रहा है और न कहीं मानवता शर्मसार हो रही है। जबकि सचाई तो यह है कि इस तरह हम जिस तरह का देशकाल और मानस रच रहे हैं, वही पुरुष के लिए स्त्री देह संसर्ग को एक 'बर्बर कारवाई’ बनाने की जंगली सनक को जन्म देते हैं।
पूर्व विश्व सुंदरी युक्ता मुखी की 2००8 में हुई शादी पिछले साल पुलिस थाने तक इसलिए पहुंच गई क्योंकि युक्ता को यह शिकायत थी कि उसके पति प्रिंस तुली उनसे वह सब कुछ चाहते हैं, जो उनके लिए घिनौना है, अप्राकृतिक है। अब कोई यह बताए कि क्या कोई इस घटना को पोस्टर बनाकर पूरे बॉलीवुड इंडस्ट्री पर चस्पा करने की हिमाकत कर सकता है कि मनोरंजन की यह पूरी दुनिया पथभ्रष्ट हो चुकी है, महिला विरोधी हो चुकी है। अगर ऐसा नहीं किया या सोचा जा सकता है तो क्या इसलिए क्योंकि खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को हम धन, हैसियत, शिक्षा, पेशा और स्थानादि से जोड़कर देखते हैं और फिर उसके मुताबिक ही उसका राजनीतिक-सामाजिक भाष्य तैयार करते हैं।
महिलावादी लेखिका मनीषा अपनी पुस्तक 'हम सभ्य औरतें’ में एक ऐसी घटना का जिक्र करती हैं जिसमें बीमारी के कारण महीनों से कौमा में पड़ी अपनी पत्नी के लिए अदालत से कृपा मृत्यु की फरियाद करने वाला पति ही बाद में अचेत पत्नी से संसर्ग बनाता है। देह और पुरुष के बीच खिंची यह वही रेखा है, जो बदायूं में दो बहनों के साथ दुष्कर्म के बाद उनकी हत्या और फिर उनकी लाश को तमाशा बनाने की जंगली हिमाकत के लिए उकसाती है।
बात प्रीति और नेस के संबंध की करें तो यहां भी यही बात संवेदनहीनता की बदली जिल्द के साथ नजर आती है। ये दोनों शादीशुदा नहीं लेकिन लंबे समय तक रिलेशन में थे। बताते हैं कि अब नेस को एक और कन्या का साथ भा रहा है। प्रीति के अधिकार बोध को यह कतई बर्दाश्त नहीं। पर सवाल यह है कि संबंध को समाज और परंपरा से निरपेक्ष अपने मन मुताबिक शक्ल देने की आतुरता अगर 'दुर्घटनाग्रस्त’ होती है तो फिर इसकी सुनवाई कानून और समाज कैसे करे। दरअसल, इन दिनों संबंधों को दीघार्यु बनाने के बजाय उसे अपडेट करने की नई सनक पैदा हो गई है। यह एलजीबीटी रिवोल्यूशन का दौर है। पर 'रेनबो रिबन’ संबंधों की नई कलाइयों की शोभा चाहे जितनी बने, इसने संबंध के कल्याणकारी सरोकारों को तो तहस-नहस कर ही दिया है।
बात जिस सारा वॉकर की हम पहले कर चुके हैं, अब जरा उसकी ही जुबानी उसके अनुभव सुनिए-'मैंने समुद्र के किनारे घर ले लिया। ...मैं अपने सौंदर्य को बहुत महत्व देती थी और ज्यादा से ज्यादा लोगों का ध्यान खुद की ओर चाहती थी। मेरी ख्वाहिश रहती थी कि लोग मेरी तरफ आकर्षित रहें। खुद को दिखाने के लिए मैं रोज समुद्र किनारे जाती। ...धीरे-धीरे वक्त गुजरता गया लेकिन मुझे अहसास होने लगा कि जैसे-जैसे मैं अपने स्त्रीत्व को चमकाने और दिखाने के मामले में आगे बढ़ती गई, वैसे-वैसे मेरी खुशी और सुख-चैन का ग्राफ नीचे आता गया।’ साफ है कि सारा ने उस दुनिया के सितम झेले और बढ़ती उम्र के साथ अकेली पड़ती गई, जहां सौंदर्य का मतलब उत्तेजना और संवेदना का मतलब दिखावा है। कहने की जरूरत नहीं कि 'आधी दुनिया’ के लिए 'पूरी दुनिया’ में मानसिकता एक जैसी है।
दुर्भाग्यपूणã यह है कि इस मसले को कहीं हम महज कानून व्यवस्था का सवाल बनाकर देखते हैं तो कहीं अपराधियों की समझ को उनकी जाति, शिक्षा या स्थान से जोड़कर देखते हैं। जबकि सचाई यह है कि अमेरिका के ह्वाइट हाउस से लेकर गरीबी और जहालत में डूबे यूपी के किसी गांव की सचाई में कोई फर्क नहीं है। दोष उस स्त्री मन का भी है, जो इस बर्बर पुरुष प्रवृत्ति के खिलाफ धिक्कार के बजाय स्वीकार से भर उठता है।
 

Monday, June 16, 2014

व्यास पीठ पर ताई


धवल-उदात्त चेहरा, आंखों पर टंगा कांच के थोड़े बड़े फ्रेम का चश्मा, पहनावे में आम तौर पर सूती या खादी की साड़ी, चलने-फिरने और बैठने-उठने का सलीका खासा ठहराव भरा, वैसे तो मितभाषी पर सार्वजनिक चिंता के मुद्दों पर मुखर, सुमित्रा महाजन की शख्सियत को यही कुछ बातें मुकम्मल और खास बनाती हैं। दरअसल, अपनी इन्हीं खूबियों के कारण ही वह अपने करीब के लोगों और अपने क्षेत्र में 'सुमित्रा ताई’ के रूप में लोकप्रिय हैं। नाम का रिश्ते में बदलना असाधारण बात है और सार्वजनिक जीवन में तो इस तरह की परंपरा अब न के बराबर रही है। सार्वजनिक जीवन में आए भरोसे के इस कमी को सुमित्रा जिस तरह पूरा कर रही हैं, वह उनके पूरे राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा प्रदेय है। लोकसभा अध्यक्ष के लिए निर्विरोध निर्वाचित होना और एक ही सीट से आठ बार संसद पहुंचना उनकी स्वीकृति के बड़े दायरे को रेखांकित करता है।
 यह गौरव की बात है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के व्यास पीठ पर एक महिला बैठेगी, प्रधानमंत्री ने इन्हीं शब्दों के साथ सुमित्रा महाजन को सर्वसम्मति के साथ लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने पर बधाई दी। बात करें सुमित्रा की तो उनका नाम लोकसभा अध्यक्ष बनने से पहले से ही चर्चा में आ गया था। यह चर्चा इसलिए शुरू हुई थी कि वह पिछले आठ बार से मध्य प्रदेश के इंदौर लोकसभा क्षेत्र से जीतती आ रही हैं। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड ही नहीं बल्कि बड़ी सफलता है।
सुमित्रा का जन्म 12 अप्रैल, 1943 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में चिपलुन नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम नीलकंठ साठे तथा माता का नाम ऊषा था। उन्होंने अपनी एमए तथा एलएलबी की डिग्री इंदौर विश्वविद्यालय -अब देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय- से प्राप्त की। उनका विवाह 29 जनवरी, 1965 को इंदौर के प्रसिद्ध वकील जयंत महाजन से हुआ था। चुनावी राजनीति में सुमित्रा का प्रवेश स्थानीय निकायों के जरिए हुआ। 1982 में वह इंदौर नगर निगम में उपमहापौर बनी थीं। 1989 में अपनी ससुराल इंदौर से उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा था। तब पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रकाश चंद्र सेठी को उनसे हार का सामना करना पड़ा था। पर बाद में तो वह इंदौर की जनता के मन में ऐसी बसीं कि आज तक वह स्थानीय स्तर पर सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। वह इंदौर में पहले 'बहू’ के तौर पर जानी गईं पर बहू के 'बेटी’ बनते देर नहीं लगी और अब तो वह वहां सबकी प्यारी 'ताई’ है। 71 वर्षीय सुमित्रा का आधिकारिक नाम भी 16वीं लोकसभा के सांसदों की सूची में सुमित्रा महाजन (ताई) के तौर पर दर्ज है। लोकप्रियता के इस सातत्य के पीछे सुमित्रा की बेदाग छवि का भी बड़ा योगदान है।
सुमित्रा संघर्ष में तपी नेता हैं। वह 16वीं लोकसभा में महिला सांसदों में सबसे वरिष्ठ सांसद हैं। मीरा कुमार के बाद महाजन लोकसभा अध्यक्ष बनने वाली दूसरी महिला हैं। उन्होंने एक सक्रिय सांसद के रूप में केवल महत्वपूर्ण समितियों का ही नेतृत्व नहीं किया है बल्कि वह सदन के भीतर अच्छी बहस करने वाली और एक उत्साही प्रश्नकर्ता भी रही हैं। वह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 1999 से 2००4 तक राज्यमंत्री रहीं। सौम्य व्यवहार करने वाली सुमित्रा एक ऐसी राजनेता के रूप में उभरी हैं जिन्होंने 1989 में इंदौर से सांसद बनने के बाद से कभी हार का मुंह नहीं देखा और विपक्षी नेताओं की एक पीढ़ी उन्हें हराने का इंतजार ही कर रही है।
लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने कहा, 'मैं लोकसभा में अधिक कामकाज पर जोर दूंगी। वहां एजेंडे को पूरा करने के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष में अच्छा समन्वय होना चाहिए। लोगों को हमसे बहुत उम्मीदें हैं। हमें काम के घंटे बढ़ाने चाहिए।’ उम्मीद करनी चाहिए कि सुमित्रा अपने नए दायित्व की चुनौतियों पर खरी उतरेंगी। यह एक बड़ी परीक्षा है। क्योंकि पिछली लोकसभा के अंतिम कुछ सत्रों में कामकाज संसद सदस्यों के अत्यधिक शोर-शराबे के कारण प्रभावित हुआ था। पर लगता है सुमित्रा इस परीक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं, तभी तो वह कहती हैं, 'उन्हें यह पता है कि इस तरह की परिस्थितियों से किस तरह निपटा जाता है।’
 

Friday, June 13, 2014

चोमस्की के मोदी विरोध का तर्क-कुतर्क


सोलह मई को 16वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव के नतीजे आए थे। उस दिन सबके अवाक रहने की स्थिति थी। विरोधी इस बात से हतप्रभ थे कि नमो का जादू इतना कारगर कैसे रहा, तो हिमयती इस बात पर दंग थे कि उम्मीद से बड़ी सफलता आखिर मिली कैसे। प्रतिक्रियों के इन अतिरेक के बीच एक खामोशी भी पसरी थी। समय और परिस्थिति के मुताबिक अपनी निष्ठाएं बदलने वाले बौद्धिकों को छोड़ दें तो कुछ ढीठ किस्म के प्रगतिशील ऐसे भी थे, जिनसे इस चुनाव परिणाम को देखकर कुछ बोलते नहीं बन रहा था। पर यह बोलती बंद की नौबत विचार परिवर्तन की चौखट को खटखटा नहीं सकी।
फिर क्या था कि जैसे-जैसे 16 मई पीछे छूटती गई, इन प्रखर जनों ने अपनी टेक नए सिरे से लेनी शुरू कर दी। बहुमत के आंकड़े को झुठलाया नहीं जा सकता और न ही लोकतंत्र में जनता की राय को लेकर आप सार्वजनिक तौर पर कोई नकारात्मक राय रख सकते हैं। पर विचार और तर्क की दुनिया में इससे बच निकलने के चोर रास्ते भी हैं। ऐसा ही एक चोर रास्ता खोला गया है विश्व प्रसिद्ध चिंतक, विचारक और भाषाविद नोम चोमस्की का नाम लेकर। चोमस्की ने भारत में नमो उदय को लेकर कुछ तीखी बातें कही हैं। खासतौर पर सोशल मीडिया पर वैचारिक वाम की अलंबरदारी करने वालों ने चोमस्की के बयान को आपस में खूब पढ़ा-पढ़ाया है। अब तो चोमस्की की टिप्पणी के साथ भाई लोग अपनी पूरक टिप्पणी भी जोड़ते चले जा रहे हैं। इस तरह एक बयान अब भरे-पूरे आख्यान की शक्ल लेता जा रहा है। आख्यान मोदी विरोध का, देश की राजनीति में मोदी के धूमकेतु की तरह उदय को लेकर जरूरी संशय का।
बहरहाल, इस बारे में आगे और बात करने से पहले यह देख लेना जरूरी है कि आखिर चोमस्की ने कहा क्या है। नोम चोमस्की के बयान से जुड़ी यह टिप्पणी देश के एक प्रगतिशील बौद्धिक के फेसबुक वाल से उठाई गई है। नाम का जिक्र इसलिए नहीं कि ऐसा किया नहीं जा सकता बल्कि इससे अनावश्यक एक ऐसे विवाद का जन्म होगा, जिसका चोमस्की के बयान प्रसंग को लेकर खड़ी हुई बहस से कोई सीधा लेना-देना नहीं है। फेसबुक पर जो टिप्पणी की गई है, वह कुछ इस तरह है-'नोम चोमस्की ने भारत के संभावित राजनीतिक परिवर्तन पर टिप्पणी करते हुए आज बोस्टन में कहा कि भारत में जो कुछ हो रहा है, वह बहुत बुरा है। भारत खतरनाक स्थिति से गुजरेगा। आरएसएस और भाजपा के नेतृत्व में जो बदलाव भारत में आने वाला है, ठीक इसी अंदाज में जर्मनी में नाजीवाद आया था। नाजी शक्तियों ने भी सस्ती व सिद्धांतहीन लोकप्रियता का सहारा लिया था। भाजपा ने भी वही हथकंडा अपनाया है। कांग्रेस पार्टी ही इन सबके लिए जिम्मेदार है। अब भारत के वामपंथी और प्रगतिशील शक्तियों को संगठित होकर इस चुनौती का सामना करना पड़ेगा। नोम चोमस्की आज शाम को कैंब्रिज पब्लिक लाइब्रेरी में अमेरिका की विदेश नीति पर अपना डेढ़ घंटे का भाषण दे रहे थे। इसके पश्चात उन्होंने अलग से मेरी अनौपचारिक संक्षिप्त बातचीत में अपनी यह प्रतिक्रिया व्यक्त की।’
अब कोई चोमस्की से यह पूछे कि लोग उन्हें एंटी-स्टैबलिशमेंट की पैरोकारी करने वाले तो मानते हैं पर लोकतंत्र विरोधी नहीं। फिर एक देश में चुनाव के जरिए बहाल हुई नई सरकार और उसके जरिए उभरे नए राजनीतिक नेतृत्व को वे इतने संशय की नजर से क्यों देख रहे हैं। क्या वैचारिक प्रखरता और प्रगतिशीलता की एक शर्त यह भी है कि वह हर उभार के खिलाफ हो। क्योंकि तभी विरोध को वैचारिक तौर पर वजनी माना जाएगा और उस पर चर्चा होगी।
नोम चोमस्की जिस देश से आते हैं और जहां उन्हें थिंक टैंक तो माना जाता है पर वहां भी वे मुख्यधारा के बौद्धिकों और विचारकों की अगुवाई नहीं कर सके। कहने को भले ऐसा करना उनकी महात्वाकांक्षा का हिस्सा न हो, पर उनके आलोचक तो इसे उनकी असफलता के तौर पर ही देखते हैं।
चोमस्की भारत को लेकर पहले भी विभिन्न मुद्दों पर अपनी बातें मुखरता से कहते रहे हैं। पर उनकी हालिया टिप्पणी से नहीं लगता कि वे भारत की राजनीतिक सचाई से पूरी तरह वाकिफ हैं। वाम की तरफ उनका झुकाव स्वाभाविक है पर भारत में वाम अपने गढ़ में ही ढह गया, इस स्थिति को समझने का विवेक वे नहीं दिखा रहे हैं। सोवियत संघ के विघटन के पुराने जिक्र को छोड़ भी दें तो भी चोमस्की यह बताने से तो बच ही रहे हैं कि बाजार के दौर में मनुष्य के अंदर उन्नति और विकास की एक नई सोच पैदा हुई है, उसके आगे कोई वैकल्पिक लकीर कैसे खिंची जाए।
बाजारवादी व्यवस्था के हिमायती भारत में भी बहुत लोग नहीं हैं। यहां तक कि नरेंद्र मोदी जिस पार्टी और विचारधारा से आते हैं, उसकी भी बुनियादी अवधारणा इसके खिलाफ है। पर इससे देश और समाज में विकास और उन्नति की जगी भूख और उससे पैदा लेने वाले नए तरह के राजनैतिक नेतृत्व का तकाजा कहां से खारिज हो जाता है।
चोमस्की की इस बात में जरूर थोड़ा दम है कि भारत में मोदी के उभार और कांग्रेस के बुरे हश्र को देखकर कई लोगों को यह लगता है कि देश में विचार और सत्ता से जुड़े तमाम सरोकार एकध्रुवीय न हो जाएं। एक अच्छे लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष का होना बहुत जरूरी है। असहमति के लिए लोकतंत्र में गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिए, यह क्रियात्मक रूप में भी सामने आना चाहिए।
वाम और क्षेत्रीय दलों के एक मंच पर आने की बात देश में चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान भी उठी पर कुछ भी ठोस सामने नहीं आया। अब एक ही उम्मीद है कि मोदी सरकार के काम करते कुछ दिन बीतते हैं तो फिर उनको लेकर सहमति-असहमति की सही जमीन चिह्नत होगी। इस इम्तहान में दोनों पक्षों को खरा उतरने की चुनौती होगी।
मोदी अभी देश में उम्मीद और भरोसे का नाम है। जिस तरह की स्थितियां पूरे देश में व्यवस्था से लेकर समाज तक है, उसमें रातोंरात कोई क्रांतिकारी बदलाव आसान बात नहीं होगी। यह बात उनके विरोधियों के भी समझ में आ रही है। पर विरोध के इस संभावित रकबे को घेरने के लिए उन्हें अभी थोड़ा धैर्य दिखाना होगा। यही नहीं उन्हें इस बीच जनता की अपेक्षाओं के मुताबिक अपनी राजनीति की बनावट को भी नए सिरे से गढ़ना होगा।
क्या चोमस्की की बातों पर उछाल भरने वालों को लोकतांत्रिक राजनीति की इस कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती मंजूर है। अगर हां, तो फिर यह उनसे ज्यादा इस महान लोकतांत्रिक मर्यादाओं वाले देश के हित में होगा और अगर नहीं, तो फिर यही साफ होगा कि बड़ी लकीर (मोदी) के आगे उससे भी बड़ी लकीर खींचना एक बात है और लकीर पीटते रहना दूसरी।