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Sunday 27 May 2012

थ्री चीयर्स फॉर काली मां

आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और विद्यानिवास मिश्र तक सबने अपने-अपने तरह से इस स्थापना को ही दोहराया है कि भारत को लोक, आस्था और परंपरा की परस्परता को समझे बगैर संभव नहीं नहीं है। इस परस्परता ने भारतीय जीवन और समाज को कई मिथकीय विलक्षणता से भरा है। इसके उलट जो मौजूदा वैश्विक दौर है, वह परंपरा विरोधी तो है ही। लोक और परंपरा की लीक भी नई सीख के आगे गैरजरूरी ही है। इस दौर में शामिल तो हम भी हैं पर लोक, परंपरा और आस्था की त्रियक आज भी हमारे दिलोदिमाग को घेरती है। उससे भी दिलचस्प यह कि आधुनिकता और परंपरा के टकराव के कुछ स्वयंभू व्याख्याकारों की तूती आज खूब बोल रही है। समाज पर इनका दबाव हो, न हो पर इस कथित दबाव का प्रभाव कई बार सरकारी निर्णयों पर भी पड़ता है।
अमेरिकी पेय उत्पाद बनाने वाली कंपनी बर्नसाइड ब्रीविंग ने काली मां के नाम से बीयर बाजार में उतारने से पहले यही सोचा होगा कि भारतीय मिथकीय आस्था और उसके प्रति दिलचस्पी रखने वाले वैश्विक समाज में उनका उत्पाद हाथोंहाथ लिया जाएगा। और अगर कोई विरोध होगा भी तो प्रतिप्रचार का लाभ उनके पेय उत्पाद को मिलेगा। इसे ही कहते हैं समर्थन से भी ज्यादा कारगर विरोध का बाजार। आपकी क्रिया और प्रतिक्रिया दोनों का ही लाभार्थी एक ही है।
बहरहाल, इस बीयर के बाजार में आने से पहले ही भारतीय संसद में इसके विरोध में फूटे स्वर ने कंपनी को यह कहने को मजबूर कर दिया कि वह अब अपने उत्पाद को नए नाम से बाजार में उतारेगी। यहां मामला महज आस्था का नहीं है। क्योंकि यह आस्था इतनी ही महत्वपूर्ण होती तो फिर इसका जन प्रकटीकरण भी जरूर सामने आता। 
अमेरिका में गणेश, शिव और लक्ष्मी के चित्रों के अभद्र इस्तेमाल की सनक हम पहले भी दिख चुके हैं। यह वही सनक है जो क्रांतिकारी चे ग्वेरा के जीवन मूल्यों को नकारते हुए भी उनके प्रतीकों को बिकाऊ मानकर संभाले चलती है। पर इसका क्या कहेंगे कि हमारे अपने देश में भी ऐसा होता है और तब प्रतिक्रियावादियों का गुस्सा नहीं फूटता।
इस साल का ही मामला है कि पटना में वैश्विक बिहार सम्मेलन में ब्रिटीश अपर हाउस के सदस्य लॉर्ड करन बिलमोरिया यह कह गए कि आज उन्हें अगर गांधीजी भी मिल जाएं तो उनका स्वागत वे अपनी कोबरा ब्रांड  बीयर से करना चाहेंगे। बताना जरूरी है कि बिलमोरिया न सिर्फ एक उद्योगपति हैं बल्कि दुनियाभर में वह बीयर किंग के रूप में जाने जाते हैं। साफ है कि मूल्य और चेतना के सरोकारों पर जब अर्थ और विकास की दरकार हावी होगी तो इस तरह के नैतिक अवमूल्यन को रोकना मुश्किल होगा। हमारी प्रतिक्रिया और आपत्ति तब तक ईमानदार नहीं ठहराई जा सकती जब तक हम जीवन, समाज और राष्ट्र को लेकर एक सुस्पष्ट मू्ल्यबोध की जरूरत को स्वीकार करने के लिए तत्पर नहीं होते हैं।

Sunday 20 May 2012

चीन है नया गोताखोर


वैश्विक अर्थव्यवस्था के सुस्त पड़ने को लेकर अब तक भारत में चिंता ऊपरी थी पर रुपए के डॉलर के मुकाबले रिकार्ड स्तर तक गोता लगाने से चिंता यहां भी गहरा गई है। डॉलर से लेकर यूरोजोन तक की इकोनमी इसकी जद में पहले ही आ चुकीहैं। हां, चीन और भारत को लेकर एक उम्मीद यह जरूर जताई जा रही थी पर अब इन दोनों देशो के हालत भी पहले की तरह बेहतर नहीं रहे। रुपए के कमजोर होने और उससे पहले एस एंड पी और मूडीज की जो नई रेटिंग आई है, उसमें कहीं न कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने का खतरा जताया गया है।
जहां तक सवाल चीन का है तो जिस विदेश व्यापार के बूते वह अब तक एक सक्षम इकोनमी की मिसाल बना रहा है, उसे लेकर अब वहां चुनौतियां बढ़ गई हैं। हाल तक वहां की सरकार यही जता रही थी कि बीते महीनों में उसके लिए बढ़े संकट वैश्विक बाजार की बढ़ी चुनौतियों की देन हैं। पर नहीं लगता कि महज बाहर की गड़बडि़यों की वजह से ही चीनी अर्थव्यवस्था की जड़ें हिली हैं। दरअसल, चीन की शासन व्यवस्था के साथ उसकी अर्थव्यवस्था को लेकर विरोधाभासी राय शुरू से रही है। पूरी दुनिया को एक छतरी के नीचे ला देने वाले बाजारवादी दौर में जहां यह विरोधभास बढ़ा, वहीं इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था का एक नया रूप दुनिया को देखने को मिला।
पहले इलेक्ट्रानिक्स जैसे कुछेक क्षेत्रों में अपनी उत्पादकता और स्तरीयता के लिए जाना जानेवाला देश अचानक आम जरूरत की तमाम चीजों के सस्ते और उन्नत विकल्प मुहैया कराने वाला देश बन गया। फिर यह सब चीन ने बिल्कुल वैसे ही नहीं किया, जैसे उदारवादी अर्थव्यवस्था की पैरोकारी करने वाले दूसरे मुल्कों ने किया। बताया यही गया कि चीन में साम्यवादी शासन भले हो अधिनायकवादी चरित्र का और लोकतांत्रिक व मानवाधिकारवादी कसौटियों पर चाहे उसकी जितनी खिल्ली उड़ाई जाए, पर उसकी अर्थव्यवस्था केंद्रित न होकर विकेंद्रित जमीन पर ही फल-बढ़ रही है। यह प्रयोग वहां हाल तक सफल भी रहा है। वैश्विक मंदी के कारण 2009 में जहां पूरी दुनिया की जीडीपी का औसत नकारात्मक दिखा, उस दौरान भी चीन ने तकरीबन नौ फीसद का विकास दर हासिल किया।
पर अब यह आर्थिक मजबूती चीन में भी दरक रही है। वहां श्रम और कच्चे माल की लागत एकदम से बढ़ गई है। विदेशों से मांग न होने से भी उत्पादन पर असर पड़ा है। सरकार अपने स्तर पर इस स्थिति से उबड़ने के भरसक उपाय तो कर रही है पर स्थिति अब काबू होने की सूरत से ज्यादा बिगड़ चुकी है। स्थानीय स्तर पर छोटे-मध्यम श्रेणी के उद्योगों की तरफ से रियायती कर्ज की जो बड़ी मांग एकदम से उठी है, उसे पूरा करने में सरकार के हाथ-पांव फूल रहे हैं।
चीनी वाणिज्य मंत्रालय तक आज खुद ही यह मान रहा है कि जो स्थिति और चुनौतियां  हैं, वह खतरे की आशंका से बहुत ज्यादा बड़ी हैं। ऐसे में भारत और चीन में जो स्थितियां बन रही है वह अगर आगे भी जारी रहती है तो यह विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाली दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के ढहने का खामियाजा भी बड़ा होगा और वैश्विक भी।

Tuesday 1 May 2012

सजा दो हमें कि हम हैं बच्चे तुम्हारे


राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने स्कूलों में शारीरिक दंड को लेकर जो विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट जारी की है, उसमें एक बार फिर देश में बच्चों के प्रति बढ़ रही असंवेदनशीलता की पुष्टि हुई है। यहां दिलचस्प यह है कि निजी स्कूलों में हालात सरकारी स्कूलों से भी बदतर है। निजी स्कूलों में 83.6 फीसद लड़कों और 84.8 फीसद लड़कियों को किसी न किसी तरह के मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। केंद्रीय विद्यालयों में यह आंकड़ा क्रमश: 70.5 और 72.6 फीसद है जबकि राज्य सरकारों द्वारा संचालित स्कूलों में 81.1 फीसद लड़कों और 79.7 फीसद लड़कियों को मानसिक रूप से प्रताडि़त करने वाले अपशब्दों को झेलने पड़ते हैं। 
रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी में भी कहा गया है कि आमतौर पर माना यही जाता है कि निजी तौर पर संचालित स्कूलों में योग्य शिक्षक-शिक्षिकाएं होती हैं। ऐसे में वहां बच्चों के साथ क्रूर सलूक की शिकायतें कम होनी चाहिए। पर ऐसा है नहीं और यह कहीं न कहीं स्कूली शिक्षा के निजीकरण की बढ़ी होड़ पर सवाल उठाता है। गौरतलब है कि निजी स्कूलों की शिक्षा न सिर्फ महंगी है बल्कि यहां दाखिला भी आसान नहीं है। पिछले दिनों चेन्नई के एक स्कूल में एक शिक्षिका के कठोर व्यवहार और उपेक्षा से खीझे बच्चे ने प्रतिक्रिया में चाकू से गोदकर शिक्षिका की स्कूल में ही हत्या कर दी थी। यह घटना भी एक बड़े निजी स्कूल में ही हुई थी। कहना नहीं होगा कि शिक्षकों की असंवेदनशीलता छात्रों की पढ़ाई को ही महज प्रभावित नहीं करती बल्कि उनकी मनोवृत्ति को भी खतरनाक रूप से विकृत कर देती है। 
वैसे यहां यह भी साफ होने का है कि देश में बचपन के साथ ऐसा क्रूर सलूक सिर्फ स्कूलों में ही नहीं बल्कि हर जगह बढ़ रहा है। पिछले साल एनसीआरबी के जो आंकड़े जारी हुए थे, उसमें कहा गया था कि 2009 के मुकाबले 2010 में आपराधिक मामलों में जहां करीब पांच फीसद की वृद्धि देखी गई, वहीं बच्चों के मामले में यह फीसद दोगुने से भी ज्यादा रही। यह दिखाता है कि परिवार और समाज के स्तर पर बच्चों के प्रति हमारे सरोकार निहायत ही लापरवाह होते चले जा रहे हैं। यह स्थिति ऐसी है जिस पर समय से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाली पीढि़यों की सोच और समझ में इसके खतरानक बीज को हम पनपते हुए देखेंगे।
अपने देश में यह स्थिति तब है जब पूरी दुनिया में बच्चों के प्रति घर-परिवार से लेकर विद्यालय तक एक जिम्मेदार और संवेदनशील व्यवहार के प्रति चेतना और प्रयास कारगर शक्ल अख्तियार कर रहे हैं। अपने देश में भी पिछले वर्ष महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने एक कानूनी प्रस्ताव घर और विद्यालयों में बच्चों को शारीरिक दंड देने पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए तैयार किया था। पर इस बारे में आगे ज्यादा प्रयास नहीं हुए, नतीजतन आज भी यह महत्वपूर्ण कानून संसद से पारित होने की बाट जोह रहा है।

Sunday 29 April 2012

अग्नि मिसाइल और नीलाम गांधी

यह न सिर्फ एक विडंबना है बल्कि एक विरोधाभासी विडंबना है। जहां गांधी से जुड़ी कुछ चीजों की नीलामी पर कुछ लोगों का ह्मदय भर आ रहा है तो वहीं अपने सैन्य बेड़े में शामिल होने जा रही अग्नि-5 मिसाइल की मारक क्षमता का विस्तार जानकर देशवासियों का सीना फख्रसे चौड़ा हो रहा है। एक तरफ हमारा मोह और हमारी आस्था उस अहिंसक मूल्यों की विरासत के प्रति है, जिसके प्रतीकों तक का अगर अनादर हो तो असहज हो उठते हैं, वहीं दूसरी तरफ आवेग, उन्माद, उत्तेजना और भय पैदा करने वाली ताकतों के और सबल होने को हम सीधे देशभक्ति के जज्बे से जोड़ते हैं।
दक्षिण अफ्रीका में मोहनदास के महात्मा बनने की परिस्थतियों पर औपन्यासिक कृति 'पहला गिरमिटिया' लिखने वाले गिरिराज किशोर को तो लंदन में गांधी से संबंधित कुछ चीजों की नीलामी इतनी नागवार गुजरी कि वह नीलामी रोकने में सरकारी नाकामी पर अपना पद्मश्री सम्मान राष्ट्रपति को लौटाने पर आमादा हो उठे। गिरिराज के आहत होने को समझा जा सकता है पर यह आहत प्रतिक्रिया जिस तरह फूट रही है, वह कहीं से गले नहीं उतरती। गांधी के गुजरात में नए टूरिज्म सर्किट को गांधी के नाम से जोड़ा गया। गुजरात पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अमिताभ बच्चन के जो विज्ञापन इन दिनों टीवी पर चल रहे हैं, उनमें बच्चन के हाथ में चरखा तक पकड़ाई गई है, उन्हें साबरमती आश्रम के बारे में बताते हुए दिखाया गया है।
मुझे नहीं लगता कि अब तक किसी को यह विज्ञापन, इसका मकसद और इसके प्रस्तोता को लेकर कोई बड़ी शिकायत रही है। जबकि सचाई यह है कि बच्चों के लिए कैडबरी के मिल्क चॉकलेट को लेकर जब शिकायतें आईं तो बच्चन ने कुछेक दिनों-महीनों की खामोशी के बाद चॉकलेट कंपनी की दलीलों के साथ जाना पसंद किया आैर विज्ञापन में पप्पू के पास होने की मीठी खुशी मनाते रहे। बात गुजरात की निकली है तो जान लें कि वहां शराब पर पाबंदी है और यह पाबंदी भी गांधी के नाम पर ही मन-बेमन से ढोई-निभाई जा रही है। पर्यटक अगर चाहें तो उन्हें शराब मिल सकती है। बहुत आसानी से गुजरात की समुद्री सीमा के पार जाकर वैधानिक चेतावनी सीमा से पार पा लिया जाता है। यह सब वहां सरकार की आंख के नीचे ही नहीं बल्कि उसकी पूरी जानकारी आैर व्यवस्था में चल रहा है।     
यह भी एक संयोग ही है कि विदेश में नीलामी की खबर के बाद देश में ही गांधी भवन के नीलाम होने की खबर आनी शुरू हो गई है। कोलकाता के बेलियाघाट में हैदरी मंजिल गांधी भवन के नाम से मशहूर है। 1947 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान गांधी ने यहीं उपवास रखा था। यह ऐतिहासिक भवन पिछले 50 सालों से एक बैंक के पास गिरबी है आैर वह अब इसकी नीलामी करने जा रहा है। यह नीलामी रूक भी सकती है क्योंकि पश्चिम बंगाल विरासत आयोग के साथ कोलकाता नगर निगम ने इस भवन की हिफाजत का फैसला किया है।
एक ऐसे दौर में जब भौतिक प्रतिस्पर्धा जैसे आत्मघाती हिंसक मूल्यों को हम जीवनचर्या का हिस्सा आैर विकास का द्योतक मान चुके हैं, यह हास्यास्पद ही लगता है कि हम गांधी को लेकर अपनी भावुक चिंता प्रकट करें। अभी एक बच्चे ने आरटीआई के जरिए सरकार से यह पूछ डाला कि ऐतिहासिक रूप से गांधी को कब राष्ट्रपिता माना गया। सरकार के पास इस सवाल का कोई दस्तावेजी जवाब नहीं था। कल को भारत अपने लोगों के जीवन में अहिंसक चेतना के कोई लक्षण दिखा पाने में अगर असमर्थ दिखे, तो हैरत नहीं होनी चाहिए। 
साफ है कि यहां बड़ा मुद्दा यह नहीं कि हमारा देश अपने राष्ट्रपिता को लेकर कितना संवेदनशील है। बड़ा सवाल यह है कि महत्व किसका ज्यादा है- गांधी विचार का,उनके अहिंसक जवन दर्शन का, उनके पढ़ाए रचनात्मक विकास के पाठ का या या सिर्फ उनके स्मृतिचिह्नों का। गांधी एक युगपुरुष हैं और उन्होंने अपने जीवन को इतने कामों में लगाया, इतनी जगहों पर बिताया, इतने लोगों के साथ जुड़े कि उसका कोई अंतिम लेखाजोखा तैयार ही नहीं किया जा सकता। 20वीं सदी का यह महात्मा 21वीं सदी में एक किंवदंति बन चुका है। यही कारण है हरेक की चेतना पर एक मानवीय दस्तक देने वाले गांधी का सामना करने को आज कोई तैयार नहीं है। क्योंकि किंवदंतियां जीवन और समाज की चर्चा में तो जीवित रहती हैं पर उनके किसी काम की नहीं होतीं। गांधी विचार तो बाजारू नहीं हो सकता पर उसके समर्थन और विरोध का आज एक बड़ा बाजार है। बाजारवादी दौर में यह बाजार भी खूब फल-फूल रहा है। और इस बाजार में एक से एक गिरिराज और किशोर अपनी सुविधा, अपना मुनाफा तलाश रहे हैं।   

Friday 20 April 2012

खुदकुशी की वर्दी


फौजी जीवन के प्रति हम सम्मान तो खूब जता देते हैं पर उनके भीतर के संघर्ष और मानसिक दबाव को नहीं समझते हैं। नहीं तो ऐसा कतई नहीं होता कि हम यह मानकर चलते कि सैनिकों की जानें सिर्फ सरहद पर दुश्मन की गोलियों से या फिर नक्सली-आतंकी भिड़ंत में ही जाती हैं। पिछले साल आतंकी घटनाओं में 65 जवान शहीद हुए जबकि इसी दौरान 99 जवानों ने खुद अपनी जीवनलीला समाप्त की और ऐसा करने वालों में महज 23 अशांत इलाकों में तैनात थे। 76 जवानों ने तो शांतिपूर्ण इलाकों में तैनाती के बावजूद आत्महत्या का दुर्भाग्यपूर्ण फैसला लिया।
सैनिकों में खुदकुशी की प्रवृत्ति हाल के सालों में एक बड़ी समस्या के रूप में उभरी है। 2007 में जहां मात्र 42 जवानों ने आत्महत्या की, वहीं उसके बाद के सालों में क्रमश: 150, 110, 115 और 99 ने यह दुर्भाग्यपूर्ण फैसला लिया। साफ है कि जवानों की कार्यस्थिति और मनोदबावों के बारे में गंभीरता से विचार करने की दरकार है। क्योंकि कहीं न कहीं यह समस्या सुरक्षा प्रहरियों के गिरते आत्मबल का भी है। फिर इस गिरावट के साथ अगर हमारे जवान अपने फर्ज को अंजाम दे रहे हैं तो न सिर्फ सुरक्षा की दृष्टि से बल्कि मानवीय आधार पर भी यह एक खतरनाक स्थिति है।
एक तो हाल के सालों में खासतौर पर सरकारी स्तर पर यह प्रवृत्ति बढ़ी है कि वह हर चुनौतिपूर्ण स्थिति से निपटने का आसान तरीका सेना की तैनाती है। ऐसे में जवानों पर कार्य दबाव जहां असामान्य तौर पर बढ़ा है। आलम तो यह है कि कानून व्यवस्था की स्थिति संभालने के लिए पूरे देश में सघन पुलिस तंत्र है पर भरोसे के अभाव में हर जोखिम भरी स्थिति में सेना की तैनाती को आसान विकल्प मान लिया गया है। यह सैनिकों की कार्यक्षमता और
कुशलता का यंत्रनापूर्ण दोहन है।
इस बारे में नीतिगत रूप में सरकार को फैसला लेना चाहिए कि आंतरिक
और वाह्य सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थलों के अलावा मात्र प्राकृतिक आपदा की स्थिति में ही सैन्य तैनाती के विकल्प पर विचार किया जाएगा। इसके अलावा सैनिकों के पारिवारिक जीवन को भी पर्याप्त महत्व दिया जाए ताकि तैनाती के दौरान उन पर कोई अतिरिक्त मानसिक दबाव न हो।
रक्षा मंत्रालय जरूर ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए सैनिकों के लिए मनोचिकित्सीय परामर्श
और योग प्रशिक्षण जैसे  कार्यक्रमों पर जोर जरूर दे रहा है पर इससे आगे और भी बहुत कुछ करने की दरकार है। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ज्यादातर जवान अपने बीवी-बच्चों से महीनों अलग रहने के कारण भीतर ही भीतर घुटन और निराशा से भरने लगते हैं और अंत में हारकर आत्महत्या जैसा फैसला लेने को मजबूर हो जाते हैं।

Tuesday 17 April 2012

गरीब हम हैं इसलिए कि तुम अमीर हो गए


भारत की गिनती जरूर आज दुनिया में चीन के बाद सबसे ज्यादा सुरक्षित और संभावनाओं से भरे इकोनमी के रूप में होती है पर देश के भीतर विकास को लेकर वर्गीय अंतर खतरनाक तरीके से बढ़ गया है। तभी अपने देश में अब सीधे विकास को लेकर बात नहीं हो रही बल्कि इसके समावेशी आयाम पर सर्वाधिक बल दिया जा रहा है। आर्थिक सोच में आया यह फर्क अकारण नहीं है।
वित्त राज्यमंत्री नमोनारायण मीणा ने संसद में ग्लोबल वेल्थ इंटेलीजेंस फर्म के हालिया सर्वे की चर्चा में बताया कि देश के चोटी के सर्वाधिक 8200 अमीर लोगों के पास करीब 945 अमेरिकी डॉलर की दौलत है, जो देश की अर्थव्यवस्था का तकरीबन 70 फीसद हिस्सा है। साफ है कि धन और साधन के असमान वितरण की चुनौती एक खतरनाक स्थिति की ओर इशारा कर रही है।
कुछ महीने पहले आए 'हंगामा' रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि देश में 14 करोड़ नौनिहालों का बचपन महज इस कारण असुरक्षित और बीमार है क्योंकि वे कुपोषित हैं। अभी कुछ ही दिन हुए हैं, जब योजना आयोग की तरफ से आए निर्धनता तय करने के अतार्किक पैमाने पर संसद से लेकर सड़क तक शोर मचा। आयोग ने अपनी रपट में शहरी क्षेत्रों में रोजाना 28.65 और देहाती इलाकों में 22.42 रुपए खर्च करने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर माना है। कहने की जरूरत नहीं कि यह आमजन के प्रति एक तंग नजरिया है।
भूले नहीं हैं लोग आज भी अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की उस चर्चित रपोर्ट को जिसमें दावा किया गया था कि देश की 77 फीसद आबादी 20 रुपए रोजाना से कम पर अब जीवन गुजारने को विवश है। आज जब वित्तमंत्री कड़े फैसले लेने की दरकार पर जोर देते हैं तो इसमें यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि कड़े फैसले का मतलब अब भी कर ढांचा और आयात-निर्यात नीति आदि में बदलाव मात्र हैं तो यह विकास की असमानता को तो दूर करने वाली अर्थनीति तो साबित होने से रही।
समावेशी अर्थ विकास का दर्शन अगर आज भी सरकारी जुमलेबाजी का हिस्सा भर है तो आगे देश में गरीबी-अमीरी की खाई और बढ़ेगी ही। पिछले कुछ महीनों में भारत सहित दुनिया भर में आर्थिक मोर्चे पर चिंताएं सघन हुई हैं। चार साल पहले की विश्व मंदी एक बार फिर से सिर उठा रही है और इस बार इसकी चपेट में डॉलर से लेकर यूरोजोन तक की इकोनमी के आने का अंदेशा है। ऐसे में भारत को अपने आर्थिक विकास को वर्टिकल से हॉरिजेंटल ग्रोथ की तरफ फोकस करना होगा।

Sunday 8 April 2012

समृद्धि के इकहरेपन के कारण

1991 से ग्लोबल विकास की दौड़ में शामिल भारत भले आज एक दमदार अर्थव्यवस्था के रूप में पूरी दुनिया में देखा जाता हो पर देश के अंदरूनी हालात अब भी खासे विरोधाभासी हैं। सुपर इकोनोमिक पावर होने की हसरत रखने वाले देश की आधी आबादी आज भी खुले में शौच को मजबूर है। इसके उलट 63.2 फीसद आबादी ऐसी है, जो मोबाइल फोन का इस्तेमाल करती है। साफ है कि विकास के नए आग्रहों ने जहां जनजीवन में स्थान बनाया है, वहीं गरीबी और पिछड़ेपन की चंगुल से अब भी लोग पूरी तरह निकल नहीं पाए हैं। गनीमत है कि गुजरे 20 सालों में विकास के इस गाढ़े होते विरोधाभास और वर्गीय अंतर को अब हमारी सरकार भी कबूलती है। समावेशी विकास की सरकारी हिमायत के पीछे कहीं न कहीं यह कबूलनामा ही है।
जनगणना-2011 के आंकड़ों के विश्लेषण में कहीं न कहीं यह तथ्य भी रेखांकित हुआ है कि देश में एक तरफ सुविधाओं के अधिकतम उपभोग की होड़ पैदा हुई है, वहीं कई ऐसे इलाके और तबके भी हैं, जहां लोगबाग आज भी विकास के बुनियादी सरोकार तक से कटे हुए हैं। देश के 49 फीसद घरों में अगर आज भी खाना पकाने के लिए सूखी लकडि़यों का इस्तेमाल होता है और नल से पेयजल की पहुंच मात्र 43 फीसद लोगों तक है, तो साफ है कि हमारी विकास नीति देश की तकरीबन आधी आबादी की जिंदगी का अंधेरा दूर करने में विफल रही है। जनगणना आंकड़ों के विश्लेषण में यह बात साफ झलकती है कि पानी-बिजली-सड़क जैसे आधाराभूत क्षेत्रों में अब भी हम काफी पीछे हैं।
मसलन, 2005 में बड़े जोर-शोर से राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतिकरण योजना की शुरुआत हुई थी। योजना का लक्ष्य 87 फीसद बगैर बिजली की सुविधा वाले घरों तक बिजली पहुंचाने की थी पर आलम यह है कि अब भी सैकड़ों गांव ऐसे हैं, जहां तक या तो यह योजना नहीं पहुंची है या फिर काम अधूरा है। पेयजल उपलब्धता आैर सफाई-स्वच्छता से संबंधित कार्यक्रमों की भी यही हालत है। दरअसल, यह स्थिति इसलिए भी है क्योंकि पिछले कुछ सालों में सरकार का ध्यान विकेंद्रित के बजाय केंद्रित विकास की तरफ ज्यादा रहा है।
नतीजा यह कि एक तरफ देशभर में अरबपतियों की गिनती लगातार बढ़ती जा रही है, वहीं कम से कम 14 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो कुपोषण का शिकार हैं। यह विरोधाभासी अंतर हमारे विकास और समृद्धि के इकहरेपन के कारण है। सरकार अब वर्ष 2020 को लक्ष्य करके देश को समावेशी विकास लक्ष्य की ओर ले जाने की तैयारी कर रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले कुछ सालों में विकास का उजाला सबके हिस्से में आएगा।