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Wednesday, February 20, 2019

हिंदी की नामवरी ठाठ

अक्षर स्मृति
डॉ. नामवर सिंह (1927-2019)

- प्रेम प्रकाश
एक ऐसे दौर में जब किसी भी तरह के विमर्श और प्रतिरोध को नासमझ वाचालता और असभ्य प्रतिक्रियाओं का फौरी आखेट चुनौती दे रहा है, हिंदी के आलोचकीय विवेक को लोकिप्रियता और स्वीकृति के सबसे ऊंचे आसन तक ले जाने वाले नामवर सिंह का न होना महज एक खबर नहीं है। दरअसल, स्वाधीन भारत की हिंदी चेतना को लोक और परंपरा के साझे के साथ समझने की चुनौती बड़ी रही है। इस बड़ी चुनौती का महत्व आज की तारीख में तब ज्यादा समझा सकता है, जब भाषा, कला और संस्कृति के पूरे विवेक को ही आवारा पूंजी की ताकत गौरजरूरी करार देने पर तुली है। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए हिंदी साहित्य के रचनात्मक विकास के साथ इस भाषा से जुड़ी संपूर्ण सांस्कृतिक निर्मिति को नामवर जी ने जो आलोचकीय धार दी, वह अद्वीतीय है। 
नामवर सिंह का जन्म 1927 में हुआ था। उनकी तरुणाई और देश की स्वाधीनता को अगर एक साथ देखें तो उस स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है, जब देश के साथ एक प्रखर युवा मन अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास की गोद में अपनी नई शिनाख्त की छटपटाहट से जूझ रहा होगा। गौरतलब है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ 1929 में लिख चुके थे। यानी देश की स्वाधीनता के साथ देश की सबसे प्रमुख भाषा के साहित्य और इतिहास का आलोचकीय निकष गढ़ा जा चुका था। यही नहीं ‘लोकमंगल’ और ‘परंपरा’ जैसे बीज शब्दों के साथ हिंदी रचनात्मकता को देखने-परखने के उपकरण सामने आ चुके थे। आगे अगर कोई चुनौती थी तो इन आलोचकीय उपकरणों के साथ हिंदी की रचनात्मक अस्मिता को और गहरे पहचानने की, उसे नए संदर्भों और नए मुहावरों से लैस करने की।
बड़ी बात यह भी है कि रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा के यहां हिंदी साहित्य की जो आलोचना भक्तिकाल, छायावाद और राष्ट्रीय भावधारा तक आते-आते ठहर जाती है। जाहिर है कि आजादी के बाद के भारतीय समाज के विरोधाभासी यथार्थों के बीच रचे गए नए साहित्य को लेकर आलोचकीय समझ बनाने की चुनौती बड़ी थी। नामवर जी अपने जिन आलोचकीय प्रतिमानों के कारण लोकिप्रय रहे और हिंदी आलोचना के शिखर आलोचक होने तक की स्वीकृति अपने जीते-जी पा गए, उन प्रतिमानों का एक सिरा अगर लोक और परंपरा के मस्तूलों से बंधा है, तो वहीं उसमें समाकालीन जीवन संदर्भों के बीच प्रगतिशील संवेदनात्मक तत्वों को पहचाने का आलोचकीय विवेक भी है।   
हिंदी साहित्य के साथ पूरे हिंदी समाज के लिए यह वाकई बड़े शोक की घड़ी है। हमारे दौर के महत्वपूर्ण कवियों में शामिल मंगलेश डबराल ने कहा भी कि यह हिंदी के प्रतिमानों की विदाई का त्रासद समय है। सोलह महीनों के छोटे से अंतराल में कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, कृष्णा सोबती और अब नामवर सिंह के निधन से जो जगहें खाली हुई हैं वे हमेशा खाली ही रहेंगी।
बनारसे के एक छोटे से गांव जायतपुर में जन्मे नामवर सिंह की चर्चा के साथ दो बातें हमेशा जुड़ी रहेंगी। एक तो उनकी भाषा से लेकर पूरे व्यक्तित्व को अपने गहन में लेनेवाला बनारसीपन और दूसरा अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिली आलोचकीय सीख को अमिट और अपराजेय बनाए रखने की उनकी जीवट जद्दोजहद। उनके व्यक्तित्व के ये दोनों रंग खासे ठेठ हैं। यहां तक कि नामवर जी खुद अपने जीवन संघर्षों के बीच भी इस ठेठ ठसक के साथ ही जीवट बने रहे।
आज पूरे देश में विश्वविद्यालयों में हिंदी विभागों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। नामवर सिंह को भुलाया इसिलए भी नहीं जा सकता क्योंकि उन्होंने स्वाधीन भारत में हिंदी आलोचना और विमर्श के केंद्र में विश्वविद्यालयों को लाने की दरकार को सबसे पहले समझा था। नए दौर में उच्च शिक्षा केंद्रों में हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाए बगैर हिंदी ज्ञान परंपरा का विकास असंभव है, वे इस बात को समझते थे। देश के सबसे प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्विविद्यालय में अपनी अगुआई में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना कराने और फिर उसे आकादमिक स्वीकृति दिलाने में उनका अध्यापकीय योगदान ऐतिहासिक है।
‘नई कविता’ और ‘नई कहानी’ को लेकर हिंदी आलोचना का जो नया प्रतिमान लेकर नामवर सिंह लेकर आए, वह नए भारतीय समाज और संस्कार के लिए भी एक मार्गदर्शक सिद्धांत की तरह है। यह सिद्धांत हमें लगातार इस बात के लिए आगाह करता रहेगा कि लोक, परंपरा और आधुनिकता हमारी संस्कृति के आलग-आलग टापू नहीं बल्कि एक ऐसी साझी विरासत हैं, जिसमें से एक का भी अलगाव हमें भाषा, समाज और संस्कृति के मजबूत साझेपन से अलग-थलग कर देगा। यह भी कि बात सैद्धांतिक प्रतिबद्धता की हो कि सामाजिक सुधार के आंदोलनात्मक तकाजों की, इनके लिए हमें कहीं और ताकने-निहारने की जरूरत नहीं बल्कि इनके बीज संस्कार हमारी परंपराओं में पहले से हैं।
आज जब नामवर जी हमारे बीच नहीं हैं, तो जो एक बात हमें सबसे ज्यादा सालेगी वह यह कि भाषा को सारस्वत रूप से धन्य करने वाली ऐसी नामवरी प्रतिभा अब हमारे बीच नहीं होगी, जिसने विमर्श और आलोचना को लेखन और पठन-पाठन के साथ वाचिक रूप से लगातार सशक्त बनाए रखा, उसे लगातार नई धार और तेवर देता रहा। 
‘छायावाद’, ‘इतिहास और आलोचना’, ‘दूसरी परंपरा की खोज’, ‘कविता के नए प्रतिमान’, ‘कहानी नई कहानी’ जैसे लोकप्रिय पुस्तकों के लेखक के साथ हमारे समय में हिंदी की अस्मिता को गरिमा और स्वीकृति की सबसे समादृत पहचान को खोना, हिंदी भाषा से आगे पूरी हिंदी संस्कृति के लिए एक बड़ा आघात है। यह आघात इसलिए भी बड़ा है क्योंकि हमारे दौर का लोकतांत्रिक सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श आज गहरे संकट में है। संकट की इस घड़ी में नामवर जी के लिखे-कहे की ताकत हमारी चेतना और विवेक के हौसले को हारने नहीं देगी, इस उम्मीद के साथ डॉ. नामवर सिंह को असंख्य हिंदी जनों का साझा नमन।

Saturday, January 26, 2019

जिद्दी प्रतिरोध की अक्षर दुनिया


- प्रेम प्रकाश

भारत में महिला लेखन के जरिए स्त्री संघर्ष, चेतना और अस्मिता की जो अक्षर दुनिया पिछले कुछ दशकों में आबाद हुई है, उस दुनिया में रचनात्मक हस्तक्षेप की जो सबसे बड़ी धुरी है, उसे चिन्हित करने में कृष्णा सोबती का बड़ा योगदान रहा है। कृष्णा जी ने महिलावादी आंदोलन की वैश्विकता के बीच स्त्री, समाज और परंपरा को अपने तरीके से एक सीध में रखकर देखा। 1950 में कहानी ‘लामा’ से साहित्यिक सफर शुरू करने वाली इस महान लेखिका ने महिला पक्ष के साथ अपने समय के हस्तक्षेप को भी काफी निर्भीक तरीके से लिखा और बोला। इसलिए उनके लेखन और जीवन की रचनात्मक चौहद्दी को बांधना आसान नहीं है।

उनके लेखन में अगर किसी पहाड़ी नदी की तरह आधी दुनिया की हहराती संवेदना है तो समय और समाज की उस चिंता से भी वह हरसंभव मुठभेड़ करती हैं, जिसके लिए कलम को सीधे-सीधे आंदोलन और प्रतिरोध का हथियार बनना पड़ता है।

यह नहीं कि आज जब कृष्णा सोबती हमारे बीच नहीं हैं, तो उनके लेखन और जीवन को लेकर हम भावनात्मक रूप से अतिरिक्त रूप से विवश या सम्मोहन का शिकार हुए जा रहे हैं, बल्कि यह तो उनके जीते-जी ही हो गया था कि समकालीन भारतीय साहित्य की कोई भी कतार बगैर उनके नाम के पूरी नहीं होती है। उनकी नाक पर चढ़े बड़े ऐनक में हम सब अपनी दुनिया को आलोचकीय विवेक के साथ देखने-समझने के आदी बहुत पहले हो गए हैं।

उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए हम अगर उस दौर की स्थितियों को देखें-समझें, जब वो अपनी स्वीकृति और उभार के लिए संघर्ष कर रही थीं तो साफ दिखता है कि नई कहानी आंदोलन के भीष्म साहनी और कमलेश्वर से लेकर राजेंद्र यादव जैसे नामवर सितारों के बीच एक लेखिका कैसे अपने जिद्दी महिला किरदारों के साथ कथा और जीवन का एक नया साझा रचने का जोखिम उठाती है। हिंदी संवेदना की अक्षर दुनिया में यह एक बड़ा मोड़ ही नहीं, एक साहसी हस्तक्षेप भी था। मृदुला गर्ग से लेकर ममता कालिया, नासिरा शर्मा और उनके बाद की कथाकारों तक यह दुनिया अगर लागातार आबाद और सघन होती चली गई तो इसलिए क्योंकि इस विस्तार को कृष्णा जी पाठकों के बीच बड़ी स्वीकृति दिला चुकी थीं। हिंदी आलोचना ने इस रचनात्मक स्वीकृति के दमखम को भले देर-सबेर पहचाना हो पर स्त्री विमर्श का समकालीन सर्ग आज अगर एक बड़ी आलोचकीय दरकार का नाम है तो इसलिए क्योंकि इसने जीवन और लेखन के पुरुषवादी मिथ को निणार्यक रूप से तोड़ दिया है।

कृष्णा जी को पिछले साल ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था। इससे पहले उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ के लिए उन्हें वर्ष 1980 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उन्हें 1996 में अकादमी के उच्चतम सम्मान साहित्य अकादमी फेलोशिप से भी नवाजा गया था। इसके अलावा पद्मभूषण, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान जैसे अलंकरण उनकी यशस्विता को बढ़ाते हैं। उन्होंने अपने लेखन से हिंदी की कम से कम दो पीढ़ियों को रचनात्मक संवेदना से जोड़ा है। उनके कालजयी उपन्यासों में ‘सूरजमुखी अंधेरे के’, ‘दिलोदानिश’, ‘जिंदगीनामा’, ‘ऐ लड़की’, ‘समय सरगम’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘जैनी मेहरबान सिंह’, ‘हम हशमत’, ‘बादलों के घेरे’ ने कथा साहित्य को अप्रतिम ताजगी और स्फूर्ति प्रदान की है।

उनकी रचनात्मक सक्रियता के आखिरी दिनों में आई ‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख’ और ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ जैसी पुस्तकें ये दिखाती हैं कि वह मौजूदा देशकाल और परिस्थिति को देखते-समझते हुए किस तरह अपने रचनात्मक शिल्प और कथ्य को लगातार विचार और लोकतंत्र की हिफाजत के औजार के तौर पर मांज रही थीं।

18 फरवरी 1924 को गुजरात (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मीं कृष्णा सोबती हमेशा साहसपूर्ण रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती रहेंगी। निजी जिंदगी से लेकर अपने शब्दों की दुनिया को वे लगातार इस काबिल बनाए रखने में सफल रहीं, जिस कारण उनके प्रति सम्मान रखने वालों का समाज हर तरह के इकहरेपन का अतिक्रमण करता है। दिलचस्प है कि यह अतिक्रमण खुद उनके जीवन और लेखन का भी हिस्सा रहा है। 94 साल का जीवन जिस दुनिया में उन्होंने जिया, उसमें जब-जब कोई महिला आजादख्याली की बात करेगी, जब-जब लेखकों-बौद्धिकों की जमात अभिव्यक्ति की निर्भीक आजादी की बात करेगी, तब-तब उनकी स्मृति हमें रचनात्मक ऊर्जा से समृद्ध करती रहेगी।

Saturday, April 14, 2018

बापू तो रहे याद भूल गए बा को!

- प्रेम प्रकाश


बा के  बारे में खुद बापू ने स्वीकार भी किया है कि उनमें दृढ़ता और निर्भीकता उनसे भी ज्यादा थी। बा की पहचान सिर्फ यही नहीं थी कि वे बापू की जीवन संगिनी रहीं। वह एक दृढ़ आत्मशक्ति वाली महिला थीं और गांधीजी की प्रेरणा भी

दो अक्टूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को लेकर सरकार और समाज दोनों उत्साहित हैं। खासतौर पर पीएम मोदी ने बापू की150वीं जयंती को राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के लक्ष्य के साथ जोड़कर इसे 2014 से ही चर्चा में ला दिया है। पर यह देश और सरकार दोनों भूल यह गई कि अगले वर्ष बापू के साथ बापू की भी 150वीं जयंती है। यही नहीं, कस्तूरबा (11 अप्रैल 1869 - 22 फरवरी 1942) चूंकि गांधी से 6 माह बड़ी थीं, इसलिए बा की जयंती दो अक्टूबर से पहले 11 अप्रैल को ही मनाई जाएगी।

कस्तूरबा और गांधी आधुनिक विश्व में दांपत्य की सबसे सफल मिसाल हैं। बा के  बारे में खुद बापू ने स्वीकार भी किया है कि उनमें दृढ़ता और निर्भीकता उनसे भी ज्यादा थी। तारीखी अनुभव के तौर पर भी देखें तो बा की पहचान सिर्फ यही नहीं थी कि वे बापू की जीवन संगिनी रहीं। आजादी की लड़ाई में उन्होंने न सिर्फ हर कदम पर अपने पति का साथ दिया, बल्कि यह कि कई बार स्वतंत्र रूप से और गांधीजी के मना करने के बावजूद उन्होंने जेल जाने और संघर्ष में शिरकत करने का फैसला किया। यहां तक गांंधी के अहिंसक संघर्ष की राह में वे गांदी से पहले जेल भी गईं। वह एक दृढ़ आत्मशक्ति वाली महिला थीं और गांधीजी की प्रेरणा भी। उन्होंने नई तालीम को लेकर गांधी के प्रयोग को सबसे पहले अमल में लाई।

इसी तरह चरखा और स्वच्छता को लेकर गांधी के प्रयोग को मॉडल की शक्ल देने वाली कोई और नहीं, बल्कि कस्तूरबा ही थीं। इसको लेकर कई प्रसंगों की चर्चा खुद गांधी ने भी की है। कहना हो तो कह सकते हैं कि शिक्षा, अनुशासन और स्वास्थ्य से जुड़े गांधी के कई बुनियादी सबक के साथ स्वाधीनता संघर्ष तक कस्तूरबा का जीवन रचनात्मक दृढ़ता की बड़ी मिसाल है।

धन्यवाद के पात्र हैं गांधी की लीक पर चले रहे वे कुछ सर्वोदयी, जिन्होंने बा और बापू की प्रेरणा को साझी विरासत के तौर पर जिंदा रखा। इस मौके पर ‘बा-बापू 150’ के नाम से जहां गांधी के इन अनुयायियों ने देशव्यापी यात्रा काफी पहले शुरू कर दी है, वहीं इस अभियान के तहत कुछ और कार्यक्रम भी हो रहे हैं। पर जहां तक रही सरकार और समाज की मुख्यधारा की बात तो शायद उनकी स्मृति से बा की विदायी हो चुकी है। 

Tuesday, April 3, 2018

दलित मुद्दे पर भाजपा का इनकाउंटर

- प्रेम प्रकाश





एस-एसटी एक्ट को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर पैदा हुआ असंतोष अब पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। विरोधी दलों को लगता है कि भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को दलित अस्मिता के संघर्ष को सड़कों पर तेज करके काउंटर किया जा सकता है

जिन राजनीति और समाज विज्ञानियों को यह लगता था कि मंडलवादी राजनीति का एक्सटेंशन मुश्किल है, उनके लिए दो अप्रैल 2018 का राष्ट्रव्यापी घटनाक्रम नींद से जगाने वाला है। एससी-एसटी एक्ट के संबंध में बीते 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित और आदिवासी संगठनों की तरफ से आयोजित भारत बंद का व्यापक असर हुआ। बंद के दौरान हिंसा भी हुई। खासतौर पर राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में हिंसा और आगजनी की कई घटनाएं हुई। दिलचस्प है कि एक्ट पर फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है। केंद्र सरकार ने तो इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। फिर भी बंद और विरोध के निशाने पर केंद्र सरकार रही। उसी के खिलाफ नारे लगे और उसी की नीतियों और मंशा को लेकर सवाल उठे, सड़कों पर असंतोष दिखा।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 के दुरुपयोग को रोकने को लेकर गाइडलाइन जारी की थी। यह सुनवाई महाराष्ट्र के एक मामले में हुई थी। ये गाइडलाइंस फौरन लागू हो गई थी। इसके तहत अब शिकायत के बावजूद सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत से होगी और अगर आरोपी सरकारी कर्मचारी नहीं है, तो उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से होगी। यही नहीं, इस मामले में अग्रिम जमानत पर मजिस्ट्रेट विचार करेंगे और अपने विवेक से जमानत मंजूर या नामंजूर करेंगे। इस अदालती फैसले का आधार कहीं न कहीं यह है कि एनसीआरबी 2016 की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में जातिसूचक गाली-गलौच के 11,060 शिकायतें दर्ज हुईं। जांच में 935 झूठी पाई गईं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित संगठनों को लगता है कि कहीं न कहीं सरकार उसे मिले न्यायिक सुविधा या अधिकार के कटौती के पक्ष में है। जबकि जिस मामले में सर्वोच्च अदालत ने नया फैसला सुनाया है, उसमें सरकार कहीं से भी पार्टी नहीं है। बावजूद इसके सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एससी/एसटी एक्ट के फैसले पर फिर से विचार करने के लिए एक याचिका दायर की। पर कोर्ट ने सोमवार यानी भारत बंद के एलान के दिन इस पर फौरन सुनवाई से मना कर दिया।
दरअसल, यह पूर मामला अब कहीं न कहीं राजनीतिक रंग ले चुका है। विरोधी दलों को लगता है कि भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को दलित अस्मिता के संघर्ष को सड़कों पर तेज करके काउंटर किया जा सकता है। इस सियासी वार-प्रतिवार के पीछे एक बड़ी वजह 2019 का लोकसभा चुनाव है। यही वजह है कि महज 13 दिन के भीतर इस मामले पर तकरीबन सारा विपक्ष एक सुर में बोलता दिखा।
गैरतलब है कि देश में एससी-एसटी की आबादी 20 करोड़ और लोकसभा में इस वर्ग से 131 सांसद आते हैं। जाहिर है कि इस वर्ग के साथ हर दल के हित जुड़े हैं। यहां तक कि भाजपा के भी सबसे ज्यादा 67 सांसद इसी वर्ग से हैं। साफ है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बड़ा गणित कहीं न कहीं दलित और पिछड़ों की राजनीति का है। भाजपा का कसूर सिर्फ इतना है उनके और संघ परिवार के कुछ नेताओं ने जिस तरह आरक्षण और जाति के मुद्दे पर जिस तरह के बयान दिए हैं, उससे विपक्ष को दलितों-पिछड़ों को यह कहने-समझाने में मदद मिली है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार आरक्षण सहित इस वर्ग के कई संवैधानिक सम्मत अधिकारों पर कैंची चलाने की मंशा रखती है। अलबत्ता इस धारणा का खंडन खुद प्रधानमंत्री तक ने कई बार किया। पर खासतौर पर जिस तरह से भाजपा के त्रिपुरा में सत्तारूढ़ होने के बाद बिहार, प. बंगाल, यूपी, राजस्थान, कर्नाटक से लेकर केरल तक देश का राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम बदला है, उसने भाजपा विरोध का एक नया मंच खड़ा कर दिया है। यह मंच दलित राजनीति का है, मंडलवादी राजनीति के आक्रामक और हिंसक एक्सटेंशन का है।   

Monday, April 2, 2018

पोस्ट ट्रुथ के दौर में बिहार का ट्रुथ

- प्रेम प्रकाश



कई राजनीति विज्ञानी इस बात को भारतीय राजनीति में डेवलप हुए उस नए पैटर्न के तौर पर देखते हैं, जिसमें जाति और अस्मिता के नाम पर होने वाली सियासी गोलबंदी को तोड़ने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को जानबूझकर तूल दिया जाता है। सवाल यह भी है कि सत्ता पर काबिज होने का यदि यही गणित और यही पैटर्न है तो फिर भारतीय लोकतंत्र के बहुलतावादी चरित्र का क्या होगा?


इन दिनों देश के कई सूबों में सांप्रदायिक तनाव की आंच इतनी तेज है कि पर्व-त्योहारों का शायद ही कोई ऐसा मौका बीतता है, जब समाज के दो समुदायों के बीच हिंसा की खबरें न आती हों। खासतौर पर बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में आए दिन ऐसी घटनाएं घट रही हैं, जो सीधे-सीधे कुछ सियासी दलों द्वारा प्रायोजित सांप्रदायिक उकसावे वाले कृत्य हैं। इस सांप्रदायिक झुलस का शिकार केरल और कर्नाटक जैसा राज्य भी है। केरल में विधानसभा चुनाव तो खैर 2021 में होने हैं पर कर्नाटक में मई में ही चुनाव होने हैं। कई राजनीति विज्ञानी इस बात को भारतीय राजनीति में डेवलप हुए उस नए पैटर्न के तौर पर देखते हैं, जिसमें जाति और अस्मिता के नाम पर होने वाली सियासी गोलबंदी को तोड़ने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को जानबूझकर तूल दिया जाता है। सवाल यह भी है कि सत्ता पर काबिज होने का यदि यही गणित और यही पैटर्न है तो फिर भारतीय लोकतंत्र के बहुलतावादी चरित्र का क्या होगा?
पिछले दिनों बिहार में भागलपुर में हिंदू नववर्ष पर निकले जुलूस के दौरान दो गुटों के बीच हिंसक भिड़ंत हो गई। देखते-देखते इस भिड़ंत ने हिंसक सांप्रदायिक टकराव की शक्ल ले ली। इसके बाद जब रामनवमी का त्योहार आया तो यह टकराव न सिर्फ और ज्यादा भड़का बल्कि इसके नाम पर खुलकर सियासी रोटियां सेंकी जाने लगी। रामनवमी पर हिंसा और आगजनी की खबरें बिहार से लगे पश्चिम बंगाल से भी आईं। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि अब भी इन दोनों सूबों में शांति और सौहार्द की स्थिति बहाल होना सरकार और समाज के आगे एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। जो हालात अभी बिहार और पश्चिम बंगाल में हैं, वो स्थितियां समय-समय पर देश के बाकी सूबों में भी पैदा होती रहती हैं। आलम यह है कि गूगल सर्च इंजन के न्यूज सेक्शन में मात्र ‘रामनवमी’ शब्द लिखने पर जो पांच लाख से ज्यादा वेब पन्ने खुलते हैं, उसमें सबसे ज्यादा खबरें हिंसा, आगजनी और भड़काने वाले बयानों को लेकर हैं।
भारतीय समाज और राजनीति की सांस्कृतिक स्फीति का यह सच निस्संदेह काफी भयावह है। यकीन नहीं होता कि यह उस देश की सच्चाई है जिसने स्वाधीनता के लिए संघर्ष से पहले सांस्कृतिक पुनर्जागरण को अपने लिए जरूरी माना। आज इस पुनर्जागरण से दूर भारत एक बार फिर उस सांप्रदायिक झुलस की तरफ बढ़ता जा रहा है, जिसका शिकार वह 1947-48 के दौर में हुआ था। तब गनीमत यह थी कि अगर देश में एक तरफ सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने वाली बर्बर प्रवृतियां थीं, तो वहीं दूसरी तरफ समाज और राजनीति की मुख्यधारा सामाजिक-सांस्कृतिक समन्वय को बहाल रखने के लिए हर लिहाज से प्रतिबद्ध थी। दुर्भाग्य से प्रतिबद्धता का यह चरित्र आज सियासी जमातों में तो नहीं ही दिखता है, राजनीतिक दुष्प्रभावों से सामाजिक चरित्र भी लगातार हिंसक और अराजक होता जा रहा है। यह स्थिति आगे अगर इसी तरह ढलाव की तरफ खिसकती गई तो आगे भारतीय समाज और संस्कृति का वह चारित्रिक साझा बहाल रख पाना मुश्किल होगा, जिसमें एक तरफ बहुलतावादी छटा दिखती है, तो वहीं दूसरी तरफ समावेशी गुण भी।
हिंदी साहित्य के सर्वाधिक मान्य इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य, संस्कृति और समाज के साझे को समझने के लिए ‘लोक’ और ‘परंपरा’ के रूप में दो सूत्र दिए हैं। भारत की बहुलतावादी संस्कृति में जब हम समन्वय के तत्वों की खोज करते हैं तो ये दो पद हमारी सबसे ज्यादा मदद करते हैं। इतिहास में बहुत पीछे न जाते हुए जब हम स्वाधीनता आंदोलन के दौरान प्रकट हुई राष्ट्रीय एकता का संदर्भ देखते हैं तो हमें सबसे पहले लोकमान्य तिलक याद आते हैं। दिलचस्प है कि देश जब 20वीं सदी के मुहाने पर खड़ा था, तो तिलक जैसे राष्ट्रवादियों की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि भारतीय जनमानस को कैसे राष्ट्रीयता और स्वाधीनता के सवाल पर एकजुट किया जाए। इसके लिए उन्होंने लोक और परंपरा की गोद में पगी भारतीय सांस्कृतिक चेतना को आधार बनाया और गणेशोत्सव को एक सार्वजनिक लोक उत्सव का रूप दिया। तिलक यह बात तब सोच रहे थे जबकि 1893 में पुणे और बंबई में दंगे हुए थे। यहां तक कि कांग्रेस का भी उदारवादी कहा जाने वाला एक बड़ा धरा इस मुद्दे पर तिलक के साथ नहीं था। दरअसल, तिलक भारतीय जनमानस के उस बोध को कहीं न कहीं समझ चुके थे कि समाज और राष्ट्र के व्यापक सवालों पर लोगों को तब तक एकजुट नहीं किया जा सकता, जब तक इसकी सांस्कृतिक प्रेरणा व्यापक तौर पर नहीं जगेगी।
कहना मुश्किल है कि एक ऐसे दौर में जब ‘सत्य’ भी इस तरह ‘विकृत’ हो गया है कि उसे मौलिक रूप में पहचानना मुश्किल है, तिलक जैसा विवेक भारतीय राजनीतिक और सांस्कृतिक चिंतन का सकर्मक हिस्सा कैसे बनेगा। ग्लोबल दौर में इस सवाल की तह भी कहीं न कहीं ग्लोबल है और इसे गहराई से समझने की जरूरत है। 16 नवम्बर, 2016 को ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी की तरफ से यह घोषणा की गई कि ‘पोस्ट ट्रुथ’ साल का सबसे चर्चित शब्द रहा है। यह शब्द और संदर्भ वही है, जिसकी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विकृति के तौर पर बात हम पहले कर चुके हैं। गौरतलब है कि 1992 में सर्बियन-अमेरिकन नाटककार स्टीव तेसिच ने एक निबंध लिखा। इस निबंध में ‘पोस्ट ट्रुथ’ शब्द का उपयोग पहली बार यह दर्शाने के लिए किया गया कि ‘सच अब उतना प्रासंगिक नहीं रहा।’ भारत से लेकर अमेरिका तक आज जिस तरह का उद्दंड राष्ट्रवाद और अपनी कथित सांस्कृतिक अस्मिता को बनाए-बचाए रखने के नाम पर जिस तरह की उपद्रवी युक्तियां सियासी जमातों द्वारा अपनाई जा रही हैं, उसे देखकर यह चिंता कंठ तक पहुंच जाती है कि सत्ता प्रतिष्ठानों पर काबिज होने की होड़ में समाज और संस्कृति का मंगलकारी योग कहीं लंबे समय के लिए तिरोहित न हो जाए। क्योंकि जनमत के लिए अगर वाकई वस्तुगत तथ्यों पर अराजक धार्मिक-सांस्कृतिक अपील हावी हो जाए, तो शांति और विवेक की धीरपूर्ण बातें अनसुनी ही रह जाएंगी। भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक इस तरह की परिस्थिति को ही जानकार ‘पोस्ट ट्रुथ’बता रहे हैं। भारतीय संदर्भ में इसे राजनीति के सूर्य के लगातार दक्षिणायन होते जाने के घटनाक्रम के तौर पर भी देख सकते हैं। धार्मिक अंहकार और विस्तार को जिस तरह राष्ट्रवादी दोशाला ओढ़ाया जा रहा है, उससे देश में बीते कुछ सालों में विग्रहवादी विमर्श और अराजक मानसिकता को बल मिला है। यह विमर्श और यह मानसिकता अगर इसी तरह सिर उठाती रहीं तो आगे भी हमें इस स्थिति के लिए तैयार होना पड़ेगा कि कभी गाय के नाम पर, कभी धर्म परिवर्तन के नाम पर, कभी पर्व-त्योहारों के नाम पर, कभी बहुसंख्यक अस्मिता के नाम पर तो कभी एक जैसे खानपान और पहनावे के नाम पर हमारे आसपास का माहौल लगातार गरमाता रहेगा। इस गरमाहट को शांत करने की फिक्र अगर जल्द ही एक राष्ट्रीय दरकार और चेतना की शक्ल नहीं लेती है तो भारतीय समाज और लोकतंत्र की मौलिक शिनाख्त और उसकी समन्वयवादी विलक्षणता की रक्षा मुश्किल होगी। इसके लिए सबसे पहली आवश्यकता राजनीति के ऊपर समाज का नैतिक अनुशासन कायम करने की है। क्योंकि न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया में कहीं भी जब-जब राजनीति और सत्ता की हांक पर सामाजिक चरित्र गढ़ा गया है, इंसानियत शर्मसार हुई है। लिहाजा, भविष्य में उम्मीद की कोई किरण फूटेगी तो वो समाज के बीच से फूटेगी, न कि राजनीतिक गलियारों से।

Saturday, March 17, 2018

थ्योरी से ज्यादा डॉयलोग पर भरोसा


- प्रेम प्रकाश

स्टीफन हॉकिंग की सबसे अच्छी बात यह थी कि वे डायलॉग में विश्वास करते थे। बहस करना उनकी आदत में शामिल नहीं था
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विज्ञान दुरूह नहीं बल्कि खासा दिलचस्प है। हमारे दौर में इस बात को जिस शख्सियत ने अपने कार्य और विचार से सबसे प्रभावशाली तरीके से समझाया, वे थे महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग। हॉकिंग ने विज्ञान के क्षेत्र में अपने काम से दुनियाभर में करोड़ों युवाओं को विज्ञान पढ़ने के लिए प्रेरित किया। अलबत्ता हॉकिंग ने विज्ञान की नजर से ही भगवान, पृथ्वी पर इंसानों का अंत और एलियनों के अस्तित्व पर अपनी बात पुरजोर अंदाज में रखी। यह निर्भीकता इसलिए भी अहम है क्योंकि गैलिलियो की तरह हॉकिंग को भी इपने इन बयानों के लिए धार्मिक संस्थाओं की ओर से विरोध का सामना भी करना पड़ा था।

ईश्वर के अस्तित्व को नकारा 
स्टीफन हॉकिंग ने अपनी किताब 'द ग्रांड डिजाइन' में भगवान के अस्तित्व को सिरे से नकारा है। उन्होंने एक नए ग्रह की खोज के बारे में बात करते हुए हमारे सौरमंडल के खास समीकरण और भगवान के अस्तित्व पर सवाल उठाया। साल 1992 में एक ग्रह की खोज की गई थी, जो हमारे सूर्य की जगह किसी अन्य सूर्य का चक्कर लगा रहा था। हॉकिंग ने इसका ही उदाहरण देते हुए कहा, ‘ये खोज बताती है कि हमारे सौरमंडल के खगोलीय संयोग- एक सूर्य, पृथ्वी और सूर्य के बीच में उचित दूरी और सोलर मास, सबूत के तौर पर ये मानने के लिए नाकाफी हैं कि पृथ्वी को इतनी सावधानी से इंसानों को खुश करने के लिए बनाया गया था।’

गुरुत्वाकर्षण से बनी सृष्टि
उन्होंने सृष्टि के निर्माण के लिए गुरुत्वाकर्षण के नियम को श्रेय दिया। हॉकिंग कहते हैं, ‘गुरुत्वाकर्षण वह नियम है, जिसकी वजह से ब्रह्मांड अपने आपको शून्य से एक बार फिर शुरू कर सकता है और करेगा भी। ये अचानक होने वाली खगोलीय घटनाएं हमारे अस्तित्व के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसे में ब्रह्मांड को चलाने के लिए भगवान की जरूरत नहीं है।’ हॉकिंग को इस बयान के लिए ईसाई धर्म गुरुओं की ओर से विरोध का सामना करना पड़ा।

ब्रह्मांड और एलियन
स्टीफन हॉकिंग ने दुनिया के सामने ब्रह्मांड में एलियनों के अस्तित्व को लेकर कड़ी चेतावनी दी थी। उन्होंने अपने लैक्चर 'लाइफ इन द यूनिवर्स' में भविष्य में इंसानों और एलियन के बीच मुलाकात को लेकर अपनी राय रखी थी। भौतिक शास्त्र के इन महान वैज्ञानिक ने कहा था, ‘अगर पृथ्वी पर जीवन के पैदा होने का समय सही है तो ब्रह्मांड में ऐसे तमाम तारे होने चाहिए जहां पर जीवन होगा। इनमें से कुछ तारामंडल धरती के बनने से 5 बिलियन साल पहले पैदा हो चुके होंगे।’ इस सवाल पर कि ऐसे में गैलेक्सी में मशीनी और जैविक जीवन के प्रमाण तैरते क्यों नहीं दिख रहे हैं। अब तक कोई पृथ्वी पर कोई क्यों नहीं आया और इस पर कब्जा क्यों नहीं किया गया, हॉकिंग ने कहा, ‘मैं ये नहीं मानता कि यूएफओ में आउटर स्पेस के एलियन होते हैं। मैं सोचता हूं कि एलियन का पृथ्वी पर आगमन खुल्लमखुल्ला होगा और शायद हमारे लिए ये अच्छा नहीं होगा।’

चौंकाने वाला एलान
हॉकिंग ने पृथ्वी पर इंसानियत के भविष्य को लेकर चौंकाने वाला एलान किया था। उन्होंने कहा था, ‘मुझे विश्वास है कि इंसानों को अपने अंत से बचने के लिए पृथ्वी छोड़कर किसी दूसरे ग्रह को अपनाना चाहिए और इंसानों को अपना वजूद बचाने के लिए अगले 100 सालों में वो तैयारी पूरी करनी चाहिए जिससे पृथ्वी को छोड़ा जा सके।’

नार्लीकर की स्मृति में हॉकिंग
भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में हॉकिंग के साथ पढ़ाई की थी। इसके बाद साइंस से संबंधित कई ग्लोबल सम्मेलनों में दोनों की मुलाक़ात होती रही। डॉ. नार्लीकर के अनुसार, ‘कॉलेज के दिनों में वो स्टीफन हॉकिंग के साथ टेबल टेनिस के मैच भी खेल चुके हैं।’ कॉलेज की उन यादों पर उन्होंने कई दिलचस्प जानकारियां हॉकिंग के बारे में दी। उन्होंने बताया कि वे मुझसे साल दो साल जूनियर ही थे। वो बाकी आम स्टूडेंट्स की तरह ही थे। उस वक़्त कोई उनकी प्रतिभा के बारे में नहीं जानता था। लेकिन कुछ सालों के भीतर ही लोगों को ये अंदाज़ा हो गया था कि स्टीफन में कुछ खास बात है।

कैंब्रिज में हॉकिंग
डॉ. नार्लीकर के शब्दों में, ‘मुझे याद है कि ब्रिटेन की रॉयल ग्रीनविच शोध विद्यालय ने साल 1961 में एक साइंस सम्मेलन आयोजित किया था। वहां स्टीफन हॉकिंग से पहली बार मेरी सीधी मुलाकात हुई थी। उस वक्त वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। मैं एक छात्र ही था, लेकिन मुझे वहां एक लेक्चर देने के लिए बुलाया गया था। लेक्चर शुरू होने के कुछ देर बाद ही मैंने पाया कि एक स्टूडेंट है जो बहुत ज़्यादा सवाल कर रहा है। वो थे स्टीफन हॉकिंग। उन्होंने मुझ पर सवालों की बौछार कर दी थी। वो ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में जानना चाहते थे. वो जानना चाहते थे कि बिग बैंग थियोरी है क्या?’
हॉकिंग पीएचडी करने के लिए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी गए थे। उस वक़्त तक लोगों को समझ आ चुका था कि हॉकिंग के मस्तिष्क की क्षमता कितनी है। उनकी पीएचडी की थीसिस पढ़कर सब हैरान रह गए थे। अपनी थीसिस में ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में उन्होंने कई बेहद दिलचस्प बातें लिखी थीं। उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर क़रीब 30 साल काम किया। ब्लैक होल पर उनकी रिसर्च को सबसे ज़्यादा पहचान मिली।

डॉयलोग पर यकीन
उनकी सबसे अच्छी बात थी कि वे डायलॉग में विश्वास करते थे। बहस करना उनकी आदत में शामिल नहीं था। डॉ. नार्लीकर बताते हैं कि कैंब्रिज में उनके साथ मैंने विज्ञान के कई सिद्धांतों पर कई बार चर्चा की, लेकिन कभी हमारे बीच गर्म बहस नहीं हुई. हमने हमेशा एक दूसरे से सीखा ही। अपनी बीमारी की वजह से बीते कई सालों से स्टीफनलेक्चर नहीं दे पा रहे थे, लेकिन लोगों की जिज्ञासाओं और उनके सवालों के जवाब वे कई माध्यमों से देते रहे।’ हॉकिंग इस बात को जोर देकर कहते थे कि दुनिया किसी ईश्वर के इशारे पर नहीं चलती। भगवान कुछ नहीं है और संभावना है कि इस विश्व के अलावा भी कोई दुनिया हो। लोगों को हमेशा ये उनकी कल्पना ही लगी। स्टीफनके पास भी इसे साबित करने के लिए कोई पुख़्ता सबूत नहीं थे। लेकिन उन्होंने मरते दम तक इसे साबित करने की कोशिश की। उनकी इस ललक का सम्मान किया जाना चाहिए।

राहुल की लाइन से अलग बोल रहे हैं खडगे



- प्रेम प्रकाश

कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राहुल जहां भाजपा को भय और तोड़ने वाली पार्टी बता रहे हैं तो वहीं खडगे कांग्रेस को संघ-भाजपा से सीखने के लिए कह रहे हैं
   
यूपी की दो सीटों पर उपचुनाव में भाजपा की हार से देश में राजनीतिक पारा भले चढ़ा दिखता हो, पर इस गरमाहट से भारतीय राजनीति का चरित्र का बहुत बदलने जा रहा है, एेसा कम से कम फिलहाल तो नहीं दिख रहा। यूपी में अगला उपचुनाव कैराना सीट पर होगा। खबर है कि उपचुनावों से भागने वाली इस बार बसपा वहां भाजपा से भिड़ने के मूड है। फूलपुर और गोरखपुर के नतीजे अगर कैराना में भी दोहरा दिए जाते हैं तो भी यह सवाल अपनी जगह कायम रहेगा कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष की गोलबंदी का बड़ा आधार क्या होगा और इसकी अगुवाई क्या कांग्रेस करने में सफल होगी।
दिल्ली में अभी 2019 के चुनावी समर की तैयारी के लिए कांग्रेस का तीन दिवसीय सम्मेलन चल रहा है। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद यह कांग्रेस का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन है। हाल में जो भी चुनाव-उपचुनाव हुए हैं, उसमें कांग्रेस को शिकस्त ही खानी पड़ी है। आगे अगर कर्नाटक भी उसके हाथ से निकला तो बड़े सूबे के तौर पर उसके पास बस पंजाब रह जाएगा। इसलिए यूपी-बिहार की सोशल इंजीनियरिंग से बसपा-सपा औ राजद भले अपनी प्रांतीय पकड़ सुधार लें, इससे आगे वे विपक्ष के किसी राष्ट्रीय गठजोड़ की उम्मीद नहीं जगाते हैं। रही कांग्रेस की बात तो वह इस उम्मीद में भले है कि 2019 के पहले उसकी छतरी के नीचे सारा विपक्ष आ जाएगा। पर इसके लिए उसकी जो तैयारी और समझ है, वह एक फिर निराशा पैदा करती है।
पार्टी के अधिवेशन में लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील की है कि भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं की तरह वे भी कर्नाटक में घर-घर जाएं। जबकि इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि वे नफरत और डर फैलाने वाली नहीं बल्कि प्रेम और भरोसा जगाने वाली पार्टी हैं। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा की राजनीतिक संस्कृति में बुनियादी अंतर बताया। सवाल यह है कि एक ही पार्टी के भीतर नेताओं के बीच जब यह साफ नहीं है कि वे चुनावी मैदान में उतरने से पहले किन बातों पर जोर देंगे और चुनावों में जीत के लिए उनकी बुनियादी रणनीति क्या होगी, वह पार्टी अगर देश के आगे राजनीतिक बदलाव और सत्ता परिवर्तन की उम्मीद जगाती है, तो यह भी साफ दिख रहा है कि इस उम्मीद के खिलाफ विरोधाभास खुद उनके अपने भीतर है।   
एक तरफ तो अधिवेशन के उद्घाटन भाषण में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी यह कह गए कि आज देश में गुस्सा फैलाया जा रहा है, देश को बांटा जा रहा है। हिंदुस्तान के एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से लड़वाया जा रहा है। हमारा काम जोड़ने का है। कांग्रेस का हाथ निशान ही देश को जोड़ कर रख सकता है। दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी के दूसरे नेता यह कह रहे हैं कि चुनावी जीत के लिए उन्हें भाजपा-संघ का मॉड्यूल अपनाना चाहिए। साफ है कि कांग्रेस अगर अपने इतिहास के सबसे बुरे दिन में है तो यहां से उबरने का रास्ता उसे अभी तक नहीं सूझ रहा है।
जुमलों और भाषणों के भरोसे न तो राजनीति बदलाव संभव है और न ही सत्ता के शिखर तक पहुंचा जा सकता है। आज की तारीख में यह बात अगर देश में किसी राजनीतिक दल को सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है तो वह देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस है।