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Tuesday, August 19, 2014

अदम की शायरी का दम


अभी मैनेजर पांडे की कई किताबें आई हैं। उन्हीं में एक में अदम गोंडवी पर उनका लेख है। याद हो आया कि अखबार के दफ्तर में काम के दौरान ही अदम के देहांत की खबर मिली थी। अखबार के ही एक साथी ने दौड़कर आकर बताया था। इसे हिदी पत्रकारिता के दिलो-दिमाग में उतरा देशज संस्कार कहें या जमीनी सरोकार कि तमाम अखबारों ने अगले दिन अदम के देहांत की खबर को स्थान देना जरूरी समझा।
अदम जनता के शायर थे और अपनी शख्सियत में भी वे आमजन की तरह ही सरल और साधारण थे। पुराने गढ़न की ठेहुने तक की मटमैली छह-छत्तीस धोती, मोटी बिनाई का कुर्ता और गले में सफेद गमछा लपेटे अदम को जिन लोगों ने कभी मुशायरों-कवि सम्मेलनों में सुना होगा, उन्हें इस निपट गंवई शायर के मुखालफती तेवर के ताव और घाव आज ज्यादा महसूस हो रहे होंगे।
हिदी की कुलीन बिरादरी इस भाषा को किताबों और सभाकक्षों में चाहे जो स्वरूप देकर अपना सारस्वत धर्म निबाहे, इसकी आत्मा तो हमेशा लोक और परंपरा के मेल में ही बसती है। यही कारण है कि अपने समय की सबसे चर्चित और स्मृतियों का हिस्सा बनी काव्य पंक्तियों के रचयिता इस जनकवि को अदबी जमात ने अपने हिस्से के तौर पर मन से कभी नहीं कबूला।
अदम काफी हद तक कबीराई मन-मिजाज के शायर थे। इसलिए उन्हें इस बात का कभी अफसोस रहा भी नहीं कि उन्हें उनके समकालीन साहित्यकार और आलोचक किस खांचे में रखते हैं। कवि सम्मेलनों और मुशायरों का हल्का और बाजारू चरित्र उन्हें खलता तो बहुत था पर वे इन मंचों को जनता तक पहुंचने का जरिया मानकर स्वीकार करते रहे।
अपने करीब 63 साल के जीवन में उन्होंने हिदुस्तान की उम्मीद और तकदीर का वह हश्र सबसे ज्यादा महसूस किया जिसने आमजन के भरोसे और उम्मीद को कुम्हलाकर
रख दिया।
सत्ता, सियासत और दौलत के गठबंधन ने गांव और गरीब को जैसे और जितनी तरह से ठगा, उसका जीवंत चित्र अदम की शायरी का सबसे बड़ा सरमाया है। अपने समय में सत्ता के खिलाफ वे सबसे हिमाकती और मुखालफती आवाज थे।
'काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में/ उतरा है रामराज्य विधायक निवास में’, 'इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया/ सेक्स की रंगीनियां या गोलियां सल्फास की’, 'जो न डलहौजी कर पाया वो ये हुक्मरान कर देंगे/ कमीशन दो तो हिदुस्तान को नीलाम कर देंगे’....जैसे नारे और बगावती बयाननुमा पंक्तियों को लोगों की जुबान पर छोड़ जाने वाले अदम गोंडवी के बाद जनभावनाओं को निर्भीक अभिव्यक्ति
देने वाली जनवादी काव्य परंपरा की निडरता शायद ही कहीं नजर आए।
जहां तक कथन के साथ काव्य शिल्प का सवाल है तो हिदी में दुष्यंत कुमार के बाद अदम गोंडवी अकेले ऐसे शायर हैं, जिन्होंने न सिर्फ हिदी शायरी की जमीन का रकबा बढ़ाया बल्कि उसे मान्यता और लोकप्रियता भी दिलाई। हिदी के काव्य हस्ताक्षरों की कबीराई परंपरा में अदम नागार्जुन और त्रिलोचन की परंपरा के कवि थे।

Friday, August 15, 2014

आजादी, मीडिया, सिनेमा और समाज


आजाद भारत की एक खूबसूरती यह भी है कि यहां न सिर्फ मीडिया को गणतंत्र का चौथा खंभा माना गया है बल्कि वह स्वतंत्र भी है। यह अलग बात है कि इस स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही और जरूरी सरोकारों का साझा बनता-बिगड़ता और बदलता रहा है। राष्ट्रीय अस्मिता और स्वाधीनता की लौ जगाने वाली पत्रकारिता के माथे पर आज एक तरफ पेड न्यूज का कलंक है तो वहीं कारोबारी विस्तार के लिए हल्की और सनसनी से भर देने वाली खबरों का दबाव। वैसे अगर पलट कर देखें तो हिंदी में पत्रकारिता का विकास भी उसके बाकी तमाम रचनात्मक रूपों के तकरीबन साथ ही हुआ। भारतेंदु और द्बिवेदी के दौर की रचनात्मकता के साथ पत्रकारिता के विकास को अलग कर नहीं देखा जा सकता बल्कि बाद में अस्सी के दशक के आसपास जब खबर और साहित्य ने अलग से अपनी जगह घेरनी शुरू की तो भी दोनों जगह कलम चलाने वालों का गोत्र एक ही रहा। फिर यह विभाजन अलगाववादी न होकर लोकतांत्रिक तौर पर एक-दूसरे के लिए भरपूर सम्मान, स्थान और अवसर मुहैया कराने के लिए था।
यही कारण रहा कि इस दौर में एक तरफ जहां धूम मचाने वाली आधुनिक धज की साहित्यिक पत्रिकाओं ने ऐतिहासिक सफलता पाई, तो वहीं उस दौरान की समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने लोकप्रियता और श्रेष्ठता के सार्वकालिक मानक रचे। खासतौर पर देशज भाषा, संवेदना और चिता के स्तर पर इस दौर की हासिल मानकीय श्रेष्ठता ने आधुनिक हिदी पत्रकारिता की संभावना की ताकत को जाहिर किया। राष्ट्रीय आंदोलन के बाद स्वतं`योत्तर भारत का यह सबसे सुनहरा दौर था हिदी पत्रकारिता के लिए और विशुद्ध साहित्य से आगे की वैकल्पिक रचनात्मकता के लिए। इसके बाद आया ज्ञान को सूचना और खबर की तात्कालिकता में समाचार की पूरी अवधारणा को तिरोहित करने वाला ग्लोबल दौर, जिसमें एक तरफ नजरअंदाज हो रही सामाजिक और सांस्कृतिक अस्मिताओं का संघर्ष सतह पर आया तो वहीं चेतना और अभिव्यक्ति के पारंपरिक लोक के लोप का खतरा बढ़ता चला गया।

आजादी बाद के दो दशक

आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण की अलख तकरीबन दो दशकों तक हिदी में कलम के सिपाहियों ने उठाई। पर यहां यह समझना जरूरी है कि हिदी की प्रखरता का एक मौलिक तेवर विरोध और असहमति है। दशकों की औपनिवेशिक गुलामी से मुठभेड़ कर बनी भाषा की यह ताकत स्वाभाविक है। इसलिए अपने यहां नेहरू युग के अंत होते-होते राष्ट्र निर्माण की एक 'असरकारी’ और वैकल्पिक दृष्टि की खोज हिदी के लेखक-पत्रकार करने लगे और उन्हें डॉ. राममनोहर लोहिया की समाजवादी राह मिली। राष्ट्रीय आंदोलन के बाद हिदी में यह रचनात्मक प्रतिबद्धता से सज्जित सिपाहियों की पहली खेप थी। जिन लोगों ने 'दिनमान’ के जमाने में फणीश्वरनाथ रेणु जैसे साहित्यकारों की रपट और लेख पढ़े हैं, उन्हें मालूम है कि अपने हाल को बताने के लिए भाषाई औजार भी अपने होने चाहिए। बाद में लेखकों-पत्रकारों के इस जत्थे में जयप्रकाश आंदोलन से प्रभावित ऊर्जावान छात्रों की खेप शामिल हुई।
कलम से आंदोलन
दुर्भाग्य से पत्रकारिता को 'मिशन’ और 'प्रोफेशन’ बताने वाली उधार की समझ रखने वाले आज मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींचने से बाज नहीं आते और देश-समाज का जीवंत हाल बताने वालों को उनकी सीमाओं से सबसे पहले अवगत कराते हैं। जबकि अपने यहां लिखने-पढ़ने वालों की एक पूरी परंपरा है, जिनकी वैचारिक प्रतिबद्धता महज 'कागद कारे’ करने से कभी पूरी नहीं हुई। बताते हैं कि चंडीगढ़ में प्रभाष जोशी नए संवाददाताओं की बहाली के लिए साक्षात्कार ले रहे थे। एक युवक से उन्होंने पूछा कि पत्रकार क्यों बनना चाहते हो? युवक का जवाब था, 'आंदोलन करने के लिए। परिवर्तन की ललक हो तो हाथ में कलम, कुदाल या बंदूक में से कोई एक तो होना ही चाहिए।’ कहने की जरूरत नहीं कि युवक ने प्रभाष जी को प्रभावित किया। आज किसी इंटरव्यू पैनल के आगे ऐसा जवाब देने वालों के लिए अखबार की नौकरी का सपना कितना दूर चला जाएगा, पता नहीं।

न्यू मीडिया

आखिर में बात सूचना तकनीक के उस भूचाली दौर की जिसमें कंप्यूटर और इंटरनेट ने भाषा और अभिव्यक्ति ही नहीं विचार के एजेंडे भी अपनी तरफ से तय करने शुरू कर दिए हैं। अंग्रेजी के लिए यह भूचाल ग्लोबल सबलता हासिल करने का अवसर बना तो हिदी की भाषाई ताकत को सीधे वरण, अनुकरण और अनुशीलन के लिए बाध्य किया जा रहा है।
कमाल की बात है कि इस मजबूरी के गढ़ में भी पहली विद्रोही मुट्ठी तनी तो उन हिदी के कस्बाई-भाषाई शूरवीरों ने जिन्हें ग्लोब पर बैठने से ज्यादा ललक अपनी माटी-पानी को बचाने की रही। जिसे आज पूरी दुनिया में 'न्यू मीडिया’ कहा जा रहा है, उसका हिदी रूप ग्लोबल एकरूपता की दरकार के बावजूद काफी हद तक मौलिक है।

Monday, August 11, 2014

और सैम हो गए विश्वकर्मा


अमेरिका में जब बराक ओबामा राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने में सफल हुए थे, तो वहां की और भारत की स्थितियों को राजनैतिक और बौद्धिक जमात के बीच कई तुलनात्मक नजरिए सामने आए। बार-बार अमेरिका के उदाहरण को सामने रखकर यह समझने की कोशिश की गई कि भारत उस उदार और विकसित राजनीतिक-सामाजिक स्थिति तक पहुंचने से कितनी दूर है, जब हम भी अपने यहां एक दलित को या एक मुसलमान को प्रधानमंत्री पद पर बैठा देखेंगे। जो बात ज्यादा भरोसे से और तार्किक तरीके से समझ में आई वह यही कि विकास और संपन्नता मध्यकालीन और जातीय बेडिèयों को तोड़ने के सबसे मुफीद औजार हंै। अमेरिका में ये औजार सबसे ज्यादा तेजी से काम कर रहे हैं। इसलिए वहां चेंज को अलग से चेज करने की जरूरत अब नहीं है। पर क्या भारत भी अपनी विकासयात्रा में उन्हीं सोपानों पर पहुंच रहा है, जहां चेंज कोई चैलेंज न होकर एक स्वाभाविक स्थिति बन जाती है। शायद नहीं।
दरअसल, हम बात करना चाह रहे हैं 2०12 में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों की। इस साल हुए आम चुनाव में यूपी के चुनावी गणित कितने काम आए, सबके सामने है। पर तब सभी सियासी पार्टियां इसे दिल्ली की सत्ता के सेमीफाइनल के तौर पर ही लड़ रही थीं। आरक्षण का खुर्शीदी-बेनी खेल पहले ही बोतल से बाहर आ गया तो रही-सही कसर जातीय राजनीति को लेकर खेले गए नंगे खेल ने पूरी कर दी।
क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले दलों की मजबूरी तो छोड़ दें, कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय प्रभाव और विस्तार वाले दलों ने भी विकास व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को छोड़कर क्षेत्र और जाति की राजनीति पर अपना यकीन ज्यादा दिखाया। बाबू सिह कुशवाहा मामले में भाजपा ने जहां आंतरिक विरोध तक को सुनना गंवारा नहीं किया, वहीं रियल और फेयर पॉलिटिक्स के हिमायती राहुल गांधी ने चुनावी सभा में सैम पैत्रोदा को विश्वकर्मा जाति का बताकर केंद्र में अपने पिता राजीव गांधी के कार्यकाल के आईटी विकास को जातीय तर्कों पर उतारने को मजबूर हुए।
विकास को सामाजिक न्याय की समावेशी संगति पर खरा उतारना तो समझ में आता है पर इसे सीधे-सीधे जातीयता की जमीन पर ला पटकना खतरनाक है। इस लिहाज से कांग्रेस पार्टी की इस हिमाकत को तब सबसे बड़ा मर्यादा उल्लंघन ठहराया गया था, जब उसने देश में आईटी क्रांति के प्रणेता रहे सैम पैत्रोदा को जातीय राजनीति के चौसर पर पासे की तरह फेंका। यह गलती नहीं बल्कि कांग्रेस की सोची-समझी चुनावी रणनीति थी, यह तब ज्यादा समझ में आया जब पार्टी ने अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी करते हुए सैम को मीडिया से मुखातिब कराया। सैम अगर सबके सामने कैलकुलेटेड ढिठाई से यह कहते कि 'मैं बढ़ई का बेटा हूं और अपनी जाति पर मुझे फL है’, तो कांग्रेस का उनको लेकर खेला गया चुनावी खेल तो समझ में आता है पर सैम को क्या पड़ी थी कि वह खुद को इस खेल में इस्तेमाल हो जाने दिया, समझना थोड़ा मुश्किल है। क्या सैम की यह 'बढ़ईगिरी’ विकास को भी जातिगत शिनाख्त देने की दरकार को खतरनाक अंजामों तक ले जाने के लिए थी। राजीव गांधी के जमाने का आईटी 21वीं सदी के एक दशक बीतते-बीतते कहां पहुंच गई, आप नहीं समझ पा रहे तो राहुल बाबा से मिलें।

Monday, August 4, 2014

अण्णा नहीं हो सके शर्मीला


हम अपने दौर को लेकर लाख खफा हों। कोफ्त से भरे हों। पर मौजूदा दौर के कसीदे पढ़ने वाले भी कम नहीं। यह और बात है कि ये कसीदाकार वही हैं, जिन्हें हमारे देशकाल ने कभी अपना प्रवक्ता नहीं माना। दरअसल, 'चरम भोग के परम दौर’ में मनुष्य की निजता को स्वच्छंदता में रातोंरात जिस तरह बदला, उसने समय और समाज की एक क्रूर व संवेदनहीन नियति कहीं न कहीं तय कर दी है। ऐसे में एक दुराग्रह और पूर्वाग्रह से त्रस्त दौर में चर्चा अगर सत्याग्रह की हो तो यह तो माना ही जा सकता है कि मानवीय कल्याण और उत्थान का मकसद अब भी बहाल है। दरअसल, हम बीते तीन-चार सालों के पन्ने फिर से उलट रहे हैं। अण्णा आंदोलन आज एक प्रमुख राष्ट्रीय घटनाक्रम का नाम है। इस आंदोलन से देश एक बार फिर से इस बात से अवगत हुआ कि अपना पक्ष रखने और 'असरकारी’ विरोध का 'सत्याग्रह’ रखने वालों की परंपरा देश में खत्म नहीं हुई है। हालांकि इसके साथ कुछ सवाल भी उठने लाजिम हैं जिनके जवाब जरूर तलाशे जाने चाहिए।
आंदोलन के दिनों में सामाजिक कार्यकताã इरोम शर्मिला ने अण्णा हजारे से अपने एक दशक से लंबे अनशन के लिए समर्थन मांगा था। इरोम मणिपुर में विवादास्पद सशस्त्र बिल विशेषाधिकार अधिनियम की विरोध कर रही थीं। उनके मुताबिक इस अधिनियम के प्रावधान मानवाधिकार विरोधी हैं, बर्बर हैं। यह सेना को महज आशंका के आधार पर किसी को मौत के घाट उतारने की कानूनी छूट देता है। इरोम खुद इस बर्बर कार्रवाई की गवाह रही हैं। यही कारण है कि उन्होंने इस विवादास्पद अधिनियम को वापस लेने की मांग को आजीवन प्रण का हिस्सा बना लिया है। दुनिया के इतिहास में अहिसक विरोध का इतना लंबा चला सिलसिला और वह भी अकेली एक महिला द्बारा अपने आप में एक मिसाल है।
इरोम को उम्मीद थी कि आज अण्णा हजारे का जो प्रभाव और स्वीकृति सरकार और जनता के बीच है, उससे उनकी मांग को धार भी मिलेगी और उसका वजन भी बढ़ेगा। हालांकि इस संदर्भ का एक पक्ष यह भी रहा कि इरोम ने भले अण्णा के समर्थन की दरकार जाहिर कर रही हों, पर उन्हें भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चरित्र को लेकर आपत्तियां भी रहीं। वैसे ये आपत्तियां वैसी नहीं हैं जैसी लेखिका अरुंधति राय को रही हैं।
असल में सत्याग्रह का गांधीवादी दर्शन विरोध या समर्थन से परे आत्मशुद्धि के तकाजे पर आधारित है। गांधी का सत्याग्रह साध्य के साथ साधन की कसौटी को भी अपनाता है। ऐसे में लोकप्रियता के आवेग और जनाक्रोश के अधीर प्रकटीकरण से अगर किसी आंदोलन को धार मिलती हो कम से कम वह दूरगामी फलितों को तो नहीं ही हासिल कर सकता है।
दिलचस्प है कि अहिसक संघर्ष के नए विमर्शी सर्ग में अण्णा के व्यक्तिगत चरित्र, जीवन और विचार पर ज्यादा सवाल नहीं उठे हैं। पर उनके आंदोलन के घटनाक्रम को देखकर तो एकबारगी जरूर लगता है कि देश की राजधानी का 'जंतर मंतर’ और मीडिया के रडार से अगर इस पूरी मुहिम को हटा लिया जाता तो भी क्या घटनाक्रम वही होते जिस प्रकार से ये घटित हुए हैं। ...और यह भी कि क्या इसी अनुकूलता और उपलब्धता की परवाह इरोम ने चूंकि नहीं की तो उनके संघर्ष का सिलसिला लंबा खिचता जा रहा है।

Monday, July 28, 2014

तुम सीटी बजाना छोड़ दो


सीटियों का जमाना लदने को है। सूचना क्रांति ने सीटीमारों के लिए स्पेस नहीं छोड़ा है। इसी के साथ होने वाला है युगांत संकेत भाषा के सबसे लंबे खिचे पॉपुलर युग का। बहरहाल, कुछ बातें सीटियों और उसकी भूमिका को लेकर। कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं पर पहली सीटी किसी लड़की ने नहीं बल्कि किसी लड़के ने किसी लड़की के लिए ही बजाई होगी। बाद के दौर में सीटीमार लड़कों ने सीटी के कई-कई इस्तेमाल आजमाए। जिसे आज ईव-टीðजग कहते हैं, उसका भी सबसे पुराना औजार सीटियां ही रही हैं। वैसे सीटियों का कैरेक्टर शेड ब्लैक या व्हाइट न होकर हमेशा ग्रे ही रहा है।
बात किशोर या नौजवान उम्र की लड़के-लड़कियों की करें तो सीटी ऐसी कार्रवाई की तरह रही है, जिसमें 'फिजिकल’ कुछ नहीं है यानी गली-मोहल्लों से शुरू होकर स्कूल-कॉलेजों तक फैली गुंडागर्दी का चेहरा इतना वीभत्स तो कभी नहीं रहा कि असर नाखूनी या तेजाबी हो। फिर भी सीटियों के लिए प्रेरक -उत्प्रेरक न बनने, इससे बचने और भागने का दबाव लड़कियों को हमारे समाज में लंबे समय तक झेलना पड़ा है। सीटियों का स्वर्णयुग तब था जब नायक और खलनायक, दोनों ही अपने-अपने मतलब से सीटीमार बन जाते थे।
इसी दौरान सीटियों को कलात्मक और सांगीतिक शिनाख्त भी मिली। किशोर कुमार की सीटी से लिप्स मूवमेंट मिला कर राजेश खन्ना जैसे परदे के नायकों ने रातोंरात न जाने कितने दिलों में अपनी जगह बना ली। आज भी जब नाच-गाने का कोई आइटम नुमा कार्यक्रम होता है तो सीटियां बजती हैं। स्टेज पर परफॉर्म करने वाले कलाकारों को लगता है कि पब्लिक का थोक रिस्पांस मिल रहा है। वैसे सीटियों को लेकर झीनी गलतफहमी शुरू से बनी रही है। संभ्रांत समाज में इसकी असभ्य पहचान कभी मिटी नहीं। यूं भी कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय के बदले दौर में भी इस कथित अमर्यादा का शुद्धिकरण कभी इतना हुआ नहीं कि सीटियों को शंखनाद जैसी जनेऊधारी स्वीकृति मिल जाए। सीटियों से लाइन पर आए प्रेम प्रसंगों के कर्ताधताã आज अपनी गृहस्थी की दूसरी-तीसरी पीढ़ी की क्यारी को पानी दे रहे हैं।
रेट्रो दौर की मेलोड्रामा मार्का कई फिल्मों के गाने प्रेम में हाथ आजमाने की सीटीमार कला को समर्पित हैं। एक गाने के बोल तो हैं- 'जब लड़का सीटी बजाए और लड़की छत पर आ जाए तो समझो मामला गड़बड़ है।’ 1951 में आई फिल्म 'अलबेला’ में चितलकर और लता मंगेशकर की युगल आवाज में 'शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो’ तो आज भी सुनने को मिल जाता है।
मॉरल पुलिसिग हमारे समाज में अलग-अलग रूप में हमेशा से रही है और इसी पुलिसिग ने सीटी प्रसंगों को गड़बड़ या संदेहास्पद मामला करार दिया। चौक-चौबारों पर कानोंकान फैलने वाली बातें और रातोंरात सरगर्मियां पैदा करने वाली अफवाहों को सबसे ज्यादा जीवनदान हमारे समाज को कथित प्रेमी जोड़ों ने ही दिया है। सीटियां आज गैरजरूरी हो चली हैं। मॉरल पुलिसिग का नया निशाना अब पब और पार्क में मचलते-फुदकते लव बर्डस हैं। सीटियों पर से टेक्नोफ्रेंडी युवाओं का डिगा भरोसा इंस्टैंट मैसेज, रिगटोन और मिसकॉल को ज्यादा भरोसेमंद मानता है।

Monday, July 21, 2014

कश्मीरी आशा और बिग बी


कश्मीर का मुद्दा एक बार फिर गरमाया है। याद आता है तकरीबन तीन साल पहले का एक वाकया। अपने महानायक तब इंग्लैंड के दौरे पर थे। ऑक्सफोर्ड की लाइब्रेरी में मैग्ना कार्टा चार्टर देखकर अमिताभ बच्चन जब अभिभूत होते हैं तो अखबारों, टीवी चैनलों के लिए यह न छोड़ी जा सकने वाली खबर थी। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है कि पूरब में खड़े होकर कोई पश्चिम को सूर्य का घर माने और उसकी लाली से अपनी चेतना और इतिहास बोध को रंग ले।
दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र की उन जड़ों की जिसकी डालियों पर झूला डालने वाले परिदे आपको आज पूरी दुनिया में मिल जाएंगे। पर लोकतंत्र महज एक शासनतंत्र नहीं, एक जीवनशैली और मानवीय इच्छाशक्ति भी है। अगर यह बोध और सोच किसी को भावनात्मक अतिरेक लगे तो उसे भारत के पांच लाख से ज्यादा गांवों के सांस्कृतिक गणतंत्र की परंपरा से परिचित होना चाहिए। परंपरा का यह प्रवाह आज जरूर पहले की तरह सजल नहीं रहा, पर है वह आज भी कायम अपने जीवन से भरे बहाव के साथ।
अमिताभ बच्चन जब आधुनिक विश्व में लोकतंत्र के ऐतिहासिक उद्भव की गाथा को देख-सुनकर गदगद हो रहे थे, उसी समय देश के कुछ सूबों में पंचायत के चुनाव हो रहे थे। इन सूबों में जम्मू कश्मीर भी शामिल था। यह एक बड़ा अनुष्ठान था। लेकिन तब विधानसभा चुनावों, भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालती कार्रवाई और नागरिक समाज की मांगों और आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन के खात्मे के शोरगुल में इसकी तरफ कम ही लोगों का ध्यान गया। अलबत्ता स्थानीय लोगों की दिलचस्पी जरूर इसमें बनी रही।
दिलचस्प तो यह रहा कि अशांत घाटी में इन चुनावों का औपचारिक निर्वाह ही जहां बड़ी कामयाबी ठहराई जा सकती थी, वहां अस्सी फीसद तक मतदान हुए। यही नहीं बिहार जैसे सूबे में जहां पंचायत की परंपरा को ऐतिहासिक मान्यता हासिल है, वहां भी ये चुनाव तब संगीनों के साए में होने के बावजूद खून के छीटों से बचे नहीं रहे थे। जबकि जम्मू-कश्मीर में ये चुनाव तकरीबन शांतिपूर्ण संपन्न हुए थे।
दरअसल, पंचायत के बहाने इस चुनाव में घाटी के लोगों ने न सिर्फ लोकतांत्रिक सरोकारों की अपनी मिट्टी को एक बार फिर से तर किया बल्कि दुनिया के आगे यह साफ भी किया था कि उनका जीवन, उनका समाज, उनकी संस्कृति उतनी उलझी या बंटी हुई नहीं है, जितनी बताई या समझाई जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कहीं से मुमकिन नहीं था कि कश्मीरी पंडित परिवार की एक महिला उस गांव से पंच चुनी जाती, जो पूरी तरह मुस्लिम बहुल है। यहां विख्यात पर्यटन स्थल गुलमर्ग जाने के रास्ते में एक छोटा सा गांव है- वुसान।
आशा इसी गांव से पंच चुनी गई थी जबकि यहां से इस पद के लिए मैदान में उतरी वह अकेली कश्मीरी पंडित महिला थी। इस सफलता को आपवादिक या कमतर ठहराने वालों के लिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि घाटी से 199० के करीब दो लाख कश्मीरी पंडित परिवारों को पलायन करना पड़ा था। दुर्भाग्यपूणã है कि देश में संसदीय परंपरा के धुरर्Þ बिखेर देने वाली खबरें तो मीडिया की आंखों की चमक बढ़ा देती हैं पर इन परंपराओं की जमीन तर करने वाली खबरों पर हम गौर नहीं फरमाते।

Wednesday, July 9, 2014

मां, ममता और दहकता इराक


इराक फिर से त्रासद हिसा की जद में है। इस बार हिसा का लंपट यथार्थ ज्यादा खतरनाक इसलिए भी है कि उसकी जड़ें बाहर कम इराक में ज्यादा हैं। एक देश और उसके साथ वहां के लोगों की बार-बार बर्बर हिसा से मुठभेड़ आधुनिक संवेदना से जुड़े सरोकारों को अंदर तक झकझोर देता है।
याद आता है वह दौर जब अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश, इराक को जंग के मैदान में सद्दाम हुसैन समेत अंतिम तौर पर रौंदने के लिए उतावले थे। अखबार के दफ्तर में रात से खबरें आने लगीं कि अमेरिका बमबारी के साथ इराक पर हमला बोलने जा रहा है। इराक से संवाददाता ने खबर भेजी कि वहां के प्रसूति गृहों में मांएं अपने बच्चों को छोड़कर भाग रही हैं।
खबर की कॉपी अंग्रेजी में थी, लिहाजा आखिरी समय में बिना पूरी खबर पढ़े उसके अनुवाद में जुट जाने का अखबारी दबाव था। अनुवाद करते समय जेहन में लगातार यही सवाल उठ रहा था कि ममता क्या इतनी निष्ठुर भी हो सकती है कि वह युद्ध जैसी आपद स्थिति में बच्चों की छोड़ सिर्फ अपनी फिक्र करने की खुदगर्जी पर उतर आए।
पूरी खबर से गुजरकर यह अहसास हुआ कि यह तो ममता की पराकाष्ठा थी। प्रसूति गृहों में समय से पहले अपने बच्चों को जन्म देने की होड़ मची थी। जिन महिलाओं की डिलीवरी हो चुकी थी, वह अपने बच्चों को छोड़कर जल्द से जल्द घर पहुंचने की हड़बड़ी में थीं क्योंकि उन्हें अपने दूसरे बच्चों और घर के बाकी सदस्यों की फिक्र खाए जा रही थी। वे अस्पताल में नवजात शिशुओं को छोड़ने के फैसले इसलिए नहीं कर रही थीं कि उनके आंचल का दूध सूख गया था। असल में युद्ध या बमबारी की स्थिति में कम से कम वह अपने नवजातों को नहीं खोना चाहती थीं। उन्हें भरोसा था कि अमेरिका इराक के खिलाफ जब हमला बोलेगा तो कम से कम इतनी नैतिकता तो जरूर मानेगा कि वह अस्पतालों और स्कूलों को बख्श दे।
युद्ध छिड़ने से पहले प्रीमैच्योर डिलीवरी का महिलाओं का फैसला भी इसलिए था कि बम धमाकों के बीच कहीं गर्भपात जैसे खतरों का सामना उन्हें न करना पड़े। सचमुच मातृत्व संवेदना की परीक्षा की यह चरम स्थिति थी जिससे गुजरते हुए इराकी महिलाएं मानवता का सर्वथा भावपूर्ण सर्ग रच रही थीं।
आज जब फिर इराक में धमाके हो रहे हैं, लोगों की जानें जा रही हैं, सड़कें और पुल उड़ाए जा रहे हैं, तो इराक युद्ध के पुराने अनुभव आंखों में सजल हो जाते हैं। इस साल हम पहले विश्व युद्ध से एक सदी आगे निकल गए हैं। पर संवेदना और करुणा के मामले में हमारा 'ग्लोबल उछाल’ कितना पिछड़ा है, कहने की जरूरत नहीं। जीवन और समाज के प्रति सोच ने आज एक बर्बर कार्रवाई की शक्ल ले ली है और इसकी सबसे ज्यादा शिकार हैं महिलाएं।
आधी दुनिया ने अपने हक और सुरक्षा के लिए पिछले कुछ सालों में अपनी आवाजें जरूर तेज की हैं। इसके लिए एक तरह की गोलबंदी भी हर तरफ नजर आती है। लेकिन महिलाओं को देखने-समझने और उनके साथ सलूक की लीक इतनी हिसक और बर्बर हो चुकी है कि उस पर खुलकर और पारदर्शी तरीके से बात करने का साहस हममें बचा ही नहीं है। पर वार और ग्लोबल ग्रोथ के साझे के दौर का यह महिला विरोधी यथार्थ हमें बार-बार सामने से आईना दिखाएगा।