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Thursday, April 17, 2014

हांक का नहीं हुंकार का लोकतंत्र चाहिए


बिहार आंदोलन के दिनों में जेपी ने आंदोलनकारियों के लिए पहला कार्यक्रम दिया था मौन जुलूस का। जेपी इस मौन जुलूस के जरिए अपने आंदोलन की अहिंसक लीक को तय करना चाहते थे। हुआ भी ऐसा ही। संपूर्ण क्रांति आंदोलन के पुराने साथी बताते हैं कि मौन जुलूस से पहले रातभर इस बात के लिए छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथी मशक्कत करते रहे कि कल जब लोग मुंह पर पट्टी बांधे सरकार के खिलाफ उतरेंगे तो उनका संदेश क्या होगा। आखिरकार दो नारे तय हुए। पहला, 'क्षुब्ध हृदय, बंद जुबान’ और दूसरा, 'हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’ अगले दिन मौन जुलूस में शामिल होने वालों ने इन्हीं नारों की तख्तियां हाथों में उठा रखी थीं। 
दिलचस्प है कि जुलूस में सबको शामिल होने की इजाजत नहीं थी। इसके लिए एक फार्म भरना था, जिसके जरिए लोकतंत्र में अहिंसक संघर्ष के प्रति निष्ठा की घोषणा करनी थी। 
तब इस मौन जुलूस को कवर करने आए बीबीसी के संवाददाता मार्क टुली अपने अनुभव को शेयर करते हुए बताते हैं कि उनके लिए मुश्किल यह थी कि उन्हें रेडियो के लिए रिपोर्ट करनी थी। इसलिए विजुअल सपोर्ट उनके लिए था नहीं और रही बात जुलूस की तो वह मौन थी इसलिए किसी आंदोलनकारी से भी बात नहीं कर सकते थे। इस जुलूस में साहित्यकारों से लेकर सर्वोदयी जमात के कई बड़े नाम शामिल थे। लिहाजा, उन्हें सड़कों पर सिर झुकाए और मुंह पर काली पट्टी बांधे कतारबद्धबढ़ते देख आसपास के लोग भी काफी शांत थे। 
ऐसे में जुलूस की खबर रेडियो के श्रोताओं तक पहुंचाने के लिए टुली ने अपना माइक आंदोलनकारियों के पांव के करीब किया। जुलूस इतना अनुशासित थी कि तकरीबन एक साथ उनके कदम उठ और गिर रहे थे। यह आवाज कैमरे ने कैच की और कहा गया कि विरोध का संकल्प इतना अहिंसक, अनुशासित और धैर्य से भरा था, इसका अनुभव भारत गांधी के स्वाधीनता संघर्ष के बाद पहली बार कर रहा है। बाद में इस आंदोलन को दूसरी आजादी का आंदोलन कहा भी गया। 
कहने का कुल मतलब सिर्फ इतना कि विरोध और विकल्प की अहिसक राजनीति की बात करना आसान हो सकता है पर इस पर अमल खासा चुनौतीपूर्ण है। अण्णा के आंदोलन से निर्भया कांड तक देश की सड़कों पर जो गुस्सा फूटा उसमें नागरिक कार्रवाई के लोकतांत्रिक रास्तों के मुहाने नए सिरे से तो जरूर खोले पर साथ में कुछ सवाल भी खड़े किए। एक सवाल तो यही कि विचार और आचरण के साझे के बिना क्या कोई कार्रवाई विकल्प या बदलाव का आंदोलनकारी संकल्प बन सकती है। 
पिछले महीनों में टीवी पर होने वाली 'विंडो विमर्श’में विचारधारा के सवाल भ्रष्टाचार के विरोध की दरकार के सामने खारिज होते जा रहे हैं। अलबत्ता आम आदमी पार्टी की सियासी जमात में शामिल कुछ नेता जरूर इस तरह की बात कहने के बजाय गांधी-लोहिया और जेपी की वैचारिक विरासत और सीख की बात कहते हैं। पर ये बातें अब तक इस नई नवेली पार्टी की वैचारिक मन:स्थिति को तय करने में असमर्थ रही है। यह कमी कार्यकताã प्रशिक्षण आदि के स्तर पर भी देखी जा सकती है। 
किसी देश का लोकतंत्र अगर अपने शील-स्वभाव को लेकर ही दुविधा में हो तो यह कोई अच्छी स्थिति तो कतई नहीं है। ओपिनियन पोल से लेकर नेताओं के चुनावी दौरे में दस-दस लाख की भीड़ के जुटने की बातोंको लेकर जिरह करके हम देश के लोकतांत्रिक मानस को कोई सार्थक बनावट नहीं दे सकते। 
यहां एक और बात समझने की है कि सूचना का दौर दरअसल प्रचार का दौर है। प्रचार का सच अकसर 'बड़ा धोखा’ होता है। ओपिनियन पोल से लेकर वर्चुअल वर्ल्ड की दोस्ती और प्यार तक इस धोखे के आज हजारों अफसाने आपको मिल जाएंगे। धोखे के इस खेल में एक बड़ा रोल अदा किया है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने। तस्वीर और आवाज के मेल से जो चौबीसों घंटे हमारे जेहन में उतरता है, उससे ही हमारी सोच-समझ, हमारी मन:स्थिति आज कहीं न कहीं तय होने लगी है। ऐसे में सब कुछ एक दिशा में बढ़ता, एक रंग में रंगा अगर दिखने लगे तो फिर विकल्प, विरोध या बदलाव के लिए गुंजाइश कहां रह जाती है। 
हिंदी के एक बड़े साहित्यकार हैं। वे खूब टीवी देखते हैं और ज्यादातर हॉलीवुड की क्लासिक फिल्में। पर इस दौरान म्यूट का बटन दबाए रखते हैं। पूछने पर उन्होंने कहा कि ऐसा वह इसलिए करते हैं ताकि घटना को अपनी कल्पना और संवेदना के शब्द दे सकें। असल में यह टीवी के वायरल इफेक्ट को कम करने का प्रयोग तो है ही, अपनी सोच-समझ और कल्पना की स्वायत्तता को बहाल रखने की कोशिश भी। पर यह अवेयर एक्शन कितनों के वश की बात है। आमतौर पर तो लोग इस वायरल इफेक्ट से पीड़ित होकर ही खुश हैं। इस बार के आम चुनाव की 'लहर’ और 'डर’ के जरिए जो वायरल इमेज टीवी मीडिया के द्बारा खड़ी की जा रही है, वह वाकई काफी खतरनाक है। यह देश और समाज को सूचना और प्रचार के नाम पर वास्तविकता से काटने जैसा अपराध है। इस आपराधिक स्वीकृति के बाद जो इबारत तारीख के पन्नों पर दर्ज होगी, दरअसल वही इस चुनाव का हासिल होगा। एक बात और यह कि समर्थन को विरोध पर भारी बताना और बहुमत के आगे अल्पमत की दास जैसी स्थिति न तो लोकतंत्र का सही भाष्य है और न ही उसका अभ्यास। एक व्यवस्था को चलाने की दरकार के लिए बहुमत को जरूर नियामक संस्था या सरकार के गठन का अधिकार दिया गया है, पर इसका यह कतई मतलब नहीं कि इस संस्था की जवाबदेहियों के रकबे से विरोधी बाहर रहेंगे। दरअसल, लोकतंत्र में बहुमत का मतलब आगे बढ़कर सबको साथ लेकर चलने की पहल का नाम है, न कि जो छूट गए उन्हें यह एहसास दिलाने का कि विरोध का खामियाजा तो उठाना ही पड़ेगा। यों भी कह सकते हैं कोई व्यवस्था तब तक तानाशाही ही मानी जाती है,जब तक एक हांक पर सब कुछ चलता है। हांक के खिलाफ हुंकार भरने के जज्बे का नाम ही लोकशाही है। इसीलिए पश्चिमी अवधारणा में जहां डेमोक्रेसी की कार्यकारी बनावट को पिरामिड की शक्ल में दिखाया गया है, वहीं गांधी ने इसके लिए ओसएनिक सर्किल की बात कही। यानी हर लहर अगली लहर को जन्म दे और इस तरह व्यक्ति से समष्टि की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया न सिर्फ संवेदनशील हो बल्कि बिंदु से लेकर सिंधु तक सभी इसमें अपने को महत्वपूर्ण मानें। 
बहरहाल, आज की विद्रूपताओं को देखते हुए ये तो काफी दूर की बातें हो गईं, अभी तो इम्तिहान सिर्फ इस बात का है कि मेल जोल व गठबंधन के दौर की भारतीय राजनीति और उससे शक्ल लेने वाला लोकतंत्र महज एक हांक से चलेगा या ललकारी हुंकार से। 


Wednesday, April 9, 2014

रायबरेली में अजय

 प्रेम प्रकाशअनजाने वे कल भी नहीं थे पर अब अचानक चर्चित हो गए हैं। टीवी चैनलों पर बैठकर इंटरव्यू दे रहे हैं। गूगल सर्च इंजन पर उनके नाम के साथ रायबरेली जोड़ दें तो 65 हजार से ऊपर वेब पेज खुल जाते हैं। भारतीय विज्ञापन की दुनिया के पुरोधा कहे जाने वाले एलेक पद्मसी के शब्दों में कहें तो यह लाइफ का एक ऐसा टर्न है जिससे आपकी शख्सियत का टर्नओवर आसमान छूने लगता है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं जाने-माने वकील अजय अग्रवाल की। इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें रायबरेली से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ उतारा है। भाजपा का यह फैसला सोनिया के लिए कितनी चुनौती भरा है, इसके विश्लेषण की बहुत दरकार नहीं है। अन्य पार्टियां भी अजय की उम्मीदवारी को सोनिया के खिलाफ बहुत गंभीरता से नहीं ले रही हैं। पर अगर बात करें अग्रवाल की तो वे रायबरेली के चुनाव में अभी से अपने को अजय मानकर चल रहे हैं।
दरमियाना कद-काठी। आमतौर पर मुखरता के साथ बातें करने वाले। पर आत्मविश्वास से ज्यादा बड़बोले अजय अग्रवाल रायबरेली की चुनावी जंग में उतरने से पहले तब-तब चर्चा में आते रहे जब-जब देश में भ्रष्टाचार का कोई मामला खुला। अपने करीबियों के बीच पीआईएल के चैंपियन माने जाने वाले अग्रवाल बोफोर्स स्कैंडल से लेकर अब्दुल करीम तेलगी के फर्जी स्टांप घोटाले तक में अदालत में याचिकाकर्ता हैं। बीते कुछ सालों में कई बार मीडिया की सुर्खियों में आए सीडब्ल्यूजी घोटाला और बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ ताज कोरिडोर मामले को भी अदालत तक ले जाने वाले वही हैं। उन्होंने सिर्फ इन मामलों पर अदालती कार्यवाही के रास्ते खोले बल्कि आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई को भी मुमकिन अंजाम तक पहुंचाकर दम लिया।
इस तरह से 49 बरस के अग्रवाल की एक इमेज भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वाले एक योद्धा की भी बनती है। पर शायद खुद अग्रवाल को अपनी पहचान के इतने सीमित रकबे पर संतोष नहीं। तभी तो जैसे ही रायबरेली से उनके भाजपा कैंडिडेचर पर मुहर लगी, उनकी महत्वाकांक्षा सातवें आसमान पर पहुंच गई। मीडिया से बातचीत में उन्होंने सोनिया के खिलाफ अपनी जीत को तो पक्का माना ही, यह भी कह डाला कि उनके चुनावी मैदान में उतरने से जो एक पॉलिटिकल वाइब्रेशन हुआ है, उसमें भाजपा यूपी में 5० से 6० सीटें तक अपनी झोली में डाल सकती है। दिलचस्प है कि अग्रवाल आज पॉपुलरिटी चार्ट में अपनी मौजूदगी से भले गद्गद हों पर उनकी इस तरह की बड़बोली प्रतिक्रियाएं उनके व्यक्तित्व के हलकेपन को जाहिर करती हैं।
अजय अग्रवाल लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व एसिस्टेंट प्रोफेसर चंद्र प्रकाश अग्रवाल के बेटे हैं। चंद्र प्रकाश आरएसएस से जुड़े रहे। वे भूतपर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा से सीनियर थे। जाहिर है कि अजय अग्रवाल को अपने घर-परिवार से एक ऐसी विरासत तो मिली ही, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र में लोकप्रिय होने की ललक उनके अंदर स्वाभाविक तौर पर पैदा होती। अस्वाभाविक संघ और भाजपा से उनकी नजदीकी भी नहीं, क्योंकि पिता के कारण यह उनके लिए सबसे सुलभ राह थी। यूपी के शाहजहांपुर और मुरादाबाद से निकलकर अग्रवाल आज एक जुआरी की तरह उस मैदान में उतर गए हैं, जहां दांव अगर थोड़े भी ठीक पड़े तो फिर बल्ले-बल्ले। राजनीति की माया है ही ऐसी।
बात करें सोनिया से अग्रवाल के मुकाबले की तो इसकी पटकथा बहुत नई भी नहीं है। बोफोर्स दलाली के खिलाफ जब वे अदालती लड़ाई लड़ रहे थे तभी से कहीं न कहीं कांग्रेस अध्यक्ष उनके निशाने पर रहीं। इस सौदे में हुए भ्रष्टाचार की सीधी आंच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक पहुंची थी। यही नहीं, इस घोटाले के सीधे तार सोनिया से जुड़े होने का दावा किया गया था। इसी कारण से अग्रवाल कहते भी हैं कि सोनिया के खिलाफ उनका संघर्ष आज का नहीं बल्कि सालों पुराना है। बहरहाल, यह देखना तो वाकई दिलचस्प होगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष के खिलाफ उतरने वाले अग्रवाल रायबरेली के चुनाव को एकतरफा से दोतरफा बनाने में कितने कामयाब होते हैं।
 

Wednesday, April 2, 2014

लोकतांत्रिक मर्यादा को जीत-हार में न बांटें

अब तक के जितने ओपिनियन पोल आए हैं उसमें बिहार में नीतीश कुमार का ग्राफ गिरता दिख रहा है। जदयू के भाजपा से अलग हो जाने के बाद नीतीश और उनके साथियों ने भले जो भी सोचा हो पर अब कहीं न कहीं इस फैसले को लेकर उनकी मुखरता फीकी पड़ी है। अलबत्ता यह चुनाव नतीजे बताएंगे कि बिहार में कौन कितने पानी में है।
बहरहाल, इस सियासी जोड़-तोड़ से बाहर एक बात, जिस पर नीतीश इन दिनों खासा जोर दे रहे हैं। वे कहते हैं, गठबंधन राजनीति के दौर में किसी को यह कहने का हक नहीं है कि उसके पक्ष में हवा बह रही है। यह गठबंधन के दौर में प्रकट हुए समावेशी जनादेश की कहीं न कहीं अवमानना है। इस मुद्दे पर चर्चा महज इसलिए नहीं कि इसे बिहार के मुख्यमंत्री रेखांकित कर रहे हैं बल्कि इसलिए कि यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर वाकई विचार होना चाहिए। यही नहीं, इस विमर्श में राजनीति व समाज के सभी वर्गों-इकाइयों में शरीक होना चाहिए। इस विमर्श से जुड़े दो-तीन प्रमुख प्रस्थानबिंदु हैं या यह कह लें कि सवाल हैं। एक तो यही कि 1989 के बाद से देश में किसी एक दल के बहुमत की सरकार नहीं बनी है।
इसी दौर में कांग्रेस और भाजपा ने अपने को बहुमत के बजाय सबसे बड़े दल होने की एक-दूसरे से होड़ लेने लगे। ऐसे में कोई दल या नेता यह कैसे कह सकता है कि उसके पक्ष में पूरे देश में हवा है। इसी तरह सामाजिक न्याय से शुरू होकर अस्मितावादी राजनीति ने जिस तरह भारत के संघीय ढांचे में राज्य सरकारों की भूमिका नए सिरे से रेखांकित की है, वह काफी महत्वपूर्ण है। दिलचस्प है कि इसी दौरान देश में विकास का उदार चरित्र देखने को मिला। नव-विकास के आंध्र से लेकर गुजरात मॉडल तक इसी दौरान सामने आए। इससे पहले तो चर्चा होती थी बस पंजाब-हरियाणा की हरित क्रांति की या फिर केरल में आए एजुकेशनल रिवोल्यूशन की।
इस तथ्य के बाद कोई यह कैसे आरोप लगा सकता है कि गठबंधन की मजबूरियों या अस्थिरता से देश में विकास पटरी से उतर जाता है। पर आज अगर देश की दोनों पार्टियां जनता को इस बात का खौफ दिखा रही हैं कि त्रिशंकु संसद चुनी गई या उन्हें सबसे ज्यादा सीटें नहीं मिलीं तो देश विकास के रास्ते से दूर हो जाएगा तो यह जनता को गुनराह करना नहीं है तो और क्या है।
भारतीय लोकतंत्र की प्रशस्ति गाने में हम काफी आगे रहते हैं। सबसे बड़ा, सबसे प्राचीन, सबसे सघन और सबसे कारगर अगर हमारा गणतंत्र है तो महज इसलिए नहीं कि इतिहास
के कुछ सुलेख उसके नाम दर्ज हैं बल्कि इसलिए कि बीते तीन दशकों में जब पूरी दुनिया में 'उदारता’ की स्वीकृति ने सबको एक छाते में आने के लिए मजबूर कर दिया, हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में आज भी विकल्प और विरोध की गुंजाइश बची हुई है। यही नहीं, ऐसा करते हुए जनता और सरकार के बीच रिश्तों को बुनने वाले बुनकर और करघे दोनों दक्षता से लगे हैं। विकास के क्षेत्र में सर्व समावेशी के तकाजे को समझने के लिए अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अगर मजबूर होना पड़ा तो भी इसलिए कि देश में वर्ण, जाति और धर्म से शुरू होने वाली विविधता सोच और विचार के स्तर तक पहुंचती है।
यह अलग बात है कि प्रतिविचारों
और प्रतिधारणाओं के बीच सामंजस्य की ताकत का आज भी हम सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। अगर ऐसा होता तो फिर सियासी जमातों में सत्ता के वर्चस्व की ललक नहीं जगती बल्कि विरोध और अस्वीकार को जीवित रखने के लिए भी वे इतने ही संकल्पित दिखाई देते।
समकालीन राजनीति में इस जुमले को बार-बार उछाला जाता है कि राजनीति तो सत्ता को पाने के लिए ही होती है। जबकि यह सरासर गलत है। बात देश की लोकतांत्रिक विरासत की हम पहले कर चुके हैं, इसलिए इस मुद्दे पर कौटिल्य की एक सूत्रोक्ति का स्मरण जरूरी है। कौटिल्य कहते हैं विरोध की पतवार थामने वाले ही अपनी नाव को मनमुताबिक दिशा में मोड़ सकते हैं। चाणक्य ने ऐसा करके भी दिखाया। विरोध की रणनीति से ही चंद्रगुप्त मगध की सत्ता तक पहुंचा। यही नहीं, इस रणनीति में 'विरोधों का सामंजस्य’ किस तरह समर्थन की 'एकाधिकारवादी सत्ता’ के दंभ से टकराती है, उसे चकनाचूर करती है, इन बातों की गवाही इतिहास देता है।
इसी तरह संख्याबल को सत्ता का
औजार मानना लोकतंत्र की एक स्थिति में तो सही है पर इससे लोकतांत्रिक अवधारणा की दरकार को नहीं समझा जा सकता है। थोड़ा और पीछे लौटें तो महाभारत के कुछ सबक सामने आएंगे। एक पक्ष जिसके पास सामथ्र्य और सत्ता दोनों थी, वह सत्य के आग्रह
के सामने घुटने टेकता है। गांधीवादी मुहावरे
में कहें तो सत्य के लिए जरूरी नहीं कि वह सत्ता के शिविर में ही वास करे बल्कि सत्य तो वहां टिकता है जहां नीयत और इरादे कल्याणकारी होते हैं।
अब सोलहवीं लोकसभा के लिए प्रथम चरण का मतदान शुरू होगा। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस दौरान तमाम छोटे-बड़े मुद्दों को जनता के सामने रखा है। इस दौरान वादे-इरादे और नीयत की भी बात कही गई है। पर इस सबके बीच यह बात खटकती है कि विरोध और अस्वीकार के जोखिम के साथ कोई नहीं बढ़ना चाहता। सबने सत्ता का बीजमंत्र ही जपा है। ऐसे में यह जनता के विवेक पर है कि वे अपनी परंपरा और संस्कार से आए लोकतांत्रिक सबकों को कैसे अपने निर्णय में बदलती है। जाहिर है, गठबंधन के दौर की राजनीति की या तो एक और गांठ जनता इस बार खोलेगी या फिर वह देश की सियासी जमातों को कुछ अलग तरीके से आईना दिखाएगी। इस लिहाज से जब सोलहवीं लोकसभा बैठेगी तो उसका कंपोजिशन देखना होगा और तब समझ में यह बात आएगी कि
इस चुनाव से देश में लोकतंत्र की जड़ें पहले से और मजबूत हुई हैं या कमजोर।
आखिर में एक बात और यह कि सूचना क्रांति के प्रतापी दौर में लोकतंत्र का चुनावी भाष्य करने वाले पंडित आपको आज हर जगह बैठे मिल जाएंगे, टीवी चैनलों से अखबारों तक। पर इनमें से बहुत कम ऐसे हैं जो बहुमत-अल्पमत, पक्ष-विपक्ष और वोट शेयर से आगे की बात करते हैं। लोकतंत्र के महायज्ञ में जनता जिन संस्कारों की समिधा लेकर उतरती है, उसे ज्यादा धुली और आग्रहहीन आंखों से देखे जाने की जरूरत है।
जीत और हार के बीच एक तीसरी
रेखा भी जनता हर चुनाव में खींचती है, जिससे पक्ष और विपक्ष दोनों को एक ही अनुशासन में बांधा जा सके। कहने की जरूरत नहीं कि यह अनुशासन व्यापक जनहित का है, लोककल्याण का है।
 

केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल एक नई मुसीबत में फंस गए हैं। इस बार मुसीबत उनके लिए वाराणसी से आई है। खबर है कि वहां के पंडितों के कड़े एतराज के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने केजरीवाल और उनके समर्थकों के केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक के साथ मंदिरों में प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। यह रोक वाराणसी में चुनाव संपन्न हो जाने तक लागू रहेगी। वैसे स्थानीय प्रशासन के सूत्रों की मानें तो यह रोक बाद में भी लागू रह सकती है।
इससे पहले केजरीवाल जब 25 मार्च को वाराणसी पहुंचे थे तो उन्होंने सबसे पहले वहां गंगा स्नान किया था। इसके बाद वे पूजा अर्चना के लिए प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर गए थे। बताया जाता है कि इस दौरान उनके कई समर्थकों ने हाथों में केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक और तिरंगा थाम रखे थे। सोशल मीडिया पर इस संबंध में एक वीडियो के वायरल हो जाने के बाद यह मामला तूल पकड़ने लगा।
मामले ने तब गंभीर मोड़ ले लिया जब स्थानीय पंडितों ने केजरीवाल व उनके समर्थकों के ऐसा करने पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। भाजपा की वाराणसी इकाई ने भी पंडितों के विरोध को जायज ठहराया और उसका समर्थन किया। इस सिलसिले में पिछले दिनों में वहां कई जगहों पर प्रदर्शन भी किए गए और आप नेताओं के पुतले फूंके गए।
काशी के पंडितों के एक संगठन ने इस बाबत राज्य निर्वाचन आयोग को भी एक शिकायती चिट्ठी लिखी थी, जिस पर जांच के बाद आयोग ने अपना फैसला सुनाया है। मंदिरों में
केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक
के साथ जाने पर रोक की खबर आने पर केजरीवाल ने ट्विटर पर कहा है कि यह सब भाजपा समर्थकों द्बारा वाराणसी के चुनाव को मुद्दे से भटकाने की कोशिश है। हालांकि केजरीवाल ने आयोग के निर्णय को चुनौती नहीं दी है पर यह खतरा जरूर जताया है कि इससे वाराणसी के लोकसभा चुनाव में विरोधियों द्बारा धार्मिक भावना भड़काने की उनकी आशंका सही साबित हुई है।
आप के प्रवक्ता और नई दिल्ली की चांदनी चौक सीट से चुनाव लड़ रहे आशुतोष ने कहा है कि
केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक गंदगी का नहीं बल्कि सफाई का प्रतीक है, इसलिए इस पर रोक का कोई तुक नहीं बैठता है। वहीं भाजपा की प्रदेश इकाई का कहना है कि सवाल केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक का नहीं है बल्कि आप के चुनाव चिह्न का है। पार्टी की तरफ से मीडिया को जारी विज्ञप्ति में राज्य चुनाव आयोग की इस बात के लिए तारीफ की गई है कि उसने समय रहते एक सही और जरूरी फैसला लिया है।
इस मामले में सपा और बसपा की तरफ से अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। वैसे अंदरखाने की खबर यह है कि आयोग के इस फैसले की सभी आप विरोधियों ने सराहना ही की है।
इस बीच, सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर दो तरह की राय आ रही हैं। कुछ लोग इसे वाराणसी में मोदी के खिलाफ बढ़ी चुनौती के खिलाफ एक बड़ी साजिश का हिस्सा मान रहे हैं, तो कुछ लोगों का यह कहना है कि यह एक जरूरी और सही फैसला है। आप नेताओं और उनके समर्थकों के
केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक
के साथ मंदिरों में प्रवेश पर रोक लगाकर राज्य निर्वाचन आयोग ने वाराणसी के चुनाव को निर्विवादित बनाने की कोशिश की है, जिसकी सराहना होनी चाहिए। बहरहाल, आगे यह मामला और तूल पकड़ सकता है।




Tuesday, March 25, 2014

कहां खो गए समर्थन और विरोध के तकाजे


भारतीय गणतंत्र के जब पचास साल पूरे हुए थे तो देशभर में इसको लेकर कई कार्यक्रम हुए थे। ऐसे मौकों को एक पवित्रवादी आग्रह के साथ मनाने की भारतीय परंपरा काफी पुरानी है। गांधी जयंती से लेकर हिंदी दिवस तक ऐसे कई उदाहरण हैं। अलबत्ता ये उदारहरण अपने प्रदेयों और उपोयिगता को लेकर कितने बहुमूल्य हैं, यह भी हम जानते हैं। गणतंत्र के स्वर्णिम सर्ग में दर्ज होने के लिए संसद भी अलग से बैठी। तत्कालीन सांसदों ने लंबी-लंबी तकरीरें कीं। कुछ ने नए संकल्प लिए तो कुछ ने पुराने सबक दोहाराए।
यह अलग बात है कि माननीयों को न तो सबक भूलने में देर लगी और न संकल्प। उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर भारतबाला प्रोडक्शन ने एक छोटा सा एडनुमा कार्यक्रम बनाया था, बमुश्किल 3० सेकेंड का। इसमें टीवी स्क्रीन पर एक-एक शब्द करके एक वाक्य उभरता है- चलो हम इस बात पर सहमत हैं कि हम एक दूसरे से असहमत हैं। इसके थोड़े अंतराल के बाद दूसरा वाक्य- असहमति पर सहमति लोकतंत्र की नींव है। अब जबकि 16वीं लोकसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है तो इन दो पुराने उल्लेखों से कुछ बातें नए सिरे से समझी जा सकती हैं।
हिंदी साहित्य के प्रखर आलोचक और इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल कविता में विरोधों के सामंजस्य की बात करते थे। कविता संवेदनाओं का लोकतंत्र है। इसलिए विरोधों के सामंजस्य की दरकार को एक लोकतांत्रिक दरकार ठहराया जा सकता है। पक्ष और विपक्ष के बीच तटस्थ जैसी स्थिति को न तो महाभारत में कृष्ण ने स्वीकार किया और न ही आधुनिक लोकतंत्र में इस स्टैंड को राइट एप्रोच माना
गया। अलबत्ता देश में अस्मितावादी राजनीति के दौर-दौरे के बीच विरोध से ज्यादा अंतर्विरोध की राजनीतिक ध्वनियों ने लोकतांत्रिक स्पेस को भरा।
बहरहाल, लोकसभा चुनावों में उतरने की पार्टियों और उनके नेताओं की तैयारियों को देखें तो कुछ बातें अभी से साफ हो गई हैं। भले लोकतंत्र के सुलेखवादी विमर्श में हम लाख बातें कहें-समझें पर सत्ता की राजनीति ने समर्थन और विरोध के बीच की लक्ष्मणरेखा को कब का अमान्य कर दिया है। यह सब हो रहा है जीत और सत्तारोहण के गणित के नाम पर। बाजार ने हमें बीते दो दशकों में सिखाया कि जेब में जिसके पैसा है, उसके लिए ही दुनिया है और अब राजनीति हमें सीखा रही है कि जो जीते वही सिकंदर। यानी विरोध का मतलब
अगर हार है तो ऐसा विरोध त्याज्य है। इसी
तरह समर्थन का अर्थ सत्ता नहीं तो फिर ऐसे समर्थन की दरकार और सरोकार दोनों ही बेमानी हैं।
दिल्ली की एक लोकसभा सीट से इस बार आम आदमी पार्टी की तरफ से राजमोहन गांधी चुनाव लड़ रहे हैं। वे काफी विनम्र और विज्ञजन हैं। पर राजनीति तो शुरू ही मजबूरी से होती है। आम आदमी पार्टी में शामिल होने से पहले उनका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक बयान आया था। तब मोदी को भाजपा ने अपना पीएम कैंडिडेट नहीं बनाया था। राजमोहन ने मोदी का बहुत नामोल्लेख तो नहीं किया पर दुनिया की सबसे ऊंची सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा बनाने के उनके अभियान पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस अभियान से एक वर्टिकल होड़ शुरू होगी अपने-अपने नेताओं और प्रतीक पुरुषों की भव्य प्रतिमा स्थापित करने की।
कुल मिलाकर सम्मान के नाम पर शुरू होने वाली इस प्रतियोगिता में क्षेत्र और समुदायों के बीच एक ऐसी हिंसक भिड़ंत होगी जो देश और समाज के लिए सर्वथा अनिष्टकारी होगी। राजमोहन के इस बयान की सराहना में भले बहुत हाथ तब नहीं उठे पर उनके विरोध में भी शायद ही कोई बयान आया। पर अब राजमोहन आप के नेता हैं। एक-दो महीने तक उनके विचारों का चरित्र जितना मुक्त था, अब शायद नहीं। तभी तो आप को लेकर और उसके नेता अरविंद केजरीवाल के उतावलेपन को लेकर वह कोई सीधी टिप्पणी करने से बचते हैं यानी उन्होंने जानबूझकर एक चुप्पी ओढ़ रखी है। यानी राजमोहन भी समझते हैं कि अभी जनता से वोट लेने की बारी है। सो अभी नापतौल कर बोलना होगा। समर्थन और विरोध की मुद्रा एकदम से तटस्थ हो गई है।
यह हमारे गणतंत्र का एक ऐसा विरोधाभासी सच है जो गणतंत्र के लिए समर्थन और विरोध की जरूरी दरकार को ही खारिज करते हैं। राजमोहन गांधी का नाम इसलिए नहीं कि वे इसके कोई बहुत बड़े कसूरवार हैं बल्कि इसलिए कि उनके जैसा समझदार और चारित्रिक सुदृढ़ता वाला व्यक्ति भी भारतीय गणतंत्र के इस अंतरविरोध को चुनौती
देने में संकोच करता है। उन्हें छोड़ दें फिर तो राहुल गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक और दिग्विजय सिंह से लेकर जगदंबिका पाल तक, सभी समर्थन और विरोध के अपने एजेंडे को जब जैसे चाहें बदल देते हैं, रद्द कर देते हैं। सामान्य समझ में यही तो है मौकापरस्ती की राजनीति।
इस बार के चुनावों को लेकर कहा जा रहा था कि ये देश में कुछ मुद्दों को लेकर राजनीतिक जमीन को इतनी ठोस कर देंगे कि अगले कुछ दशकों की देश की राजनीति इसी जमीन पर होगी। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार को माना जा रहा था। जनता से राजनीतिक विमर्श करने वाले सभी लोग इस बात को अपने-अपने तरीके से मान रहे थे। यहां तक कि हाल तक के ओपिनियन पोल में भी भ्रष्टाचार को बड़ा चुनावी मुद्दा माना गया।
पर अगर दलों के टिकट वितरण के आधारों को देखें या फिर दल छोड़ने व नए दल
में शामिल होने के कारणों को देखें तो कम से कम भ्रष्टाचार कहीं से कोई मुद्दा नहीं है। इसी के साथ भ्रष्टाचार के समर्थन और विरोध को लेकर अंतिम रूप से लकीर खींचने की संभावना भी क्षीण हो गई, जिसे लेकर काफी उम्मीदें थीं।
अब ऐसी स्थिति में चुनावी राजनीति से इतर मौकों पर राजनेताओं की उन तकरीरों का क्या, जिसमें देश की लोकतांत्रिक महानता को बनाए और बचाए रखने के लिए खूब सारी बातें होती हैं, शपथें होती हैं। इसी तरह लोकतंत्र की अवधारणा को साफ करने वाली उन बुनियादी बातों का भी क्या जिसमें समर्थन और विरोध के बीच दुराव के बजाय समन्वय की तो बात होती है पर किसी मुद्दे को लेकर तटस्थतावादी घालमेल की कोई गुंजाइश नहीं। मुद्दा भ्रष्टाचार का हो, महंगाई का हो, चुनाव सुधार का हो या फिर विकास का, नहीं लगता कि जनता इस चुनाव में यह निर्णय ले पाएगी कि वह किस मुद्दे पर किसके साथ जाए और किसके विरोध में। जनता की यह मुश्किल ही आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसी स्थिति में इस बार के चुनावों में तारीख के हर्फ कितने बदलेंगे, कहना मुश्किल नहीं।
 

Friday, March 21, 2014

इंदिरा के खिलाफ जीत का 'राज’


1977 के चुनाव में केंद्र की राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व को जनता ने करारा जवाब दिया था। जेपी आंदोलन से निकली जनता पार्टी की पूरे उत्तर और मध्य भारत में एक तरह से लहर थी।
इस लहर में कांग्रेसी राजनीति के कई सूरमाओं को संसद का मुंह नहीं देखने दिया। पर इंदिरा गांधी की हार ने सबको चौंकाया। इमरजेंसी को लेकर इंदिरा के खिलाफ एक दृढ़ जनभावना जरूर थी, पर वह चुनाव तक हार जाएंगी, इसकी उम्मीद उनके विरोधियों को भी नहीं थी। इंदिरा को जानेमाने समाजवादी नेता राजनारायण ने चुनावी शिकस्त दी और वह भी उनके गढ़ रायबरेली में।
दरअसल, इंदिरा और कांग्रेस के खिलाफ अपने घोषित सैद्धांतिक विरोध के कारण राजनारायण 1971 में भी रायबरेली से इंदिरा के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे थे। पर उन्हें पटखनी खानी पड़ी थी। इस पराजय के चार साल बाद राजनारायण ने चुनाव परिणाम के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सबूतों को गंभीर और पर्याप्त मानते हुए इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया। उनकी सांसदी को तो अवैध करार दिया ही गया, छह सालों के लिए उनके चुनाव लड़ने पर बैन भी लगा दिया गया।
इंदिरा को इस फैसले ने गुस्से से भर दिया और उन्होंने इस्तीफा देने से मना कर दिया। इस दौरान वह जेपी आंदोलन के कारण पहले से परेशान चल रही थीं। इन्हीं परेशानियों के बीच इंदिरा ने 26 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी।
जनवरी 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने आपातकाल समाप्त कर लोकसभा चुनाव की घोषणा की। राजनारायण फिर से रायबरेली में उन्हें चुनौती देने के लिए मैदान में उतरे।
इस चुनाव में समाजवादी राजनारायण ने जीत दर्ज कराकर दिखा दिया कि लोकतंत्र में किसी का भी विरोध असंभव नहीं है और जनता की अदालत में अन्याय हमेशा हारता है। भारतीय लोकतंत्र की यही खासियत उसकी असली ताकत है।
 

अंत नहीं अनंत खुशवंत


खुशवंत सिंह अपनी उम्र की गिनती को दहाई से सैकड़े तक नहीं ले जा सके। यह अफसोस उनके चाहने वालों को हमेशा रहेगा। अलबत्ता जिस जिदादिली से वह जीते रहे उसे देखकर तो किसी को भी रक्स होगा। विवाद, यश, प्रतिष्ठा, सम्मान और संतोष सब कुछ भरपूर था उनके जीवन में।
उन्होंने अपने 99 साल के जीवन में न सिर्फ स्वाधीन भारत के लिए संघर्ष और नए राष्ट्र का निर्माण देखा बल्कि वे विभाजन और सिख दंगों समेत इतिहास के कई दुखद प्रसंगों के भी साक्षी रखे। उनके लेखन में ये दोनों तरह के अनुभव बखूबी दर्ज हुए हैं।
खुशवंत की जिंदादिली का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि वे विवादों में बेशक हमेशा रहे पर लोगों की नफरत के शिकार कभी नहीं हुए। इसके उलट उन्हें हर क्षेत्र के लोगों से बेपनाह मोहब्बत मिलती रही। शराब और औरतों को लेकर वे भले बढ़-चढ़कर बातें करते हों, पर उनके चरित्र को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा। बदनामी के जोखिम के बीच नाम और शोहरत पाने की उनकी ललक को देखकर तो कई बार हैरत होती थी।
दिल्ली से उन्हें बहुत प्रेम था। यहां के कई प्रसिद्ध परिवारों से उनके काफी नजदीकी रिश्ते थे। यह सब उनके पिता के जमाने से चला आ रहा था। दिल्ली के सिख समुदाय के लोगों के तो वे काफी आत्मीय थे। वैसे बात चाहने वालों की करें तो क्या कोलकाता और क्या मुंबई, उनके मुरीद देश में हर जगह थे।
खुशवंत जितने भारत में लोकप्रिय थे, उतने ही पाकिस्तान में भी। उनकी किताब 'ट्रेन टु पाकिस्तान’ बेहद लोकप्रिय हुई। इस पर फिल्म भी बन चुकी है। उन्हें 1974 पद्मभूषण और 2००7 में पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया गया था। उनके पिता का नाम सर सोभा सिह था, जो अपने समय के प्रसिद्ध रईस और जमींदार थे। एक जमाने में सोभा सिह को आधी दिल्ली का मालिक कहा जाता था।
खुशवंत ने गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से तालीम हासिल की। पसंद नहीं आने के बावजूद उन्हें कानून की पढ़ाई करनी पड़ी। उनका विवाह कंवल मलिक के साथ हुआ। उनके बेटे का नाम राहुल सिह और पुत्री का नाम माला है।
एक पत्रकार के तौर पर खुशवंत सिह ने काफी ख्याति अर्जित की। 1951 में वे आकाशवाणी से जुड़े और 1951 से 1953 तक भारत सरकार के पत्र 'योजना’ का संपादन किया। मुंबई से प्रकाशित प्रसिद्ध अंग्रेजी साप्ताहिक 'इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ के और 'न्यू देहली’ के वे 198० तक संपादक थे। वे 'नेशनल हेराल्ड’ के भी संपादक रहे। 1983 तक दिल्ली के अंग्रेजी दैनिक 'हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादक भी वही थे। तभी से वे प्रति सप्ताह एक लोकप्रिय कॉलम लिखते थे, जो अनेक भाषाओं के दैनिक पत्रों में प्रकाशित होता था।
उनके तीन उपन्यास खासे प्रसिद्ध हैं- 'देहली’, 'ट्रेन टु पाकिस्तान’ और 'दि कंपनी ऑफ वूमन’। वर्तमान संदर्भों और प्राकृतिक वातावरण पर भी उनकी कई रचनाएं हैं। दो खंडों में प्रकाशित 'सिखों का इतिहास’ उनकी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति है। साहित्य के क्षेत्र में पिछले सात दशकों में खुशवंत सिह का विविध आयामी योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1947 से कुछ सालों तक खुशवंत सिह ने भारत के विदेश मंत्रालय में विदेश सेवा के महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। 198० से 1986 तक वे राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। सेक्स, मजहब, भाषा खासतौर पर हिंदी और ऐसे ही कुछ विषयों पर की गई टिप्पणियों के कारण वे हमेशा आलोचना के केंद्र में रहे। पर यह सब शायद जिंदादिली से जीवन जीने का उनका तरीका था। भीतर से वे खासे संवेदनशील इनसान थे और देश-समाज की चिंताओं से हमेशा गहराई से जुड़े रहे।
यह अलग बात है कि अपने सरोकारों और रास्तों को तय करते हुए वे कभी लकीर के फकीर नहीं बने। अपने लेखन की तरह अपनी शख्सियत को भी उन्होंने अपने तरीके से ही गढ़ा। जीवन और रचना के बीच आत्मविश्वास का ऐसा गाढ़ा मेल शायद ही कहीं और देखने को मिले।