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Friday, June 24, 2016

जयप्रकाश आंदोलन का भी अपना साहित्य था

-प्रेम प्रकाश
केरल में अपनी सरकार बनाने की खुशी को बड़ी कामयाबी के तौर पर जाहिर करते हुए माकपा ने अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के रंगीन विज्ञापन दिए। इससे पहले इस तरह का आत्मप्रचार वामदलों की तरफ से शायद ही देखने को मिला हो। दरअसल, पिछले दो दशकों में और उसमें भी हालिया दो सालों में सियासी तौर पर उनका रास्ता जिस तरह तंग और उनकी काबिज जमीन का रकबा इकहरा होता जा रहा है, उसमें यह अस्तित्व बचाने का आखिरी दांव जैसा है। वाम जमात ने इतिहास से लेकर साहित्य तक जिस तरह अपने वर्चस्व को भारत में दशकों तक बनाए रखा, वह दौर अब हांफने लगा है। खासतौर पर हिदी आलोचना में नया समय उस गुंजाइश को लेकर आया है, जब मार्क्सवादी दृष्टि पर सवाल उठाते हुए साहित्येहास पर नए सिरे से विचार हो। असहिष्णुता पर बहस और विरोध के दौरान यह खुलकर सामने आया था कि सत्तापीठ से उपकृत होने वाले कैसे अब तक अभिव्यक्ति और चेतना के जनवादी तकाजों को सिर पर लेकर घूम रहे थे। नक्सलवाद तक को कविता का तेवर और प्रासंगिक मिजाज ठहराने वालों ने देश में उस धारा और चेतना का रचनात्मक अभिव्यक्ति को कैसे दरकिनार और अनसुना किया, उसकी तारीखी मिसाल हैजयप्रकाश आंदोलन। इस आंदोलन को लेकर वाम शिविर शुरू से शंकालु और दुविधाग्रस्त रहा। यहां तक कि लोकतंत्र के हिफाजत में सड़कों पर उतरने के जोखिम के बजाय उनकी तरफ से आपातकाल के समर्थन तक का पाप हुआ। 
अब जबकि वाम शिविर की प्रगतिशीलता अपने अंतर्विरोधों के कारण खुद- ब-खुद अंतिम ढलान पर है तो हमें एक खुली और धुली दृष्टि से इतिहास के उन पन्नों पर नजर दौड़ानी चाहिए, जिस पर अब तक वाम पूर्वाग्रह की धूल जमती रही है। जयप्रकाश नारायण 74 आंदोलन के दिनों में अकसर कहा करते थे कि कमबख्त क्रांति भी आई तो बुढ़ापे में। पर इसे बुढ़ापे की पकी समझ ही कहेंगे कि संपूर्ण क्रांति का यह महानायक अपने क्रांतिकारी अभियान में संघर्षशील युवाओं और रचनात्मक कार्यकर्ताओं की जमात के साथ कलम के उन सिपाहियों को भी भूला नहीं, जो जन चेतना की अक्षर ज्योति जलाने में बड़ी भूमिका निभा सकते थे। संपूर्ण क्रांति का शीर्ष आह्वान गीत 'जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है’ रचने वाले रामगोपाल दीक्षित ने तो लिखा भी कि 'आओ कृषक श्रमिक नागरिकों इंकलाब का नारा दो/ गुरुजन शिक्षक बुद्धिजीवियों अनुभव भरा सहारा दो/ फिर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है/ तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्बार पर आई है।’ दरअसल जेपी उन दिनों जिस समग्र क्रांति की बात कह रहे थे, उसमें तीन तत्व सर्वप्रमुख थे- शिक्षा, संस्कृति और अध्यात्म। कह सकते हैं कि यह उस जेपी की क्रांतिकारी समझ थी जो मार्क्स और गांधी-विनोबा के रास्ते 74 की समर भूमि तक पहुंचे थे। दिलचस्प है कि सांतवें और आठवें दशक की हिन्दी कविता में आक्रोश और मोहभंग के स्वर एक बड़ी व्याप्ति के स्तर पर सुने और महसूस किए जाते हैं। अकविता से नयी कविता की तक की हिन्दी काव्ययात्रा के सहयात्रियों में कई बड़े नाम हैं, जिनके काव्य लेखन से तब की सामाजिक चेतना की बनावट पर रोशनी पड़ती है। पर दुर्भाग्य से हिन्दी आलोचना के लाल साफाधारियों ने देश में 'दूसरी आजादी की लड़ाई’ की गोद में रची गई उस काव्य रचनात्मकता के मुद्दे पर जान-बुझकर चुप्पी अखितियार कर ली है, जिसमें कलम की भूमिका कागज से आगे सड़क और समाज के स्तर पर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की हो गई थी। न सिर्फ हिन्दी ब्लकि विश्व की दूसरी भाषा के इतिहास में भी यह एक अनूठा अध्याय, एक अप्रतिम प्रयोग था।
जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े कवियों के 1978 में प्रकाशित हुए रचना संग्रह 'समर शेष है’ की प्रस्तावना में प्रख्यात आलोचक डा. रघुवंश कहते भी हैं, 'मैं नयी कविता के आंदोलन से जोड़ा गया हूं क्योंकि तमाम पिछले नये कवियों के साथ रहा हूं, परंतु उनकी रचनाओं पर बातचीत करता रहा हूं। परंतु 'समर शेष है’ के रचनाकारों ने जेपी के नेतृत्व में चलने वाले जनांदोलन में अपने काव्य को जो नयी भूमिका प्रदान की है, उनका मूल्यांकन मेरे लिए एकदम नयी चुनौती है।’ कागज पर मूर्तन और अमूर्तन के खेल को अभिजात्य सौंदर्यबोध और नव परिष्कृत चेतना का फलसफा गढ़ने वाले वाम आलोचक अगर इस चुनौती को स्वीकार करने से आज तक बचते रहे हैं तो इसे हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए एक दुर्भाग्यपूणã स्थिति ही कहेंगे। मौन कैसे मुखरता से भी ज्यादा प्रभावशाली है, इसे आठ अप्रैल 1974 को आंदोलन को दिए गए जेपी के पहले कार्यक्रम से भलीभांति समझा जा सकता है।यह पहला कार्यक्रम एक मौन जुलूस था। 'हमला चाहे जैसा होगा हाथ हमारा नहीं उठेगा’ जैसे लिखे नारों वाली तख्तियों को हाथों में उठाए और हाथों में पट्टी बांधे हुए सत्याग्रहियों की जो जमात पटना की सड़कों पर चल रही रही थी, उसमें संस्कृतिकर्मियों की टोली भी शामिल थी। इस जुलूस में हिस्सा लेने वालों में फणीश्वरनाथ 'रेणु’ का नाम सर्वप्रमुख था। संपूर्ण क्रांति आंदोलने के लिए दर्जनों लोकप्रिय गीत रचने वाले गोपीवल्लभ सहाय ने तो समाज, रचना और आंदोलन को एक धरातल पर खड़ा करने वाले इस दौर को 'रेणु समय’ तक कहा है। अपने प्रिय साहित्यकारों को आंदोलनात्मक गतिविधियों से सीधे जुड़ा देखना जहां सामान्य लोगों के लिए एक सामान्य अनुभव था, वहीं इससे आंदोलनकारियों में भी शील और शौर्य का तेज बढ़ा। व्यंग्यकार रवींद्र राजहंस की उन्हीं दिनों की लिखी पंक्तियां हैं, 'अनशन शिविर में कुछ लोग/ रेणु को हीराबाई के रचयिता समझ आंकने आए/ कुछ को पता लगा कि नागार्जुन नीलाम कर रहे हैं अपने को/ इसलिए उन्हें आंकने आए।’ बाद के दिनों में आंदोलन की रौ में बहने वाले कवियों और उनकी रचनाओं की गिनती भी बढ़ने लगी। कई कवियों-संस्कृतिकर्मियों को इस वजह से जेल तक की हवा खानी पड़ी। लोकप्रियता की बात करें तो तब परेश सिन्हा की 'खेल भाई खेल/सत्ता का खेल/ बेटे को दिया कार कारखाना/ पोसपुत के हाथ आई भारत की रेल’, सत्यनारायण की 'जुल्म का चक्का और तबाही कितने दिन’, गोपीवल्लभ सहाय की 'जहां-जहां जुल्मों का गोल/ बोल जवानों हल्ला बोल', रवींद्र राजहंस की 'सवाल पूछता है जला आदमी/ अपने शहर में कहां रहता है भला आदमी।’ कवियों ने जब नुक्कड़ गोष्ठियां कर आम लोगों के बीच आंदोलन का अलख जगाना शुरू किया तो इस अभिक्रम का हिस्सा बाबा नागार्जुन जैसे वरिष्ठ कवि भी बने। बाबा तब डफली बजाते हुए नाच-नाचकर गाते- 'इंदूजी-इंदूजी क्या हुआ आपको/ सत्ता के खेल में भूल गई बाप को...।’ दिलचस्प है कि चौहत्तर आंदोलन में मंच और मुख्यधारा के कवियों के साथ सर्वोदयी-समाजवादी कार्यकर्ताओं के बीच से भी कई काव्य प्रतिभाएं निकलकर सामने आईं। जयप्रकाश अमृतकोष द्बारा प्रकाशित ऐतिहासिक स्मृति ग्रंथ 'जयप्रकाश’ में भी इनमें से कई गीत संकलित हैं। इन गीतों में रामगोपाल दीक्षित के 'जयप्रकाश का बिगूल बजा’ के अलावा 'हम तरुण हैं हिद के/ हम खेलते अंगार से’ (डा. लल्लन), 'आज देश की तरुणाई को अपना फर्ज निभाना है’ (राज इंकलाब), 'युग की जड़ता के खिलाफ एक इंकलाब है’ (अशोक भार्गव) आदि जयप्रकाश आंदोलन की गोद से पैदा हुए ऐसे ही गीत हैं।
हिन्दी कविता की मुख्यधारा के लिए यह साठोत्तरी प्रभाव का दौर था। आठवें दशक तक पहुंचते-पहुंचते जिन कविताओं की शिननाख्त 'मोहभंग की कविताओं’ या क्रुद्ध पीढ़ी की तेजाबी अभिव्यक्ति के तौर पर की गई, जिस दौर को अपने समय की चुनौती और यथार्थ से सीधे संलाप करने के लिए याद किया जाता है, इसे विडंबना ही कहेंगे कि वहां समय की शिला पर ऐसा कोई भी अंकन ढूंढ़े नहीं मिलता है जहां तात्कालिक स्थितयों कोे लेकर प्रत्यक्ष रचनात्मक हस्तक्षेप का साहस दिखाई पड़े। नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती और दुष्यंत कुमार जैसे कुछ कवियों को छोड़ दें तो उक्त नंगी सचाई से मंुह ढापने के लिए शायद ही कुछ मिले। अलबत्ता यह भी कम दिलचस्प नहीं हैकि तब मुख्यधारा से अलग हिन्दी काव्य मंचों ने भी पेशेवर मजबूरियों की सांकल खोलते हुए तत्कालीन चेतना को स्वर दिया। मंच पर तालियों के बीच नीरज ने साहस से गाया- 'संसद जाने वाले राही कहना इंदिरा गांधी से/ बच न सकेगी दिल्ली भी अब जयप्रकाश की आंधी से।’ कहना नहीं होगा कि हर आंदोलन का एक साहित्य होता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी भाषा के साहित्येतिहास में कई आंदोलन होते हैं। इस लिहाज से जयप्रकाश आंदोलन का भी अपना साहित्य था। पर बात शायद यहीं पूरी नहीं होती है। अगर जयप्रकाश आंदोलन और उससे जुड़े साहित्य का आलोचनात्मक मूल्यांकन हो तो निष्कर्ष आंख खोलने वाले साबित हो सकते हैं। एक बार फिर डा. रघुवंश के शब्दों की मदद लें तो जयप्रकाश आंदोलन के 'कवियों ने लोकचेतना की रक्षा की लड़ाई में अगर अपने रचनाधर्म को उच्चतम स्तर पर
विसर्जित-प्रतिष्ठित किया।’ 

Monday, February 8, 2016

आड़ी-तिरछी लकीरों से एक लीक गढ़ गए तैलंग


कार्टून महज कागज पर खिंची गईं वैसी रेखाएं भर नहीं, जिसे देखकर हम हंसे-मुस्कराएं। कार्टून एक गंभीर विधा है। यह एक रचनात्मक औजार भी जिसका प्रतिरोध के लिए कारगर इस्तेमाल का समृद्ध इतिहास रहा है। कहा जाता है कि हिटलर तक अपने ऊपर बनने वाले व्यंग्यात्मक कार्टूनों से भय खाते थे, उन्हें डर लगता था कि कहीं इसके कारण उनकी सार्वजनिक छवि खराब न हो जाए और जन साधारण उनके खुले विरोध पर आमादा न हो जाए। भारत में शंकर से लेकर आरके लक्ष्मण, काक और सुधीर तैलंग तक कार्टूनिस्टों का एक ऐसा सिलसला कायम रहा है, जिन्होंने इस विधा की गंभीरता को तो बनाए ही रखा, इसे काफी लोकप्रिय भी बनाया। पर दुखद है कि यह समृद्ध पात अब सूनी पड़ती जा रही है। चर्चित एवं लोकप्रिय कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग के देहांत की खबर इस लिहाज से बहुत बड़ी है कि वे न सिर्फ वरिष्ठ और चर्चित कार्टूनिस्ट थे बल्कि उन्होंने समय-समय पर लोकतंत्र में व्यंग्य और असहमति के लिए जरूरी स्पेस को लेकर आवाज भी उठाई। इसके लिए उन्होंने कलम तो उठाया ही, सड़कों पर भी उतरे। अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति उनकी हिमायत और संघर्ष दोनों ही याद किए जाएंगे। दुखद यह भी रहा कि उनकी उम्र अभी ज्यादा नहीं हुई थी। कैंसर के क्रूर हाथों ने मात्र 56 वर्ष की अवस्था में उन्हें हमसे छीन लिया। वे पिछले डेढ़ साल से ब्रेन कैंसर से पीड़ित थे। उनके परिवार में पत्नी और एक बेटी है। तैलंग का जन्म राजस्थान में हुआ था और वहीं से उन्होंने पढाई-लिखाई की थी। उन्होंने बीएससी करने के बाद अंग्रेजी में एम.ए किया था। तैलंग ने कार्टूनिस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुआत 'इलस्ट्रेटेड वीकली' से की थी। राजनेताओं पर बनाए गए उनके कार्टून देशभर में लोगों को आकर्षित करते रहे। कार्टून के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें 2००4 में पद्मश्री से अलंकृत किया गया था। तैलंग ने हिंदी और अंग्रेजी दोनों अखबारों के लिए काम किया। उनके व्यंग्य की खास बात यह थी कि वह हमेशा सार्वजनिक जीवन में मूल्यों की वकालत करते रहे। इसके अलावा जनसाधारण को होने वाली परेशानियों को लेकर उन्होंने नेताओं से लेकर पूरे सत्ता प्रतिष्ठान पर बार-बार सवाल उठाए। उनके व्यंग्य में चटीलापन और तल्खी तो होती थी पर स्तरहीनता नहीं। इस सावधानी का उन्होंने बहुत धैर्यपूर्वक निर्वाह किया। आजकल कई कार्टूनिस्ट हल्के अंदाज में अपनी बात कहकर तात्कालिक वाहवाही लूटना चाहते हैं। पर यह तरीका कार्टून जैसी गंभीर विधा को ही कहीं न कहीं कमजोर बनाता है। तैलंग इस कमजोरी के प्रति हमेशा काफी सचेत रहे। पिछले साल जब पेरिस में शार्ली हब्दो के दफ्तर पर आतंकी हमला हुआ था तैलंग ने भारत की स्थिति को लेकर भी असंतोष जताया था। उन्होंने पिछली केंद्र सरकार के दौरान शंकर के एक पुराने कार्टून को लेकर हुई राजनीति का हवाला दिया था। दिलचस्प है कि इसके बाद भी पश्चिम बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक कई ऐसे मामले सामने आए जिसमें कार्टूनिस्टों के खिलाफ सियासी सनक ने सारी सीमाएं तोड़ दी। तैलंग इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अशुभ प्रवृत्ति मानते थे। उनका साफ कहना था कि आलोचना से मुंह फेरने का मतलब है कि हम सचाई से घबराते हैं। आज जब उनका निधन हो गया है तो उनका यह सबक सरकार और समाज दोनों ही याद रखें तो अच्छा होगा। अभिव्यक्ति की आजादी की हिमायत और उसकी सुनिश्चतता ही उनके प्रति सबसे अच्छी श्रद्धांजलि होगी। 

Wednesday, January 20, 2016

तू जो मुड़के देख लेगा, 'मेरा साया’ साथ होगा...

क्रिसमस के दिन जब ज्यादातर सरकारी और निजी दफ्तर बंद रहते हैं और लोगबाग मोबाइल फोन के जरिए एक दूसरे को बधाइयां दे रहे होते हैं, मशहूर अभिनेत्री साधना के निधन की खबर ने सबको दुखी कर दिया। वैसे खान तिकड़ी के दौर में नई पीढ़ी के लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि वह एक ऐसी अभिनेत्री थीं, जिन्होंने अदा और अभिनय दोनों को एक साथ साधा। उनकी हेयर स्टाइल को आज भी लोग 'साधना कट’ के नाम से जानते हैं। उनके बाद शायद ही किसी भारतीयअभिनेत्री को यह फL हासिल हो कि उनकी शिनाख्त इस तरह से तय हो। साधना ने 'आरजू’, 'मेरे मेहबूब’, 'लव इन शिमला’, 'मेरा साया’, 'वक्त’, 'आप आए बहार आई’, 'वो कौन थी’, 'राजकुमार’, 'असली नकली’, 'हम दोनों’ जैसी मशहूर फिल्मों में काम किया था। हिंदी फिल्मों का यह वह दौर था जब फिल्मी परदे पर एक तरफ हीरो के साथ हीरोइन की शोखी प्रेम को नया रूपहला अंदाज दे रहा था तो वहीं लता और आशा की आवाज नायिका के हृदय के तारों पर मधुर कविताई कर रही थी। वहीदा रहमान, वैजयंतीमाला और आशा पारेख जैसी अभिनेत्रियों की पांत को साधना अकेली छोड़कर चली गईं। उनके साथ के बाकी की अभिनेत्रियों ने अपनी फिल्मी या सार्वजनिक उपस्थिति को कहीं न कहीं बाद में भी बरकरार रखा। पर इस मामले में साधना थोड़ी जुदा थीं। इस बाबत उन्होंने कहा भी कि वे नहीं चाहतीं कि लोग परदे पर नाचने-गाने और तरह-तरह की शोखियां बिखेरने वाली साधना से इतर किसी साधना को याद रखें। यह उनका खुद के प्रति एक सम्मोहन जैसा खयाल था। अभिनेताओं में यही खयाल कहीं न कहीं देवआनंद का भी खुद को लेकर था। 74 वर्षीय साधना कुछ दिनों से बीमार थीं। यही नहीं उनके बीते कुछ सालों की जिंदगी में कई और परेशानियां भी रहीं। अभिनेत्री आशा पारेख के मुताबिक, 'पिछले हफ्ते ही हम मिले थे और हमारी पार्टियां होती थीं, जिनमें हम बीते जमाने की एक्ट्रेसेज- हेलेन, वहीदा रहमान, शम्मी आंटी और कई लोग मिलते थे। उनकी तबीयत पहले से खराब थी और पांच-छह कोर्ट केस भी चल रहे थे, जिनके चलते वह परेशान थीं। पर उन्होंने कभी अपना दुख हमसे साझा नहीं किया।’आशा पारेख जिन केसेज की बात कर रही हैं, उसमें एक तो उनके रिहाइश को लेकर ही था। पर यह साधना ही थीं तो बदलते वक्त में भी खुद के प्रति अपने सम्मोहन की हिफाजत इस तरह करती रहीं कि दुनिया के सामने अपने लिए कभी कोई फरियाद नहीं की। जाहिर है, निजी जिंदगी के संघर्ष में वे खुद को लगातार मजबूत करती चली गईं। फिल्मकार करण जौहर ने इसलिए कहा भी,'सौंदर्य, आत्मविश्वास और आकर्षण की आपकी विरासत अमर रहेगी।’ पिछले साल मुंह के कैंसर की वजह से उनकी सर्जरी हुई थी। पर उनके परिजनों ने इस बात की कभी पुष्टि नहीं की। शायद ऐसा साधना की हिदायत के कारण ही हुआ था। हालांकि पिछले साल ही जब वह अभिनेता रणबीर कपूर के साथ रैंप पर भी दिखीं तो खुले तौर पर पहली बार लोगों को अपनी चहेती अभिनेत्री के आज का दीदार हुआ। साधना भारतीय मध्यवर्गीय परिवार की बेटियों के उस सफरनामे की तरह भी है जो पहले श्याम-श्वेत था और बाद में रंगीन होता चला गया। इस रंगीनी को लोग आज एचडी स्क्रीन पर निहारते हैं। ऐसे में एक नरम आह तो जरूर निकलेगी उस कशिश के खोने को लेकर जिसे साधना और उन सरीखी अन्य अभिनेत्रियों के कारण हिंदी सिने परदे पर दशकों तक कायम रही।

Monday, October 19, 2015

रामलीला 2015

बीते साल में दिल्ली में दो नई सरकारें आईं, एक केंद्र की तो दूसरी दिल्ली प्रदेश की। दोनों सरकारों ने बदलाव के बड़े-बड़े दावे किए। इन दावों की राजनीतिक व्याख्या और समीक्षा तो खैर मीडिया में हर दिन चल रही है पर सांस्कृतिक स्तर पर इसे देखें-समझें तो समय और समाज का ऐसा चित्र सामने आएगा, जिस पर हम कम से कम सीधे-सीधे तो नाज नहीं कर सकते। जाहिर है कि ये अफसोस से भर देनेवाला परिदृश्य है।
दिल्ली में कांग्रेस के बड़े नेता जेपी अग्रवाल को यह गंवारा नहीं था कि वे जिस रामलीला कमेटी के प्रमुख थे, वह कमेटी अपने आयोजन में प्रधानमंत्री को बुलाए। बस क्या था, उन्होंने रामलीला कमेटी को ही राम-राम कह दिया। दिल्ली की ही एक दूसरी घटना में रामलीला देखने गई दो साल की बच्ची के साथ बदमाशों ने दुष्कर्म किया। बात देश की राजधानी की चल ही रही है तो साथ में यह जोड़ते चलें कि इस बार चमक-दमक और ग्लैमर ने रामलीला का एक तरह उत्तर-आधुनिक कल्प ही रच दिया। टीवी कलाकार रामकथा के पात्र बनकर मंच पर उतरे तो मोनिका बेदी से लेकर बार डांसरों तक ने रामलीला के मंच पर ठुमके लगाए।

पुरस्कार वापसी की लीला

रामलीला की चर्चा से पूर्व यह प्रसंग इसलिए कि हमें उस देशकाल को समझने का अंदाजा हो जाता है कि जिसमें आस्था का निर्वाह और उसके साथ खिलवाड़ दोनों ही एक बराबर हैं। कमाल की बात है कि इस बीच, देशभर के कथित तौर पर प्रगतिशील खेमे के साहित्यकारों के बीच साहित्य अकादमी और पद्म पुरस्कारों को लौटाने की होड़ मची है। और यह सब हो रहा है दादरी कांड के बहाने असहिष्णुता और सांप्रदायिकता के नाम पर। सांस्कृतिक स्फीति की चिंता यहां उस तरह नहीं है, जिस तरह की चिंता कम से कम कला और साहित्य के क्षेत्र के लोगों के बीच होनी चाहिए।
वैसे यह पूरा न तो आखिरी है और न ही अंतिम। क्योंकि यही और महज इतना ही सच नहीं है। वैसे भी महज दिल्ली-मुंबई को देखकर इस देश के सांस्कृतिक चरित्र पर कोई अंतिम राय नहीं बनाई जा सकती। लोक, आस्था और परंपराओं को हृदय से लगाकर रखने वाला हमारा देश विशिष्ट और महान इसलिए है कि यहां नए और पुराने के बीच अलगाव नहीं बल्कि एक समन्वयीय रेखा हमेशा से खींचती रही है। यह रेखा ही बहुलता और विविधता के इस देश को एकरंगता या एकरसता से नहीं भरने देती।
अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन कैरी को नहीं लगता कि भारत में कोई सर्वधमã समभाव की स्थिति है। वे भारत में धर्म विशेष को लेकर भय की स्थिति की भी बात करते हैं। ये सारी बातें अमेरिका ही नहीं, देश के भीतर भी कही-सुनी जा रही हैं, खासतौर पर हाल के दादरी कांड के बाद। पर सांप्रदायिकता के नाम पर होने वाली राजनीति और अतिरेक से भरी बयानबाजी का ही असर है कि इस बार मीडिया ने कई ऐसी खबरें/स्टोरीज कीं, जिसमें देश-समाज का पारंपरिक सद्भाव बिना किसी अतिरिक्त कोशिश के आज भी कायम है। यूपी के सहारनपुर से लेकर बिहार के बक्सर तक सद्भाव के अनेकानेक उदाहरण देखने को मिलते हैं, जो सांस्कृतिक तौर पर खासे जीवंत और प्रेरक हैं।
दिलचस्प है कि यह सद्भाव सबसे ज्यादा रामलीला खेलने के मौके पर दिखाई देते हैं। कहीं लीला मंच पर सारे कलाकार मुस्लिम समुदाय के हैं, तो कहीं लीला आयोजन को नियामकीय स्तर पर संभालने वालों में गैरहिंदू समुदाय के लोग हैं। यह अलग बात है कि भारतीय संस्कृति की इस आंतरिक बलिष्ठता-श्रेष्ठता को न तो सियासी जमातें अपने लिए फलदायी पाती हैं और न ही संस्कृति के अलंबरदारों ने इस दिशा में अपनी तरफ से कुछ सोचा-किया।
बहरहाल, राई को पहाड़ कहकर बेचने वाले सौदागर भले अपने मुनाफे के खेल के लिए कुछ खिलवाड़ के लिए आमादा हों, पर अब भी उनकी ताकत इतनी नहीं बढ़ी है कि हम सब कुछ खोने का रुदन शुरू कर दें। देशभर में रामलीलाओं की परंपरा करीब साढेè चार सौ साल पुरानी है। आस्था और संवेदनाओं के संकट के दौर में अगर भारत आज भी ईश्वर की लीलाभूमि है तो यह यहां के लोकमानस को समझने का नया विमर्श बिदु भी हो सकता है।

रामनगर की लीला

 बनारस के रामनगर में पिछले करीब 18० सालों से रामलीला खेली जा रही है। दिलचस्प है कि यहां खेली जानेवाली लीला में आज भी लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल नहीं होता है। यही नहीं लीला की सादगी और उससे जुड़ी आस्था के अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता है। खुले मैदान में यहां-वहां बने लीला स्थल और इसके साथ दशकों से जुड़ी लीला भक्तों की आस्था की ख्याति पूरी दुनिया में है।
'दिल्ली जैसे महानगरों और चैनल संस्कृति के प्रभाव में देश के कुछ हिस्सों में रामलीलाओं के रूप पिछले एक दशक में इलेक्ट्रॉनिक साजो-सामान और प्रायोजकीय हितों के मुताबिक भले बदल रहे हैं। पर देश भर में होने वाली ज्यादातर लीलाओं ने अपने पारंपरिक बाने को आज भी कमोबेश बनाए रखा है’, यह मानना है देश-विदेश की रामलीलाओं पर गहन शोध करने वाली डॉ. इंदुजा अवस्थी का।

परंपरा ही हावी

लोक और परंपरा के साथ गलबहियां खेलती भारतीय संस्कृति की बहुलता और अक्षुण्णता का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है कि चाहे बनारस के रामनगर, चित्रकूट, अस्सी या काल-भैरव की रामलीलाएं हों या फिर भरतपुर और मथुरा की, राम-सीता और लक्ष्मण के साथ दशरथ, कौशल्या, उर्मिला, जनक, भरत, रावण व हनुमान जैसे पात्र के अभिनय 1०-14 साल के किशोर ही करते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अब कस्बाई इलाकों में पेशेवर मंडलियां उतरने लगी हैं, जो मंच पर अभिनेत्रियों के साथ तड़क-भड़क वाले पारसी थियेटर के अंदाज को उतार रहे हैं। पर इन सबके बीच अगर रामलीला देश का सबसे बड़ा लोकानुष्ठान है तो इसके पीछे एक बड़ा कारण रामकथा का अलग स्वरूप है।
अवस्थी बताती हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम और लीला पुरुषोत्तम कृष्ण की लीला प्रस्तुति में बारीक मौलिक भेद है। रासलीलाओं में »ृंगार के साथ हल्की-फुल्की चुहलबाजी को भले परोसा जाए पर
रामलीला में ऐसी कोई गुंजाइश निकालनी मुश्किल है। शायद ऐसा दो ईश्वर रूपों में भेद के कारण ही है। पुष्प वाटिका, कैकेयी-मंथरा और रावण-अंगद या रावण-हनुमान आदि प्रसंगों में भले थोड़ा हास्य होता है, पर इसके अलावा पूरी कथा के अनुशासन को बदलना आसान नहीं है।

हर बोली-संस्कृति में राम

तुलसी ने लोकमानस में अवधी के माध्यम से रामकथा को स्वीकृति दिलाई और आज भी इसका ठेठ रंग लोकभाषाओं में ही दिखता है। मिथिला में रामलीला के बोल मैथिली में फूटते हैं तो भरतपुर में राजस्थानी की बजाय ब्रजभाषा की मिठास घुली है। बनारस की रामलीलाओं में वहां की भोजपुरी और बनारसी का असर दिखता है पर यहां अवधी का साथ भी बना हुआ है। बात मथुरा की रामलीला की करें तो इसकी खासियत पात्रों की शानदार सज-धज है। कृष्णभूमि की रामलीला में राम और सीता के साथ बाकी पात्रों के सिर मुकुट से लेकर पग-पैजनियां तक असली सोने-चांदी के होते हैं। मुकुट, करधनी और बांहों पर सजने वाले आभूषणों में तो हीरे के नग तक जड़े होते हैं। और यह सब संभव हो पाता है यहां के सोनारों और व्यापारियों की रामभक्ति के कारण। आभूषणों और मंच की साज-सज्जा के होने वाले लाखों के खर्च के बावजूद लीला रूप आज भी कमोबेश पारंपरिक ही है। मानो सोने की थाल में माटी के दीये जगमग कर रहे हों।
आज जबकि परंपराओं से भिड़ने की तमीज रिस-रिसकर समाज के हर हिस्से में पहुंच रही है, ऐसे में रामलीलाओं विकास यात्रा के पीछे आज भी लोक और परंपरा का ही मेल है। रामकथा के साथ इसे भारतीय आस्था के शीर्ष पुरुष का गुण प्रसाद ही कहेंगे कि पूरे भारत के अलावा सूरीनाम, मॉरिशस, इंडोनेशिया, म्यांमार और थाईलैंड जैसे देशों में रामलीला की स्वायत्त परंपराएं हैं। यह न सिर्फ हमारी सांस्कृतिक उपलब्धि की मिसाल है, बल्कि इसमें मानवीय भविष्य की कई मांगलिक संभावनाएं भी छिपी हैं।

Friday, September 25, 2015

कॉमेडी की नई अपील और कपिल



कॉमेडियन कपिल शर्मा अब टीवी के छोटे परदे के हीरो भर नहीं रहे। उन्होंने अब अपनी फिल्म पारी शुरू कर दी है। हालांकि अभी यह देखना बाकी है कि फिल्मी कपिल को लोग टीवी वाले कपिल की तरह हाथोंहाथ लेते हैं या नहीं? बहरहाल, कपिल लगातार चर्चा में जरूर बने रहते हैं। हाल में उन्होंने अपने कॉमेडी शो के सेट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रित करने की हसरत जाहिर की। नमो उनके शो में आएंगे या नहीं पता नहीं पर कपिल तो अपनी हसरत जताकर चर्चा में आ ही गए। वैसे एक बात तो है कि कपिल शर्मा हाल के दिनों में उभरने वाले ऐसे सितारों में से हैं, जिन्होंने बुलंदी का शिखर बहुत तेजी से चढ़ा।
आज से दो साल पहले लोग वर्ष 2०13 को इस लिहाज से महत्वपूर्ण मान रहे थे कि यह 'आम’ आदमी के 'खास’ होने का साल है। इस साल आम जनता ने एकाधिक बार अपनी ताकत का इजहार किया। यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव की स्थिति रही। इस स्थिति की व्यापकता तब और बढ़ जाती है जब हम देखते हैं आम आदमी के बूते बदलाव का सियासी 'जंतर मंतर’ टीवी-सिनेमा और मनोरंजन जगत में भी काम आ रहा है। कॉमेडियन कपिल शर्मा की दो-तीन साल पहले तक जो भी पहचान थी, वह आम तरह की लोकप्रियता के दायरे में कैद थी। 2०13 में यह दायरा टूटा और वे आम से एक 'खास’ कॉमेडियन हो गए।
'कॉमेडी नाइट विद कपिल’ आज टीवी का एक ऐसा शो बन गया है, जिसकी लोकप्रियता ने बिग बी, सलमान खान, माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर जैसे दिग्गजों को पछाड़ दिया है। बात टीआरपी की करें या कांटेंट की, कपिल सब पर भारी पड़ रहे हैं। आलम यह रहा कि प्रसिद्ध पत्रिका 'फोब्र्स’ तक उन्हें देश के सौ प्रभावशाली लोगों की सूची में स्थान दे चुकी है। कपिल के लिए इतनी जल्दी कामयाबी के इतने बड़े मुकाम तक पहुंचना उन तमाम लोगों के लिए एक सीख है, जो अपनी जिदगी और पृष्ठभूमि को अपनी कामयाबी की राह का बड़ा रोड़ा मानते हैं।
दो अप्रैल 1981 को अमृतसर में जन्मे कपिल शर्मा के पिता पुलिस सेवा में थे जबकि मां एक साधारण गृहिणी। 26 अप्रैल 2००4 को पिता की कैंसर से हुई मौत से अचानक परिवार की सारी जवाबदेही कपिल के कंधों पर आ गई। कपिल के लिए यह चुनौती काफी मुश्किलों भरी थी। एक तो उनकी उम्र कम थी, दूसरे उन्हें काम के नाम पर मंच से लोगों को हंसाना भर आता था। स्कूल-कॉलेज के दिनों में उन्हें इस कारण थोड़ी लोकप्रियता भी मिली, पर महज इस बूते परिवार की जिम्मेदारी को उठाना आसान नहीं था।
कपिल शुरू से थोड़े जुनूनी और इरादों के पक्के रहे। सो इस नई चुनौती को भी उन्होंने अपने तरीके से ही हल करने की ठान ली। कॉमेडी को उन्होंने अपनी हॉबी से आगे एक करियर के तौर पर चुन लिया। इस फैसले से कॉमेडी को लेकर उनका इरादा जहां और मजबूत हुआ, वहीं वे अपने काम को प्रोफेशनली भी गंभीरता से लेने लगे। कपिल के जीवन में तब एक सुखद क्षण आया, जब वे पॉपुलर टीवी शो 'द ग्रेट इंडियन लॉफ्टर चैलेंज’ (सीजन-3) के विजेता बने।
पर शायद इससे बड़ी सफलता जीवन में उनका इंतजार कर रही थी। अपने प्रोडक्शन बैनर के9 के तहत जब स्टैंड अप कॉमेडी शो 'कॉमेडी नाइट विद कपिल’ लेकर आए तो देखते-देखते इसकी लोकप्रियता टीवी के तमाम हिट शोज पर भारी पड़ने लगी। आज आलम यह है कि बड़े सेे बड़े सिने सितारे उनके शो में शामिल होने के लिए लालायित रहते हैं।

Monday, November 24, 2014

प्रतिभा की द्रौपदी...!


ज्ञानपीठ पुरस्कार को इस साल पचास साल पूरे हो रहे हैं। यह अलग बात है कि इस साल 49वें ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हुई है, जो वरिष्ठ हिदी कवि केदारनाथ सिह को दिया गया है। वर्ष के हिसाब से केदारजी को यह सम्मान 2०13 के लिए दिया गया है।
अपनी अर्धशती लंबी इस यात्रा में भारतीय भाषाओं के इस सर्वोच्च और सर्वमान्य माने जाने वाले पुरस्कार को लेकर हर हलके में एक सम्मान का भाव रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण इसका कम विवादित रहना रहा है। पुरस्कारों के अवमूल्यन के दौर में यह उपलब्धि बड़ी बात है।
मुझे याद है कि 2०11 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हुई तो एक साथ मोबाइल फोन और ईमेल पर कई मैसेज आने लगे। इनमें ज्यादातर इस सूचना को साझा करने वाले थे कि इस बार ज्ञानपीठ सम्मान के लिए चुनी गई हैं वरिष्ठ उडिèया कथाकार प्रतिभा राय।
ताज्जुब हुआ कि गूगल के सर्च इंजन पर एक हफ्ते के अंदर इतनी सारी सामग्री इकट्ठा हो गई कि जिन्होंने पहले प्रतिभा जी को नहीं पढ़ा था, वे भी इस बारे में कई रचनात्मक तथ्यों से अवगत होने लगे। हिदीप्रेमियों के फ़ेसबुक वाल पर प्रतिभा जी की नई-पुरानी तस्वीरें साझा होने लगीं। साथ में सबके अपने मूल्यांकन और टिप्पणियां। हिदी की कई पत्रिकाओं ने इस अवसर पर या तो अपने विशेषांक निकाले या फिर प्रतिभा राय की कहानियों को पुनर्पाठ के लिए पाठकों को प्रस्तुत किया। ईमानदारी से कहूं तो पुरस्कार की घोषणा के बाद ही मैंने भी प्रतिभा जी के बारे में काफी कुछ पढ़ा और जाना-समझा। खासतौर पर उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'द्रौपदी’
को लेकर।
प्रतिभा राय भारतीय साहित्यकारों की उस पीढ़ी की हैं, जिन्होंने गुलाम नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में अपनी आंखें खोलीं। लिहाजा, अपनी अक्षर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने स्वतंत्र लीक गढ़ने का हौसला दिखाया। उडिèया से बाहर का रचना संसार उनके इस हौसले से ज्यादा करीब से तब परिचित हुआ, जब उनका उपन्यास आया- 'द्रौपदी’। भारतीय पौराणिक चरित्रों को लेकर नवजागरण काल से 'सुधारवादी साहित्य’ लिखा जा रहा है, जिसमें ज्यादा संख्या काव्य कृतियों की है। कथा क्षेत्र में इस तरह का कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ।
समकालीन जीवन के गठन और चिताओं को लेकर एक बात इधर खूब कही जाती है कि साहित्य के मौजूदा सरोकारों पर खरा उतरने के लिए अब 'बिबात्मक’ औजार से ज्यादा जरूरी है- 'कथात्मक हस्तक्षेप’। मौजूदा भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी दुराग्रहों पर हमला बोलने के लिए प्रतिभा राय ने इस दरकार को समझा। 'द्रौपदी’ में वह विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर सामाजिक नजरिया, पति-पत्नी संबंध और स्त्री प्रेम को लेकर काफी ठोस धरातल पर संवाद करती हैं। इस संवाद में वह एक तरफ जहां पुरुषवादी आग्रहों को चुनौती देती हैं, वहीं भारतीय स्त्री के गृहस्थ जीवन को रचने वाली विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर भी वह संवेदनात्मक सवाल खड़ी करती हैं।
बहरहाल, 'द्रौपदी’ उपन्यास की रचयिता का रचना संसार काफी विषद और विविधतापूर्ण है। कथा साहित्य के साथ कविता के क्षेत्र में भी वह अधिकारपूर्वक दाखिल हुई हैं। उनका रचनाकर्म अभी न तो थका है और न ही विराम के करीब है, इसलिए उनसे आगे और महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों की उम्मीद है।

Monday, November 17, 2014

ऐसे तो लौटने से रहे महात्मा


समय से हम सब बंधे हैं पर समय को बांधने की भी हमारी ललक रहती है। तभी तो समय को जीने से पहले ही हम उसके नाम का फैसला कर लेते हैं। यह ठीक उसी तरह है, जैसे बच्चे के जन्म के साथ उसका नामकरण संस्कार पूरा कर लिया जाता है। यह परंपरा हमारी स्वाभाविक वृत्तियों से मेल खाती है।
जिस 21वीं सदी में हम जी रहे हैं, उसका आगमन बाद में हुआ नामकरण पहले कर दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी इसे कंप्यूटर और सूचना क्रांति की सदी बताते थे। उनकी पार्टी आज भी इस बात को भूलती नहीं और देश को जब-तब इस बात की याद दिलाती रहती है। बहरहाल, बात इससे आगे की। 21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिसक प्रयोगों को आजमाया गया तो फिर से एक बार समय के नामकरण की जल्दबाजी देखी गई। भारतीय मीडिया की तो छोड़ें अमेरिका और इंग्लैंड से निकलने वाले जर्नलों और अखबारों में कई लेख छपे, बड़ी-बड़ी हेडिग लगी कि भारत में एक बार फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण और उन्हें सशक्त बनाने के लिए खासतौर पर देशभर के युवा एकजुट हो रहे हैं। सूचना और तकनीक के साझे के जिस दौर को गांधीवादी मूल्यों का विलोमी बताया जा रहा था, अचानक उसे ही इसकी ताकत और नए औजार बताए जाने लगे। नौबत यहां तक आई कि थोड़ी हिचक के साथ देश के कई गांवों-शहरों में रचनात्मक कामों में लगी गांधीवादी कार्यकर्ताओं की जमात भी इस लोक आलोड़न से अपने को छिटकाई नहीं रख सकी। वैसे कुछ ही महीनों के जुड़ाव के साथ इनमें से ज्यादातर लोगों ने अपने को इससे अलग कर लिया।
इस सिलसिले में एक उल्लेख और। भाजपा के थिक टैंक में शामिल रहे सुधींद्र कुलकर्णी ने अपनी किताब 'म्यूजिक ऑफ द स्पीनिग व्हील’ में तो इंटरनेट को गांधी का आधुनिक चरखा तक बता दिया। कुलकर्णी ने अपनी बात सिद्ध करने के लिए तमाम तर्क दिए और यहां तक कि खुद गांधी के कई उद्धरणों का इस्तेमाल किया। कुलकर्णी के इरादे पर बगैर संशय किए यह बहस तो छेड़ी ही जा सकती है कि जिस गांधी ने अपने 'हिद स्वराज’ में मशीनों को शैतानी ताकत तक कहा और इसे मानवीय श्रम और पुरुषार्थ का अपमान बताया, उसकी सैद्धांतिक टेक को कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी परावलंबी तकनीक और भोगवादी औजार के साथ कैसे मेल खिलाया जा सकता है।
संयोग से गांधी के 'हिद स्वराज’ के भी सौ साल पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर गांधीवादी विचार के तमाम अध्येताओं ने एक सुर में यही बात कही कि इस पुस्तक में दर्ज विचार को गांधी न तब बदलने को तैयार थे और न आज समय और समाज की जो नियति सामने है, उसमें कोई इसमें फ़ेरबदल की गंुजाइश देखी जा सकती है।
अब ऐसे में कोई यह बताए कि साधन और साध्य की शुचिता का सवाल आजीवन उठाने वाले गांधी की प्रासंगिकता और उनके मूल्यों की 'रिडिस्कवरी’ की घोषणा ऐसे ही तपाक से कैसे की जा सकती है? तो क्या गांधी के मूल्य, उनके अहिसक संघर्ष के तरीकों की वापसी की घोषणा में जल्दबाजी की गई। अगर आप देश में 'आप’ की राजनीति पर नजदीकी नजर रख रहे होंगे तो इस सवाल का जवाब आपको जरूर मिल गया होगा।