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Tuesday, November 23, 2010

कितने गंदे हम


ऐसे समय में जबकि देश में सार्वजनिक जीवन में मलिनता को लेकर बहस की गरमाहट बढ़ी है, ’स्वच्छता‘ का सवाल खड़ा करना कुछ बुनियादी सरोकारों को रेखांकित करने जैसा है। हालिया कुछ आंकड़े हमारे विकास का विरोधाभासी चरित्र उजागर करते है। एक अरब से ज्यादा की आबादी वाले देश में अगर आज भी महज 36 करोड़ लोग ही ऐसे है जो शौचकर्म खुले में नहीं करते तो साफ है कि हमारी वस्तुस्थिति और उन्नति के बीच की खाई खासी चौड़ी है। इस खाई के बड़े और गहरे होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि देश में सेलफोन पर बतियाने वालों की गिनती शौचालय का प्रयोग करने वालों से दोगुनी है।
दरअसल, तेजी से हो रहे शहरीकरण ने गांव-देहात के जीवन की न सिर्फ उपेक्षा की है बल्कि एक ऐसी सनक के कंधे पर हाथ रखा है जिसमें कुछ चेहरों की लाली के लिए लाखों-करोड़ों मुरझाए चेहरे उनके हाल पर छोड़ दिये गये है। अच्छी बात यह है कि विकास योजनाओं के एकांगी चरित्र से बचने की सोच सरकार के भीतर भी अब काफी हद तक कारगर शक्ल अख्तियार कर रही है। इसे बेहतर संकेत मानना चाहिए कि विकास और समृद्धि के ऊपरी नारों और वादों की जगह, बिजली, सड़क, शौचालय और पानी जैसे बुनियादी जरूरत के मुद्दे एक बार फिर एजेंडे में बहाल हो रहे है। छूटते जा रहे इन मुद्दों ने जाति और क्षेत्र की राजनीति करने वालों को भी हतोत्साहित किया है।
केंद्र में जब दूसरी बार मनमोहन सरकार आई तब भी माना गया कि रोजगार गारंटी जैसी महात्वाकांक्षी योजनाओं के बूते ही संप्रग लोगों का व्यापक समर्थन हासिल करने में सफल रही। आज सरकार द्वारा जिस समेकित विकास नीति पर जोर दिया जा रहा है, उसकी जरूरत भी इसलिए पड़ी कि विकास की सरपट दौड़ में काफी कुछ छूटता चला गया है। जिन आंकड़ों से हमारे विकास का मलिन चेहरा उजागर हुआ है, उसमें यह भी शामिल है कि देश के दिल्ली और केरल जैसे हिस्सों में बेहतर स्वच्छता सहूलियत का लाभ उठाने वालों का प्रतिशत 90 से ज्यादा है जबकि झारखंड, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में स्थिति सबसे खराब है। साफ है कि शिक्षा और शहरीकरण का सीधा रिश्ता स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसी बुनियादी सहूलियतों से जुड़ा है। शहरी आबादी का बढ़ता बोझ और पलायन जैसी समस्या के पीछे भी शहर बनाम गांव की स्थिति सबसे बड़ा कारण है।
हमारी लोक परंपरा में स्वच्छता का स्थान काफी ऊंचा है। यह कहीं न कहीं हमारे संस्कारों में भी बीज रूप से शामिल है। हां, अशिक्षा और गरीबी ने देश की आबादी के एक बड़े हिस्से की परिस्थति को इतना मजबूर जरूर कर दिया कि उसे महज दो जून की रोटी के संघर्ष के साथ किसी तरह गुजर-बसर करने की जद्दोजहद में ही अपना सारा सामर्थ्य झोंक देना पड़ता है। अब जबकि सरकार का ध्यान शिक्षा और खाद्य सुरक्षा की तरफ गंभीरता से गया है तो उम्मीद करनी चाहिए कि न सिर्फ देश के संभ्रांत और सभ्य कहे जाने वाले इलाकों बल्कि सुदूर गांव-देहातों में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता की बुनियादी सहूलियतें पहुंचेंगी।

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