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Thursday, May 29, 2014

रोनाल्ड रीगन की तरह उभरे हैं मोदी


महज तुलना के भरोसे कभी भी गंभीर विमर्श आगे नहीं बढ़ाता। पर इसका यह कतई मतलब नहीं कि तुलना का कोई महत्व ही नहीं है। तुलनात्मक विवेक का होना तार्किकता के लिए तो जरूरी है ही, इससे अच्छे-बुरे की एक सामान्य समझ को विशिष्ट बनाने में भी मदद मिलती है। तुलना को लेकर यह भी काफी महत्व की बात है कि यह हमारी स्वाभाविक वृति का हिस्सा है। अपनी कोई भी राय बनाने या किसी निर्णय पर पहुंचने के लिए हम अकसर जिस साधन की मदद लेते हैं, वह तुलना ही है। एक की दूसरे से, पहले की बाद से तुलना करके ही हम अपनी किसी समझ को गढ़ते हैं।
देश में आजकल ऐसी ही समझ को गढ़ने का एक नया सिलसिला शुरू हो गया है। इस सिलसिले के केंद्र में हैं भारत के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। कोई उनकी तुलना उनकी पृष्ठभूमि और जीवन को देखते हुए पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से कर रहा है तो कोई उन्हें गुजरात की माटी से निकला देश का एक और महापुरुष बता रहा है। गुजरात की ऐतिहासिकता को खंगालने वाले महात्मा गांधी, सरदार पटेल, मोरारजी देसाई की पांत में नरेंद्र मोदी को बिठा रहे हैं।
मोदी की छवि और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए लोग उनकी तुलना दूसरे देशों के नेताओं से भी कर रहे हैं और यह काम भारत में ही नहीं पड़ोसी पाकिस्तान से लेकर ब्रिटेन और अमेरिका तक हो रहा है। कोई मोदी को चीनी राष्ट्रपति शी जिन पींग के समकक्ष रखकर देख रहा तो कोई रूसी राष्ट्रपति पुतिन और मोदी में विलक्षण समानताएं देख रहा है। 6० वर्षीय जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे से भी मोदी की तुलना करने वाले बहुतेरे हैं।
बात जिन पींग की करें या फिर पुतिन की या कि शिंजो आबे की, लोग इन विश्व नेताओं की तुलना नरेंद्र मोदी से करने में इसलिए दिलचस्पी दिखा रहे हैं कि इन सभी नेताओं ने अपने देश की एक मुश्किल वक्त में कमान संभाली है। यही नहीं, इन तीनों नेताओं को यह भी श्रेय जाता है कि वे अपने देश को लोगों में राष्ट्र स्वाभिमान की भावना का संचार कर लगन, ऊर्जा और जोश को नए सिरे से बहाल कर पाने में सफल रहे।
इस दृष्टि से नरेंद्र मोदी की सबसे दिलचस्प तुलना की गई है पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से। इस तुलना में अतीत और वर्तमान के बीच जहां संवाद के पुल का निर्माण होता है, वहीं यह भी दिखता है कि किस तरह एक नया उन्नयन, एक नया उभार पूरी दुनिया की निगाहों को अपनी तरफ मोड़ने में सफल होता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय विचार और संवाद जगत में उनको लेकर बातें हो रही हैं बल्कि अब भारत को लेकर भी नए तरह के आकलन और मूल्यांकन सामने आ रहे हैं।
बहरहाल, बात मोदी और रीगन की। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के प्रशासन से जुड़े रहे डेविड कोहेन ने लेख में नरेंद्र मोदी की तुलना पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से की है। उन्होंने दोनों नेताओं में कई समानताएं गिनाई हैं। उनका मानना है कि भारत को अपनी वृहद आर्थिक संभावनाओं को साकार करने में मोदीनॉमिक्स मददगार होगा। उनकी बात से भारतीय पाठक दंग हैं कि पश्चिम से एक आवाज आई है जो मोदी के प्रति नकारात्मक नहीं है।
कोहेन रीगन के प्रशंसक हैं और भारत के भी। भारतीय समाज के बारे में उनकी आलोचना को एक अमेरिकी द्बारा भारत के कमतर दिखाने के बजाय उसे एक भारत समर्थक अमेरिकी की राय मानना चाहिए। जो अमेरिकी और भारतीय समाज की कई बुराइयों और अच्छाइयों में समानता देखता है। उन्हें अमेरिका के चालीसवें राष्ट्रपति रीगन और नरेंद्र मोदी में कई समानताएं नजर आती हैं। मसलन, दोनों ही सामान्य परिवेश से आए हैं। दोनों लोकप्रिय और राज्य के मुख्यमंत्री (रीगन कैलिफोर्निया के गवर्नर रहे हैं) रहे। दोनों ही नेता खुली अर्थव्यवस्था के समर्थक हैं। दोनों के राजनीतिक विरोधी भी एक जैसे हैं। अमेरिका की ही तरह भारत में भी सांस्कृतिक कुलीनों का एक वर्ग है जो हर बात की तस्दीक के लिए यूरोप के अपने पुराने शासकों की ओर देखता है। यह वर्ग रीगन की ही तरह मोदी का भी तिरस्कार करता रहा है। यह वर्ग इस खयाल से भी घबरा जाता है कि उसके देश का नेतृत्व एक चाय वाले के हाथ में आ सकता है।
अमेरिकी संभ्रांत वर्ग को लगता था कि रीगन एक गंवार और सीधे सादे व्यक्ति हैं जो अतिरेक से भरे हैं। उन्होंने चुनाव के समय चेताया भी था कि अगर रीगन राष्ट्रपति बन गए तो देश मुसीबतों में फंस जाएगा। चुनाव के बाद क्या हुआ यह अब तारीखहै। अमेरिका के इस वर्ग ने रीगन पर जातिवादी (रेसिस्ट) होने का भी आरोप लगाया। अमेरिका में इस वर्ग के पास जब तर्क और तथ्य नहीं होते तो वे गालीगलौज पर उतर आते हैं।
मोदी को भी उनके विरोधी सांप्रदायिक कहते हैं। इस तरह का आरोप लगाने के पीछे विरोधियों की नीति अल्पसंख्यकों को डराकर उनका समर्थन हासिल करने की रही है। डेविड कोहेन लिखते हैं कि उन्हें भारत की मुख्यधारा की मीडिया में हो रही चर्चा थोड़ी भ्रामक लगती है। इसके मुताबिक यदि आप धर्म के आधार पर लोगों के साथ अलग सलूक का समर्थन करें तो आप धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील समझे जाते हैं। यदि आप सभी नागरिकों को समान रूप से देखते हैं तो आप धार्मिक उग्रवादी हैं। उनके मुताबिक दूसरे धर्मों के अनुयायिओं विकास का अवसर देना हिदू धर्म की सहिष्णुता का परिचायक है। भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की हालत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मोदी को धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णु बताने वाले पड़ोसी देशों के मानक नहीं अपनाते।
कोहेन ने मोदी के पाकिस्तान के प्रति कठोर रवैए की तुलना रीगन के सोवियत संघ के प्रति रवैए से की है। उनका कहना है कि मोदीनॉमिक्स भारत की अंतर्निहित आर्थिक शक्ति के दोहन के लिए अच्छा है, जिसे क्रोनी सोशलिज्म ने अवरूद्ध कर रखा है। यदि भारत की बहुआयामी उद्यमिता को अवसर मिले वह आकाश की ऊंचाइयों को छू सकता है।
अमेरिका में नरेंद्र मोदी उसी वर्ग में अवांछित रहे हैं, जिस वर्ग में रीगन थे। उनके मुताबिक अमेरिका की नौकरशाही पर वामपंथी रुझान के आभिजात्य वर्ग का कब्जा रहा है। उसी ने मोदी के अमेरिकी वीजा मिलने में अड़ंगेबाजी की। अमेरिका ऐसे नेताओं को वीजा देते रहते हैं जिन्होंने अपने देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों को गैरकानूनी घोषित कर रखा और दूसरे धर्मों के प्रति घृणा फैलाना जिनकी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा है।
आखिर में डेविड कोहेन लिखते हैं कि भारत को शायद अपना रीगन मिल गया है। अमेरिका को अपना मोदी कब मिलेगा?
 

Wednesday, May 28, 2014

नमो फंडा भी और झंडा भी


पिछले दो दशकों में देश में जीवन, समाज और सरोकारों को लेकर जो एक नई समझ बनी है, उसे एड्रेस करने में देश की राजनीति हाल तक असफल रही है। नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और उनका बढ़ता आभा मंडल इसी नाकामी की कोख से पैदा हुआ है। मोदी जिस नए भारत के नेता हैं उसमें नवमध्य वर्ग और ग्लोबल दौर की नई युवा पीढèी का रकबा सबसे ज्यादा है। इस बढ़े दायरे के बीच एक द्बंद्ब भी है, नागरिक अस्मिता और उपभोगवादी चेतना के बीच।
मोदी इन तमाम स्थितियों को समझते हैं और इस समझदारी के अनुरूप ही वे लगातार खुद को ढालते चले गए हैं। उनकी स्कूलिंग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जरूर है। पर वे अपने जड़ों से आज भी नहीं कटे हैं पर शाखों पर नए पत्ते जरूर आए हैं। वैसे भी परंपरा के रूढ़ता में बदल जाने के खतरे को लेकर जो लोग खुद को आगाह नहीं करते, उनके अतीत के पन्नों में खो जाने में देर नहीं लगती।
हर बात में चौकन्नादिल्ली विश्वविद्यालय में एसआरसीसी के छात्रों को जब वे संबोधित करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे प्रबंधन क्षेत्र के किसी धुरंधर की तरह बात कर रहे हों। ऐसे मौकों पर वे अपने दिखने-बोलने की शैली को लेकर खासतौर पर चौकन्ने रहते हैं।
उनका यह चौकन्नापन किस तरह का है, यह तब विशेष तौर पर लोगों की निगाहों में आया था, जब सद्भावना के लिए किए अनशन जैसे सादे और गरिमामय अवसर पर भी कैमरे की नजर से बचकर बालों पर कंघी फेरना वे नहीं भूले। यह किसी आदर्शवाद के खिलाफ स्थिति नहीं बल्कि भारतीय समाज में तेजी से प्रसारित हुआ नया युगबोध है और इस बोध से जुड़ने में मोदी को कोई हिचक नहीं है। मोदी यहीं अपने समकालीन नेताओं की पांत से अलग खड़े हो जाते हैं। इसी वजह से वे अपनी पार्टी के कई पुराने नेताओं से भिन्न मालूम पड़ते हैं और कइयों के लिए आदर्श।
देश की संसद खाद्य सुरक्षा बिल पर बहस करती है और इस दौरान कांग्रेस और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की तबीयत बिगड़ती है, तो सरकार या कांग्रेसजन की तरफ से कोई जानकारी आए, इससे पहले ट्विटर पर उनका संदेश आ जाता है।
इसी तरह जिस दिन वह पीएम पद की शपथ लेने वाले होते हैं तो सुबह सबसे पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर जाते हैं। वे जब वहां से लौटते हैं तो मीडिया को वे खुद बताते हैं कि वे गुजरात भवन नहीं जा रहे बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आशीष लेने जा रहे हैं। इससे पहले उनके इस कार्यक्रम के बारे में मीडिया को कोई जानकारी नहीं थी।
बदले तकाजे का अहसास
ऐसे चौकस और फुर्तीले मोदी को पता है अरब बसंत के दौर में बदलाव और नेतृत्व के तकाजे बदल गए हैं। इसमें एक तरफ देशप्रेम है तो दूसरी तरफ अभिव्यक्ति का खुलापन। एक तरफ समाज, संबंध और सरोकारों की नई दुनिया है तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार और स्त्री असुरक्षा के खिलाफ गुस्सा भी है।
इस सबके साथ एक बात यह भी कि अब उपलब्धि का मतलब ही वर्टिकल हो गया है, यानी द्रुत और दूर तक दिखने वाला विकास। एक ऐसा विकास जो न सिर्फ जरूरी हो बल्कि चमकदार भी हो ताकि उसकी अच्छे से मार्केटिंग हो सके।
ऐसा नहीं है कि मोदी के मुख्यमंत्री रहते गुजरात बाकी विकसित राज्यों को पीछे धकेलता हुआ काफी आगे निकल गया या अब उनके दिल्ली के तख्त पर बैठते ही ऐसा कुछ हो जाएगा। पर एक बात तो जरूर है कि बात चाहे राज्य में पनबिजली परियोजनाओं की हो या बिजली-सड़क-पानी की, पिछले एक दशक से ज्यादा समय में वहां काफी काम हुआ है और लोगों के जीवन में इससे काफी फर्क भी आया है। रही बात औद्योगिक ढांचे और अन्य राज्यों और विदेशों से निवेश की करें तो गुजरात निश्चित रूप से ऐसे तमाम प्रस्तावों का अल्टीमेट डस्टिनेशन है।
मोदी की खासियत यह है कि वे काम के साथ काम की और अपनी मार्केटिंग करना भी जानते हैं, नहीं तो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी भाजपा की सरकारें हैं और वहां भी काम अच्छा हो रहा है। पर इसका श्रेय उस तरह न तो शिवराज सिंह चौहान को मिल रहा है और न रमन सिंह को। ये इन दो नेताओं की नाकामी नहीं बल्कि व्यक्तित्व का अंतर है। मोदी ने अपना व्यक्तित्व और छवि समय के अनुसार बदला है, उन्हें होना, करना और दिखना के बीच का रिस्ता समझ में आता है। यही कारण है कि वे कामयाब भी हैं और लोकप्रिय भी।
डांडिया से पतंगबाजी तक
मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले अगर आप उनकी गुजरात में बढ़ी लोकप्रियता के एजेंडे पर गौर करें तो उसमें हर वे तत्व मिलेंगे जो नए मूल्यबोध पर खरे उतरते हैं। डांडिया से लेकर पतंगबाजी तक सब अब वाइब्रेंट गुजरात के रंग में नहाया है। खास बात यह है कि यह सब करते हुए नरेंद्र मोदी परंपरा विरोधी नहीं बल्कि पुरानी और नई परंपराओं की साझी जमीन पर खड़े हुए दिखते हैं। स्वामी विवेकानंद, सरदार वल्लभभाई पटेल से लेकर अमिताभ बच्चन तक हर उस नाम के साथ वे जुड़ते हैं जिनकी अपीलिंग पावर आज भी असंदिग्ध है।
 

Monday, May 12, 2014

मदर इंडिया 2०14



 किसी को अगर यह शिकायत है कि परंपरा, परिवार, संबंध और संवेदना के लिए मौजूदा दौर में स्पेस लगातार कम होते जा रहे हैं, तो उसे नए बाजार बोध और प्रचलन के बारे में जानकारी बढ़ा लेनी चाहिए। जो सालभर हमें याद दिलाते चलते हैं कि हमें कब किसके लिए ग्रीटिग कार्ड खरीदना है और कब किसे किस रंग का गुलाब भेंट करना है। बहरहाल, बात उस दिन की जिसे मनाने को लेकर हर तरफ चहल-पहल है। मदर्स डे वैसे तो आमतौर पर मई के दूसरे रविवार को मनाने का चलन है। पर खासतौर पर स्कूलों में इसे एक-दो दिन पहले ही मना लिया गया ताकि हफ्ते की छुट्टी बर्बाद न चली जाए। रही बात भारतीय मांओं की स्थिति की तो गर्दन ऊंची करने से लेकर सिर झुकाने तक, दोनों तरह के तथ्य सामने हैं। कॉरपोरेट दुनिया में महिला बॉसों की गिनती अब अपवाद से आगे कार्यकुशलता और क्षमता की एक नवीन परंपरा का रूप ले चुकी है।
सिनेजगत में तो आज बकायदा एक पूरी फेहरिस्त है, ऐसी अभिनेत्रियों की जो विवाह के बाद करियर को अलविदा कहने के बजाय और ऊर्जा-उत्साह से अपनी काबिलियत साबित कर रही हैं। देश की राजनीति में भी बगैर किसी विरासत के महिला नेतृत्व की एक पूरी खेप सामने आई है। पर गदगद कर देने वाली इन उपलब्धियों के बीच जीवन और समाज के भीतर परिवर्तन का उभार अब भी कई मामलों में असंतोषजनक है।
आलम यह है कि मातृत्व को सम्मान देने की बात तो दूर देश में आज तमाम ऐसे संपन्न, शिक्षित और जागरूक परिवार हैं, जहां बेटियों की हत्या गर्भ में ही कर दी जाती है। इस मुद्दे को अभिनेता आमिर खान ने अपने टीवी शो 'सत्यमेव जयते’ के पिछले सीजन में काफी जोर-शोर से उठाया था। इसकी देश की संसद तक में चर्चा हुई।
रही जहां तक प्रसव और शिशु जन्म की बात तो यहां भी सचाई कम शर्मनाक नहीं है। देश में आज भी तमाम ऐसे गांव-कस्बे हैं, जहां प्रसव देखभाल की चिकित्सीय सुविधा नदारद है। जहां इस तरह की सुविधा है भी वहां भी व्यवस्थागत कमियों का अंबार है।
सेव द चिल्ड्रेन ने अपनी सालाना रिपोर्ट वल्डर््स मदर्स-2०12 में भारत को मां बनने के लिए खराब देशों में शुमार करते हुए उसे 8० विकासशील देशों में 76वें स्थान पर रखा है। स्थिति यह है कि देश में 14० महिलाओं में से एक की प्रसव के दौरान मौत हो जाती है।
स्वास्थ्य सेवा की स्थिति इतनी बदतर है कि मात्र 53 फीसद प्रसव ही अस्पतालों में होते हैं। ऐसे में जो बच्चे जन्म भी लेते हैं, उनकी भी स्थिति अच्छी नहीं है। पांच साल की उम्र तक के बच्चों में 43 फीसद बच्चे अंडरवेट हैं।
टीयर-2 देशों की बात करें तो सर्वाधिक बाल कुपोषित बच्चे भारत में ही हैं। ऐसी दुरावस्था में हमारी सरकार अगर देशवासियों को मदर्स डे की शुभकामनाएं देती है और समाज का एक वर्ग इस एक दिनी उत्साह में मातृत्व के प्रति औपचारिक आभार की शालीनता प्रकट करने में विनम्र होना नहीं भूलता तो यह देश की तमाम मांओं के प्रति हमारी संवेदना के सच को बयां करने के लिए
काफी है।
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हमारा दौर बुजुर्ग विरोधी!
यह दौर युवाओं का है। यह बात ऐसे कही जाती है जैसे युवा पहली बार किसी दौर की अगुवाई कर रहे हैं यानि कि युवाओं की मौजूदगी को महसूस करना कोई आविष्कारिक घटना सरीखा है। दरअसल, यह एक आशावादी दृष्टिकोण है भविष्य के प्रति। युवाओं के बहाने हम अपने भविष्य को बेहतर गढ़ना चाहते हैं, इसलिए ऐसा कहते हैं। वैसे कोई दौर उन तमाम लोगों का होता है, जो उस दौर के जीवनकाल को जीते हैं। यह अलग बात है कि नायकत्व की दावेदारी और अवधारणा दोनों ही समवेत की जगह भेड़िया और गड़ेरिया वाली समझ से बनती है। बहरहाल, ये बातें यहीं तक... आगे एक सीधा सवाल कि क्या हमारा दौर बुजुर्ग विरोधी है? क्या नई पीढ़ी का मानस इतना आधुनिक और विकसित हो गया है कि वह अपने जनकों की परवाह किए बगैर भविष्य का रास्ता तय करना चाहते हैं?
अगर हम ऐसे कुछ सवालों से दो-चार होना चाहें तो अपने समय की एक अनुदार और निराशाजनक स्थिति की पूरी बुनावट समझ में आएगी। शहरों से लेकर गांव तक बुजुर्गों के अकेले और निहत्थे पड़ते जाने की नियति घनी होती जा रही है। कुछ साल पहले केंद्र सरकार का ध्यान इस ओर गया और उसे जरूरी लगा कि वह बच्चों को अपने मां-पिता के प्रति कानूनी तौर पर जवाबदेह बनाए। केंद्र ने तब इस मुद्दे को लेकर जो पहल की वह आज भी पूरी तरह कारगर नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह राज्य सरकारों का गैरजिम्मेदार रवैया रहा। महज दस राज्यों में ही यह कानून पूरी तरह लागू हो पाया। पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में सबसे ज्यादा बुजुर्ग आबादी है। पर इन राज्यों ने बच्चों को अपने माता-पिता के प्रति जवाबदेह बनाने वाले कानून को अपने यहां लागू करने की जरूरत ही नहीं समझी। रही जहां तक केंद्र सरकार की बात तो वह केंद्र शासित राज्यों से भी अपनी बात मनवाने में नाकाम रही।
नतीजतन तीन साल पुरानी पहल के अनपेक्षित हश्र के बाद केंद्र के स्तर पर भी अब बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर किसी नई पहल या एजेंडे को लेकर कोई चिता, कोई बहस नहीं चल रही है। आलम यह है कि 1999 के बाद से राष्ट्रीय बुजुर्ग नीति की न तो समीक्षा हुई और न ही नई नीति पेश करने को लेकर कोई अंतिम सूरत सामने है। गौरतलब है कि देश में दस करोड़ से ज्यादा बुजुर्गों को इस कानून के तहत संरक्षण दिए जाने का लक्ष्य था। अब जबकि बुजुर्गों के भरण-पोषण और कल्याण के लिए बना यह कानून अपने लक्ष्य और उद्देश्यों को कहीं से भी पूरा करता नहीं दिखता तो एक सवाल तो जरूर कचोटता है कि क्या हम सचमुच इतने असंवेदनशील और क्रूर समय को जी रहे हैं, जिनमें उम्र की लाचारी की तरफ न देखना हमारी आदत और खुदगर्ज जरूरत का हिस्सा बन गया है।
वरिष्ठ नागरिकों के नाम पर बैंकों के जमा खाते में कुछ फीसद का ब्याज बढ़ा देने और रेल यात्रा टिकटों में कुछ रियायत देकर हमारी सरकारें बुजुर्गों के प्रति जो टोकन रूप में फर्ज निभा रही हैं, उसकी एक असलियत यह भी है कि देश में अपराधी तो अपराधी, अपने बच्चों तक से इन उम्रदराज लोगों को जीवन का सबसे ज्यादा खतरा है। परिवार की संयुक्त अवधारणा के विसर्जन ने जहां नौजवानों के लिए सुविधाजनक एकल परिवार की संकल्पना सामने रखी, वहीं एक उम्र के बाद समय और समाज के लिए गैरजरूरी बोझ बनने की खतरनाक नियति को भी रच दिया। अगर हम सचमुच एक जागरूक, जवाबदेह और संवेदनशील भविष्य की कामना करते हैं तो हमारी सरकारों के साथ समाज को भी बुजुर्गों के प्रति ईमानदार और जवाबदेह होना पड़ेगा।



Tuesday, May 6, 2014

हमें मत कहिए ग्लोबल यूथ


सीजन चुनाव का है तो आजकल बातें भी सबसे ज्यादा चुनावों को लेकर ही हो रही हैं। नेताओं के भाषणों से लेकर चाय की दुकानों पर होने वाली बहसों में जो एक बात कॉमन है, वह है भारत के नए वोटरों की बात। सभी यही कह रहे हैं कि 18 से 28 वर्ष की उम्र के नौजवान इस बार चुनावी निर्णय को सबसे ज्यादा प्रभावित करेंगे। इसी के साथ शुरू हो गया है एक नया विमर्श फ़ेसबुकिया पीढ़ी से लेकर ग्लोबल पीढ़ी की शिनाख्त पाने वाले नौजवान भारत को लेकर। ज्यादातर आग्रह इंपोजिग नेचर के हैं तो कुछ दलीलों में तथ्य कम आग्रह ज्यादा है। दरअसल, जिसे नए दौर की पीढ़ी कहते हैं, उसकी चेतना और मानस को समझने के लिए हम ग्लोबल तकाजों की तलाश करते हैं। पर उसकी दुनिया बिल्कुल वैसी ही नहीं है, जैसी मीडिया या फिल्मों में दिखाई पड़ती है। इस विभ्रम की सबसे बड़ी वजह देश की गुड़-माटी की समझ रखने वाले क्रिटिकल एप्रोच में तेजी से आई कमी है। 
लोक और परंपरा के कल्याणकारी मिथकों पर भरोसा करने वाले आचार्यों की बातें अब विश्वविद्यालयों के शोधग्रंथों तक सिमट कर रह गई हैं। इन पर मनन-चितन करने का भारतीय समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक विवेक बीते दौर की बात हो चुकी है। ऐसा अगर हम कह रहे हैं तो इसलिए कि ऐसा मानने वाले आज ज्यादा हैं। पर तथ्य के साथ सत्य भी यहीं आकर टिकता हो, ऐसा नहीं है। 
सेक्स, सेंसेक्स और सक्सेस
दिलचस्प है कि खुले बाजार ने अपने कपाट जितने नहीं खोले, उससे ज्यादा हमने भारतीय युवाओं के बारे में आग्रहों को खोल दिया। सेक्स, सेंसेक्स और सक्सेस के त्रिकोण में कैद नव भारतीय युवा की छवि और उपलब्धि पर सरकार और कॉरपोरेट जगत सबसे ज्यादा फिदा हैं। ऐसा हो भी भला क्यों नहीं। क्योंकि इनमें से एक ग्लोबल इंडिया का रास्ता बुहारने और दूसरा रास्ता बनाने में लगा है। यह भूमिका और सचाई उन सबको भाती है जो भारत में विकास और बदलाव की छवि को पिछले दो दशकों में सबसे ज्यादा चमकदार बताने के हिमायती हैं। 
ऐसे में कोई यह समझे कि देश की युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा न सिर्फ इन बदलावों के प्रति पीठ किए बैठा है बल्कि ग्लोबल इंडिया का मुहावरा ही उसके लिए अब तक अबूझ है तो हैरानी जरूर होगी। पर क्या करें सचाई की जो असली सरजमीं है, वह हैरान करने वाली ही है। 
लोकतंत्र पर भरोसा 
इस दशक के तकरीबन आरंभ में 'इंडियन यूथ इन ए ट्रांसफॉîमग वर्ल्ड : एटीट्यूड्स एंड परसेप्शन’ नाम से एक शोध अध्ययन चर्चा में थी। इसमें बताया गया था कि देश के 29 फीसद युवा ग्लोबलाइजेशन या मार्केट इकोनमी जैसे शब्दों और उसके मायने से बिल्कुल अपरिचित हैं। यही नहीं देश की जिस युवा पीढ़ी को इस इमîजग फिनोमेना से अकसर जोड़कर देखा जाता है कि उसकी आस्था चुनाव या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं व मूल्यों के प्रति लगातार छीजती जा रही है, उसके विवेक का धरातल इस पूर्वाग्रह से बिल्कुल अलग है। आज भी देश के तकरीबन आधे यानी 48 फीसद युवक ऐसे हैं, जिनका न सिर्फ भरोसा अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रति है बल्कि वे जीवन और विकास को इससे सर्वथा जुड़ा मानते हैं। 
साफ है कि पिछले दो-ढाई दशकों में देश बदला हो कि नहीं बदला हो, हमारा नजरिया समय और समाज को देखने का जरूर बदला है। नहीं तो ऐसा कतई नहीं होता कि अपनी परंपरा की गोद में खेली पीढ़ी को हम महज डॉलर, करिअर, पिज्जा-बर्गर और सेलफोन से मिलकर बने परिवेश के हवाले मानकर अपनी समझदारी की पुलिया पर मनचाही आवाजाही करते। जमीनी बदलाव के चरित्र को जब भी सामाजिक और लोकतांत्रिक पुष्टि के साथ गढ़ा गया है, वह कारगर रहा है। एक गणतांत्रिक देश के तौर पर छह दशकों से ज्यादा के गहन अनुभव और उसके पीछे दासता के सियाह सर्गों ने हमें यह सबक तो कम से कम नहीं सिखाया है कि विविधता और विरोधाभास से भरे इस विशाल भारत में ऊपरी तौर पर किसी बात को बिठाना आसान है। तभी तो हमारे यहां बदलाव या क्रांति की भी जो संकल्पना है, वह जड़मूल से क्रांति की है, संपूर्ण क्रांति की है।
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चार बोतल बोदका
देश की लोक, परंपरा और संस्कृति के हवाले से एक बात और... रूढ़ियां तोड़ने से ज्यादा सांस्कृतिक स्वीकृतियों को खारिज करने के लिए बदनाम पब और लव को बराबरी का दर्ज़ा देने वाले युवाओं की जो तस्वीर हमारी आंखों के आगे जमा दी गई है, उसके लिए शराब का सुर्ख सुरूर बहुत जरूरी है। 
पर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चंडीगढ़ आदि से आगे जैसे ही हम 'इंडिया’ से 'भारत’ की दुनिया में कदम रखते हैं, जरूरत की यह युवा दरकार खारिज होती चली जाती है। 
नए भारत के युवा को लेकर यहां भी एक पूर्वाग्रह टूटता है क्योंकि जिस अध्ययन का हवाला हम पहले दे चुके हैं, उसमें उभरा एक बड़ा तथ्य यह भी है 66 फीसद युवाओं के लिए आज भी शराब को हाथ लगाना जिदगी का सबसे कठिन फैसला है। देश की अधिसंख्य युवा आबादी की ऐसी तमाम कठिनाइयों को समझे बगैर कोई सुविधाजनक राय बना लेना सचमुच बहुत खतरनाक है। 
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विकास का खाका और झांसा 
पिछले बीस सालों के विकास की अंधाधुंध होड़ के बजबजाते यथार्थ को देखने के बाद यह मानने वालों की तादाद आज ज्यादा है जो यह समझते हैं कि किसानों, दस्तकारों के इस देश को अचानक ग्लोबल छतरी में समाने की नौबत पैदा की गई। यह नौबत इतनी त्रासद रही कि कम से कम ढाई लाख किसान खुदकुशी के मोहताज हुए। साफ है कि ग्लोब पर इंडिया को इमîजग इकोनमी पावर के तौर पर देखने के लिए जिन तथ्यों और तर्कों का हम सहारा लेते रहे हैं, उसकी विद्रूप सचाई हमें सामने से आईना दिखाती है। सस्ते श्रम की विश्व बाजार में नीलामी कर आंकड़ों के खानों में देश को खुशहाल जरूर बताया जा सकता है पर यह देश के हर काबिल युवा के हाथ में काम के लक्ष्य और सपने को पूरा करने की राह में महज कुछ कदम ही हैं। ये कदम भी आगे जाने के बजाय या तो अब ठिठक गए हैं या फिर पीछे लौटेंगे क्योंकि मेहरबानी बरसाने वाले कई देश एक बार फिर संरक्षणवादी नीतियों को अमल में लाने लगे हैं।