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Sunday, May 27, 2012

थ्री चीयर्स फॉर काली मां

आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और विद्यानिवास मिश्र तक सबने अपने-अपने तरह से इस स्थापना को ही दोहराया है कि भारत को लोक, आस्था और परंपरा की परस्परता को समझे बगैर संभव नहीं नहीं है। इस परस्परता ने भारतीय जीवन और समाज को कई मिथकीय विलक्षणता से भरा है। इसके उलट जो मौजूदा वैश्विक दौर है, वह परंपरा विरोधी तो है ही। लोक और परंपरा की लीक भी नई सीख के आगे गैरजरूरी ही है। इस दौर में शामिल तो हम भी हैं पर लोक, परंपरा और आस्था की त्रियक आज भी हमारे दिलोदिमाग को घेरती है। उससे भी दिलचस्प यह कि आधुनिकता और परंपरा के टकराव के कुछ स्वयंभू व्याख्याकारों की तूती आज खूब बोल रही है। समाज पर इनका दबाव हो, न हो पर इस कथित दबाव का प्रभाव कई बार सरकारी निर्णयों पर भी पड़ता है।
अमेरिकी पेय उत्पाद बनाने वाली कंपनी बर्नसाइड ब्रीविंग ने काली मां के नाम से बीयर बाजार में उतारने से पहले यही सोचा होगा कि भारतीय मिथकीय आस्था और उसके प्रति दिलचस्पी रखने वाले वैश्विक समाज में उनका उत्पाद हाथोंहाथ लिया जाएगा। और अगर कोई विरोध होगा भी तो प्रतिप्रचार का लाभ उनके पेय उत्पाद को मिलेगा। इसे ही कहते हैं समर्थन से भी ज्यादा कारगर विरोध का बाजार। आपकी क्रिया और प्रतिक्रिया दोनों का ही लाभार्थी एक ही है।
बहरहाल, इस बीयर के बाजार में आने से पहले ही भारतीय संसद में इसके विरोध में फूटे स्वर ने कंपनी को यह कहने को मजबूर कर दिया कि वह अब अपने उत्पाद को नए नाम से बाजार में उतारेगी। यहां मामला महज आस्था का नहीं है। क्योंकि यह आस्था इतनी ही महत्वपूर्ण होती तो फिर इसका जन प्रकटीकरण भी जरूर सामने आता। 
अमेरिका में गणेश, शिव और लक्ष्मी के चित्रों के अभद्र इस्तेमाल की सनक हम पहले भी दिख चुके हैं। यह वही सनक है जो क्रांतिकारी चे ग्वेरा के जीवन मूल्यों को नकारते हुए भी उनके प्रतीकों को बिकाऊ मानकर संभाले चलती है। पर इसका क्या कहेंगे कि हमारे अपने देश में भी ऐसा होता है और तब प्रतिक्रियावादियों का गुस्सा नहीं फूटता।
इस साल का ही मामला है कि पटना में वैश्विक बिहार सम्मेलन में ब्रिटीश अपर हाउस के सदस्य लॉर्ड करन बिलमोरिया यह कह गए कि आज उन्हें अगर गांधीजी भी मिल जाएं तो उनका स्वागत वे अपनी कोबरा ब्रांड  बीयर से करना चाहेंगे। बताना जरूरी है कि बिलमोरिया न सिर्फ एक उद्योगपति हैं बल्कि दुनियाभर में वह बीयर किंग के रूप में जाने जाते हैं। साफ है कि मूल्य और चेतना के सरोकारों पर जब अर्थ और विकास की दरकार हावी होगी तो इस तरह के नैतिक अवमूल्यन को रोकना मुश्किल होगा। हमारी प्रतिक्रिया और आपत्ति तब तक ईमानदार नहीं ठहराई जा सकती जब तक हम जीवन, समाज और राष्ट्र को लेकर एक सुस्पष्ट मू्ल्यबोध की जरूरत को स्वीकार करने के लिए तत्पर नहीं होते हैं।

Sunday, May 20, 2012

चीन है नया गोताखोर


वैश्विक अर्थव्यवस्था के सुस्त पड़ने को लेकर अब तक भारत में चिंता ऊपरी थी पर रुपए के डॉलर के मुकाबले रिकार्ड स्तर तक गोता लगाने से चिंता यहां भी गहरा गई है। डॉलर से लेकर यूरोजोन तक की इकोनमी इसकी जद में पहले ही आ चुकीहैं। हां, चीन और भारत को लेकर एक उम्मीद यह जरूर जताई जा रही थी पर अब इन दोनों देशो के हालत भी पहले की तरह बेहतर नहीं रहे। रुपए के कमजोर होने और उससे पहले एस एंड पी और मूडीज की जो नई रेटिंग आई है, उसमें कहीं न कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने का खतरा जताया गया है।
जहां तक सवाल चीन का है तो जिस विदेश व्यापार के बूते वह अब तक एक सक्षम इकोनमी की मिसाल बना रहा है, उसे लेकर अब वहां चुनौतियां बढ़ गई हैं। हाल तक वहां की सरकार यही जता रही थी कि बीते महीनों में उसके लिए बढ़े संकट वैश्विक बाजार की बढ़ी चुनौतियों की देन हैं। पर नहीं लगता कि महज बाहर की गड़बडि़यों की वजह से ही चीनी अर्थव्यवस्था की जड़ें हिली हैं। दरअसल, चीन की शासन व्यवस्था के साथ उसकी अर्थव्यवस्था को लेकर विरोधाभासी राय शुरू से रही है। पूरी दुनिया को एक छतरी के नीचे ला देने वाले बाजारवादी दौर में जहां यह विरोधभास बढ़ा, वहीं इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था का एक नया रूप दुनिया को देखने को मिला।
पहले इलेक्ट्रानिक्स जैसे कुछेक क्षेत्रों में अपनी उत्पादकता और स्तरीयता के लिए जाना जानेवाला देश अचानक आम जरूरत की तमाम चीजों के सस्ते और उन्नत विकल्प मुहैया कराने वाला देश बन गया। फिर यह सब चीन ने बिल्कुल वैसे ही नहीं किया, जैसे उदारवादी अर्थव्यवस्था की पैरोकारी करने वाले दूसरे मुल्कों ने किया। बताया यही गया कि चीन में साम्यवादी शासन भले हो अधिनायकवादी चरित्र का और लोकतांत्रिक व मानवाधिकारवादी कसौटियों पर चाहे उसकी जितनी खिल्ली उड़ाई जाए, पर उसकी अर्थव्यवस्था केंद्रित न होकर विकेंद्रित जमीन पर ही फल-बढ़ रही है। यह प्रयोग वहां हाल तक सफल भी रहा है। वैश्विक मंदी के कारण 2009 में जहां पूरी दुनिया की जीडीपी का औसत नकारात्मक दिखा, उस दौरान भी चीन ने तकरीबन नौ फीसद का विकास दर हासिल किया।
पर अब यह आर्थिक मजबूती चीन में भी दरक रही है। वहां श्रम और कच्चे माल की लागत एकदम से बढ़ गई है। विदेशों से मांग न होने से भी उत्पादन पर असर पड़ा है। सरकार अपने स्तर पर इस स्थिति से उबड़ने के भरसक उपाय तो कर रही है पर स्थिति अब काबू होने की सूरत से ज्यादा बिगड़ चुकी है। स्थानीय स्तर पर छोटे-मध्यम श्रेणी के उद्योगों की तरफ से रियायती कर्ज की जो बड़ी मांग एकदम से उठी है, उसे पूरा करने में सरकार के हाथ-पांव फूल रहे हैं।
चीनी वाणिज्य मंत्रालय तक आज खुद ही यह मान रहा है कि जो स्थिति और चुनौतियां  हैं, वह खतरे की आशंका से बहुत ज्यादा बड़ी हैं। ऐसे में भारत और चीन में जो स्थितियां बन रही है वह अगर आगे भी जारी रहती है तो यह विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाली दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के ढहने का खामियाजा भी बड़ा होगा और वैश्विक भी।

Tuesday, May 1, 2012

सजा दो हमें कि हम हैं बच्चे तुम्हारे


राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने स्कूलों में शारीरिक दंड को लेकर जो विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट जारी की है, उसमें एक बार फिर देश में बच्चों के प्रति बढ़ रही असंवेदनशीलता की पुष्टि हुई है। यहां दिलचस्प यह है कि निजी स्कूलों में हालात सरकारी स्कूलों से भी बदतर है। निजी स्कूलों में 83.6 फीसद लड़कों और 84.8 फीसद लड़कियों को किसी न किसी तरह के मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। केंद्रीय विद्यालयों में यह आंकड़ा क्रमश: 70.5 और 72.6 फीसद है जबकि राज्य सरकारों द्वारा संचालित स्कूलों में 81.1 फीसद लड़कों और 79.7 फीसद लड़कियों को मानसिक रूप से प्रताडि़त करने वाले अपशब्दों को झेलने पड़ते हैं। 
रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी में भी कहा गया है कि आमतौर पर माना यही जाता है कि निजी तौर पर संचालित स्कूलों में योग्य शिक्षक-शिक्षिकाएं होती हैं। ऐसे में वहां बच्चों के साथ क्रूर सलूक की शिकायतें कम होनी चाहिए। पर ऐसा है नहीं और यह कहीं न कहीं स्कूली शिक्षा के निजीकरण की बढ़ी होड़ पर सवाल उठाता है। गौरतलब है कि निजी स्कूलों की शिक्षा न सिर्फ महंगी है बल्कि यहां दाखिला भी आसान नहीं है। पिछले दिनों चेन्नई के एक स्कूल में एक शिक्षिका के कठोर व्यवहार और उपेक्षा से खीझे बच्चे ने प्रतिक्रिया में चाकू से गोदकर शिक्षिका की स्कूल में ही हत्या कर दी थी। यह घटना भी एक बड़े निजी स्कूल में ही हुई थी। कहना नहीं होगा कि शिक्षकों की असंवेदनशीलता छात्रों की पढ़ाई को ही महज प्रभावित नहीं करती बल्कि उनकी मनोवृत्ति को भी खतरनाक रूप से विकृत कर देती है। 
वैसे यहां यह भी साफ होने का है कि देश में बचपन के साथ ऐसा क्रूर सलूक सिर्फ स्कूलों में ही नहीं बल्कि हर जगह बढ़ रहा है। पिछले साल एनसीआरबी के जो आंकड़े जारी हुए थे, उसमें कहा गया था कि 2009 के मुकाबले 2010 में आपराधिक मामलों में जहां करीब पांच फीसद की वृद्धि देखी गई, वहीं बच्चों के मामले में यह फीसद दोगुने से भी ज्यादा रही। यह दिखाता है कि परिवार और समाज के स्तर पर बच्चों के प्रति हमारे सरोकार निहायत ही लापरवाह होते चले जा रहे हैं। यह स्थिति ऐसी है जिस पर समय से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाली पीढि़यों की सोच और समझ में इसके खतरानक बीज को हम पनपते हुए देखेंगे।
अपने देश में यह स्थिति तब है जब पूरी दुनिया में बच्चों के प्रति घर-परिवार से लेकर विद्यालय तक एक जिम्मेदार और संवेदनशील व्यवहार के प्रति चेतना और प्रयास कारगर शक्ल अख्तियार कर रहे हैं। अपने देश में भी पिछले वर्ष महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने एक कानूनी प्रस्ताव घर और विद्यालयों में बच्चों को शारीरिक दंड देने पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए तैयार किया था। पर इस बारे में आगे ज्यादा प्रयास नहीं हुए, नतीजतन आज भी यह महत्वपूर्ण कानून संसद से पारित होने की बाट जोह रहा है।