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Wednesday, August 31, 2011

लोकशाही तो है पर यकीन क्यों नहीं होता!


संसद और सांसदों दोनों के लिए मैजूदा दौर मुश्किलें बढ़ाने वाला है। दिलचस्प है कि इन दोनों की भूमिका और विशेषाधिकारों पर जिसे देखिए वही सवाल उछाल दे रहा है। असल में इस सारी मुसीबत की जड़ में दल हैं और उनसे पैदा हुआ राजनीतिक दलदल है। देश के लोकतंत्र को जो लोग संसदीय सर्वोच्चता के मूल्य के साथ समझने के हिमायती हैं, उन्हें भी आज शायद ही इस बात को कबूलने में कठिनाई हो कि दलीय राजनीति के छह दशक के अनुभव ने इस मू्ल्य को बहुत मू्ल्यवान नहीं रहने दिया है। नहीं तो ऐसा कभी नहीं होता कि विचार और लोकहित की अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर अलग-अलग नाम और रंग के झंडे उड़ाने वाली पार्टियों और उनके नेताओं की विश्वसनीयता पर ही सबसे ज्यादा सवाल उठते।   
अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करें तो इस आंदोलन को मिला अपार लोकसमर्थन कहीं न कहीं राजनीतिक बिरादरी की जनता के बीच खारिज हुई विश्वसनीयता और आधार के सच को भी बयान करती है। एक गैरदलीय मुहिम का महज कुछ ही महीनों में प्रकट हुआ आंदोलनात्मक तेवर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की जमीन को नए सिरे से तैयार करने की दरकार को सामने रखता है। अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ महीनों में इस तैयारी का न सिर्फ लोकसमर्थित तर्क खड़ा हुआ है, बल्कि इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव भी बढ़ा है। कांग्रेस और भाजपा के कुछ सांसदों ने आज अगर अपने ही दलीय अनुशासन के खिलाफ जाने की हिमाकत दिखाई है तो यह इसलिए कि जनता से लगातार कटते जाने के खतरे को कुछ नेता अब समझने को तैयार हैं।
पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम में जनता का गुस्सा हर दल और उसके सांसदों के प्रति दिखा है। यह गुस्सा इसलिए है कि लोकतंत्र को देश में एक दिन के चुनावी अनुष्ठान तक सीमित कर दिया गया है। लोकसंवाद की सतत प्रक्रिया पांच साल की मुंहजोही के लिए मजबूर हो गई है। एक सफल लोकतंत्र जीवंत और प्रगतिशील भी होता है। समय और अनुभव के साथ उसमें संशोधन जरूरी है। जनलोकपाल अगर आज की तारीख में जनता का एक बड़ा मुद्दा है तो इसके बाद सबसे जरूरी मुद्दा दलीय राजनीति के ढांचे आैर चुनाव प्रणाली में सुधार है।
दिलचस्प है कि खुद हजारे ने भी पिछले दिनों जनप्रतिनिधत्व तय करने वाली मौजूदा परंपरा और  तरीके पर सवाल उठाए हैं। यही नहीं उन्होंने तो संसदीय सर्वोच्चता की दलील के बरक्स लोकतंत्र की अपनी नई समझ भी रखी है। पंचायतीराज का मॉडल प्रातिनिधिक के सामने प्रत्यक्ष और  विकेंद्रित लोकतांत्रिक संस्था की अनोखी मिसाल है। लोकसभा और विधानसभाओं के विशेषाधिकार का तर्क ग्रामसभाओं के अविघटनकारी विशेषता के सामने कमजोर मालूम पड़ते हैं। यहीं नहीं पिछले चार दशकों से उठती आ रही 'पार्टीलेस डेमोक्रेसी" की मांग एक बार फिर से केंद्र में आ रही है। नए समय में यह मांग जहां नए सरोकारों से लैस हो रही हैं, वहीं दलों से पैदा राजनीतिक गलीज और  दलदल ने इस दरकार को और ज्यादा पुष्ट कर दिया है।
 लिहाजा, अब वक्त आ गया है कि देश अपनी लोकतांत्रिक परंपरा को नए संदर्भ और समय के अनुरूप मांजने को तत्पर हो। अगर यह तत्परता राजनीतिक दलों के भीतर से अब भी स्वत: नहीं प्रकट होता तो यह उनकी एक अदूरदर्शी समझ होगी। उम्मीद करनी चाहिए कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों व दायित्वों को लेकर जनता और उनकी नुमाइंदगी करने वालों में साझी समझदारी प्रकट होगी। और पिछले साठ सालों की यात्रा के बाद देश एक बार फिर अपने लोकतांत्रिक आधारों को पुष्ट करने के लिए तत्पर होगा। इस तत्परता का फलित भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को काफी हद तक तय करने वाला होगा।

दैनिक जागरण : ‘फिर से’ में पूरबिया का अन्ना

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30 अगस्त 2011 को दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण के नियमित स्तंभ ‘फिर से’ में पूरबिया का अन्ना

Tuesday, August 30, 2011

अनुशासन पर इतना भाषण क्यों !


बात आप शिक्षा की करें और अनुशासन का मुद्दा रह जाए तो शायद आपकी बरत अधूरी रह जाए। वैसे यह अधूरापन इसलिए नहीं है कि एक के साथ दूसरे संदर्भ को नहीं देखा जाता बल्कि ये अधूरापन इसलिए ज्यादा है कि इन दोनों मुद्दों को अलग-अलग देखे जाने का आग्रह होता है। दरअसल, शिक्षा और अनुशासन अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं। इतने गहरे कि इस बहाने हम शिक्षण संस्कार की परंपरा से लेकर उसके लक्ष्य तक को भलीभांति परिभाषित कर सकते हैं। पर आज अनुशासन आचरण से ज्यादा दूसरे पर थोपे जाने वाली मयार्दा का नाम है। दिलचस्प है कि मर्यादा का यह आग्रह सबसे ज्यादा उस पीढ़ी से की जाती है, जिस पर परंपरागत जीवन मूल्यों के साथ आधुनिक समय चेतना को भी आत्मसात करने का दबाव है। ऐसे में यह कहीं से मुनासिब नहीं कि हम बलात् अनुशासन की लाठी उन पर भांजें।
इंसाफ, तहजीब और मजहबी दरकार के नाम पर जिस तालिबानी सलूक को पूरी दुनिया में बर्बरता के रूप में देखा जाता है, वह बर्बरता हमारे समय और समाज के कुछ दायरों का सच भर नहीं बल्कि हमारे अंदर के कोनों-खोलों की दबी-छिपी सचाई है। यौन हिंसा संबंध और परिवार के दायरे में सबसे तेजी से पले-बढ़े और स्कूल-कॉलेजों में अनुशासन के नाम पर मध्यकालीन मानसिकता के साथ छात्रों से सलूक हो, अगर यह हमारी चिंता का विषय नहीं है तो इसे एक खतरनाक प्रवृति ही कहेंगे।
अभी पिछले दिन ही अखबारों में खबर आई कि चेन्नई के एक कॉलेज में शिक्षक ने मोबाइल फोन रखने के आरोप में छात्रा की इस तरह तालाशी ली कि उसे एक तरह से निर्वस्त्र कर दिया। दूसरी घटना केरल के एक केंद्रीय विद्यालय की है, जहां एक शिक्षक को बच्चों का बाल बढ़ा होना इतना अनुशासनहीन लगा कि उसने एक साथ 90 बच्चों के बाल काट डाले। अनुशासन और संस्कृति के नाम पर पहरुआगिरी का यह कृत्य वैसा ही जो युवकों-युवतियों को कभी कपड़े पहनने के सलीके के नाम पर सरेआम बेइज्जत करने से बाज नहीं आता तो कभी उनके प्रेम और खुलेआम मेलजोल को धर्म और संस्कृति के लिए घातक करार देता है। दिलचस्प है कि अनुशासन का आग्रह कोई खारिज की जा सकने वाली दरकार नहीं पर यह आग्रह अगर दुराग्रह बन जाए तो यह निश्चित रूप से खतरनाक मंसूबों को साधने का बहाना बन जाता है।
जहां तक बात है शिक्षण परिसरों में बरते और दिखने वाले अनुशासन की तो इसकी बुनियादी जरूरत से तो शायद ही कोई इनकार करे। एक बेहतर अनुशासित वातावरण में ही बेहतर शिक्षण का मकसद पूरा होता है। देश-दुनिया के हजारों-लाखों स्कूलों-कालेजों और विश्वविद्यालयों  में से जिन कुछेक को ज्यादा लोकप्रियता और सम्मान हासिल है, वहां शिक्षा के साथ अनुशासन भी आले दर्जे की है। यही नहीं इस अनुशासन के दायरे में सिर्फ वहां के छात्र नहीं बल्कि तमाम शिक्षक और कर्मचारी भी आते हैं। इतिहास के कई नायकों ने अपनी सफलता का श्रेय अपने शिक्षकों की मेहनत और अपने स्कूल-कॉलेज के वातावरण को दिया है। साफ है कि शिक्षकों के व्यवहार से छात्रों तक पहुंचने वाला अनुशासन एक निहायत ही संवेदनशील मसला है और किसी भी शिक्षा संस्थान में इस संवेदनशीलता का निर्वहन किस रूप में हो रहा है, यह उसके स्तर को काफी हद तक तय कर देता है। एक ऐसे दौर में जबकि शिक्षा को छात्रों के ज्यादा से ज्यादा अनुकूल और सहज बनाने की कवायद तेज है, छात्रों से असहज अनुशासन की अपेक्षा करना, समय और शिक्षा की आधुनिक समझ के पूरी तरह खिलाफ है। 

Monday, August 29, 2011

क्या हुआ जो मीडिया भी अन्ना गया


 स्वतंत्र भारत में चौबीसो घंटे के खबरिया चैनलों का दौर शुरू होने और भाषाई पत्रकारिता के विकेंद्रित विस्तार के बाद यह पहला अनुभव है, जब  अखिल भारतीय स्तर पर जनभावना का कोई दिव्य प्रकटीकरण हो। जो लोग आज अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में 1974 के जयप्रकाश आंदोलन की लिखावट पढ़ने चाह रहे हैं, उनकी भी पहली प्रतिक्रिया यही है कि लोकपक्ष और नए मीडिया का सकरात्मक साझा चमक के साथ कितना असर पैदा कर सकता है, यह चमत्कृत कर देने वाला अनुभव है। प्रेस को अगर लोकतंत्र का विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद चौथा बड़ा स्तंभ माना गया है, तो इसलिए भी कि उसकी भूमिका एक लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने के लिए खासी जिम्मेदारी से भरी है। इमरजेंसी के दौरान जिम्मेदारी के इन हाथों को बड़ियां पहनाई गई थी तो अपने संपादकीय स्तंभ की जगह को खाली छोड़ अखबारों ने अपना विरोध जताया था।
15 अगस्त की अगली सुबह देश में नागरिकों के अहिंसक और  शांतिपूर्ण प्रतिरोध के अधिकार पर जो कुठाराघात हुआ, संसद का सत्र जारी रहने के बावजूद उसकी गूंज वहां के बजाय मीडिया में ज्यादा पैदा हुई। यह देश की मीडिया का सद्विवेकी रवैया का ही नतीजा रहा कि उसने लोकपक्ष की जुबान और चेहरा बनने का फैसला लिया। कह सकते हैं कि न्यायकि सक्रियता के बाद देश में मीडिया की सक्रियता के यह एक नए सर्ग का शुभारंभ है। दिलचस्प है कि अन्ना हजारे ने भी 16 अगस्त से अपने प्रस्तावित अनशन से एक दिन पहले मीडिया का इस बात के लिए शुक्रिया अदा किया था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम को जोर पकड़ाने में उसकी बड़ी भूमिका रही है। यही नहीं जब वे रामलीला मैदान से अनशन से उठे तो उन्होंने और उनके साथियों ने मीडिया का कई-कई बार आभार जताया। 
असल में यह एक जीवंत और प्रगतिशील लोकतंत्र का तकाजा है कि लोक भावना और लोक संघर्ष  के स्पेस को वह न तो कमतर करता है और न ही उसे खारिज करता है। क्योंकि इससे लोकहित के मुद्दों के दरकिनार हो जाने का खतरा पैदा होता है। समाचार की 'इंफोमेंटी" समझ और 'प्रोफेशनल" होड़ ने मीडिया की भूमिका पर पिछले दो दशकों में कई सवाल उठाए हैं। प्रेस की आजादी के नाम पर मनमानी करने की छूट ने लोकतंत्र की एक जिम्मेदार संस्था को काफी हद तक अगंभीर और गैरजवाबदेह बना दिया है, ऐसे आरोप मीडिया पर लगने अब आपवादिक नहीं रहे। ऐसे में मीडिया के लिए यह फख्र के साथ सबक सीखने का भी अवसर है कि अगर वह लोकचेतना का चेहरा बनने का दायित्व पूरा करता है तो न सिर्फ उसकी विश्वसनीयता बहाल रहती है बल्कि उसकी साख भी बरकरार रहती है। 
लोकहित का तकाजा ही यही है कि उसे गुमराह करने के बजाय उसका हमकदम बना जाए, उसका मार्गदर्शी बना जाए। नया मीडिया ज्यादा तकनीक संपन्न है, लिहाजा उससे ज्यादा जिम्मेदार पहरुआ (वॉच डॉग) भी होना चाहिए। ऐसे में कुछ लोगों और समाज के कुछ वर्गों से आई कुछ शिकायतें मायने रखती है। मसलन असम के इरोम शर्मिला के दस साल से चले आ रहे अनशन का मुद्दा चौबीसों घंटे चौकन्ना मीडिया की आंखों से ओझल क्यों रहा? इसी तरह क्या पूनम पांडे और राखी सावंत को जिस मुंह से घर-घर तक पहुंचाने वाले मीडिया के पेशेवर सरोकार क्या वक्त-बेवक्त सुविधानुसार नहीं बदलते हैं और क्या यह बदलाव पूरी तरह विश्वसनीय माना जा सकता है।
बहरहाल, अन्ना का आंदोलन भले फिलहाल समाप्त हो चुका हो पर देश में लोकहित के कई जरूरी मुद्दे अब भी सरकार और व्यवस्था के एजेंडे में शामिल होने बाकी हैं। नए मीडिया का एक दायित्व यह भी कि वह हाशिए के इन मुद्दों को उठाए और एक सशक्त लोकमत के निर्माण का अपना दायित्व आगे भी पूरी ऊर्जा के साथ निभाए।

Sunday, August 28, 2011

‘फिर से’ पूरबिया की बहुरंगता


27 अगस्त 2011 को दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण के नियमित स्तंभ ‘फिर से’ में पूरबिया की बहुरंगता

Friday, August 26, 2011

आंदोलन की बहुरंगता को बदरंग देखना


अंग्रेजों ने भारत को कभी संपेरों और भभूती साधुओं का देश कहा था। आज भी दुनियाभर के इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों के बीच इस देश की रचना और चेतना को लेकर कई समानान्तर मत हैं। खुद अपने देश को देखने की जो समझ हमने पिछले छह दशकों में गढ़ी है, वह भी या तो कोरे आदर्शवादी हैं या फिर आधी-अधूरी। ऐसी ही एक समझ यह है कि भारत विविधताओं के बावजूद समन्वय और समरसता का देश है। ये बातें छठी-सातवीं जमात के बच्चे अपने सुलेखों में भले आज भी दोहराएं पर देश का नया प्रसंस्कृत मानस इस समझ के बरक्स अपनी नई दलील खड़ा कर रहा है।
असल में अपने यहां देश विभाजन की बात हो या सामाजिक बंटवारे की, राजनीतिक तर्क पहले खड़ा हुआ और बाद में सरजमीनी सच को उसके मुताबिक काटा-छांटा गया। मजहबी और जातिवादी खांचों और खरोचों को देश का इतिहास छुपा नहीं सकता पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इन्हें कम करने और पाटने की बड़ी कोशिशों को देश की सामाजिक मुख्यधारा का हमेशा समर्थन मिला है। और इस समर्थन के जोर पर ही कभी तुलसी-कबीर का कारवां बढ़ा तो कभी  गांधी-लोहिया-जयप्रकाश का। बीच में एक कारवां विनोबा के पीछे भी बढ़ा, पर उनके भूदान आंदोलन की सफलता अपने ही बोझ से दब गई और बाद में इस सफलता के कई अंतर्द्वंद भी सामने आए। अभी देश में पिछले कुछ महीनों से जब भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश सड़कों पर उमड़ना शुरू हुआ है तो इस आक्रोश की वजहों को समझने के बजाय इसके चेहरे को पढ़ने में नव प्रसंस्कृत और प्रगतिशील मानस अपनी मेधा का परिचय दे रहा है। 
जनलोकपाल बिल के माध्यम से भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम को देखते-देखते आजादी की दूसरी लड़ाई की शिनाख्त देने वाले अन्ना हजारे आज की तारीख में देश का सबसे ज्यादा स्वीकृत नाम है। गांधीवादी धज के साथ अपने आंदोलन को अहिंसक मूल्यों के साथ चलाने वाले हजारे का यह चरित्र राष्ट्र नेतृत्व का पर्याय बन चुका है तो इसके पीछे उनका जीवनादर्श तो है ही, वे प्रयोग भी हैं जिसे उन्होंने सबसे पहले अपने गांव समाज में सफलता के साथ पूरे किए। लिहाजा, यह सवाल उठाना कि उनके साथ उठने-बैठने वालों और उनके आह्वान पर सड़कों पर उतरने वालों में दलित या मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी नहीं है, यह एक आंदोलन को खारिज करने की ओछी हिमाकत से ज्यादा कुछ भी नहीं।
भूले नहीं होंगे लोग कि इसके पहले जब हजारे के जंतर मंतर पर हुए अनशन के बाद सरकार सिविल सोसायटी के साथ मिलकर लोकपाल बिल के बनी संयुक्त समिति के सोशल कंपोजिशन पर भी सवाल उठाए गए थे। अब जबकि रामलीला मैदान में हजारे के अनशन और उनकी मुहिम के समर्थन में देश के तमाम सूबों और तबकों से लोग घरों से बाहर आए हैं, तो 'तिरंगे' के हाथ-हाथ में पहुंचने और 'वंदे मातरम' के नारे के आगे मजहबी कायदों की नजीर रखी जा रही है। आरोप और आपत्ति के ये स्वर वही हैं, जिन्हें पेशेवर एतराजी होने फख्र हासिल है।
बहरहाल, जिन लोगों को लगता है कि महाराष्ट्र के एक गांव रालेगण सिद्धि से चलकर दिल्ली तक पहुंचे अन्ना हजारे के आंदोलन को समाज के हर तबके का समर्थन हासिल नहीं है, उन्हें अपने जैसे ही कुछ और आलोचकों की बातों पर भी गौर करना चाहिए। कहा यह भी जा रहा है बाजार के वर्चस्व और साइबर क्रांति के बाद देश में यह पहला मौका है जब जनांदोलन का इतना बड़ा प्रकटीकरण देखने को मिला है। यही नहीं इसमें शामिल होने वालों में ज्यादातर संख्या ऐसो लोगों की है, जिन्होंने आज तक किसी मोर्चे, किसी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लिया। लिहाजा यह देश की लोकतांत्रिक परंपरा का एक नया सर्ग भी है, जिसकी लिखावट में समय और समाज के के नए-पुराने रंग शामिल हैं। इस बहुरंगता को बदरंग होने से बचाना होगा।

Tuesday, August 23, 2011

दैनिक जागरण में पूरबिया का दर्शन


23 अगस्त 2011 को दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण के नियमित स्तंभ ‘फिर से’ में पूरबिया का दर्शन

Monday, August 22, 2011

हांडी में अनशन और देह दर्शन

 कृष्ण जन्माष्टमी का हर्षोल्लास इस बार भी बीते बरसों की तरह ही दिखा। मंदिरों-पांडालों में कृष्ण जन्मोत्सव की भव्य तैयारियां और दही-हांडी फोड़ने को लेकर होने वाले आयोजनों की गिनती और बढ़ गई। मीडिया में भी जन्माष्टमी का क्रेज लगता बढ़ता जा रहा है। पर्व और परंपरा के मेल को निभाने या मनाने से ज्यादा उसे देखने-दिखाने की होड़ हर जगह दिखी। जब होड़ तगड़ी हो तो उसमें शामिल होने वालों की ललक कैसे छलकती है, वह इस बार खास तौर पर दिखा। दिलचस्प है कि कृष्ण मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं बल्कि लीला पुरुषोत्तम हैं, उनकी यह लोक छवि अब तक कवियों-कलाकारों को उनके आख्यान गढ़ने में मदद करती रही है। अब यही छूट बाजार उठा रहा है।      
हमारे लोकपर्व अब हमारे कितने रहे, उस पर हमारी परंपराओं का रंग कितना चढ़ा या बचा हुआ है और इन सब के साथ उसके संपूर्ण आयोजन का लोक तर्क किस तरह बदल रहा है, ये सवाल चरम भोग के दौर में भले बड़े न जान पड़ें पर हैं ये बहुत जरूरी। मेरे एक सोशल एक्टिविस्ट साथी अंशु ने ईमेल के जरिए सूचना दी कि उन्हें  कृष्णाष्टमी पर नए तरह की ई-ग्रीटिंग मिली। उन्हें किसी रिती देसाई का मेल मिला। मेल में जन्माष्टमी की शुभकामनाएं हैं और साथ में है उसकी एस्कार्ट कंपनी का विज्ञापन, जिसमें एक खास रकम के बदले दिल्ली, मुंबई और गुजरात में कार्लगर्ल की मनमाफिक सेवाएं मुहैया कराने का वादा किया गया है। मेल के साथ मोबाइल नंबर भी है वेब एड्रेस भी। मित्र को जितना मेल ने हैरान नहीं किया उससे ज्यादा देहधंधा के इस हाईटेक खेल के तरीके ने परेशान किया।
लगे हाथ जन्माष्टमी पर इस साल दिखी एक और छटा का जिक्र। एक तरफ जहां गोविंदाओं की टोलियों ने अन्ना मार्का टोपी पहनकर भ्रष्टाचार की हांडी फोड़ी। अन्ना का अनशन दिल्ली के रामलीला मैदान में जनक्रांति का जो त्योहारी-मेला संस्करण दिखा वह मुंबई तक पहुंचते-पहुंचते प्रोटेस्ट का फैशनेबल ब्रांड बन गया। यही नहीं बार बालाओं से एलानिया मुक्ति पा चुकी मायानगरी मुंबई से पिछले साल की तरह इस बार भी खबर आई कि चौक-चारौहों पर होने वाले दही-हांडी उत्सव अब पब्स और क्लब्स तक पहुंच चुके हैं। देह का भक्ति दर्शन एक पारंपरिक उत्सव को जिस तरह अपने रंग में रंगता जा रहा है, वह हाल के सालों में गरबा के बाद यह दूसरा बड़ा मामला है, जब किसी लोकोत्सव पर बाजार ने मनचाहे तरीके से डोरे डाले हैं। ऐसा भला हो भी क्यों नहीं क्योंकि आज भक्ति का बाजार सबसे बड़ा है और इसी के साथ डैने फैला रहा है भक्तिमय मस्ती का सुरूर। मामला मस्ती का हो और देह प्रसंग न खुले ऐसा तो संभव ही नहीं है।   
बात कृष्णाष्टमी की चली है तो यह जान लेना जरूरी है कि देश में अब तक कई शोध हो चुके हैं जो कृष्ण के साथ राधा और गोपियों की संगति की पड़ताल करते हैं। महाभारत में न तो गोपियां हैं और न राधा। इन दोनों का प्रादुर्भाव भक्तिकाल के बाद रीतिकाल में हुआ। रवींद्र जैन की मशहूर पंक्तियां हैं- 'सुना है न कोई थी राधिका/ कृष्ण की कल्पना राधिका बन गई/ ऐसी प्रीत निभाई इन प्रेमी दिलों ने/ प्रेमियों के लिए भूमिका बन गई।' दरअसल राम और कृष्ण लोक आस्था के सबसे बड़े आलंबन हैं। पर राम के साथ माधुर्य और प्रेम की बजाय आदर्श और मर्यादा का साहचर्य ज्यादा स्वाभाविक दिखता है। इसके लिए गुंजाइश कृष्ण में ज्यादा है। वे हैं भी लीलाधारी, जितना लीक पर उतना ही लीक से उतरे हुए भी। सो कवियों-कलाकारों ने उनके व्यक्तित्व के इस लोच का भरसक फायदा उठाया। लोक इच्छा भी कहीं न कहीं ऐसी ही थी।
नतीजतन किस्से-कहानियों और ललित पदों के साथ तस्वीरों की ऐसी अनंत परंपरा शुरू हुई, जिसमें राधा-कृष्ण के साथ के न जाने कितने सम्मोहक रूप रच डाले गए। आज जबकि प्रेम की चर्चा बगैर देह प्रसंग के पूरी ही नहीं होती तो यह कैसे संभव है कि प्रेम के सबसे बड़े लोकनायक का जन्मोत्सव 'बोल्ड' न हो। इसलिए भाई अंशु की चिंता हो या मीडिया में जन्माष्टमी के बोल्ड होते चलन पर दिखावे का शोर-शराबा। इतना तो समझ ही लेना होगा  कि भक्ति अगर सनसनाए नहीं और प्रेम मस्ती न दे, तो सेक्स और सेंसेक्स के दौर में इनका टिक पाना नामुमकिन है।

Wednesday, August 17, 2011

तुमसे अच्छा कौन है!

एक लकीर जब बहुत लंबी खिंच जाती है तो बाद के लकीरों के लिए इम्तहान बढ़ जाता है। क्योंकि तब उसे न सिर्फ एक सीध में लंबा चलना होता है बल्कि सबसे आगे निकलने का दबाव भी रहता है उसके ऊपर। पृथ्वीराज कपूर के बाद उनके खानदान के हर बारिस के आगे तकरीबन ऐसी ही चुनौती रही खुद को साबित करने की, सबसे आगे दिखने की। पर दिलचस्प है कि राज से लेकर करीना और रणबीर पूर तक ने लकीर के फकीर होने की बजाय अपनी मुख्तलिफ खासियतों को संवारना ज्यादा मुनासिब समझा।
शम्मी कपूर ने जब कैमरे के आगे आने का पेशेवर फैसला लिया तो उन्हें अपनी जमीन नए सिरे से तैयार करनी पड़ी। एक तरफ उनके पिता पृथ्वीराज कपूर का फिल्म और थियेटर की दुनिया में बड़ा नाम और सम्मान था, तो दूसरी तरफ भाई शोमैन राज कपूर की लोकप्रिय छवि। लिहाजा नया कुछ करने और दिखने का दबाव तो था ही पर जोखिम भी था कि लोग उन्हें मंजूर करेंगे कि नहीं। आज यह बात तारीखी सियाही से लिखी जा चुकी है कि न सिर्फ शम्मी ने अपनी विशिष्ट नृत्य और  अभिनय शैली से अपनी अलग पहचान कायम की बल्कि 50-60 के दशक के हिंदी सिनेमा को काफी हद तक अपनी रंग में सराबोर भी रखा।
शम्मी अब हमारे बीच नहीं हैं तो उनके साथ काम करने वाले अभिनेता-अभिनेत्रियों से लेकर पूरा फिल्म उद्योग और उनके लाखों चाहने वाले अपने इस मस्तमौला अभिनेता को अपनी-अपनी तरह से याद कर रहे हैं। पिछले कुछ सालों में हिंदी सिनेमा का फलक एक तरफ जहां व्यापारिक रूप में ग्लोबल हुआ है, वहीं मुख्यधारा की फिल्मों से अलग प्रयोग और विकल्प की भी गुंजाइश भी बढ़ी है। यह गुंजाइश कला फिल्मों के यशस्वी प्रयोगकाल से नितांत भिन्न है। इसमें फिल्म माध्यम की क्षमता का विशुद्ध कलावादी या सार्थकता के आग्रह के साथ इस्तेमाल नहीं बल्कि कहानी कहने की नई शैलियों और नई कहानी  को परदे पर लाने की ललक ज्यादा है। दिलचस्प है हिंदी सिनेमा के इस बदलाव को देखना। तकरीबन 50 साल पहले जब शम्मी कपूर का जादू सिर चढ़कर बोलता था तो आलोचकों ने उनकी 'याहू' छवि को रिबेल स्टार की शिनाख्त दी। प्रेम की तरुणाई और तरुणाई के प्रेम को भारतीय समाज और परंपरा की बंद कोठरियों से खुली हवा में महकाने वाले इस बेजोड़ कलाकार को फिल्मों के रसिया इसलिए भी शायद कभी नहीं भूल पाएंगे कि पारिवारिक मर्यादाओं के खिलाफ बगैर बिगुल फूंके उन्होंने आधुनिकता और स्वच्छंदता का जो तिलिस्म परदे पर रचा, वह एक तरफ जहां खासा मनोरंजक था, वहीं दूसरी तरफ स्टारडम की खूबियों की मिसाल भी। इससे बढ़कर किसी कलाकार की सफलता क्या होगी कि उसके स्वर्णिम दौर के खत्म हो जाने के बाद भी उसकी अदाओं का जादू चलता रहे। जिन लोगों को राजेश खन्ना और जितेंद्र की शुरुआती दौर की फिल्में याद होंगी, वे इस बात को बेहतर कह पाएंगे कि कैसे इन दोनों सितारों की अभिनय और नृत्य शैली में शम्मी कपूर का अक्श झांकता था।
भारत के एल्बिल प्रेस्ले कहने जाने वाले शम्मी ने अपनी अंतिम सांसें जरूर अस्पताल में ली पर उनकी सक्रियता उनके जीवन के आखिरी दिनों तक बनी रही। वे शोहरत की दुनिया के उन सितारों की तरह नहीं थे, जिनका चमकना महज कुछ दिनों या एक दौर तक सीमित रहता है। साइबर और मोबाइल क्रांति के दौर में एक तरफ जहां उनका रुझान लगातार अध्यात्म की तरफ बढ़ता गया, वहीं वे इंटरनेट की दुनिया के भी बड़े सैलानी थे। इंटरनेट के साथ उनके संबंधों की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि वे इंटनेट यूजर्स कम्यूनिटी ऑफ़ इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष थे। शम्मी कपूर की जिंदगी जीने की इस जिंदीदिल शैली के कारण ही उनके बच्चे और परिवार के अन्य लोगों को इस बात का कतई मलाल नहीं है कि वे अपने सफर को कहीं आधा-अधूरा छोड़ इस दुनिया से विदा हो गए। हां, यह जरूर है कि अब शायद ही उनके जैसा कोई फिल्मी दुनिया में आए, जिसे देख हम कह सकें कि 'तुमसे अच्छा कौन है'।

Monday, August 1, 2011

50 लाख पन्नों पर लिखी दोस्ती


प्यार और दोस्ती जीवन से जुड़े ऐसे सरोकार हैं जिनको निभाने के लिए हमारी आपकी फिक्रमंदी भले कम हुई हो पर इसे उत्सव की तरह मनाने वाली सोच बकायदा संगठित उद्योग का रूप ले चुका है। दिलचस्प यह भी है कि कल तक लक्ष्मी के जिन उल्लुओं की चोंच और आंखें सबसे ज्यादा परिवार और परंपरा का दूध पीकर बलिष्ठ हो रहे संबंधों पर भिंची रहतीं थी, अब वही कलाई पर दोस्ती और प्यार का धागा बांधने का पोस्टमार्डन फंडा हिट कराने में लगे हैं। फ्रेंड और फ्रेंडशिप का जो जश्न पूरी दुनिया में अगस्त के पहले रविवार से शुरू होगा उसके पीछे का अतीत मानवीय संवेदनाओं को खुरचने वाली कई क्रूर सचाइयों पर से भी परदा उठाता है।
फ्रेंडशिप डे या मैत्री दिवस को मनाने का ऐतिहासिक सिलसिला 1935 में तब शुरू हुआ जब यूएस कांग्रेस ने दोस्तों के सम्मान में इस खास दिन को मनाने का फैसला किया। इस फैसले तक पहुंचने के पीछे सबसे बड़ी वजह प्रथम विश्वयुद्ध के वे शर्मनाक अनुभव बनी जिसने देशों के साथ समाज के भीतर संबंधों के सारे सरोकारों को तार-तार कर दिया। इस त्रासद अनुभव को सबने मिलकर अनुभव किया। तभी बगैर किसी हील-हुज्जत के यह सर्वसम्मत राय बनने लगी कि अगर हम संबंधों के निभाने के प्रति समय रहते संवेदनशील जज्बे के साथ सामने नहीं आए तो वह दिन दूर नहीं जब मानव इतिहास का कोई भी हासिल बचा नहीं रख पाएंगे। आलम यह है कि पिछले कई दशकों से  दुनिया के सबसे ताकतवर देश का तमगा हासिल करने वाले देश से मैत्री को उत्सव दिवस के रूप में मनाने की परंपरा आज पूरी दुनिया के कैलेंडर की एक खास तारीख है। दोस्ती का दायरा समाज और राष्ट्रों के बीच ज्यादा से ज्यादा बढ़े इस जरूरत को समझते हुए संयुक्त राष्ट्र ने भी 1997 में एक अहम फैसला लिया। उसने लोकप्रिय कार्टून कैरेक्टर विन्नी और पूह को पूरी दुनिया के लिए दोस्ती का राजदूत घोषित किया।
पिछले दस सालों में दोस्ती का यह पर्व उसी तरह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुआ है जिस तरह वेंलेंटाइन डे। अलबत्ता यह बात जरूर थोड़ी चौकाती है कि सेक्स और सेंसेक्स के बीच झूलती दुनिया में संबंधों को कलाई पर बांधकर दिखाने की रस्मी रिवायत से किसका भला ज्यादा हो रहा है। लेखक राजेंद्र यादव दोस्ती की बात छेड़ने पर अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत दोहराते हैं- 'बूट्स एंड फ्रेंडशिप शुड बी पॉलिश्ड रेग्युलरली।' जाहिर है संबंधों को एक दिन के उल्लास और उत्सव की रस्म अदायगी के साथ निपटाने के खतरे को वे बखूबी समझते हैं।
फेंड और फ्रेंडशिप का जिक्र हो रहा हो और बात युवाओं की न हो बात पूरी नहीं होती है। आर्चीज जैसी कार्ड और गिफ्ट बनाने और बेचने वाली कंपनियां इन्हीं युवाओं के मानस पर प्रेम, ख्वाब, यादें और दोस्ती जैसे शब्द लिखकर तो अपनी अंटी का वजन रोज ब रोज बढ़ा रही हैं। फिर बात दोस्ती के महापर्व की हो तो इन युवाओं को कैसे भूला जा सकता है। हाल में टीवी पर दिखाए जा रहे एक शो में जज बने जावेद अख्तर तब तुनक गए जब गायिका वसुंधरा दास ने अपने एक गाने को यूथफूल होने की दलील उनके सामने रखी। जावेद साहब ने थोड़े तल्ख लहजे में उस मानसिकता पर चुटकी ली जिसमें देह की अवधारणा को संदेह से अलगाने की कोशिश हो या किसी बेसिर-पैर के म्यूजिकल कंपोजिशन को मार्डन या यूथफूल ठहराने का कैलकुलेटेड एफर्ट, यूथ सेंटीमेंट की बात छेड़कर सब कुछ जायज और जरूरी ठहरा दिया जाता है। उनके शब्द थे "इस तरह की दलीलों को सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे यूथ कोई 21वीं सदी का इन्वेंशन हो और इससे पहले ये होते ही नहीं थे।' इस  वाकिए को सामने रखकर यह समझने में थोड़ी सहुलियत हो सकती है कि नई पीढ़ी को सीढ़ी बनाकर संबंधों के केक काटने वाला बाजार किस कदर अपने मकसद में क्रूर है। यहां यह भूल करने से बचना चाहिए कि नई पीढ़ी की संवेदनशीलता कोरी और कच्ची है। हां, यह जरूर है कि उसके आसपास का वातावरण उससे वह मौका भरसक हथिया लेने में सफल हो रहा है जो निभाए जाने वाले मानवीय सरोकारों को दिखाए जाने वाला रोमांच भर बना रहे हैं।
स्थिति शायद उतनी निराशाजनक नहीं जितनी ऊपर से दिखती है। गूगल सर्च इंजन पर फ्रेंडशिप डे के दो शब्द जो 50 लाख से ज्यादा पन्ने हमारे सामने खोलता है उसमें कई सामाजिक संस्थाओं और दोस्तों के ऐसे समूहों के क्रिया-कलापों का बखान भी बखान भी है जो मानवीय संबंधों को हर तरह की त्रासदी से उबाड़ने में लगे हैं। खुशी की बात यह कि ऐसी पहलों का ज्यादातर हिस्सा युवाओं के हिस्से है। बहरहाल, पूरी दुनिया के साथ भारत भी मैत्री दिवस को मनाने के लिए तैयार है। और उम्मीद की जानी चाहिए कि संबंधों और वचनों के मान के लिए सब कुछ दाव पर लगा देने वाले देश में लोक और परंपरा के साथ आधुनिकता के बीच दोस्ती के नए संकल्प पूरे होंगे।