LATEST:


Tuesday, August 31, 2010

खाली सफा


खाली सफा था
कुछ भी लिखता
नाम अपना
बनाता पहाड़
डूबता सूरज
बहती नदी
लाली सांझ की
घोसलों से आती
चुनमुन-चुनमुन
चिड़ियों की आवाज
या खेलता खेल
कट्टमकुट्टी का
फिर एक बार
अपने ही खिलाफ
बहुत साल बाद

खाली सफा था
कुछ भी लिखता
कुछ भी करता
बना लेता नाव
उड़ाता जहाज
दौड़ पड़ता लेकर घिरनी
सामने से आती
हर हवा के खिलाफ
पर नहीं
मन की तिल्ली तो
बनना चाहती थी आग
रगड़ के बाद
चौंध के साथ उड़ता
सबसे तेज धुंआ
पसीने से तर-बतर
सबसे गरम आवाज

Wednesday, August 18, 2010

बीवी, वह मेरी


परदा नहीं टीवी का
न मॉल की स्वचालित सीढ़ी है
न छवियों का विज्ञापनी फरेब
अदाओं का आंचल भी नहीं
पेंटिंग में बरसता बादल भी नहीं

बीवी है वह मेरी
मेरी फिसलन के खिलाफ
जेहादी विद्रोह की तरह
सांझ की घुंघट से निकलते
सुनहरे भोर की तरह

सपनों की किनारी से चमकती
आंखों में बसा भरोसे का सुरूर
पिघलते बर्फ के मौसम में भी
गरमाहट का गुरूर
बीवी है वह मेरी
मियादी बुखारों
बरसाती विचलनों के खिलाफ
मेरे लिए अभेद सुरक्षा चक्र की तरह

पति के अज्ञान को माफ करने वाला
पत्नी का विज्ञान
किताबें नहीं परिवार रचती हैं
सिंदूरी साथ का अभिमान कितना उदार
कि बीवी मेरी अपने लिए नहीं
मेरे लिए सजती है

18.08.10

Tuesday, August 17, 2010

महिमा छिनाल की


छोरी नए यार की निगोरी फिलिम प्यार की।
कुकुर से छूटकर वह हो गई सियार की।।
धनिए की बेटी ने चुम्मी ली सोनार की।
गाओ खूब विभूति भाई महिमा छिनाल की ।।

Monday, August 16, 2010

वफादार प्रेमियों का टूटा मिथक



दढ़ियल पांडेय जी की प्रेमिका
चिकने बांके द्विवेदी की जांघ पर कल दोपहर बेसुध मिली
खबर यह इतनी बड़ी कि
दंगों के दौरान पैदा होने वाली सनसनी भी
खोलने लगी आंचल की पुरानी गांठ

ठाकुर साहब की पूर्व ब्याहता
खिड़की के रास्ते दाखिल होकर
आवारा कुमार के संग एक ही तकिए पर भिगोती रही रात
झूलती रही झूला कई सालों तक एक साथ
सचाई यह इतनी बड़ी कि
तथ्य से बड़े सच की तरह
करने लगे सब मन मसोसकर स्वीकार

प्रेमिका का प्रेम ज्यादा बदला
प्रेमियों के नामों के मुकाबले
प्रेम के बहाने स्त्री अनुभूति का नया प्रस्थान बिंदु
कितना सघन कितना सिंधु
रिक्शे पर भाग-भागकर
पुराने प्रेम की गलियों को छोड़ना पीछे
बाइक उड़ा रहे प्रेमी के साथ भरना उड़ान
सपनों से भी आगे क्षितिज के भी पार
नए प्रेम पयर्टन का रोड मैप है
सफर की इस जल्दबाजी में
जो छूट गया पीछे
वह कुछ और नहीं
बस जेनरेशन गैप है

प्रेम एक अनुभव
एक अंतराल
लगातार और दूर तक बजता जलतरंग है
एतराज सिर्फ उन्हें जिनके नाखूनों से
छूटने लगे मांसल एहसास

गन्ने के खेत को जो लोग
गुड़-चीनी बनते देखने के हैं आदी
उनके लिए प्रेम होता है हमेशा रंगीन आख्यान
दांत कटे होठों से अश्लील शर्बत का पान

प्रेमिकाएं अब बांदी नहीं
पुरुष एहसास के जंगलों को
मनमाफिक झकझोर देनेवाली आंधी हंै
शर्मिंदगी का ऐनक चमकाकर
नहीं मिटाया जा सकता
उनकी आंखों के तीखेपन को काढ़ने वाला काजल

प्रेम का रंग सिंदूरी नहीं अबीरी है
सौभाग्यवतियों के देश में
पंडितों ने बांचा है नया फलादेश
तीज-करवा के चांद का मुंह है टेढ़ा
यह सीधी समझ बहुत दूर निकल गई
बर्फ की तरह जमी सदियों की प्रेम अनुभूति
आइसक्रीम की तरह पिघल रही

वफा से ज्यादा अनुभव का घाटा-मुनाफा
बटोरने में हर्ज क्या है
जब बाजार ने कर ही रखा है घोषित
स्त्री को देह और प्रेम को नए दौर का सबसे बड़ा संदेह
अब रोती-बिसूरती प्रेमिकाओं के सदाबहार गीत
आकाशवाणी बनकर नहीं फूटेंगे
नहीं टपकेगी रात किसी वियोगिनी की आंख से
नहीं महकेगी सांस किसी प्रिय की विदाई-आगमन से
बेवफा प्रेमिकाओं ने
वफादार प्रेमियों का मिथक तोड़ दिया है


16.08.10










16.08.10

Wednesday, August 11, 2010

...तो खारी नहीं मीठी होती!


नमक किसी मिठाई की बेटी नहीं
हाथ और पांव का गासा-गासा गला चुके
मजदूरों की रोटी है
साल के चुनिंदा दिनों में
खुशियों की काजल आंज कर
केक के साथ चाकूमारी से पहले
मोमबत्तियां बुझाने वाली आंखें
खारे पानी से भींगकर
पहले भी हो चुकी हैं नंगी
गम को सैड सांग का कीमती एलबम
दिल को वेलेंटाइन डे का गिफ्ट
और खुशी को चमकता पारा कहने वालों ने
जब भी लिखा है सुलेख मधुमास में संत्रास का
उन्हें दिखे हैं सिर्फ अपने टेसू

हर कदम पर जहां जीतने का रोमांस
दो कदम साथ चलकर
कैसे हो जाता है लहूलुहान
यह डायरी के कुछ पन्ने
कविताई के नाम करने वाले बताएं
यह उनके बूते का नहीं
हर रात को मिठास की तरह चखने वाली इच्छाएं
हर मौसम के लिए रचाना चाहती हैं स्वयंवर
और जब उनकी अंगराई पर नहीं बरसते मेघ
नहीं सजती सेज बहारों की
तीखा लगता है उन्हें जिंदगी का सच
खारा लगता है प्यार का आस्वाद

प्यार को पूनम
और खुशियों को शबनम का
रुपक देनेवाली गुस्ताखियां
जब भी होती हैं मजबूर
संवेदनाओं की ओट लेती हैं
खारेपन को कोसकर
फिर से मीठी हो जाने की दमित इच्छाओं ने
अपनी छुअन बेचकर
कितनों को कराया है झूठे पुण्य का एहसास
यह समुद्र होने की कामना से पहले
अगर सोचती नदी
तो वह खारी नहीं मीठी होती
10.08.10