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Tuesday, December 28, 2010

भ्रष्टाचार की अमर्त्य व्याख्या


अमर्त्य सेन को जब नोबेल मिला था तब इस सम्मान का इसलिए भी स्वागत हुआ था कि इस बहाने बाजार और  भोग का  खपतवादी "अर्थ" सिखाने वाले दौर में वेलफेयर इकॉनमिक्स की दरकार और महत्ता दोनों रेखांकित हुई। अमर्त्य  हमेशा अर्थ के कल्याणकारी लक्ष्य के हिमायती रहे हैं। इसलिए जीडीपी और सेंसेक्सी उछालों में दिखने वाले विकास के मुकाबले वे हमेशा ग्रामीण शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों को विकास का बैरोमीटर बताते हैं। एक ऐसे दौर में जबकि अर्थ को लेकर तमाम तरह की अनर्थकारी समझ की नीतिगत स्थितियां हर तरफ लोकप्रिय हो रही हैं तो नोबेल विजेता इस अर्थशास्त्री ने दुनिया के सामने कल्याणकारी अर्थनीति की तार्किक व्याख्याएं और दरकार रखी हैं।
हैरत नहीं कि जब भ्रष्टाचार को लेकर बढ़ी चिंता पर उन्होंने अपनी राय जाहिर की तो देश में दिख रहे तात्कालिक आवेश और आक्रोश से अलग अपनी बात कही। अमर्त्य को नहीं लगता कि भ्रष्टाचार को लेकर सिर्फ मौजूदा मनमोहन सरकार पर दबाव बनाना वाजिब है। वह सरकार और सरकार में बैठे कुछ लोगों की भूमिका से ज्यादा उस व्यवस्थागत खामी का सवाल उठाते हैं, जिसमें भ्रष्टाचार की पैठ गहरी है। इस लिहाज से माजूदा यूपीए सरकार हो या इसके पहले की सरकारें, दामन किसी का भी साफ नहीं।
अमर्त्य की नजर में भ्रष्टाचार की चुनौती तो निश्चित रूप से बढ़ी है पर इससे निजात आरोपों और तल्ख प्रतिक्रियाओं से तो कम से कम मिलने से रहा। दुर्भाग्य से देश में संसद से लेकर सड़क तक अभी जो शोर-शराबा दिख रहा है, वह अपने गिरेबान में झांकने की बजाय दूसरे का गिरेबान पकड़ने की नादानी से ज्यादा कुछ भी नहीं। आखिर एक ऐसे समय में जबकि सभी यह स्वीकार करते हैं कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक नैतिकता के सरोकारों का अभाव हर स्तर पर दिख रहा है, हम कैसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि भ्रष्टाचार की पागल नदी पर हम ऊपर ही ऊपर नैतिक पाररदर्शिता का सेतु बांध लेंगे या कि ऐसा करना ही इस समस्या का हल भी है।
भ्रष्टाचार को लेकर इस देश में केंद्र की सबसे शक्तिशाली कही जाने वाली सरकार तक को मुंह की खानी पड़ी है। यह इतिहास अभी इतना पुराना नहीं हुआ है कि इसके सबक और घटनाक्रम लोग भूल गए हों। आज भ्रष्टाचार का पैमाना लबालब है पर इसके खिलाफ कोई संगठित जनाक्रोश नहीं है। विपक्षी पार्टियां खुद इतनी नंगी हैं कि वे इस मुद्दे पर न तो जनता के बीच लंबी तैयारी से जा सकते हैं और न ही सरकार को सधे तार्किक तीरों से पूरी तरह बेध सकती हैं क्योंकि तब तीर उनके खिलाफ भी कम नहीं चलेंगे।
एक और सवाल अमर्त्य सेन ने गठबंधन सरकारों की मजबूरी को लेकर भी उठाया है। उन्होंने मनमोहन सिंह की छवि की तरफ इशारा करते हुए कहा कि भले आपकी ईमानदारी की छवि जगजाहिर हो पर गठबंधन का लेकर कुछ मजबूरियां तो आपके आगे होती ही हैं। दिलचस्प है कि गठबंधन भारतीय राजनीति का यथार्थ है। पर इस यर्थाथ की पालकी ढोने वाली पार्टियों को यह तो साफ करना ही होगा कि गठबंधन की जरूरत आैर सरकार चलाने की मजबूरी में वे कितनी दूर तक समझौते करेंगे।  
बहरहाल, अर्थ को कल्याण के लक्ष्य के साथ देखने वाले सेन मौजूदा स्थितियों से पूरी तरह निराश भी नहीं हैं। उनकी नजर में भ्रष्टाचार को अब लोग जिस स्पष्टता से स्वीकार कर रहे हैं, वह एक सकारात्मक लक्षण है। किसी समस्या को चुनौतीपूर्वक स्वीकार करने के बाद ही उसके खिलाफ आधारभूत रूप से किसी पहल की गुंजाइश बनती है। अभी कम से कम यह स्थिति तो जरूर आ गई है कि इस बात पर तकरीबन हर पक्ष एकमत है कि अगर समय रहते समाज और व्यवस्था में गहरे उतर चुके भ्रष्टाचार के जहर के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तो सचमुच बहुत देर हो जाएगी। बस सवाल यहां आकर फंसा है कि इसके खिलाफ पहल क्या हो और  पहला कदम कौन बढ़ाए। तात्कालिक आवेश पर अंकुश रखकर अगर समाज, सरकार और  राजनीतिक दल कुछ बड़े फैसले लेने के लिए मन बड़ा करें तो एक भ्रष्टाचार विहीन समय और व्यवस्था के सपने को सच कर पाना मुश्लिक नहीं है। अमर्त्य अर्थ के जिस कल्याणकारी लक्ष्य की बात करते हैं, जाहिर है कि उसका शपथ मीडिया, समाज और संसद सबको एक साथ लेना होगा।         

Sunday, December 26, 2010

विरासत के नाम एक मनमोहन चिंता


भारत का एक राष्ट्र और संस्कृति के रूप में अभ्युदय नया नहीं है। यही नहीं लोक और परंपरा की गोद में दूध पीती यहां की बहुरंगी संस्कृति का कलेवर शुरू से सतरंगी रहा है। दुनियाभर में यही हमारी पहचान भी रही है और  यही हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चिंता जताई है कि बहुसंस्कृति, संयम और भाईचारे की समृद्ध विरासत पर खतरा है और इसे हर हाल में बचाया जाना चाहिए। उन्होंने खासतौर पर बुद्धिजीवियों से अपील की है कि वे इस विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में योगदान करें। बुद्धिजीवियों की भूमिका और उनकी दरकार को इस तरह स्वीकार करना अगर ऊपरी या रस्मी नहीं है तो मौजूदा स्थितियों में यह बड़ी बात है और स्वागतयोग्य भी। यह और बात है कि विद्वानों और कला-संस्कृति के जानकारों के लिए बना ऊपरी सदन अब इनकी उपस्थिति को मोहताज है। वहां दाखिले के लिए अब दीनारी दमखम चाहिए। सो "संतन को कहां सीकरी सो काम" कहने वाले कैसे वहां पहुंच पाएंगे। 
बहरहाल, बात प्रधानमंत्री के हालिया बयान की। दरअसल, मौजूदा दौर में संबंध, संवेदना और संयम को हर स्तर पर खारिज होते जाने का चलन प्रगाढ़ हुआ है और उसकी जगह जो पनप और पसर रहा है, वह है तात्कालिक उत्कर्ष और समृद्धि का उतावलापन। यहां तक की 21वीं सदी में विश्व शक्ति के रूप में भारत की जिस पहचान को विश्व मानचित्र पर उकेरने के उपक्रम चल रहे हैं, उनमें भी सार्वदेशिकता और सार्वकालिकता की बजाय तात्कालिक उत्कर्ष के तर्क ही ज्यादा हावी हैं। सुखद है कि विकास के ग्लोबल दौड़ में भारत को एक द्रुत धावक के रूप में तैयार करने की ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले मनमोहन सिंह को भी इस खतरे का अंदाजा है कि आगे निकलने की जल्दबाजी में कहीं कुछ बहुत महत्वपूर्ण पीछे न छूट जाए।
मनमोहन मानते हैं कि बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसंस्कृति वाले इस देश में एकता को बनाए रखने की दरकार है। उन्होंने उस अध्यात्म दर्शन का भी हवाला दिया, जिसके कारण हमारे देश को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा हासिल हुई है। भारतीय चित्त, मानस और काल के अध्येता धर्मपाल हों या लोक और परंपरा के कल्याणकारी संबंध की व्याख्या करने वाले वासुदेवशरण अग्रवाल और रामचंद्र शुक्ल। सबने भारतीय समाज में किसी बाजारू या आर्थिक की बजाय लोकादर्शों की संरक्षा और उसे आगे बढ़ाने वाले तत्वों को अन्यतम बताया है। हमारी यह अन्यतमता नए समय में हमारी महत्ता को सबसे काबिल तरीके से सिद्ध कर सकती है।
खतरा सिर्फ एक है कि चरम भोग की घुट्टी पिलाने वाले बाजारवादी मूल्यों के बीच शांति, संयम और समन्वय का धैर्यपूर्ण पाठ पढ़ने की ललक लोगों में कैसे पैदा की जाए। सरकार के मुखिया अगर स्कूल-कॉलेज के सिलेबसों में किसी फेरबदल या शोध अध्ययनों के साथ इस तरह की कोई गुंजाइश देखते हैं तो यह चिंता और चुनौती दोनों का सरलीकरण होगा।
दरअसल, भारत विकास और समृद्धि की जिस लीक पर अभी चल रहा है, वह उसकी आधुनिकता से तो जरूर मेल खाता है पर बुनियादी प्रकृति के खिलाफ है। दुखद है कि इस दुविधा को लेकर संसद और समाज कहीं भी कोई मंथन या बहस नहीं दिखती। अच्छा होता कि भारतीयता की पारंपरिक छवि को नए संभाल के साथ हम आगे बढ़ाते क्योंकि तब हमारी उपलब्धियां न सिर्फ हमारे रंगो-तेवर के मुताबिक होती बल्कि उसमें हमारी शर्तें भी शामिल होती। तब हम दुनिया के रंग में नहीं बल्कि दुनिया हमारे रंग में रंगती।
आगे बढ़कर पलटना खतरनाक है पर खतरनाक रास्ते पर आंख मूंदकर चल पड़ना भी कोई बुद्धिमानी नहीं। हमें यकीन करना चाहिए कि हमारे प्रधानमंत्री बुद्धिमान तो हैं ही, बड़े से बड़े खतरे के खिलाफ खड़े होने में हर लिहाज से सक्षम भी हैं। इसलिए अगर उनकी चिंता बस "मनमोहनी" न होकर जेहनी तौर पर जायज है तो सरकार के सांस्कृतिक सरोकारों की जमीन एक बार फिर हरीभरी हो सकती है। वैसे इस हरियाली की कामना और इसका दर्शन हो निहायत अलग चीचें हैं। यह "कामना" और "दर्शन" अगर एक सीध में आ जाए तो मौजूदा सदी का नया दशक सचमुच कई मायने में क्रांतिकारी साबित हो सकता है।    

Thursday, December 23, 2010

हेंताई : एनिमेटेड सेक्सुअल फैंटेसी



खबरिया चैनलों के सनसनी मार्का लहजे में कहें तो यह दुनिया कहने के लिए तो काल्पनिक है पर इसका नीला रंग उतना ही नीला या खतरनाक है जितना दिल्ली के पालिका बाजार में बिकने वाली किसी ब्लू फिल्म का। दरअसल हम बात कर रहे हैं 'हेंताई' की। हेंताई यानी बच्चों के लिए बनाए गए कामूक कार्टून किरदार या कथानक....

Sunday, December 19, 2010

बस यह उम्मीद डिलीट न हो !


कोई दौर जब क्रांतिकारी है तो उसकी उपलब्धियां भी ऐतिहासिक महत्व की होंगी ही। एक क्रांतिकारी समय की अगर यही अवधारणा ज्यादा मान्य और यही उसकी अंतिम शर्त है तब तो हमारा समय कई मायनों में क्रांतिकारी भी है और ऐतिहासिक भी। सूचना, संवाद, बाजार, खुला अर्थतंत्र, इंटरनेट, मोबाइल, सोशल नेटवर्किग जैसे न जाने कितने सर्ग पिछले एक-दो दशक में खुले हैं। रहा जहां तक भारत का सवाल तो वह इसमें से किसी क्रांति का सूत्रधार भले न हो उसकी सबसे बड़ी लेबोरेटरी जरूर रहा है। इस लिहाज से अपने देश की बाकी दुनिया में कद्र भी है और साख भी।  
नई खबर यह है कि देश की आधी से ज्यादा आबादी के हाथ सूचना क्रांति के सबसे लोकप्रिय और तेज औजार मोबाइल फोन से लैस हो चुके हैं। भारत की विकसित छवि के लिए यह खबर बड़ी तो है ही जरूरी भी है। दिलचस्प है कि इलेक्ट्रानिक क्रांति के विश्व पुरोधा चीन के राष्ट्रपति वेन जियाबाओ हाल में जब भारत आए तो तमाम राजनैतिक-कूटनीतिक मतभेदों के बावजूद उन्होंने भारत में विकसित हो रही बाजार संभावनाओं को सलामी ठोकी। नत्थी वीजा और अरुणाचल जैसे मुद्दों पर सोची-समझी चुप्पी साधने वाले देश की तरफ से दिखाई जा रही इस तरह की विनम्रता की दरकार को अगर समझें तो कहना पड़ेगा कि भारत अपनी एटमी ताकत के बूते जितना ताकतवर नहीं हुआ, उससे ज्यादा सबसे बड़े रकवे में फैले बाजार का मालिकान उसे शक्तिशाली बनाता है। इससे पहले बराक ओबामा भी भारत आकर तकरीबन ऐसी ही प्रतिक्रिया जता चुके हैं।
संवाद क्रांति का रास्ता समाज के बीच से नहीं बाजार की भीड़ के बीच से फूटा है। यह रास्ता आज प्रशस्त मार्ग बन चुका है, जिस पर देशी-विदेशी कंपनियों के साथ देश की नौजवान पीढ़ी दौड़ रही है। होना तो यह चाहिए था कि संवाद की ताकत से हमारे लोकतांत्रिक सरोकारों को ज्यादा मजबूती मिलती तथा शासन और समाज का नया घना तानाबाना खड़ा होता। पर हुआ ठीक इसके उलट। सेक्स, सेंसेक्स और सक्सेस के दौर में रातोंरात जवान होने वाला पैशन जिस तेजी से मोबाइल कंपनियों की अंटी को वजनी कर रहा है, उससे ज्यादा तेजी से लोक, परंपरा और समाज की जड़ों में मट्ठा डाल रहा है। यह चिंता गुमराह करने वाले कई सुखद एहसासों  से बार-बार ढकी जाती है। नहीं तो ऐसा विरोधाभास क्यों दिखता कि अजनबीयत, संवादहीनता और संवेदनशून्यता की जंगल में तब्दील हो रहे नए समाज में हर दूसरे व्यक्ति के पास संवाद बनाने का मोबाइल यंत्र है।
तकनीक का विकास जरूरी है और इस पर किसी सूरत लगाम नहीं चढ़ाई जा सकती लेकिन यह खतरा मोल लेना भी बुद्धिमानी नहीं होगी कि व्यक्ति और समाज को जोड़ने वाली बुनावट की ही काट-छांट शुरू हो जाए। कितना अच्छा होता कि मोबाइल फोन का इस्तेमाल पिज्जा-बर्गर आर्डर करने या युवा स्वच्छंदता को बिंदास अंदाज में बढ़ाने-भड़काने जैसे उपयोगों की जगह यह बताया-समझाया जाता कि परिवार-समाज और व्यवस्था के बीच के रिश्ते को यह संवाद यंत्र कैसे मजबूत करता है।
इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि देश में भ्रष्टाचार और आंतरिक सुरक्षा से लेकर महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही बर्बरता को लेकर चिंता है, उसे खतरनाक तरीके से बढ़ाने में एक बड़ी भूमिका मोबाइल फोन और इंटरनेट की है। वैकल्पिक विकास की सोच वाले कुछ गैरसरकारी संगठनों ने केरल और महाराष्ट्र सहित देश के कुछ अन्य हिस्सों में सामाजिक जागरूकता बढ़ाने और एक बेहतर नागरिक समाज की रचना में मोबाइल फोन और उसकी एसएमएस सुविधा का कारगर इस्तेमाल शुरू किया है। मुनाफे की सीख देने वाले आर्थिक ढांचे के बीच अगर इस तरह की सार्थक गुंजाइशों की संभावना थोड़ी और बढ़े तो यह कहना और मानना दोनों सार्थक होगा कि हम संवाद को तकनीकी क्रांति या बाजारू उपक्रम की जगह लोकतांत्रिक सरोकारों को पुष्ट करने वाला आधुनिक जरिया भी मानते हैं।
...तो क्या उम्मीद की जानी चाहिए कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र उसके सरोकारों को भी बड़ा और मजबूत बनाने की आधुनिक मिसाल दुनिया के सामने रख पाने में कामयाब होगा। अगर यह उम्मीद हमारे समय के इनबाक्स से डिलीट नहीं होता और इसके लिए जरूरी पहलों की ट्रिनट्रिन पर हम-आप सब सचमुच दौड़ पड़ते हैं तो निश्चित रूप से भारत संवाद क्रांति का आपवादिक लेकिन सबसे सार्थक और कल्याणकारी सर्ग लिखने वाला देश  हो सकता है।             

Thursday, December 9, 2010

सेक्स फैंटेसी का ओवरडोज


खबरिया चैनलों के सनसनी मार्का लहजे में कहें तो यह दुनिया कहने के लिए तो काल्पनिक है पर इसका नीला रंग उतना ही नीला या खतरनाक है जितना दिल्ली के पालिका बाजार में बिकने वाली किसी ब्लू फिल्म का। दरअसल हम बात कर रहे हैं 'हेंताई' की। हेंताई यानी बच्चों के लिए बनाए गए कामूक कार्टून किरदार या कथानक। हेंताई की दुनिया बच्चों के लिए तो जरूर है पर इस दुनिया ने जिस कदर भोंडी कामुकता के बाजार में वर्चस्व बढ़ाया है, वह अमेरिका जैसे कई शक्तिशाली देशों की चिंताएं भी बढ़ा रहा है। हेंताई की पूरी दुनिया में बढ़ी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गूगल सर्च पर हेंताई लिखते ही पलक झपकते ही करीब 5 करोड़ पन्ने हाजिर हो जाते हैं। इसमें तो कई ऐसे वेब ठिकाने हैं जहां विजिट करते ही कार्टून किरदारों की चपल कामुक क्रीड़ाएं शुरू हो जाती हैं।
बता दें कि हेंताई एक जापानी मूल का शब्द है। इसका मौजूदा अर्थ इसके मूल अर्थ से खासा भिन्न है। आज पूरी दुनिया में हेंताई का मतलब ऐसी एनिमेटेड सामग्री से लिया जाता है जो विकृत सेक्स किरदारों और कथानकों की काल्पनिक दुनिया से जुड़ा है।  हेंताई आज पोर्न मार्केट को लीड कर रहा है और इसका प्रसार जापान, चीन और अमेरिका में तो है ही भारत सहित कई एशियाई और यूरोपीय देश में भी इसका प्रसार तेजी से बढ़ रहा है। जापान में हेंताई को दो प्रमुख श्रेणियों में बांटकर देखा जाता है। ये श्रेणियां हैं यॉई और यूरी। याई के तहत होमोसेक्सुअल और यूरो के तहत हेट्रोसेक्सुअल एनिमेटेड फिक्शन या फैंटेसी आते हैं। साफ्ट पोर्न की कैटेगरी को एक्की कहते हैं। इसी तरह बाकूनयू कैटगरी में वैसे कार्टून किरदारों की कामुक क्रीड़ाएं और कथाएं शामिल की जाती हैं जिनके स्तन बड़े-बड़े होते हैं। इनसेक्ट एक और कैटेगरी है जिसमें एक ही घर या परिवार के सदस्यों के बीच के सेक्सुअल रिलेशन को बताया जाता है।
दिलचस्प है कि हेंताई की दुनिया चूंकि पूरी तरह काल्पनिक या वच्र्युअल है इसलिए यहां कुछ भी असंभव नहीं है। आमतौर पर जैसे बाकी कार्टून किरदारों की दुनिया में कोरी कल्पना से रोमांच और हास्य पैदा किया जाता है, वैसे ही यहां भी कई रंग-रूप और आकार के किरदारों के साथ घोस्ट और रोबोट तक कहानी का हिस्सेदार होते हैं। अलबत्ता यह जरूर है कि विषयवस्तु चूंकि सेक्स आधारित है इसलिए कल्पना और फैंटेसी की सारी उड़ान की परिणति आखिरकार एक तरह की क्रूरता और फूहड़ता में होती है। यहां कुछ भी असंभव नहीं है। आपको कभी अलग-अलग प्रकृति और आकार के किरदारों के यौन संसर्ग देखने को मिलेंगे तो कभी जननांगों के अस्वाभाविक रूप आपको इस दुनिया की विचित्रता से अवगत कराएंगे। 
शोध अध्ययनों में यह बताया गया है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से हेंताई को एनिमेटेड सेक्सुआल फेंटैसी के रूप में भुनाने में बाजार की कई ताकतें सक्रिय हुईं। आज हेंताई का विश्व बाजार अरबों डॉलर का है और यह कॉमिक बुक, एनिमेटेड फिल्म से लेकर खिलौनों और कंप्यूटर व मोबाइल वालपेपर और स्क्रीन सेवर तक कई रूपों में अपने चाहने वालों की संख्या बढ़ा रहा है। भारत में हेंताई का चलन अभी नया है। पर इंटरनेट ने इसकी पहुंच के दरवाजे जिस तरह खोले हैं, उससे इस खतरे के बढ़ने के आसार कितने ज्यादा हैं, यह समझा जा सकता है। हेंताई की लोकप्रियता के पीछे एक बड़ी वजह इसका रियल की जगह वच्र्युअल होना है। इसके वच्र्युअल होने के कारण पोर्न मैटेरियल के रूप में इसका इस्तेमाल करने वालों को कोई गिल्टी भी नहीं होती है। और यही कारण है कि हेंताई को पसंद करने वालों में बच्चों-किशोरों के साथ बड़ी तादाद में व्यस्क भी शामिल हैं।
बहरहाल, इतना तो साफ है कि बाजार के वर्चस्व के दौर में इस खतरे को कोई नहीं समझ रहा है कि विशुद्ध कामुकता का यह ओवरडोज हमारे बच्चों के साथ किशोरों और युबाओं के विकास को कितना और किस-किस स्तर पर प्रभावित करेगी।

Tuesday, December 7, 2010

यह डिवोर्स मेड इन चाइना है


अखबारों के तकरीबन एक ही पन्ने पर साया हुईं  ये दो खबरें हैं। एक तरफ प्राचीन से नवीन होता चीन है तो दूसरी तरफ उत्तर आधुनिकता की जमीन पर परंपराओं और संबंधों के नए सरोकारों को विकसित कर रहा अमेरिका। दुनिया के दो महत्वपूर्ण हिस्सों में यह सामाजिक बदलाव का दौर है। लेकिन दिशा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग। एक तरफ खतरे का लाल रंग काफी तेजी से और गाढ़ा होता जा रहा है तो दूसरी तरफ मध्यकालीन बेड़ियों से झूल रहे बचे-खुचे तालों को तोड़ने का संकल्प।   
बाजार के साथ हाथ मिलाते हुए भी अपनी लाल ठसक को बनाए रखने वाले चीन की यह बिल्कुल वही तस्वीर नहीं है जो न सिर्फ सशक्त है बल्कि  सर्वाइवल और डेवलपमेंट का एक डिफरेंट मॉडल भी है। चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने सोशल रिसर्चर तंग जुन के हवाले से बताया है कि चीन में न सिर्फ अर्थव्यवस्था का बल्कि तलाक का ग्राफ भी बढ़ा है। ढाई दशक पहले तक चीन में हर हजार शादी पर 0.4 मामले तलाक के थे जबकि अब वहां नौबत यह आ गई है कि हर पांचवीं शादी का दुखांत होता है। चीनी समाज में स्थितियां किस तरह बदल रही हैं इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2009 में चीन में 2.42 करोड़ लोग परिणय सूत्र में बंधे लेकिन 24 लाख लोग अंतत:  इस बंधन से बाहर आ गए। अर्थ का विकास जीवन को कुछ सुकूनदेह बनाता हो या न, उसके अनर्थ का खतरा कभी मरता नहीं है।
चीनी विकास का अल्टरनेट मॉडल परिवार और समाज के स्तर पर भी कोई वैकल्पिक राह खोज लेता तो सचमुच बड़ी बात होती। लेकिन शायद ऐसा न तो संभव था और न ही ऐसी कोई कोशिश की गई। उलटे विकास और समृद्धि के चमकते आंकड़ों की हिफाजत के लिए वहां पोर्न इंडस्ट्री और सेक्स ट्वायज का नया बाजार खड़ा हो गया। दुनिया के जिस भी समाज  में सेक्स की सीमा ने सामाजिक संस्थाओं का अतिक्रमण कर सीधे-सीधे निजी आजादी का एजेंडा चलाया है, वहां सामाजिक संस्थाओं की बेड़ियां सबसे पहले झनझनाई हैं। चीन में आज अगर इस झनझनाहट को सुना जा रहा है तो वहां की सरकार को थ्यानमन चौक की घटना से भी बड़े खतरे के लिए तैयार हो जाना चाहिए। क्योंकि बाजार को अगर सामाजिक आधारों को बदलने का छुट्टा लाइसेंस मिल गया तो आगे जीवन और जीवनशैली के लिए सिर्फ क्रेता और विक्रेता के संबंधों का खतरनाक आधार बचेगा।
अमेरिका से आई खबर की प्रकृति बिल्कुल अलग है। वहां शादियों और मां बनने का न सिर्फ जोर बढ़ा है बल्कि इन सबके साथ कई क्रूर रुढ़ताएं भी खंडित हो रही हैं। जिस अमेरिका में राजनीति से लेकर फिल्म और शिक्षण संस्थाओं तक नस्लवाद का अक्स आज भी कायम है, वहां रंग, जाति और बिरादरी से बाहर जाकर प्यार करने और शादी करने का नया चलन जोर पकड़ रहा है। नस्ली सीमाओं को लांघकर विवाह करने का यह चलन कितना मजबूत है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पिछले तीन दशक में ऐसा करने वालों की गिनती दोगुनी हो चुकी है। अमेरिकी समाज के लिए यह एक बड़ी घटना है।                  
50-60 के दशक तक अमेरिका में दूसरी नस्ल के लोगों के साथ विवाह करने की इजाजत नहीं थी। बाद में वहां सुप्रीम कोर्ट का आर्डर आया जिसने ऐसे किसी एतराज को गलत ठहराया। बहरहाल, इतना तो कहना ही पड़ेगा कि दुनिया भर में नव पूंजीवाद व उदारवाद का अलंबरदार देश अपनी भीतरी बनावट में भी उदार होने के लिए छटपटा रहा है। यह सूरत आशाजनक तो है पर फिलहाल इसे क्रांतिकारी इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि अब भी वहां 37 फीसद सोशल हार्डकोर मेंटेलिटी के लोग हैं जो विवाह की नस्ली शिनाख्त में किसी फेरबदल के हिमायती नहीं हैं। जाहिर है चरमभोग के परमधाम में अभी स्वच्छंदता की मध्यकालीन मलिनता से छुटकारा मुश्किल है। लेकिन वहां जो बदलाव दिख रहा है उसमें आस और उजास दोनों हैं।     

Friday, December 3, 2010

दिल्ली : संवेदना की खिल्ली


वह दौर गया जब कवि ग्रामवासिनी भारत के गीत गाते नहीं अघाते और छात्र इसी विषय पर साल दर साल सुलेख का अभ्यास करते थे। शहरों की रेशमी लकदक पर फिकरे कसकर जमीन से जुड़े होने का दावा करने वाले रैडिकल एक्टिविस्ट तो खैर आज भी मिल जाएंगे, पर उनके लिए यह बात सोच से ज्यादा कुशल अभिव्यक्ति के चालाक पैतरे भर हैं। जीवन और समाज के बीच से तमाम कोमलताओं का हरण कर जिस तरह रातोंरात गांवों के सीने पर विकास की सेज (एसइजेड) बिछाई जा रही है, वह हमारी आधुनिकता को जिस अंदाज में परिभाषित करती है, उसके खतरे हम समझें न समझें, रोज ब रोज उस खतरे को उठा जरूर रहे हैं।   
इसे आर्थिक समझ का मुगालता कहें न कहें एक अव्वल दर्जे की आत्मघाती बेवकूफी तो जरूर कहेंगे कि उन्नति और विकास के लिए शहरीकरण को लक्ष्य और लक्षण दोनों स्वीकार करने वाले सिद्धांतकार सरकार के भीतर और बाहर दोनों जगह हैं। और यह स्थिति सिर्फ अपने यहां है ऐसा भी नहीं। पूरी दुनिया को खुले आर्थिक तंत्र की एक छतरी में देखने की ग्लोबल होड़ के बाद कमोबेश यही समझ हर देश और दिशा में बनी है।
2010 के नवम्बर महीने के आखिरी दिन दो ऐसी खबरें आयीं जिसने शहरी समाज और व्यवस्था के बीच से लगातार छिजती जा रही संवेदनशीलता के सवाल को एक बार फिर उभार दिया। 50 साल के घायल रामभोर ने एंबुलेंस में ही इसलिए दम तोड़ दिया क्योंकि देश की राजधानी के बड़े-छोटे किसी अस्पताल के पास न तो उसकी इलाज के लिए जरूरी उपकरण थे और न ही वह रहमदिली कि उसे कम से कम उसके हाल पर न छोड़ा जाए। विडंबना ही है कि हेल्थ हेल्पलाइन से लेकर किसी को भूखे न सोने की गारंटी देने वाली देश की राजधानी में एक गरीब और मजबूर की जान की कीमत कुछ भी नहीं।
शहर के अस्पतालों में मरीजों के साथ होने वाले सलूक का सच इससे पहले भी कई बार सामने आ चुका है। जो निजी पांच सितारा अस्पताल अपनी अद्वितीय सेवा धर्म का ढिंढोरा पीटती हैं, वहां तो गरीबों के लिए खैर कोई गुंजाइश ही नहीं है। रही सरकारी अस्पतालों की बात तो आए दिन अपनी पगार और भत्ते बढ़ाने के लिए हड़ताल पर बैठने वाले डॉक्टरों की तरफ से कम से कम कभी कोई मांग मरीजों की उचित देखरेख के लिए तो नहीं ही उठाई गई। उनकी इसी मानसिकता को लेकर एक समकालीन कवि ने डॉक्टरों को पेशेवर रहमदिल इंसान तक कहा। यह अलग बात है कि नई घटना में तो वे ढ़ंग से पेशेवर भी नहीं साबित हुए।
दूसरी घटना मेट्रो स्टेशन की है। जिसमें  ऊपरी तौर पर घटित तो कुछ भी नहीं हुआ, हां अंतर्घटना के रूप में देखें-समझें तो रोंगटे जरूर खड़े हो जाते हैं। अपनों से अलग-थलग पड़ चुकी कानपुर से दिल्ली आई एक महिला राजधानी के एक मेट्रो स्टेशन पर इस फिक्र में घंटों बैठी रही कि वह कहां जाए और  किससे मदद की गुहार लगाए। उसकी स्थिति देखकर कोई भी उसकी लाचारी को पढ़ सकता था पर उससे कुछ ही कदम की दूरी पर बैठे सुरक्षा जवानों के लिए शहर में आए दिन दिखने वाला यह एक आम माजरा था। दिलचस्प है कि यह संवेदनहीनता उस शहर के पुलिस और सुरक्षा जवानों की है जिसको लेकर यहां की सरकार अमन-चैन के वादे करती है। गनीमत है कि किसी अपराधी तत्व की निगाह उस महिला पर नहीं पड़ी नहीं तो हालिया गैंगरेप मामले में छीछालेदर करा चुकी पुलिस के लिए मुंह छिपाने की एक आैर बड़ी वजह लोगों की चर्चा का विषय होता।
दरअसल, कभी एशियाड तो कभी कॉमनवेल्थ के नाम पर जिस दिल्ली को सजाया-चमकाया जाता है, उसकी फितरत रेड लाइट इलाके में देर रात तक गुलजार किसी कोठे की तरह हो गई है। जहां रोशनी महज इसलिए नहीं कि हालात रौशन हैं, बल्कि इसलिए हैं कि गरम गोश्त के शौकीनों का जीभ अब भी लपलपा रहा है। पानी पर अपने काम के लिए जाने वाले अनुपम मिश्र कई बार कहते हैं कि दिल्ली आज भले सत्ता और अमीरों का शहर बन गया है। पहले इस शहर के पास अपनी तहजीब और जीवन को लेकर एक टिकाऊ परंपरा और संवेदनशील व्यवस्था थी। विकास की ग्लोबल आंधी में परंपरा के ये सारे निशान लगातार मिटते चले गए। बदले में जो गढ़ा और रटाया जा रहा है, वह है बाजार के चरम भोग का परम मंत्र। अब इस मंत्र पर आहुति देने वालों की निगाहें अगर हिंसक और नाखूनें भूखी हैं तो इसमें कोई क्या करे। अपना ही लिखा शेर जेहन में आ रहा है-
जिन जंगलों को लगाया था हमने,
उन्हीं जंगलों में भटक भी रहे हैं ।
सजाया था घर को दीवारो दर को,
सजावट यही अब खटक भी रहे हैं।