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Tuesday, October 26, 2010

नहीं कर सकती तुम उतना प्यार



तुम हो सकती हो नंगी
पर उतनी नहीं
जितना होता है नंगा
एक पुरुष
अनावरण समारोह का
फीता काटने के बाद

तुम्हें करना आता है प्यार
खूब करती हो प्यार
मनाती हो खुशी-खुशी हर साल
प्यार का त्योहार
पर कभी नहीं कर सकती
तुम उतना प्यार
जितना कर सकता है
एक पुरुष
एक साथ
एक क्षण में अपने मन में
उगीं हजारों भुजाओं के साथ

सलीके आैर नजाकत के कीमती
दोशाले से लिपटा
इनकार आैर इजहार तुम्हारा
बन सकती है कविता
गा सकता है कवि
पर कथन का जादुई यथार्थ
अभिव्यक्ति का मारक इस्तेमाल
सब कुछ करके
न कहने का भरोसेमंद अंदाज
तो है एक पुरुष के ही पास
वही कर सकता है
इस पर नाज

तुम्हें भाता है श्रृंगार
बहुत जरूरी है तुम्हारे लिए
आईने का इस्तेमाल
पर सजावट का तर्क तुम्हारा
कभी इतना सधा नहीं हो सकता
जितना एक पुरुष का रंगीन ख्याल
उसकी उभरी हुई जमीन
उसका छितराया हुआ आकाश

तड़प होगी कोई तुम्हारी भी
प्यास लगती होगी तुम्हें भी
पर इतना तो शायद ही कभी
जितना तड़पता है
एक पुरुष बीच रात में
अपनी खाट की आवाज सुनकर
जितनी छटपटाती है
उसकी इच्छा
किसी चील के कोटर में
रखा मांस देखकर

2 comments:

  1. कभी कभी निराशाओं से भरी ज़िन्दगी में अपने आप को उच्च मानकर अपनी निराशाओं से थोड़ी देर के लिए ही सही दूरी बनाई जा सकती है. शायद ऐसा ही कुछ आपकी कविता का वो पुरुष भी कर रहा है. कहीं न कहीं अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए अपने आप को उच्च मान रहा है ये पुरुष. हाँ मगर, एक दर्द भी पुरुषों का यहाँ पर उभर रहा है. इस पुरुषवादी समाज में आज जिस प्रकार हर पुरुष महिलावादी बना हुआ है, ऐसे में ऐसी रचनाओं का पूरे जोशो-खरोश से स्वागत है.

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  2. pratikriya thodi shakt ha...pr imandar ha...apni gazal ka ek sher jehan ma aya....
    BNA BNAYA HR SACNHA SA MAI LADTA HUN..AAWARA HUN...
    LOG KHENGA ISKA PHLA MAI KHTA HUN AAWARA HUN..
    .

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