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Friday, October 22, 2010

हार्दिक विरोध


अतीत के लिए टेसू बहाने वाली ने
नया शगल अपनाया है-
व्यतीत को कोसने का
शीशे से नजरें मिलाकर
आंखों में आई हौसले की चमक नई
बड़ी है कैनवस पर एक नंगी नायिका के
चरित्र को काढ़ने वाली
हर मीनाकारी से

कल होना आैर कल का होना
उसे न होने देगा आज 
आैर न आज के मन माफिक
कल को ही शक्ल दे सकेगी वह
पलटकर न देखना 
आदत न होती है नदी की
आैर न ही इक्कीसवीं सदी की
किसी तेज-तर्रार स्त्री की

समय ने सभ्यता की अप्सराओं को
बदहवास सताए जाने की
पीड़ा से मुक्त तो नहीं किया
हां बदहवास जीवन को
अघोषित गंतव्य की दिशा
बनाए रखने का महामंत्र जरूर दिया है

कल तक
उसे भोगे जाने का शोक था
आज थाली उसने
खुद अपने हाथों सजाई है
आज उसके पास अपने चुनाव की
तोशक है तकिया-रजाई है

कलकल बहता कल
है सबसे बड़ा झूठ
भविष्य के सत्य दर्शन से
हमारे समय की नायिका का
है लिवइन रिलेशन

एक आधुनिका 
कितनी स्वच्छंद
कितनी निद्र्वंद्व हो सकती है
उसकी हिमाकत
कितनी हो सकती है बोल्ड
अगर पढ़ना है इस लिखावट को तो
उन मेडिकल रिपोर्टों को
मेज पर रखना होगा
जिसमें किसी प्रेमी के बाप बन जाने का डर
किसी आधुनिका के मां बन जाने के
आत्महंता साक्ष्य से खेलता है गलबहियां
कभी सरेआम
तो कभी अंधेरे में लुकाछिपी के साथ

प्रेम की टहनी आैर कली कही जाने वाली
नायिकाओं ने दूसरों के हाथों में अब
रंग-बिरंगे बैलून होने से
कर दिया है इनकार
रोने-बिसुरने आैर तकिए गीले करने का
उनका अनुभव
उनका अवसाद
अब उनका क्षोभ है
यह प्रेम का नहीं
एक प्रेमिका का
अपने समय की कुलीनता के प्रति
हार्दिक विरोध है

1 comment:

  1. कादम्बिनी में छपी एक कविता याद आई
    रास्ते के पत्थर से मैने पूछा
    -तेरी औकात क्या है
    उसने कहा-तुमसे बेहतर
    आने जाने वालों की नजरें
    तो ठहरती हैं मुझपर

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