बुधवार, 12 जनवरी 2011

लड़की, बेडरूम और प्यार


 (1)
प्यार
प्यार का पुनर्पाठ
अभिनय की तरह
कई बार के रिटेक में
फाइनल शॉट का अभ्यास
एक जनतांत्रिक मसला तो है
पर संवैधानिक नहीं
सवाल उगाती समझदारी है यह
उस अधीर लड़की की
जो भूल से प्यार भले न सही
पर प्यार में चूक जरूर कबूलती है
प्यार का मर्म कोमल धर्म
उसे रह-रहकर कचोटता है
अपने ही किए को
कसौटी बनाने के जोखिम से

(2)
पिछले दरवाजे से स्वाधीन हुआ प्रेम
सामने के दरवाजे पर खड़ा
बड़ा सवाल है
वह लड़की आज भी अधीर है
बाल को संवारने जैसा
जिंदगी की संभाल के लिए

(3)
प्यार को रोक नहीं पाना
एहसास की सिहरन जागते ही
तकिया और रजाई हो जाना
महज समय के दोशाले में लिपटी
खरगोशी गरमाहट नहीं
समय के सबसे तेज साफ्टवेयर पर
डाउनलोड किया गया एप्लीकेशन भी है

(4)
...तो क्या एक अधीर लड़का ही
आखिरकार गढ़ता है
एक अधीर लड़की का प्रेम
उसका मन उसका मिजाज
उसका पूर्व उसका आज
बहस हंसकर करें या डूबकर
गर्दन की नाप तो लेनी होगी
उन छोकरों की ही
जिनके माइक्रोसॉफ्टी दिमाग के
खुले विंडो पर
बालिगाना खेल के लिए
तैयार हैं कई गेमप्लान
समय से ऊंची मचान
तीखे तीर शातिर कमान

(5)
अबला को
बला की संभावनाओं से भर देना
आजादी के नाम पर की गई
मालफंक्शनिंग नहीं तो और क्या है

(6)
लैंगिक समता के अलंबरदारों बताओ
एक लड़की का बेडरूम की तरह इस्तेमाल
उसे जिस हाल तक देता है पहुंचा 
वहां कितना बचता ही है दमखम
एक अधीर हुई
अबीर हुई लड़की के पास
कि वह फिर से करे प्यार
अपने किए-कराए पर पुनर्विचार
या कि आंखों को काजल कर देने वाले
आंसुओं पर एतबार

सोमवार, 10 जनवरी 2011

सर्दी वादियों में सुलगते सवाल


यह दौर जितना बदलाव का नहीं, उससे ज्यादा अस्थिरता का है। स्थितियों को बदलतीं अस्थिरताएं हमारे आसपास से लेकर अंदर तक पसर चुकी हैं। आलम यह है कि मौसम का बारहमासी चित्त और चरित्र तक अब पहले जैसे नहीं रहे। जेठ की धूप और पूस की रात के परंपरागत अनुभव आज दूर तक खारिज हो चुके हैं। लिहाजा मौसम और प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता अब वैसा नहीं रहा, जैसा हमारे पुरखों का था। जलवायु मुद्दे पर विश्व सम्मेलनों से लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही गैरसरकारी संस्थाएं, पिछले दो दशकों में इस खतरे को लगातार रेखांकित कर रही हैं कि मनुष्य ने अपनी लालच और बेलगाम जरूरतों पर अगर ध्यान नहीं दिया तो जीवन के लिए अनुकूलताएं तय करने वाले कारक एक-एक कर उससे छिनते जाएंगे। पर इस दिशा में कोई पहला, बड़ा और निर्णायक कदम अब तक इसलिए नहीं उठाया जा सका क्योंकि दुनियाभर की सरकारों को उस विकास की ज्यादा फिक्र है, जो उनकी जनता को उपभोग और व्यय का आधुनिक अनुशासन सिखाती है। 
सर्दी का आगाज इस साल भी वैसे तो पिछले कुछ सालों की तरह ही हुआ। इस बार भी सर्दी की शुरुआती दस्तक के साथ खबरें आने लगीं कि इस साल ठंड अपेक्षा से ज्यादा पड़ेगी और पारा गिरने के पुराने कई रिकार्ड धराशायी होंगे। हुआ भी ऐसा ही। दिसंबर बीतते-बीतते सर्दी ने समय को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया। उन इलाकों से भी पारे के खतरनाक स्तर तक गिर जाने की खबरें आ रही हैं, जो कोल्ड जोन से बाहर माने जाते थे। कश्मीर और हिमाचल में बर्फानी सर्दी ने अपने खतरनाक मंसूबे इस तरह जाहिर किए और यहां पड़ने वाली ठंड से निपटने के पारंपरिक अनुभव और तरीके लाचार साबित हो रहे हैं।
विडंबना ही है कि की तपिश महंगाई की हो या मौसम की बेरहमी, पहली मार पड़ती है गरीबों पर। उसकी ही जिंदगी सबसे पहले दूभर होती है, सबसे पहले उसकी ही सांसें उखड़ती हैं। रहा सवाल, सरकारी प्रयासों और उसकी संवेदनशीलता का तो आज अदालत को यह फिक्र करनी पड़ रही है कि रैनबसेरे न तोड़े जाएं और सड़कों पर जीवन गुजारने को मजबूर लोगों की हिफाजत के लिए सर्दी के मौसम में जगह-जगह अलाव जलाए जाएं। हाड़ तक अकड़ा देने वाली ठंड ने जहां बड़े शहरों की देर रात पार्टियों की रौनकी आंच आैर शराब दुकानों की कतारें बढ़ा दी है, वहीं विकास और सरकार दोनों ही दृष्टि से नजरअंदाज लोगों का हाल बुरा है। सर्दी को सह न पाने के कारण मौत की नींद सोने वालों की अखबारों में बजाप्ता तालिका छप रही है। लेकिन फर्क किसी को नहीं पड़ रहा है। समाज और सरकार दोनों के लिए यह इतनी चौंकाने वाली स्थिति नहीं कि वह अपना चैन लुटाएं।
उधर, बाजार में सर्दी और गरमी दोनों का सामना करने वाले एक से बढ़कर एक उत्पाद आ गए हैं। आप में अगर भोग की परम लिप्सा है और बीच बाजार खड़ा होने की इजाजत आपकी जेब आपको देती है तो फिर मौसम का बदलता बारहमासा भी आपके लिए हर सूरत में सुहाना है, आरामदायक है। पर यह स्थिति ठीक नहीं है। अगर हम अब भी बदले मौसम के खतरे को पढ़ने को तैयार नहीं हैं तो भविष्य के हिस्से हम एक तरफ तो खतरों का बोझ बढ़ा देंगे, वहीं दूसरी तरफ अपनी नीति और नीयत को लेकर ऐतिहासिक रूप से गुनहगार ठहराए जाएंगे। क्योंकि हरित पट्टियों का रकबा लगातार कम होते जाने का खतरा हो या पर्यावरणीय संतुलन को जानबूझकर बिगाड़ने की हिमाकत, इसके नतीजे अगर अभी ही खतरनाक साबित हो रहे हैं तो दूरगामी तौर पर तो ये पूरी तरह असह्य और प्रतिकूल साबित होंगे। लिहाजा, यह समय है निर्णायक रूप से चेतने और कारगर कदम उठाने का। दरकार सिर्फ प्रकृति पर हावी होने की बजाय उसका साथी होने की है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस साथ की चाह हम सबके अंदर पैदा होगी।

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

रूपम न्याय का सुशील अध्याय


जनतांत्रिक व्यवस्था का सबसे पहला तकाजा सबके लिए समान अवसर और न्याय है। ऐसे में बिहार में भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या के बाद इस पूरे मामले की जो सूरत गढ़ी गई, वह खासा खतरनाक और कई गंभीर सवाल उठाती है। तब जबकि एक तरफ राज्य सरकार ने मामले को संगीन बताया और फौरी तौर पर इसकी जांच के आदेश दिए, यह बात सरकार में शामिल लोगों की तरफ से बढ़-चढ़कर बताना कि केसरी क्षेत्र में काफी लोकप्रिय थे और उन्हें पूर्णिया की जनता ने चार बार विधायक चुनकर भेजा था, लिहाजा अगर किसी का चरित्र संदिग्ध है तो उस महिला का जिसने विधायक की चाकू घोंपकर हत्या की। ये बातें कहीं से भी गले नहीं उतरती।
केसरी चूंकि भाजपा विधायक थे, इसलिए इस घटना के बाद राज्य में सत्तारूढ़ जदयू-भाजपा गठबंधन में सबसे मुश्किल स्थिति जाहिर रूप से भाजपा की ही बनी। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की इस घटना के बाद अतिरिक्त सक्रियता और कुछ घंटे के अंदर ही मीडिया के सामने यह कह देना कि पेशे से शिक्षिका रूपम पाठक द्वारा विधायक पर यौन उत्पीड़न के आरोप गंभीर नहीं हैं। इस आरोप को लेकर न तो कोई मामला लंबित है और न ही किसी स्तर पर कोई लिखायत शिकायत दर्ज है। केसरी जनप्रिय नेता थे और भाजपा के साथ उनका साथ पुराना और विश्वसनीय है। किसी सूबे की सरकार में वरीयता में दूसरे नंबर की जवाबदेही संभाल रहे नेता का इस तरह का बयान कम से कम एक तटस्थ प्रतिक्रिया तो नहीं ही ठहराई जा सकती।
जदयू-भाजपा गठबंधन को सूबे की जनता ने जब शासन के लिए दोबारा चुना तो उसके पीछे एक बड़ी आशा राज्य में सुशासन की स्थापना भी थी। बेशक निजी रूप से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सत्ता में रहते हुए अपने बयान और क्रियाकलाप में अपेक्षित रूप से कम विवादास्पद रहे हैं। लेकिन विधायक हत्या मामले में सरकार और उसमें शामिल एक दल की छवि दांव पर लगी है। न्याय की यह सार्वदेशिक और सार्वकालिक मर्यादा है कि न्याय होने से ज्यादा जरूरी है कि न्याय होते हुए भी दिखे। इस मामले में कम से कम अब तक के घटनाक्रम में तो यह न्याय की यह मर्यादा पूरी होती नहीं दिखती।
एक सरकार की छवि और उसके लोगों की छवि और सुरक्षा अगर बहुत मायने रखती है तो यह कहीं से सिद्ध नहीं होता कि यह सब नागरिक सुरक्षा और खासकर एक महिला की छवि को बगैर किसी पुष्ट आधार के दाव पर लगाकर ही पूरा हो। वैसे भी जनतांत्रिक मर्यादा किसी सरकार और उसके हिस्से-पुर्जों को जनता के प्रति ही अंतिम रूप से उत्तरदायी ठहराती है। लिहाजा, केसरी हत्याकांड की जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक सरकारी पक्ष तटस्थ मर्यादा का सख्ती से पालन करे, यह चुनौती भी है और यही अपेक्षित भी। जिस तरह यह हत्या हुई, उसमें कम से कम पहली नजर में तो यह लगता ही है कि इसके पीछे की वजह मामूली तो कम से कम नहीं होगी। जिस महिला ने कानून हाथ में लेकर यह अतिरेक कदम उठाया, उसकी अब और पहले कही गई बातों पर बगैर किसी पुख्ता पड़ताल के कोई अंतिम राय बनाने का कोई कारण नहीं। और यह भी कि एक विधायक की सुरक्षा कम से कम इतनी कमजोर तो नहीं ही होनी चाहिए जैसा कि इस मामले में दिखा।

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

चल बसा रामभरोसे


इसे आर्थिक समझ का मुगालता कहें न कहें अव्वल दर्जे की एक आत्मघाती बेवकूफी तो जरूर कहेंगे कि उन्नति और विकास के लिए शहरीकरण को लक्ष्य और लक्षण दोनों स्वीकार करने वाले सिद्धांतकार सरकार के भीतर और बाहर दोनों जगह हैं। और यह स्थिति सिर्फ अपने यहां है ऐसा भी नहीं। पूरी दुनिया को खुले आर्थिक तंत्र की एक छतरी में देखने की भूमंडलीय होड़ के बाद कमोबेश यही समझ हर देश और दिशा में बनी है।
पिछले दिनों दो ऐसी खबरें आई जिसने शहरी समाज और व्यवस्था के बीच से लगातार छिजती जा रही संवेदनशीलता के सवाल को एक बार फिर उभार दिया। 50 साल के घायल रामभरोसे ने एंबुलेंस में ही इसलिए दम तोड़ दिया क्योंकि देश की राजधानी के बड़े-छोटे किसी अस्पताल के पास न तो उसकी इलाज के लिए जरूरी उपकरण थे और न ही वह रहमदिली कि उसे कम से कम उसके हाल पर न छोड़ा जाए। विडंबना ही है कि हेल्थ हेल्पलाइन से लेकर किसी को भूखे न सोने की गारंटी देने वाली देश की राजधानी में एक गरीब और मजबूर की जान की कीमत कुछ भी नहीं।
शहर के अस्पतालों में मरीजों के साथ होने वाले सलूक का सच इससे पहले भी कई बार सामने आ चुका है। जो निजी पांच सितारा अस्पताल अपनी अद्वितीय सेवा धर्म का ढिंढ़ोरा पीटते हैं, वहां तो गरीबों के लिए खैर कोई गुंजाइश ही नहीं है। रही सरकारी अस्पतालों की बात तो आए दिन अपनी पगार और भत्ते बढ़ाने के लिए हड़ताल पर बैठने वाले डॉक्टरों की तरफ से कभी कोई मांग कम से कम मरीजों की उचित देखरेख के लिए तो नहीं ही उठाई गई। उनकी इसी मानसिकता को लेकर एक समकालीन कवि ने डॉक्टरों को पेशेवर रहमदिल इंसान तक कहा। यह अलग बात है कि नई घटना में तो वे ढ़ंग से पेशेवर भी नहीं साबित हुए।
हम जिन घटनाओं का जिक्र कर रहे हैं, उसमें दूसरी घटना एक मेट्रो स्टेशन की है। इस घटना में ऊपरी तौर पर घटित तो कुछ भी नहीं हुआ, हां अंतर्घटना के रूप में देखें-समझें तो रोंगटे जरूर खड़े हो जाते हैं। अपनों से अलग-थलग पड़ चुकी कानपुर से दिल्ली आई एक महिला राजधानी के एक मेट्रो स्टेशन पर इस फिक्र में घंटों बैठी रही कि वह कहां जाए और किससे मदद की गुहार लगाए। उसकी स्थिति देखकर कोई भी उसकी लाचारी को पढ़ सकता था पर उससे कुछ ही कदम की दूरी पर बैठे सुरक्षा जवानों के लिए शहर में आए दिन दिखने वाला यह एक आम माजरा था।
दिलचस्प है कि यह संवेदनहीनता उस शहर के पुलिस और सुरक्षा जवानों की है जिसको लेकर यहां की सरकार अमन-चैन के लंबे-चौडे़ वादे करती है। गनीमत है कि किसी अपराधी तत्व की निगाह उस महिला पर नहीं पड़ी, नहीं तो गैंगरेप के एक से ज्यादा मामलों में अब तक अंधेरे में तीर चला रही सरकार और पुलिस के लिए मुंह छिपाने की एक और बड़ी वजह आज लोगों की चर्चा का विषय होता।
दरअसल, पूरे देश की आबादी के सबसे घने बसाव वाली दिल्ली के लिए कानून-व्यवस्था के जिस अलग और ज्यादा चुस्त तंत्र की दरकार है, उसकी जरूरत केंद्र और स्थानीय सरकार ने महसूस की हो या नहीं, कम से कम उनकी तरफ से इस दिशा में कोई निर्णयात्मक पहल तो नहीं ही की गई। इस जरूरी पहल का रास्ता कभी राजनीति ने काटा तो कभी सरकारी महकमों की गतहाली ने। पर अब स्थिति चेतने की है, नहीं तो सचमुच बहुत देर हो जाएगी।             

रविवार, 2 जनवरी 2011

वर्षकाल


एक बिन धुले
निगेटिव की तरह
था साल दो हजार दस
कैमरे की कई बार की
क्लिक के बाद भी
तस्वीर की कल्पना भर
दृश्य का महज आभास भर

विदा होते हुए बरस यह
पूरी तरह धुल चुके मुकम्मल
कोडेक इमेज की तरह
कहां गलत थे पांव
किसे बस यों ही मान बैठे
अपना गांव
कहां पथ प्रशस्त
कहां दु:स्वप्न के झार-कांटे
कहां मनमौजी
जिद्दी आत्मघाती रास्ते

हाथ वह जो
कड़ी जोड़ने
हथकड़ी तोड़ने की तरह
राह जिसने संभव किया
समय का हृदय से जुड़ाव
एहसास के कुछ गिनेचुने पड़ाव
कुछ देर तक गुदगुदाते लम्हे 
कुछ दूर तक सिहरते घाव

अनुभवों की बारीक
कसीदाकारी
मां को लपेटे
जैसे व्रत की साड़ी
भेंट अंतिम यह
गुजरे एक पूरे वर्ष का
परिस्थिति वह तब की
स्थिति यह अब की

ध्वंस की राख
कि भभूतिया चमत्कार
छंट चुकी पूरी तरह
रात एक अबीरी
बढ़कर थाम रही
सुबह एक सिंदूरी
कुछ आधी-अधूरी बात
कुछ भरपूर जज्बात
एक पूरा वर्षकाल

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

भ्रष्टाचार की अमर्त्य व्याख्या


अमर्त्य सेन को जब नोबेल मिला था तब इस सम्मान का इसलिए भी स्वागत हुआ था कि इस बहाने बाजार और  भोग का  खपतवादी "अर्थ" सिखाने वाले दौर में वेलफेयर इकॉनमिक्स की दरकार और महत्ता दोनों रेखांकित हुई। अमर्त्य  हमेशा अर्थ के कल्याणकारी लक्ष्य के हिमायती रहे हैं। इसलिए जीडीपी और सेंसेक्सी उछालों में दिखने वाले विकास के मुकाबले वे हमेशा ग्रामीण शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों को विकास का बैरोमीटर बताते हैं। एक ऐसे दौर में जबकि अर्थ को लेकर तमाम तरह की अनर्थकारी समझ की नीतिगत स्थितियां हर तरफ लोकप्रिय हो रही हैं तो नोबेल विजेता इस अर्थशास्त्री ने दुनिया के सामने कल्याणकारी अर्थनीति की तार्किक व्याख्याएं और दरकार रखी हैं।
हैरत नहीं कि जब भ्रष्टाचार को लेकर बढ़ी चिंता पर उन्होंने अपनी राय जाहिर की तो देश में दिख रहे तात्कालिक आवेश और आक्रोश से अलग अपनी बात कही। अमर्त्य को नहीं लगता कि भ्रष्टाचार को लेकर सिर्फ मौजूदा मनमोहन सरकार पर दबाव बनाना वाजिब है। वह सरकार और सरकार में बैठे कुछ लोगों की भूमिका से ज्यादा उस व्यवस्थागत खामी का सवाल उठाते हैं, जिसमें भ्रष्टाचार की पैठ गहरी है। इस लिहाज से माजूदा यूपीए सरकार हो या इसके पहले की सरकारें, दामन किसी का भी साफ नहीं।
अमर्त्य की नजर में भ्रष्टाचार की चुनौती तो निश्चित रूप से बढ़ी है पर इससे निजात आरोपों और तल्ख प्रतिक्रियाओं से तो कम से कम मिलने से रहा। दुर्भाग्य से देश में संसद से लेकर सड़क तक अभी जो शोर-शराबा दिख रहा है, वह अपने गिरेबान में झांकने की बजाय दूसरे का गिरेबान पकड़ने की नादानी से ज्यादा कुछ भी नहीं। आखिर एक ऐसे समय में जबकि सभी यह स्वीकार करते हैं कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक नैतिकता के सरोकारों का अभाव हर स्तर पर दिख रहा है, हम कैसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि भ्रष्टाचार की पागल नदी पर हम ऊपर ही ऊपर नैतिक पाररदर्शिता का सेतु बांध लेंगे या कि ऐसा करना ही इस समस्या का हल भी है।
भ्रष्टाचार को लेकर इस देश में केंद्र की सबसे शक्तिशाली कही जाने वाली सरकार तक को मुंह की खानी पड़ी है। यह इतिहास अभी इतना पुराना नहीं हुआ है कि इसके सबक और घटनाक्रम लोग भूल गए हों। आज भ्रष्टाचार का पैमाना लबालब है पर इसके खिलाफ कोई संगठित जनाक्रोश नहीं है। विपक्षी पार्टियां खुद इतनी नंगी हैं कि वे इस मुद्दे पर न तो जनता के बीच लंबी तैयारी से जा सकते हैं और न ही सरकार को सधे तार्किक तीरों से पूरी तरह बेध सकती हैं क्योंकि तब तीर उनके खिलाफ भी कम नहीं चलेंगे।
एक और सवाल अमर्त्य सेन ने गठबंधन सरकारों की मजबूरी को लेकर भी उठाया है। उन्होंने मनमोहन सिंह की छवि की तरफ इशारा करते हुए कहा कि भले आपकी ईमानदारी की छवि जगजाहिर हो पर गठबंधन का लेकर कुछ मजबूरियां तो आपके आगे होती ही हैं। दिलचस्प है कि गठबंधन भारतीय राजनीति का यथार्थ है। पर इस यर्थाथ की पालकी ढोने वाली पार्टियों को यह तो साफ करना ही होगा कि गठबंधन की जरूरत आैर सरकार चलाने की मजबूरी में वे कितनी दूर तक समझौते करेंगे।  
बहरहाल, अर्थ को कल्याण के लक्ष्य के साथ देखने वाले सेन मौजूदा स्थितियों से पूरी तरह निराश भी नहीं हैं। उनकी नजर में भ्रष्टाचार को अब लोग जिस स्पष्टता से स्वीकार कर रहे हैं, वह एक सकारात्मक लक्षण है। किसी समस्या को चुनौतीपूर्वक स्वीकार करने के बाद ही उसके खिलाफ आधारभूत रूप से किसी पहल की गुंजाइश बनती है। अभी कम से कम यह स्थिति तो जरूर आ गई है कि इस बात पर तकरीबन हर पक्ष एकमत है कि अगर समय रहते समाज और व्यवस्था में गहरे उतर चुके भ्रष्टाचार के जहर के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तो सचमुच बहुत देर हो जाएगी। बस सवाल यहां आकर फंसा है कि इसके खिलाफ पहल क्या हो और  पहला कदम कौन बढ़ाए। तात्कालिक आवेश पर अंकुश रखकर अगर समाज, सरकार और  राजनीतिक दल कुछ बड़े फैसले लेने के लिए मन बड़ा करें तो एक भ्रष्टाचार विहीन समय और व्यवस्था के सपने को सच कर पाना मुश्लिक नहीं है। अमर्त्य अर्थ के जिस कल्याणकारी लक्ष्य की बात करते हैं, जाहिर है कि उसका शपथ मीडिया, समाज और संसद सबको एक साथ लेना होगा।         

रविवार, 26 दिसंबर 2010

विरासत के नाम एक मनमोहन चिंता


भारत का एक राष्ट्र और संस्कृति के रूप में अभ्युदय नया नहीं है। यही नहीं लोक और परंपरा की गोद में दूध पीती यहां की बहुरंगी संस्कृति का कलेवर शुरू से सतरंगी रहा है। दुनियाभर में यही हमारी पहचान भी रही है और  यही हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चिंता जताई है कि बहुसंस्कृति, संयम और भाईचारे की समृद्ध विरासत पर खतरा है और इसे हर हाल में बचाया जाना चाहिए। उन्होंने खासतौर पर बुद्धिजीवियों से अपील की है कि वे इस विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में योगदान करें। बुद्धिजीवियों की भूमिका और उनकी दरकार को इस तरह स्वीकार करना अगर ऊपरी या रस्मी नहीं है तो मौजूदा स्थितियों में यह बड़ी बात है और स्वागतयोग्य भी। यह और बात है कि विद्वानों और कला-संस्कृति के जानकारों के लिए बना ऊपरी सदन अब इनकी उपस्थिति को मोहताज है। वहां दाखिले के लिए अब दीनारी दमखम चाहिए। सो "संतन को कहां सीकरी सो काम" कहने वाले कैसे वहां पहुंच पाएंगे। 
बहरहाल, बात प्रधानमंत्री के हालिया बयान की। दरअसल, मौजूदा दौर में संबंध, संवेदना और संयम को हर स्तर पर खारिज होते जाने का चलन प्रगाढ़ हुआ है और उसकी जगह जो पनप और पसर रहा है, वह है तात्कालिक उत्कर्ष और समृद्धि का उतावलापन। यहां तक की 21वीं सदी में विश्व शक्ति के रूप में भारत की जिस पहचान को विश्व मानचित्र पर उकेरने के उपक्रम चल रहे हैं, उनमें भी सार्वदेशिकता और सार्वकालिकता की बजाय तात्कालिक उत्कर्ष के तर्क ही ज्यादा हावी हैं। सुखद है कि विकास के ग्लोबल दौड़ में भारत को एक द्रुत धावक के रूप में तैयार करने की ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले मनमोहन सिंह को भी इस खतरे का अंदाजा है कि आगे निकलने की जल्दबाजी में कहीं कुछ बहुत महत्वपूर्ण पीछे न छूट जाए।
मनमोहन मानते हैं कि बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसंस्कृति वाले इस देश में एकता को बनाए रखने की दरकार है। उन्होंने उस अध्यात्म दर्शन का भी हवाला दिया, जिसके कारण हमारे देश को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा हासिल हुई है। भारतीय चित्त, मानस और काल के अध्येता धर्मपाल हों या लोक और परंपरा के कल्याणकारी संबंध की व्याख्या करने वाले वासुदेवशरण अग्रवाल और रामचंद्र शुक्ल। सबने भारतीय समाज में किसी बाजारू या आर्थिक की बजाय लोकादर्शों की संरक्षा और उसे आगे बढ़ाने वाले तत्वों को अन्यतम बताया है। हमारी यह अन्यतमता नए समय में हमारी महत्ता को सबसे काबिल तरीके से सिद्ध कर सकती है।
खतरा सिर्फ एक है कि चरम भोग की घुट्टी पिलाने वाले बाजारवादी मूल्यों के बीच शांति, संयम और समन्वय का धैर्यपूर्ण पाठ पढ़ने की ललक लोगों में कैसे पैदा की जाए। सरकार के मुखिया अगर स्कूल-कॉलेज के सिलेबसों में किसी फेरबदल या शोध अध्ययनों के साथ इस तरह की कोई गुंजाइश देखते हैं तो यह चिंता और चुनौती दोनों का सरलीकरण होगा।
दरअसल, भारत विकास और समृद्धि की जिस लीक पर अभी चल रहा है, वह उसकी आधुनिकता से तो जरूर मेल खाता है पर बुनियादी प्रकृति के खिलाफ है। दुखद है कि इस दुविधा को लेकर संसद और समाज कहीं भी कोई मंथन या बहस नहीं दिखती। अच्छा होता कि भारतीयता की पारंपरिक छवि को नए संभाल के साथ हम आगे बढ़ाते क्योंकि तब हमारी उपलब्धियां न सिर्फ हमारे रंगो-तेवर के मुताबिक होती बल्कि उसमें हमारी शर्तें भी शामिल होती। तब हम दुनिया के रंग में नहीं बल्कि दुनिया हमारे रंग में रंगती।
आगे बढ़कर पलटना खतरनाक है पर खतरनाक रास्ते पर आंख मूंदकर चल पड़ना भी कोई बुद्धिमानी नहीं। हमें यकीन करना चाहिए कि हमारे प्रधानमंत्री बुद्धिमान तो हैं ही, बड़े से बड़े खतरे के खिलाफ खड़े होने में हर लिहाज से सक्षम भी हैं। इसलिए अगर उनकी चिंता बस "मनमोहनी" न होकर जेहनी तौर पर जायज है तो सरकार के सांस्कृतिक सरोकारों की जमीन एक बार फिर हरीभरी हो सकती है। वैसे इस हरियाली की कामना और इसका दर्शन हो निहायत अलग चीचें हैं। यह "कामना" और "दर्शन" अगर एक सीध में आ जाए तो मौजूदा सदी का नया दशक सचमुच कई मायने में क्रांतिकारी साबित हो सकता है।