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Wednesday, January 8, 2014

चुनाव महज मोदी और राहुल के बीच नहीं


नरेंद्र मोदी अगर 2०14 में देश के प्रधानमंत्री होते हैं तो यह अनिष्टकारी होगा। नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन के बाद हाल में मनमोहन सिंह इस बात को अलग-अलग तरीके से कह चुके हैं। इस सिलसिले में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता और रणनीतिकार योगेंद्र यादव के बयान का भी जिक्र जरूरी है। उनके कहने का तरीका थोड़ा भिन्न है। वे लोकसभा चुनाव को मोदी बनाम राहुल के तौर पर देखने पर ही लानत भरते हैं। उनका बयान अमत्र्य और मनमोहन के बयान के करीब से जरूर गुजरता है पर उसकी मंजिल कहीं और है। वे सिर्फ व्यक्ति केंद्रित राजनीति पर सवाल नहीं उठाते बल्कि साथ ही इस दरकार को भी तार्किक रूप से रेखांकित करते हैं कि लोकतंत्र में चुनाव का मतलब सीएम या पीएम चुनना भर नहीं है और न ही इस या उस पार्टी की हार भर है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो चुनाव उस महापर्व का नाम है, जिसमें देश और समाज का हर वर्ग बराबरी के साथ शिरकत करता है। यह शिरकत सरकार बनाने या गिराने से ज्यादा उस गुंजाइश को बहाल रखने के लिए अहम है, जिसमें एक समान्य जन भी अपने हाथ में सत्ता की चाबी संभाल सकता है। यही लोकतंत्र की महानता है, उसकी ताकत है।
बहरहाल, बात इस चर्चा के जरिए उस लोकतांत्रिक मानस की जिसमें बदलाव की बात आज हर तरफ हो रही है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की बनी सरकार ने इस बदलाव की संभावना को कहीं न हीं ज्यादा पुष्ट कर दिया है। देश में पिछले कम से कम तीन सालों के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में जनता की ताकत और उसका निर्णायक सहभाग कैसे सुनिश्चित हो, यह एक बड़ा मुद्दा बना है। बात विकास की हो, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य की हो तो स्थानीय जनता की जरूरत की सर्वोपरिता समझी जा सकती है। नागरिक समाज को खड़ा करने से निश्चित रूप से एक अनुशासित लोकतंत्र को खड़ा होने में मदद मिलेगी।
देश में अब तक आम आदमी पांच साल में एक बार मतदान की कतार में खड़ा होकर अपने लोकतांत्रिक अधिकार और कर्तव्य को पूरा करता रहा है। इससे आगे उसके करने और समझने की कोई गुंजाइश छोड़ी ही नहीं गई है। इस कारण सत्ता से जनता की दूरी बढ़ी है और सत्ता को लेकर एक अविश्वास का जनमानस भी बना है। ऐसी स्थिति लोकतंत्र की मौलिक अवधारणा के भी खिलाफ है। पिछले दिनों जन प्रतिनिधियों से लेकर संसद की सर्वोच्चता पर जब बहस छिड़ी तो मौजूदा राजनीति के माहिरों को यह काफी अखड़ा भी। भारत में जिस तरह का लोकतंत्र है और हमारा संविधान जिसकी व्याख्या करता है उसमें संसद निस्संदेह सर्वोच्च नियामक संस्था है। पर इससे यह आशय कैसे निकल सकता है कि संसद की यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है। और अगर जनता सर्वोच्च है तो फिर उसे अपनी यह सर्वोच्चता साबित करने का मौका पांच साल में महज एक बार क्यों मिले। लिहाजा, आज अगर इस सवाल को लोग लोकसभा चुनाव से पहले उठा रहे हैं कि देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, तो इसमें नामों को लेकर आग्रह-दुराग्रह तो दिख रहा है, पर यह सवाल कहीं पीछे छूट जा रहा है कि नामों और दलों की शिनाख्त के आधार पर देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए हो रही कोशिशों के सिलसिले को एक कारगर अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता है।
जेपी चौहत्तर आंदोलन के दिनों में बार-बार कहते रहे कि हमें 'कैप्चर ऑफ पॉवर’ नहीं बल्कि 'कंट्रोल ऑफ पॉवर’ चाहिए। घटनाक्रमों में तेजी से आए बदलाव के कारण जेपी का लोक समिति और लोक उम्मीदवार का प्रयोग बहुत कारगर नहीं हो सका। संपूर्ण क्रांति के शीर्ष व्याख्याकार आचार्य राममूर्ति ने भी माना कि चौहत्तर के लोकनायक के प्रयोग को महज सत्ता परविर्तन के तौर पर देखना, उन तमाम मुद्दों और संभावनाओं के प्रति अन्याय है, जिसने जनता को तब काफी मथा था। केंद्र में जनता सरकार का आना महज इसका प्रतिफल कतई नहीं था।
आज जब बात हो रही है 2०14 के लोकसभा चुनाव की तो इसमें पिछले कुछ सालों में नागरिक समाज की उस पहल का तो अक्श दिखना ही चाहिए जिसने लोकतंत्र की ज्यादा सार्थक व्याख्या और भूमिका के प्रति लोगों के बीच भरोसा जगाया, जिनका धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्थाओं और उसके निर्वाचन प्रक्रिया के प्रति ही मोहभंग होना शुरू हो गया था। आज मुद्दा यह नहीं है कि देश के अगले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होंगे या राहुल गांधी। न ही यह मुद्दा है कि अगली सरकार केंद्र में यूपीए की बनती है कि एनडीए की। यहां तक कि मुद्दा यह भी नहीं है कि गठबंधन राजनीति के दौर में कौन किस गोद से छिटककर किस गोद में जाकर बैठ जाता है। बल्कि मुद्दा तो यह है कि क्या आगामी लोकसभा चुनाव वैकल्पिक राजनीति की बढ़ी संभावना को बढ़ाता है कि नहीं,जनता और सरकार के बीच की दूरी कम होती है कि नहीं। देखने वाली बात यह भी होगी कि केंद्र में सत्तारूढ़ होने वाली पार्टी या उसका गठबंधन राजनीति को लोकनीति की तरफ ले जाने के लिए कितनी तत्पर दिखती है।
यहां यह साफ होने का है कि विकल्प और स्थानापन्न होने में फर्क है। कांग्रेस और भाजपा के बीच केंद्र के अलावा कई राज्यों में इतने भर का ही राजनीतिक संघर्ष है कि जनता अगर एक से दुखी होती है तो दूसरे को सत्ता सौंप देती है। ऐसा इसलिए नहीं कि जनता को इसके अलावा कुछ सूझता नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि उसके आगे चुनाव ही यही है कि वह इन दोनों में से किसी एक की तरफ जाए। यह तो विकल्प की नहीं बल्कि स्थानापन्नता की राजनीति हुई। मतदान के दौरान चुनाव के विकल्प से जनता को दूर रखने की जड़ता को जो राजनीतिक शक्तियां बहाल रखना चाहती हैं, वो इस लिहाज से तो कमजोर जरूर हैं कि वे अपने आगे किसी अपारंपरिक विकल्प के खड़ा होने से घबड़ाती है।
पारंपरिक राजनीति के प्रतिष्ठान कितना ढहते हैं, यह इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव का सबसे दिलचस्प प्रतिफल होगा। यह प्रतिफल ही यह तय करेगा कि इस देश की जनता अपने लिए और अपने नाम पर चलने वाले तंत्र को पराए हाथों से कितना अपने हाथों में ला पाती है। पंजाबी के क्रांतिकारी कवि पाश सबसे खतरनाक स्थिति उसे मानते हैं जब हमारे सपने मर जाते हैं। आने वाला लोकसभा चुनाव देश के जन, गण और मन के लिए सुखद ही होगा, खतरनाक नहीं ऐसी कामना है। भले अमत्र्य सेन या मनमोहन सिंह इस कामना पर भरोसा न करें। योगेंद्र यादव की कामना जरूर ऐसी दिखती है और न भी दिखती हो तो इस देश का आम आदमी तो 16वीं लोकसभा के गठन को इन्हीं कामनाओं से आकार लेता देखना चाह रहा है।

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