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Wednesday, January 15, 2014

कुछ कहता है भट्ट साहब का अफसोस


आलिया भट्ट को सैफई नहीं जाना चाहिए। यह इस तरह के आयोजन में शामिल होने का सही वक्त नहीं था। किसी भी संवेदनशील कलाकार को यह समझना चाहिए कि एक तरफ जहां राज्य में लोग डर और अभाव के बीच सर्द रातें काट रहे हैं, वहां सरकारी खर्चे पर भड़कीला आयोजन करना एक वीभत्स हिमाकत है। इसकी आलोचना होनी चाहिए। पिता महेश भट्ट अपनी बेटी के सैफई महोत्सव में शिरकत करने पर अपनी वेटी तरफ से कुछ इन्हीं वजहों से अफसोस जता रहे हैं। हालांकि बॉलीवुड के दबंग सलमान खान को यह सब रास नहीं आ रहा है। सलमान सैफई में आलिया के साथ मंच पर नाचने-गाने वालों में शामिल थे। उन्होंने आलिया के पिता के अफसोस पर कहा, 'भट्ट साहब, आलिया की तरफ से माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है। आपने उसकी परवरिश बहुत बेहतरीन तरीके से की है। वह बहुत मेहनती और समर्पित लड़की है और गरिमा के साथ अपने करियर में आगे बढ़ रही है।’
दरअसल, इस पूरे प्रसंग में सत्य इधर या उधर नहीं बल्कि कहीं बीच में टिका है। न्यू क्रिटिसिज्म का बहुत ही पॉपुलर टर्म है- 'टेक्स्ट’। इस पूरे घटनाक्रम के टेक्स्ट पर जाएं तो समय, संदर्भ और घटना को हम थोड़ा समन्वित रूप में समझ पाएंगे। समाज और राजनीति के लिए मौजूदा दौर नए विमर्श और नए निकष का है। दिलचस्प है कि जिस 21वीं सदी को सूचना तकनीक की सदी कहकर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी अपने को यशस्वी कर रहे थे, वह एक दशक बीतते-बीतते उन सरोकारों और दरकारों के आमने-समाने आ गया, जिसकी इससे पहले किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। आमजन की ताकत और उसकी संवेदना महज सभ्य समाज और लोकतंत्र की मौलिक अवधारणाओं में ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह महत्व प्रत्यक्ष तौर पर जाहिर और महसूस भी होना चाहिए। दरकार और सरोकार के इस लोकतांत्रिक साझे को लेकर पिछले दो-तीन सालों में देश की जनता एकाधिक बार सड़कों पर उतरी है। दलगत लोकतंत्र के साढ़े छह दशक के अभ्यास में भारत में संभवत: यह पहली स्थिति रही, जब स्पष्ट विचार, संगठन और नेतृत्व के बिना जनता महज इस दरकार से घर से बाहर निकलने को बार-बार मजबूर हुई क्योंकि वह लोकतंत्र में अपनी कथित स्थिति और शिनाख्त को नए सिरे से महसूस करना चाह रही थी।
अण्णा हजारे या उनके नाम से जानी गई टीम जनता की इस तड़प को पूरी तरह एड्रेस कर पाई या नहीं, यह तो कहना मुश्किल है। पर यह जरूर कहा जा सकता है कि जनलोकपाल आंदोलन ने इस दलील को जरूर एक निर्णायक अंजाम तक पहुंचाया कि जनता की भूमिका को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पांच साल में एक बार मतदान के लिए कतारबद्ध होने तक नहीं सीमित किया जा सकता है। जनता अगर लोकतंत्र की सार्वभौम इकाई है तो उसका सामथ्र्य सरकार और शासन की व्यवस्था में भी दिखना चाहिए। प्रातिनिधिक लोकतांत्रिक ढांचे का यह कतई मतलब नहीं कि जन प्रतिनिधि और संसद जनता के ऊपर अपनी सर्वोच्चता को लाद दें।
मुजफ्फरनगर दंगे की टीस की अगर आप इस टेक्स्ट को सामने रखते हुए समझें तो साफ दिखेगा कि सरकार और शासन की संवेदनहीनता हमारी कथित लोकतांत्रिक महानता को किस कदर सामने से मुंह चिढ़ाती है। अखबारों के पन्ने और टीवी चैनलों के कैमरे यह चीख-चीखकर कहते रहे कि मुजफ्फरनगर में दंगे के बाद वहां से उजड़े परिवारों की स्थिति अब भी ठीक नहीं है। जिन लोगों ने राहत कैंपों में शरण ली, वे वहां से घर वापस जाना नहीं चाह रहे थे। रही कैंपों की स्थिति तो सर्दी और पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में वहां बच्चों की जानें जा रही थी। दूसरी, तरफ इस जख्म पर हर तरफ से सियासी रोटियां सेंकी जाती रहीं। आलम यहां तक रहा कि पीड़ितों की शिनाख्त तक पर सवाल उठाए गए। इस बीच सेक्यूलरवादी तकाजे पर खरा उतरने के लिए मुआवजे की बढ़ी राशियों की घोषणा प्रदेश सरकार करती रही। ध्यान देने की बात है कि यह सब तब हो रहा था जब एक तरफ तो पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए मत डाले जा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव के लिए सियासी बिसातें बिछनी शुरू हो गई थी।
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार बड़ी बहुमत से आई है। सरकार चलाने के लिए अंक जुटाने का दबाव सरकार के आगे नहीं है। पर क्या यह ठसक जनता की चुनी गई सरकार को जनता के ऊपर मनमर्जी के शासन का क्या लाइसेंस थमा देती है? क्या सरकार में बने रहने का पांच साल का इत्मीनान इतना संवेदनहीन हो सकता कि सरकार जनता की तकलीफ में उसके साथ खड़े होने की बजाय उसके आगे सरकारी वैभव का भोंडा प्रदर्शन करे। ...और मीडिया जब इस बारे में मुख्यमंत्री या सरकारी दल के नेताओं से बात करे तो उसे फटकारा जाए। कम से कम पिछले दो हफ्ते में जब तक सैफई महोत्सव चलता रहा, यह सवाल सरकार के आगे बार-बार उठाया गया कि वह अपने आचरण से कम से कम अपने ही प्रदेश के एक हिस्से के हजारों लोगों की तकलीफ को कम करने की कवायद करते हुए अगर वह न भी दिखे तो कम से कम उसका क्रूर उपहास करते हुए भी कम से कम न दिखे।
गौरतलब है कि एक ऐसे दौर में जब जनता, सरकार और सादगी का साझा राजनीतिक संस्कृति के बदलाव को जरूरी बना रहा हो, कोई सरकार इस पूरी स्थिति को महज इसलिए खारिज कर दे कि उसके आगे चुनाव में उतरने का तात्कालिक दबाव नहीं है तो इसे आप क्या कहेंगे। महेश भट्ट बहुत संवेदनशील इंसान हैं या अगर वह किसी बात पर अपनी तरफ से अफसोस जता रहे हैं तो उसके बहुत मायने हैं, ऐसा नहीं है। खुद भट्ट साहब के कई बयान पिछले महीनों-सालों में ऐसे आए हैं जिसमें उनकी बौद्धिकता और मानसिकता को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। पर बहरहाल, भट्ट साहब उस देशकाल को जरूर पढ़ने-समझने में कामयाब रहे हैं, जिसको लेकर आज हर तरफ बात हो रही है। सलमान खान ने उनकी बेटी का पक्ष लेकर बस इतना भर जताया है कि एक फिल्मी कलाकार की भूमिका के दायरे को रातोंरात इतना विस्तार देना ठीक नहीं जिसमें वे सोशल चेंज के एजेंट के रूप में प्रभावी दिखने लगे। यह एक आदर्श दरकार जरूरी हो सकती है पर इसके जरूरी होने के लिए राजनीति, समाज और सिनेमा को अभी बदलाव के कई पाठ पढ़ने-सीखने होंगे।
अलबत्ता महेश भट्ट का अफसोस उस सरकारी संवेदनहीनता को जरूर एक बार फिर से कठघरे में ले आई, जिस पर सवाल आज हर तरफ से उठ रहे हैं। अगर एक पिता अगर अपनी बेटी को सार्वजनिक रूप से यह नसीहत दे कि उसे कहां जाना चाहिए और कहां नहीं, इसका निर्णय करने से पहले उसे उस टेक्स्ट को भी जरूर ध्यान में रखना चाहिए, जो उसके समय और परिवेश को रचते हैं, तो इस सीख को आप यों ही खारिज नहीं कर सकते हैं ै। इस प्रसंग की आज हर तरफ चर्चा है तो इसलिए कि जनता अब अपने ऊपर शासन के अट्टहास को सहन करने को तैयार नहीं है।

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