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Tuesday, December 31, 2013

'स्मॉल इज नॉट वनली ब्यूटीफुल, इट अज सिग्निफिकेंट आल्सो’


ईएफ शुमाकर की मशहूर किताब है- स्मॉल इज ब्यूटीफुल। शुमाकर की गिनती बीसवीं सदी के चोटी के आर्थिक चिंतक में होती है। वैसे वे महज अर्थ पंडित भर नहीं थे। समय और समाज को लेकर वे एक व्यापक दृष्टिकोण रखते थे। उनकी साफ मान्यता थी कि लोकसमाज को साथ लिए बिना आप न तो विकास का कोई ब्लू प्रिंट तैयार कर सकते हैं और न ही मानव कल्याण के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। बहरहाल, शुमाकर का जिक्र फिलहाल महज इसलिए क्योंकि वर्ष 2०13 के दिनों-महीनों को पलटकर देखने पर उनकी किताब के शीर्षक का बरबस ध्यान आता है। यह शुमाकर की किताब का नाम भर नहीं बल्कि उनके नाम से मशहूर हुई एक कालजयी उक्ति भी है। बिहार आंदोलन के दिनों में जेपी इस उक्ति का कई बार जिक्र करते थे। जेपी तब की स्थिति को देखते हुए इसे थोड़ा बदलते भी थे। वे कहते थे-'स्मॉल इज नॉट वनली ब्यूटीफुल, इट अज सिग्निफिकेंट आल्सो।’
जेपी को तब नहीं पता था कि संपूर्ण क्रांति की जिस मशाल को वह जला रहे हैं, वह देश में राजनीति और व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष को किस मुकाम तक ले जाएगा। पर उन्हें यह जरूर महसूस होता था कि जो भी पहल हो रही वह सामयिक तौर पर जरूरी है। जड़ता के टूटने से ज्यादा जरूरी है, उसके खिलाफ हस्तक्षेप का होना। एक चेतनशील मनुष्य और उसके समाज की यही पहचान है कि वह अपनी चेतना को हर उस जड़ता के खिलाफ एक कार्रवाई का रूप दे जो उसके परिवेश को प्रगतिशील होने के बजाय स्थिर करता है, निष्प्राण करता है। आज जब हम वर्ष 2०13 की समाप्ति पर इन बातों को समझने की कोशिश करते हैं तो हमारा ध्यान कई उन छोटी-बड़ी बातों पर जाता है, जो इस वर्ष को आगे के कई वर्षों के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाता है।
वैसे यहां यह साफ होना जरूरी है कि कैलेंडर में तो हफ्ते-महीने को अलगाना आसान है पर अगर हम बात करते हैं देश और समाज की तो हमें बारहमासे के तय खांचे से थोड़ा आगे निकलना होगा। इस तरह अगर वर्ष 2०13 के साथ हम अगर 21वीं सदी के दूसरे दशक के अब तक के दौर को एक साथ देखें तो हमें साफ लगेगा कि छह दशक से ज्यादा लंबी उम्र का भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर से अपनी शिनाख्त और भूमिका को नए सिरे से तय करना चाहता है। आजादी पूर्व से लेकर आजादी बाद के भारतीय इतिहास में यह नितांत नए तरह का अनुभव है।
नायक, विचार, संगठन और फिर इनकी सामूहिक ताकत से एक क्रांतिकारी आरोहण की तैयारी रिवोल्यूशन की यह थ्योरी आज बेमानी है। यह उस दौर का सच है जिसमें लोग यहां तक विचार करने की स्थिति में हैं कि 'भीड़ भी एक विचार है’। दिलचस्प है कि अरब बसंत के बाद इस बात को लेकर तमाम तरह के अध्ययन हो रहे हैं कि आज एक नए तरह का विश्व समाज है। एक ऐसा समाज जो एक तरफ तो अपने आस-पड़ोस से दूर है, कटा-कटा है, वहीं सोशल मीडिया पर वह संपर्क के तमाम तरह की एक्टिविटी से जुड़ा है। इस स्थिति को समाजशास्त्री अध्ययन के किसी पुराने चश्मे से नहीं समझा जा सकता है। यह एक नई तरह की स्थिति है, जिसमें व्यक्ति, परिवार और समाज की इकाई हर स्तर पर अपनी नई पहचान और नई दरकारों को दर्ज करा रही है। उत्तर आधुनिकता के नाम पर पिछले दो दशकों में इस स्थिति को लोक और परंपरा की पुरानी लीक के खिलाफ एक दुराग्रह का दौर तक कहा गया। पर क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि एक ऐसे समय में जब आतंकवाद जैसा प्रतिक्रियावादी विकल्प लोगों के सामने अपने को असंतोष को व्यक्त करने के लिए मौजूद है, लोग तमाम तरह के अहिंसक विकल्पों को आजमा रहे हैं।
बात करें भारत की तो एक चिंता जो गांधी ने देश की आजादी से काफी पहले जताई थी कि लोकतंत्र का केंद्रीकृत ढांचा अगर बहाल रहा तो स्वराज का अभीष्ट हमसे दूर ही रहेगा। लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण मतलब प्रातिनिधक लोकतंत्र के मॉडल को प्रत्यक्ष जन प्रतिभाग के मॉडल में बदलना। आज जिस आम आदमी पार्टी (आप) की दिल्ली विधानसभा की 28 सीटों पर जीत को लेकर राजनीति-सामाजिक चिंतक तमाम तरह की बातें कर रहे हैं, वह लोकतंत्र में ढांचागत परिवर्तन की जनांकांक्षा को ही कहीं न कहीं प्रतिबिंबित करता है।
वैसे आप के 'स्वराज’ को लेकर अभी तमाम तरह की आशंकाएं भी हैं। जनतंत्र में जन भागीदारी की भूमिका को पांच साल में एक बार मतदान की कतार में खड़े होने से आगे ले जाने की दरकार तो समझ में आती है, पर इससे आगे नीति और निर्णय के जन प्रतिभाग को कैसे व्यवस्थागत रूप से सुनिश्चत किया जाए, यह भी एक बड़ा प्रश्न है। गांधी के स्वराज और अरविंद केजरीवाल के स्वराज में एक बड़ा फर्क है। गांधी स्वराज के लिए सबसे पहले नागरिक इकाई की शुचिता का सवाल उठाते हैं। शारीरिक श्रम, मितव्ययता, प्रेम-करुणा, सर्वधमã समभाव जैसी चारित्रिक और नीतिगत कसौटी पर खड़ा हुए बगैर गांधीवादी अहिंसक स्वराज की कल्पना नहीं की जा सकती।
प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी मौजूदा दौर को 'परम भोग’ का 'चरम दौर’ कहते थे। बाजार के साथ आई सूचना क्रांति ने एक तरफ जहां हमारी रचनात्मक वृतियों से स्वाबलंबन का तत्व छिन लिया है, वहीं हम लालच के महापाश में इतना बंध गए हैं कि इस कैद को ही सुखद कहने-मानने को मजबूर हैं। ऐसे 'उदार’ दौर का स्वराज कितना उदार होगा, यह बड़ा प्रश्न है। पर यह तो हुई गांधी विचार और परंपरा की एक बड़ी लीक के आगे 'आम आदमी’ के कुछ क्रांतिकारी संकल्पों को खारिज करने की बात।
गांधी की ही एक बात को लें तो वे अपने जीवन और अपने कमोर्ं को सत्य का प्रयोग कहते रहे। यह प्रयोग गांधी तक आकर कोई अंतिम स्थिति को पा गया, ऐसा नहीं है। यह एक सतत प्रक्रिया है, जो हमेशा चलती रहनी चाहिए। खुद गांधी भी अगर कोई सीख देते हैं, हमें यही सीख देते हैं। अब इस दृष्टि से वर्ष 2०13 में बनी स्थितियों की बात करें तो इसमें कई सकारात्मक लक्षण लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के दिखाई पड़ते हैं।
'भीड़’ इस या उस पार्टी या संगठन के बैनर तले नहीं बल्कि तिरंगे को लहराती हुई अचानक देश के कोने-कोने में सड़कों पर उतर आती है। नागरिक समझ के नाम पर बस यह प्रतिक्रिया कि भ्रष्टाचार, महिला असुरक्षा, नागरिक अधिकारों पर कुठाराघात की स्थिति को अब नहीं सहेंगे। क्या इतने भर से शासन-प्रशासन की जड़ता भंग होगी? दरअसल यह शुरुआती स्थिति ही आज परिवर्तन की एक प्रक्रिया को जन्म दे रही है। जन, गण और मन का नया समन्वय किसी नीति और विचार से आगे समाधान की स्थिति की ओर ले जाता है। एक ऐसा समाधान जिसे परिवर्तन का आधुनिक लोकतांत्रिक तरीका भी कह सकते हैं। यह तरीका व्यक्ति का व्यक्ति पर भरोसे का है। इस न्यूनतम शपथ का है कि हम बदलेंगे इसलिए हमारा परिवेश, हमारा समय भी बदलेगा। यह तरीका स्वाभाविक रूप से अपने लिए नायकत्व भी तय कर लेता है। शुमाकर के शब्दों का एक बार फिर से स्मरण करें तो यह छोटा प्रयोग सुंदर तो है ही, जेपी की पूरक व्याख्या को जोड़ दें तो रेखांकित करने योग्य भी है।



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