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Saturday, December 21, 2013


अमेरिका 2०13 में दो हफ्ते से भी ज्यादा शटडाउन के खतरे में पड़ गया था। हालांकि यह संकट वहां डेमोक्रेट और रिपब्लिकन पार्टियों के बीच सियासी भिड़ंत के कारण आया था। पर यह सूरत एक बार फिर से इस तरफ इशारा कर गई कि दुनिया की तमाम बड़ी आर्थिक ताकतें कहीं न कहीं आज उस मुकाम पर पहुंच गई हैं, जिसमें उनका आर्थिक स्वाबलंबन कभी भी डगमगा सकता है। डॉलर से लेकर यूरो जोन तक की अर्थव्यवस्थाएं लगातार अपने को बचाने में लगी हैं। इस बात को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यही बीते कुछ सालों से देश-दुनिया के रिश्ते को तय करनेवाले नियामक मुद्दे रहे हैं।
दिलचस्प है कि यह एक ऐसे दौर की सचाई बनती जा रही है जिसे 'उदार’ होने का खिताब दिया गया है। अमेरिका इस खिताब को पूरी दुनिया में बांटने वाला अगुवा देश है पर जो सूरत अब वहां भी बराक ओबामा के पिछले और मौजूदा कार्यकाल में बनी है, उसमें आर्थिक सुरक्षा के लिए उसे दुनिया के तमाम देशों के साथ अपने आर्थिक सरोकार खासे 'अनुदार’ तौर पर तय करने पड़ रहे हैं। यह सूरत 2०14 में अचानक से बदल जाएगी, ऐसी कोई उम्मीद न के बराबर ही दिखती है। यह अलग बात है कि अमेरिका इस बदले हालात में भी सुपर पावर नंबर वन होने के अपने दावे को अलग-अलग तरीकों से मजबूत करता रहा है। इस मजबूती के लिए वह कभी ईरान और उत्तर कोरिया पर अपनी आंखें तरेरता है तो वहीं पाकिस्तान जैसे राष्ट्र को प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन और मदद देकर एक पूरे क्षेत्र में अपनी भूमिका के रकबे को लगातर बढ़ाने की जुगत में रहता है। उसकी यह जुगत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अगले साल भी जारी ही रहेगी, ऐसा मानकर चलना चाहिए। वैसे संतोषप्रद यह जरूर है कि जिस तरह इस साल ईरान के मामले में उसकी हिमाकत एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाई, वैसी स्थिति नए वर्ष में भी अमेरिका के कई विस्तारवादी मंसूबों पर पानी फेर सकता है।
बात करें भारत की तो अगले साल यहां लोकसभा चुनाव होने जा रहे हैं। जो सूरत और संकेत हैं, उसमें केंद्र की अगली सरकार यूपीए की बनती नहीं दिख रही है। वैसे भाजपा की अगुवाई में अगर अगली सरकार एनडीए की भी बनती है तो देश की विदेश नीति में कोई बहुत बुनियादी फर्क आएगा, ऐसा लगता नहीं है। हां, पाकिस्तान को लेकर भावी केंद्र सरकार के रवैए में थोड़ी सख्ती जरूर देखने को मिल सकती है। अलबत्ता यह सख्ती भी युद्धक होने की इंतिहा तक शायद ही पहुंचेगी। आखिर भारत और पाकिस्तान दोनों ही एटमी देश हैं। वैसे एक शुभ संकेत जरूर है कि पाकिस्तान में 2०13 में नवाज शरीफ के नेतृत्व में नई सरकार बनी है। पिछले दिनों वहां के सेनाध्यक्ष भी बदल गए हैं। ऐसे में राजनयिक कुशलता का अगर परिचय दिया जाए तो दोनों देशों के रिश्ते में थोड़ी मिठास घुल सकती है।
इस साल भारत और चीन के बीच सीमा विवाद काफी उलझा रहा और इसमें हमारा देश कई बार बैकफुट पर भी दिखा। पर आखिरकार सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया और सीमा पर अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने का फैसला किया। यह सामरिक सुदृढ़ता भविष्य में चीन के खिलाफ भारत की स्थिति को रणनीतिक रूप से मजबूत करेगी।

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