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गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

गांधीवादी दौर की वापसी का खंडित मिथक


समय को जीने से पहले ही हम उसके नाम का फैसला कर लेते हैं। यह ठीक उसी तरह है, जैसे बच्चे के जन्म के साथ उसका नामकरण संस्कार पूरा कर लिया जाता है। यह परंपरा हमारी स्वाभाविक वृत्तियों से मेल खाता है। समय की बात शुरू में इसलिए क्योंकि जिस 21वीं सदी में हम जी रहे हैं, उसका आगमन बाद में हुआ नामकरण पहले कर दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी इसे कंप्यूटर और सूचना क्रांति की सदी बताते थे। उनकी पार्टी आज भी इस बात को भूलती नहीं और देश को जब-तब इस बात की याद दिलाते रहते हैं।
बहरहाल, बात इससे आगे की। 21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिंसक प्रयोगों को आजमाया गया तो फिर से एक बार समय के नामकरण की जल्दबाजी देखी गई। भारतीय मीडिया की तो छोड़ें अमेरिका और इंग्लैंड से निकलने वाले जर्नलों और अखबारों में कई लेख छपे, बड़ी-बड़ी हेडिंग लगी कि भारत में एक बार फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण और उन्हें सशक्त बनाने के लिए खासतौर पर देशभर के युवा एकजुट हो रहे हैं। सूचना और तकनीक के साझे के जिस दौर को गांधीवादी मूल्यों का विलोमी बताया जा रहा था, अचानक उसे ही इसकी ताकत और नए औजार बताए जाने लगे। नौबत यहां तक आई कि थोड़ी हिचक के साथ देश के कई गांवों-शहरों में रचनात्मक कामों में लगी गांधीवादी कार्यकताओं की जमात भी इस लोक आलोड़न से अपने को छिटकाई नहीं रख सकी। वैसे कुछ ही महीनों के जुड़ाव के साथ इनमें से ज्यादातर लोगों ने अपने को इससे अलग कर लिया।
इस सिलसिले में एक उल्लेख और। भाजपा के थिंक टैंक में शामिल सुधींद्र कुलकर्णी ने अपनी किताब 'म्यूजिक ऑफ द स्पीनिंग व्हील’ में तो इंटरनेट को गांधी का आधुनिक चरखा तक बता दिया। कुलकर्णी ने अपनी बात सिद्ध करने के लिए तमाम तर्क दिए और यहां तक कि खुद गांधी के कई उद्धरणों का इस्तेमाल किया। कुलकर्णी के इरादे पर बगैर संशय किए यह बहस तो छेड़ी ही जा सकती है कि जिस गांधी ने अपने 'हिंद स्वराज’ में मशीनों को शैतानी ताकत तक कहा और इसे मानवीय श्रम और पुरुषार्थ का अपमान बताया, उसकी सैद्धांतिक टेक कोकंप्यूटर और इंटरनेट जैसी परावलंबी तकनीक और भोगवादी औजार के साथ कैसे मेल खिलाया जा सकता है।
संयोग से गांधी के 'हिंद स्वराज’ के भी चार साल पहले सौ साल पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर गांधीवादी विचार के तमाम अध्येताओं ने एक सुर में यही बात कही कि इस पुस्तक में दर्ज विचार को गांधी न तब बदलने को तैयार थे और न आज समय और समाज की जो नियति सामने है, उसमें कोई इसमें फेरबदल की गंुजाइश देखी जा सकती है। अब ऐसे में कोई यह बताया कि साधन और साध्य की शुचिता का सवाल आजीवन उठाने वाले गांधी की प्रासंगिकता और उनके मूल्यों की 'रिडिस्कवरी’ की घोषणा ऐसे ही तपाक से कैसे की जा सकती है। तो क्या गांधी के मूल्य, उनके अहिंसक संघर्ष के तरीकों की वापसी की घोषणा में जल्दबाजी की गई। और अगर ऐसा हुआ तो इस जल्दबाजी के कसूरवार तो मीडिया से लेकर राजनीतिक दल तक सभी हैं।
इस जल्दबाजी के नुकसान पर आगे चर्चा से पहले कुछ बातें उस चेहरे को लेकर जिसे समय के परिवर्तन का चेहरा बताया गया था, बनाया गया था। आज अण्णा हजारे क्या हैं और क्या कर रहे हैं इस पर जरूर अलग-अलग तरीके से टिप्पणियां की जा सकती हैं। उनके कई शुभचिंतकों और मुरीदों को भी इस बात का अफसोस है कि बदलाव की एक बड़ी लोक अंगराई के वे अगुवा होने के बावजूद वे आज देखते-देखते नेपथ्य में चले गए। पर बड़ा सवाल यह है कि क्या उनके द्बारा या उनके आंदोलन के जरिए उठाए गए मुद्दे भी नेपथ्य में चले गए हैं या बस कुछ महीने बीतते-बीतते पिट गए। वैसे खुद अण्णा अफने को चुका हुआ नहीं मानते हैं। आगामी 1० दिसंबर से वे फिर से अनशन पर बैठने वाले हैं सरकार पर शीतकालीन सत्र में जनलोकपाल बिल पास कराने का दबाव बनाने के लिए। कहना मुश्किल है कि इस बार उनके अनशन का असर क्या होगा, क्योंकि इस संघर्ष के उनके पुराने साथी आज उनके साथ नहीं हैं।
बहरहाल बात उन कुछ सवालों और मुद्दों की जो गुजरे दो-तीन सालों में बार-बार उठे। लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एक दिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से क्या पूरी हो जाती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद सर्वोच्च संस्था है पर क्या उसकी यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है? क्या सरकार और संसद सिर्फ नीतियों और योजनाओं का निर्धारण जनता के लिए करेंगे या फिर इस निर्णय प्रक्रिया में जनता की भी स्पष्ट भागीदारी सुनिश्चत होनी चाहिए? केंद्रीकृत सत्ता लोकतांत्रिक विचारधारा के मूल स्वभाव के खिलाफ है तो फिर उसका पुख्ता तौर पर विकेंद्रीकरण क्यों नहीं किया जा रहा है? पंचायती राज व्यवस्था को अब तक सरकार की तरफ से महज कुछ विकास योजनाओं को चलाने की एजेंसी बनाकर क्यों रखा गया है, उसका सशक्तिकरण क्यों नहीं किया जा रहा है?
ये तमाम वे मुद्दे और सवाल हैं, जो बीते कुछ सालों में जनता के बीच उभरे, खुली बहस का हिस्सा बने। जनता के मूड को देखते हुए या तो ज्यादातर राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने इनका समर्थन किया या फिर विरोध की जगह एक चालाक चुप्पी साध ली। पारदर्शी सरकारी कामकाज और उस पर निगरानी के लिए अधिकार संपन्न लोकपाल की नियुक्ति जैसे सवालों पर तो संसद तक ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी। चुनाव सुधार के मुद्दे पर भी तकरीबन एक सहमति हर तरफ दिखी। पर अब जब चुनाव हो रहे हैं। पहले पांच राज्यों के विधानसभाओं के और फिर अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं, तो इनमें से शायद ही कोई मुद्दा हो जो किसी राजनीतिक दल के चुनावी एजेंडे में शुमार हो। चुनावी वादे के नाम पर कच्ची-पक्की सड़कों के या तो किलोमीटर गिनाए जा रहे हैं या फिर मुफ्त अनाज या लैपटॉप बांटने के लालची वादे। अण्णा आंदोलन से छिटकर कर बनी आम आदमी पार्टी जरूर इनमें से कुछ मुद्दों को लेकर दिल्ली विधानसभा चुनाव में उतरी है, पर उनकी महत्वाकांक्षा और जल्दबाजी से उनके आदर्शवादी कदमों की व्यावहारिकता पर सवाल उठते हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि अपने दौर को पहचानने और उसे नाम देने में हम एक बार फिर से धोखा खा गए? क्या हमारा समय अभी किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था परविर्तन के लिए तैयार नहीं है। क्या देश की जनता की लोकतांत्रिक जागरुकता एक भावावेश भर है, जो देखते-देखते बीत जाता है।
दरअसल, ये सवाल चाहे जैसे भी पूछे जाएं उसका केंद्रीय उत्तर एक ही है। वह उत्तर यह है कि परिवर्तन कोई फैशनेबल चीज नहीं, जिसे जब चाहे प्रचलन में ला दिया और जब चाहे प्रयोग से बाहर कर दिया। फिर यह टू मिनट नूडल्स भी नहीं कि बस कुछ ही समय में बस जो चाहा हासिल कर लिया। यही नियति हाल में बनी परिवर्तनकारी स्थितियों की भी हुई। इसके नाम और परिणाम तय करने की भावुक स्वाभाविकता में हम भूल गए कि समय के तारीख के हर्फ ऐसे नहीं बदलते। फिर जिस राजनीतिक व्यवस्था ने पिछले छह दशकों से ज्यादा के समय में अपनी पकड़ का रकबा हमारे मानस तक फैला रखा है, उसकी बाहें मरोड़ना कोई आसान बात नहीं। निचोड़ यह कि संभावना तभी यकीनी है जब उसके संभव होने के आसार हों और नाम से नहीं बलिक कोई चीज अपने अंजाम से जानी-मानी जाती है।

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