सोमवार, 31 दिसंबर 2012

पत्थर फेंक रहा हूं द्रौपदी

चंद्रकांत देवताले
देवताले पचास के दशक के आखिर में हिंदी कविता जगत में एक हस्तक्षेप के रूप में उभरते हैं और उनका यह हस्तक्षेप आगे चलकर भी न तो कभी स्थगित हुआ और न ही कमजोर पड़ा। देवताले की काव्य संवेदना पर वीरेन डंगवाल की चर्चित टिप्पणी है, कि वे 'हाशिए' के नहीं बल्कि 'परिधि' के कवि हैं। उनकी कविताओं में स्वातंत्रोत्तर भारत में जीवनमूल्यों के विघटन और विरोधाभासों को लेकर चिंता तो है ही, एक गंभीर आक्रोश और प्रतिकार भी है। अपनी रचनाधर्मिता के प्रति उनकी संलग्नता इस कारण कभी कम नहीं हुई कि अपने कई समकालीनों के मुकाबले आलोचकों ने उनको लेकर एक तंग नजरिया बनाकर रखा।
जाहिर है कि इस कारण अर्धशती से भी ज्यादा व्यापक उनके काव्य संसार को लेकर एक मुकम्मल राय तो क्या बनती, उलटे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सरोकारों को लेकर सवाल उठाए गए। किसी ने उन्हें 'अकवि' ठहराया तो किसी ने उनकी वैचारिक समझ पर अंगुली उठाई। देवताले के मू्ल्यांकन को लेकर रही हर कसर उन्हें 2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुने जाने के बाद पूरी हो जाएगी, ऐसा तो नहीं कह सकते। हां, यह जरूर है कि इस कारण उनको लेकर नई पीढ़ी को एक आग्रहमुक्त राय बनाने में मदद मिलेगी। देवताले को यह सम्मान उनके 2010 में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूं' के लिए दिया गया है। यह उनकी एक महत्वपूर्ण काव्य पुस्तक है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं। 'भूखंड तप रहा है' और 'लकड़बग्घा हंस रहा है', 'पत्थर की बेंच' और 'आग हर चीज में बताई गई थी' जैसे उनके काव्य संकलन उनकी रचनात्मक शिनाख्त को कहीं ज्यादा गढ़ते हैं।
बहरहाल, यह विवाद का विषय नहीं है। वैसे भी अकादमी सम्मान के बारे में कहा जाता है कि यह भले किसी एक कृति के लिए दिया जाता हो, पर यह कहीं न कहीं पुरस्कृत साहित्याकार के संपूर्ण कृतित्व का अनुमोदन है। इस कारण एक उम्मीद यह जरूर बंधती है कि देवताले के काव्य बोध और उनके विपुल कवि कर्म का पुनरावलोकन करने की आलोचकीय दरकार देर से ही सही लेकिन अब पूरी होगी। इस तरह की दरकारों का जीवित रहना और उनका पूरा होना मौजूदा दौर में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समय, समाज और संवेदना का अंतजर्गत आज सर्वाधिक विपन्नता का संकट झेल रहा है। मानव मूल्यों के विखंडन को नए विकासवादी सरोकारों के लिए जरूरी मान लिया गया है। यह एक खतरनाक स्थिति है पर इस खतरे को रेखांकित करने का जोखिम कोई लेना नहीं चाहता है।
देवताले हिंदी की अक्षर संवेदना को बनाए और बचाए रखने वाले महत्वपूर्ण कवियों में हैं। हिंदी का मौजूदा रचना जगत  सार्वकालिकता के बजाय तात्कालिक मूल्य बोधों को पकड़ने के प्रति ज्यादा मोहग्रस्त मालूम पड़ता है। यही कारण है कि टिकाऊ रचानकर्म का अभाव आज हिंदी साहित्य की एक बड़ी चिंता बनकर उभर रही है। देवताले इस चिंता का समाधान तो देते ही हैं, वे हमें उस चेतना से भी लैस करते हैं, जिसकी दरकार एक जीवंत आैर तत्पर नागरिक बोध के लिए है- 'मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/ आैर मैंने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया/ जो घृणित युद्ध में शामिल हैं।' (पत्थर फेंक रहा हूं)
प्रतिभा राय
2011 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हो गई है और इस बार इसके लिए चुनी गई हैं वरिष्ठ उडि़या कथाकार प्रतिभा राय। प्रतिभा राय भारतीय साहित्यकारों की उस पीढ़ी की हैं, जिन्होंने गुलाम नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में अपनी आंखें खोलीं। लिहाजा, अपनी अक्षर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें स्वतंत्र लीक गढ़ने का हौसला दिखाया। उडि़या से बाहर का रचना संसार उनके इस हौसले से ज्यादा करीब से तब परिचित हुआ, जब उनका उपन्यास आया- 'द्रौपदी'। भारतीय पौराणिक चरित्रों को लेकर नवजागरण काल से 'सुधारवादी साहित्य' लिखा जा रहा है, जिसमें ज्यादा संख्या काव्य कृतियों की है। कथा क्षेत्र में इस तरह का कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ।
समाकालीन जीवन के गठन और चिंताओं को लेकर एक बात इधर खूब कही जाती है कि साहित्य के मौजूदा सरोकारों पर खरा उतरने के लिए अब 'बिंबात्मक' औजार से ज्यादा जरूरी  है- 'कथात्मक हस्तक्षेप'। मौजूदा भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी दुराग्रहों पर हमला बोलने के लिए राय ने इस दरकार को समझा। 'द्रौपदी' में वह विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर सामाजिक नजरिया, पति-पत्नी संबंध और स्त्री प्रेम को लेकर काफी ठोस धरातल पर संवाद करती हैं। इस संवाद में वह एक तरफ जहां पुरुषवादी आग्रहों को चुनौती देती हैं, वहीं भारतीय स्त्री के गृहस्थ जीवन को रचने वाली विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर भी वह संवेदनात्मक सवाल खड़ी करती हैं।
बहरहाल, 'द्रौपदी' उपन्यास की रचयिता का रचना संसार काफी विषद और विविधतापूर्ण है। कथा साहित्य की विविध विधाओं के साथ कविता के क्षेत्र में भी वह अधिकारपूर्वक दाखिल हुई हैं। यही कारण है कि आज जब उन्हें भारतीय साहित्य क्षेत्र के सर्वाधिक सम्मानित आैर मान्य पुरस्कार के लिए चुना गया है तो निर्णय प्रक्रिया की तटस्थता पर भी कोई सवाल नहीं उठ रहा है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि सुप्रसिद्ध उडि़या लेखक डॉ. सीताकांत महापात्र चूंकि ज्ञानपीठ चयन समिति के अध्यक्ष थे, इसलिए प्रतिभा राय के कृतित्व पर विचार करने और सर्वसम्मत निर्णय लेने में सहुलियत हुई होगी।
राय को इससे पूर्व साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ का ही एक और महत्वपूर्ण पुरस्कार मूर्तिदेवी सम्मान मिल चुका है। लिहाजा उनके साहित्य को नए सिरे अनुमोदित होने की जरूरत नहीं है। उनका रचनाकर्म अभी न तो थका है और न ही विराम के करीब है, इसलिए उनसे आगे और महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों की उम्मीद की जा सकती है।     

रविवार, 30 दिसंबर 2012

रविशंकर : हमारी स्थानीयता वैश्विकता के खिलाफ नहीं


चेतना और स्वतंत्रता की जो नई जमीन तैयार दुनिया में 50-60 के दशक में हो रही थी, उसमें राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा ही नहीं संस्कृति भी एक बड़े औज़ार के रूप में काम कर रही थी। पंडित रविशंकर की नब्बे साला जिंदगी पर नजर डालें तो यह बात ज्यादा समझ में आती है। रविशंकर से पहले उनके अग्रज उदयशंकर नृत्य की तमाम शैलियों को लेकर नर्तन की एक नई सर्वसमावेशी शैली को रच रहे थे। उनका प्रयोग स्थानीयता के प्रभाव से मुक्त एक ग्लोबल प्रयोग था। 18 साल की उम्र तक रविशंकर अपने अग्रज के साथ रहे। लेकिन नृत्यकला में वैश्विक पहचान बनाने की हुलस अचानक ही बदल गई और उन्होंने सितार के तारों को अपनी आत्मा की आवाज बनाने का निर्णय कर लिया। करियर आैर सक्सेस के प्रतिस्पद्र्धी दौर में इस निर्णय के पीछे की शिद्दत को समझना थोड़ा कठिन है। रविशंकर के लिए यह निर्णय महज अपने रास्ते अपनी मंजिल पाने की धुन भर नहीं थी।
नृत्य का साथ छोड़कर वादन क्षेत्र में आने का फैसला उनके अग्रज के प्रयोगों का ही एक नया विस्तार था। अपने समय और परिवेश के साथ संवादी रिश्ते के साथ रविशंकर को यह भी लगा कि जब तक वे प्रशिक्षण से आगे साधना के रूप में संगीत से नहीं जुड़ेंगे, तब तक उनका संगीत 'अनहद' तक नहीं पहुंच पाएगा। साधना की इस शपथ को उन्होंने मैहर वाले बाबा अल्लाउद्दीन खान की शार्गिदी में और पक्का कर लिया।  फिर क्या था, सितार और रविशंकर इस तरह एक-दूसरे के पर्याय बने कि विश्व संगीत जगत भी दंग रह गया।
दिलचस्प है कि उनकी पैदाइश बनारस की थी और बनारस के बारे में कहा जाता है कि यहां की माटी-पानी का असर जिंदगी भर नहीं जाता। आज भारतीय संगीत के इस महान जादूगर के निधन पर जब भारत के साथ पूरी दुनिया उनके जीवन के स्वर्णिम सर्गों को याद कर विस्मित हो रही है, तो संगीत के भारतीय घराने की परंपरा, शैली और संभावना पर भी नए सिरे से बात हो रही है। भारत रत्न, मैग्सेसे और तीन बार ग्रैमी सम्मान से नवाजे गए रविशंकर को बीटल्स के जार्ज हैरिसन अगर विश्व संगीत के गॉडफादर मानते हैं तो इसलिए नहीं कि उन्होंने भारतीय संगीत परंपरा का साथ छोड़ धुन और साज की कोई नई वैश्विक समझ पा ली थी।
दरअसल, प्राच्य दर्शन की तरह प्राच्य संगीत भी नस्ल और सरहद की दायरेबंदी से आजाद रहा है। विश्व मानवता और उनके बीच के समन्वय, सहयोग और सौहार्द को और प्रगाढ़ करने के लिए संगीत भी एक क्रांतिकारी जरिया हो सकता है, पंडित रविशंकर ने अपनी संगीत साधना से सिद्ध करके दिखाया। आज जब ग्लोबल भाषा, व्यापार और सूचना तंत्र की बात होती है और उसमें भारत की दखल पर जोर दिया जाता है, तो लोग यह भूल जाते हैं कि भारत अपनी तरह से इस तकाजे पर शुरू से खरा उतरता आया है। यह सबक है, उन तमाम लोगों के लिए जो यह मानते हैं कि उत्तर-आधुनिकता की सीढि़यां लोक और परंपरा की भारतीय सीख के साथ नहीं चढ़ी जा सकती है।
कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर से लेकर एमएफ हुसैन और पंडित रविशंकर तक भारत की यशस्वी सांस्कृतिक परंपरा एक ही बात बार-बार दोहराती है कि हमारी स्थानीयता वैश्विकता के खिलाफ नहीं बल्कि उसकी पूरक है, उसकी संवाहक है।   

रविवार, 4 नवंबर 2012

एक भट्टी का शांत हो जाना


मौजूदा दौर की एकिक और सामूहिक मानवीय प्रवृतियों पर गौर करें तो कहना पड़ेगा कि यह दौर कड़वाहट और फूहड़ता के साझे का है। साझे के इस मांझे में ही निजी से लेकर सार्वजनिक जिंदगी उलझी हुई है। सुलझाव की कोशिशें इतनी सतही और बेइमान हैं कि उलझन में और नई गांठ ही पड़ती जा रही हैं। गंभीर विमर्श के खालीपन को आरोप-प्रत्यारोप, तर्क-कुतर्क और ज्ञान के वितंडावादी प्रदर्शन भर रहे हैं, तो हास्य-व्यंग्य की चुटीलता भोंडेपन में तब्दील हो रही है।
ऐसे में जो काम जसपाल भट्टी कर रहे थे और जिस तरह की उनकी सोच और रचनाधर्मिता थी, वह महत्वपूर्ण तो थी ही समय और परिवेश की रचना के हिसाब से एक जरूरी दरकार भी थी। भट्टी का सड़क दुर्घटना में असमय निधन काफी दुखद है। इसने तमाम क्षेत्र के लोगों को मर्माहत किया है। अपनी ऊर्जा और लगन के साथ वे लगातार सक्रिय थे। उनके जेहन और एजेंडे में तमाम ऐसे आइडिया और प्रोजेक्ट थे, जिस पर वे काम कर रहे थे।
जसपाल भट्टी ने पढ़ाई तो इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग की थी पर उनकी हास्य-व्यंग्य के प्रति दिलचस्पी कॉलेज के दिनों से ही थी, जो बाद में और प्रखर हुई। भट्टी का हास्य नाहक नहीं बल्कि सामाजिक सोद्देश्यता से लैश था और उनकी चिंता के केंद्र में आम आदमी हमेशा रहा। आमजन के जीवन की बनावट, उसका संघर्ष और उसकी चुनौतियों को उन्होंने न सिर्फ उभारा बल्कि इस पर उनके चुटीले व्यंग्यों ने व्यवस्था और सत्ता के मौजूदा चरित्र पर भी खूब सवाल खड़े किए।
नाटक से टीवी और सिनेमा तक पहुंचने के उनके रास्ते का आगाज दरअसल एक कार्टूनिस्ट के तौर पर हुआ। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि एक जमाने में जसपाल भट्टी 'द ट्रिब्यून' अखबार के लिए कार्टून बनाया करते थे। काटूर्निस्ट सुधीर तैलंग ने उनके निधन पर सही ही कहा कि एक ऐसे दौर में जब लोग हंसना भूल गए हैं और कार्टून और व्यंग्य की दूसरी विधाओं के जरिए सिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोल रहे लोग शासन के कोप का शिकार हो रहे हैं, भट्टी की हास्य-व्यंग्य शैली का अनोखापन न सिर्फ उन्हें लोकप्रिय बनाए हुए था बल्कि वे अपनी बातों को लोगों तक पहुंचाने में सफल भी हो रहे थे।
जसपाल भट्टी के सरोकार जिस तरह के थे और जिस तरह के विषयों को वे सड़क से लेकर, नाटकों, टेलीविजन सीरियलों और फिल्मों में उठाते थे, वह उन्हें एक कॉमेडी आर्टिस्ट के साथ एक एक्टिविस्ट के रूप में भी गढ़ता था। विज्ञापन जगत और सिने दुनिया ने उनकी लोकप्रियता का व्यावसायिक जरूर किया पर खुद भट्टी कभी लीक और सरोकारों से नहीं डिगे। उनकी यह उपलब्धि खास तो है ही यह उन लोगें के आगे एक मिसाल भी है, जो प्रसिद्धि की मचान पर चढ़ते ही अपनी जमीन से रिश्ता खो देते हैं। गौरतलब है कि भट्टी का वयक्तित्व पंजाबियत की रंग में रंगा था। उनके हास्य-व्यंग्य में भी यह पंजाबियत झांकती है। पंजाब की जमीन और लोगों से उनका रिश्ता आखिरी समय तक कायम रहा, जबकि इस बीच मुंबई की माया ने उन्हें अपनी तरफ खींचने के लिए हाथ खूब लंबे किए।

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

बुद्ध के खिलाफ युद्ध...!

एक दशक पूर्व जब अफागानिस्तान में तालिबानियों ने बामियान की बुद्ध प्रतिमाओं को नष्ट कर अपनी बर्बरता दिखाई थी तब इसकी चौतरफा आलोचना हुई थी। यहां तक कि इस्लाम के नाम पर आतंकी गतिविधियां चलाने वाले समूहों में भी इस कार्रवाई को लेकर मतभेद उभरे थे। एक दशक बाद एक बार फिर पूरी दुनिया में धार्मिक असंवेदनशीलता का एक नया दौर शुरू हुआ है। पैगंबर मोहम्मद की कथित आलोचना वाली अमेरिकी फिल्म 'इन्नोसेंस ऑफ मुस्लिम्स' के खिलाफ पूरी दुनिया में प्रतिरोध में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। आगजनी हो रही है। खून-खराबे हो रहे हैं। प्रतिरोध के ये स्वर संयुक्त राष्ट्र तक गूंजे। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस मुद्दे पर जहां अपनी सफाई रखी, वहीं यह कहकर मामले को एक तरह से तूल भी दे दी कि किसी धर्म विशेष की निंदा-आलोचना पर मुखर होने वालों को बाकी धर्मों के प्रति भी समान नजरिया अपनाना चाहिए। यह एक भड़काने वाला बयान भले न सही पर इससे अमेरिकी फिल्म से दुनिया भर में भड़के आक्रोश को और बढ़ाया ही।
वैसे धर्म के नाम पर होने वाले प्रतिरोध की दलीलों और वजहों को तो फिर भी समझा जा सकता है। आखिर धार्मिकआस्था एक संवेदनशील मुद्दा है और किसी को भी जानबूझकर इसे भड़काने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। पर अफसोसनाक यह है कि प्रतिरोध की इस आड़ में लूटमार और हिंसा की बड़ी घटनाएं भी होती हैं।  दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि अकसर ऐसे मौकों पर समाज के कुछ अराजक तत्व सक्रिय हो जाते हैं और वे शांति और सौहार्द का माहौल बिगाड़ने लगते हैं।
बांग्लादेश में जो घटना घटी उसमें कथित तौर पर एक बौद्ध धर्मावलंबी ने अपने फेसबुक एकाउंट में पवित्र कुरानशरीफ की जली प्रति की तस्वीर पोस्ट कर दी थी। हालांकि ऐसा करने वाले ने इसे जानबूझकर किया गया कृत्य न मानकर एक चूक बताया है। बावजूद इसके वहां की बहुसंख्यक आबादी इस बात पर भड़क उठी। आधी रात के बाद वहां हजारों लोग इस कृत्य के विरोध में प्रदर्शन करने लगे। इस दौरान ही कुछ अराजक मानसिकता के लोगों ने वहां कम से कम 11 बौद्ध मंदिरों को जला डाला। इस घटना ने बामियान की एक दशक पुरानी घटना की याद ताजा कर दी है।
अभी पिछले साल ही खबर आई थी कि जर्मनी के म्युनिख विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर और उनके कुछ साथी शोधार्थियों ने बामियान में बुद्ध की मूर्तियों को पुनस्र्थापित करने की पहल शुरू की है। ये लोग शांति का संदेश देने वाली इन ऐतिहासिक प्रतिमाओं का महत्व इस रूप में देख रहे थे कि इनकी उपस्थिति से विश्व मानवता का प्रेम और सौहार्द का संकल्प मजबूत होता है।
दिलचस्प है कि पूरी दुनिया में जहां-जहां भी बौद्ध धर्मावलंबी हैं, उनका नाम शायद ही कभी धार्मिक टकराव की किसी घटना में आया हो। जिस बांग्लादेश में बौद्ध मंदिरों को जलाया गया, वहां तो उनकी बमुश्किल एक फीसद आबादी है। इससे पूर्व वहां कभी धार्मिक हिंसा की खबर आई भी है तो वह बहुसंख्यक मुस्लिमों और अल्पसंख्यक हिंदुओं के कारण। बौद्धों के प्रति किसी दूसरे मजहब के लोगों के आक्रोशित होने की ऐसी खबर अब तक  दुनिया के किसी हिस्से से आई संभवत: पहली खबर है। साफ है कि धार्मिक असहिष्णुता का पागलपन अगर हम नहीं रोक पाते हैं तो इसका अनिष्ट भविष्य में और भी बड़ा हो सकता है। 

रविवार, 30 सितंबर 2012

महात्मा @ कुलकर्णी

रंग-बिरंगे मुखौटों का अट्टाहास
गूंज रहा है मैलोड्रामा के बीच
नस्ल की रोशनाई
फौलाद को गुस्ताख कहने वाली सोच की शमशीर
 कहीं भी लिख देती है लाल लथपथ गाथा
पर अजन्मी रह जाती है हर बार
आखिरी आदमी की पहली पुकार
महात्मा फिर एक बार
...


सुधींद्र कुलकर्णी महज एक भाजपा कार्यकर्ता भर नहीं हैं। उनकी पहचान पार्टी की विचारधारा और रणनीति बनाने वाले की रही है। यह भूमिका वह पिछले कई सालों से निभा रहे हैं। एनडीए सरकार के दौरान उनकी यह भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गई थी। पिछली बार उनका नाम तब जोर-शोर से सामने आया था, जब 'वोट फॉर नोट' मामले का पर्दाफाश हुआ। तुलनात्मक दृष्टि से चीजों को देखने-परखने वाले उन्हें भाजपा का सैम पैत्रोदा तक कहते हैं। यह तुलना सही हो या नहीं, इतना जरूर है कि भाजपा शिविर में वैचारिक-बौद्धिक प्रखरता का बहुत बड़ा दारोमदार उन पर है और वे इस प्रखरता को अपनी तरह से बनाए-बचाए हुए भी हैं।
उनकी इसी प्रखर सक्रियता की मिसाल है, उनकी नई अंग्रेजी किताब- 'म्यूजिक ऑफ द स्पीनिंग व्हील'। इस किताब में कुलकर्णी ने इंटरनेट की भूमिका और प्रसार का गांधीवादी प्रतिमानों पर रोचक आलोचना की है। आईडिया के लिहाज से यह प्रयास बेजोड़ है। निश्चित रूप से इससे इंटरनेट को सामने रखकर एक नवीन सभ्यता विमर्श को शुरू करने में मदद मिलेगी। बात गांधी और सभ्यता विमर्श की हो रही है, तो यह जिक्र भी जरूरी है कि गांधी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' को उनकी 'मूल विचार सारिणी' कहा जाता है। एक सदी पूर्व इस पुस्तक को 'सभ्यता विमर्श' की अहिंसक कसौटी के रूप में देखा गया था, तो आज इसे बजाप्ता 'नव सभ्यता विमर्श' के रूप में प्रासंगिकता के साथ देखा-समझा जा रहा है।
इस सिलसिले में वरिष्ठ लेखक वीरेंद्र कुमार बरनवाल की हाल में आई पुस्तक 'हिंद स्वराज : नव सभ्यता विमर्श' का उल्लेख जरूरी है। दिलचस्प है कि 'हिंद स्वराज' में जहां अहिंसक स्वाबलंबन और विकेंद्रीकरण को शांति और विकास का रास्ता बताया गया है, वहीं भारी मशीन और मानव श्रम की अस्मिता को खंडित करने वाले केंद्रित उपक्रमों को खतरनाक ठहराया गया है। कुलकर्णी ने इंटरनेट को गांधीवादी मू्ल्यों पर न सिर्फ खरा पाया है, बल्कि इसे गांधी के 'आधुनिक चरखे' का नाम तक दिया है। इंटरनेट को लेकर यह निष्कर्ष दिलचस्प भले हो पर जल्दबाजी और असावधानी में निकाला गया नतीजा है।
इंटरनेट बाजारवादी दौर की तो देन है ही बाजार के पराक्रम को बढ़ाने वाला एक प्रमुख अस्त्र भी रहा है। आम आदमी के जीवन में महत्व और 'न्यू मीडिया' जैसी संभावनाओं को अगर इंटरनेट क्रांति का कल्याणकारी हासिल मान भी लें तो भी इसे अहिंसक कसौटी पर कबूल कर पाना मुश्किल है। गांधी के 'सत्याग्रह' का 'विग्रह' महज एक सदी बीतते-बीतते कम से कम इस धरातल पर तो नहीं हो सकता कि समय के साथ गांधीवादी मूल्यों में जोड़-तोड़ और सुधार संभव हैं। 

रविवार, 16 सितंबर 2012

मीडिया पर मनमोहन उपदेश

विपक्ष को अपने मौजूदा प्रधानमंत्री से अन्य शिकायतों के साथ एक बड़ा शिकायतयह है कि वे मुखर नहीं हैं। पिछले दिनों अपनी खामोशी पर मनमोहन  सिंह ने एक शायराना जवाब भी दिया था। प्रधानमंत्री चूंकि बोलते ही बहुत कम हैं इसलिए जब वे कुछ कहते भी हैं तो लोग उसके निहितार्थ को बहुत दूर तक या तह तक जाकर समझने की कोशिश करते हैं। आमतौर पर ऐसी स्थिति में कई बातें सामने आ जाती हैं और फिर उस पर बाजाप्ता बहस छिड़ जाती है।
ऐसा ही एक मौका बीते दिनों आया, जब मनमोहन सिंह ने मीडिया को उसके दायित्वों और चुनौतियों की याद दिलाई। मौका था केरल श्रमजीवी पत्रकार संघ के स्वर्ण जयंती समारोह के शुभारंभ का। आज सरकार जिस स्थिति में चल रही है और वह खुद जिस तरह की आलोचनाओं से घिरी है, उसमें उसके मुखिया द्वारा अकेले मीडिया को संयम और समन्वय का पाठ पढ़ाना गले के नीचे नहीं उतरता। ऐसा इसलिए नहीं कि भारतीय मीडिया को अपनी आलोचना सुनने का धैर्य नहीं है और वह अपने को सुधारों से ऊपर मानता है, बल्कि इसलिए क्योंकि जब प्रधानमंत्री उसे 'सनसनीखेज' बनने से बचने की सलाह देते हैं तो लगे हाथ वे अपनी पार्टी के नेताओं और सरकार के मंत्रियों को जबानी संयम का सबक याद कराना भूल जाते हैं।
अन्ना आंदोलन से लेकर असम हिंसा और कार्टूनों पर लंबे चले विवाद तक कई ऐसे मौके आए जब यह संयम अनजाने नहीं बल्कि जानबूझकर तोड़ा गया। वैसे इस मामले में कांग्रेस पार्टी पर अकेला दोष मढ़ना भी ठीक नहीं होगा क्योंकि आज हम कटुता और असंवेदनशीलता के सामाजिक-राजनीतिक दौर में जी रहे हैं। मीडिया के आईने में जो जैसा है, उसकी वैसी ही छवि दिखती है। यह अलग बात है कि लोग अपनी विद्रूपता को छोड़ दूसरों के दोषों को गिनाने में दिलचस्पी ज्यादा लेते हैं। आलम तो यह है कि संवैधानिक संस्थाएं ही एक-दूसरे की छवि म्लान कर रही हैं।
जहां तक बात है असम समस्या की -जिसका हवाला खासतौर पर प्रधानमंत्री ने दिया है- तो मीडिया में वहां की खबरों को लेकर शुरुआती तथ्यात्मक त्रुटियां जरूर रहीं, पर उसे बगैर और समय गंवाए सुधार भी लिया गया। बल्कि मीडिया को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि उसने इस समस्या की गंभीरता को समझा और इसे राष्ट्रीय चिंता से जोड़ने में बड़ी भूमिका अदा की। रही बात सोशल मीडिया द्वारा फैलाए गए अफवाहों और भ्रामक प्रचारों की तो, यह नाकामी सरकार और उसकी एजेंसियों की रही, जिसे इस बारे में समय से पता ही नहीं चला।
इसके बाद भी प्रधानमंत्री उपदेश का उल्लू अगर सिर्फ मीडिया का नाम लेकर सीधा करना चाहते हैं, उनकी सुनने वाला कोई नहीं। उलटे उनकी ही सोच और विवेक पर दस सवाल और खड़े हो जाएंगे। 

रविवार, 9 सितंबर 2012

सोशल मीडिया को अराजक कहने से पहले

सरकार ने एकाधिक मौकों पर यह चिंता जाहिर की है कि सोशल मीडिया का अराजक इस्तेमाल खतरनाक है और इस पर निश्चित रूप से रोक लगनी चाहिए। हाल में असम हिंसा में अफवाह और भ्रामक सूचना फैलाने के पीछे भी बड़ा हाथ सोशल मीडिया का रहा है, यह बात अब विभिन्न स्तरों पर पड़ताल के बाद सामने आई है। इसी तरह का एक दूसरा मामला है, जिसमें पता चला कि लोग पीएमओ के नाम पर ट्वीटर पर फेक एकाउंट खोलकर लोगों में भ्रम फैला रहे हैं। इससे पहले सरकार ने शीर्षस्थ नेताओं को लेकर आपत्तिजनक गुस्से को लेकर इस तरह की साइट चलाने वाले फर्मों को नोटिस तक थमाया था। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि सोशल मीडिया पर सरकार की नीति और कार्यक्रमों पर टिप्पणी की तल्खी अब बढ़ती जा रही है। इसका फायदा अन्ना आंदोलन को भी मिला। आंदोलन की रणनीति बनाने वालों ने लोगों को सड़क पर उतारने के लिए एसएमएस के अलावा सोशल मीडिया का जबरदस्त इस्तेमाल किया। 
बहरहाल, सरकार एक बार फिर जहां साइट प्रबंधनों को इस बाबत चेताने की सोच रही है, वहीं वह अपने उन तामम विभागों को जो सोशल साइटों का किसी भी रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें ताकीद किया है कि वे इन पर गोपनीय व अपुष्ट तथ्य न डालें। सवाल यह है कि क्या साइबर क्रांति की देन अभिव्यक्ति की इस नई स्वतंत्रता के खतरे क्या आज सचमुच इतने बढ़ गए हैं कि बार-बार उस पर नकेल कसने की बात उठने लगी है।
दरअसल, सोशल मीडिया के स्वरूप और विस्तार को लेकर पिछले कुछ सालों में कई स्तरों पर बहस चल रही है। एक तरफ अरब मुल्कों का अनुभव है, जहां आए बदलाव के 'वसंत' का यह एक तरह से सूत्रधार रहा तो वहीं अमेरिका की इराक, ईरान और अफगानिस्तान को लेकर विवादास्पद नीतियों पर तथ्यपूर्ण तार्किक अभियान पिछले करीब एक दशक से 'न्यू मीडिया' के हस्तक्षेप को रेखांकित कर रहा है। इसके अलावा मानवाधिकार हनन से लेकर पर्यावरण सुरक्षा तक कई मुहिम पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति के इस ई-अवतार के जरिए चलाई जा रही है। ऐसे में यह एकल और अंतिम राय भी नहीं बनाई जा सकती कि सोशल नेटवर्किंग साइटों का महज दुरुपयोग ही हो रहा है।
समाज और सोच की विविधता का अंतर और असर सिनेमा से लेकर साहित्य तक हर जगह दिखता है। यही बात सोशल मीडिया को लेकर भी कही जा सकती है। फिर जिस रूप में भूगोल और सरहद की तमाम सीमाएं लांघकर इसका विकास और विस्तार हो रहा है, उसमें इसके कानूनी दायरे को स्पष्ट रूप से रेखांकित कर पाना भी किसी देश के अकेले बूते की बात नहीं है। कोशिश यह होनी चाहिए की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस बड़े जरिए को लेकर दुनिया के तमाम देश मिलकर एक साथ मिल-बैठकर कोई राय बनाएं। यहां यह भी गौरतलब है कि अभिव्यक्ति की आजादी का मुद्दा आज एक तरफ अत्यंत मुखरता के कारण चर्चा में है तो वहीं जन-अभिव्यक्ति और जनपक्षधरता की अभिव्यक्ति की गर्दन पर फांस चढ़ाने की कोशिश दुनिया की कई लोकप्रिय सरकारें कर रही हैं। ऐसे में नियम-कायदों की कमान थामने वालों को भी अपने चरित्र से कहीं न कहीं यह दिखाना होगा कि अपनी जनता के बीच उतना इकबाल इतना भी कमजोर नहीं कि उसे कुछ क्लिक और कुछ पोस्ट डिगा दें।