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बुधवार, 2 अप्रैल 2014

लोकतांत्रिक मर्यादा को जीत-हार में न बांटें

अब तक के जितने ओपिनियन पोल आए हैं उसमें बिहार में नीतीश कुमार का ग्राफ गिरता दिख रहा है। जदयू के भाजपा से अलग हो जाने के बाद नीतीश और उनके साथियों ने भले जो भी सोचा हो पर अब कहीं न कहीं इस फैसले को लेकर उनकी मुखरता फीकी पड़ी है। अलबत्ता यह चुनाव नतीजे बताएंगे कि बिहार में कौन कितने पानी में है।
बहरहाल, इस सियासी जोड़-तोड़ से बाहर एक बात, जिस पर नीतीश इन दिनों खासा जोर दे रहे हैं। वे कहते हैं, गठबंधन राजनीति के दौर में किसी को यह कहने का हक नहीं है कि उसके पक्ष में हवा बह रही है। यह गठबंधन के दौर में प्रकट हुए समावेशी जनादेश की कहीं न कहीं अवमानना है। इस मुद्दे पर चर्चा महज इसलिए नहीं कि इसे बिहार के मुख्यमंत्री रेखांकित कर रहे हैं बल्कि इसलिए कि यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर वाकई विचार होना चाहिए। यही नहीं, इस विमर्श में राजनीति व समाज के सभी वर्गों-इकाइयों में शरीक होना चाहिए। इस विमर्श से जुड़े दो-तीन प्रमुख प्रस्थानबिंदु हैं या यह कह लें कि सवाल हैं। एक तो यही कि 1989 के बाद से देश में किसी एक दल के बहुमत की सरकार नहीं बनी है।
इसी दौर में कांग्रेस और भाजपा ने अपने को बहुमत के बजाय सबसे बड़े दल होने की एक-दूसरे से होड़ लेने लगे। ऐसे में कोई दल या नेता यह कैसे कह सकता है कि उसके पक्ष में पूरे देश में हवा है। इसी तरह सामाजिक न्याय से शुरू होकर अस्मितावादी राजनीति ने जिस तरह भारत के संघीय ढांचे में राज्य सरकारों की भूमिका नए सिरे से रेखांकित की है, वह काफी महत्वपूर्ण है। दिलचस्प है कि इसी दौरान देश में विकास का उदार चरित्र देखने को मिला। नव-विकास के आंध्र से लेकर गुजरात मॉडल तक इसी दौरान सामने आए। इससे पहले तो चर्चा होती थी बस पंजाब-हरियाणा की हरित क्रांति की या फिर केरल में आए एजुकेशनल रिवोल्यूशन की।
इस तथ्य के बाद कोई यह कैसे आरोप लगा सकता है कि गठबंधन की मजबूरियों या अस्थिरता से देश में विकास पटरी से उतर जाता है। पर आज अगर देश की दोनों पार्टियां जनता को इस बात का खौफ दिखा रही हैं कि त्रिशंकु संसद चुनी गई या उन्हें सबसे ज्यादा सीटें नहीं मिलीं तो देश विकास के रास्ते से दूर हो जाएगा तो यह जनता को गुनराह करना नहीं है तो और क्या है।
भारतीय लोकतंत्र की प्रशस्ति गाने में हम काफी आगे रहते हैं। सबसे बड़ा, सबसे प्राचीन, सबसे सघन और सबसे कारगर अगर हमारा गणतंत्र है तो महज इसलिए नहीं कि इतिहास
के कुछ सुलेख उसके नाम दर्ज हैं बल्कि इसलिए कि बीते तीन दशकों में जब पूरी दुनिया में 'उदारता’ की स्वीकृति ने सबको एक छाते में आने के लिए मजबूर कर दिया, हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में आज भी विकल्प और विरोध की गुंजाइश बची हुई है। यही नहीं, ऐसा करते हुए जनता और सरकार के बीच रिश्तों को बुनने वाले बुनकर और करघे दोनों दक्षता से लगे हैं। विकास के क्षेत्र में सर्व समावेशी के तकाजे को समझने के लिए अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अगर मजबूर होना पड़ा तो भी इसलिए कि देश में वर्ण, जाति और धर्म से शुरू होने वाली विविधता सोच और विचार के स्तर तक पहुंचती है।
यह अलग बात है कि प्रतिविचारों
और प्रतिधारणाओं के बीच सामंजस्य की ताकत का आज भी हम सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। अगर ऐसा होता तो फिर सियासी जमातों में सत्ता के वर्चस्व की ललक नहीं जगती बल्कि विरोध और अस्वीकार को जीवित रखने के लिए भी वे इतने ही संकल्पित दिखाई देते।
समकालीन राजनीति में इस जुमले को बार-बार उछाला जाता है कि राजनीति तो सत्ता को पाने के लिए ही होती है। जबकि यह सरासर गलत है। बात देश की लोकतांत्रिक विरासत की हम पहले कर चुके हैं, इसलिए इस मुद्दे पर कौटिल्य की एक सूत्रोक्ति का स्मरण जरूरी है। कौटिल्य कहते हैं विरोध की पतवार थामने वाले ही अपनी नाव को मनमुताबिक दिशा में मोड़ सकते हैं। चाणक्य ने ऐसा करके भी दिखाया। विरोध की रणनीति से ही चंद्रगुप्त मगध की सत्ता तक पहुंचा। यही नहीं, इस रणनीति में 'विरोधों का सामंजस्य’ किस तरह समर्थन की 'एकाधिकारवादी सत्ता’ के दंभ से टकराती है, उसे चकनाचूर करती है, इन बातों की गवाही इतिहास देता है।
इसी तरह संख्याबल को सत्ता का
औजार मानना लोकतंत्र की एक स्थिति में तो सही है पर इससे लोकतांत्रिक अवधारणा की दरकार को नहीं समझा जा सकता है। थोड़ा और पीछे लौटें तो महाभारत के कुछ सबक सामने आएंगे। एक पक्ष जिसके पास सामथ्र्य और सत्ता दोनों थी, वह सत्य के आग्रह
के सामने घुटने टेकता है। गांधीवादी मुहावरे
में कहें तो सत्य के लिए जरूरी नहीं कि वह सत्ता के शिविर में ही वास करे बल्कि सत्य तो वहां टिकता है जहां नीयत और इरादे कल्याणकारी होते हैं।
अब सोलहवीं लोकसभा के लिए प्रथम चरण का मतदान शुरू होगा। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस दौरान तमाम छोटे-बड़े मुद्दों को जनता के सामने रखा है। इस दौरान वादे-इरादे और नीयत की भी बात कही गई है। पर इस सबके बीच यह बात खटकती है कि विरोध और अस्वीकार के जोखिम के साथ कोई नहीं बढ़ना चाहता। सबने सत्ता का बीजमंत्र ही जपा है। ऐसे में यह जनता के विवेक पर है कि वे अपनी परंपरा और संस्कार से आए लोकतांत्रिक सबकों को कैसे अपने निर्णय में बदलती है। जाहिर है, गठबंधन के दौर की राजनीति की या तो एक और गांठ जनता इस बार खोलेगी या फिर वह देश की सियासी जमातों को कुछ अलग तरीके से आईना दिखाएगी। इस लिहाज से जब सोलहवीं लोकसभा बैठेगी तो उसका कंपोजिशन देखना होगा और तब समझ में यह बात आएगी कि
इस चुनाव से देश में लोकतंत्र की जड़ें पहले से और मजबूत हुई हैं या कमजोर।
आखिर में एक बात और यह कि सूचना क्रांति के प्रतापी दौर में लोकतंत्र का चुनावी भाष्य करने वाले पंडित आपको आज हर जगह बैठे मिल जाएंगे, टीवी चैनलों से अखबारों तक। पर इनमें से बहुत कम ऐसे हैं जो बहुमत-अल्पमत, पक्ष-विपक्ष और वोट शेयर से आगे की बात करते हैं। लोकतंत्र के महायज्ञ में जनता जिन संस्कारों की समिधा लेकर उतरती है, उसे ज्यादा धुली और आग्रहहीन आंखों से देखे जाने की जरूरत है।
जीत और हार के बीच एक तीसरी
रेखा भी जनता हर चुनाव में खींचती है, जिससे पक्ष और विपक्ष दोनों को एक ही अनुशासन में बांधा जा सके। कहने की जरूरत नहीं कि यह अनुशासन व्यापक जनहित का है, लोककल्याण का है।
 

मंगलवार, 25 मार्च 2014

कहां खो गए समर्थन और विरोध के तकाजे


भारतीय गणतंत्र के जब पचास साल पूरे हुए थे तो देशभर में इसको लेकर कई कार्यक्रम हुए थे। ऐसे मौकों को एक पवित्रवादी आग्रह के साथ मनाने की भारतीय परंपरा काफी पुरानी है। गांधी जयंती से लेकर हिंदी दिवस तक ऐसे कई उदाहरण हैं। अलबत्ता ये उदारहरण अपने प्रदेयों और उपोयिगता को लेकर कितने बहुमूल्य हैं, यह भी हम जानते हैं। गणतंत्र के स्वर्णिम सर्ग में दर्ज होने के लिए संसद भी अलग से बैठी। तत्कालीन सांसदों ने लंबी-लंबी तकरीरें कीं। कुछ ने नए संकल्प लिए तो कुछ ने पुराने सबक दोहाराए।
यह अलग बात है कि माननीयों को न तो सबक भूलने में देर लगी और न संकल्प। उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर भारतबाला प्रोडक्शन ने एक छोटा सा एडनुमा कार्यक्रम बनाया था, बमुश्किल 3० सेकेंड का। इसमें टीवी स्क्रीन पर एक-एक शब्द करके एक वाक्य उभरता है- चलो हम इस बात पर सहमत हैं कि हम एक दूसरे से असहमत हैं। इसके थोड़े अंतराल के बाद दूसरा वाक्य- असहमति पर सहमति लोकतंत्र की नींव है। अब जबकि 16वीं लोकसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है तो इन दो पुराने उल्लेखों से कुछ बातें नए सिरे से समझी जा सकती हैं।
हिंदी साहित्य के प्रखर आलोचक और इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल कविता में विरोधों के सामंजस्य की बात करते थे। कविता संवेदनाओं का लोकतंत्र है। इसलिए विरोधों के सामंजस्य की दरकार को एक लोकतांत्रिक दरकार ठहराया जा सकता है। पक्ष और विपक्ष के बीच तटस्थ जैसी स्थिति को न तो महाभारत में कृष्ण ने स्वीकार किया और न ही आधुनिक लोकतंत्र में इस स्टैंड को राइट एप्रोच माना
गया। अलबत्ता देश में अस्मितावादी राजनीति के दौर-दौरे के बीच विरोध से ज्यादा अंतर्विरोध की राजनीतिक ध्वनियों ने लोकतांत्रिक स्पेस को भरा।
बहरहाल, लोकसभा चुनावों में उतरने की पार्टियों और उनके नेताओं की तैयारियों को देखें तो कुछ बातें अभी से साफ हो गई हैं। भले लोकतंत्र के सुलेखवादी विमर्श में हम लाख बातें कहें-समझें पर सत्ता की राजनीति ने समर्थन और विरोध के बीच की लक्ष्मणरेखा को कब का अमान्य कर दिया है। यह सब हो रहा है जीत और सत्तारोहण के गणित के नाम पर। बाजार ने हमें बीते दो दशकों में सिखाया कि जेब में जिसके पैसा है, उसके लिए ही दुनिया है और अब राजनीति हमें सीखा रही है कि जो जीते वही सिकंदर। यानी विरोध का मतलब
अगर हार है तो ऐसा विरोध त्याज्य है। इसी
तरह समर्थन का अर्थ सत्ता नहीं तो फिर ऐसे समर्थन की दरकार और सरोकार दोनों ही बेमानी हैं।
दिल्ली की एक लोकसभा सीट से इस बार आम आदमी पार्टी की तरफ से राजमोहन गांधी चुनाव लड़ रहे हैं। वे काफी विनम्र और विज्ञजन हैं। पर राजनीति तो शुरू ही मजबूरी से होती है। आम आदमी पार्टी में शामिल होने से पहले उनका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक बयान आया था। तब मोदी को भाजपा ने अपना पीएम कैंडिडेट नहीं बनाया था। राजमोहन ने मोदी का बहुत नामोल्लेख तो नहीं किया पर दुनिया की सबसे ऊंची सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा बनाने के उनके अभियान पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस अभियान से एक वर्टिकल होड़ शुरू होगी अपने-अपने नेताओं और प्रतीक पुरुषों की भव्य प्रतिमा स्थापित करने की।
कुल मिलाकर सम्मान के नाम पर शुरू होने वाली इस प्रतियोगिता में क्षेत्र और समुदायों के बीच एक ऐसी हिंसक भिड़ंत होगी जो देश और समाज के लिए सर्वथा अनिष्टकारी होगी। राजमोहन के इस बयान की सराहना में भले बहुत हाथ तब नहीं उठे पर उनके विरोध में भी शायद ही कोई बयान आया। पर अब राजमोहन आप के नेता हैं। एक-दो महीने तक उनके विचारों का चरित्र जितना मुक्त था, अब शायद नहीं। तभी तो आप को लेकर और उसके नेता अरविंद केजरीवाल के उतावलेपन को लेकर वह कोई सीधी टिप्पणी करने से बचते हैं यानी उन्होंने जानबूझकर एक चुप्पी ओढ़ रखी है। यानी राजमोहन भी समझते हैं कि अभी जनता से वोट लेने की बारी है। सो अभी नापतौल कर बोलना होगा। समर्थन और विरोध की मुद्रा एकदम से तटस्थ हो गई है।
यह हमारे गणतंत्र का एक ऐसा विरोधाभासी सच है जो गणतंत्र के लिए समर्थन और विरोध की जरूरी दरकार को ही खारिज करते हैं। राजमोहन गांधी का नाम इसलिए नहीं कि वे इसके कोई बहुत बड़े कसूरवार हैं बल्कि इसलिए कि उनके जैसा समझदार और चारित्रिक सुदृढ़ता वाला व्यक्ति भी भारतीय गणतंत्र के इस अंतरविरोध को चुनौती
देने में संकोच करता है। उन्हें छोड़ दें फिर तो राहुल गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक और दिग्विजय सिंह से लेकर जगदंबिका पाल तक, सभी समर्थन और विरोध के अपने एजेंडे को जब जैसे चाहें बदल देते हैं, रद्द कर देते हैं। सामान्य समझ में यही तो है मौकापरस्ती की राजनीति।
इस बार के चुनावों को लेकर कहा जा रहा था कि ये देश में कुछ मुद्दों को लेकर राजनीतिक जमीन को इतनी ठोस कर देंगे कि अगले कुछ दशकों की देश की राजनीति इसी जमीन पर होगी। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार को माना जा रहा था। जनता से राजनीतिक विमर्श करने वाले सभी लोग इस बात को अपने-अपने तरीके से मान रहे थे। यहां तक कि हाल तक के ओपिनियन पोल में भी भ्रष्टाचार को बड़ा चुनावी मुद्दा माना गया।
पर अगर दलों के टिकट वितरण के आधारों को देखें या फिर दल छोड़ने व नए दल
में शामिल होने के कारणों को देखें तो कम से कम भ्रष्टाचार कहीं से कोई मुद्दा नहीं है। इसी के साथ भ्रष्टाचार के समर्थन और विरोध को लेकर अंतिम रूप से लकीर खींचने की संभावना भी क्षीण हो गई, जिसे लेकर काफी उम्मीदें थीं।
अब ऐसी स्थिति में चुनावी राजनीति से इतर मौकों पर राजनेताओं की उन तकरीरों का क्या, जिसमें देश की लोकतांत्रिक महानता को बनाए और बचाए रखने के लिए खूब सारी बातें होती हैं, शपथें होती हैं। इसी तरह लोकतंत्र की अवधारणा को साफ करने वाली उन बुनियादी बातों का भी क्या जिसमें समर्थन और विरोध के बीच दुराव के बजाय समन्वय की तो बात होती है पर किसी मुद्दे को लेकर तटस्थतावादी घालमेल की कोई गुंजाइश नहीं। मुद्दा भ्रष्टाचार का हो, महंगाई का हो, चुनाव सुधार का हो या फिर विकास का, नहीं लगता कि जनता इस चुनाव में यह निर्णय ले पाएगी कि वह किस मुद्दे पर किसके साथ जाए और किसके विरोध में। जनता की यह मुश्किल ही आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसी स्थिति में इस बार के चुनावों में तारीख के हर्फ कितने बदलेंगे, कहना मुश्किल नहीं।
 

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

इंदिरा के खिलाफ जीत का 'राज’


1977 के चुनाव में केंद्र की राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व को जनता ने करारा जवाब दिया था। जेपी आंदोलन से निकली जनता पार्टी की पूरे उत्तर और मध्य भारत में एक तरह से लहर थी।
इस लहर में कांग्रेसी राजनीति के कई सूरमाओं को संसद का मुंह नहीं देखने दिया। पर इंदिरा गांधी की हार ने सबको चौंकाया। इमरजेंसी को लेकर इंदिरा के खिलाफ एक दृढ़ जनभावना जरूर थी, पर वह चुनाव तक हार जाएंगी, इसकी उम्मीद उनके विरोधियों को भी नहीं थी। इंदिरा को जानेमाने समाजवादी नेता राजनारायण ने चुनावी शिकस्त दी और वह भी उनके गढ़ रायबरेली में।
दरअसल, इंदिरा और कांग्रेस के खिलाफ अपने घोषित सैद्धांतिक विरोध के कारण राजनारायण 1971 में भी रायबरेली से इंदिरा के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे थे। पर उन्हें पटखनी खानी पड़ी थी। इस पराजय के चार साल बाद राजनारायण ने चुनाव परिणाम के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सबूतों को गंभीर और पर्याप्त मानते हुए इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया। उनकी सांसदी को तो अवैध करार दिया ही गया, छह सालों के लिए उनके चुनाव लड़ने पर बैन भी लगा दिया गया।
इंदिरा को इस फैसले ने गुस्से से भर दिया और उन्होंने इस्तीफा देने से मना कर दिया। इस दौरान वह जेपी आंदोलन के कारण पहले से परेशान चल रही थीं। इन्हीं परेशानियों के बीच इंदिरा ने 26 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी।
जनवरी 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने आपातकाल समाप्त कर लोकसभा चुनाव की घोषणा की। राजनारायण फिर से रायबरेली में उन्हें चुनौती देने के लिए मैदान में उतरे।
इस चुनाव में समाजवादी राजनारायण ने जीत दर्ज कराकर दिखा दिया कि लोकतंत्र में किसी का भी विरोध असंभव नहीं है और जनता की अदालत में अन्याय हमेशा हारता है। भारतीय लोकतंत्र की यही खासियत उसकी असली ताकत है।
 

बुधवार, 19 मार्च 2014

बेल्लारी की चुनावी सुषमा


बेल्लारी लोकसभा सीट 13वीं लोकसभा चुनावों के दौरान अचानक काफी चर्चा में आ गई और पूरे देश की निगाहें यहां के चुनावी नतीजे पर आकर ठहर गईं। दरअसल, यहां से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चुनाव लड़ने का एलान किया और उनके इस फैसले को भाजपा ने चुनौती देने की ठान ली। दिलचस्प है कि यह सोनिया का पहला चुनाव था। इस चुनाव में भाजपा ने अपनी तेज-तर्रार नेता सुषमा स्वराज को सोनिया के खिलाफ उतारने का फैसला किया। देखते-देखते यह मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन गया। भाजपा इस चुनाव को रणनीतिक तौर पर देख रही थी। क्योंकि अगर सोनिया वहां से चुनाव हार जातीं तो उनका पॉलिटिकल करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता। इसके उलट सुषमा इसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी लोकप्रियता के बड़े मौके के रूप में देख रही थीं। सोनिया को हराने के लिए जनता दल और कुछ दूसरे दलों ने भी सुषमा का साथ दिया।
भाजपा ने इस चुनाव में स्वदेशी बनाम विदेशी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। बेल्लारी के वोटरों को यह बात रेखांकित करके बताई गई कि इंदिरा गांधी की बहू और राजीव गांधी की पत्नी इटली की रहने वाली हैं। भाजपा को सोनिया के विदेशी होने का मुद्दा सूट कर रहा था और वह इसी मुद्दे पर सोनिया को घेर रही थी।
1952 से यहां महज दो बार कांग्रेस हारी थी। यही देखते हुए सोनिया को बेल्लारी एक सुरक्षित सीट लगी और वह यहां से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गईं। बहरहाल, सुषमा इस चुनाव में सोनिया से हार गईं। अलबत्ता उन्होंने यहां मुकाबले को जरूर दिलचस्प स्थिति में ला दिया था। उन्होंने सोनिया को घेरने के लिए बेल्लारी के गांवों-कस्बों की खूब खाक छानी। यहां तक कि उन्होंने कन्नड़ भी थोड़ी-बहुत इस दौरान सीख ली।
इसके जवाब में राहुल गांधी और खासतौर पर प्रियंका गांधी ने सोनिया के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी। एक बात और यह कि सोनिया बेल्लारी के अलावा उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से भी चुनाव मैदान में उतरी थीं। उन्हें दोनों जगह से जीत मिली। हालांकि बाद में उन्होंने बेल्लारी की सीट से इस्तीफा दे दिया था।
 

लोकतंत्र में बिहार पहले से विशेष राज्य


सरदार वल्लभ भाई पटेल जब देसी रियासतों का विलय भारत राज्य में कराने में लगे थे तो उन दिनों वह एक महत्वपूर्ण बात अकसर कहा करते थे। वह कहते थे कि देश के विभिन्न प्रांतों-क्षेत्रों, वर्गों-भाषा-भाषियों को भारत राज्य से जोड़ना इसलिए जरूरी है कि इससे ही भारतीयता की शिनाख्त पूरी होगी। ऐसा कहते हुए वे भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की इस विलक्षणता को रेखांकित करना नहीं भूलते थे कि देश अगर स्वतंत्र है तो इसलिए कि इसमें सभी मजहब और सूबों के लोगों ने शिरकत की है, कुर्बानियां दी हैं। इन सबका जुड़ाव जैसा संघर्ष के दिनों में था, वैसा ही बाद में भी दिखना चाहिए। एकजुटता की यह ताकत ही भारत
की ताकत है।
अभी देश में सोलहवीं लोकसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। दिलचस्प है कि चुनावी चर्चाओं के बीच सरदार का नाम भी लिया जा रहा है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने तो गुजरात में उनकी दुनिया की सबसे भव्य प्रतिमा बनाने की मुहिम ही छेड़ रखी है। यह अलग बात है कि उनकी इस मुहिम के सियासी निहितार्थ निकालने वाले भी कम नहीं हैं। हाल में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुजरात पहुंचे तो उन्होंने सरदार और मोदी के विरोधाभासों को रेखांकित करने की कोशिश की। यह अलग बात है कि ऐसा करते हुए वह मौजूदा कांग्रेस पार्टी और उसके स्वर्णिम इतिहास के बीच बढ़ते विरोधाभास पर कुछ नहीं बोले।
दरअसल, आज जिन दलीलों और हवालों से चुनावी मैदान मारने में पार्टियां और उनके नेता लगे हैं, उनमें वैसे तत्वों का खासतौर पर अभाव है जो भारतीय गणतंत्र की तारीखी खासियत रही है। विकास, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता का मुद्दा मजबूत जरूर है पर इससे भी मजबूत भारतीय समाज की लोकतांत्रिक आस्था है।
इस आस्था के साथ आज किस कदर खिलवाड़ हो रहा है, इसे आप यों समझ सकते हैं- बिहार में लोकसभा की 4० सीटें हैं और वहां सबसे बड़ा मुद्दा विशेष राज्य का दर्जा है। एकजुट होकर भले न सही पर तकरीबन पार्टियां वहां इस मुद्दे का समर्थन कर रही हैं। फर्क बस यही है कि वे इस मुद्दे पर संघर्ष
का श्रेय बांटना नहीं चाहतीं। यह इस मुद्दे को लेकर बरती जाने वाली एक ऐसी सियासी बेईमानी है, जिसे जनता भी जरूर समझ
रही होगी।
ऐसा इसलिए भी कि पार्टियां अपने बीच की दूरियां जाहिर करने के लिए अत्यंत अगंभीर नाटकीय तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं। मसलन, केंद्र से विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर जब जदयू ने बिहार बंद का कॉल दिया तो उससे एक दिन पहले भाजपा ने रेल रोको आंदोलन की तिथि तय कर मुद्दे को हथियाने की कोशिश की। इससे पहले दिल्ली में जब इसी मुद्दे पर जदयू ने दिल्ली में रैली की तो उसमें भाजपा को साथ नहीं लिया, जबकि तब सरकार में वह उसके साथ थी। बात बिहार की निकली है तो यहां एक बात का जिक्र जरूरी है। जब से बिहार को लोगों को परप्रांतीय विरोध के नाम पर दिल्ली से लेकर मुंबई तक गालियां-लाठियां खानी पड़ रही हैं, तब से बिहार अस्मिता का सवाल एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा हो गया है। इसके पीछे कहीं न कहीं वोटबैंक की राजनीति भी है। बिहार में लोकसभा की 4० सीटें हैं। यूपी में सीटों की संख्या 8० है। दोनों सूबों की सीटों की गिनती मिला दें तो यह केंद्रीय सत्ता की दावेदारी को मजबूत करने वाली स्थिति है किसी भी पार्टी के लिए। आज अगर वाराणसी से नरेंद्र मोदी को भाजपा चुनावी मैदान में उतार रही है तो उसके पीछे सीधा गणित यही है कि यूपी और बिहार की 12० सीटों पर इसका सकारात्मक असर भाजपा को फायदा पहुंचाएगा।
पर इस फायदे-नुकसान में बिहारी अस्मिता का सवाल कहीं पीछे छूटता मालूम पड़ता है। चुनावी मैदान में भाजपा को इस सवाल का जवाब देना पड़ सकता है कि बिहारियों को मारने-पीटने और खदेड़ने वाले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से उसकी बढ़ी नजदीकी का क्या मतलब है? क्या यह अपने सूबे से बाहर काम-धंधा करने वाले बिहारियों के जख्म पर नमक छिड़कने जैसा नहीं है। और अगर ऐसा है तो फिर भाजपा को बिहारी अस्मिता से खिलवाड़ का कसूरवार क्यों न ठहराया जाए।
गौरतलब है कि यह राजनीतिक दुर्दशा उस राज्य की है, जिसकी देश के लोकतांत्रिक इतिहास में भूमिका खासी उल्लेखनीय रही है। अशोक मेहता, मीनू मसानी, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीस और शरद यादव में से कोई बिहारी नहीं हैं। पर बिहार की जनता ने देश की समाजवादी आंदोलन के इन दिग्गजों को संसद तक पहुंचाया।
यह इस राज्य की राजनीतिक या लोकतांत्रिक समझ की एक ऐसी मिसाल है जो आज इस सूबे की पहचान से जुड़े कई पूर्वाग्रहों को न सिर्फ खंडित करते हैं बल्कि एक नई बोधदृष्टि से उसे देखने की दरकार पेश करती है। इस लिहाज से देखें तो बिहार देश के लोकतांत्रिक नक्शे पर पहले से विशेष राज्य है। यह अलग बात है कि विशेषता की यह चमक अकेले बिहार के साथ नहीं है। बल्कि बिहार उसी तरह विशेष है जैसे गुजरात विशेष है, महाराष्ट्र विशेष है या फिर ओडिशा, तमिलनाडु या आंध्र विशेष है। इन बातों को तार्किक रूप से समझने में अगर कोई कठिनाई हो तो एक बार फिर से सरदार की बातों का स्मरण करें।
देश में फिर से चुनावी उत्सव चल रहा है। ऐसे में दल और नेता एक-दूसरे के खिलाफ भले ही हमलावर बोल बोलें, लेकिन उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों की ऐतिहासकिता को भी एक सातत्य प्रदान करने का दायित्व निभाना चाहिए, जिससे देश के लोकतंत्र के मंदिर में हर क्षेत्र का कम से कम एक दीपक तो जरूर जले।
साठ साल से भी लंबा देश का लोकतांत्रिक सफरनामा महज धिक्कार से भरने के लिए नहीं है बल्कि इसमें गौरव और यश के भी तमाम अनुभव शामिल हैं।
इन अनुभवों का सिलसिले को अगर हम जारी रखने में यकीन नहीं रखते तो इसका मतलब यही है कि न तो हमें अपने लोकतंत्र को लेकर न तो कोई फL है और न ही इसकी क्षमता को लेकर कोई भरोसा। अविश्वास का यह भाव खतरनाक है।
सत्ता की राजनीति के लिए दावों-प्रतिदावों, आरोपों-प्रत्यारोपों और वादों-इरादों से आगे कुछ सकारात्मकता की भी बात जरूर होनी चाहिए। यह देश के जागरूक मतदाताओं के लिए भी एक सम्मान की बात होगी क्योंकि इससे उसके दायित्वपूर्ण विवेक को तो मान मिलेगा ही, ऐसे ही जवाबदेह तरीके से लोकतांत्रिक दायित्व के पालन के लिए प्रोत्साहन भी मिलेगा। क्या इस सामयिक दरकार को देश की सियासी जमातें समझेंगी?
 

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

संभावित बदलाव के साथ नई राजनीति का दौर

इस बार के लोकसभा चुनाव में फैसला महज इस बात का नहीं होगा कि दिल्ली में सरकार कौन बनाएगा, बल्कि यह चुनाव देश की राजनीति को भी नए निकष पर कसने जा रहा है। यह इस लिहाज से जरूरी भी है कि बीते कुछ दशकों में जनता को राजनीतिक विचारधारा और उसके प्रति दिखाई जाने वाली प्रतिबद्धता के नाम पर खतरनाक तरीके से बहलाया-भड़काया और बांटा जाता रहा है।
दरअसल, देश की राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व के खिलाफ आई गैरकांग्रेसवाद की डॉ. राममनोहर लोहिया की अवधारणा के बाद जिस तरह सेक्यूलर और अस्मितावादी राजनीति ने अपना रकबा बढ़ाया, उसने भारतीय राजनीति के अखिल चरित्र को क्षेत्र, जाति और वर्ग के खांचों में पूरी तरह बांटकर रख दिया। सोशल इंजीनियरिंग की सामयिकता और दरकार की वकालत करने वालों की नजर में लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक अन्याय के खिलाफ यह एक जरूरी राजनीतिक कार्रवाई है। पर यह कार्रवाई कई तरह की प्रतिक्रियावादी अनीतियों-कुतर्कों की जिस तरह शिकार हुई, वह काफी चिंताजनक है।
चिंता की इस जमीन को समझने के लिए खासतौर पर बीते दो दशकों में उत्तर प्रदेश में बसपा की राजनीति को देखा जा सकता है। दलित या बहुजन समाज की बात करने वाली पार्टी की नेता मायावती ने नई सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर ब्राह्मणों-क्षत्रियों सबके मंच पर गईं और अपने लिए वोट का जुगाड़ किया। बात बनी तो सनक इस तरह सवार हुई की बहनजी सरकार में आने पर सूबे में कई जगहों पर करोड़ों रुपयों की लागत से अपनी मूर्तियां लगवाने लगीं। इसी तरह की राजनीति अपनी-अपनी सुविधा से बिहार में लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान करते रहे हैं। थोड़े किंतु-परंतु के साथ इस सूची में आप चाहें तो नीतीश कुमार को भी गिन सकते हैं।
अब जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव के दिन करीब आते जा रहे हैं अस्मितावाद के नाम पर क्षेत्रवाद की राजनीति करने वालों के पांव के नीचे से जमीन खिसकती जा रही है। इस स्थिति को और समझने के लिए आपको मायावती के पिछले दिनों आए उस बयान पर गौर करना होगा, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए सांप्रदायिकता विरोधी ताकतों की एकजुटता की बात की थी। बहनजी ने कितने दफे भाजपा के साथ आकर यूपी में सत्ता सुख भोगा है, यह कोई ज्यादा पुराना इतिहास नहीं है। अब जब उन्हें लग रहा है कि एक व्यक्ति गुजरात से निकलकर पूरे देश में विकास और देश के नवनिर्माण की बात कर रहा है तो उन्हेंयह खौफ खाए जा रहा है कि कहीं यह लोकप्रियता उनकी सियासी जमीन को ही न हड़प ले।
बात यूपी की निकली है तो राजनीति के पुराने पहलवान मुलायम सिंह यादव का भी जिक्र जरूरी है। अपनी सेक्यूलर छवि के लिए मुस्लिम तुष्टि की हर हद को छूने वाले नेताजी को इन दिनों सबसे ज्यादा आक्रोश इसी बिरादरी से देखने को मिल रहा है। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद 'मुल्ला मुलायम’ का सियासी तिलिस्म किस कदर दरका है, इसकी मिसाल है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जाने का दौरा नेताजी को रद्द करना पड़ा। वहां के छात्र उनके विरोध में सड़कों पर उतर आए थे। छात्रों का आक्रोश मुजफ्फरनगर दंगे को लेकर सपा सरकार के अगंभीर रवैए को लेकर था। दिलचस्प है कि यह वही विश्वविद्यालय है, जहां एक जमाने में मुसलमानों के सबसे बड़े रहनुमा के तौर पर मुलायम की आवभगत होती थी। इस सबसे घबड़ाए नेताजी सांप्रदायिकता का खौफ दिखाकर भरसक कोशिश कर रहे हैं कि मुसलमानों का साथ उन्हें फिर से मिल जाए। तीसरे मोर्चे का तंबू एक बार फिर तानकर वे आखिरी सियासी दांव चल रहे हैं। पर शायद अब बहुत देर हो गई है।
नया ताजा पॉलिटकल ड्रामा बिहार में खेला जा रहा है। उत्तर प्रदेश में दलित नेता उदित राज के भाजपा में शामिल होने के साथ ही खबर आई कि दलित राजनीति के पुराने सूरमा रामविलास पासवान भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ सकते हैं। इन दोनों खबरों ने हिंदी पट्टी में बीते कम से कम से कम दो दशकों से चली आ रही दलित राजनीति के अस्मितावादी तकाजे को एक तरह से अप्रासंगिक ठहरा दिया।
दिलचस्प तो यह रहा कि इस बड़े सियासी उलटफेर के साथ खबर यह भी आई कि बिहार में लालू यादव की राजनीति का लालटेन अचानक बुझने लगा है। एक जमाने में बैलेट बॉक्स से 'जिन्न’ निकालने का दावा करने वाले लालू प्रसाद यादव को अपनी ही पार्टी में
विरोध की आग को ठंडा करने में पसीना बहाना पड़ रहा है।
इन तमाम सियासी घटनाक्रमों को एक सीध में रखकर देखें तो कुछ बातों के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। पहला संकेत तो यही है कि गठबंधन राजनीति के दौर में क्षेत्रीय राजनीति की जो गुंजाइश बढ़ गई थी, वह अब सिमटती जा रही है। न सिर्फ यूपीए और एनडीए बल्कि अब देश की नई राजनीति कांग्रेस और भाजपा के दो ध्रुवों में बंटती नजर आ रही है। भारत की बहुलतावादी एकता के सूत्रों को समझने वालों की नजर में यह एक पॉजिटव पॉलिटकल डेवलपमेंट है।
इससे आगे की बात करें तो पूरे देश में नमो को लेकर आकर्षण है। इस स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पहले जो बात कांग्रेस के कुछ नेता अलग-अलग कह रहे थे, वह बात अब अरविंद केजरीवाल तक कह रहे हैं कि मोदी की कहीं न कहीं लहर तो जरूर है। हालांकि इसे समझने के लिए ग्राउंड रिपोट्र्स का ही भरोसा ज्यादा करना चाहिए क्योंकि ओपिनियन पोल्स पर नए स्टिंग ने इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठा दिए हैं।
अगर यह स्थिति वाकई है तो इसके चुनावी फलित को इस रूप में देखा जा सकता है कि इस बार मोदी की छतरी के नीचे कई ऐसे दल और नेता आ सकते हैं, जो अब तक दलित-पिछड़ा या सेक्यूलरवाद की आड़ में अपनी राजनीति खेलते रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो वाकई देश की राजनीति को देखने-समझने का पिछले दो-तीन दशकों का नजरिया बदल जाएगा। नए नजरिए में न तो कथित अस्मितावादी तकाजों के लिए कोई जगह होगी और न ही छद्म सेक्यूलरवाद के लिए कोई गुंजाइश।
यह नया बदलाव देश में राजनीति के तर्क को जहां और ठोस करेगा, वहीं पक्ष या विरोध की राजनीति के लिए स्टैंड लेने वालों को ज्यादा गंभीर लोकतांत्रिक विवेक दिखलाना होगा। अपने साढ़े छह दशक से भी लंबे सफरनामे के बाद अगर भारतीय राजनीति इस मुकाम तक पहुंची है, तो यह सचमुच काफी सुखद है। कह यह भी सकते हैं कि इस संभावित बदलाव के साथ देश में 21वीं सदी की नई राजनीति का दौर शुरू होगा।
 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

कुछ सबक तो लें माननीय

पंद्रहवीं लोकसभा देश के संसदीय लोकतंत्र को लेकर उठने वाले कई सामयिक सवालों और एतराजों की साक्षी रही। लोकसभा सत्र के आखिरी दिन सांसद भावुकता में भले एक-दूसरे के प्रति अपने शिकवे-शिकायतों को दूर कर सौहार्द बढ़ाते दिखे, पर इस बात से कौन इनकार करेगा कि इस लोकसभा का कार्यकाल सदन के अंदर और बाहर सर्वाधिक सवालों के घेरे में रहा। काम के घंटे और पास होने वाले बिलों का लेखा-जोखा अगर छोड़ भी दें तो बीते पांच सालों में सदन के आचरण और उसकी प्राथमिकताओं पर लगातार सवाल उठाए गए। एक तरफ इसे 'दागियों का सदन’ कहा गया तो वहीं दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने की उसकी प्रतिबद्धता को कठघरे में खड़ा किया गया।
भूले नहीं हैं लोग साल 2०11 के उस ऐतिहासिक घटनाक्रम को जब जनलोकपाल बिल को पास कराने को लेकर समाजसेवी अण्णा हजारे दिल्ली के रामलीला मैदान पर अनशन पर बैठे थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उन्हें सदन के अंदर यह कहते हुए सैल्यूट कर रहे थे कि संसद भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक पहल के लिए तैयार है, प्रतिबद्ध है।
लोकसभा के अंतिम सत्र की समाप्ति पर प्रधानमंत्री जब अपनी सरकार की कामयाबी गिना रहे थे तो वे यह कहना भूल गए कि इस देश में लोकशाही इसलिए मजबूत नहीं है कि यह सदन उसके लिए प्रतिबद्ध है बल्कि इस देश की जनता की लोकतांत्रिक आस्था इतनी मजबूत है कि वह विचलन की स्थिति में संसदीय गणतंत्र को भी राह दिखाती है।
15वीं लोकसभा के कार्यकाल को लेकर ये कुछ बातें इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि इससे यह साफ होता है कि इसके कार्यकाल में सरकारी भ्रष्टाचार के कई बड़े मामले खुले और इसकी आंच मंत्रियों से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक पर पहुंची। यही नहीं, इस दौरान कई मामलों की जांच में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई, उसकी कर्तव्यहीनता को शर्मनाक करार दिया।
क्या दाग अच्छे हैं

लोकसभा की कार्यवाही के आखिरी दिन का मंजर देखकर यह नहीं लग रहा था कि यह सदन अपने अमर्यादित आचरण और लोकहित के प्रति अपनी लापरवाही के लिए कहीं से शर्मसार है। सौहार्द के बोल सरकार की तरफ से तो बोले ही गए, विपक्ष ने भी सरकार की विफलता पर हलकी चुटकी लेने से ज्यादा तल्खी दिखाने को तैयार नहीं दिखी।
कई सांसदों ने आत्मावलोकन की बात जरूर की पर इसमें ये बात कहीं से रेखांकित नहीं हुई कि इस लोकसभा के 543 में से 162 यानी तकरीबन 3० फीसदी सांसदों का रिकॉर्ड दागदार है। यही नहीं, जब आपराधिक रिकॉर्ड वाले ऐसे लोगों के चुनाव लड़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए तो इसके खिलाफ बिल लाने की मांग उठी। इस पहल के लिए सबसे पहले सरकार ललक से भरी। फिर विपक्ष भी कहीं न कहीं सरकार के साथ खड़ा दिखा।
वैसे इस बिल को संसद की हरी झंडी नहीं मिली और जब आनन-फानन में सरकार इस पर अध्यादेश लाने को तैयार हुई तो जनता के मूड को भांपते हुए विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। बाद में नाटकीय तरीके से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस अध्यादेश को रद्दी की टोकड़ी में फेंकने की बात कही और सरकार को अपने ही घोषित एजेंडे से यू-टर्न लेना पड़ा।
यह सब देखकर इस लोकसभा के आचरण और संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को बहाल रखने की उसकी प्रतिबद्धता को लेकर अंतिम राय क्या बनेगी, कहने की जरूरत नहीं।
तेलंगाना पर हंगामा

15वीं लोकसभा ने सबसे अशोभनीय आचरण तब दिखाया जब तेलंगाना बिल सदन में आया। सरकार के मंत्री तक वेल में हंगामा मचाते दिखे। हद तो तब हो गई जब माइक तोड़ने से लेकर मिर्ची स्प्रे करकेसदन की कार्यवाही रोकी गई। बाद में जब यह बिल पास भी हुआ तो इस अफरा-तफरी के बीच कि सरकार और विपक्ष दोनों ने अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए । दिलचस्प है कि इस दौरान सदन में क्या चल रहा था लोग लोकसभा चैनल पर देखना चाह रहे थे पर अचानक ब्लैक आउट करके पूरे देश को अंधेरे में रखा गया। यह अंधेरा इतिहास के पन्नों पर भी इस लोकसभा का पीछा शायद ही छोड़े।