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Wednesday, July 7, 2010

देह राजनीति पर प्रकाश


"राजनीति' के कथानाक का पूरा ताना-बाना जिस तरह बुना गया है, उसमें महिला को इस्तेमाल होने का सच तो जरूर दिखाया गया है, पर उसे इस्तेमाल करने वाले पुरुषों को लेकर खटकने वाली खामोशी बरती गई है
जागरूक भारतीय जनमानस के लिए राजनीति एक प्रिय विषय रहा है। जिसे पूरबिया बेल्ट या गोबर पट्टी कहते हैं तो वहां तो जागरूकता का आलम यह है कि अब भी लोग विभिन्न राजनतिक मुद्दों पर चौपालों से लेकर चाय-पान की दुकानों तक घंटों बहस करते हैं। इन दिनों प्रकाश झा की "राजनीति' की भी चर्चा भी खूब है। चर्चा का एक स्तर तो उस खेल को लेकर है जिसमें मीडिया में 24-48 घंटे में किसी फिल्म की ऐतिहासिक सफलता से लेकर उसके डिब्बा मार्का होने का सर्टिफिकेट दे दिया जाता है। पर "राजनीति' को लेकर जो ज्यादा महत्वपूर्ण चर्चा और बहस सतह पर आई है, वह है इस फिल्म का कंटेंट। कहने के लिए यह पूरबिया अंचलों की राजनीति का महाभारती भाष्य है। खुद प्रकाश झा ने भी माना है कि वह बिहार-यूपी की राजनति के अलग-अलग शेड्स को इस फिल्म में उभारना चाहते थे।
फिल्म को देखकर हमारे जेहन में कई सवाल भी उठते हैं। पहला सवाल तो यही कि फिल्म में आमजनों के सरोकारों और संघर्ष की जो आवाज नसीरुद्दीन शाह फिल्म की शुरुआती रीलों में उठाते हैं, वह आवाज बीच में ही कहां और क्यों खो जाती है? इसका जवाब न तो फिल्म देती है और न ही यह बताना "राजनीति' बनाने वालों को जरूरी लगता है।फिर नसीर के रेडिकल कैरेक्टर शेड को थोड़ा और पावरफुल बनाने के लिए उसकी एक महिला मित्र के साथ दिल-दिमाग से होते हुए बिस्तर तक पहुंची नजदीकी को तेजी से घटित होते हुए दिखाया गया है। पर महिला के प्यार और उसके साथ को एक क्रांतिकारी राजनीतिक कार्यकर्ता के जीवन की बाधा किन तर्कों पर मान लिया जाता है, इसका जवाब नहीं मिलता। हां, यह सब देखते हुए मैथिलीशरण गुप्त की वो पंक्तियां जरूर याद आती है जिसमें यशोधरा बुद्ध के गृहत्याग पर मार्मिक उलाहने देती है।
दरअसल, यह फिल्म बिहार-यूपी में राजनीतिक अपराधीकरण की लाल जमीन को जितनी खूबी के साथ समझने का मौका देती है, उतना ही यह महिला किरदारों के मामले में अब तक बने-चले आ रहे पूर्वाग्रहों के आगे समझौता भी करती है। इस फिल्म का फलक काफी बड़ा है। तीन घंटे में सब कुछ समेट लेने की कलात्मक मजबूरी नेे जरूर प्रकाश झा को भी परेशान किया होगा। लिहाजा, उनके प्रति थोड़ी हमदर्दी भी होनी चाहिए।
पिछले छह दशकों में जनता के बीच से निकलकर देश के राजनीतिक नेतृत्व की पहली पांत तक पहुंचे नेताओं की बात करें तो कई बड़े और सफल नाम हमारी गिनती बढ़ाएंगे। पर यह बात महिला नेतृत्व को लेकर आसानी से नहीं की जा सकती। आज भी जो गिनी-चुनी महिलाएं राजनीति की मुख्यधारा में थोड़ी लंबी दूर तक अपने नेतृत्व की नौका खे पाई हैं, उनके पीछे परिवार और वंश की राजनीति है। वैसे वंशवाद की बैसाखी पर राजनीति करने वाले पुरुषों की भी तादाद कम नहीं है। "राजनीति' की कथाभूमि इस पृष्ठभूमि पर रची गई मालूम पड़ती है।
फिल्म में दिखाया गया है कि चुनाव में टिकट पाने की अहर्ता इतनी क्रूर है कि एक महिला को उसके लिए अपने कपड़े तक ढीले करने पड़ते हैं। बात इतने से भी नहीं बनती तो एक के साथ देह रिश्ते का सच, दूसरे के हाथ में अपने विरोधी के खिलाफ हथियार बनाकर सौंपने का सौदा तक करने की मजबूरी को भी वह सहर्ष स्वीकारती है। वहीं दूसरी तरफ वंश, परिवार और परंपरा की चारदीवारी का घेरा आज भी भारतीय समाज में इतना मजबूत है कि उसके भीतर महिला अस्मिता, संवेदना और महत्वाकांक्षा चाहे जितनी बार दम तोड़े, उसके लिए इस फांस को तोड़ पाना तकरीबन नामुमकिन है। दिलचस्प तो यह कि परिवार और परंपरा की राजसी ठाठ के नाम पर आज भी चुनावों में न सिर्फ थोक इमोशनल वोटिंग होती है, बल्कि उसके विरोध में उठी जरूरी राजनीतिक आवाज भी अनसुनी रह जाती है।
फिल्म के जिस एक दृश्य में और महज एक संवाद बोलने के लिए प्रकाश झा परदे पर आते हैं, बताया जा रहा है कि वह संवाद भी उन्हें बदलना पड़ा। वोटिंग के दिन झा एक चाय की दुकान पर वोटिंग के रुख पर अपनी टिप्पणी करते हैं कि लगता है कि "विधवा' सारे वोट बटोर ले जाएगी। फिल्म किसी विवाद में न फंसे और उस पर महिला संवेदना व अस्मिता से जानबूझकर खेलने का आरोप न लगे, इसलिए "विधवा' की जगह "बिटिया' शब्द फिट कर दिया गया।
"राजनीति' के कथानाक का पूरा ताना-बाना जिस तरह बुना गया है, उसमें महिला को इस्तेमाल होने का सच तो जरूर दिखाया गया है, पर उसे इस्तेमाल करने वाले पुरुषों को लेकर खटकने वाली खामोशी बरती गई है। यहां तक कि राजनीति के महाभारती भाष्य में कथित रूप से कृष्ण का किरदार निभाने वाले नाना पाटेकर को भी इन मामलों से या तो कटा-कटा दिखाया गया है या फिर उनके समर्थन और आशीर्वाद से ही सारी लीला खेली जाती है। लीक से हटकर एक अलग फिल्म बनाने के प्रकाश झा के जज्बे की सराहना करते हुए इतनी शिकायत तो उनसे की ही जा सकती है कि महिलाओं के खिलाफ "दामुली' अत्याचार पर वह चाहे तो कुछ जरूरी सवाल तो जरूर खड़े कर सकते थे।

3 comments:

  1. राजनीति के बारे में बढ़िया लिखा है आपने. आलोचना इतनी ही अच्छी होती है. ज्यादा नहीं. नसीरुद्दीन शाह का पक्ष भी सही उठाया है. ब्लॉग देखने में सुंदर है. आँखों पर जोर नहीं डालना पड़ता. पढने के लिए.

    प्रितम्भरा

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  2. फिल्म पर आपके आलेख की सराहना करता हूं। इसलिए नहीं कि फिल्म पर आलेख है बल्कि राजनीतिक हालात की समझ इसमें दिखाई देती है। आपकी राजनीतिक समझ है जिससे यह आलेख तल्लीनता से एक सांस में ही मैं पढ़ गया।

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  3. राजनीति फिल्म की सबसे अच्छी समीक्षा मुझे पढ़ने को यही मिली। बाकी जगह तो बस गुडी-गुडी बातें ही मिली कि यह अच्छा है और वह अच्छा है। यह एक बैलेंस समीक्षा लगी। फिल्मों के बारे में लिखते रहिए। पीपली लाइव की आपकी समीक्षा का इंतजार है।

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