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Monday, September 26, 2011

होरी के देश में गोरी


हमारा समय दिलचस्प विरोधाभासों का है। तभी तो जिस दौर में काला धन को लाने के लिए लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, उसी दौर में सबसे ज्यादा ललक और समर्थन गोर तन को लेकर हैं। काला धन और गोरा तन, ये दोनों ही हमारे समय और समाज के नए शिष्टाचार को व्यक्त करने वाले सबसे जरूरी प्रतीक हैं। इन दोनों में आप चाहें तो अंदरूनी रिश्तों के कई स्तर भी देख-परख सकते हैं। अवलेहों और उबटनों की परंपरा अपने यहां कोई नई नहीं है। तीज-त्योहार से लेकर शादी-ब्याह तक में इस परंपरा के अलग-अलग रंग हमारे यहां आज भी देखने को मिलते हैं। हालांकि यह जरूर है कि इस परंपरा का ठेठ रंग अब जीवन-समाज का पहले की तरह हिस्सा नहीं है।
पिछले कुछ दशकों में जोर यह हावी हुआ है कि चेहरा अगर फेयर और फिगर शेप में नहीं हुआ तो प्यार से लेकर रोजगार तक कुछ भी हाथ नहीं आएगा। संवेदना का यह दैहिक और लैंगिक तर्क टीवी चैनलों की कृपा से आज घर-घर पहुंच रहा है। कुछ महीने पहले की ही बात है जब अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह ने यह कहते हुए फेयरनेस क्रीम का एड करने से इनकार कर दिया था कि उन्हें अपने सांवलेपन को लेकर फख्र है न कि अफसोस। चित्रांगदा के इस फैसले को रंगभेद का खतरा पैदा करने वाले सौंदर्य के बाजार के खिलाफ महिला अस्मिता की असहमति और विरोध के तौर पर देखा गया।
यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि जिस फिल्म इंडस्ट्री और मॉडलिंग दुनिया के कंधों पर गोरी त्वचा और छरहरी काया का पूरा बाजारवादी तिलिस्म रचा गया है, वहां आज भी तूती रंग और देह से ज्यादा तूती काबिलियत की ही बोलती है। और यह रंगविरोधी समझ न सिर्फ व्यवसाय के स्तर पर पर बल्कि संवेदना के स्तर पर भी एकाधिक बार प्रकट हुई है। लोग आज भी 1963 में फिल्म 'बंदिनी' के लिए लिखे गुलजार के लिखे इस गीत को गुनगुनाते हैं- 'मोरा गोरा अंग लेइ ले...मोहे श्याम रंग देइ दे...'।
आज भारत में फेयरनेस क्रीम, ब्लीच और दूसरे उत्पादों का बाजार करीब 2000 करोड़ रुपए का है, जिसमें अकेले रातोंरात त्वचा को गौरवर्णी बना देने वाले क्रीमों की हिस्सेदारी करीब 1800 करोड़ रुपए की है। यही नहीं यह पूरा बाजार किसी भी दूसरे क्षेत्र के बाजार के मुकाबले सबसे ज्यादा उछाल के साथ आगे बढ़ रहा है। नई खबर यह है कि पीएमओ का ध्यान गोरेपन की क्रीम और मोटापा घटाने की दवा बेचने वालों के विज्ञापनी झांसे की तरफ गया है। पीएमओ ऐसे विज्ञापनों को आपत्तिजनक और खतरनाक मानते हुए बाजाप्ता इनके खिलाफ दिशानिर्देश दिए हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रधान सचिव टीकेए नायर ने इसके लिए उपभोक्ता मामलों के अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में यह साफ किया गया कि विभाग को ऐसी नियामक प्रणाली विकसित करनी चाहिए जिससे ऐसे भ्रमित करने वाले विज्ञापनों के प्रसारण पर कारगर रोक लगे। बताया जा रहा है पीएमओ ने चूंकि इस मुद्दे को खासी गंभीरता से लिया है, लिहाजा महीने भर के भीतर इस मुद्दे पर जरूरी कदम उठा लिए जाएंगे।
सरकारी तौर पर इस तरह की पहल का निश्चित रूप से अपना महत्व है और इसके कारगर असर भी जरूर होंगे, एसी उम्मीद की जा सकती है। पर एक बड़ी जवाबदेही लोग और समाज के हिस्से भी आती है। यह कैसी विडंबना है कि रंगभेद के नाम पर सत्ता और समाज के वर्चस्ववादी दुराग्रहों को पीछे छोड़कर हम जिस आधुनिक युग में प्रवेश कर गए हैं, वहां देह और वर्ण को सुंदरता, सफलता और श्रेष्ठता की अगर कुंजी के रूप में अगर मान्यता मिलेगी तो यह मानवीय अस्मिता के लिए एक खतरनाक स्थिति है। लिहाजा, इनके खिलाफ एक एक मुखर सामाजिक चेतना की भी दरकार है। क्योंकि आखिरकार यह तय करना समाज को ही है कि उसके भीतर काले-गोरे को लेकर आग्रह का पैमाना क्या है। अलबत्ता यह तो साफ है कि श्याम-श्वेत के दौर से आगे निकल चुकी दुनिया आज भी अगर गोरे-काले के मध्यकालीन बंटवारे को तवज्जो देती है तो यह उसकी आधुनिकता के हवालों को भी सवालिया घेरे में ले आता है।

3 comments:

  1. स्थिति सचमुच में खतरनाक है और सामाजिक चेतना जगाने की ज़रूरत है।

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  2. गहन चिन्तनयुक्त प्रासंगिक लेख....

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  3. विचारोत्तेजक प्रशंशनीय आलेख...

    यह आपने खुशखबरी सुनाई कि ऐसे दिग्भ्रमित करने वाले रंगभेद को आधार देने वाले विज्ञापनों पर नकेल लगने वाली है...लेकिन मुझे लगता है,यही क्या..ऐसे किसी भी भ्रामक विज्ञापनों को आपराधिक श्रेणी में लाना चाहिए...

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