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Friday, September 23, 2011

बंग समाज की हर दूसरी बेटी का सच !


चाव के साथ चुनाव और राजनीति की बात करने वाले कह सकते हैं कि पश्चिम बंगाल में बदलाव आ गया है। पर यह बात यहां की राजनीति के लिए भले सही बैठे लेकिन जहां तक यहां के जीवन और समाज का सवाल है, उसकी तबीयत को तारीखी रौशनी में ही पढ़ा जा सकता है।  दरअसल, बंगाल की धरती परंपरा और परिवर्तन दोनों की साझी रही है। बात नवजागरण की करें कि जंगे आजादी की इस क्रांतिकारी धरती ने देश के इतिहास के कई सुनहरे सर्ग रचे हैं। पर इस सुनहलेपन के साथ यहां के जीवन और समाज का अंतर्द्वंद्व और विरोधाभास भी पर प्रकट होता रहा है। बांग्ला साहित्य को तो इस बात का श्रेय है कि उसने यहां के सामाजिक अंतविर्रोधों को खासी खूबी के साथ अभिव्यक्ति दी है।
हाल में यूनिसेफ की एक रिपोर्ट आई है। इसमें बताया गया है कि इस पश्चिम बंगाल में हर दूसरी लड़की कच्ची उम्र में ही ब्याह दी जाती है। आज की स्थिति में यह आंकड़ा चौंकाता तो है ही, यह इस सूबे के सामाजिक-आर्थिक हालात पर नए सिरे से विचार करने की दरकार भी सामने रखता है। आखिर क्या ऐसा हुआ कि बाल और विधवा विवाह के खिलाफ देश में सामाजिक नवजागरण का बिगुल फूंकने वाला प्रदेश आज फिर से उन्हीं समस्याओं से जकड़ गया है। क्या अपनी परंपरा और संस्कृति से बेहद प्यार करने वाला बंग समाज अपनी रुढ़ताओं के प्रति भी आग्रही है या कि पिछले तीन-चार दशकों से एक विचार और एक शासन के वर्चस्वादी आग्रह ने यहां के जनजीवन को आधुनिकता की मुख्यधारा का हिस्सा बनने ही नहीं दिया। इतना तो साफ है कि यह समस्या अगर सामाजिक है तो इसके कारक एक-दो दिन में तो कम से कम नहीं खड़े हुए होंगे। सामाजिक अध्ययन की दृष्टि से बंग समाज का सामंती और मध्यकालीन मिजाज ठेठ हिंदी पट्टी से तो अलग है पर है यह उसका ही विस्तार।
बिहार के अंग और मैथिली क्षेत्र से बांग्लादेश की सीमा तक में फैला-समाया लोक और परंपरा पर एक तरफ जहां खेतिहर मलिकाव की हेकड़ी हावी रही है, तो वहीं दूसरी तरफ गांव-समाज का एक बड़ा हिस्सा और तबका भूख और गरीबी से बिलबिलाता रहा है। यह द्वंद्वात्मकता ही कहीं नक्सल हिंसा के रूप में फूटी है तो कहीं आधुनिकता से छिटकते चले जाने की नियति सामाजिक रुढताओं को और वज्र बनाती चली गई है। 21वीं सदी के नए दशक के आरंभ के साथ पश्चिम बंगाल में बहुत कुछ बदला है। यह बदलाव 'सरकारी' के साथ 'असरकारी' भी साबित होगी, ऐसा अभी कह पाना मुश्किल तो है ही, जल्दबाजी भी होगी। आज वहां एक महिला मुख्यमंत्री हैं। 'मां, माटी और मानुष' के प्रति अपनी जवाबदेही और संवेदना को बार-बार दोहराने वाली ममता बनर्जी अगर सचमुच वहां कारगर साबित हो रही हैं फिर तो वहां पितृसत्तात्मक समाज की कई वर्जनाएं भी दरकनी चाहिए।

5 comments:

  1. .

    'मां, माटी और मानुष' के प्रति अपनी जवाबदेही और संवेदना को बार-बार दोहराने वाली ममता बनर्जी अगर सचमुच वहां कारगर साबित हो रही हैं हैं फिर तो वहां पितृसत्तात्मक समाज की कई वर्जनाएं भी दरकनी चाहिए।....
    ......मुझे उनसे उम्मीदें तो बहुत हैं , देखिये क्या बदलाव लाती हैं वे.

    .

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  2. chaukaney baaali baat batae aapney.uper say to paschim bangaal ki aurat adhunic abm bold nazar aati hai.lakeen sach to kuch aur hi hai.

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  4. shukriya aapne apne blog tak aane ka maarg mujhe diya, aabhari hun. aaj aapki ye post padh kar hairan hun ki kya ye sach bang pradesh ka katu saty hai. me north india side me rehne wali hu is liye vaha ke haalaton se anbhigy hun . dukh hua ye sab jaan kar.

    aabhar is jankari k liye.

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