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शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

हिज्जे बदलकर अपना गांव


एक खूंटे से बंधा
दूसरा लड़ रहा लगातार
खूंटे से ही
संगीत की पटरी से उतरी
जुगलबंदी नहीं
न जावेद अख्तर की
स्क्रिप्ट का प्लॉट है
ये तो दोनों पांव हैं उसके
अगले दोनों की सनक पर
धोबिहा गदहे की तरह
हरकत करते

बैठा दूं
इस चौपाये की पीठ पर
आठ से दस मिनट में
गरमा जाएगा चूतड़
मांगेंगे ठंडा तेल
पारासिटामोल
आएगी याद जब भी
तो थामने दौड़ेंगे
पजामा इतिहास का

खैर...
आप कहीं जाएं न
ठहरें
लाइन पर बने रहें
मैं पुटुरवा के
इसी अगहन में खुले
पीसीओ से बोल रहा हूं
अपने गांव की कथा
वाया शार्टकट

सीन एक
दुर्गाथान की मैया को
अपने ही थान में
करनी पड़ रही है
बेगारी
संभालती है मैया
खासे जतन से
अपने जूड़े में
गांव के सबसे होनहार
शकुनियों के पत्ते को
गोटी भांजने वाले
नौसिखुओं के पासे तो
वह कहीं भी रखलेती है
हाथ की खोहरी सेनुरदानी
या पांव के नीचे से
झरती मिट्टी के बीच
कहीं भी
गदहा-जोड़ा बैल-पताका
और पांच सौ पचपन
बीड़ी और खैनी की पोटलियां
दुर्गाथान के कोनों
और खोलों की
कर रही हैं भरपायी
भरपूर

सीन दो
कैला भगत के लालटेन में तेल
अब उतना ही बचा है
जितनी उसकी जुबान पर
रामायण और गोसार्इं कथा
भगत कोरम को पूरा करने वाले
नाम तीन
रिटायर्ड मास्टर सुभाष
गांव की तिरंगा समिति का अध्यक्ष
बांके अहीर और
बयालीस साल का एचएमटी (हाफ माइंड ट्रेंड)
ददुआ
जिसके खिलाफ
साक्षरता मिशन की मुहिम
पंद्रह महीनों से
कमीशनखोरी के जूते पहनकर
फरार है

सीन तीन
बलैया काकी के पतोहू को
बंगलोर से
एसएमएस आया है
किशुन दा के मोबाइल पर
डीयर सासु मां
हैप्पी रिटर्नस ऑफ द डे
हैप्पी-हैप्पी
हैप्पी मदर्स डे
उधर भाग गयी
ग्रेजुएट कविता
कबूतर पकड़ने वाले
भुवन कुमार के साथ

सीन चार
कटैया टोले के स्कूल में
मास्स साहब
घिस्स रहे हैं खड़िया
आज भी
आधे बचे ब्लैकबोर्ड पर
स्कूल से निकलकर
इमली खाने पहुंचती हैं
लड़कियां आज भी
अब भी सधते हैं निशाने
पहले की तरह ही
इमली के बीयों से
मिस स्कुलिया सुंदरी
एक दो तीन पर

सीन सीक्वंेस में
सबसे उज्जड़
सबसे जंगली सीन
गुअर टोली की
सबसे जवान पीढ़ी ने
पुरखों की मिट्टी
न गलने देने की
सौगंध ली है
वे बजा देते हैं सांकल
कभी भी
बाभन टोली के बावन घरों का
अब तक चौबीस में
पहली लाश गिरी
इलाके के विनोबा
संकटा बाबू के बेटे की
इस घटना पर
चार पीढ़ियों से अनपढ़
चलित्तर साव की
समझदानी से निकला
पैदल बयान था
गांव का राजनीति में
पोलटिस घुस गया है

भैरो मोहन की गृहस्थी
लास्ट सीन
भैरो ने बेच दी मिट्टी
ब्लॉक के ठेकेदार को
बचे खेत की परती जोतने में
उसका बेटा
बैल बनने को तैयार नहीं
बाप-दादे के जमाने से बनी
आनाज की कोठियों में से
एक में
बेटे के तिलक का सामान
बाकी दो में
अंधे कुएं की थाह बताती
कई बार गिनी जा चुकी
अनाज की बोरियां
बस
अब रखता हूं चोंगा
काटता हूं लाइन
आखिर चौबीस घंटे टेलीविजन
और नोम चोमस्की के विजन के बाद
कितना बचता ही है गांव
जिस गरमायी पीठ पर
तोड़ी हैं
बर्फ की सिल्लियां मैंने
वह संवेदना भी कहीं छका न दे
डरता हूं
हिज्जे बदलकर
दूर तक गाने में
अपना गांव
कहीं बरमुडा पहने कोई सेल्समैन
लगा न दे हांक
बीस रुपये में आधा
और दस बढ़ाकर देने में
अक्खा दिगंबर गांव
अंग्रेजी सब-टाइटिल के साथ

1 टिप्पणी:

  1. muja ya kavita yaad ha..ya bhut saal phla likhe thi apna...kai din mehnat ke thi... pr iska sath ek aur kavita b likhe thi apna "MERA Gaon"...syd mera khna pr he...usa b blog pr dalea...acha lgega...

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