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Wednesday, August 31, 2011

लोकशाही तो है पर यकीन क्यों नहीं होता!


संसद और सांसदों दोनों के लिए मैजूदा दौर मुश्किलें बढ़ाने वाला है। दिलचस्प है कि इन दोनों की भूमिका और विशेषाधिकारों पर जिसे देखिए वही सवाल उछाल दे रहा है। असल में इस सारी मुसीबत की जड़ में दल हैं और उनसे पैदा हुआ राजनीतिक दलदल है। देश के लोकतंत्र को जो लोग संसदीय सर्वोच्चता के मूल्य के साथ समझने के हिमायती हैं, उन्हें भी आज शायद ही इस बात को कबूलने में कठिनाई हो कि दलीय राजनीति के छह दशक के अनुभव ने इस मू्ल्य को बहुत मू्ल्यवान नहीं रहने दिया है। नहीं तो ऐसा कभी नहीं होता कि विचार और लोकहित की अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर अलग-अलग नाम और रंग के झंडे उड़ाने वाली पार्टियों और उनके नेताओं की विश्वसनीयता पर ही सबसे ज्यादा सवाल उठते।   
अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करें तो इस आंदोलन को मिला अपार लोकसमर्थन कहीं न कहीं राजनीतिक बिरादरी की जनता के बीच खारिज हुई विश्वसनीयता और आधार के सच को भी बयान करती है। एक गैरदलीय मुहिम का महज कुछ ही महीनों में प्रकट हुआ आंदोलनात्मक तेवर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की जमीन को नए सिरे से तैयार करने की दरकार को सामने रखता है। अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ महीनों में इस तैयारी का न सिर्फ लोकसमर्थित तर्क खड़ा हुआ है, बल्कि इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव भी बढ़ा है। कांग्रेस और भाजपा के कुछ सांसदों ने आज अगर अपने ही दलीय अनुशासन के खिलाफ जाने की हिमाकत दिखाई है तो यह इसलिए कि जनता से लगातार कटते जाने के खतरे को कुछ नेता अब समझने को तैयार हैं।
पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम में जनता का गुस्सा हर दल और उसके सांसदों के प्रति दिखा है। यह गुस्सा इसलिए है कि लोकतंत्र को देश में एक दिन के चुनावी अनुष्ठान तक सीमित कर दिया गया है। लोकसंवाद की सतत प्रक्रिया पांच साल की मुंहजोही के लिए मजबूर हो गई है। एक सफल लोकतंत्र जीवंत और प्रगतिशील भी होता है। समय और अनुभव के साथ उसमें संशोधन जरूरी है। जनलोकपाल अगर आज की तारीख में जनता का एक बड़ा मुद्दा है तो इसके बाद सबसे जरूरी मुद्दा दलीय राजनीति के ढांचे आैर चुनाव प्रणाली में सुधार है।
दिलचस्प है कि खुद हजारे ने भी पिछले दिनों जनप्रतिनिधत्व तय करने वाली मौजूदा परंपरा और  तरीके पर सवाल उठाए हैं। यही नहीं उन्होंने तो संसदीय सर्वोच्चता की दलील के बरक्स लोकतंत्र की अपनी नई समझ भी रखी है। पंचायतीराज का मॉडल प्रातिनिधिक के सामने प्रत्यक्ष और  विकेंद्रित लोकतांत्रिक संस्था की अनोखी मिसाल है। लोकसभा और विधानसभाओं के विशेषाधिकार का तर्क ग्रामसभाओं के अविघटनकारी विशेषता के सामने कमजोर मालूम पड़ते हैं। यहीं नहीं पिछले चार दशकों से उठती आ रही 'पार्टीलेस डेमोक्रेसी" की मांग एक बार फिर से केंद्र में आ रही है। नए समय में यह मांग जहां नए सरोकारों से लैस हो रही हैं, वहीं दलों से पैदा राजनीतिक गलीज और  दलदल ने इस दरकार को और ज्यादा पुष्ट कर दिया है।
 लिहाजा, अब वक्त आ गया है कि देश अपनी लोकतांत्रिक परंपरा को नए संदर्भ और समय के अनुरूप मांजने को तत्पर हो। अगर यह तत्परता राजनीतिक दलों के भीतर से अब भी स्वत: नहीं प्रकट होता तो यह उनकी एक अदूरदर्शी समझ होगी। उम्मीद करनी चाहिए कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों व दायित्वों को लेकर जनता और उनकी नुमाइंदगी करने वालों में साझी समझदारी प्रकट होगी। और पिछले साठ सालों की यात्रा के बाद देश एक बार फिर अपने लोकतांत्रिक आधारों को पुष्ट करने के लिए तत्पर होगा। इस तत्परता का फलित भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को काफी हद तक तय करने वाला होगा।

1 comment:

  1. सटीक अवलोकन , निश्चित रूप से वक्त आ गया है की राजनैतिक दल जनमानस के मन की कुंठा जाने और लोकतंत्र की सही परिभाषा पहचाने वरना अभी कई आन्दोलन आएंगे और विस्वसनीयता पर सवाल उठाएंगे .

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