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Monday, August 29, 2011

क्या हुआ जो मीडिया भी अन्ना गया


 स्वतंत्र भारत में चौबीसो घंटे के खबरिया चैनलों का दौर शुरू होने और भाषाई पत्रकारिता के विकेंद्रित विस्तार के बाद यह पहला अनुभव है, जब  अखिल भारतीय स्तर पर जनभावना का कोई दिव्य प्रकटीकरण हो। जो लोग आज अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में 1974 के जयप्रकाश आंदोलन की लिखावट पढ़ने चाह रहे हैं, उनकी भी पहली प्रतिक्रिया यही है कि लोकपक्ष और नए मीडिया का सकरात्मक साझा चमक के साथ कितना असर पैदा कर सकता है, यह चमत्कृत कर देने वाला अनुभव है। प्रेस को अगर लोकतंत्र का विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद चौथा बड़ा स्तंभ माना गया है, तो इसलिए भी कि उसकी भूमिका एक लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने के लिए खासी जिम्मेदारी से भरी है। इमरजेंसी के दौरान जिम्मेदारी के इन हाथों को बड़ियां पहनाई गई थी तो अपने संपादकीय स्तंभ की जगह को खाली छोड़ अखबारों ने अपना विरोध जताया था।
15 अगस्त की अगली सुबह देश में नागरिकों के अहिंसक और  शांतिपूर्ण प्रतिरोध के अधिकार पर जो कुठाराघात हुआ, संसद का सत्र जारी रहने के बावजूद उसकी गूंज वहां के बजाय मीडिया में ज्यादा पैदा हुई। यह देश की मीडिया का सद्विवेकी रवैया का ही नतीजा रहा कि उसने लोकपक्ष की जुबान और चेहरा बनने का फैसला लिया। कह सकते हैं कि न्यायकि सक्रियता के बाद देश में मीडिया की सक्रियता के यह एक नए सर्ग का शुभारंभ है। दिलचस्प है कि अन्ना हजारे ने भी 16 अगस्त से अपने प्रस्तावित अनशन से एक दिन पहले मीडिया का इस बात के लिए शुक्रिया अदा किया था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम को जोर पकड़ाने में उसकी बड़ी भूमिका रही है। यही नहीं जब वे रामलीला मैदान से अनशन से उठे तो उन्होंने और उनके साथियों ने मीडिया का कई-कई बार आभार जताया। 
असल में यह एक जीवंत और प्रगतिशील लोकतंत्र का तकाजा है कि लोक भावना और लोक संघर्ष  के स्पेस को वह न तो कमतर करता है और न ही उसे खारिज करता है। क्योंकि इससे लोकहित के मुद्दों के दरकिनार हो जाने का खतरा पैदा होता है। समाचार की 'इंफोमेंटी" समझ और 'प्रोफेशनल" होड़ ने मीडिया की भूमिका पर पिछले दो दशकों में कई सवाल उठाए हैं। प्रेस की आजादी के नाम पर मनमानी करने की छूट ने लोकतंत्र की एक जिम्मेदार संस्था को काफी हद तक अगंभीर और गैरजवाबदेह बना दिया है, ऐसे आरोप मीडिया पर लगने अब आपवादिक नहीं रहे। ऐसे में मीडिया के लिए यह फख्र के साथ सबक सीखने का भी अवसर है कि अगर वह लोकचेतना का चेहरा बनने का दायित्व पूरा करता है तो न सिर्फ उसकी विश्वसनीयता बहाल रहती है बल्कि उसकी साख भी बरकरार रहती है। 
लोकहित का तकाजा ही यही है कि उसे गुमराह करने के बजाय उसका हमकदम बना जाए, उसका मार्गदर्शी बना जाए। नया मीडिया ज्यादा तकनीक संपन्न है, लिहाजा उससे ज्यादा जिम्मेदार पहरुआ (वॉच डॉग) भी होना चाहिए। ऐसे में कुछ लोगों और समाज के कुछ वर्गों से आई कुछ शिकायतें मायने रखती है। मसलन असम के इरोम शर्मिला के दस साल से चले आ रहे अनशन का मुद्दा चौबीसों घंटे चौकन्ना मीडिया की आंखों से ओझल क्यों रहा? इसी तरह क्या पूनम पांडे और राखी सावंत को जिस मुंह से घर-घर तक पहुंचाने वाले मीडिया के पेशेवर सरोकार क्या वक्त-बेवक्त सुविधानुसार नहीं बदलते हैं और क्या यह बदलाव पूरी तरह विश्वसनीय माना जा सकता है।
बहरहाल, अन्ना का आंदोलन भले फिलहाल समाप्त हो चुका हो पर देश में लोकहित के कई जरूरी मुद्दे अब भी सरकार और व्यवस्था के एजेंडे में शामिल होने बाकी हैं। नए मीडिया का एक दायित्व यह भी कि वह हाशिए के इन मुद्दों को उठाए और एक सशक्त लोकमत के निर्माण का अपना दायित्व आगे भी पूरी ऊर्जा के साथ निभाए।

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