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शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

सर

(शिक्षक दिवस पर विशेष कविता)


रोकिए नहीं सर
अभी लिखना है
और भी बहुत कुछ
इजाजत नहीं तो वहां
क्लास के बाहर
बैठकर लिख लूंगा
आपकी छड़ी
टिक-टिक घड़ी
दोनों की कद्रदानी
सौभाग्य है मेरा


सौभाग्य यह आज भी
दुविधाग्रस्त नहीं
सुरक्षित है सर
बहुत सिखाया है इसने
बहुत असर है इनका
मेरे ऊपर


लेकिन लिखूंगा
आज तो जरूर लिखूंगा सर
ऐसे कई शब्द
अधूरे-पूरे वाक्य
जिनके हिज्जे
पूरा का पूरा गठन
दुरुस्त नहीं
बस होंगे मौलिक



ये भी बड़ी बात है सर
बताया था आपने ही
पढ़ाते हुए कबीर
इन्हें बस मैं ही लिख सकता हूं
सिर्फ मेरी स्याही ही
उगा सकती हैं इन्हें
ये मेरे शब्द हैं सर
सिर्फ मेरी कॉपी पर ही
हो सकते हैं


इनके होने की दरकार
एक अधूरे आदमी की
पूरे व्यक्तित्व की चाहना है
बहुत जरूरी है
इनका चहकना


बहुत जरूरी है सर
मेरी कॉपी को
मेरा साबित होना
भरोसा है
यह मौका आप देंगे
मेरी कॉपी आप
नहीं लेंगे सर



मंगलवार, 30 अगस्त 2011

अनुशासन पर इतना भाषण क्यों !


बात आप शिक्षा की करें और अनुशासन का मुद्दा रह जाए तो शायद आपकी बरत अधूरी रह जाए। वैसे यह अधूरापन इसलिए नहीं है कि एक के साथ दूसरे संदर्भ को नहीं देखा जाता बल्कि ये अधूरापन इसलिए ज्यादा है कि इन दोनों मुद्दों को अलग-अलग देखे जाने का आग्रह होता है। दरअसल, शिक्षा और अनुशासन अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं। इतने गहरे कि इस बहाने हम शिक्षण संस्कार की परंपरा से लेकर उसके लक्ष्य तक को भलीभांति परिभाषित कर सकते हैं। पर आज अनुशासन आचरण से ज्यादा दूसरे पर थोपे जाने वाली मयार्दा का नाम है। दिलचस्प है कि मर्यादा का यह आग्रह सबसे ज्यादा उस पीढ़ी से की जाती है, जिस पर परंपरागत जीवन मूल्यों के साथ आधुनिक समय चेतना को भी आत्मसात करने का दबाव है। ऐसे में यह कहीं से मुनासिब नहीं कि हम बलात् अनुशासन की लाठी उन पर भांजें।
इंसाफ, तहजीब और मजहबी दरकार के नाम पर जिस तालिबानी सलूक को पूरी दुनिया में बर्बरता के रूप में देखा जाता है, वह बर्बरता हमारे समय और समाज के कुछ दायरों का सच भर नहीं बल्कि हमारे अंदर के कोनों-खोलों की दबी-छिपी सचाई है। यौन हिंसा संबंध और परिवार के दायरे में सबसे तेजी से पले-बढ़े और स्कूल-कॉलेजों में अनुशासन के नाम पर मध्यकालीन मानसिकता के साथ छात्रों से सलूक हो, अगर यह हमारी चिंता का विषय नहीं है तो इसे एक खतरनाक प्रवृति ही कहेंगे।
अभी पिछले दिन ही अखबारों में खबर आई कि चेन्नई के एक कॉलेज में शिक्षक ने मोबाइल फोन रखने के आरोप में छात्रा की इस तरह तालाशी ली कि उसे एक तरह से निर्वस्त्र कर दिया। दूसरी घटना केरल के एक केंद्रीय विद्यालय की है, जहां एक शिक्षक को बच्चों का बाल बढ़ा होना इतना अनुशासनहीन लगा कि उसने एक साथ 90 बच्चों के बाल काट डाले। अनुशासन और संस्कृति के नाम पर पहरुआगिरी का यह कृत्य वैसा ही जो युवकों-युवतियों को कभी कपड़े पहनने के सलीके के नाम पर सरेआम बेइज्जत करने से बाज नहीं आता तो कभी उनके प्रेम और खुलेआम मेलजोल को धर्म और संस्कृति के लिए घातक करार देता है। दिलचस्प है कि अनुशासन का आग्रह कोई खारिज की जा सकने वाली दरकार नहीं पर यह आग्रह अगर दुराग्रह बन जाए तो यह निश्चित रूप से खतरनाक मंसूबों को साधने का बहाना बन जाता है।
जहां तक बात है शिक्षण परिसरों में बरते और दिखने वाले अनुशासन की तो इसकी बुनियादी जरूरत से तो शायद ही कोई इनकार करे। एक बेहतर अनुशासित वातावरण में ही बेहतर शिक्षण का मकसद पूरा होता है। देश-दुनिया के हजारों-लाखों स्कूलों-कालेजों और विश्वविद्यालयों  में से जिन कुछेक को ज्यादा लोकप्रियता और सम्मान हासिल है, वहां शिक्षा के साथ अनुशासन भी आले दर्जे की है। यही नहीं इस अनुशासन के दायरे में सिर्फ वहां के छात्र नहीं बल्कि तमाम शिक्षक और कर्मचारी भी आते हैं। इतिहास के कई नायकों ने अपनी सफलता का श्रेय अपने शिक्षकों की मेहनत और अपने स्कूल-कॉलेज के वातावरण को दिया है। साफ है कि शिक्षकों के व्यवहार से छात्रों तक पहुंचने वाला अनुशासन एक निहायत ही संवेदनशील मसला है और किसी भी शिक्षा संस्थान में इस संवेदनशीलता का निर्वहन किस रूप में हो रहा है, यह उसके स्तर को काफी हद तक तय कर देता है। एक ऐसे दौर में जबकि शिक्षा को छात्रों के ज्यादा से ज्यादा अनुकूल और सहज बनाने की कवायद तेज है, छात्रों से असहज अनुशासन की अपेक्षा करना, समय और शिक्षा की आधुनिक समझ के पूरी तरह खिलाफ है।