शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

प्यार का नया देशकाल

प्यार और दोस्ती जीवन से जुड़े ऐसे सरोकार हैं जिनको निभाने के लिए हमारी आपकी फिक्रमंदी भले कम हुई हो पर इसे उत्सव की तरह मनाने वाली सोच बकायदा संगठित उद्योग का रूप ले चुका है। दिलचस्प यह भी है कि कल तक लक्ष्मी के जिन उल्लुओं की चोंच और आंखें सबसे ज्यादा परिवार और परंपरा का दूध पीकर बलिष्ठ हो रहे संबंधों पर भिंची रहती थी, अब वही कलाई पर दोस्ती और प्यार का धागा बांधने का पोस्टमार्डन फंडा हिट कराने में लगे हैं।
प्यार और दोस्ती के महापर्व
लव, फ्रेंड और फ्रेंडशिप का जो जश्न पूरी दुनिया में वेलेंटाइन डे के नाम पर शुरू हुआ है, उसका अतीत मानवीय संवेदनाओं को खुरचने वाली कई क्रूर सचाइयों पर से परदा उठाता है। सेंट वेलेंटाइन को भी नहीं पता होगा कि उनके बाद की पीढ़ियां उनके प्यार और समर्पण के संदेश को महज प्यार की सनसनाहट और रोमांच तक सीमित कर देंगे।
आज तो आलम यह है कि पिछले कई दशकों से दुनिया के सबसे समृद्ध देशों से लेकर गरीब और पिछड़े मुल्कों में वेलेंटाइन डे को उत्सव दिवस के रूप में मनाने की परंपरा कैलेंडर की कुछ खास तारीखें हैं। पिछले एक-डेढ़ दशक में प्यार और दोस्ती के महापर्व के रूप में वेलेंटाइन डे के साथ फ्रेंडशिप डे का भी प्रचलन काफी बढ़ गया है। अलबत्ता यह बात जरूर थोड़ी चौकाती है कि सेक्स और सेंसेक्स के बीच झूलती दुनिया में संबंधों को कलाई पर बांधकर दिखाने की रस्मी रिवायत से किसका भला ज्यादा हो रहा है।
राजेंद्र यादव कहा करते थे
स्वर्गीय लेखक राजेंद्र यादव दोस्ती की बात छेड़ने पर अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत दोहराते थे- 'बूट्स एंड फ्रेंडशिप शुड बी पॉलिश्ड रेग्युलरली।’ जाहिर है संबंधों को एक दिन के उल्लास और उत्सव की रस्म अदायगी के साथ निपटाने के खतरे को वे बखूबी समझते थे।
बात प्यार और दोस्ती की हो और बात युवाओं की न हो बात पूरी नहीं होती है। आर्चीज जैसी कार्ड और गिफ्ट बनाने और बेचने वाली कंपनियां इन्हीं युवाओं के मानस पर प्रेम, ख्वाब, यादें और दोस्ती जैसे शब्द लिखकर तो अपनी अंटी का वजन रोज ब रोज बढ़ा रही हैं। फिर बात दोस्ती और प्यार के महापर्व की हो तो युवाओं को कैसे भूला जा सकता है।
तुनक गए जावेद साहब
कुछ अर्से पहले टीवी पर दिखाए जा रहे एक शो में जज बने जावेद अख्तर तब तुनक गए जब गायिका वसुंधरा दास ने अपने एक गाने को यूथफूल होने की दलील उनके सामने रखी। जावेद साहब ने थोड़े तल्ख लहजे में उस मानसिकता पर चुटकी ली जिसमें देह की अवधारणा को संदेह से अलगाने की कोशिश हो या किसी बेसिर-पैर के म्यूजिकल कंपोजिशन को मार्डन या यूथफूल ठहराने का कैलकुलेटेड एफर्ट, यूथ सेंटीमेंट की बात छेड़कर सब कुछ जायज और जरूरी ठहरा दिया जाता है। उनके शब्द थे 'इस तरह की दलीलों को सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे यूथ कोई 21वीं सदी का इन्वेंशन हो और इससे पहले ये होते ही नहीं थे।’ इस वाकिए को सामने रखकर यह समझने में थोड़ी सहुलियत हो सकती है कि नई पीढ़ी को सीढ़ी बनाकर संबंधों के केक काटने वाला बाजार किस कदर अपने मकसद में क्रूर है। यहां यह भूल करने से बचना चाहिए कि नई पीढ़ी की संवेदनशीलता कोरी और कच्ची है। हां, यह जरूर है कि उसके आसपास का वातावरण उससे वह मौका भरसक हथिया लेने में सफल हो रहा है जो निभाए जाने वाले मानवीय सरोकारों को दिखाए जाने वाला रोमांच भर बना रहे हैं।
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ग्लोबल नहीं हैं भारतीय युवा

लोक और परंपरा के कल्याणकारी मिथकों पर भरोसा करने वाले आचार्यों की ाातें आ विश्वविद्यालयों के शोधग्रंथों तक सिमट कर रह गई हैं। इन पर मनन-चितन करने का भारतीय समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक विवेक बीते दौर की बात हो चुकी है। ऐसा अगर हम कह रहे हैं तो इसलिए क्योंकि ऐसा मानने वाले आज ज्यादा है। पर तथ्य और सत्य भी यहीं आकर ठहरता है, ऐसा नहीं है। दिलचस्प है कि खुले बाजार ने अपने कपाट जितने नहीं खोले, उससे ज्यादा हमने भारतीय युवाओं के बारे में आग्रहों को खोल दिया। सेक्स, सेंसेक्स और सक्सेस के त्रिकोण में कैद नव भारतीय युवा की छवि और उपलधि पर सरकार और कॉरपोरेट जगत सबसे ज्यादा फिदा है। ऐसा हो भी भला क्यों नहीं क्योंकि इसमें से एक ग्लोबल इंडिया का रास्ता बुहारने और दूसरा रास्ता बनाने में लगा है। यह भूमिका और सचाई उन सब को भाती है जो भारत में विकास और बदलाव की छवि को पिछले दो दशकों में सबसे ज्यादा चमकदार बताने के हिमायती हैं। ऐसे में कोई यह समझे कि देश की युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा न सिर्फ इन बदलावों के प्रति पीठ किए बैठा है बल्किइंडिया शाइनिग का मुहावरा ही उसके लिए अब तक अबूझ है तो हैरानी जरूर होगी।
सर्वे में सामने आया सच
कुछ साल पहले 'इंडियन यूथ इन ए ट्रांसफॉमिग वर्ल्ड : एटीटरूड्स एंड परसेप्शन’ नाम से एक शोध अध्ययन खूब चर्चा में आई थी। इसमें बताया गया था कि देश के 29 फीसदी युवा ग्लोबलाइजेशन या मार्केट इकोनमी जैसे शब्दों और उसके मायने से अपरिचित हैं। यही नहीं देश की जिस युवा पीढ़ी को इस इमîजग फिनोमेना से अकसर जोड़कर देखा जाता है कि उनकी आस्था चुनाव या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं व मूल्यों के प्रति लगातार छीजती जा रही है, उसके विवेक का धरातल इस पूर्वाग्रह से बिल्कुल अलग है। शोध के मुताबिक देश के तकरीबन आधे यानी 48 फीसद युवक ऐसे हैं, जिनका न सिर्फ भरोसा अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रति है बल्कि वे जीवन और विकास को इससे सर्वथा जुड़ा मानते हैं।
साफ है कि पिछले दो दशकों में देश बदला हो कि नहीं बदला हो, हमारा नजरिया समय और समाज को देखने का जरूर बदला है। नहीं तो ऐसा कतई नहीं होता कि अपनी परंपरा की गोद में खेली पीढ़ी को हम महज डॉलर, करियर, पिज्जा-बर्गर और सेलफोन से मिलकर बने परिवेश के हवाले मानकर अपनी समझदारी की पुलिया पर मनचाही आवाजाही करते। जमीनी बदलाव के चरित्र को जब भी सामाजिक और लोकतांत्रिक पुष्टि के साथ गढ़ा गया है, वह कारगर रहा है, कामयाब रहा है।
एक गणतांत्रिक देश के तौर पर छह दशकों के गहन अनुभव और उसके पीछे दासता के सियाह सर्गों ने हमें यह सबक तो कम से कम नहीं सिखाया है कि विविधता और विरोधाभास से भरे इस विशाल भारत में ऊपरी तौर पर किसी बात को बिठाना आसान है। तभी तो हमारे यहां बदलाव या क्रांति की भी जो संकल्पना है, वह जड़मूल से क्रांति की है, संपूर्ण क्रांति की है।
आज पिछले तीस सालों के विकास की अंधाधुंध होड़ के बजबजाते यथार्थ को देखने के बाद यह मानने वालों की तादाद आज ज्यादा है जो यह समझते हैं कि किसानों, दस्तकारों के इस देश को अचानक ग्लोबल छतरी में समाने की नौबत पैदा की गई और यह नौबत इतनी त्रासद रही कि कम से कम ढ़ाई लाख किसान खुदकुशी के मोहताज हुए। साफ है कि ग्लोब पर इंडिया को इमîजग इकोनमी पॉवर के तौर पर देखने के लिए जिन तथ्यों और तर्कों का हम सहारा ले रहे हैं, उसकी विद्रूप सचाई हमें सामने से आईना दिखाती है। सस्ते श्रम की विश्व बाजार में नीलामी कर आंकड़ों के खाने में विदेशी मुद्रा का वजन जरूर बढ़ सकता है पर यह सब देश के हर काबिल युवा के हाथ में काम के लक्ष्य और सपने को पूरा करने की राह में महज कुछ कदम ही हैं। ये कदम भी आगे जाने की बजाय या तो अब ठिठक गए हैं या फिर पीछे जाएंगे क्योंकि मेहरबानी बरसाने वाले अमेरिका जैसे देश एक बार फिर संरक्षणवादी आर्थिक हितों को अमल में लाने लगे हैं।
पब के दौर में लव
आखिर में एक बात और देश की लोक, परंपरा और संस्कृति के हवाले से। रूढ़ियां तोड़ने से ज्यादा सांस्कृतिक स्वीकृतियों को खारिज करने के लिए बदनाम पब और लव को बराबरी का दर्जा देने वाले युवाओं की जो तस्वीर हमारी आंखों के आगे जमा दी गई है, उसके लिए शराब का सुर्ख सुरूर बहुत जरूरी है। पर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चंडीगढ़ आदि से आगे जैसे ही हम इंडिया से भारत की दुनिया में कदम रखते हैं, यह युवा दरकार खारिज होती चली जाती है। नए भारत के युवाओं को लेकर यहां भी एक पूर्वाग्रह टूटता है क्योंकि जिस अध्ययन का हवाला हम पहले दे चुके हैं, उसमें उभरा एक बड़ा तथ्य यह भी है 66 फीसदी युवाओं के लिए आज भी शराब को हाथ लगाना जिदगी का सबसे कठिन फैसला है।
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लद गया सीटियों का जमाना
सीटियों का जमाना लदने को है। सूचना क्रांति ने सीटीमारों के लिए स्पेस नहीं छोड़ी है। इसी के साथ होने वाला है युगांत संकेत भाषा के सबसे लंबे खिचे पॉपुलर युग का। बहरहाल, कुछ बातें सीटियों और उसकी भूमिका को लेकर। कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं पर पहली सीटी किसी लड़की ने नहीं बल्कि किसी लड़के ने किसी लड़की के लिए ही बजाई होगी। बाद के दौर में सीटीमार लड़कों ने सीटी के कई-कई इस्तेमाल आजमाए। जिसे आज ईव-टीðजग कहते हैं, उसका भी सबसे पुराना औजार सीटियां ही रही हैं। वैसे सीटियों का कैरेक्टर शेड ब्लैक या व्हाइट न होकर हमेशा ग्रे ही रहा है। इस ग्रे कलर का परसेंटेज जरूर काल-पात्र-स्थान के मुताबिक बदलता रहा है।
बात किशोर या नौजवान उम्र की लड़के-लड़कियों की करें तो सीटी ऐसी कार्रवाई की तरह रही है, जिसमें 'फिजिकल’ कुछ नहीं है यानी गली-मोहल्लों से शुरू होकर स्कूल-कॉलेजों तक फैली गुंडागर्दी का चेहरा इतना वीभत्स तो कभी नहीं रहा कि असर नाखूनी या तेजाबी हो। फिर भी सीटियों के लिए प्रेरक -उत्प्रेरक न बनने, इससे बचने और भागने का दबाव लड़कियों को हमारे समाज में लंबे समय तक झेलना पड़ा है। सीटियों का स्वर्णयुग तब था, जब नायक और खलनायक, दोनों ही अपने-अपने मतलब से सीटीमार बन जाते थे।
किशोर कुमार की सीटी
इसी दौरान सीटियों को कलात्मक और सांगीतिक शिनाख्त भी मिली। किशोर कुमार की सीटी से लिप्स मूवमेंट मिला कर राजेश खन्ना जैसे परदे के नायकों ने रातोंरात न जाने कितने दिलों में अपनी जगह बना ली। आज भी जब नाच-गाने का कोई आइटमनुमा कार्यक्रम होता है तो सीटियां बजती हैं। स्टेज पर परफॉर्म करने वाले कलाकारों को लगता है कि पब्लिक का थोक रिस्पांस मिल रहा है। वैसे सीटियों को लेकर झीनी गलतफहमी शुरू से बनी रही है। संभ्रांत समाज में इसकी असभ्य पहचान कभी मिटी नहीं। यूं भी कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय के बदले दौर में भी इस कथित अमर्यादा का शुद्धिकरण कभी इतना हुआ नहीं कि सीटियों को बड़ी स्वीकृति स्वीकृति मिल जाए।
सीटियों से लाइन पर आए प्रेम प्रसंगों के कर्ताधताã आज अपनी गृहस्थी की दूसरी-तीसरी पीढ़ी की क्यारी को पानी दे रहे हैं। लिहाजा संबंधों की हरियाली को कायम रखने और इसके रकबे के बढ़ाने में सीटियों ने भी कोई कम योगदान नहीं किया है। यह अलग बात है कि इस तरह की कोशिशें कई बार सिरे नहीं चढ़ने पर बेहूदगी की भी अव्वल मिसालें बनी हैं।

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प्यार का झूठ और लव गुरु
शादी के बाद पति-पत्नी के रिश्ते में कितनी पारदर्शिता रहे, इसका अव्यावहारिक रास्ता निकाला जाना चाहिए। रेडियो-टीवी पर बैठे लव गुरुओं और मैरिटल काउंसलरों की भी सलाह ऐसी ही है। साफ तौर पर हिदायत दी जा रही है कि जो कहने-बताने से रिश्ते पर आंच न आए, वही सही है। पर यहां भी एक पेंच है। शेखी की तरह सचाई बघारने वाले ज्यादातर पुरुषों को अपने पिछले रिलेशन और अफेयर के बावजूद अपनी पत्नियों से परेशानी का खतरा न के बराबर रहता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि महिलाओं को घर-बाहर हर जगह यही हिदायत दी जाती है कि पुरुष तो ऐसे ही होते हैं, यहां-वहां और जहां-तहां मुंह मारने वाले। सो उसके किए पर अफसोस क्यों? चाहे जैसे हो बचा लो रिश्ता और इस तरह पेश आओ कि तुम्हारा पति तुम्हारे काबू में रहे, बहके नहीं और अगर बहके भी तो लौट के बुद्धु घर को आए की तरह।
केस स्टडी
शालिनी टीचर है और उसका पति इंश्योरेंस एजेंट। रजनी ने टीवी पर आने वाले मैरिटल काउंसिलिग के कार्यक्रम में बैठे विशेषज्ञों के आगे अपनी परेशानी रखी। उसकी शादी उसके साथ पढ़ने वाले लड़के से होनी थी। दोनों के बीच तकरीबन चार-पांच साल नजदीकी ताल्लुकात रहे। अफेयर भी कह सकते हैं। पर जब शादी की बात चली तो लड़के के घर वाले नहीं माने। शालिनी आज अपने शादीशुदा जीवन के आगे सब कुछ भूल चुकी है। उसकी एक बेटी स्कूल जाती है। पर उसका पति आज भी उसे अपने प्रति पूरी तरह वफादार नहीं मानता। उसे इस बात पर आए दिन पति से प्रताड़ित होना पड़ता है।
दरअसल, शालिनी ने एक ही गलती कि उसने अपने जीवनसाथी को शादी के कुछ ही दिनों बाद सब कुछ बता दिया। छह साल पहले कहा सच आज भी उसकी शादीशुदा जिदगी को ग्रास रहा है। शालिनी जैसी युवतियों से हमदर्दी रखने वाले भी यही कहते हैं कि पति के साथ सब कुछ शेयर करना जरूरी नहीं है। पुरुषों के लिए तो बदचलनी की गाली भी गिनती के ही हैं, पर महिलाओं की बोलती बंद करने के लिए उन्हें बदचलन ठहराना घर से बाहर क्या घर के अंदर भी सबसे आसान औजार है।
भूले नहीं हैं लोग अब भी टीवी पर स्वयंवर के उस ड्रामे को जिसमें राहुल महाजन शादी रचाते हैं। राहुल के लिए शादी का यह पहला मौका नहीं था। अफेयर के मामले में वह पहले से काफी विवादास्पद रहा था। पर उससे शादी का ख्वाब सजाने वाली किसी भी लड़की को इस बात से शिकायत नहीं थी। इस मुद्दे पर कोई चर्चा भी नहीं हुई।
आप सोचकर देखें, राहुल का सच किसी लड़की का होता तो क्या होता? अव्वल तो उसे इस टीवी शो का हिस्सा ही नहीं बनाया जाता। अगर बनाया भी जाता तो वरमाला कम से कम उसके गले में तो राहुल नहीं डालता। यह एक तरफ तो नए दौर का टीआरपी मार्का मनोरंजन का सच है तो वहीं दूसरी ओर यह रियलिटी उस पुरुष मानसिकता की भी है जिसे अपने ऊपर कभी कोई खरोंच बर्दाश्त नहीं भले खुद उसके नाखून बढ़ते रहें।
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चीनी प्रोडक्ट क्या
रिलेशन भी टिकाऊ नहीं

अखबारों के तकरबीन एक ही पन्ने पर साया हुईं ये दो खबरें हैं। एक तरफ प्राचीन से नवीन होता चीन है तो दूसरी तरफ उत्तर आधुनिकता की जमीन पर परंपराओं और संबंधों के नए सरोकारों को विकसित कर रहा अमेरिका। दुनिया के दोनों महत्वपूर्ण हिस्सों में यह सामाजिक बदलाव का दौर है। लेकिन दिशा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग। एक तरफ खतरे का लाल रंग काफी तेजी से और गाढ़ा होता जा रहा है तो दूसरी तरफ मध्यकालीन बेड़ियों से झूल रहे बचे-खुचे तालों को तोड़ने का संकल्प।
बाजार के साथ हाथ मिलाते हुए भी अपनी लाल ठसक को बनाए रखने वाले चीन की यह बिल्कुल वही तस्वीर नहीं है, जो न सिर्फ सशक्त है बल्कि सर्वाइवल और डेवलपमेंट का एक डिफरेंट मॉडल भी है। चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने सोशल रिसर्चर तंग जुन के हवाले से बताया कि चीन में न सिर्फ अर्थव्यवस्था का बल्कि तलाक का ग्राफ भी बढ़ा है। ढाई दशक पहले तक चीन में हर हजार शादी पर ०.4 मामले तलाक के थे जो कि आ वहां नौबत यह आ गई है कि हर पांचवीं शादी का दुखांत होता है। चीनी समाज में स्थितियां किस तरह बदल रही हैं, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2००9 में चीन में 2.42 करोड़ लोग परिणय सूत्र में बंधे लेकिन 24 लाख लोग अंतत: इस बंधन से बाहर आ गए। अर्थ का विकास जीवन को कुछ सुकूनदेह बनाता हो या न, उसके अनर्थ का खतरा कभी मरता नहीं है।
चीनी विकास का अल्टरनेटिव मॉडल परिवार और समाज के स्तर पर भी कोई वैकल्पिक राह खोज लेता तो सचमुच बड़ी बात होती। लेकिन शायद ऐसा न तो संभव था और न ही ऐसी कोई कोशिश की गई। उलटे विकास और समृद्धि के चमकते आंकड़ों की हिफाजत के लिए वहां पोर्न इंडस्ट्री और सेक्स ट्वॉयज का नया बाजार खड़ा हो गया। दुनिया के जिस भी समाज में सेक्स की सीमा ने सामाजिक संस्थाओं का अतिक्रमण कर सीधे-सीधे निजी आजादी का एजेंडा चलाया है, वहां सामाजिक संस्थाओं की बेड़ियां सबसे पहले झनझनाई हैं। चीन में आज अगर इस झनझनाहट को सुना जा रहा है तो वहां की सरकार को थ्यानमन चौक की घटना से भी बड़े खतरे के लिए तैयार हो जाना चाहिए। क्योंकि बाजार को अगर सामाजिक आधारों को बदलने का छुट्टा लाइसेंस मिल गया तो आगे जीवन और जीवनशैली के लिए सिर्फ क्रेता और विक्रेता के संबंधों का खतरनाक आधार बचेगा।
अमेरिका से आई खबर की प्रकृति बिल्कुल अलग है। वहां शादियों और मां बनने का न सिर्फ जोर बढ़ा है बल्कि इन सबके साथ कई क्रूर रुढ़ताएं भी खंडित हो रही हैं। जिस अमेरिका में राजनीति से लेकर फिल्म और शिक्षण संस्थाओं तक नस्लवाद का अक्स आज भी कायम है, वहां रंग, जाति और बिरादरी से बाहर जाकर प्यार करने और शादी करने का नया चलन जोर पकड़ रहा है। नस्ली सीमाओं को लांघकर विवाह करने का यह चलन कितना मजबूत है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पिछले तीन दशक में ऐसा करने वालों की गिनती दोगुनी हो चुकी है। अमेरिकी समाज के लिए यह एक बड़ी घटना है।
5०-6० के दशक तक अमेरिका में दूसरी नस्ल के लोगों के साथ विवाह करने की इजाजत नहीं थी। बाद में वहां सुप्रीम कोर्ट का आर्डर आया जिसने ऐसे किसी एतराज को गलत ठहराया। बहरहाल, इतना तो कहना ही पड़ेगा कि दुनिया भर में नव पूंजीवाद व उदारवाद का अलांरदार देश अपनी भीतरी बनावट में भी उदार होने के लिए छटपटा रहा है। यह सूरत आशाजनक तो है पर फिलहाल इसे क्रांतिकारी इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि अब भी वहां 37 फीसद सोशल हार्डकोर मेंटेलिटी के लोग हैं, जो विवाह की नस्ली शिनाख्त में किसी फेरबदल के हिमायती नहीं हैं।
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बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

ऑटो एक्सपो में क्या करने पहुंचे थे सचिन

सचिन तेंदुलकर को लेकर एक बड़ी दिलचस्प स्थिति है। उन्हें क्रिकेट का भगवान पहले माना गया, भारत रत्न का सम्मान उन्हें बाद में मिला। यही नहीं, भारत रत्न दिए जाने की घोषणा होने और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने से पहले उन्हें राज्यसभा का सांसद मनोनीत किया गया। आज सचिन एक साथ क्रिकेट के भगवान, भारत रत्न और माननीय सांसद हैं।
लिटिल चैंपियन का यह परिचय एक ऐसा विशाल आभामंडल रचता है जिसके आगे देश के तमाम दूसरे क्षेत्रों की प्रतिभाओं की चमक फीकी मालूम पड़ती है। चर्चा निकली है तो यह भी ध्यान दिलाना जरूरी है कि इस दौरान आरटीआई के जरिए हुए एक खुलासे में यह जानकारी सामने आई कि भारत रत्न के लिए खेल मंत्रालय ने ध्यानचंद का नाम अग्रसारित किया था लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसमें अपने स्तर से हस्तक्षेप किया और सचिन तेंदुलकर का नाम फाइनल कर दिया।
गौरतलब है कि सचिन पहले ऐसे शख्स हैं, जिन्हेें खेल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए यह सम्मान दिया गया है। इसके लिए सरकार को सम्मान की अर्हता तय करने वाले प्रवधानों को संशोधित करना पड़ा। पूरे मामले की तफ्सील सामने आने पर खेल की दुनिया के अलावा सड़कों पर यह सवाल उठाया गया कि हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को नजरंदाज कर सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न के लिए क्यों चुना गया।
बहरहाल, इस विवाद में और जाने की बजाय बात अकेले सचिन तेंदुलकर की। उनका जिस तरह का आचरण और अब भी वे जिस तरह से अपनी प्राथमिकताएं तय कर रहे हैं, उससे क्या वह देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान और राज्यसभा सदस्यता पाने की अपनी काबिलियत को सही साबित कर पा रहे हैं। राज्यसभा के लिए चुने जाने के मौके पर सचिन ने कहा था कि फिलहाल तो संसद के लिए बहुत समय नहीं निकाल पाएंगे क्योंकि क्रिकेट में उनका बहुत समय चला जाता है। पर उनके संन्यास की घोषणा के बाद लोगों को लगा कि वे अब राज्यसभा में अपनी सक्रिय मौजूदगी दिखाएंगे। इसी बीच उन्हें भारत रत्न के सम्मान से भी विधिवत नवाजा गया।
पर ऐसा कुछ देखने में आया नहीं। संसद का सत्र अभी चल रहा है। उच्च सदन की प्रस्तावित कार्यवाही में कई महत्वपूर्ण विषय हैं, जिन पर विचार होने हैं। पूरे देश की आंखें इन पर लगी हैं। यह अलग बात है कि विभिन्न दलों के सांसदों के विरोध के कारण संसद की कार्यवाही अच्छी तरह से चल नहीं रही है। पर सचिन इस बीच जहां और जो करते दिखे, वह उनकी शख्सियत से जुड़े तमाम सम्मानों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। दिलचस्प है कि सचिन को इस दौरान ग्रेटर नोएडा के ऑटो एक्सपो में महंगी बीएमडल्यू कार का नया वर्जन लांच करते देखा गया।
सवाल है कि एक व्यक्ति जो भारत रत्न जैसे शीर्ष नागरिक सम्मान से सम्मानित और राज्यसभा सांसद है, उसे प्रोडक्ट लांचिंग या एंडोर्समेंट जैसे काम में शरीक होना चाहिए या नहीं। तकनीकी रूप से भले इसमें कुछ गलत न हो पर यह उस महान मूल्य और परंपरा के खिलाफ है, जिसका अब तक देश में एक तरह से निर्वहन होता रहा है।
इस बात से इनकार नहीं है कि भारत रत्न सम्मान देने में कई बार राजनीतिक पसंद-नापसंद का ध्यान रखा गया है। इसके बावजूद यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वालों में हरेक का कद कम से कम इतना ऊंचा तो जरूर रहा है कि वे देश केे सामने एक आदर्श के रूप में नजर आएं। इस फेहरिस्त में महान दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेेल, जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे, पंडित रविशंकर और उस्ताद विस्मिल्ला खां तक तमाम ऐसी विभूतियों के नाम शामिल हैं, जिनका कृतित्व और व्यक्तित्व काफी बड़ा रहा। दूसरी तरफ उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन के आचरण में इस मूल्य को बनाए रखा कि उनके किसी किए पर कोई विवाद या सवाल नहीं उठे।
सचिन तेंदुलकर को खुद को सौभाग्यशाली मानना चाहिए कि उन्हें यह सम्मान तब दिया गया, जब वे आयु और शरीर से काफी समर्थ हैं, ऊर्जावान हैं, नहीं तो देश की कई विभूतियों को तो जीते-जी यह सम्मान मिला भी नहीं। वैसे मरणोपरांत भारत रत्न से नवाजे जाने की परंपरा एक अलग विवाद को भी जन्म देती है। पर यह कहीं न कहीं यह भी दिखाता है कि कई लोगों के पूरे जीवन को देखने के बाद सरकार इस नतीजे पर पहुंची कि उन्हें भारत रत्न का सम्मान दिया जाना चाहिए। विनोबा और जेपी सहित ऐसे कई नाम हैं।
ग्रेटर नोएडा के ऑटो एक्सपो में सचिन तेंदुलकर जब राज्यसभा की बैठक को छोड़कर बीएमडब्ल्यू कार के नए वर्जन को अनावृत कर रहेे थेे तो उनकी हैसियत एक मॉडल या सेल्समैन से ज्यादा नजर नहीं आ रही थी। यह भारत रत्न का अपमान है कि इससे सम्मानित एक व्यक्ति महज कुछ रुपयों के लिए सार्वजनिक रूप से इस तरह पेश आए।
सचिन ने अपने जीवन में आमतौर पर ज्यादा कुछ सार्वजनिक रूप से कहा नहीं है। जब कभी भी उन्होंने ऐसा कुछ कहा है तो वे काफी संयमित और विवेकशील दिखे हैं। उन्होंने अपना देशप्रेम खेल के मैदान पर तो एकाधिक बार जाहिर किया है। मीडिया के सामने भी उन्होंने बार-बार यह कबूला है कि उनके लिए सबसे सम्मानजनक और संतोषजनक यही रहा कि उन्हें देश के लिए खेलने का मौका मिला और देशवासियों ने उनके खेल को इतना सराहा। अब जबकि सचिन एक खिलाड़ी से भी आगे देश के रत्न मान लिए गए हैं तो उन्हें भरसक इस बात का खयाल रखना पड़ेगा कि वे क्या करें और क्या नहीं।
भारत एक बहुत बड़ा देश है। यहां आज भी तमाम ऐसी समस्याएं और चुनौतियां हैं जो हमें एक खुशहाल और विकसित देश बनने से रोकती हैं। देश के नवनिर्माण में युवकों की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है। सचिन युवाओं के रोल मॉडल रहे हैं। वे युवाओं को राजनीतिक भले न सही पर शिक्षा और खेल के क्षेत्र में आगे लाने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। उनकी किसी पहल का न सिर्फ असर होगा बल्कि वह खासा कारगर भी साबित होगा। देशहित में कई मौकों पर उन्होंने कई ऐसे अभियानों में हिस्सा लिया भी है, जिससे एक स्वस्थ और खुशहाल भारत का निर्माण हो।
हम जीवन में लंबे समय तक पैसा, पद और प्रतिष्ठा के लिए तरसते हैं, इसके लिए कोशिश करते हैं पर ये फिर भी हमें हासिल नहीं होते। कर्म और सौभाग्य का मेल हर बार हो ही, यह जरूरी नहीं पर सचिन के जीवन में यह मेल है। यह उनके लिए गौरव की भी बात है और संतोष की भी। उन्हें इस गौरव और संतोष को मान देना चाहिए और कुछ भी ऐसा करने से बचना चाहिए जो उनके लिए अशोभनीय हो।

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

कामयाबी का सॉफ्टवेयर

मैं 46 साल का हूं। 22 सालों से शादीशुदा हूं। मेरे तीन बच्चे हैं। जो लोग मुझे जानते हैं वे कहते हैं कि मेरी पहचान मेरी जिज्ञासा और सीखने की उत्कंठा है। मैं जितनी किताबें पढ़ सकता हूं उससे कहीं ज्यादा किताबें खरीदता हूं। मैं जितने ऑनलाइन कोर्सेज कर सकता हूं, उससे कहीं ज्यादा कोर्सेज में दाखिला लेता हूं। परिवार, जिज्ञासा और ज्ञान की भूख ही मुझे परिभाषित करते हैं। ये बातें वह आदमी अपने बारे में अपने साथियों के साथ साझा कर रहा है, जिसे इस बात का फL हासिल होने जा रहा है कि दुनिया के कंप्यूटर और टेक्नॉलाजी के क्षेत्र की दिग्गज कंपनी माइक्रोसॉफ्ट का नया सीईओ होगा। दरअसल, हम बात कर रहे हैं सत्या नडेला की।
दुनिया की इस चौथी बड़ी कंपनी के प्रमुख बिल गेट्स ने सीईओ के रूप में सत्या के नाम की घोषणा करते हुए कहा, 'माइक्रोसॉफ्ट के सामने आज पहले से कहीं ज्यादा चुनौतियां हैं। लेकिन हमारे सामने ढेèरों मौके भी हैं और मुझे खुशी है कि उन मौकों को हासिल करने के लिए हमें एक मजबूत नेता मिला है।’ साफ है कि सत्या ने नाम, सम्मान और सफलता की यह ऊंचाई ऐसे ही नहीं हासिल की है।
पूर्व आईएएस अधकारी के बेटे सत्या 1992 में माइक्रोसॉफ्ट से जुड़े और कंपनी से मिली भूमिकाओं में खुद को साबित करते आए। उनकी अलग सोच और तेज रणनीति के नतीजे से कंपनी को अपनी साख और सफलता का ग्लोबल रकबा बढ़ाने में खासी मदद मिली। उन्होंने सर्च इंजन बिग और माइक्रोसोफ्ट ऑफिस के क्लाउड वर्जन ऑफिस 365 को लांच करने में अहम भूमिका निभाई है।
सत्या नडेला के माइक्रोसॉफ्ट का नया बॉस बनने पर भारत में भी काफी खुशी का आलम है। ऐसा इसलिए क्योंकि सत्या की पैदाइश भारत की है। उनका जन्म 1967 में हैदराबाद में हुआ। वे बचपन से ही काफी तेजस्वी और कुशाग्र थे। उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई से लेकर उच्चतर शिक्षा भी भारत में ही पूरी की। दिलचस्प है कि आज भले सत्या को कंप्यूटर तकनीक के क्षेत्र में एक बेहतरीन प्रतिभा के रूप में देखा जा रहा हो पर उनकी पहली पसंद कभी क्रिकेट खेलना था। अलबत्ता उनकी यही पसंद बाद में उनके लिए अलग तरीके से मददगार भी साबित हुई।
वे खुद कहते भी हैं, 'मुझे लगता है कि क्रिकेट से मैंने टीम में खेलने और नेतृत्व के बारे में सीखा और मेरे पूरे करियर में वह मेरे साथ रहा।’ आज जिस तरह के क्षेत्र में सत्या हैं उसमें प्रतिभा के साथ एकाग्रता और धैर्य की काफी जरूरत है। यही कारण है कि उन्हें आज भी फटाफट क्रिकेट की बजाय टेस्ट क्रिकेट देखना पसंद है। इसकी वजह बताते हुए वे कहते हैं कि दुनिया में कोई भी खेल इतने लंबे समय तक नहीं खेला जाता। यह बिल्कुल किसी रूसी नॉवेल को पढ़ने जैसा है। सत्या को उनकी नई नियुक्ति के लिए खूब सारी शुभकामनाएं।

 

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

खाकी पर भारी खादी

देश में इन दिनों सियासत खूब गरमाई हुई है। लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी दल ही सिर्फ अपने पत्ते फेंटने में नहीं लगे हैं बल्कि समाज के विभिन्न हिस्सों-तबकों में भी इसको लेकर दिलचस्पी खासी बढ़ गई है। सब कह रहे हैं कि इस बार का चुनाव देश की राजनीतिक धारा को वैकल्पिक मोड़ देगा, सो चुनावी मैदान में क्रांतिकारी मंसूबे के साथ कई अराजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग भी कूद रहे हैं। ऐसे ही नामों में एक बड़ा नाम है सत्यपाल सिंह का। सिंह ने अपनी सियासी पारी के लिए मुंबई पुलिस कमिश्नर के पद से इस्तीफा दे दिया है। माना जा रहा है कि वह भाजपा या आम आदमी पार्टी के टिकट पर अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर सत्यपाल सिह का कहना इतना भर है कि वह राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और विश्व शांति के लिए काम करना चाहते हैं। उनके ही शब्दों में, 'मैंने अभी यह तय नहीं किया है कि मैं किस पार्टी में शरीक होऊंगा। आपको दो से तीन दिन में इसके बारे में जानकारी मिल जाएगी।’ वैसे सत्यपाल भले अपने मुंह से कुछ न कहें पर उनको लेकर कयासबाजी खूब चल रही है। सूत्रों की मानें तो वे भाजपा के टच में हैं और पार्टी उन्हें उत्तर प्रदेश के मेरठ या बागपत सीट से लोकसभा उम्मीदवार बना सकती है। बता दें कि इससे पहले उन्होंने इशरतजहां एनकाउंटर केस में गुजरात हाईकोर्ट की एसआईटी की अगुवाई करने से इनकार कर दिया था।
इन संभावनाओं को पर लगने के पीछे कुछ और वजहें भी हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो पार्टी के बड़े नेताओं के साथ सिह की बातचीत पहले ही हो चुकी है। उनका भाजपा में शामिल होना तकरीबन तय है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पिछले दिनों उनकी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिह व पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ बातचीत हो चुकी है। इस बातचीत के बाद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को सिह से संपर्क साधने के लिए कहा था। सत्यपाल सिह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के भी करीबी बताए जाते हैं। वैसे उन्हें आम आदमी पार्टी से भी मुंबई से लोकसभा चुनाव लड़ने का ऑफर मिला है, ऐसी खबरें भी मीडिया के कुछ हल्कों में चल रही हैं।
29 नवंबर 1955 में मेरठ के बसौली में पैदा हुए सत्यपाल सिह की स्कूली पढ़ाई बागपत में हुई। इसके बाद उन्होंने मेरठ से रसायन विज्ञान में एमएससी और फिर एमफिल किया। रसायन शास्त्र के वैज्ञानिक बनने की ओर बढ़ रहे सिह पीएचडी करना चाहते थे, लेकिन अचानक उनका मूड बदल गया और उन्होंने आईपीएस की तैयारी शुरू कर दी। इस बीच वे ऑस्ट्रेलिया चले गए और वहां पर एमबीए करने लगे। एमबीए करने के दौरान भी उन्होंने आईपीएस बनने के लक्ष्य को छोड़ा नहीं। वापस भारत आए तो लोक प्रशासन में एमए किया और फिर इसी विषय में पीएचडी में दाखिला लिया। इसी दौरान उन्होंने आईपीएस की तैयारी तेज कर दी और परीक्षा पास कर ली।
सत्यपाल सिह महाराष्ट्र पुलिस में कई पदों पर रह चुके हैं। मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनाए जाने से पहले वह महाराष्ट्र के एडिशनल डीजीपी (लॉ एंड ऑर्डर) थे। इसके पहले वह पुणे और नागपुर के पुलिस कमिश्नर भी रह चुके हैं। इसके अलावा डेप्युटेशन पर वह सीबीआई में भी काम कर चुके हैं।
धर्म और अध्यात्म में तो खासतौर पर उनकी गहरी रुचि है। उन्होंने अध्यात्म व नैतिक मूल्यों पर कई किताबें भी लिखी हैं। पिछले साल उनकी किताब 'तलाश इंसान की’ का विमोचन अमिताभ बच्चन और जावेद अख्तर ने किया था।
बहरहाल, एक बात तो तय है कि सिंह ने जिस उम्मीद के साथ अपनी सियासी पारी खेलने का मन बनाया होगा, उसके पूरे होने के इस बार के लोकसभा चुनाव में आसार काफी हैं। अलबत्ता यह इस बात पर जरूर निर्भर करेगा कि वह किस पार्टी का झंडा थामते हैं। एक बात और यह कि सत्यपाल सिंह जैसे लोग अगर सियासी मैदान में उतर रहे हैं तो इससे देश की राजनीति के साफ-सुथरा और प्रभावी होने के आसार काफी बढ़
गए हैं।

परिवर्तन का दारोमदार महज आप पर नहीं


संभावनाओं के पूरे होने से ज्यादा जरूरी है, उनका बने रहना। जीवन और समाज का संभावना रहित होना खतरनाक है। ये बातें आज भारतीय राजनीति के संदर्भ में समझनी जरूरी है। इन दिनों देश में राजनीति काफी गरमाई हुई है। दो-तीन महीने में लोकसभा चुनाव होने हैं। दल और विचार की साझा ताकत सत्ता के गणित के आगे कमजोर पड़ रही है। बदलाव और विकल्प की सामयिक दरार को रेखांकित करने से तो किसी सियासी जमात को गुरेज नहीं है, पर इस पर पूरा जोर भी किसी का नहीं है। यह सब संभावनाओं के बड़े कैनवस को फिर से पुराने रंगों और चित्रों से भर जाने के अंदेशे की तरह है।
इस पूरी स्थिति को समझने के लिए थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो कई बातें साफ होंगी। बीते तीन सालों में भ्रष्टाचार को लेकर जो देशभर में आक्रोश दिखा, उसकी अगुवाई करने वाले नागरिक समाज के एक धड़े ने अपने सांगठनिक सामथ्र्य को राजनीतिक दल का रूप दिया। पर सत्ता तक पहुंचकर सत्तावादी आचरण को बदलने की अधीरता ने एक बड़ी कोशिश को कुछ ही महीनों में पटरी से उतार दिया। आम आदमी पार्टी के कार्यकताã और शुभचिंतक भी अब उससे कट रहे हैं। सदस्यता अभियान के नाम पर करोड़ का आंकड़ा छूने का दावा जरूर किया जा रहा है पर कमिटेड वर्क फोर्स के नाम पर पार्टी के पास गिनती के नाम हैं। यही नहीं महिला अस्मिता जैसे मुद्दे पर पार्टी की सोच और उसकीसरकार के मंत्री के आचरण की हर तरफ कठोर निंदा हो रही है। पार्टी के संस्थापक सदस्याओं में से एक मधु भादुड़ी सीधा आरोप लगा रही हैं कि पार्टी को कुछ लोगों ने हाईजैक कर लिया है। पार्टी के अंदर चुनाव जीतने और सत्ता की राजनीति करने का पागलपन इस कदर बढ़ गया है कि भिन्न स्वरों और वैकल्पिक रायों को पार्टी के अंदर कोई सुनने को तैयार नहीं है।
मधु आगे बढ़कर यहां तक कहती हैं कि इस पार्टी में और बातें तो छोड़ दीजिए महिलाओं को 'इंसान’ तक नहीं समझा जा रहा। गौरतलब है कि मधु आप के राष्ट्रीय अधिवेशन में खिड़की एक्सटेंशन में आधी रात को दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की अगुवाई में हुए महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक सलूक के मामले को उठाना चाहती थीं। उनकी मांग और मंशा इतनी भर थी कि पार्टी को इस मामले में अपनी चूक मान लेनी चाहिए और खुद से आगे बढ़कर माफी मांगनी चाहिए। पर माफी की बात तो दूर उन्हें इस मामले में पार्टी फोरम पर अपनी पूरी बात कहने तक से रोका गया।
आप से निकाले गए विधायक विनोद कुमार बिन्नी की राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को देखते हुए उनके उठाए सवालों को अगर एक किनारे कर भी दें तो भी एक बात तो साफ जाहिर हो रही है कि इस पार्टी ने अपने लिए जो उच्च राजनीतिक मानदंड तय किए थे, वह आज उस पर खुद खरी नहीं उतर रही है। ऐसा नहीं होता तो सरकार बनाने और तमाम अहम मुद्दों पर जनता की राय से अपना रुख तय करने वाली पार्टी अपने विधायक को बिना जनता से राय लिए कम से कम बाहर का रास्ता नहीं दिखाती।
आप को लेकर ये सारी बातें इसलिए क्योंकि उसके उदय और संघर्ष की परिघटना ने ही देश में राजनीतिक बदलाव और विकल्प की संभावना को रेखांकित किया था। भूले नहीं हैं लोग कि जब इस पार्टी ने दिल्ली में डेढ़ दशक से चल रही कांग्रेस सरकार को महज आठ सीट तक सीमित कर दिया तो राहुल गांधी ने मीडिया के सामने आकर बयान दिया कि आप से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। खासकर उसने जिस तरह कम समय में लोगों को अपने से जोड़ा। आज उसी राहुल गांधी की तरफ से अखबारों में विज्ञापन छप रहा है- 'अराजकता नहीं प्रशासन सुधार’। साफ है कि निशाने पर सीधे-सीधे खुद को अराजक कहने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार है। इससे पहले गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भी परोक्ष रूप से दिल्ली सरकार के कामकाज पर टिप्पणी कर चुके हैं।
दरअसल, अब सवाल यह नहीं है कि क्या आम आदमी पार्टी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और इतिहास बदलने की जल्दबाजी में देश में लोकतांत्रिक परिवर्तन की एक बड़ी संभावना हाशिए पर खिसकती जा रही है, खारिज होती जा रही है? नया सवाल तो यह है कि क्या संभावना और उसके बूते परिवर्तन की ऐतिहासिक पटकथा लिखने का लाइसेंस सिर्फ आप और उसके मुट्ठी भर नेताओं के पास है। पिछले एक महीने में दिल्ली की सड़कों से लेकर सचिवालय के अंदर-बाहर दिखी नौटंकी ही क्या देश के भविष्य के चित्र हैं? निश्चित रूप से इसका जवाब नहीं है।
देश में परिवर्तन की गहराती संभावनाओं की बात इसलिए नहीं शुरू हुई कि ऐसा सिविल सोसायटी की नुमाइंदगी करने वाले कुछ लोग या कोई पार्टी ऐसा कह रही थी। दरअसल, इसके पीछे बीते कुछ सालों में देश की सड़कों पर बार-बार खुलकर प्रकट हुई वह जनाकांक्षा रही, जिसने लोकतंत्र में जन साझीदारी की दरकार के लिए सियासी जमातों के आगे खासा दबाव बनाया। बाकी दलों औरआप में फर्क बस यह रहा कि बाकी ने इस सामयिक दरकार को गंभीरता से नहीं लिया और आप ने इसे अपना एजेंडा बना लिया। यह अलग बात है कि सत्ता की राजनीति में उतरी यह नई पार्टी भी अब अपने इस एजेंडे को लेकर पहले की तरह गंभीर नहीं है।
यह स्थिति उन तमाम दलों के लिए चूक सुधार के एक मौके की तरह है जो कल तक आप के सियासी उदय को अपने लिए कहीं न कहीं खतरा मान रहे थे। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से लेकर कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय ठहराए जाने वाले नेता राहुल गांधी को इस बाबत खासतौर पर ध्यान देना चाहिए। इन दोनों नेताओं पर ही कहीं न कहीं दारोमदार है कि वे लोकसभा चुनाव के एजेंडे को क्या शक्ल देते हैं। जनता पर नहीं बल्कि जनता के साथ मिलकर शासन चलाना, सत्ता का विकेंद्रीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर पहल के साथ अगर देश की दोनों चोटी की पार्टियां अपनी तैयारी और सोच के साथ इस बार जनता के सामने वोट मांगने जाएं तो यह जनभावना के अनुरूप होगा। साथ ही यह देश में पारंपरिक की जगह वैकल्पिक राजनीति के प्रयोग की बड़ी मुश्किल से बनी संभावना को एक अंजाम तक पहुंचाने के ऐतिहासिक अभिक्रम से जुड़ने जैसा भी होगा।
चुनाव के दौरान स्वार्थपूणã गठजोड़ और एक दूसरे के खिलाफ तीखे व घटिया आरोप-प्रत्यारोप का अतिवाद अब निश्चित रूप से दरकना चाहिए। इतिहास और विचार के तमाम सुलेखों को अपने नाम दर्ज होने का दावा करने वाली देश की दोनों महत्वपूर्ण पार्टियों को यह साहस दिखाना चाहिए कि वे एक-दूसरे से बेहतर संभावना के नाम पर भिड़ें न कि घटिया सियासी सलूक के नाम पर।
 

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

अरब की स्त्री और फेकी

भारत बाजार के लिए भले पिछले दो दशकों में ज्यादा उदार हुआ हो पर विचार के क्षेत्र में उसकी उदारता काफी पहले से रही है। भारतीय चिंतन का चरित्र समन्वयवादी इसलिए है क्योंकि नए विचारों का हमने हमेशा खुले हाथों से स्वागत किया है। बहरहाल, ये बातें यहां इसलिए क्योंकि हम चर्चा करने जा रहे हैं एक ऐसी लेखिका की जो भारतीय नहीं हैंऔर न ही भारतीय जीवन और समाज को लेकर उन्होंने कोई उल्लेखनीय कार्य किया है। पर उन्हें पढ़ने-सुनने के लिए यहां के प्रबुद्ध लोगों में गजब का आकर्षण है।
दरअसल, हम बात कर रहे हैं ब्रितानी लेखिका और पत्रकार शिरीन एल फेकी की। शिरीन का अरब की महिलओं को लेकर अध्ययन काफी चर्चित रहा है। उनकी किताब है 'सेक्स एंड दी सिटेडेल : इंटीमेट लाइफ इन ए चेंजिग अरब वर्ल्ड’। इसमें उन्होंने अरब की महिलाओं के जीवन के अंतरंग अनुभवों को बेबाकी से सामने रखा है। दिलचस्प है कि महिलाओं को लेकर अरब का समाज आज भी बहुत खुला नहीं है। वहां पर्दा प्रथा जैसी तमाम मध्यकालीन परंपराएं और मान्यताएं आज भी प्रचलन में हैं, जो वहां की महिलाओं को बाहरी दुनिया में खुलकर सांस लेने से रोकती हैं।
शिरीन पिछले दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शिरकत करने आई थीं। वहां एक संवाद सत्र में उन्होंने कहा कि लोगों को उनका काम इसलिए आकर्षक लगता है क्योंकि इसका केंद्रीय विषय सेक्स है। पर यह उनके काम को महत्वहीन करने वाला नजरिया है। इस तरह के नजरिए के कारण महिलाओं के जीवन से जुड़ी कई समस्याओं और उनके उत्पीड़न के मुद्दों को सही तरीके से समझने की कोशिश अनावश्यक रूप से प्रभावित होती है।
फेकी ने कहा कि सेक्स पर बातें करते हुए मैंने अरब दुनिया में पांच वर्ष बिताए हैं। कई लोग यह सोच सकते हैं कि यह दुनिया का बेहतरीन काम है। पर ऐसा नहीं है क्योंकि वे अरब की महिलाओं की जिंदगी के उन पन्नों को खोलना चाहती थीं, जिसके बारे में आमतौर पर बात नहीं होती है।
अपने बारे में फेकी बताती हैं कि वे ब्रितानी जरूर हैं पर उनकी परवरिश वहां नहीं हुई। उनके पिता वेल्स के और मां मिस्त्र की हैं। मां-पिता के कनाडा चले जाने के कारण उनकी पढ़ाई भी बाहर ही हुई। सितंबर 2००1 में अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी हमला होने तक उन्होंने अरब दुनिया के साथ कभी कोई जुड़ाव महसूस नहीं किया था। पर इसके बाद इस्लामी मुल्कों, खासतौर पर अरब की महिलाओं के जीवन को लेकर उनके मन में कई तरह की जिज्ञासा और सवाल पैदा हुए।
फेकी को जब 'द इकोनामिस्ट’ अखबार के लिए स्वास्थ्य संवाददाता के रूप में काम करने का मौका मिला तो उन्होंने एचआईवी पर एक महत्वपूर्ण स्टोरी की। इसी क्रम में पुरातनपंथी मूल्यों वाले अरब मुल्कों की महिलाओं के साथ उन्हें बातचीत का मौका मिला।
फेकी का मानना है कि समाज का व्यवहार शयनकक्ष के बंद दरवाजे के पीछे जो कुछ घटित होता है, उससे गहरे तौर पर जुड़ा होता है। पर लोग इश बात को गहराई से नहीं समझते हैं।
अरब की महिलाएं इस लिहाज से बाकी दुनिया से कतई अलग नहीं हैं कि प्यार और संवेदना को लेकर उनका दिलो दिमाग किसी और तरह की बनावट का है। बल्कि सच तो यह है कि यहां की महिलाओं की जीवन के कुछ कोमल अनुभवों को लेकर आपबीती इतनी खुरदरी और उत्पीड़न भरी है कि उसके बारे में जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
फेकी कहती हैं कि अरब मुल्कों की महिलाओं के बारे में आमतौर पर जिस तरह की बातें की जाती हैं, वह सचाई से निहायत परे हैं। अगर आज आधी दुनिया लैंगिक समानता और देह पर अधिकार जैसे महिलावादी तकाजों पर मुट्ठी बांध रही हैं तो उसमें अरब की महिलाओं का संघर्ष अलग से रेखांकित होना चाहिए। फेकी भी इस तकाजे को ही अपना लेखकीय मिशन मानती हैं।

संबोधन में छिपा चिंताओं का समाधानकारी सार

देश ने जब इस बार 65वां गणतंत्र दिवस मनाया तो उसके मन में उल्लास के साथ कई सवाल भी थे। ये सवाल भी कोई रातोंरात पैदा हुए हों, ऐसा नहीं है। अलबत्ता यह जरूर है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जिस तरह कुछ मुद्दों और खतरों को रेखांकित किया, उनसे ये सवाल एकदम से सतह पर आ गए। राष्ट्रपति महोदय ने देश के लोकतंत्र को लेकर यह चिंता जताई है कि एक तरफ तो जनता गुस्से में है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर अराजकतावादी आचरण दिख रहे हैं।
सनसनी पैदा करने की गरज से राष्ट्रपति के इस संबोधन की कुछ लोग मन माफिक व्याख्या कर रहे हैं। इसमें मीडिया का भी एक तबका शामिल है। दरअसल, इस स्थिति को समझने के लिए हमें बीते कुछ सालों के घटनाक्रमों को देखना होगा। देश का नागरिक समाज जनता को साथ लेकर इस दौरान एक नए तरह के लोकमत के निर्माण में लगा है। लोकमत निर्माण की यह प्रक्रिया प्रतिक्रियावादी और सुधारवादी दोनों है। प्रतिक्रियावादी इस लिहाज से कि इसमें एक तरफ तो इस बात की खीझ है कि सत्ता और जनता का साझा आचरण बदल गया है। केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें 'जनता का शासन’ चलाने की बजाय 'जनता पर शासन’ कर रही हैं। नतीजतन सरकारी सोच और काम की प्राथमिक शर्त अब न तो लोक कल्याणकारी है और न ही पारदर्शी। इस स्थिति पर देश के प्रथम नागरिक ने भी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है, 'यदि भारत की जनता गुस्से में है, तो इसका कारण है कि उन्हें भ्रष्टाचार तथा राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी दिखाई दे रही है।’
देश के नागरिक समाज ने इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ लोकतांत्रिक दरकारों और सरोकारों को बार-बार रेखांकित किया है। इसमें सबसे अहम् मुद्दा है प्रातिनिधिक लोकतंत्र के ढांचे को संभव स्तर तक प्रतिभागी बनाना। जनलोकपाल आंदोलन के प्रकटीकरण के पीछे के कारणों को अगर समझें तो साफ होता है कि जनता अपने लिए सुविधा ही नहीं नीति और कानून निर्माण के लिए भी सड़क पर उतर सकती है। महज इतना ही नहीं, सरकार के आगे जनता इस बात का भी लोकतांत्रिक दबाव बना सकती है कि वह महज उसके लिए नहीं बल्कि उसके साथ बैठकर जरूरी फैसले करे।
दिलचस्प है कि अराजनीतिक रूप से चल रही इस तरह की सुधारवादी कोशिश ने अब राजनीतिक विकल्प की भी शक्ल ले ली है। पर एक बड़ी कोशिश के ठोस विकल्प बनने की प्रक्रिया सघन और सुचिंतित होनी चाहिए। दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की जीत और फिर सरकार बनाने की घटना काफी अफरातफरी भरी रही है। आप ने जिस तरह के वादे जनता से किए और फिर सरकार बनाने के बाद वह जिस तरह अराजक स्थितियों को जन्म दे रही है, उसने कई सवाल खड़े किए हैं।
इस स्थिति पर राष्ट्रपति की टिप्पणी गौरतलब है। उनके ही शब्दों में, 'चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं। जो लोग मतदाताओं का भरोसा चाहते हैं, उन्हें केवल वही वादा करना चाहिए जो संभव है। सरकार कोई परोपकारी निकाय नहीं है। लोकलुभावन अराजकता, शासन का विकल्प नहीं हो सकती।’
देश की मौजूदा स्थिति और राजनीतिक स्तर पर बदलाव की कम-ज्यादा संभावनाओं के बीच देश के प्रथम नागरिक की टिप्पणियों और चिंताओं पर जब विचार करते हैं तो इससे काफी हद तक समाधान मिलता है। हालांकि यहीं से कुछ नए सवालों का प्रस्थान बिंदु भी तैयार हो जाता है। समाधान की बात यह है कि जैसा कि महामहिम खुद कहते हैं, 'मैं निराशावादी नहीं हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि लोकतंत्र में खुद में सुधार करने की विलक्षण योग्यता है। यह ऐसा चिकित्सक है जो खुद के घावों को भर सकता है और पिछले कुछ वर्षों की खंडित तथा विवादास्पद राजनीति के बाद 2०14 को घावों के भरने का वर्ष होना चाहिए।’
सवालों की नई जमीन इस पर तैयार हो गई है कि राष्ट्रपति को अभी ये सारी बातें कहने की जरूरत क्यों पड़ी। क्या इससे पहले का देश का लोकतांत्रिक इतिहास उन चिंताओं से सर्वथा मुक्त रहा, जिस पर आज चिंता जताई जा रही है? क्या देश लोकतांत्रिक संस्थाओं के अवमूल्यन की इमरजेंसी जैसी हिमाकत तक पहुंच गया है? क्या सरकारी अराजकता का नया खतरा 1984 में सिख दंगों के दौरान 'एक बड़ा पेड़ गिरने पर धरती के स्वाभाविक कंपन’ से भी बड़ा है? सवाल यह भी कि लोकतंत्र क्या इतना लकीर का फकीर है कि उसे आंदोलन और बदलाव जैसी स्थितियां या तो असंवैधानिक लगती हैं, या फिर अमर्यादित?
बहरहाल, इस मुद्दे पर यह तो मानकर ही चलना चाहिए कि राष्ट्रपति महोदय ने जो भी बातें कहीं, वह किसी एक घटना, सरकार या पार्टी तक सीमित न होकर संपूर्ण राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण होंगी, नहीं तो अनावश्यक विवाद पैदा होगा। अलबत्ता इस पूरे विमर्श में कुछ चीजें पहले से जरूर साफ होनी चाहिए। एक तो यह कि बीते दो-तीन सालों में जनता एकाधिक बार सरकार के खिलाफ अपने आक्रोश को लेकर सड़कों पर उतरी तो विरोध प्रदर्शन का यह तरीका हर लिहाज से अहिंसक था।
लिहाजा, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि कम से कम जनता की मन:स्थिति अब भी हिंसक या अराजक नहीं है। रही दिल्ली की आप की सरकार और उसके कामकाज के तौर-तरीके की तो इस बारे में सर्वसम्मत सराहना की स्थिति तो कतई नहीं है। यह जरूर है कि सरकार और जनता के बीच साझेदारी बढ़ाने के लोकतांत्रिक तकाजे को जरूर आप ने फिर से रेखांकित किया है। क्योंकि कम से कम यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल को देखें तो इस दौरान न सिर्फ जनता की नजरों में सरकार की विश्वसनीयता में कमी आई है बल्कि पूरी राजनीतिक जमात की साख पर भी बट्टा लगा है।
सार्वजनिक जीवन की गरिमा में आए इस तरह के ह्रास को सादगी और ईमानदारी जैसी कुछ कसौटियों पर चुनावी चुनौती की पटकथा जिस तरह आप ने दिल्ली में लिखी और आगे लोकसभा चुनाव में उसके विस्तार को लेकर वह जिस तरह से ललक से भरी है, वह थोड़ा सोचने पर मजबूर करती है। आज हर तरफ से आप को इस सवाल से दो-चार होना पड़ रहा है कि उसकी वैचारिक अवधारणा का सार क्या है। कोई क्रांति कम से कम विचार शून्यता से तो नहीं पैदा हो सकती है। ऐसे लोग चुनावी राजनीति में जनता को विकल्प के नाम पर गुमराह भी कर सकते हैं। इस स्थिति पर चिंता महामहिम ने भी जताई है- 'चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं।’ राष्ट्रपति का यह कथन उन सवालों का जवाब और चिंताओं का समाधानकारी सार है, जिस पर उनकी ही कही कुछ बातों के बाद हर तरफ चर्चा हो रही है।