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Monday, August 13, 2012

ओबामा का श्याम-श्वेत


अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में सौ से भी कम दिन रह गए हैं। जो हालिया सर्वे वहां हुए हैं, उसमें बराक ओबामा अपने प्रतिद्वंद्वी मिट रोमनी पर बढ़त बनाए हुए हैं। आज की तारीख में अमेरिका में अन्य किसी मुद्दे से बड़ा मुद्दा है आर्थिक संकट। तकरीबन 36 फीसद अमेरिकियों को भरोसा है कि ओबामा में ही वह दमखम और विवेक है, जिससे इस चुनौती से निपट सकता है। वैसे इस चुनाव को हार-जीत से अलग कुछ अन्य संवेदनशील मुद्दों की रोशनी में भी देखा जाना चाहिए। दिलचस्प है कि ओबामा भले अपने नेतृत्व की सर्व-स्वीकार्यता के लिए शुरू से सजग रहे हों पर अब भी अमेरिका सहित बाकी दुनिया में उनकी एक बड़ी छवि अश्वेत राजनेता की भी है। जब पहली बार वह राष्ट्रपति बने तो उनकी जीत को अमेरिकी समाज के उस लोकतांत्रिक खुलेपन के रूप में भी देखा गया, जिसमें एक अश्वेत भी व्हाइट हाउस में दाखिल हो सकता है। कुछ लोगों की यह शिकायत है कि ओबामा ने अपने कार्यकाल में ऐसा कुछ खास नहीं किया, जिससे अमेरिकी समाज में अब भी विभिन्न मौकों और सलूकों में जाहिर होने वाली नस्लवादी मानसिकता को बदला जा सके।
हाल का ही एक मामला है, जिसमें वहां एक चर्च के पादरी ने एक अश्वेत जोड़े का विवाह कराने से मना कर दिया। यह जोड़ा मिसीसिपी के क्रिस्टल स्प्रिंग्स में फस्र्ट बैपटिस्टि चर्च में जाता रहा था लेकिन श्वेतों की प्रधानता वाले इस चर्च ने दबाव में आकर शादी की तय तारीख से एक दिन पूर्व अश्वेत जोड़े की शादी कराने से इनकार कर दिया। दलील यह दी गई कि 1883 में स्थापित होने के बाद से इस चर्च में आज तक किसी अश्वेत जोड़े की शादी नहीं कराई गई है। पादरी स्टैन वीदरफोर्ड ने कहा कि चर्च के कुछ सदस्यों ने पहले से चली आ रही परंपरा को तोड़ने के प्रति सख्त एतराज जताया। इन लोगों ने पादरी को धमकाया कि अगर उसने परंपरा भंजन का दुस्साहस किया तो उसे पादरी पद से हटाया तक जा सकता है।
देखने में यह भले एक आपवादिक मामला लगे पर अमेरिकी समाज की वास्तविकता इससे बखूबी उजागर होती है। श्वेत-अश्वेत का मुद्दा अब भी वहां विवाह जैसे फैसलों को प्रभावित करते हैं। वहां की कुल आबादी में अश्वेतों की गिनती 13 फीसद है। ओबामा की 2008 की जीत में इस आबादी के 96 फीसद वोट ने बड़ी भूमिका निभाई थी। अब जबकि  ओबामा ने मुख्यधारा की या यों कहें कि कथित नए और खुले अमेरिकी समाज की नुमाइंदगी के नाम पर समलैंगिक संबंधों तक पर अपनी पक्षधरता जाहिर करने में हिचक नहीं दिखाई है तो उनका अश्वेत वोट बैंक इससे काफी खफा है। पर वहां की अश्वेत आबादी के पास इस संतोष और फख्र का कोई विकल्प नहीं है कि वह एक अश्वेत की जगह किसी दूसरे को राष्ट्रपति पद तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाए। अमेरिकी अश्वेत समाज का यह धर्मसंकट बराक ओबामा के दोबारा राष्ट्रपति बनने की राह को और आसान बना सकता है।

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