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रविवार, 24 जुलाई 2011

इंडिया को पढ़िए फेसबुक पर


फेस टू फेस बात करने में यकीन करने वाले चौक जाएं। जमाना फेस टू फेस होने का नहीं बल्कि फेसबुक में दिखने और दर्ज होने का है। अपने इंडिया को तो यह फेसबुक इतना पसंद है कि इसको इस्तेमाल करने वाले टॉप टेन देशों में न सिर्फ उसका शुमार है बल्कि उसका स्थान भी बहुत नीचे नहीं बल्कि चौथा है।  देश में दस करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर्स बताए जाते हैं जिनमें करीब तीन करोड़ फेसबुक के रसिया हैं। इस सूची में अमेरिका 15 करोड़ से ऊपर की गिनती के  साथ अव्वल है। नए आंकड़ांे के अनुसार दूसरे नंबर पर इंडोनेशिया (3,88,60,460), तीसरे पर यूनाईटेड किंगडम (2,98,80,860) है। भारत में 2,94,75,740 लोगों के पास फेसबुक आईडी है। तीसरे और चौथे स्थान के बीच फासला बहुत मामूली है और जो स्थिति है उसमें भारत कभी भी अपनी पोजिशन सुधार कर चार से तीन नंबर पर आ सकता है।
पूरी दुनिया में फेसबुक के कुल यूजर्स की संख्या लगभग 75 करोड़ है। दरअसल, यह एक नया गणतंत्र है- फेसबुकिया गणतंत्र।  21वीं सदी का अपना नया गणतंत्र। यह अलग बात है कि इस नए डेमोक्रेटिक सोसाइटी के एक्चुअल बिहेवियर को एक्जामिन होना अभी बाकी है। अब तक इस नए डेमोक्रेसी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां एक्शन से ज्यादा तेज रिएक्शन है। बात ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की हो या लीबिया में सत्ता पलट के आंदोलन की, यह रिएक्शन हर जगह दिखता है। लीबिया मामले में तो अभी यह साफ होना भी बाकी है कि फेसबुक पर जनचेतना दिखी या जनचेतना का रिएक्शन फेसबुक पर प्रकट हुआ।  
दिलचस्प है कि संवाद के पुराने बिरसे को बहाल करने वालों में भी कई आधुनिकों ने अपने रुदन और विचार प्रसंग के लिए इंटरनेट को ही आैजार बनाया है। यही नहीं लोक अभियान के बूते चलने वाले लोकपाल बिल को लेकर चलने वाले अभियान का जंतर-मंतर भी इन्हीं फेसबुक, मोबाइल मैसज और इंटरनेट जैसे नए साइबर डाकियों के हवाले है। पर इतना तो आज भी कहना पड़ेगा कि यह सब सच इंडिया का है भारत का कतई नहीं। यह अलग बात है कि इस दौरान जहां इंडिया का साइज बढ़ा है, वहीं भारत के वासी और हिमायती कम हुए हैं, अलग-थलग पड़े हैं। भारत का संघर्ष आज भी 'बसपा' (बिजली, सड़क और पानी) के एजेंडे को ही साधने में पसीना बहा रहा है।  ऐसे में संवाद और मीडिया के माहिरों को बजाय इसके कि साइबर सरमाया कितना बढ़ गया है कुछ सवालों के जवाब जरूर देने चाहिए।
सबसे अहम सवाल तो यही कि संवाद क्रांति के दौर का अगर यह क्लाइमेक्स है तो आगे के सफर का हासिल क्या होगा? क्योंकि भी यही यह आलम है कि अगर हम महज दो मिनट में इंटरनेट पर डाउनलोड हुए वीडियो को देखने बैठें तो पूरे दो दिन का समय निकालना होगा। साफ है कि साइबेर दुनिया में अब पहले की तरह उड़ान संभव नहीं क्योंकि यहां भी अब जाम है, जमावड़ा है और भारी रेलमपेल मची है।  वैसे समझना यह भी होगा कि यह कि ईमेल से शुरू होकर फेसबुक तक पहुंची कामयाबी, क्या मनुष्य की संवादप्रियता के सामाजिक तथ्य पर मुहर लगाता है या फिर यह भीड़ और शोरोगुल से जानबूझकर दूर रहकर दुनिया को अपने तरीके से अकेले देखने-सुनने की स्वच्छंदता का आलम है। एक तकनीकी सवाल यह भी कि फेसबुक पर एकाउंटेबल होने वाली पीढ़ी के गोपन बनाम ओपन के संघर्ष में विजय पताका किसके हाथ लगी। बहरहाल, एक बात तो तय है कि तकनीक और फैटेंसी के मानवीय सरोकारों ने 21वीं सदी के आगाज को काफी हद तक अपने कब्जे में ले लिया है। आगे चलकर यह जिम्मेदारी इतिहास की होगी कि वह इसका अंजाम किसी फेसबुक में दर्ज कराता है कि कहीं और।

साभार : राष्ट्रीय सहारा


1 टिप्पणी:

  1. आपने एक गहन चिंतन करती और बहुत से सवाल उठाती पोस्ट हमारे सामने रखी है । यकीनन इसे पढने के बाद सब इसका उत्तर अपने अपने पहलू में झांककर ही तलाशना चाहेंगें ..चिंतनीय बातें

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