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Wednesday, September 3, 2014

एक शब्द के चोरी होने का दर्द


हिदी का एक शब्द आजकल मुझे बहुत परेशान करता है। खासतौर पर उसका इस्तेमाल। यह शब्द है- 'उदार’। इसी से बना दूसरा शब्द है- 'उदारवाद’। 'उदार’ शब्द का इस्तेमाल हाल तक मानवता के श्रेष्ठ गुण के लिए किया जाता था। ईश्वर और ईश्वर तुल्यों के लिए जिस गुण विशेष का आज तक इस्तेमाल होता रहा, वह शब्द हमारे देखते-देखते समय और परंपरा के सबसे संवेदनहीन दौर के लिए समर्पित कर दिया गया।
दरअसल, शब्दों का भी अपना लोकतंत्र होता है और यह लोकतंत्र किसी भी राजकीय या शासकीय लोकतंत्र के मॉड्यूल से ज्यादा लोकतांत्रिक होता है। शब्दों की दुनिया में वर्चस्व या एकाधिकार की गुंजाइश नहीं। परंपरा और व्यवहार का समर्थन या विरोध ही यह तय करता है कि कौन सा शब्द चलेगा और कौन सा नहीं।
शब्द हमारी अभिव्यक्ति के साथ-साथ हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास, हमारी परंपरा और हमारे समाज से गहरे जुड़े हैं। शब्दों का अध्ययन हमारे चित्त, मानस और काल के कलर और कलई की सचाई को सबसे बारीकी से पकड़ सकता है।
'उदार’ शब्द के अपहरण -चोरी भी कह सकते हैं- की स्थितियों को थोड़ा समझना चाहें तो कई बातें साफ होती हैं। आंखों से काजल चुराने वाले सियाने भले अब पुरानी कहानियों, कविताई और मुहावरों में ही मिलें पर ग्लोबल दौर की चोरी और चोर भी कम नहीं हैं।
चोरी एक ऐसा कर्म है जिसका इस्तेमाल विचार से लेकर संस्कार तक हर क्षेत्र में होता रहा है। जाहिर है, जिस परंपरा का विस्तार और प्रसार इतना व्यापक हो, उसके डाइमेंशन भी एक-दो नहीं बल्कि अनगिनत होंगे। नए दौर में चोरी को लेकर एक फर्क यह जरूर आया है कि अब चोरी अपनी परंपरा से विलग कर आधुनिक और ग्लोबल कार्रवाई हो गई है। इस फर्क ने चोरी के नए और बदलावकारी आयामों को हमारे सामने खोला है।
अब इस काम को करने के लिए किसी तरह के शातिराना तर्जुबे की दरकार नहीं बल्कि इसे ढोल-धमाल के साथ उत्सवी रूप में किया जा रहा है।
जाहिर है कि चोरी अब सभ्य नागरिक समाज के लिए कोई खारिज कर्म नहीं रह गया है और न ही इसका संबंध अब धन-संपदा पर हाथ साफ करने भर से रह गया है। स्वीकार और प्रसार के असंख्य हाथ अब एक साथ चोर-चोर चिल्ला रहे हैं पर खौफ से नहीं बल्कि खुशी-खुशी। वैसे यहां यह गौर करने वाली बात होगी कि 'उदारवाद’ के विरोधी भले विकास के नाम पर बाजार की चालाकी और उपभोक्ता क्रांति के नाम पर चरम भोग की प्रवृत्ति को मुद्दा बनाएं, पर विरोध के उनके एजेंडे में भी इस तरह की चोरी शामिल नहीं है।
बात ज्यादा दूर की नहीं बल्कि अपने ही देश और उसके सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बोली-भाषा की की जाए तो ग्लोबल चोरी सर्ग में इसके कई शब्द देखते-देखते अपने अर्थ को छोड़ अनर्थ के संग हो लिए। मानवीय सुंदरता की जगह, बात सड़कों की और शहरों की सुंदरता की होती है। विकास और बाजार ने मिलकर सबके ऊपर एक ऐसा छाता ताना है कि इसके भीतर समाने के लिए सारे मरे जा रहे हैं। शब्दों से खिलवाड़ हो ही रहा है तो आप खेल-खेल में इसे सबको ललचाने वाली 'ग्लोबल छत्रछाया’भी कह सकते हैं।

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