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Wednesday, April 9, 2014

रायबरेली में अजय

 प्रेम प्रकाशअनजाने वे कल भी नहीं थे पर अब अचानक चर्चित हो गए हैं। टीवी चैनलों पर बैठकर इंटरव्यू दे रहे हैं। गूगल सर्च इंजन पर उनके नाम के साथ रायबरेली जोड़ दें तो 65 हजार से ऊपर वेब पेज खुल जाते हैं। भारतीय विज्ञापन की दुनिया के पुरोधा कहे जाने वाले एलेक पद्मसी के शब्दों में कहें तो यह लाइफ का एक ऐसा टर्न है जिससे आपकी शख्सियत का टर्नओवर आसमान छूने लगता है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं जाने-माने वकील अजय अग्रवाल की। इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें रायबरेली से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ उतारा है। भाजपा का यह फैसला सोनिया के लिए कितनी चुनौती भरा है, इसके विश्लेषण की बहुत दरकार नहीं है। अन्य पार्टियां भी अजय की उम्मीदवारी को सोनिया के खिलाफ बहुत गंभीरता से नहीं ले रही हैं। पर अगर बात करें अग्रवाल की तो वे रायबरेली के चुनाव में अभी से अपने को अजय मानकर चल रहे हैं।
दरमियाना कद-काठी। आमतौर पर मुखरता के साथ बातें करने वाले। पर आत्मविश्वास से ज्यादा बड़बोले अजय अग्रवाल रायबरेली की चुनावी जंग में उतरने से पहले तब-तब चर्चा में आते रहे जब-जब देश में भ्रष्टाचार का कोई मामला खुला। अपने करीबियों के बीच पीआईएल के चैंपियन माने जाने वाले अग्रवाल बोफोर्स स्कैंडल से लेकर अब्दुल करीम तेलगी के फर्जी स्टांप घोटाले तक में अदालत में याचिकाकर्ता हैं। बीते कुछ सालों में कई बार मीडिया की सुर्खियों में आए सीडब्ल्यूजी घोटाला और बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ ताज कोरिडोर मामले को भी अदालत तक ले जाने वाले वही हैं। उन्होंने सिर्फ इन मामलों पर अदालती कार्यवाही के रास्ते खोले बल्कि आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई को भी मुमकिन अंजाम तक पहुंचाकर दम लिया।
इस तरह से 49 बरस के अग्रवाल की एक इमेज भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वाले एक योद्धा की भी बनती है। पर शायद खुद अग्रवाल को अपनी पहचान के इतने सीमित रकबे पर संतोष नहीं। तभी तो जैसे ही रायबरेली से उनके भाजपा कैंडिडेचर पर मुहर लगी, उनकी महत्वाकांक्षा सातवें आसमान पर पहुंच गई। मीडिया से बातचीत में उन्होंने सोनिया के खिलाफ अपनी जीत को तो पक्का माना ही, यह भी कह डाला कि उनके चुनावी मैदान में उतरने से जो एक पॉलिटिकल वाइब्रेशन हुआ है, उसमें भाजपा यूपी में 5० से 6० सीटें तक अपनी झोली में डाल सकती है। दिलचस्प है कि अग्रवाल आज पॉपुलरिटी चार्ट में अपनी मौजूदगी से भले गद्गद हों पर उनकी इस तरह की बड़बोली प्रतिक्रियाएं उनके व्यक्तित्व के हलकेपन को जाहिर करती हैं।
अजय अग्रवाल लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व एसिस्टेंट प्रोफेसर चंद्र प्रकाश अग्रवाल के बेटे हैं। चंद्र प्रकाश आरएसएस से जुड़े रहे। वे भूतपर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा से सीनियर थे। जाहिर है कि अजय अग्रवाल को अपने घर-परिवार से एक ऐसी विरासत तो मिली ही, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र में लोकप्रिय होने की ललक उनके अंदर स्वाभाविक तौर पर पैदा होती। अस्वाभाविक संघ और भाजपा से उनकी नजदीकी भी नहीं, क्योंकि पिता के कारण यह उनके लिए सबसे सुलभ राह थी। यूपी के शाहजहांपुर और मुरादाबाद से निकलकर अग्रवाल आज एक जुआरी की तरह उस मैदान में उतर गए हैं, जहां दांव अगर थोड़े भी ठीक पड़े तो फिर बल्ले-बल्ले। राजनीति की माया है ही ऐसी।
बात करें सोनिया से अग्रवाल के मुकाबले की तो इसकी पटकथा बहुत नई भी नहीं है। बोफोर्स दलाली के खिलाफ जब वे अदालती लड़ाई लड़ रहे थे तभी से कहीं न कहीं कांग्रेस अध्यक्ष उनके निशाने पर रहीं। इस सौदे में हुए भ्रष्टाचार की सीधी आंच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक पहुंची थी। यही नहीं, इस घोटाले के सीधे तार सोनिया से जुड़े होने का दावा किया गया था। इसी कारण से अग्रवाल कहते भी हैं कि सोनिया के खिलाफ उनका संघर्ष आज का नहीं बल्कि सालों पुराना है। बहरहाल, यह देखना तो वाकई दिलचस्प होगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष के खिलाफ उतरने वाले अग्रवाल रायबरेली के चुनाव को एकतरफा से दोतरफा बनाने में कितने कामयाब होते हैं।
 

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