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सोमवार, 4 अगस्त 2014

अण्णा नहीं हो सके शर्मीला


हम अपने दौर को लेकर लाख खफा हों। कोफ्त से भरे हों। पर मौजूदा दौर के कसीदे पढ़ने वाले भी कम नहीं। यह और बात है कि ये कसीदाकार वही हैं, जिन्हें हमारे देशकाल ने कभी अपना प्रवक्ता नहीं माना। दरअसल, 'चरम भोग के परम दौर’ में मनुष्य की निजता को स्वच्छंदता में रातोंरात जिस तरह बदला, उसने समय और समाज की एक क्रूर व संवेदनहीन नियति कहीं न कहीं तय कर दी है। ऐसे में एक दुराग्रह और पूर्वाग्रह से त्रस्त दौर में चर्चा अगर सत्याग्रह की हो तो यह तो माना ही जा सकता है कि मानवीय कल्याण और उत्थान का मकसद अब भी बहाल है। दरअसल, हम बीते तीन-चार सालों के पन्ने फिर से उलट रहे हैं। अण्णा आंदोलन आज एक प्रमुख राष्ट्रीय घटनाक्रम का नाम है। इस आंदोलन से देश एक बार फिर से इस बात से अवगत हुआ कि अपना पक्ष रखने और 'असरकारी’ विरोध का 'सत्याग्रह’ रखने वालों की परंपरा देश में खत्म नहीं हुई है। हालांकि इसके साथ कुछ सवाल भी उठने लाजिम हैं जिनके जवाब जरूर तलाशे जाने चाहिए।
आंदोलन के दिनों में सामाजिक कार्यकताã इरोम शर्मिला ने अण्णा हजारे से अपने एक दशक से लंबे अनशन के लिए समर्थन मांगा था। इरोम मणिपुर में विवादास्पद सशस्त्र बिल विशेषाधिकार अधिनियम की विरोध कर रही थीं। उनके मुताबिक इस अधिनियम के प्रावधान मानवाधिकार विरोधी हैं, बर्बर हैं। यह सेना को महज आशंका के आधार पर किसी को मौत के घाट उतारने की कानूनी छूट देता है। इरोम खुद इस बर्बर कार्रवाई की गवाह रही हैं। यही कारण है कि उन्होंने इस विवादास्पद अधिनियम को वापस लेने की मांग को आजीवन प्रण का हिस्सा बना लिया है। दुनिया के इतिहास में अहिसक विरोध का इतना लंबा चला सिलसिला और वह भी अकेली एक महिला द्बारा अपने आप में एक मिसाल है।
इरोम को उम्मीद थी कि आज अण्णा हजारे का जो प्रभाव और स्वीकृति सरकार और जनता के बीच है, उससे उनकी मांग को धार भी मिलेगी और उसका वजन भी बढ़ेगा। हालांकि इस संदर्भ का एक पक्ष यह भी रहा कि इरोम ने भले अण्णा के समर्थन की दरकार जाहिर कर रही हों, पर उन्हें भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चरित्र को लेकर आपत्तियां भी रहीं। वैसे ये आपत्तियां वैसी नहीं हैं जैसी लेखिका अरुंधति राय को रही हैं।
असल में सत्याग्रह का गांधीवादी दर्शन विरोध या समर्थन से परे आत्मशुद्धि के तकाजे पर आधारित है। गांधी का सत्याग्रह साध्य के साथ साधन की कसौटी को भी अपनाता है। ऐसे में लोकप्रियता के आवेग और जनाक्रोश के अधीर प्रकटीकरण से अगर किसी आंदोलन को धार मिलती हो कम से कम वह दूरगामी फलितों को तो नहीं ही हासिल कर सकता है।
दिलचस्प है कि अहिसक संघर्ष के नए विमर्शी सर्ग में अण्णा के व्यक्तिगत चरित्र, जीवन और विचार पर ज्यादा सवाल नहीं उठे हैं। पर उनके आंदोलन के घटनाक्रम को देखकर तो एकबारगी जरूर लगता है कि देश की राजधानी का 'जंतर मंतर’ और मीडिया के रडार से अगर इस पूरी मुहिम को हटा लिया जाता तो भी क्या घटनाक्रम वही होते जिस प्रकार से ये घटित हुए हैं। ...और यह भी कि क्या इसी अनुकूलता और उपलब्धता की परवाह इरोम ने चूंकि नहीं की तो उनके संघर्ष का सिलसिला लंबा खिचता जा रहा है।

सोमवार, 21 जुलाई 2014

कश्मीरी आशा और बिग बी


कश्मीर का मुद्दा एक बार फिर गरमाया है। याद आता है तकरीबन तीन साल पहले का एक वाकया। अपने महानायक तब इंग्लैंड के दौरे पर थे। ऑक्सफोर्ड की लाइब्रेरी में मैग्ना कार्टा चार्टर देखकर अमिताभ बच्चन जब अभिभूत होते हैं तो अखबारों, टीवी चैनलों के लिए यह न छोड़ी जा सकने वाली खबर थी। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है कि पूरब में खड़े होकर कोई पश्चिम को सूर्य का घर माने और उसकी लाली से अपनी चेतना और इतिहास बोध को रंग ले।
दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र की उन जड़ों की जिसकी डालियों पर झूला डालने वाले परिदे आपको आज पूरी दुनिया में मिल जाएंगे। पर लोकतंत्र महज एक शासनतंत्र नहीं, एक जीवनशैली और मानवीय इच्छाशक्ति भी है। अगर यह बोध और सोच किसी को भावनात्मक अतिरेक लगे तो उसे भारत के पांच लाख से ज्यादा गांवों के सांस्कृतिक गणतंत्र की परंपरा से परिचित होना चाहिए। परंपरा का यह प्रवाह आज जरूर पहले की तरह सजल नहीं रहा, पर है वह आज भी कायम अपने जीवन से भरे बहाव के साथ।
अमिताभ बच्चन जब आधुनिक विश्व में लोकतंत्र के ऐतिहासिक उद्भव की गाथा को देख-सुनकर गदगद हो रहे थे, उसी समय देश के कुछ सूबों में पंचायत के चुनाव हो रहे थे। इन सूबों में जम्मू कश्मीर भी शामिल था। यह एक बड़ा अनुष्ठान था। लेकिन तब विधानसभा चुनावों, भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालती कार्रवाई और नागरिक समाज की मांगों और आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन के खात्मे के शोरगुल में इसकी तरफ कम ही लोगों का ध्यान गया। अलबत्ता स्थानीय लोगों की दिलचस्पी जरूर इसमें बनी रही।
दिलचस्प तो यह रहा कि अशांत घाटी में इन चुनावों का औपचारिक निर्वाह ही जहां बड़ी कामयाबी ठहराई जा सकती थी, वहां अस्सी फीसद तक मतदान हुए। यही नहीं बिहार जैसे सूबे में जहां पंचायत की परंपरा को ऐतिहासिक मान्यता हासिल है, वहां भी ये चुनाव तब संगीनों के साए में होने के बावजूद खून के छीटों से बचे नहीं रहे थे। जबकि जम्मू-कश्मीर में ये चुनाव तकरीबन शांतिपूर्ण संपन्न हुए थे।
दरअसल, पंचायत के बहाने इस चुनाव में घाटी के लोगों ने न सिर्फ लोकतांत्रिक सरोकारों की अपनी मिट्टी को एक बार फिर से तर किया बल्कि दुनिया के आगे यह साफ भी किया था कि उनका जीवन, उनका समाज, उनकी संस्कृति उतनी उलझी या बंटी हुई नहीं है, जितनी बताई या समझाई जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कहीं से मुमकिन नहीं था कि कश्मीरी पंडित परिवार की एक महिला उस गांव से पंच चुनी जाती, जो पूरी तरह मुस्लिम बहुल है। यहां विख्यात पर्यटन स्थल गुलमर्ग जाने के रास्ते में एक छोटा सा गांव है- वुसान।
आशा इसी गांव से पंच चुनी गई थी जबकि यहां से इस पद के लिए मैदान में उतरी वह अकेली कश्मीरी पंडित महिला थी। इस सफलता को आपवादिक या कमतर ठहराने वालों के लिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि घाटी से 199० के करीब दो लाख कश्मीरी पंडित परिवारों को पलायन करना पड़ा था। दुर्भाग्यपूणã है कि देश में संसदीय परंपरा के धुरर्Þ बिखेर देने वाली खबरें तो मीडिया की आंखों की चमक बढ़ा देती हैं पर इन परंपराओं की जमीन तर करने वाली खबरों पर हम गौर नहीं फरमाते।

सोमवार, 16 जून 2014

व्यास पीठ पर ताई


धवल-उदात्त चेहरा, आंखों पर टंगा कांच के थोड़े बड़े फ्रेम का चश्मा, पहनावे में आम तौर पर सूती या खादी की साड़ी, चलने-फिरने और बैठने-उठने का सलीका खासा ठहराव भरा, वैसे तो मितभाषी पर सार्वजनिक चिंता के मुद्दों पर मुखर, सुमित्रा महाजन की शख्सियत को यही कुछ बातें मुकम्मल और खास बनाती हैं। दरअसल, अपनी इन्हीं खूबियों के कारण ही वह अपने करीब के लोगों और अपने क्षेत्र में 'सुमित्रा ताई’ के रूप में लोकप्रिय हैं। नाम का रिश्ते में बदलना असाधारण बात है और सार्वजनिक जीवन में तो इस तरह की परंपरा अब न के बराबर रही है। सार्वजनिक जीवन में आए भरोसे के इस कमी को सुमित्रा जिस तरह पूरा कर रही हैं, वह उनके पूरे राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा प्रदेय है। लोकसभा अध्यक्ष के लिए निर्विरोध निर्वाचित होना और एक ही सीट से आठ बार संसद पहुंचना उनकी स्वीकृति के बड़े दायरे को रेखांकित करता है।
 यह गौरव की बात है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के व्यास पीठ पर एक महिला बैठेगी, प्रधानमंत्री ने इन्हीं शब्दों के साथ सुमित्रा महाजन को सर्वसम्मति के साथ लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने पर बधाई दी। बात करें सुमित्रा की तो उनका नाम लोकसभा अध्यक्ष बनने से पहले से ही चर्चा में आ गया था। यह चर्चा इसलिए शुरू हुई थी कि वह पिछले आठ बार से मध्य प्रदेश के इंदौर लोकसभा क्षेत्र से जीतती आ रही हैं। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड ही नहीं बल्कि बड़ी सफलता है।
सुमित्रा का जन्म 12 अप्रैल, 1943 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में चिपलुन नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम नीलकंठ साठे तथा माता का नाम ऊषा था। उन्होंने अपनी एमए तथा एलएलबी की डिग्री इंदौर विश्वविद्यालय -अब देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय- से प्राप्त की। उनका विवाह 29 जनवरी, 1965 को इंदौर के प्रसिद्ध वकील जयंत महाजन से हुआ था। चुनावी राजनीति में सुमित्रा का प्रवेश स्थानीय निकायों के जरिए हुआ। 1982 में वह इंदौर नगर निगम में उपमहापौर बनी थीं। 1989 में अपनी ससुराल इंदौर से उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा था। तब पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रकाश चंद्र सेठी को उनसे हार का सामना करना पड़ा था। पर बाद में तो वह इंदौर की जनता के मन में ऐसी बसीं कि आज तक वह स्थानीय स्तर पर सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। वह इंदौर में पहले 'बहू’ के तौर पर जानी गईं पर बहू के 'बेटी’ बनते देर नहीं लगी और अब तो वह वहां सबकी प्यारी 'ताई’ है। 71 वर्षीय सुमित्रा का आधिकारिक नाम भी 16वीं लोकसभा के सांसदों की सूची में सुमित्रा महाजन (ताई) के तौर पर दर्ज है। लोकप्रियता के इस सातत्य के पीछे सुमित्रा की बेदाग छवि का भी बड़ा योगदान है।
सुमित्रा संघर्ष में तपी नेता हैं। वह 16वीं लोकसभा में महिला सांसदों में सबसे वरिष्ठ सांसद हैं। मीरा कुमार के बाद महाजन लोकसभा अध्यक्ष बनने वाली दूसरी महिला हैं। उन्होंने एक सक्रिय सांसद के रूप में केवल महत्वपूर्ण समितियों का ही नेतृत्व नहीं किया है बल्कि वह सदन के भीतर अच्छी बहस करने वाली और एक उत्साही प्रश्नकर्ता भी रही हैं। वह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 1999 से 2००4 तक राज्यमंत्री रहीं। सौम्य व्यवहार करने वाली सुमित्रा एक ऐसी राजनेता के रूप में उभरी हैं जिन्होंने 1989 में इंदौर से सांसद बनने के बाद से कभी हार का मुंह नहीं देखा और विपक्षी नेताओं की एक पीढ़ी उन्हें हराने का इंतजार ही कर रही है।
लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने कहा, 'मैं लोकसभा में अधिक कामकाज पर जोर दूंगी। वहां एजेंडे को पूरा करने के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष में अच्छा समन्वय होना चाहिए। लोगों को हमसे बहुत उम्मीदें हैं। हमें काम के घंटे बढ़ाने चाहिए।’ उम्मीद करनी चाहिए कि सुमित्रा अपने नए दायित्व की चुनौतियों पर खरी उतरेंगी। यह एक बड़ी परीक्षा है। क्योंकि पिछली लोकसभा के अंतिम कुछ सत्रों में कामकाज संसद सदस्यों के अत्यधिक शोर-शराबे के कारण प्रभावित हुआ था। पर लगता है सुमित्रा इस परीक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं, तभी तो वह कहती हैं, 'उन्हें यह पता है कि इस तरह की परिस्थितियों से किस तरह निपटा जाता है।’
 

मंगलवार, 6 मई 2014

हमें मत कहिए ग्लोबल यूथ


सीजन चुनाव का है तो आजकल बातें भी सबसे ज्यादा चुनावों को लेकर ही हो रही हैं। नेताओं के भाषणों से लेकर चाय की दुकानों पर होने वाली बहसों में जो एक बात कॉमन है, वह है भारत के नए वोटरों की बात। सभी यही कह रहे हैं कि 18 से 28 वर्ष की उम्र के नौजवान इस बार चुनावी निर्णय को सबसे ज्यादा प्रभावित करेंगे। इसी के साथ शुरू हो गया है एक नया विमर्श फ़ेसबुकिया पीढ़ी से लेकर ग्लोबल पीढ़ी की शिनाख्त पाने वाले नौजवान भारत को लेकर। ज्यादातर आग्रह इंपोजिग नेचर के हैं तो कुछ दलीलों में तथ्य कम आग्रह ज्यादा है। दरअसल, जिसे नए दौर की पीढ़ी कहते हैं, उसकी चेतना और मानस को समझने के लिए हम ग्लोबल तकाजों की तलाश करते हैं। पर उसकी दुनिया बिल्कुल वैसी ही नहीं है, जैसी मीडिया या फिल्मों में दिखाई पड़ती है। इस विभ्रम की सबसे बड़ी वजह देश की गुड़-माटी की समझ रखने वाले क्रिटिकल एप्रोच में तेजी से आई कमी है। 
लोक और परंपरा के कल्याणकारी मिथकों पर भरोसा करने वाले आचार्यों की बातें अब विश्वविद्यालयों के शोधग्रंथों तक सिमट कर रह गई हैं। इन पर मनन-चितन करने का भारतीय समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक विवेक बीते दौर की बात हो चुकी है। ऐसा अगर हम कह रहे हैं तो इसलिए कि ऐसा मानने वाले आज ज्यादा हैं। पर तथ्य के साथ सत्य भी यहीं आकर टिकता हो, ऐसा नहीं है। 
सेक्स, सेंसेक्स और सक्सेस
दिलचस्प है कि खुले बाजार ने अपने कपाट जितने नहीं खोले, उससे ज्यादा हमने भारतीय युवाओं के बारे में आग्रहों को खोल दिया। सेक्स, सेंसेक्स और सक्सेस के त्रिकोण में कैद नव भारतीय युवा की छवि और उपलब्धि पर सरकार और कॉरपोरेट जगत सबसे ज्यादा फिदा हैं। ऐसा हो भी भला क्यों नहीं। क्योंकि इनमें से एक ग्लोबल इंडिया का रास्ता बुहारने और दूसरा रास्ता बनाने में लगा है। यह भूमिका और सचाई उन सबको भाती है जो भारत में विकास और बदलाव की छवि को पिछले दो दशकों में सबसे ज्यादा चमकदार बताने के हिमायती हैं। 
ऐसे में कोई यह समझे कि देश की युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा न सिर्फ इन बदलावों के प्रति पीठ किए बैठा है बल्कि ग्लोबल इंडिया का मुहावरा ही उसके लिए अब तक अबूझ है तो हैरानी जरूर होगी। पर क्या करें सचाई की जो असली सरजमीं है, वह हैरान करने वाली ही है। 
लोकतंत्र पर भरोसा 
इस दशक के तकरीबन आरंभ में 'इंडियन यूथ इन ए ट्रांसफॉîमग वर्ल्ड : एटीट्यूड्स एंड परसेप्शन’ नाम से एक शोध अध्ययन चर्चा में थी। इसमें बताया गया था कि देश के 29 फीसद युवा ग्लोबलाइजेशन या मार्केट इकोनमी जैसे शब्दों और उसके मायने से बिल्कुल अपरिचित हैं। यही नहीं देश की जिस युवा पीढ़ी को इस इमîजग फिनोमेना से अकसर जोड़कर देखा जाता है कि उसकी आस्था चुनाव या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं व मूल्यों के प्रति लगातार छीजती जा रही है, उसके विवेक का धरातल इस पूर्वाग्रह से बिल्कुल अलग है। आज भी देश के तकरीबन आधे यानी 48 फीसद युवक ऐसे हैं, जिनका न सिर्फ भरोसा अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रति है बल्कि वे जीवन और विकास को इससे सर्वथा जुड़ा मानते हैं। 
साफ है कि पिछले दो-ढाई दशकों में देश बदला हो कि नहीं बदला हो, हमारा नजरिया समय और समाज को देखने का जरूर बदला है। नहीं तो ऐसा कतई नहीं होता कि अपनी परंपरा की गोद में खेली पीढ़ी को हम महज डॉलर, करिअर, पिज्जा-बर्गर और सेलफोन से मिलकर बने परिवेश के हवाले मानकर अपनी समझदारी की पुलिया पर मनचाही आवाजाही करते। जमीनी बदलाव के चरित्र को जब भी सामाजिक और लोकतांत्रिक पुष्टि के साथ गढ़ा गया है, वह कारगर रहा है। एक गणतांत्रिक देश के तौर पर छह दशकों से ज्यादा के गहन अनुभव और उसके पीछे दासता के सियाह सर्गों ने हमें यह सबक तो कम से कम नहीं सिखाया है कि विविधता और विरोधाभास से भरे इस विशाल भारत में ऊपरी तौर पर किसी बात को बिठाना आसान है। तभी तो हमारे यहां बदलाव या क्रांति की भी जो संकल्पना है, वह जड़मूल से क्रांति की है, संपूर्ण क्रांति की है।
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चार बोतल बोदका
देश की लोक, परंपरा और संस्कृति के हवाले से एक बात और... रूढ़ियां तोड़ने से ज्यादा सांस्कृतिक स्वीकृतियों को खारिज करने के लिए बदनाम पब और लव को बराबरी का दर्ज़ा देने वाले युवाओं की जो तस्वीर हमारी आंखों के आगे जमा दी गई है, उसके लिए शराब का सुर्ख सुरूर बहुत जरूरी है। 
पर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चंडीगढ़ आदि से आगे जैसे ही हम 'इंडिया’ से 'भारत’ की दुनिया में कदम रखते हैं, जरूरत की यह युवा दरकार खारिज होती चली जाती है। 
नए भारत के युवा को लेकर यहां भी एक पूर्वाग्रह टूटता है क्योंकि जिस अध्ययन का हवाला हम पहले दे चुके हैं, उसमें उभरा एक बड़ा तथ्य यह भी है 66 फीसद युवाओं के लिए आज भी शराब को हाथ लगाना जिदगी का सबसे कठिन फैसला है। देश की अधिसंख्य युवा आबादी की ऐसी तमाम कठिनाइयों को समझे बगैर कोई सुविधाजनक राय बना लेना सचमुच बहुत खतरनाक है। 
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विकास का खाका और झांसा 
पिछले बीस सालों के विकास की अंधाधुंध होड़ के बजबजाते यथार्थ को देखने के बाद यह मानने वालों की तादाद आज ज्यादा है जो यह समझते हैं कि किसानों, दस्तकारों के इस देश को अचानक ग्लोबल छतरी में समाने की नौबत पैदा की गई। यह नौबत इतनी त्रासद रही कि कम से कम ढाई लाख किसान खुदकुशी के मोहताज हुए। साफ है कि ग्लोब पर इंडिया को इमîजग इकोनमी पावर के तौर पर देखने के लिए जिन तथ्यों और तर्कों का हम सहारा लेते रहे हैं, उसकी विद्रूप सचाई हमें सामने से आईना दिखाती है। सस्ते श्रम की विश्व बाजार में नीलामी कर आंकड़ों के खानों में देश को खुशहाल जरूर बताया जा सकता है पर यह देश के हर काबिल युवा के हाथ में काम के लक्ष्य और सपने को पूरा करने की राह में महज कुछ कदम ही हैं। ये कदम भी आगे जाने के बजाय या तो अब ठिठक गए हैं या फिर पीछे लौटेंगे क्योंकि मेहरबानी बरसाने वाले कई देश एक बार फिर संरक्षणवादी नीतियों को अमल में लाने लगे हैं।


गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

हांक का नहीं हुंकार का लोकतंत्र चाहिए


बिहार आंदोलन के दिनों में जेपी ने आंदोलनकारियों के लिए पहला कार्यक्रम दिया था मौन जुलूस का। जेपी इस मौन जुलूस के जरिए अपने आंदोलन की अहिंसक लीक को तय करना चाहते थे। हुआ भी ऐसा ही। संपूर्ण क्रांति आंदोलन के पुराने साथी बताते हैं कि मौन जुलूस से पहले रातभर इस बात के लिए छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथी मशक्कत करते रहे कि कल जब लोग मुंह पर पट्टी बांधे सरकार के खिलाफ उतरेंगे तो उनका संदेश क्या होगा। आखिरकार दो नारे तय हुए। पहला, 'क्षुब्ध हृदय, बंद जुबान’ और दूसरा, 'हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’ अगले दिन मौन जुलूस में शामिल होने वालों ने इन्हीं नारों की तख्तियां हाथों में उठा रखी थीं। 
दिलचस्प है कि जुलूस में सबको शामिल होने की इजाजत नहीं थी। इसके लिए एक फार्म भरना था, जिसके जरिए लोकतंत्र में अहिंसक संघर्ष के प्रति निष्ठा की घोषणा करनी थी। 
तब इस मौन जुलूस को कवर करने आए बीबीसी के संवाददाता मार्क टुली अपने अनुभव को शेयर करते हुए बताते हैं कि उनके लिए मुश्किल यह थी कि उन्हें रेडियो के लिए रिपोर्ट करनी थी। इसलिए विजुअल सपोर्ट उनके लिए था नहीं और रही बात जुलूस की तो वह मौन थी इसलिए किसी आंदोलनकारी से भी बात नहीं कर सकते थे। इस जुलूस में साहित्यकारों से लेकर सर्वोदयी जमात के कई बड़े नाम शामिल थे। लिहाजा, उन्हें सड़कों पर सिर झुकाए और मुंह पर काली पट्टी बांधे कतारबद्धबढ़ते देख आसपास के लोग भी काफी शांत थे। 
ऐसे में जुलूस की खबर रेडियो के श्रोताओं तक पहुंचाने के लिए टुली ने अपना माइक आंदोलनकारियों के पांव के करीब किया। जुलूस इतना अनुशासित थी कि तकरीबन एक साथ उनके कदम उठ और गिर रहे थे। यह आवाज कैमरे ने कैच की और कहा गया कि विरोध का संकल्प इतना अहिंसक, अनुशासित और धैर्य से भरा था, इसका अनुभव भारत गांधी के स्वाधीनता संघर्ष के बाद पहली बार कर रहा है। बाद में इस आंदोलन को दूसरी आजादी का आंदोलन कहा भी गया। 
कहने का कुल मतलब सिर्फ इतना कि विरोध और विकल्प की अहिसक राजनीति की बात करना आसान हो सकता है पर इस पर अमल खासा चुनौतीपूर्ण है। अण्णा के आंदोलन से निर्भया कांड तक देश की सड़कों पर जो गुस्सा फूटा उसमें नागरिक कार्रवाई के लोकतांत्रिक रास्तों के मुहाने नए सिरे से तो जरूर खोले पर साथ में कुछ सवाल भी खड़े किए। एक सवाल तो यही कि विचार और आचरण के साझे के बिना क्या कोई कार्रवाई विकल्प या बदलाव का आंदोलनकारी संकल्प बन सकती है। 
पिछले महीनों में टीवी पर होने वाली 'विंडो विमर्श’में विचारधारा के सवाल भ्रष्टाचार के विरोध की दरकार के सामने खारिज होते जा रहे हैं। अलबत्ता आम आदमी पार्टी की सियासी जमात में शामिल कुछ नेता जरूर इस तरह की बात कहने के बजाय गांधी-लोहिया और जेपी की वैचारिक विरासत और सीख की बात कहते हैं। पर ये बातें अब तक इस नई नवेली पार्टी की वैचारिक मन:स्थिति को तय करने में असमर्थ रही है। यह कमी कार्यकताã प्रशिक्षण आदि के स्तर पर भी देखी जा सकती है। 
किसी देश का लोकतंत्र अगर अपने शील-स्वभाव को लेकर ही दुविधा में हो तो यह कोई अच्छी स्थिति तो कतई नहीं है। ओपिनियन पोल से लेकर नेताओं के चुनावी दौरे में दस-दस लाख की भीड़ के जुटने की बातोंको लेकर जिरह करके हम देश के लोकतांत्रिक मानस को कोई सार्थक बनावट नहीं दे सकते। 
यहां एक और बात समझने की है कि सूचना का दौर दरअसल प्रचार का दौर है। प्रचार का सच अकसर 'बड़ा धोखा’ होता है। ओपिनियन पोल से लेकर वर्चुअल वर्ल्ड की दोस्ती और प्यार तक इस धोखे के आज हजारों अफसाने आपको मिल जाएंगे। धोखे के इस खेल में एक बड़ा रोल अदा किया है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने। तस्वीर और आवाज के मेल से जो चौबीसों घंटे हमारे जेहन में उतरता है, उससे ही हमारी सोच-समझ, हमारी मन:स्थिति आज कहीं न कहीं तय होने लगी है। ऐसे में सब कुछ एक दिशा में बढ़ता, एक रंग में रंगा अगर दिखने लगे तो फिर विकल्प, विरोध या बदलाव के लिए गुंजाइश कहां रह जाती है। 
हिंदी के एक बड़े साहित्यकार हैं। वे खूब टीवी देखते हैं और ज्यादातर हॉलीवुड की क्लासिक फिल्में। पर इस दौरान म्यूट का बटन दबाए रखते हैं। पूछने पर उन्होंने कहा कि ऐसा वह इसलिए करते हैं ताकि घटना को अपनी कल्पना और संवेदना के शब्द दे सकें। असल में यह टीवी के वायरल इफेक्ट को कम करने का प्रयोग तो है ही, अपनी सोच-समझ और कल्पना की स्वायत्तता को बहाल रखने की कोशिश भी। पर यह अवेयर एक्शन कितनों के वश की बात है। आमतौर पर तो लोग इस वायरल इफेक्ट से पीड़ित होकर ही खुश हैं। इस बार के आम चुनाव की 'लहर’ और 'डर’ के जरिए जो वायरल इमेज टीवी मीडिया के द्बारा खड़ी की जा रही है, वह वाकई काफी खतरनाक है। यह देश और समाज को सूचना और प्रचार के नाम पर वास्तविकता से काटने जैसा अपराध है। इस आपराधिक स्वीकृति के बाद जो इबारत तारीख के पन्नों पर दर्ज होगी, दरअसल वही इस चुनाव का हासिल होगा। एक बात और यह कि समर्थन को विरोध पर भारी बताना और बहुमत के आगे अल्पमत की दास जैसी स्थिति न तो लोकतंत्र का सही भाष्य है और न ही उसका अभ्यास। एक व्यवस्था को चलाने की दरकार के लिए बहुमत को जरूर नियामक संस्था या सरकार के गठन का अधिकार दिया गया है, पर इसका यह कतई मतलब नहीं कि इस संस्था की जवाबदेहियों के रकबे से विरोधी बाहर रहेंगे। दरअसल, लोकतंत्र में बहुमत का मतलब आगे बढ़कर सबको साथ लेकर चलने की पहल का नाम है, न कि जो छूट गए उन्हें यह एहसास दिलाने का कि विरोध का खामियाजा तो उठाना ही पड़ेगा। यों भी कह सकते हैं कोई व्यवस्था तब तक तानाशाही ही मानी जाती है,जब तक एक हांक पर सब कुछ चलता है। हांक के खिलाफ हुंकार भरने के जज्बे का नाम ही लोकशाही है। इसीलिए पश्चिमी अवधारणा में जहां डेमोक्रेसी की कार्यकारी बनावट को पिरामिड की शक्ल में दिखाया गया है, वहीं गांधी ने इसके लिए ओसएनिक सर्किल की बात कही। यानी हर लहर अगली लहर को जन्म दे और इस तरह व्यक्ति से समष्टि की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया न सिर्फ संवेदनशील हो बल्कि बिंदु से लेकर सिंधु तक सभी इसमें अपने को महत्वपूर्ण मानें। 
बहरहाल, आज की विद्रूपताओं को देखते हुए ये तो काफी दूर की बातें हो गईं, अभी तो इम्तिहान सिर्फ इस बात का है कि मेल जोल व गठबंधन के दौर की भारतीय राजनीति और उससे शक्ल लेने वाला लोकतंत्र महज एक हांक से चलेगा या ललकारी हुंकार से। 


बुधवार, 9 अप्रैल 2014

रायबरेली में अजय

 प्रेम प्रकाशअनजाने वे कल भी नहीं थे पर अब अचानक चर्चित हो गए हैं। टीवी चैनलों पर बैठकर इंटरव्यू दे रहे हैं। गूगल सर्च इंजन पर उनके नाम के साथ रायबरेली जोड़ दें तो 65 हजार से ऊपर वेब पेज खुल जाते हैं। भारतीय विज्ञापन की दुनिया के पुरोधा कहे जाने वाले एलेक पद्मसी के शब्दों में कहें तो यह लाइफ का एक ऐसा टर्न है जिससे आपकी शख्सियत का टर्नओवर आसमान छूने लगता है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं जाने-माने वकील अजय अग्रवाल की। इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें रायबरेली से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ उतारा है। भाजपा का यह फैसला सोनिया के लिए कितनी चुनौती भरा है, इसके विश्लेषण की बहुत दरकार नहीं है। अन्य पार्टियां भी अजय की उम्मीदवारी को सोनिया के खिलाफ बहुत गंभीरता से नहीं ले रही हैं। पर अगर बात करें अग्रवाल की तो वे रायबरेली के चुनाव में अभी से अपने को अजय मानकर चल रहे हैं।
दरमियाना कद-काठी। आमतौर पर मुखरता के साथ बातें करने वाले। पर आत्मविश्वास से ज्यादा बड़बोले अजय अग्रवाल रायबरेली की चुनावी जंग में उतरने से पहले तब-तब चर्चा में आते रहे जब-जब देश में भ्रष्टाचार का कोई मामला खुला। अपने करीबियों के बीच पीआईएल के चैंपियन माने जाने वाले अग्रवाल बोफोर्स स्कैंडल से लेकर अब्दुल करीम तेलगी के फर्जी स्टांप घोटाले तक में अदालत में याचिकाकर्ता हैं। बीते कुछ सालों में कई बार मीडिया की सुर्खियों में आए सीडब्ल्यूजी घोटाला और बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ ताज कोरिडोर मामले को भी अदालत तक ले जाने वाले वही हैं। उन्होंने सिर्फ इन मामलों पर अदालती कार्यवाही के रास्ते खोले बल्कि आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई को भी मुमकिन अंजाम तक पहुंचाकर दम लिया।
इस तरह से 49 बरस के अग्रवाल की एक इमेज भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वाले एक योद्धा की भी बनती है। पर शायद खुद अग्रवाल को अपनी पहचान के इतने सीमित रकबे पर संतोष नहीं। तभी तो जैसे ही रायबरेली से उनके भाजपा कैंडिडेचर पर मुहर लगी, उनकी महत्वाकांक्षा सातवें आसमान पर पहुंच गई। मीडिया से बातचीत में उन्होंने सोनिया के खिलाफ अपनी जीत को तो पक्का माना ही, यह भी कह डाला कि उनके चुनावी मैदान में उतरने से जो एक पॉलिटिकल वाइब्रेशन हुआ है, उसमें भाजपा यूपी में 5० से 6० सीटें तक अपनी झोली में डाल सकती है। दिलचस्प है कि अग्रवाल आज पॉपुलरिटी चार्ट में अपनी मौजूदगी से भले गद्गद हों पर उनकी इस तरह की बड़बोली प्रतिक्रियाएं उनके व्यक्तित्व के हलकेपन को जाहिर करती हैं।
अजय अग्रवाल लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व एसिस्टेंट प्रोफेसर चंद्र प्रकाश अग्रवाल के बेटे हैं। चंद्र प्रकाश आरएसएस से जुड़े रहे। वे भूतपर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा से सीनियर थे। जाहिर है कि अजय अग्रवाल को अपने घर-परिवार से एक ऐसी विरासत तो मिली ही, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र में लोकप्रिय होने की ललक उनके अंदर स्वाभाविक तौर पर पैदा होती। अस्वाभाविक संघ और भाजपा से उनकी नजदीकी भी नहीं, क्योंकि पिता के कारण यह उनके लिए सबसे सुलभ राह थी। यूपी के शाहजहांपुर और मुरादाबाद से निकलकर अग्रवाल आज एक जुआरी की तरह उस मैदान में उतर गए हैं, जहां दांव अगर थोड़े भी ठीक पड़े तो फिर बल्ले-बल्ले। राजनीति की माया है ही ऐसी।
बात करें सोनिया से अग्रवाल के मुकाबले की तो इसकी पटकथा बहुत नई भी नहीं है। बोफोर्स दलाली के खिलाफ जब वे अदालती लड़ाई लड़ रहे थे तभी से कहीं न कहीं कांग्रेस अध्यक्ष उनके निशाने पर रहीं। इस सौदे में हुए भ्रष्टाचार की सीधी आंच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक पहुंची थी। यही नहीं, इस घोटाले के सीधे तार सोनिया से जुड़े होने का दावा किया गया था। इसी कारण से अग्रवाल कहते भी हैं कि सोनिया के खिलाफ उनका संघर्ष आज का नहीं बल्कि सालों पुराना है। बहरहाल, यह देखना तो वाकई दिलचस्प होगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष के खिलाफ उतरने वाले अग्रवाल रायबरेली के चुनाव को एकतरफा से दोतरफा बनाने में कितने कामयाब होते हैं।
 

मंगलवार, 25 मार्च 2014

कहां खो गए समर्थन और विरोध के तकाजे


भारतीय गणतंत्र के जब पचास साल पूरे हुए थे तो देशभर में इसको लेकर कई कार्यक्रम हुए थे। ऐसे मौकों को एक पवित्रवादी आग्रह के साथ मनाने की भारतीय परंपरा काफी पुरानी है। गांधी जयंती से लेकर हिंदी दिवस तक ऐसे कई उदाहरण हैं। अलबत्ता ये उदारहरण अपने प्रदेयों और उपोयिगता को लेकर कितने बहुमूल्य हैं, यह भी हम जानते हैं। गणतंत्र के स्वर्णिम सर्ग में दर्ज होने के लिए संसद भी अलग से बैठी। तत्कालीन सांसदों ने लंबी-लंबी तकरीरें कीं। कुछ ने नए संकल्प लिए तो कुछ ने पुराने सबक दोहाराए।
यह अलग बात है कि माननीयों को न तो सबक भूलने में देर लगी और न संकल्प। उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर भारतबाला प्रोडक्शन ने एक छोटा सा एडनुमा कार्यक्रम बनाया था, बमुश्किल 3० सेकेंड का। इसमें टीवी स्क्रीन पर एक-एक शब्द करके एक वाक्य उभरता है- चलो हम इस बात पर सहमत हैं कि हम एक दूसरे से असहमत हैं। इसके थोड़े अंतराल के बाद दूसरा वाक्य- असहमति पर सहमति लोकतंत्र की नींव है। अब जबकि 16वीं लोकसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है तो इन दो पुराने उल्लेखों से कुछ बातें नए सिरे से समझी जा सकती हैं।
हिंदी साहित्य के प्रखर आलोचक और इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल कविता में विरोधों के सामंजस्य की बात करते थे। कविता संवेदनाओं का लोकतंत्र है। इसलिए विरोधों के सामंजस्य की दरकार को एक लोकतांत्रिक दरकार ठहराया जा सकता है। पक्ष और विपक्ष के बीच तटस्थ जैसी स्थिति को न तो महाभारत में कृष्ण ने स्वीकार किया और न ही आधुनिक लोकतंत्र में इस स्टैंड को राइट एप्रोच माना
गया। अलबत्ता देश में अस्मितावादी राजनीति के दौर-दौरे के बीच विरोध से ज्यादा अंतर्विरोध की राजनीतिक ध्वनियों ने लोकतांत्रिक स्पेस को भरा।
बहरहाल, लोकसभा चुनावों में उतरने की पार्टियों और उनके नेताओं की तैयारियों को देखें तो कुछ बातें अभी से साफ हो गई हैं। भले लोकतंत्र के सुलेखवादी विमर्श में हम लाख बातें कहें-समझें पर सत्ता की राजनीति ने समर्थन और विरोध के बीच की लक्ष्मणरेखा को कब का अमान्य कर दिया है। यह सब हो रहा है जीत और सत्तारोहण के गणित के नाम पर। बाजार ने हमें बीते दो दशकों में सिखाया कि जेब में जिसके पैसा है, उसके लिए ही दुनिया है और अब राजनीति हमें सीखा रही है कि जो जीते वही सिकंदर। यानी विरोध का मतलब
अगर हार है तो ऐसा विरोध त्याज्य है। इसी
तरह समर्थन का अर्थ सत्ता नहीं तो फिर ऐसे समर्थन की दरकार और सरोकार दोनों ही बेमानी हैं।
दिल्ली की एक लोकसभा सीट से इस बार आम आदमी पार्टी की तरफ से राजमोहन गांधी चुनाव लड़ रहे हैं। वे काफी विनम्र और विज्ञजन हैं। पर राजनीति तो शुरू ही मजबूरी से होती है। आम आदमी पार्टी में शामिल होने से पहले उनका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक बयान आया था। तब मोदी को भाजपा ने अपना पीएम कैंडिडेट नहीं बनाया था। राजमोहन ने मोदी का बहुत नामोल्लेख तो नहीं किया पर दुनिया की सबसे ऊंची सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा बनाने के उनके अभियान पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस अभियान से एक वर्टिकल होड़ शुरू होगी अपने-अपने नेताओं और प्रतीक पुरुषों की भव्य प्रतिमा स्थापित करने की।
कुल मिलाकर सम्मान के नाम पर शुरू होने वाली इस प्रतियोगिता में क्षेत्र और समुदायों के बीच एक ऐसी हिंसक भिड़ंत होगी जो देश और समाज के लिए सर्वथा अनिष्टकारी होगी। राजमोहन के इस बयान की सराहना में भले बहुत हाथ तब नहीं उठे पर उनके विरोध में भी शायद ही कोई बयान आया। पर अब राजमोहन आप के नेता हैं। एक-दो महीने तक उनके विचारों का चरित्र जितना मुक्त था, अब शायद नहीं। तभी तो आप को लेकर और उसके नेता अरविंद केजरीवाल के उतावलेपन को लेकर वह कोई सीधी टिप्पणी करने से बचते हैं यानी उन्होंने जानबूझकर एक चुप्पी ओढ़ रखी है। यानी राजमोहन भी समझते हैं कि अभी जनता से वोट लेने की बारी है। सो अभी नापतौल कर बोलना होगा। समर्थन और विरोध की मुद्रा एकदम से तटस्थ हो गई है।
यह हमारे गणतंत्र का एक ऐसा विरोधाभासी सच है जो गणतंत्र के लिए समर्थन और विरोध की जरूरी दरकार को ही खारिज करते हैं। राजमोहन गांधी का नाम इसलिए नहीं कि वे इसके कोई बहुत बड़े कसूरवार हैं बल्कि इसलिए कि उनके जैसा समझदार और चारित्रिक सुदृढ़ता वाला व्यक्ति भी भारतीय गणतंत्र के इस अंतरविरोध को चुनौती
देने में संकोच करता है। उन्हें छोड़ दें फिर तो राहुल गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक और दिग्विजय सिंह से लेकर जगदंबिका पाल तक, सभी समर्थन और विरोध के अपने एजेंडे को जब जैसे चाहें बदल देते हैं, रद्द कर देते हैं। सामान्य समझ में यही तो है मौकापरस्ती की राजनीति।
इस बार के चुनावों को लेकर कहा जा रहा था कि ये देश में कुछ मुद्दों को लेकर राजनीतिक जमीन को इतनी ठोस कर देंगे कि अगले कुछ दशकों की देश की राजनीति इसी जमीन पर होगी। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार को माना जा रहा था। जनता से राजनीतिक विमर्श करने वाले सभी लोग इस बात को अपने-अपने तरीके से मान रहे थे। यहां तक कि हाल तक के ओपिनियन पोल में भी भ्रष्टाचार को बड़ा चुनावी मुद्दा माना गया।
पर अगर दलों के टिकट वितरण के आधारों को देखें या फिर दल छोड़ने व नए दल
में शामिल होने के कारणों को देखें तो कम से कम भ्रष्टाचार कहीं से कोई मुद्दा नहीं है। इसी के साथ भ्रष्टाचार के समर्थन और विरोध को लेकर अंतिम रूप से लकीर खींचने की संभावना भी क्षीण हो गई, जिसे लेकर काफी उम्मीदें थीं।
अब ऐसी स्थिति में चुनावी राजनीति से इतर मौकों पर राजनेताओं की उन तकरीरों का क्या, जिसमें देश की लोकतांत्रिक महानता को बनाए और बचाए रखने के लिए खूब सारी बातें होती हैं, शपथें होती हैं। इसी तरह लोकतंत्र की अवधारणा को साफ करने वाली उन बुनियादी बातों का भी क्या जिसमें समर्थन और विरोध के बीच दुराव के बजाय समन्वय की तो बात होती है पर किसी मुद्दे को लेकर तटस्थतावादी घालमेल की कोई गुंजाइश नहीं। मुद्दा भ्रष्टाचार का हो, महंगाई का हो, चुनाव सुधार का हो या फिर विकास का, नहीं लगता कि जनता इस चुनाव में यह निर्णय ले पाएगी कि वह किस मुद्दे पर किसके साथ जाए और किसके विरोध में। जनता की यह मुश्किल ही आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसी स्थिति में इस बार के चुनावों में तारीख के हर्फ कितने बदलेंगे, कहना मुश्किल नहीं।
 

बुधवार, 19 मार्च 2014

बेल्लारी की चुनावी सुषमा


बेल्लारी लोकसभा सीट 13वीं लोकसभा चुनावों के दौरान अचानक काफी चर्चा में आ गई और पूरे देश की निगाहें यहां के चुनावी नतीजे पर आकर ठहर गईं। दरअसल, यहां से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चुनाव लड़ने का एलान किया और उनके इस फैसले को भाजपा ने चुनौती देने की ठान ली। दिलचस्प है कि यह सोनिया का पहला चुनाव था। इस चुनाव में भाजपा ने अपनी तेज-तर्रार नेता सुषमा स्वराज को सोनिया के खिलाफ उतारने का फैसला किया। देखते-देखते यह मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन गया। भाजपा इस चुनाव को रणनीतिक तौर पर देख रही थी। क्योंकि अगर सोनिया वहां से चुनाव हार जातीं तो उनका पॉलिटिकल करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता। इसके उलट सुषमा इसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी लोकप्रियता के बड़े मौके के रूप में देख रही थीं। सोनिया को हराने के लिए जनता दल और कुछ दूसरे दलों ने भी सुषमा का साथ दिया।
भाजपा ने इस चुनाव में स्वदेशी बनाम विदेशी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। बेल्लारी के वोटरों को यह बात रेखांकित करके बताई गई कि इंदिरा गांधी की बहू और राजीव गांधी की पत्नी इटली की रहने वाली हैं। भाजपा को सोनिया के विदेशी होने का मुद्दा सूट कर रहा था और वह इसी मुद्दे पर सोनिया को घेर रही थी।
1952 से यहां महज दो बार कांग्रेस हारी थी। यही देखते हुए सोनिया को बेल्लारी एक सुरक्षित सीट लगी और वह यहां से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गईं। बहरहाल, सुषमा इस चुनाव में सोनिया से हार गईं। अलबत्ता उन्होंने यहां मुकाबले को जरूर दिलचस्प स्थिति में ला दिया था। उन्होंने सोनिया को घेरने के लिए बेल्लारी के गांवों-कस्बों की खूब खाक छानी। यहां तक कि उन्होंने कन्नड़ भी थोड़ी-बहुत इस दौरान सीख ली।
इसके जवाब में राहुल गांधी और खासतौर पर प्रियंका गांधी ने सोनिया के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी। एक बात और यह कि सोनिया बेल्लारी के अलावा उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से भी चुनाव मैदान में उतरी थीं। उन्हें दोनों जगह से जीत मिली। हालांकि बाद में उन्होंने बेल्लारी की सीट से इस्तीफा दे दिया था।
 

लोकतंत्र में बिहार पहले से विशेष राज्य


सरदार वल्लभ भाई पटेल जब देसी रियासतों का विलय भारत राज्य में कराने में लगे थे तो उन दिनों वह एक महत्वपूर्ण बात अकसर कहा करते थे। वह कहते थे कि देश के विभिन्न प्रांतों-क्षेत्रों, वर्गों-भाषा-भाषियों को भारत राज्य से जोड़ना इसलिए जरूरी है कि इससे ही भारतीयता की शिनाख्त पूरी होगी। ऐसा कहते हुए वे भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की इस विलक्षणता को रेखांकित करना नहीं भूलते थे कि देश अगर स्वतंत्र है तो इसलिए कि इसमें सभी मजहब और सूबों के लोगों ने शिरकत की है, कुर्बानियां दी हैं। इन सबका जुड़ाव जैसा संघर्ष के दिनों में था, वैसा ही बाद में भी दिखना चाहिए। एकजुटता की यह ताकत ही भारत
की ताकत है।
अभी देश में सोलहवीं लोकसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। दिलचस्प है कि चुनावी चर्चाओं के बीच सरदार का नाम भी लिया जा रहा है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने तो गुजरात में उनकी दुनिया की सबसे भव्य प्रतिमा बनाने की मुहिम ही छेड़ रखी है। यह अलग बात है कि उनकी इस मुहिम के सियासी निहितार्थ निकालने वाले भी कम नहीं हैं। हाल में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुजरात पहुंचे तो उन्होंने सरदार और मोदी के विरोधाभासों को रेखांकित करने की कोशिश की। यह अलग बात है कि ऐसा करते हुए वह मौजूदा कांग्रेस पार्टी और उसके स्वर्णिम इतिहास के बीच बढ़ते विरोधाभास पर कुछ नहीं बोले।
दरअसल, आज जिन दलीलों और हवालों से चुनावी मैदान मारने में पार्टियां और उनके नेता लगे हैं, उनमें वैसे तत्वों का खासतौर पर अभाव है जो भारतीय गणतंत्र की तारीखी खासियत रही है। विकास, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता का मुद्दा मजबूत जरूर है पर इससे भी मजबूत भारतीय समाज की लोकतांत्रिक आस्था है।
इस आस्था के साथ आज किस कदर खिलवाड़ हो रहा है, इसे आप यों समझ सकते हैं- बिहार में लोकसभा की 4० सीटें हैं और वहां सबसे बड़ा मुद्दा विशेष राज्य का दर्जा है। एकजुट होकर भले न सही पर तकरीबन पार्टियां वहां इस मुद्दे का समर्थन कर रही हैं। फर्क बस यही है कि वे इस मुद्दे पर संघर्ष
का श्रेय बांटना नहीं चाहतीं। यह इस मुद्दे को लेकर बरती जाने वाली एक ऐसी सियासी बेईमानी है, जिसे जनता भी जरूर समझ
रही होगी।
ऐसा इसलिए भी कि पार्टियां अपने बीच की दूरियां जाहिर करने के लिए अत्यंत अगंभीर नाटकीय तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं। मसलन, केंद्र से विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर जब जदयू ने बिहार बंद का कॉल दिया तो उससे एक दिन पहले भाजपा ने रेल रोको आंदोलन की तिथि तय कर मुद्दे को हथियाने की कोशिश की। इससे पहले दिल्ली में जब इसी मुद्दे पर जदयू ने दिल्ली में रैली की तो उसमें भाजपा को साथ नहीं लिया, जबकि तब सरकार में वह उसके साथ थी। बात बिहार की निकली है तो यहां एक बात का जिक्र जरूरी है। जब से बिहार को लोगों को परप्रांतीय विरोध के नाम पर दिल्ली से लेकर मुंबई तक गालियां-लाठियां खानी पड़ रही हैं, तब से बिहार अस्मिता का सवाल एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा हो गया है। इसके पीछे कहीं न कहीं वोटबैंक की राजनीति भी है। बिहार में लोकसभा की 4० सीटें हैं। यूपी में सीटों की संख्या 8० है। दोनों सूबों की सीटों की गिनती मिला दें तो यह केंद्रीय सत्ता की दावेदारी को मजबूत करने वाली स्थिति है किसी भी पार्टी के लिए। आज अगर वाराणसी से नरेंद्र मोदी को भाजपा चुनावी मैदान में उतार रही है तो उसके पीछे सीधा गणित यही है कि यूपी और बिहार की 12० सीटों पर इसका सकारात्मक असर भाजपा को फायदा पहुंचाएगा।
पर इस फायदे-नुकसान में बिहारी अस्मिता का सवाल कहीं पीछे छूटता मालूम पड़ता है। चुनावी मैदान में भाजपा को इस सवाल का जवाब देना पड़ सकता है कि बिहारियों को मारने-पीटने और खदेड़ने वाले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से उसकी बढ़ी नजदीकी का क्या मतलब है? क्या यह अपने सूबे से बाहर काम-धंधा करने वाले बिहारियों के जख्म पर नमक छिड़कने जैसा नहीं है। और अगर ऐसा है तो फिर भाजपा को बिहारी अस्मिता से खिलवाड़ का कसूरवार क्यों न ठहराया जाए।
गौरतलब है कि यह राजनीतिक दुर्दशा उस राज्य की है, जिसकी देश के लोकतांत्रिक इतिहास में भूमिका खासी उल्लेखनीय रही है। अशोक मेहता, मीनू मसानी, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीस और शरद यादव में से कोई बिहारी नहीं हैं। पर बिहार की जनता ने देश की समाजवादी आंदोलन के इन दिग्गजों को संसद तक पहुंचाया।
यह इस राज्य की राजनीतिक या लोकतांत्रिक समझ की एक ऐसी मिसाल है जो आज इस सूबे की पहचान से जुड़े कई पूर्वाग्रहों को न सिर्फ खंडित करते हैं बल्कि एक नई बोधदृष्टि से उसे देखने की दरकार पेश करती है। इस लिहाज से देखें तो बिहार देश के लोकतांत्रिक नक्शे पर पहले से विशेष राज्य है। यह अलग बात है कि विशेषता की यह चमक अकेले बिहार के साथ नहीं है। बल्कि बिहार उसी तरह विशेष है जैसे गुजरात विशेष है, महाराष्ट्र विशेष है या फिर ओडिशा, तमिलनाडु या आंध्र विशेष है। इन बातों को तार्किक रूप से समझने में अगर कोई कठिनाई हो तो एक बार फिर से सरदार की बातों का स्मरण करें।
देश में फिर से चुनावी उत्सव चल रहा है। ऐसे में दल और नेता एक-दूसरे के खिलाफ भले ही हमलावर बोल बोलें, लेकिन उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों की ऐतिहासकिता को भी एक सातत्य प्रदान करने का दायित्व निभाना चाहिए, जिससे देश के लोकतंत्र के मंदिर में हर क्षेत्र का कम से कम एक दीपक तो जरूर जले।
साठ साल से भी लंबा देश का लोकतांत्रिक सफरनामा महज धिक्कार से भरने के लिए नहीं है बल्कि इसमें गौरव और यश के भी तमाम अनुभव शामिल हैं।
इन अनुभवों का सिलसिले को अगर हम जारी रखने में यकीन नहीं रखते तो इसका मतलब यही है कि न तो हमें अपने लोकतंत्र को लेकर न तो कोई फL है और न ही इसकी क्षमता को लेकर कोई भरोसा। अविश्वास का यह भाव खतरनाक है।
सत्ता की राजनीति के लिए दावों-प्रतिदावों, आरोपों-प्रत्यारोपों और वादों-इरादों से आगे कुछ सकारात्मकता की भी बात जरूर होनी चाहिए। यह देश के जागरूक मतदाताओं के लिए भी एक सम्मान की बात होगी क्योंकि इससे उसके दायित्वपूर्ण विवेक को तो मान मिलेगा ही, ऐसे ही जवाबदेह तरीके से लोकतांत्रिक दायित्व के पालन के लिए प्रोत्साहन भी मिलेगा। क्या इस सामयिक दरकार को देश की सियासी जमातें समझेंगी?
 

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

परिवर्तन का दारोमदार महज आप पर नहीं


संभावनाओं के पूरे होने से ज्यादा जरूरी है, उनका बने रहना। जीवन और समाज का संभावना रहित होना खतरनाक है। ये बातें आज भारतीय राजनीति के संदर्भ में समझनी जरूरी है। इन दिनों देश में राजनीति काफी गरमाई हुई है। दो-तीन महीने में लोकसभा चुनाव होने हैं। दल और विचार की साझा ताकत सत्ता के गणित के आगे कमजोर पड़ रही है। बदलाव और विकल्प की सामयिक दरार को रेखांकित करने से तो किसी सियासी जमात को गुरेज नहीं है, पर इस पर पूरा जोर भी किसी का नहीं है। यह सब संभावनाओं के बड़े कैनवस को फिर से पुराने रंगों और चित्रों से भर जाने के अंदेशे की तरह है।
इस पूरी स्थिति को समझने के लिए थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो कई बातें साफ होंगी। बीते तीन सालों में भ्रष्टाचार को लेकर जो देशभर में आक्रोश दिखा, उसकी अगुवाई करने वाले नागरिक समाज के एक धड़े ने अपने सांगठनिक सामथ्र्य को राजनीतिक दल का रूप दिया। पर सत्ता तक पहुंचकर सत्तावादी आचरण को बदलने की अधीरता ने एक बड़ी कोशिश को कुछ ही महीनों में पटरी से उतार दिया। आम आदमी पार्टी के कार्यकताã और शुभचिंतक भी अब उससे कट रहे हैं। सदस्यता अभियान के नाम पर करोड़ का आंकड़ा छूने का दावा जरूर किया जा रहा है पर कमिटेड वर्क फोर्स के नाम पर पार्टी के पास गिनती के नाम हैं। यही नहीं महिला अस्मिता जैसे मुद्दे पर पार्टी की सोच और उसकीसरकार के मंत्री के आचरण की हर तरफ कठोर निंदा हो रही है। पार्टी के संस्थापक सदस्याओं में से एक मधु भादुड़ी सीधा आरोप लगा रही हैं कि पार्टी को कुछ लोगों ने हाईजैक कर लिया है। पार्टी के अंदर चुनाव जीतने और सत्ता की राजनीति करने का पागलपन इस कदर बढ़ गया है कि भिन्न स्वरों और वैकल्पिक रायों को पार्टी के अंदर कोई सुनने को तैयार नहीं है।
मधु आगे बढ़कर यहां तक कहती हैं कि इस पार्टी में और बातें तो छोड़ दीजिए महिलाओं को 'इंसान’ तक नहीं समझा जा रहा। गौरतलब है कि मधु आप के राष्ट्रीय अधिवेशन में खिड़की एक्सटेंशन में आधी रात को दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की अगुवाई में हुए महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक सलूक के मामले को उठाना चाहती थीं। उनकी मांग और मंशा इतनी भर थी कि पार्टी को इस मामले में अपनी चूक मान लेनी चाहिए और खुद से आगे बढ़कर माफी मांगनी चाहिए। पर माफी की बात तो दूर उन्हें इस मामले में पार्टी फोरम पर अपनी पूरी बात कहने तक से रोका गया।
आप से निकाले गए विधायक विनोद कुमार बिन्नी की राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को देखते हुए उनके उठाए सवालों को अगर एक किनारे कर भी दें तो भी एक बात तो साफ जाहिर हो रही है कि इस पार्टी ने अपने लिए जो उच्च राजनीतिक मानदंड तय किए थे, वह आज उस पर खुद खरी नहीं उतर रही है। ऐसा नहीं होता तो सरकार बनाने और तमाम अहम मुद्दों पर जनता की राय से अपना रुख तय करने वाली पार्टी अपने विधायक को बिना जनता से राय लिए कम से कम बाहर का रास्ता नहीं दिखाती।
आप को लेकर ये सारी बातें इसलिए क्योंकि उसके उदय और संघर्ष की परिघटना ने ही देश में राजनीतिक बदलाव और विकल्प की संभावना को रेखांकित किया था। भूले नहीं हैं लोग कि जब इस पार्टी ने दिल्ली में डेढ़ दशक से चल रही कांग्रेस सरकार को महज आठ सीट तक सीमित कर दिया तो राहुल गांधी ने मीडिया के सामने आकर बयान दिया कि आप से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। खासकर उसने जिस तरह कम समय में लोगों को अपने से जोड़ा। आज उसी राहुल गांधी की तरफ से अखबारों में विज्ञापन छप रहा है- 'अराजकता नहीं प्रशासन सुधार’। साफ है कि निशाने पर सीधे-सीधे खुद को अराजक कहने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार है। इससे पहले गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भी परोक्ष रूप से दिल्ली सरकार के कामकाज पर टिप्पणी कर चुके हैं।
दरअसल, अब सवाल यह नहीं है कि क्या आम आदमी पार्टी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और इतिहास बदलने की जल्दबाजी में देश में लोकतांत्रिक परिवर्तन की एक बड़ी संभावना हाशिए पर खिसकती जा रही है, खारिज होती जा रही है? नया सवाल तो यह है कि क्या संभावना और उसके बूते परिवर्तन की ऐतिहासिक पटकथा लिखने का लाइसेंस सिर्फ आप और उसके मुट्ठी भर नेताओं के पास है। पिछले एक महीने में दिल्ली की सड़कों से लेकर सचिवालय के अंदर-बाहर दिखी नौटंकी ही क्या देश के भविष्य के चित्र हैं? निश्चित रूप से इसका जवाब नहीं है।
देश में परिवर्तन की गहराती संभावनाओं की बात इसलिए नहीं शुरू हुई कि ऐसा सिविल सोसायटी की नुमाइंदगी करने वाले कुछ लोग या कोई पार्टी ऐसा कह रही थी। दरअसल, इसके पीछे बीते कुछ सालों में देश की सड़कों पर बार-बार खुलकर प्रकट हुई वह जनाकांक्षा रही, जिसने लोकतंत्र में जन साझीदारी की दरकार के लिए सियासी जमातों के आगे खासा दबाव बनाया। बाकी दलों औरआप में फर्क बस यह रहा कि बाकी ने इस सामयिक दरकार को गंभीरता से नहीं लिया और आप ने इसे अपना एजेंडा बना लिया। यह अलग बात है कि सत्ता की राजनीति में उतरी यह नई पार्टी भी अब अपने इस एजेंडे को लेकर पहले की तरह गंभीर नहीं है।
यह स्थिति उन तमाम दलों के लिए चूक सुधार के एक मौके की तरह है जो कल तक आप के सियासी उदय को अपने लिए कहीं न कहीं खतरा मान रहे थे। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से लेकर कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय ठहराए जाने वाले नेता राहुल गांधी को इस बाबत खासतौर पर ध्यान देना चाहिए। इन दोनों नेताओं पर ही कहीं न कहीं दारोमदार है कि वे लोकसभा चुनाव के एजेंडे को क्या शक्ल देते हैं। जनता पर नहीं बल्कि जनता के साथ मिलकर शासन चलाना, सत्ता का विकेंद्रीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर पहल के साथ अगर देश की दोनों चोटी की पार्टियां अपनी तैयारी और सोच के साथ इस बार जनता के सामने वोट मांगने जाएं तो यह जनभावना के अनुरूप होगा। साथ ही यह देश में पारंपरिक की जगह वैकल्पिक राजनीति के प्रयोग की बड़ी मुश्किल से बनी संभावना को एक अंजाम तक पहुंचाने के ऐतिहासिक अभिक्रम से जुड़ने जैसा भी होगा।
चुनाव के दौरान स्वार्थपूणã गठजोड़ और एक दूसरे के खिलाफ तीखे व घटिया आरोप-प्रत्यारोप का अतिवाद अब निश्चित रूप से दरकना चाहिए। इतिहास और विचार के तमाम सुलेखों को अपने नाम दर्ज होने का दावा करने वाली देश की दोनों महत्वपूर्ण पार्टियों को यह साहस दिखाना चाहिए कि वे एक-दूसरे से बेहतर संभावना के नाम पर भिड़ें न कि घटिया सियासी सलूक के नाम पर।
 

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

संबोधन में छिपा चिंताओं का समाधानकारी सार

देश ने जब इस बार 65वां गणतंत्र दिवस मनाया तो उसके मन में उल्लास के साथ कई सवाल भी थे। ये सवाल भी कोई रातोंरात पैदा हुए हों, ऐसा नहीं है। अलबत्ता यह जरूर है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जिस तरह कुछ मुद्दों और खतरों को रेखांकित किया, उनसे ये सवाल एकदम से सतह पर आ गए। राष्ट्रपति महोदय ने देश के लोकतंत्र को लेकर यह चिंता जताई है कि एक तरफ तो जनता गुस्से में है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर अराजकतावादी आचरण दिख रहे हैं।
सनसनी पैदा करने की गरज से राष्ट्रपति के इस संबोधन की कुछ लोग मन माफिक व्याख्या कर रहे हैं। इसमें मीडिया का भी एक तबका शामिल है। दरअसल, इस स्थिति को समझने के लिए हमें बीते कुछ सालों के घटनाक्रमों को देखना होगा। देश का नागरिक समाज जनता को साथ लेकर इस दौरान एक नए तरह के लोकमत के निर्माण में लगा है। लोकमत निर्माण की यह प्रक्रिया प्रतिक्रियावादी और सुधारवादी दोनों है। प्रतिक्रियावादी इस लिहाज से कि इसमें एक तरफ तो इस बात की खीझ है कि सत्ता और जनता का साझा आचरण बदल गया है। केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें 'जनता का शासन’ चलाने की बजाय 'जनता पर शासन’ कर रही हैं। नतीजतन सरकारी सोच और काम की प्राथमिक शर्त अब न तो लोक कल्याणकारी है और न ही पारदर्शी। इस स्थिति पर देश के प्रथम नागरिक ने भी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है, 'यदि भारत की जनता गुस्से में है, तो इसका कारण है कि उन्हें भ्रष्टाचार तथा राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी दिखाई दे रही है।’
देश के नागरिक समाज ने इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ लोकतांत्रिक दरकारों और सरोकारों को बार-बार रेखांकित किया है। इसमें सबसे अहम् मुद्दा है प्रातिनिधिक लोकतंत्र के ढांचे को संभव स्तर तक प्रतिभागी बनाना। जनलोकपाल आंदोलन के प्रकटीकरण के पीछे के कारणों को अगर समझें तो साफ होता है कि जनता अपने लिए सुविधा ही नहीं नीति और कानून निर्माण के लिए भी सड़क पर उतर सकती है। महज इतना ही नहीं, सरकार के आगे जनता इस बात का भी लोकतांत्रिक दबाव बना सकती है कि वह महज उसके लिए नहीं बल्कि उसके साथ बैठकर जरूरी फैसले करे।
दिलचस्प है कि अराजनीतिक रूप से चल रही इस तरह की सुधारवादी कोशिश ने अब राजनीतिक विकल्प की भी शक्ल ले ली है। पर एक बड़ी कोशिश के ठोस विकल्प बनने की प्रक्रिया सघन और सुचिंतित होनी चाहिए। दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की जीत और फिर सरकार बनाने की घटना काफी अफरातफरी भरी रही है। आप ने जिस तरह के वादे जनता से किए और फिर सरकार बनाने के बाद वह जिस तरह अराजक स्थितियों को जन्म दे रही है, उसने कई सवाल खड़े किए हैं।
इस स्थिति पर राष्ट्रपति की टिप्पणी गौरतलब है। उनके ही शब्दों में, 'चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं। जो लोग मतदाताओं का भरोसा चाहते हैं, उन्हें केवल वही वादा करना चाहिए जो संभव है। सरकार कोई परोपकारी निकाय नहीं है। लोकलुभावन अराजकता, शासन का विकल्प नहीं हो सकती।’
देश की मौजूदा स्थिति और राजनीतिक स्तर पर बदलाव की कम-ज्यादा संभावनाओं के बीच देश के प्रथम नागरिक की टिप्पणियों और चिंताओं पर जब विचार करते हैं तो इससे काफी हद तक समाधान मिलता है। हालांकि यहीं से कुछ नए सवालों का प्रस्थान बिंदु भी तैयार हो जाता है। समाधान की बात यह है कि जैसा कि महामहिम खुद कहते हैं, 'मैं निराशावादी नहीं हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि लोकतंत्र में खुद में सुधार करने की विलक्षण योग्यता है। यह ऐसा चिकित्सक है जो खुद के घावों को भर सकता है और पिछले कुछ वर्षों की खंडित तथा विवादास्पद राजनीति के बाद 2०14 को घावों के भरने का वर्ष होना चाहिए।’
सवालों की नई जमीन इस पर तैयार हो गई है कि राष्ट्रपति को अभी ये सारी बातें कहने की जरूरत क्यों पड़ी। क्या इससे पहले का देश का लोकतांत्रिक इतिहास उन चिंताओं से सर्वथा मुक्त रहा, जिस पर आज चिंता जताई जा रही है? क्या देश लोकतांत्रिक संस्थाओं के अवमूल्यन की इमरजेंसी जैसी हिमाकत तक पहुंच गया है? क्या सरकारी अराजकता का नया खतरा 1984 में सिख दंगों के दौरान 'एक बड़ा पेड़ गिरने पर धरती के स्वाभाविक कंपन’ से भी बड़ा है? सवाल यह भी कि लोकतंत्र क्या इतना लकीर का फकीर है कि उसे आंदोलन और बदलाव जैसी स्थितियां या तो असंवैधानिक लगती हैं, या फिर अमर्यादित?
बहरहाल, इस मुद्दे पर यह तो मानकर ही चलना चाहिए कि राष्ट्रपति महोदय ने जो भी बातें कहीं, वह किसी एक घटना, सरकार या पार्टी तक सीमित न होकर संपूर्ण राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण होंगी, नहीं तो अनावश्यक विवाद पैदा होगा। अलबत्ता इस पूरे विमर्श में कुछ चीजें पहले से जरूर साफ होनी चाहिए। एक तो यह कि बीते दो-तीन सालों में जनता एकाधिक बार सरकार के खिलाफ अपने आक्रोश को लेकर सड़कों पर उतरी तो विरोध प्रदर्शन का यह तरीका हर लिहाज से अहिंसक था।
लिहाजा, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि कम से कम जनता की मन:स्थिति अब भी हिंसक या अराजक नहीं है। रही दिल्ली की आप की सरकार और उसके कामकाज के तौर-तरीके की तो इस बारे में सर्वसम्मत सराहना की स्थिति तो कतई नहीं है। यह जरूर है कि सरकार और जनता के बीच साझेदारी बढ़ाने के लोकतांत्रिक तकाजे को जरूर आप ने फिर से रेखांकित किया है। क्योंकि कम से कम यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल को देखें तो इस दौरान न सिर्फ जनता की नजरों में सरकार की विश्वसनीयता में कमी आई है बल्कि पूरी राजनीतिक जमात की साख पर भी बट्टा लगा है।
सार्वजनिक जीवन की गरिमा में आए इस तरह के ह्रास को सादगी और ईमानदारी जैसी कुछ कसौटियों पर चुनावी चुनौती की पटकथा जिस तरह आप ने दिल्ली में लिखी और आगे लोकसभा चुनाव में उसके विस्तार को लेकर वह जिस तरह से ललक से भरी है, वह थोड़ा सोचने पर मजबूर करती है। आज हर तरफ से आप को इस सवाल से दो-चार होना पड़ रहा है कि उसकी वैचारिक अवधारणा का सार क्या है। कोई क्रांति कम से कम विचार शून्यता से तो नहीं पैदा हो सकती है। ऐसे लोग चुनावी राजनीति में जनता को विकल्प के नाम पर गुमराह भी कर सकते हैं। इस स्थिति पर चिंता महामहिम ने भी जताई है- 'चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं।’ राष्ट्रपति का यह कथन उन सवालों का जवाब और चिंताओं का समाधानकारी सार है, जिस पर उनकी ही कही कुछ बातों के बाद हर तरफ चर्चा हो रही है।

बुधवार, 22 जनवरी 2014

आप नहीं बदलाव का सारथी


बीते तीन-चार दिनों के घटनाक्रम में देश की राजनीति ने अपने लिए नई व्याख्या और विमर्श की चौहद्दी को और बढ़ा दिया है। निराश वे लोग ज्यादा हैं जिन्हें अब भी लोकतंत्र की व्यवस्था 'इनक्लूसिव’ की जगह 'इंपोजिंग’ ही पसंद आ रही है। 21वीं सदी का दूसरा दशक देश में जिस तरह के लोकतांत्रिक तकाजे को बहस के केंद्र में लेकर आया है, उसकी बुनियादी दरकार ही यही है कि जनकल्याण का ढिंढ़ोरा पीटकर सियासी रोटियां सेंकने के दिन बीत गए। अब तो विकास का कोरा नारा भी व्यापक लोकमत के निर्माण में कारगर औजार साबित होगा, ऐसा कहना जोखिम भरा है। ये तमाम स्थितियां एक ही सवाल को बार-बार रेखांकित कर रही हैं कि जनता और सरकार का अस्तित्व एक दूसरे से जुदा या एक के ऊपर एक की बजाय साझा क्यों नहीं हो सकता? और अगर ऐसा नहीं हो सकता तो फिर लोकतंत्र में लोक की उपस्थिति कहां है और किस भूमिका के साथ है?
जिन बीते तीन-चार दिनों की हम बात कर रहे हैं उसमें एक तरफ कांग्रेस पार्टी और उनके सबसे लोकप्रिय करार दिए जाने वाले नेता राहुल गांधी बार-बार ये समझाने में लगे रहे कि उनकी सरकार ने जनता को जितना अधिकार संपन्न बनाया है, उसके लिए जितने प्रत्यक्ष लाभाकरी कदम उनकी सरकार ने उठाए हैं, उतना किसी ने नहीं किया है। आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी अपनी इन उपलब्धियों के नाम पर जनता से वोट के रूप में अपने लिए श्रेय चाह रही है।
2००9 में जब कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए दोबारा सत्ता में आई थी तो सबने एक तरफ से कहा था कि मनरेगा का जादू काम कर गया। अब जबकि इस साल फिर चुनाव होने हैं तो मनरेगा जैसी मेगा योजना तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। यही नहीं इस दौरान यूपीए-एक और दो के कार्यकाल के कई बड़े घोटाले और वित्तीय अनियमितताओं के मामले भी इस दौरान सामने आए। सूचना के अधिकार कानून के तहत एक के बाद एक खुलासे हुए कि सरकार जिस तरह काम कर रही है, उसमें भ्रष्टाचार से चुनौती से निपटने का कोई कारगर मैकेनिज्म नहीं है। एकाधिक मामलों में सीएजी ने कहा कि फैसले लेने के तरीके में ही नहीं मंशा में भी गलतियां हुई हैं। ऐसे में 'पॉवर वैक्यूम’ से लेकर 'पॉलिसी पैरालाइज’ तक के तमगे सरकार को मिले। फिर इस बीच जिस तरह जनता महंगाई और विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार से जूझती रही, उससे कुल मिलाकर एक मोहभंग की स्थिति पैदा हुई।
दिलचस्प है कि राहुल गांधी इन स्थितियों के बावजूद चीजों को कामचलाऊ तरीके से समझना चाह रहे हैं। सुधार और परिवर्तन के नाम पर वे महज रफ्फूगिरी से काम चलाना चाहते हैं। अपनी गलतियों और असफलताओं को वे उपलब्धियां गिनाकर ढकना चाहते हैं। यह एक आत्मघाती सोच है। पहले उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में फिर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में जिस तरह पार्टी को मुंह की खानी पड़ी, उससे कांग्रेस उपाध्यक्ष की आंख अब तक खुल जानी चाहिए थी।
इस मोहभंग का भाजपा अपने तरीके से लाभ उठाना चाहती है। नरेंद्र मोदी के दबंग और सम्मोहक नेतृत्व को सामने लाकर पार्टी को लगता है कि केंद्र में दस साल की सत्ता की केंद्रित जड़ता को वह तोड़ देगी। मोदी अपनी तरह से विकास की बात करते हैं, देश के लोगों खासतौर पर युवाओं के पुरुषार्थ में भरोसा दिखलाते हैं, साथ भी बिजली, सड़क, पानी, उद्योग और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में गुजरात में किए गए अपने सफल प्रयोगों से लोगों में इस बार के चुनाव में परिवर्तन का विकल्प अपनी तरफ स्थिर करने का यत्न करते हैं। रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में जब वे बोलने के लिए खड़े हुए तो उनकी नजर में देश के नवनिर्माण का एक पूरा ब्लू प्रिंट था। उन्होंने लंबा भाषण ही नहीं दिया, तकरीबन सभी मुद्दों पर अपनी राय और सोच भी सबके सामने रखी।
पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही एक बात में चूक कर रही है। वह चूक यह है कि जिस मतदाता के पास आखिरकार उन्हें जाना है, उसकी बदली सोच को रीड करने में दोनों से कहीं न कहीं भूल हो रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन के बाद मीडिया से लेकर देश में बहस के तमाम चौपालों पर अगर यह बात हो रही है कि देश वैकल्पिक राजनीति की तरफ बढ़ रहा है तो यह बात देश की दोनों बड़ी पार्टियों को न सिर्फ समझ में आनी चाहिए बल्कि इसका फर्क उनकी कार्यनीति और आचरण में भी आना चाहिए। सिर्फ यह कह देना कि प्रातिनिधिक की जगह प्रतिभाग के लोकतंत्र की तरफ हम कदम बढ़ाएंगे, काम नहीं चलेगा। देश की जनता के इस आंदोलनात्मक रुझान को पार्टियों को अपने विजन और एक्शन दोनों में ट्रांसलेट करके दिखाना होगा।
दोनों दलों को याद रखना पड़ेगा कि बीते तीन-चार सालों में जनता अगर एकाधिक बार भ्रष्टाचार और महिला असुरक्षा के खिलाफ उतरी है तो यह कौल किसी पार्टी या नेता का नहीं था। देश की सिविल सोसाइटी ने अपने को आगे किया और देश में व्यवस्था परविर्तन की छटपटाहट को सड़क पर ला दिया। आम आदमी पार्टी इसी छटपटाहट का नतीजा है। यह पार्टी अपनी नीति और एजेंडे को लेकर आज जरूर कंफ्यूज्ड जरूर दिखाई पड़ती है पर उसके उन्नयन में कहीं न कहीं वैकल्पिक राजनीति की तलाश शामिल है।
आप से घबराए दलों के लिए शुक्र की बात यह है कि विचार और संगठन के स्तर पर उसकी लड़खड़ाहट साफ तौर पर जाहिर हो रही है। दिल्ली में सरकार बनाने के बाद गवर्नेंस के स्तर पर उसे उम्दा प्रदर्शन करके मिसाल पेश करनी चाहिए थी पर वह अब एक अराजकतावादी राह पर है। आप दिल्ली विधानसभा चुनाव के रिफ्लेक्शन को लोकसभा चुनाव में भी देखना चाहती है। इसलिए वह और उसकी सरकार फिर से सड़क पर प्रतिरोधी तेवर के साथ दिखना चाह रही है। यह आप की रणनीति कम असफलता ज्यादा है। यह उस उम्मीद के साथ भी नाइंसाफी है, जो आप ने लोगों के मन में राजनीतिक बदलाव के नाम पर जगाई थी।
पर आप के भटकाव के बावजूद यह कहीं से साबित नहीं होता कि देश की राजनीति में विकल्प का खाली स्पेस भरने की दरकार ही खारिज हो गई। भारतीय जन-गण का नया मन परंपरावादी राजनीति से वाकई तंग आ चुका है। देश की राजनीति में एक नई ताजी बयार को महसूस करने की तड़प मुट्ठियां बांध चुकी हैं। इन बंधी मुट्ठियों की ताकत को समझना होगा। भाजपा और कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह एक ही तरह के पॉलिटिकल कल्चर में कहीं न कहीं ढ़ल चुकी हैं। नई स्थितियों में जनता के बीच, जनता के साथ और जनता के बल पर ये पार्टियां अगर अपनी ताकत को गुणित नहीं करती हैं तो वह अपने सामथ्र्य के साथ बेईमानी करेंगी। खासतौर पर यह उम्मीद भाजपा को लेकर ज्यादा है क्योंकि वह केंद्र में पिछले दस सालों से सत्ता से बाहर है। वह देश के नागरिक समाज के साथ बेहतर संवाद कर अपनी संभावना में जादुई पंख लगा सकती है।
एक बात और यह कि परिवर्तन का पेटेंटे किसी एक नेता या आदमी के नाम पर दर्ज नहीं होता है। इसलिए सिविल सोसायटी की सक्रियता और आप के उभार को लेकर घबड़ाई हुई प्रतिक्रिया वही लोग दे रहे हैं, जिन्हें लग रहा है कि जनता इस उभार के साथ बंधक की तरह साथ है। दरअसल, देश में जनतांत्रिक सशक्तिकरण एक सामयकि दरकार है और इस दरकार को अपने सारोकारों में शामिल कर जो भी दल या नेता आगे बढ़ेंगे जनता उसके साथ होगी।
 

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

महानायक और लोकनायक के बीच

भारत के लिए आज चुनौती क्या है? इस सवाल का जवाब ही यह साफ करेगा कि हम देश और समाज को लेकर किस तरह की चेतना से भरे हैं। वह चेतना जो पूरी तरह बाजार प्रायोजित है या फिर ऐसी चेतना जो विचार और समाज को एक सीध में देखने की चुनौती सामने रखती है। अभी-अभी ग्यारह अक्टूबर बीता है। इस दिन कई महानायक एक साथ चर्चा में रहे। सबसे ज्यादा चर्चा में रहे मिलेनियम स्टार का रुतबा हासिल कर चुके अमिताभ बच्चन। बिग बी का यह जन्मदिन है। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर चर्चा में इसलिए रहे क्योंकि उन्होंने ट्वेंटी-2० और एकदिनी क्रिकेट के बाद टेस्ट क्रिकेट से भी अपनी विदाई की तारीख की घोषणा कर दी। इन दोनों नामों के साथ दो नाम या तो छूट गए या फिर इनकी चर्चा लोगों ने जरूरी ही नहीं समझी। इस चूक या नासमझी में मीडिया और न्यू मीडिया भी शामिल रहा, जिसे पिछले दो-तीन सालों से यह मुगालता रहा है कि वह देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए अपनी पहल को एक्टिविज्म की हद तक ले जाने का जोखिम मोल ले रहा है। छूट गए ये दो नाम हैं जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख। ग्यारह अक्टूबर को इनकी भी जयंती थी। जेपी को जनता ने ही कभी लोकनायक कहा था तो नानाजी आधुनिक राजनीति में संत छवि को जीने और निभाने वाले रहे। 
21वीं सदी के दूसरे दशक के आगाज के साथ भारतीय लोकतंत्र को सशक्त करने वाले कुछ शुभ संकेत प्रकट हुए। सड़कों पर तिरंगा लेकर देश के नवनिर्माण के लिए उतरने वाले नौजवानों की ललक में भले बहुत गंभीरता न हो और पर इस ललक की प्रासंगिकता और ईमानदारी पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। इस ललक के आलोक में ही देश में छह दशक बाद यह स्थिति आई कि हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसकी बुनियादी अवधारणा के साथ बहसीय मुठभेड़ कर सकें। इस मुठभेड़ ने ही यह साफ किया कि जो व्यवस्था राजनीतिक पथभ्रष्टता और भ्रष्टाचार की महामारी फैलाने की मशीनरी बन गई है, उसके कायम रहते राष्ट्रीय विकास और नवनिर्माण जैसे किसी लक्ष्य तक पहुंचने का संकल्प कैसे पूरा हो सकता है। 
जिस नई पीढ़ी की वैचारिक-सामाजिक संलग्नता को लेकर हम तरह-तरह के आग्रह-पूर्वाग्रह पाले बैठे हैं, उस फेसबुकिया पीढ़ी ने आगे आकर यह साफ किया कि सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स से आगे उसकी उड़ान देश और समाज के रचनात्मक उन्नयन से भी जुड़ी है। देश की युवाशक्ति की यह नई शिनाख्त राष्ट्रनिर्माण में उनकी प्रासंगिक भूमिका की नई पटकथा की तरह है, जिसमें अभी कई घटनाक्रम जुड़ने बाकी हैं। यहां तक की कहानी का क्लाइमेक्स तक आना अभी बाकी है। 
 अरब में बसंत का आना भले एक सुखद उत्तरआधुनिक परिघटना हो पर भारत में बसंत की कल्पना समाज और संस्कृति के बीच एक परंपरागत अनुशीलन है। पुराने पत्तों का झरना और नए पत्तों को आना हमारे लिए जीवन की नित-नूतन कल्पना की तरह है। इसमें निर्माण और विसर्जन का अलगाव नहीं है बल्कि यह एक सहअस्तित्ववादी जीवनदृष्टि है। अच्छी बात यह है कि सीख के ये पुराने सुलेख आज भी नष्ट नहीं हुए हैं, बचे हुए हैं। कसूर हमारा है कि बाजार का इश्तेहार तो हमारी जुबान पर चढ़ जाते हैं पर तारीख के कुछ जरूरी हर्फ पढ़ने की फुर्सत हमें नहीं। अभी टीवी पर एक विज्ञापन खूब चल रहा है जिसमें नेता और राजनीति में बदलाव के लिए माहौल को बदलने की बात जोर-शोर से की जाती है। विज्ञापन का संदेश है कि पुराने माहौल और पुरानी राहों ने अगर हमें निराश किया है तो निश्चित रूप से नए परिवेश और नए पथ की बात होनी चाहिए। यहां तक तो विज्ञापन की सैद्धांतिक टेक समझ में आती है पर क्षोभ तब यह होता है जब पता चलता है यह सब दिखाया-समझाया इसलिए जा रहा है क्योंकि एक महंगा प्लाई कवर बेचना है। जिस दौर में डेमोक्रेसी भी एड मैनेजमेंट का एक जरूरी सब्जेक्ट है, उस दौर के लिए इतनी बात तो जरूर कही जा सकती है लोकतंत्र की बेहतरी के लिए एक जरूरी रचनात्मक हस्तक्षेप की भूमिका बन चुकी है। अब तो बस इसके आगे के अध्याय लिखे जाने हैं। 
जेपी बिहार आंदोलन के दिनों में अकसर कहा करते थे कि जनता को 'कैप्चर ऑफ पावर’ के लिए नहीं बल्कि 'कंट्रोल ऑफ पावर’ के लिए संघर्ष करना चाहिए। यही बात आज प्रकारांतर से अण्णा हजारे कह रहे हैं। यही नहीं राजनीति की जगह लोकनीति और सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात अब फिर से होने लगी है। असंतोष की बात यह है कि लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के इन जरूरी मुद्दों को गिनाने वाले मुंह और खुले मंच तो आज कई हैं पर आमतौर पर इनका सरलीकृत भाष्य ही परोसा जाता है। 
यह सरलीकरण खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसमें एक्टिविज्म और मार्केट फोर्सेज की सरपरस्ती को एक साथ स्वीकार है। यह मलेरिया के मच्छर और उसके टीके को एक साथ लेकर चलने जैसी स्थिति है। यह एक छल है। यह छल ही है जो एक तरफ तो अमिताभ और सचिन के स्टारडम को पाए की तरह खड़ा करता है, वहीं दूसरी तरफ लोकनायक जैसी शख्सियत को भूलने की चालाक दरकार को भी अमल में लाता है। बदलाव न तो बिकाऊ हो सकता है और न चलताऊ। इसे एक चैरिटी की तरह भी आप नहीं चला सकते हैं। बदलाव एक कसौटी है जो विचार, उसकी दरकार और आचरण को एक कलेक्टिव एक्शन की शक्ल देता है। आज अगर कुछ मिसिंग है तो यही कलेक्टिव एक्शन। 
जेपी की लोकनीति और उसके लिए बनी लोक समिति ने कार्यकारी रूप में अपना प्रभाव भले न छोड़ा हो पर उनका यह सबक तो आज भी प्रासंगिक है कि ग्रामसभा से लोकसभा तक का लोकतांत्रिक पिरामिड देश में उलटा खड़ा है। इसमें सत्ता का केंद्र और इसकी नियामक ताकतें प्रातिनिधिक लोकतंत्र के नाम पर दिल्ली, मुंबई या लखनऊ, पटना जैसी राजधानियों में हैं। 
ग्राम पंचायतों का सशक्तिकरण देश में लोकतंत्र के प्रातिनिधिकता के ढ़ांचे को प्रत्यक्ष सहभागिता के ढ़ांचे में बदल सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि विधानसभा या लोकतसभा की तरह ग्रामसभा कभी विघटित नहीं होती। इसका अस्तित्व हमेशा कायम रहता है और संबंधित क्षेत्र के अठारह साल से ऊपर के सभी नागरिक इसके आजीवन सदस्य हैं। नीति और विधि की दरकारों को सरकारें अगर इस विकेंद्रित लोकतांत्रिक इकाई के सहभाग से तय करें तो इसमें पूरे देश का लोकतांत्रिक सहभाग होगा और यह नीतियों और कानूनों के अमल का स्पष्टधरातल तैयार करेगा। जेपी ने बिहर आंदोलन के दौरान ये बातें चीख-चीखकर कहीं। आज अण्णा हजारे और उनके साथ या अलग हुई जमातें चुनाव सुधार और लोकतांत्रिक सुधार का जो एजेंडा देश के सामने रख रहे हैं, उसमें भी ये बातें शामिल हैं। पर न तो देश का मीडिया और न ही देश में पिछले दो-तीन दशकों में तैयार हुई एक्टिविस्टों की जमात इन बातों को जनता के बीच खुलकर सामने ला पा रही हैं, उन्हें समझा पा रही हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हम अपने आइकनों को गढ़ने और उन्हें मान्यता देने में फौरी और बाजारवादी तकाजों की गिरफ्त में होते हैं। जबकि एक देश के जीवन में परंपरा और इतिहास के भी कुछ सबक जरूरी हैं। जेपी ऐसे ही एक सबक का नाम है, जिनको भूलने का मतलब लोकतांत्रिक सुधार की प्रक्रिया को एक तदर्थ नियति की तरफ ले जाएगा। क्या राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी जैसे नायक इस तदर्थवाद के खतरे को समझेंगे? 


रविवार, 25 अगस्त 2013

मीडिया और नियमन



मीडिया और नियमन। बहस का यह मुद्दा पिछले कुछ सालों में देश में जिस तरह उठा है, उसके एक नहीं बल्कि कई निहितार्थ हैं। सरकार का एक बड़बोला मंत्री जब यह कहता है कि बार काउंसिल के लाइसेंस की तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में उतरने से पहले पत्रकारों को लाइसेंसशुदा होना जरूरी होना चाहिए तो समझ में यही बात आती है कि यह सुझाव से ज्यादा चिढ़ है देश की मीडिया के प्रति। यह चिढ़ पूर्वाग्रहग्रस्त भी है।
दरअसल, 21वीं सदी लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए कई नई चुनौती लेकर आई है। इस सदी के दूसरे दशक से तो इन चुनौतियों ने सड़कों पर अपने तेवर एकाधिक बार दिखाए। मुद्दा भ्रष्टाचार का हो कि संसद और जनता के बीच सर्वोच्चता को लेकर छिड़ी बहस, इन तमाम सवालों पर जनता घरों से बाहर निकली। और वह भी बिना किसी राजनीतिक छतरी के नीचे आए। जो सूरत बनी उसमें लोकतांत्रिक सशक्तिकरण की असीम संभावनाएं थीं। ये संभावनाएं आज भी बहाल हैं। इसी दौर में देश और राज्यों की राजधानियों में बैठे जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों और उनके समर्थन से बनी सरकारों को लगने लगा कि यह प्रखर नागरिक चेतना उनके पूरे अस्तित्व को मिट्टी की भीत की तरह भर-भराकर गिरा देगी। लिहाजा इस नागरिक सशक्तिकरण को तीव्र और प्रभावी बनाने वाले हाथ को मरोड़ा जाए। मीडिया इसी हाथ का नाम है। लोकतंत्र का चौथा खंभा कहकर जिसे सरकारें अब तक इज्जत तो बख्शती रही हैं पर उसकी अतिशय संलग्नता और तत्परता को कभी गले नहीं उतार पाई हैं। इमरजेंसी के दिनों में इसका सबसे क्रूर रूप हम देख चुके हैं।
जनता के लिए लोकतांत्रिक साझेदारी का मतलब सिर्फ पांच साल में एक बार मतदान केंद्र के बाहर कतार में खड़े होना भर नहीं है। उसकी साझेदारी तो इससे आगे की है और इसी दरकार ने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को जन्म दिया है। पर दुर्भाग्य से इस दरकार को निर्वाचित जनों और संस्थाओं ने अपने लिए ज्यादा सुरक्षित बनाने का उपक्रम बना लिया और अब तो सूरत यह है कि जनता की लोकतांत्रिक प्रतिभागिता पूरी व्यवस्था में इतनी भर रह गई है कि उसके नाम पर भले सब कुछ होता है पर उसकी मर्जी का कुछ भी नहीं। अखबारों-टीवी चैनलों के बढ़े प्रसार के साथ सोशल मीडिया के नए दमखम ने दुनिया भर के शासक वर्ग के सामने अनुशासन और अनुशीलन का दबाव बढ़ाया है। भारत में इस खतरे को बढ़ते देख सरकार ने कई बार अलग-अलग तरीके से मीडिया पर आंखें तरेरी हैं, उसकी आलोचना की है। चूंकि देश सेंसरशिप और इमरजेंसी के दौर से काफी आगे निकल आया है इसलिए आज मीडिया के मुंह पर जाबी पहनाने की हिमाकत तो शायद ही कोई करे। पर अगर कोई यह कहे कि पत्रकारों के भी लाइसेंस बनने चाहिए, उनके लिए भी एप्टिट्यूड टेस्ट होने चाहिए तो इतना तो लगता ही है कि उसे देश के पत्रकारिता आंदोलन के बारे में जानकारी थोड़ी कम है।
अगर हम बात करें प्रिंट मीडिया की तो देश में पत्रकारिता के लिहाज से दो दौर खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। एक आजादी से पूर्व का दूसरा ग्लोबलाइजेशन के बाद का। अगर एक पराधीन देश की जनता ने जिद पर आने पर दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी सत्ता की चूलें हिलाकर रख दीं तो उसके पीछे देश की भाषाई पत्रकारिता का बहुत बड़ा हाथ था। साहित्यकारों-पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी ने देश के आत्मसम्मान को जगाया और स्वाधीनता की ललक जन-जन में पैदा की। बाद में ग्लोबलाइजेशन के दौर में लगने लगा कि खुरदरे कागजों पर खबर पढ़ने का दौर अब पीछे छूट जाएगा क्योंकि उपभोक्तावादी सनक के साथ टीवी चैनलों की खुलती छतरियों और इंटरनेट के बढ़े जोर के बाद इतनी फुर्सत किसे होगी कि वह घर में बैठकर अखबार बांचे। पर हुआ ठीक इसके उलटा। भाषाई पत्रकारिता ने इस दौर में अपना सबसे बड़ा आरोहण दिखाया। प्रसार के साथ कमाई दोनों में उसने कुबेरी आख्यान रचे। और यह सफलता उस देश में मायने रखती है जहां सरकार को अभी सर्वशिक्षा का प्रण ही दोहराना पड़ रहा है।
ऐसी स्थिति में महज इस कारण से कि जनता के मुद्दे अगर मीडिया की ताकत के साथ देश का एजेंडा बनने लगे तो खतरनाक है, यह सोच कमजोर सत्ता प्रतिष्ठानों में ही उभर सकती है। एक गांधीवादी सामाजिक कार्यकताã के अनशन के आगे मजबूर होकर जब देश की संसद को अपनी कार्यवाही चलानी पड़ी, प्रस्ताव पारित करने पड़े तो उसके साथ यह भी साफ हो गया कि लोकमत और मीडिया के साझे से देश में लोकतंत्र की नई लहर शुरू हो सकती है। फिर क्या था, नेताओं के एक के बाद एक बयान आए कि मीडिया ने अण्णा आंदोलन को ओवरएक्सपोज किया। यही स्थिति तब भी सामने आई जब पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ की गई बर्बरता के खिलाफ पूरे देश के युवा आक्रोशित होकर घरों से बाहर आए।
देश की राजनीतिक जमात को अभी तक यही लगता रहा है कि उनके मुद्दे और उनकी सोच और पहल से ही देश में लोकतंत्र की गाड़ी आगे बढ़नी चाहिए। जनता बस इस गाड़ी में सवारी की तरह बैठ जाए, वह ड्राइविंग सीट पर आने की हिमाकत ना करे। यहां तक कि प्रेस परिषद के मुखिया जस्टिस काटजू जैसे लोगों के दिमाग में भी यही बात आती है कि पत्रकारिता के पेशे में कूप-मंडूक लोग भरे पड़े हैं।
नक्सल हिंसा से लेकर किसानों की आत्महत्या तक को लेकर जमीनी रिपोर्टों और इन पर बहस का दुस्साहस देश के पत्रकारों ने दिखाया है। इस कवरेज के साथ प्रबंधकीय मुठभेड़ भी पत्रकारों को करनी पड़ी है। बावजूद इसके आज अगर भ्रष्टाचार को लेकर केंद्र से लेकर कई सूबों की सरकारें हलकान हैं तो उसके पीछे भी मीडिया की चौकस नजर ही है। पिछले दो-तीन सालों में चले नागरिक सशक्तिकरण के अभिक्रम को भी मीडिया का संबल इसलिए मिला क्योंकि यह समय की मांग है। देश की राजनीतिक बिरादरी अगर आज जनता की नजरों में अपना इकबाल खोती जा रही है तो उसकी वजह ये लोग खुद हैं। आप आईने पर यह दबाव नहीं डाल सकते कि वह आपको मनमाफिक तरीके से दिखाए। यह बात मनीष तिवारी के साथ उन तमाम लोगों को समझनी चाहिए जिन्हें उनके जैसा बोलना-सोचना अच्छा लगता है। यह बात उन जस्टिस साहब को भी समझनी चाहिए जिन्हें मीडिया मीडियाकरों की जमात लगती है और देश के नब्बे फीसद लोग जाहिल। परिवर्तन का हरकारा इस देश में मीडिया हमेशा रहा है और आज उसके लिए कई बिजनेस कंपल्शन बढ़ जाने के बावजूद अगर उसके भीतर यह जज्बा बहाल है, फिर तो सूचना और खबरों के इस पूरे तंत्र को सलाम। नियमन और लाइसेंस की दरकार तो वहां ज्यादा है जहां निर्वाचित निर्वाचकों के स्वयंभू स्वामी बने फिर रहे हैं।

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रविवार, 3 मार्च 2013

खूनी हिमाकत और घाटी में पंचायत


अभी यासीन मलिक चर्चा में थे। उन्होंने घाटी की स्थिति को लेकर अपने विवादास्पद से ज्यादा संदेहास्पद स्टैंड को दुनिया के सामने रखने के लिए 'पाक धरती' चुनी। इस पाक सरजमीं पर उन्हें हाफिज सइद तक की मौजूदगी नागवार न गुजरी। भारत सरकार इस सबके बावजूद थोड़ी इत्मिनान में है तो उसकी वजह है। दरअसल जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र बहाल है। वहां पंचायत से लेकर विधानसभा तक चुने हुए प्रतिनिधि शासन व्यवस्था को संभाल रहे हैं। यह बात भारत दुनिया के किसी भी मंच पर जब कहता है तो कश्मीर समस्या को लेकर तमाम दुष्प्रचारों का वह एक तरह से मुंहतोड़ जवाब दे रहा होता है। यह जवाब खासतौर पर पाकिस्तान और उससे सुर मिलाकर चलने वाले कश्मीरी अलगवादियों को कभी भी सोहाया नहीं। 
बड़े धमाकों और कई दिनों तक चलने वाले हड़तालों के दिन अब जम्मू-कश्मीर में लद चुके हैं। जाहिर है कि इससे नफरत और टूट का खेल खेलने वालों का मनोबल टूटा है। हताशा में उनकी की गई 'पत्थरबाजी' का भी डर वहां काम नहीं कर रहा है। नतीजतन, अमन के दुश्मनों ने पिछले एक-दो सालों में अपनी रणनीति बदल ली है। उन्हें साफ लग रहा है कि सूबे में अपना प्रभाव अगर बनाए रखना है तो उन्हें वहां आए लोकतांत्रिक स्थायीत्व को डिगाना होगा। इसके लिए उन्होंने स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक ढांचे को तहस-नहस करने का रास्ता चुना।
वैसे इस मंसूबे को पूरा होना उनके लिए बड़ी चुनौती है। क्योंकि सूबे में जब पंचायत चुनाव हुए थे तो मतदान का फीसद 80 से ज्यादा था। साफ है कि वहां लोकतंत्र कोई थोपी हुई स्थिति नहीं बल्कि एक आस्थापूर्ण चुनाव है। अब जबकि मौत का डर दिखाकर पंचायत प्रतिनिधियों को जबरिया इस्तीफा देने के लिए वहां मजबूर किया जा रहा है, तो इसे आतंकी आकाओं का दुस्साहस नहीं बल्कि यह उनकी कुंठा का ज्यादा बड़ा प्रमाण है।
घाटी में पंच-सरपंच मिलाकर करीब 33 हजार पंचायत प्रतिनिधि हैं। इनमें करीब 400 ने डर से इस्तीफा दे दिया है। कुछ लोग इस संख्या को 600 के करीब बताते हैं। इसी तरह दर्जनों पंचायत प्रतिनिधियों को या तो मार डाला गया है या वे आतंकी हिंसा में घायल हुए हैं। बारामूला जिले के क्रीरी क्षेत्र में एक सरपंच की गोलीबारी में मौत, इस तरह की हिंसा की ताजा घटना है। बावजूद इस हिंसक सचाई के नहीं लगता कि वहां लोकतंत्र की विकेंद्रित ताकत को समाप्त करना इतना आसान होगा।
अलबत्ता, यह जरूर है कि लोकतंत्र की जड़ों पर हिंसक प्रहार को लेकर राज्य सरकार को निश्चित रूप से प्रभावी कदम उठाने चाहिए। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को इस बाबत चिंता से कई बार अगवगत भी कराया गया है। मुख्यमंत्री ने खुद इस चुनौती को गंभीरता से कबूला भी है। राज्य सरकार ने अपनी तरफ से इस दौरान जरूर कुछ कदम भी उठाए होंगे। पर पंचायत प्रतिनिधियों की जानें अगर अब भी जा रही हैं और उनके इस्तीफे का सिलसिला अब भी रुका नहीं है, तो इसका मतलब यही है कि उमर सरकार की इसे रोकने की कोशिश असफल रही है। अच्छा होगा कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर एकल पहल के बजाय एक राजनीतिक सर्वसम्मति के साथ कोई पहल करे।

रविवार, 11 मार्च 2012

लोकतंत्र का पंचनामा


अपने यहां आलोचना की नामवरी परंपरा में भी एक बात अकसर दुहराई जाती है कि क्या दिखता है से ज्यादा जरूरी है कि हम देखते क्या हैं। छह दशक के गणतंत्रीय अनुभव में ऐसे कई मौके आए जब हमने कुछ बहुत जरूरी बहसों और सरोकारों को महज इसलिए नजरअंदाज कर दिया क्योंकि हमारी समझदारी के आग्रह कहीं और से बन-बिगड़ रहे थे। रचना और विकास के केंद्रित ढांचे को विकेंद्रित विकल्प पर तरजीह देने का फैसला ऐसा ही एक उदाहरण है।
केंद्रित सत्ता के आग्रह में योजना और विकास को कुछ हाथों से बहुत हाथों में कभी बंटने ही नहीं दिया। बाद में जब लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण का दबाव बढ़ा भी तो पंचायतीराज के रूप में एक आधे-अधूरे और अधिकारविहीन ढांचे को निचले स्तर पर तैयार कर लिया गया। दिलचस्प है कि भारत का लोकतंत्र पूरी दुनिया में इस मामले में सबसे भिन्न और आगे है कि हमारे यहां प्रातिनिधिक के साथ प्रतिभागिता का तंत्र है, जो जनता का और जनता के लिए तो है पर जनता द्वारा नहीं है।
चूंकि लोकतंत्र एक जीवंत और लगातार अपने अनुभवों से समृद्ध होने वाली व्यवस्था है, लिहाजा एकबारगी फिर यह बहस सतह पर आ गई है कि हम लोकतांत्रिक प्रतिनिधत्व को महत्व दें कि लोक सहभाग को। जाहिर है लोक सहभाग के अभाव में ही लोक प्रतिनिधित्व का महत्व है। ऐसे में लोकसभा-राज्यसभा और विधानसभा के मुकाबले ग्रामसभा की सर्वोपरिता पर सवाल उठाने का कम से कम कोई सैद्धांतिक कारण तो नहीं ही है।
प्रतिनिधित्व को समग्र लोक भागीदारी में बदलने के इसी आग्रह को एक बार फिर से स्वर दिया है समाजसेवी अन्ना हजारे ने। पिछले एक साल में जबसे उनके कार्य और विचार पर लोगों का ध्यान ज्यादा गया है, वे ग्रामसभा के बहाने पंचायतराज और ग्राम स्वराज की बात बार-बार करते रहे हैं। पर भ्रष्टाचार और जनलोकपाल जैसे ज्यादा दिलचस्पी के मुद्दों और फिर उन पर पक्ष-विरोध की बयानबाजी में यह जरूरी मुद्दा कहीं पीछे छूटता रहा है। देश के 63वें गणतंत्र दिवस के मौके पर हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने संघर्ष के अनुभव से कहा कि चुनाव के बाद चुने गए प्रतिनिधि जनता के सेवक की तरह नहीं बल्कि मालिक की तरह सलूक करते हैं। यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। लिहाजा, ग्रामसभाओं को अधिक अधिकार संपन्न बनाकर उसकी भूमिका को ज्यादा निर्णायक बनाने के साथ पंचायतराज संस्था के सशक्तिकरण की दरकार समय की मांग है। 
सोमवार से संसद का बजट सत्र शुरू हुआ है। इस मौके पर राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संस्थापक केएन गोविंदाचार्य ने पंचायतों के सशिक्तकरण के मुद्दे को एक नई तार्किक दरकार के साथ उठाया है। उनकी मांग है कि सरकार केंद्रीय बजट का कम से कम सात फीसद हिस्सा सीधे पंचायतों को दे। ऐसा करने से न सिर्फ लोकतंत्र का यह उपेक्षित ढांचा सशक्त होगा बल्कि राजसत्ता और अर्थसत्ता के विकेंद्रीकरण का मार्ग भी प्रशस्त होगा। शहरीकरण की बढ़ती होड़ के बावजूद आज भी देश में पांच लाख से ज्यादा गांव हैं और करीब 70 फीसद आबादी इन्हीं गांवों में रहती है। गांव और कृषि की अवहेलना करके हम एक सशक्त और विकसित भारत की कल्पना नहीं कर सकते हैं। पिछले 20 सालों में यह मांग बार- बार उठी है कि सरकार पंचायती राज संस्था को अपनी विकास योजनाओं को तय करने का अधिकार दे और इसके लिए उसे आर्थिक रूप से स्वाबलंबी बनाया जाए ताकि योजनाएं दिल्ली से चलकर गांवों तक न पहुंचे बल्कि इनका निर्धारण स्थानीय स्तर पर स्थानीय लोगों द्वारा हो। गोविंदाचार्य नए सिरे से इस मुद्दे पर दबाव बनाना चाह रहे हैं। आगे यह देखना होगा कि जो चिंता अब तक नागरिक समाज के स्तर पर है, उसके साथ सरकार कब तक और कितना जुड़ पाती है। 

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

ओबामा बने प्रेसीडेंट तो अपने सैम बढई

अमेरिका  में जब बराक ओबामा राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने में सफल हुए थे, तो वहां की और भारत की स्थितियों को राजनैतिक और बौद्धिक जमात के बीच कई तुलनात्मक नजरिए सामने आए। बार-बार अमेरिका के उदाहरण को सामने रखकर यह समझने की कोशिश की गई कि भारत उस उदार और विकसित राजनीतिक-सामाजिक स्थिति तक पहुंचने से कितनी दूर है, जब हम भी अपने यहां एक दलित को या एक मुसलमान को प्रधानमंत्री पद पर बैठा देखेंगे। जो बात ज्यादा भरोसे से और तार्किक तरीके से समझ में आई वह यही कि विकास और संपन्नता मध्यकालीन और जातीय बेडि़यों को तोड़ने का सबसे मुफीद औजार है। अमेरिका में ये औजार सबसे ज्यादा तेजी से काम कर रहे हैं। इसलिए वहां चेंज को अलग से चेज करने की जरूरत अब नहीं है। पर क्या भारत भी अपनी विकासयात्रा में उन्हीं सोपानों पर पहुंच रहा है, जहां चेंज कोई चैलेंज न होकर एक स्वभाविक स्थिति बन जाती है। अगर आपका उत्तर है तो आपको अपने सैद्धांतिक आधारों पर एक बार फिर विचार करना होगा? दरअसल, यह दरकार कहीं और से नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के हालात के बीच से आए हैं। 2014 के आम चुनाव में यूपी के चुनावी गणित कितने काम आएंगे, पता नहीं। पर सभी सियासी पार्टियां इसे दिल्ली की सत्ता के सेमीफाइनल के तौर पर ही लड़ रही हैं। आरक्षण का खुर्शीदी-बेनी खेल पहले ही बोतल से बाहर आ गया है। रही सही कसर जातीय राजनीति को लेकर खेले गए नंगे खेल ने पूरा कर दिया है। क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले दलों की मजबूरी तो छोड़ दें, कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय प्रभाव और विस्तार वाले दलों ने भी विकास व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को छोड़कर क्षेत्र और जाति की राजनीति पर अपना यकीन ज्यादा दिखाया। बाबूसिंह कुशवाहा मामले में भाजपा ने जहां आंतरिक विरोध तक को सुनना गंवारा नहीं किया, वहीं रियल और  फेयर पॉलिटिक्स के हिमायती राहुल गांधी ने चुनावी सभा में सैम पित्रोदा को विश्वकर्मा जाति का बताकर केंद्र में अपने पिता राजीव गांधी के कार्यकाल के आईटी विकास को जातीय तर्कों पर उतारने को मजबूर हुए। 
विकास को सामाजिक न्याय की समावेशी संगति पर खरा उतारना तो समझ में आता है पर इसे सीधे-सीधे जातीयता की जमीन पर ला पटकना खतरनाक है। इस लिहाज से कांग्रेस पार्टी की इस हिमाकत को सबसे बड़ा मर्यादा उल्लंघन ठहराया जा सकता है, जब उसने देश में आईटी क्रांति के प्रणेता रहे सैम पित्रोदा को जातीय राजनीति के चौसर पर पासे की तरह फेंका। यह गलती नहीं बल्कि कांग्रेस की एक सोची-समझी चुनावी रणनीति है, यह तब ज्यादा जाहिर हुआ जब पार्टी ने यूपी में अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी करते हुए सैम को मीडिया से मुखातिब कराया। 
सैम अगर सबके सामने कैलकुलेटेड ढिठाई से यह कहते कि 'मैं बढ़ई का बेटा हूं और अपनी जाति पर मुझे फख्र है', तो कांग्रेस का उनको लेकर खेला गया चुनावी खेल तो समझ में आता है पर सैम को क्या पड़ी थी कि वह खुद को इस खेल में इस्तेमाल हो जाने दे रहे हैं। क्या सैम की यह बढ़ईगिरी विकास को भी जातिगत शिनाख्त देने की दरकार को खतरनाक अंजामों तक नहीं ले जाएगी। राजीव गांधी के जमाने का आईटी 21वीं सदी के एक दशक बीतते-बीतते कहां पहुंच गई, आप समझ सकते हैं।

बुधवार, 31 अगस्त 2011

लोकशाही तो है पर यकीन क्यों नहीं होता!


संसद और सांसदों दोनों के लिए मैजूदा दौर मुश्किलें बढ़ाने वाला है। दिलचस्प है कि इन दोनों की भूमिका और विशेषाधिकारों पर जिसे देखिए वही सवाल उछाल दे रहा है। असल में इस सारी मुसीबत की जड़ में दल हैं और उनसे पैदा हुआ राजनीतिक दलदल है। देश के लोकतंत्र को जो लोग संसदीय सर्वोच्चता के मूल्य के साथ समझने के हिमायती हैं, उन्हें भी आज शायद ही इस बात को कबूलने में कठिनाई हो कि दलीय राजनीति के छह दशक के अनुभव ने इस मू्ल्य को बहुत मू्ल्यवान नहीं रहने दिया है। नहीं तो ऐसा कभी नहीं होता कि विचार और लोकहित की अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर अलग-अलग नाम और रंग के झंडे उड़ाने वाली पार्टियों और उनके नेताओं की विश्वसनीयता पर ही सबसे ज्यादा सवाल उठते।   
अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करें तो इस आंदोलन को मिला अपार लोकसमर्थन कहीं न कहीं राजनीतिक बिरादरी की जनता के बीच खारिज हुई विश्वसनीयता और आधार के सच को भी बयान करती है। एक गैरदलीय मुहिम का महज कुछ ही महीनों में प्रकट हुआ आंदोलनात्मक तेवर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की जमीन को नए सिरे से तैयार करने की दरकार को सामने रखता है। अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ महीनों में इस तैयारी का न सिर्फ लोकसमर्थित तर्क खड़ा हुआ है, बल्कि इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव भी बढ़ा है। कांग्रेस और भाजपा के कुछ सांसदों ने आज अगर अपने ही दलीय अनुशासन के खिलाफ जाने की हिमाकत दिखाई है तो यह इसलिए कि जनता से लगातार कटते जाने के खतरे को कुछ नेता अब समझने को तैयार हैं।
पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम में जनता का गुस्सा हर दल और उसके सांसदों के प्रति दिखा है। यह गुस्सा इसलिए है कि लोकतंत्र को देश में एक दिन के चुनावी अनुष्ठान तक सीमित कर दिया गया है। लोकसंवाद की सतत प्रक्रिया पांच साल की मुंहजोही के लिए मजबूर हो गई है। एक सफल लोकतंत्र जीवंत और प्रगतिशील भी होता है। समय और अनुभव के साथ उसमें संशोधन जरूरी है। जनलोकपाल अगर आज की तारीख में जनता का एक बड़ा मुद्दा है तो इसके बाद सबसे जरूरी मुद्दा दलीय राजनीति के ढांचे आैर चुनाव प्रणाली में सुधार है।
दिलचस्प है कि खुद हजारे ने भी पिछले दिनों जनप्रतिनिधत्व तय करने वाली मौजूदा परंपरा और  तरीके पर सवाल उठाए हैं। यही नहीं उन्होंने तो संसदीय सर्वोच्चता की दलील के बरक्स लोकतंत्र की अपनी नई समझ भी रखी है। पंचायतीराज का मॉडल प्रातिनिधिक के सामने प्रत्यक्ष और  विकेंद्रित लोकतांत्रिक संस्था की अनोखी मिसाल है। लोकसभा और विधानसभाओं के विशेषाधिकार का तर्क ग्रामसभाओं के अविघटनकारी विशेषता के सामने कमजोर मालूम पड़ते हैं। यहीं नहीं पिछले चार दशकों से उठती आ रही 'पार्टीलेस डेमोक्रेसी" की मांग एक बार फिर से केंद्र में आ रही है। नए समय में यह मांग जहां नए सरोकारों से लैस हो रही हैं, वहीं दलों से पैदा राजनीतिक गलीज और  दलदल ने इस दरकार को और ज्यादा पुष्ट कर दिया है।
 लिहाजा, अब वक्त आ गया है कि देश अपनी लोकतांत्रिक परंपरा को नए संदर्भ और समय के अनुरूप मांजने को तत्पर हो। अगर यह तत्परता राजनीतिक दलों के भीतर से अब भी स्वत: नहीं प्रकट होता तो यह उनकी एक अदूरदर्शी समझ होगी। उम्मीद करनी चाहिए कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों व दायित्वों को लेकर जनता और उनकी नुमाइंदगी करने वालों में साझी समझदारी प्रकट होगी। और पिछले साठ सालों की यात्रा के बाद देश एक बार फिर अपने लोकतांत्रिक आधारों को पुष्ट करने के लिए तत्पर होगा। इस तत्परता का फलित भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को काफी हद तक तय करने वाला होगा।

सोमवार, 29 अगस्त 2011

क्या हुआ जो मीडिया भी अन्ना गया


 स्वतंत्र भारत में चौबीसो घंटे के खबरिया चैनलों का दौर शुरू होने और भाषाई पत्रकारिता के विकेंद्रित विस्तार के बाद यह पहला अनुभव है, जब  अखिल भारतीय स्तर पर जनभावना का कोई दिव्य प्रकटीकरण हो। जो लोग आज अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में 1974 के जयप्रकाश आंदोलन की लिखावट पढ़ने चाह रहे हैं, उनकी भी पहली प्रतिक्रिया यही है कि लोकपक्ष और नए मीडिया का सकरात्मक साझा चमक के साथ कितना असर पैदा कर सकता है, यह चमत्कृत कर देने वाला अनुभव है। प्रेस को अगर लोकतंत्र का विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद चौथा बड़ा स्तंभ माना गया है, तो इसलिए भी कि उसकी भूमिका एक लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने के लिए खासी जिम्मेदारी से भरी है। इमरजेंसी के दौरान जिम्मेदारी के इन हाथों को बड़ियां पहनाई गई थी तो अपने संपादकीय स्तंभ की जगह को खाली छोड़ अखबारों ने अपना विरोध जताया था।
15 अगस्त की अगली सुबह देश में नागरिकों के अहिंसक और  शांतिपूर्ण प्रतिरोध के अधिकार पर जो कुठाराघात हुआ, संसद का सत्र जारी रहने के बावजूद उसकी गूंज वहां के बजाय मीडिया में ज्यादा पैदा हुई। यह देश की मीडिया का सद्विवेकी रवैया का ही नतीजा रहा कि उसने लोकपक्ष की जुबान और चेहरा बनने का फैसला लिया। कह सकते हैं कि न्यायकि सक्रियता के बाद देश में मीडिया की सक्रियता के यह एक नए सर्ग का शुभारंभ है। दिलचस्प है कि अन्ना हजारे ने भी 16 अगस्त से अपने प्रस्तावित अनशन से एक दिन पहले मीडिया का इस बात के लिए शुक्रिया अदा किया था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम को जोर पकड़ाने में उसकी बड़ी भूमिका रही है। यही नहीं जब वे रामलीला मैदान से अनशन से उठे तो उन्होंने और उनके साथियों ने मीडिया का कई-कई बार आभार जताया। 
असल में यह एक जीवंत और प्रगतिशील लोकतंत्र का तकाजा है कि लोक भावना और लोक संघर्ष  के स्पेस को वह न तो कमतर करता है और न ही उसे खारिज करता है। क्योंकि इससे लोकहित के मुद्दों के दरकिनार हो जाने का खतरा पैदा होता है। समाचार की 'इंफोमेंटी" समझ और 'प्रोफेशनल" होड़ ने मीडिया की भूमिका पर पिछले दो दशकों में कई सवाल उठाए हैं। प्रेस की आजादी के नाम पर मनमानी करने की छूट ने लोकतंत्र की एक जिम्मेदार संस्था को काफी हद तक अगंभीर और गैरजवाबदेह बना दिया है, ऐसे आरोप मीडिया पर लगने अब आपवादिक नहीं रहे। ऐसे में मीडिया के लिए यह फख्र के साथ सबक सीखने का भी अवसर है कि अगर वह लोकचेतना का चेहरा बनने का दायित्व पूरा करता है तो न सिर्फ उसकी विश्वसनीयता बहाल रहती है बल्कि उसकी साख भी बरकरार रहती है। 
लोकहित का तकाजा ही यही है कि उसे गुमराह करने के बजाय उसका हमकदम बना जाए, उसका मार्गदर्शी बना जाए। नया मीडिया ज्यादा तकनीक संपन्न है, लिहाजा उससे ज्यादा जिम्मेदार पहरुआ (वॉच डॉग) भी होना चाहिए। ऐसे में कुछ लोगों और समाज के कुछ वर्गों से आई कुछ शिकायतें मायने रखती है। मसलन असम के इरोम शर्मिला के दस साल से चले आ रहे अनशन का मुद्दा चौबीसों घंटे चौकन्ना मीडिया की आंखों से ओझल क्यों रहा? इसी तरह क्या पूनम पांडे और राखी सावंत को जिस मुंह से घर-घर तक पहुंचाने वाले मीडिया के पेशेवर सरोकार क्या वक्त-बेवक्त सुविधानुसार नहीं बदलते हैं और क्या यह बदलाव पूरी तरह विश्वसनीय माना जा सकता है।
बहरहाल, अन्ना का आंदोलन भले फिलहाल समाप्त हो चुका हो पर देश में लोकहित के कई जरूरी मुद्दे अब भी सरकार और व्यवस्था के एजेंडे में शामिल होने बाकी हैं। नए मीडिया का एक दायित्व यह भी कि वह हाशिए के इन मुद्दों को उठाए और एक सशक्त लोकमत के निर्माण का अपना दायित्व आगे भी पूरी ऊर्जा के साथ निभाए।