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शनिवार, 17 मार्च 2018

राहुल की लाइन से अलग बोल रहे हैं खडगे



- प्रेम प्रकाश

कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राहुल जहां भाजपा को भय और तोड़ने वाली पार्टी बता रहे हैं तो वहीं खडगे कांग्रेस को संघ-भाजपा से सीखने के लिए कह रहे हैं
   
यूपी की दो सीटों पर उपचुनाव में भाजपा की हार से देश में राजनीतिक पारा भले चढ़ा दिखता हो, पर इस गरमाहट से भारतीय राजनीति का चरित्र का बहुत बदलने जा रहा है, एेसा कम से कम फिलहाल तो नहीं दिख रहा। यूपी में अगला उपचुनाव कैराना सीट पर होगा। खबर है कि उपचुनावों से भागने वाली इस बार बसपा वहां भाजपा से भिड़ने के मूड है। फूलपुर और गोरखपुर के नतीजे अगर कैराना में भी दोहरा दिए जाते हैं तो भी यह सवाल अपनी जगह कायम रहेगा कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष की गोलबंदी का बड़ा आधार क्या होगा और इसकी अगुवाई क्या कांग्रेस करने में सफल होगी।
दिल्ली में अभी 2019 के चुनावी समर की तैयारी के लिए कांग्रेस का तीन दिवसीय सम्मेलन चल रहा है। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद यह कांग्रेस का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन है। हाल में जो भी चुनाव-उपचुनाव हुए हैं, उसमें कांग्रेस को शिकस्त ही खानी पड़ी है। आगे अगर कर्नाटक भी उसके हाथ से निकला तो बड़े सूबे के तौर पर उसके पास बस पंजाब रह जाएगा। इसलिए यूपी-बिहार की सोशल इंजीनियरिंग से बसपा-सपा औ राजद भले अपनी प्रांतीय पकड़ सुधार लें, इससे आगे वे विपक्ष के किसी राष्ट्रीय गठजोड़ की उम्मीद नहीं जगाते हैं। रही कांग्रेस की बात तो वह इस उम्मीद में भले है कि 2019 के पहले उसकी छतरी के नीचे सारा विपक्ष आ जाएगा। पर इसके लिए उसकी जो तैयारी और समझ है, वह एक फिर निराशा पैदा करती है।
पार्टी के अधिवेशन में लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील की है कि भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं की तरह वे भी कर्नाटक में घर-घर जाएं। जबकि इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि वे नफरत और डर फैलाने वाली नहीं बल्कि प्रेम और भरोसा जगाने वाली पार्टी हैं। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा की राजनीतिक संस्कृति में बुनियादी अंतर बताया। सवाल यह है कि एक ही पार्टी के भीतर नेताओं के बीच जब यह साफ नहीं है कि वे चुनावी मैदान में उतरने से पहले किन बातों पर जोर देंगे और चुनावों में जीत के लिए उनकी बुनियादी रणनीति क्या होगी, वह पार्टी अगर देश के आगे राजनीतिक बदलाव और सत्ता परिवर्तन की उम्मीद जगाती है, तो यह भी साफ दिख रहा है कि इस उम्मीद के खिलाफ विरोधाभास खुद उनके अपने भीतर है।   
एक तरफ तो अधिवेशन के उद्घाटन भाषण में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी यह कह गए कि आज देश में गुस्सा फैलाया जा रहा है, देश को बांटा जा रहा है। हिंदुस्तान के एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से लड़वाया जा रहा है। हमारा काम जोड़ने का है। कांग्रेस का हाथ निशान ही देश को जोड़ कर रख सकता है। दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी के दूसरे नेता यह कह रहे हैं कि चुनावी जीत के लिए उन्हें भाजपा-संघ का मॉड्यूल अपनाना चाहिए। साफ है कि कांग्रेस अगर अपने इतिहास के सबसे बुरे दिन में है तो यहां से उबरने का रास्ता उसे अभी तक नहीं सूझ रहा है।
जुमलों और भाषणों के भरोसे न तो राजनीति बदलाव संभव है और न ही सत्ता के शिखर तक पहुंचा जा सकता है। आज की तारीख में यह बात अगर देश में किसी राजनीतिक दल को सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है तो वह देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस है।


बुधवार, 8 जनवरी 2014

चुनाव महज मोदी और राहुल के बीच नहीं


नरेंद्र मोदी अगर 2०14 में देश के प्रधानमंत्री होते हैं तो यह अनिष्टकारी होगा। नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन के बाद हाल में मनमोहन सिंह इस बात को अलग-अलग तरीके से कह चुके हैं। इस सिलसिले में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता और रणनीतिकार योगेंद्र यादव के बयान का भी जिक्र जरूरी है। उनके कहने का तरीका थोड़ा भिन्न है। वे लोकसभा चुनाव को मोदी बनाम राहुल के तौर पर देखने पर ही लानत भरते हैं। उनका बयान अमत्र्य और मनमोहन के बयान के करीब से जरूर गुजरता है पर उसकी मंजिल कहीं और है। वे सिर्फ व्यक्ति केंद्रित राजनीति पर सवाल नहीं उठाते बल्कि साथ ही इस दरकार को भी तार्किक रूप से रेखांकित करते हैं कि लोकतंत्र में चुनाव का मतलब सीएम या पीएम चुनना भर नहीं है और न ही इस या उस पार्टी की हार भर है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो चुनाव उस महापर्व का नाम है, जिसमें देश और समाज का हर वर्ग बराबरी के साथ शिरकत करता है। यह शिरकत सरकार बनाने या गिराने से ज्यादा उस गुंजाइश को बहाल रखने के लिए अहम है, जिसमें एक समान्य जन भी अपने हाथ में सत्ता की चाबी संभाल सकता है। यही लोकतंत्र की महानता है, उसकी ताकत है।
बहरहाल, बात इस चर्चा के जरिए उस लोकतांत्रिक मानस की जिसमें बदलाव की बात आज हर तरफ हो रही है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की बनी सरकार ने इस बदलाव की संभावना को कहीं न हीं ज्यादा पुष्ट कर दिया है। देश में पिछले कम से कम तीन सालों के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में जनता की ताकत और उसका निर्णायक सहभाग कैसे सुनिश्चित हो, यह एक बड़ा मुद्दा बना है। बात विकास की हो, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य की हो तो स्थानीय जनता की जरूरत की सर्वोपरिता समझी जा सकती है। नागरिक समाज को खड़ा करने से निश्चित रूप से एक अनुशासित लोकतंत्र को खड़ा होने में मदद मिलेगी।
देश में अब तक आम आदमी पांच साल में एक बार मतदान की कतार में खड़ा होकर अपने लोकतांत्रिक अधिकार और कर्तव्य को पूरा करता रहा है। इससे आगे उसके करने और समझने की कोई गुंजाइश छोड़ी ही नहीं गई है। इस कारण सत्ता से जनता की दूरी बढ़ी है और सत्ता को लेकर एक अविश्वास का जनमानस भी बना है। ऐसी स्थिति लोकतंत्र की मौलिक अवधारणा के भी खिलाफ है। पिछले दिनों जन प्रतिनिधियों से लेकर संसद की सर्वोच्चता पर जब बहस छिड़ी तो मौजूदा राजनीति के माहिरों को यह काफी अखड़ा भी। भारत में जिस तरह का लोकतंत्र है और हमारा संविधान जिसकी व्याख्या करता है उसमें संसद निस्संदेह सर्वोच्च नियामक संस्था है। पर इससे यह आशय कैसे निकल सकता है कि संसद की यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है। और अगर जनता सर्वोच्च है तो फिर उसे अपनी यह सर्वोच्चता साबित करने का मौका पांच साल में महज एक बार क्यों मिले। लिहाजा, आज अगर इस सवाल को लोग लोकसभा चुनाव से पहले उठा रहे हैं कि देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, तो इसमें नामों को लेकर आग्रह-दुराग्रह तो दिख रहा है, पर यह सवाल कहीं पीछे छूट जा रहा है कि नामों और दलों की शिनाख्त के आधार पर देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए हो रही कोशिशों के सिलसिले को एक कारगर अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता है।
जेपी चौहत्तर आंदोलन के दिनों में बार-बार कहते रहे कि हमें 'कैप्चर ऑफ पॉवर’ नहीं बल्कि 'कंट्रोल ऑफ पॉवर’ चाहिए। घटनाक्रमों में तेजी से आए बदलाव के कारण जेपी का लोक समिति और लोक उम्मीदवार का प्रयोग बहुत कारगर नहीं हो सका। संपूर्ण क्रांति के शीर्ष व्याख्याकार आचार्य राममूर्ति ने भी माना कि चौहत्तर के लोकनायक के प्रयोग को महज सत्ता परविर्तन के तौर पर देखना, उन तमाम मुद्दों और संभावनाओं के प्रति अन्याय है, जिसने जनता को तब काफी मथा था। केंद्र में जनता सरकार का आना महज इसका प्रतिफल कतई नहीं था।
आज जब बात हो रही है 2०14 के लोकसभा चुनाव की तो इसमें पिछले कुछ सालों में नागरिक समाज की उस पहल का तो अक्श दिखना ही चाहिए जिसने लोकतंत्र की ज्यादा सार्थक व्याख्या और भूमिका के प्रति लोगों के बीच भरोसा जगाया, जिनका धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्थाओं और उसके निर्वाचन प्रक्रिया के प्रति ही मोहभंग होना शुरू हो गया था। आज मुद्दा यह नहीं है कि देश के अगले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होंगे या राहुल गांधी। न ही यह मुद्दा है कि अगली सरकार केंद्र में यूपीए की बनती है कि एनडीए की। यहां तक कि मुद्दा यह भी नहीं है कि गठबंधन राजनीति के दौर में कौन किस गोद से छिटककर किस गोद में जाकर बैठ जाता है। बल्कि मुद्दा तो यह है कि क्या आगामी लोकसभा चुनाव वैकल्पिक राजनीति की बढ़ी संभावना को बढ़ाता है कि नहीं,जनता और सरकार के बीच की दूरी कम होती है कि नहीं। देखने वाली बात यह भी होगी कि केंद्र में सत्तारूढ़ होने वाली पार्टी या उसका गठबंधन राजनीति को लोकनीति की तरफ ले जाने के लिए कितनी तत्पर दिखती है।
यहां यह साफ होने का है कि विकल्प और स्थानापन्न होने में फर्क है। कांग्रेस और भाजपा के बीच केंद्र के अलावा कई राज्यों में इतने भर का ही राजनीतिक संघर्ष है कि जनता अगर एक से दुखी होती है तो दूसरे को सत्ता सौंप देती है। ऐसा इसलिए नहीं कि जनता को इसके अलावा कुछ सूझता नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि उसके आगे चुनाव ही यही है कि वह इन दोनों में से किसी एक की तरफ जाए। यह तो विकल्प की नहीं बल्कि स्थानापन्नता की राजनीति हुई। मतदान के दौरान चुनाव के विकल्प से जनता को दूर रखने की जड़ता को जो राजनीतिक शक्तियां बहाल रखना चाहती हैं, वो इस लिहाज से तो कमजोर जरूर हैं कि वे अपने आगे किसी अपारंपरिक विकल्प के खड़ा होने से घबड़ाती है।
पारंपरिक राजनीति के प्रतिष्ठान कितना ढहते हैं, यह इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव का सबसे दिलचस्प प्रतिफल होगा। यह प्रतिफल ही यह तय करेगा कि इस देश की जनता अपने लिए और अपने नाम पर चलने वाले तंत्र को पराए हाथों से कितना अपने हाथों में ला पाती है। पंजाबी के क्रांतिकारी कवि पाश सबसे खतरनाक स्थिति उसे मानते हैं जब हमारे सपने मर जाते हैं। आने वाला लोकसभा चुनाव देश के जन, गण और मन के लिए सुखद ही होगा, खतरनाक नहीं ऐसी कामना है। भले अमत्र्य सेन या मनमोहन सिंह इस कामना पर भरोसा न करें। योगेंद्र यादव की कामना जरूर ऐसी दिखती है और न भी दिखती हो तो इस देश का आम आदमी तो 16वीं लोकसभा के गठन को इन्हीं कामनाओं से आकार लेता देखना चाह रहा है।

रविवार, 11 मार्च 2012

लोकतंत्र का पंचनामा


अपने यहां आलोचना की नामवरी परंपरा में भी एक बात अकसर दुहराई जाती है कि क्या दिखता है से ज्यादा जरूरी है कि हम देखते क्या हैं। छह दशक के गणतंत्रीय अनुभव में ऐसे कई मौके आए जब हमने कुछ बहुत जरूरी बहसों और सरोकारों को महज इसलिए नजरअंदाज कर दिया क्योंकि हमारी समझदारी के आग्रह कहीं और से बन-बिगड़ रहे थे। रचना और विकास के केंद्रित ढांचे को विकेंद्रित विकल्प पर तरजीह देने का फैसला ऐसा ही एक उदाहरण है।
केंद्रित सत्ता के आग्रह में योजना और विकास को कुछ हाथों से बहुत हाथों में कभी बंटने ही नहीं दिया। बाद में जब लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण का दबाव बढ़ा भी तो पंचायतीराज के रूप में एक आधे-अधूरे और अधिकारविहीन ढांचे को निचले स्तर पर तैयार कर लिया गया। दिलचस्प है कि भारत का लोकतंत्र पूरी दुनिया में इस मामले में सबसे भिन्न और आगे है कि हमारे यहां प्रातिनिधिक के साथ प्रतिभागिता का तंत्र है, जो जनता का और जनता के लिए तो है पर जनता द्वारा नहीं है।
चूंकि लोकतंत्र एक जीवंत और लगातार अपने अनुभवों से समृद्ध होने वाली व्यवस्था है, लिहाजा एकबारगी फिर यह बहस सतह पर आ गई है कि हम लोकतांत्रिक प्रतिनिधत्व को महत्व दें कि लोक सहभाग को। जाहिर है लोक सहभाग के अभाव में ही लोक प्रतिनिधित्व का महत्व है। ऐसे में लोकसभा-राज्यसभा और विधानसभा के मुकाबले ग्रामसभा की सर्वोपरिता पर सवाल उठाने का कम से कम कोई सैद्धांतिक कारण तो नहीं ही है।
प्रतिनिधित्व को समग्र लोक भागीदारी में बदलने के इसी आग्रह को एक बार फिर से स्वर दिया है समाजसेवी अन्ना हजारे ने। पिछले एक साल में जबसे उनके कार्य और विचार पर लोगों का ध्यान ज्यादा गया है, वे ग्रामसभा के बहाने पंचायतराज और ग्राम स्वराज की बात बार-बार करते रहे हैं। पर भ्रष्टाचार और जनलोकपाल जैसे ज्यादा दिलचस्पी के मुद्दों और फिर उन पर पक्ष-विरोध की बयानबाजी में यह जरूरी मुद्दा कहीं पीछे छूटता रहा है। देश के 63वें गणतंत्र दिवस के मौके पर हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने संघर्ष के अनुभव से कहा कि चुनाव के बाद चुने गए प्रतिनिधि जनता के सेवक की तरह नहीं बल्कि मालिक की तरह सलूक करते हैं। यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। लिहाजा, ग्रामसभाओं को अधिक अधिकार संपन्न बनाकर उसकी भूमिका को ज्यादा निर्णायक बनाने के साथ पंचायतराज संस्था के सशक्तिकरण की दरकार समय की मांग है। 
सोमवार से संसद का बजट सत्र शुरू हुआ है। इस मौके पर राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संस्थापक केएन गोविंदाचार्य ने पंचायतों के सशिक्तकरण के मुद्दे को एक नई तार्किक दरकार के साथ उठाया है। उनकी मांग है कि सरकार केंद्रीय बजट का कम से कम सात फीसद हिस्सा सीधे पंचायतों को दे। ऐसा करने से न सिर्फ लोकतंत्र का यह उपेक्षित ढांचा सशक्त होगा बल्कि राजसत्ता और अर्थसत्ता के विकेंद्रीकरण का मार्ग भी प्रशस्त होगा। शहरीकरण की बढ़ती होड़ के बावजूद आज भी देश में पांच लाख से ज्यादा गांव हैं और करीब 70 फीसद आबादी इन्हीं गांवों में रहती है। गांव और कृषि की अवहेलना करके हम एक सशक्त और विकसित भारत की कल्पना नहीं कर सकते हैं। पिछले 20 सालों में यह मांग बार- बार उठी है कि सरकार पंचायती राज संस्था को अपनी विकास योजनाओं को तय करने का अधिकार दे और इसके लिए उसे आर्थिक रूप से स्वाबलंबी बनाया जाए ताकि योजनाएं दिल्ली से चलकर गांवों तक न पहुंचे बल्कि इनका निर्धारण स्थानीय स्तर पर स्थानीय लोगों द्वारा हो। गोविंदाचार्य नए सिरे से इस मुद्दे पर दबाव बनाना चाह रहे हैं। आगे यह देखना होगा कि जो चिंता अब तक नागरिक समाज के स्तर पर है, उसके साथ सरकार कब तक और कितना जुड़ पाती है। 

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

चर्चिल का सिगार और गांधी की लंगोट


गांधीजी की लंगोट चर्चिल तक को अखरती थी क्योंकि इस सादगी का उनके पास कोई तोड़ नहीं था। सो गुस्से में वे गांधी का जिक्र आते ही ज्यादा सिगार पीने लगते और उन्हें नंगा फकीर कहने लगते। आए दिन गांधीजी की ऐनक, घड़ी और चप्पल की नीलामी की खबरें आती रहती हैं। सरकार से गुहार लगाई जाती है कि गांधी हमारे हैं और उनकी सादगी के उच्च मानक गढ़ने में मददगार चीजों को भारत में ही रहना चाहिए। बीते साल मीडिया वालों ने अहमदाबाद में उस विदेशी शख्स को खोज निकाला जो गांधीजी की ऐसी चीजों का पहले तो जिस-तिस तिकड़म से संग्रह करता और फिर उन्हें करोड़ों डॉलर के नीलामी बाजार में पहुंचा देता।  फिर नीलामी आज सिर्फ गांधीजी के सामानों की नहीं हो रही। यहां और भी बहुत कुछ हैं। पुरानी से पुरानी शराब की बोतल से लेकर शर्लिन चोपड़ा की हीरे जड़ी चड्ढ़ी तक। खरीदार दोनों के हैं, सो बाजार में कद्र भी दोनों की  है। यानी नंगा फकीर बापू और हॉट बिकनी बेब शर्लिन दोनों एक कतार में खड़े हैं।
हमारे दौर की सबसे खास बात यही है कि यहां सब कुछ बिकता है- धर्म से लेकर धत्कर्म तक। आप अपने घर बटोर-बटोर कर खुशियां लाएं, इसके  लिए झमाझम ऑफर और सेल की भरमार है। इस बाबत आप और जानकारी बढ़ाना चाहें तो 24 घंटे आपका पीछा करने वाले रेडियो-टीवी-अखबार तो हैं ही। गुजरात के समुद्री किनारों पर जो नया टूरिज्म इंडस्ट्री डेवलप हो रहा है, वह अपने सम्मानित अतिथियों को गांधी के मिनिएचर चरखे और अंगूर की बेटी का आकर्षण एक साथ परोसता है। बस इतना लिहाज रखा जाता है कि क्रूज पर शराब तभी परोसी जाती हैं, जब वह गुजरात की सीमा से बाहर निकल आते हैं। गुजरात सीमा के भीतर ऐसा नहीं  किया जा सकता क्योंकि वहां शराबबंदी है। यानी आत्मानुशासन का जनेऊ पहनना जरूरी है पर उसे उतारकर उसके  साथ खिलवाड़ की भी पूरी छूट है।
ये बाजार द्वारा की गई मेंटल कंडिशनिंग का ही नतीजा है कि कल तक जिसे हम महज अंत:वस्त्र कहकर निपटा देते थे, उनका बाजार किसी भी दूसरे परिधान के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है।  मां की ममता पर भारी पहने वाले डिब्बाबंद दूध का इश्तेहार बनाने वाले आज अंत:वस्त्रों को सेकेंड स्किन से लेकर सेक्स सिंबल तक बता रहे हैं। जैनेंद्र की एक कहानी में नायक अपना अंडरबियर-बनियान बाहर अलगनी पर सुखाने में संकोच करता है कि नायिका देख लेगी। आज नायक तो नायक नायिकाएं और लेडी मॉडल स्टेज से लेकर टीवी परदे तक इन्हें धारण कर ग्लैमर दुनिया की चौंध बढ़ाती हैं।
बालीवुड की मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान कहती हैं, 'सब कुछ हॉट हो गया, अब कुछ भी नरम या मुलायम नहीं रहा। गुजरे जमाने की हीरोइनों के नजर झुकाने और फिर अदा के उसे उठाते हुए फेर लेने से जितनी बात हो जाती थी, वह आज की हीरोइनों के पूरी आंख मार देने के बाद भी नहीं  बनती।'  साफ है कि देह दर्शन के तर्क ने लिबासों की भी परिभाषा बदल दी। और इसी के साथ बदल गई हमारी अभिव्यक्ति और सोच-समझ की तमीज भी। पचास शब्द की खबर के लिए पांच कॉलम की खबर छापने का दबाव किसी अखबार की एडिटोरियल गाइडलाइन से ज्यादा मल्लिका का राखी जैसी बिंदास बालाओं का मुंहफट बिंदासपन बनाता है। रही पुरुषों की बात तो नंगा होने से आसान उन्हें नंगा देखने के लिए उकसाता रहा है। तभी तो महिलाओं के अंत:वस्त्र के बाजार का साइज पुरुषों के के मुकाबले कई  गुना है।  यह सिलसिला इंद्रसभा से लेकर आईपीएल ग्राउंड तक देखा जा सकता है। 'अंत:दर्शन' अब 'अनंतर' तक सुख देता है और पुरुष मन के इस सुख के लिए महिलाओं को फीगर से लेकर कपड़ों तक की बारीक काट-छांट करनी पड़ रही है।
बात चूंकि गांधी के नाम से शुरू हुई इसलिए आखिर में बा को भी याद कर लें।  खरीद-फरोख्त और चरम भोग के परम दौर की इस माया को नमन ही करना चाहिए कि उसकी दिलचस्पी न तो बा की साड़ी में है और न ही उसकी जिंदगी में। अव्वल यह अफसोस से ज्यादा सुकूनदेह है। और ऐसा अब भी है, यह किसी गनीमत से कमतर नहीं।

गुरुवार, 5 मई 2011

अमूल बेबी की आरटीआई : जागरण में ‘पूरबिया’

राहुल का  भारतीय राजनीति के सबसे ख्यात और शक्तिशाली परिवार से आते हैं, उनकी पार्टी कांग्रेस भी देश की आज तक नंबर एक राजनीतिक पार्टी है। अगर लोगों के बीच जाना, उनसे जुड़ना, उन्हें समझना और लोक संवाद के जरिए लगातार संघर्ष के लिए तत्पर बने रहना राजनीति की कम से कम वह सीख तो नहीं ही है जिसमें एक तरफ जहां प्याली में क्रांति उबलती है, वहीं दूसरी तरफ लाल बत्ती से नेतृत्व का कद तय होता है। राहुल को लेकर एक राय यह भी है कि धैर्य और सरलता की राह उनकी नीति से ज्यादा रणनीति है। एक ऐसी रणनीति जो उनकी भविष्य में होने वाली ताजपोशी के लिए बनाई गई है। अगर यह बात सही है तो यह जनता के साथ एक और विश्वासघात होगा और लोकतंत्र में लोक की आस्था और भरोसे से खिलवाड़ का खामियाजा बहुत बड़ा है। राहुल को यह भी अभी से समझ लेना होगा...  


मंगलवार, 3 मई 2011

अमूल बेबी को भाई आरटीआई


संघर्ष लोकतंत्र में हमेशा जारी रहने वाली प्रक्रिया है। जिस राजनीति को हम सिर्फ सत्ता की दखली और बेदखली से जोड़कर देखते हैं, वह उस पूरी राजनीति के औचित्य का लेश मात्र भी नहीं, जिसकी एक बेहतर लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए दरकार है। यह बातें इसलिए भी समझनी होगी क्योंकि हमें यह लगता है कि नेता और जनता हमेशा एक-दूसरे के खिलाफ होते हैं, यही उनकी फितरत भी है और यही मौजूदा हालात में सतह पर आई सचाई भी है। दरअसल, राजनीति और संघर्ष के लोकतांत्रिक तकाजे जनता से जुड़े हैं, जनता के लिए हैं। इसलिए जन सरोकार से अलग या उसके उलट न तो कोई दूसरा सरोकार लोकतंत्र में मान्य है और न ही कोई दूसरा रास्ता। साफ है कि लोकतंत्र की ताकत अगर लोक है तो सत्ता और शक्ति के किसी दूसरे केंद्र का ताकतवर होना खतरनाक है। यही बात लोकतांत्रिक संघर्षों को लेकर भी है।
यह कहीं से मुनासिब नहीं कि 'राजपथ' का महत्व 'जनपथ' से ज्यादा हो। अगर जनता और नेता के संघर्ष के औजार भिन्न होंगे तो इसका मतलब है कि लोक के लोप की कीमत पर नेता नेतागीरी का स्कोप देख रहे हैं। जिन लोगों को भारतीय राजनीति में राहुल गांधी के आगमन और आगे बढ़ने के उनके सीधे-सरल लोकतांत्रिक तरीके पर जरा भी यकीन हो, उन्हें यह जानना अच्छा लगा होगा कि सरकारी योजनाओं में घपलों-घोटालों को उजागर करने के लिए उन्होंने ओरटीआई को हथियार बनाया है। इसके लिए उन्होंने न सिर्फ खुद से अर्जी लगाई बल्कि यह दिखाया भी कि नेतागीरी की धौंस और सत्ता की पागल कर देने वाली राजनीति में उनका कोई यकीन नहीं। कलावती की झोपड़ी में रात बिताकर परिवर्तन के सवेरे की बात करने वाले इस युवा नेता की कथनी और करनी अगर सचमुच एकमेक है तो यह बड़ी बात है।
राहुल भारतीय राजनीति के सबसे ख्यात और शक्तिशाली परिवार से आते हैं, उनकी पार्टी कांग्रेस भी देश की आज तक नंबर एक राजनीतिक पार्टी है। अगर लोगों के बीच जाना, उनसे जुड़ना, उन्हें समझना और लोक संवाद के जरिए लगातार संघर्ष के लिए तत्पर बने रहना राजनीति की कम से कम वह सीख तो नहीं ही है जिसमें एक तरफ जहां प्याली में क्रांति उबलती है, वहीं दूसरी तरफ लाल बत्ती से नेतृत्व का कद तय होता है। राहुल को लेकर एक राय यह भी है कि धैर्य और सरलता की राह उनकी नीति से ज्यादा रणनीति है। एक ऐसी रणनीति जो उनकी भविष्य में होने वाली ताजपोशी के लिए बनाई गई है। अगर यह बात सही है तो यह जनता के साथ एक और विश्वासघात होगा और लोकतंत्र में लोक की आस्था और भरोसे से खिलवाड़ का खामियाजा बहुत बड़ा है। राहुल को यह भी अभी से समझ लेना होगा।  
पिछले दिनों में कई ऐसी पहलें हुई हैं जिसमें आरटीआई सरकार के अपने कामकाज के साथ व्यवस्थापिका की कमजोरियों को तथ्यगत तौर पर उजागर करने का हथियार बना है। इस कारण कई मौके पर जहां जरूरी कदम उठाए गए, वहीं कई मामलों में अदालत तक ने सार्थक हस्तक्षेप किया। अभी नागरिक समाज की सजगता से भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल को लेकर जो मुहिम आगे बढ़ रही है उसके आगाज के पीछे भी आरटीआई कार्यकर्ताओं की सफलता ही है। दरअसल, यह एक ऐसी कानूनी ताकत है जिसके माध्यम से जनता सरकारी कामकाज, उसके खर्च ब्योरे और तौर-तरीकों पर सीधे सवाल उठा सकती है। सरकार और व्यवस्था के कामकाज का इस तरह सार्वजनिक होना, जहां उनकी विश्वसनीयता को बहाल करने का कारगर जरिया बना है, वहीं जनता को भी भरोसा हुआ है कि उसकी योजनाओं और उसके हक के साधनों की गिद्ध लूट अब संभव नहीं।