राजस्थान की लोक परंपरा में 'पधारो म्हारे देस’ का अलाप इसलिए तो कम से कम नहीं ही गूंजा होगा कि लोग देस-दुनिया से यहां आएं और यहां की संस्कृति पर रीझें, मुस्कराएं और आगे निकल जाएं। हैरत ही है कि जो गीत राजस्थानी परिवार-समाज की सदियों से चली आ रही आतिथ्यि उदारता को शब्द दे रहे थे, वे आज सैलानियों को यहां लाने-जुटाने के लिए हांक भर हैं।
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मंगलवार, 16 जुलाई 2013
पधारो म्हारे देस
राजस्थान की लोक परंपरा में 'पधारो म्हारे देस’ का अलाप इसलिए तो कम से कम नहीं ही गूंजा होगा कि लोग देस-दुनिया से यहां आएं और यहां की संस्कृति पर रीझें, मुस्कराएं और आगे निकल जाएं। हैरत ही है कि जो गीत राजस्थानी परिवार-समाज की सदियों से चली आ रही आतिथ्यि उदारता को शब्द दे रहे थे, वे आज सैलानियों को यहां लाने-जुटाने के लिए हांक भर हैं।
रविवार, 11 मार्च 2012
लोकतंत्र का पंचनामा
केंद्रित सत्ता के आग्रह में योजना और विकास को कुछ हाथों से बहुत हाथों में कभी बंटने ही नहीं दिया। बाद में जब लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण का दबाव बढ़ा भी तो पंचायतीराज के रूप में एक आधे-अधूरे और अधिकारविहीन ढांचे को निचले स्तर पर तैयार कर लिया गया। दिलचस्प है कि भारत का लोकतंत्र पूरी दुनिया में इस मामले में सबसे भिन्न और आगे है कि हमारे यहां प्रातिनिधिक के साथ प्रतिभागिता का तंत्र है, जो जनता का और जनता के लिए तो है पर जनता द्वारा नहीं है।
चूंकि लोकतंत्र एक जीवंत और लगातार अपने अनुभवों से समृद्ध होने वाली व्यवस्था है, लिहाजा एकबारगी फिर यह बहस सतह पर आ गई है कि हम लोकतांत्रिक प्रतिनिधत्व को महत्व दें कि लोक सहभाग को। जाहिर है लोक सहभाग के अभाव में ही लोक प्रतिनिधित्व का महत्व है। ऐसे में लोकसभा-राज्यसभा और विधानसभा के मुकाबले ग्रामसभा की सर्वोपरिता पर सवाल उठाने का कम से कम कोई सैद्धांतिक कारण तो नहीं ही है।
प्रतिनिधित्व को समग्र लोक भागीदारी में बदलने के इसी आग्रह को एक बार फिर से स्वर दिया है समाजसेवी अन्ना हजारे ने। पिछले एक साल में जबसे उनके कार्य और विचार पर लोगों का ध्यान ज्यादा गया है, वे ग्रामसभा के बहाने पंचायतराज और ग्राम स्वराज की बात बार-बार करते रहे हैं। पर भ्रष्टाचार और जनलोकपाल जैसे ज्यादा दिलचस्पी के मुद्दों और फिर उन पर पक्ष-विरोध की बयानबाजी में यह जरूरी मुद्दा कहीं पीछे छूटता रहा है। देश के 63वें गणतंत्र दिवस के मौके पर हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने संघर्ष के अनुभव से कहा कि चुनाव के बाद चुने गए प्रतिनिधि जनता के सेवक की तरह नहीं बल्कि मालिक की तरह सलूक करते हैं। यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। लिहाजा, ग्रामसभाओं को अधिक अधिकार संपन्न बनाकर उसकी भूमिका को ज्यादा निर्णायक बनाने के साथ पंचायतराज संस्था के सशक्तिकरण की दरकार समय की मांग है।
सोमवार से संसद का बजट सत्र शुरू हुआ है। इस मौके पर राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संस्थापक केएन गोविंदाचार्य ने पंचायतों के सशिक्तकरण के मुद्दे को एक नई तार्किक दरकार के साथ उठाया है। उनकी मांग है कि सरकार केंद्रीय बजट का कम से कम सात फीसद हिस्सा सीधे पंचायतों को दे। ऐसा करने से न सिर्फ लोकतंत्र का यह उपेक्षित ढांचा सशक्त होगा बल्कि राजसत्ता और अर्थसत्ता के विकेंद्रीकरण का मार्ग भी प्रशस्त होगा। शहरीकरण की बढ़ती होड़ के बावजूद आज भी देश में पांच लाख से ज्यादा गांव हैं और करीब 70 फीसद आबादी इन्हीं गांवों में रहती है। गांव और कृषि की अवहेलना करके हम एक सशक्त और विकसित भारत की कल्पना नहीं कर सकते हैं। पिछले 20 सालों में यह मांग बार- बार उठी है कि सरकार पंचायती राज संस्था को अपनी विकास योजनाओं को तय करने का अधिकार दे और इसके लिए उसे आर्थिक रूप से स्वाबलंबी बनाया जाए ताकि योजनाएं दिल्ली से चलकर गांवों तक न पहुंचे बल्कि इनका निर्धारण स्थानीय स्तर पर स्थानीय लोगों द्वारा हो। गोविंदाचार्य नए सिरे से इस मुद्दे पर दबाव बनाना चाह रहे हैं। आगे यह देखना होगा कि जो चिंता अब तक नागरिक समाज के स्तर पर है, उसके साथ सरकार कब तक और कितना जुड़ पाती है।
गुरुवार, 29 सितंबर 2011
रामलीला 450 पर नॉटआउट
रावण से युद्ध करने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ मार्का सूरमा उतरे तो सीता स्वयंवर में वरमाला डलवाने के लिए पहुंचने वालों में महेंद्र सिंह धोनी और युवराज सिंह जैसे स्टार क्रिकेटरों के गेटअप में क्रेजी क्रिकेट फैंस भी थे। तैयारी तो यहाँ तक है कि रावण का वध इस बार राम अन्ना की टोपी पहन कर करेंगे। यह रामकथा का पुनर्पाठ हो या न हो रामलीला के कथानक का नया सच जरूर है।
राम की मर्यादा के साथ नाटकीय छेड़छाड़ में लोगों की हिचक अभी तक बनी हुई है पर रावण और हनुमान जैसे किरदार लगातार अपडेट हो रहे हैं। बात अकेले रावण की करें तो यह चरित्र लोगों के सिरदर्द दूर करने से लेकर विभिन्न कंपनियों के फेस्टिवल ऑफर को हिट कराने के लिए एड गुरुओं की बड़ी पसंद बनकर पिछले कुछ सालों में उभरा है। बदलाव के इतने स्पष्ट और लाक्षणिक संयोगों के बीच सुखद यह है कि देश में आज भी रामकथा के मंचन की परंपरा बनी हुई है। और यह जरूरत या दरकार लोक या समाज की ही नहीं, उस बाजार की भी है, जिसने हमारे एकांत तक को अपनी मौजूदगी से भर दिया है। दरअसल, राई को पहाड़ कहकर बेचने वाले सौदागर भले अपने मुनाफे के खेल के लिए कुछ खिलावाड़ के लिए आमादा हों, पर अब भी उनकी ताकत इतनी नहीं बढ़ी है कि हम सब कुछ खोने का रुदन शुरू कर दें। देशभर में रामलीलाओं की परंपरा करीब साढे़ चार सौ साल पुरानी है। आस्था और संवेदनाओं के संकट के दौर में अगर भारत आज भी ईश्वर की लीली भूमि है तो यह यहां के लोकमानस को समझने का नया विमर्श बिंदू भी हो सकता है।
बाजार और प्रचारात्मक मीडिया के प्रभाव में चमकीली घटनाएं उभरकर जल्दी सामने आ जाती हैं। पर इसका यह कतई मतलब नहीं कि चीजें जड़मूल से बदल रही हैं। मसलन, बनारस के रामनगर में तो पिछले करीब 180 सालों से रामलीला खेली जा रही हैं। दिलचस्प है कि यहां खेली जानेवाली लीला में आज भी लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल नहीं होता है। यही नहीं लीला की सादगी और उससे जुड़ी आस्था के अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता है। खुले मैदान में यहां-वहां बने लीला स्थल और इसके साथ दशकों से जुड़ी लीला भक्तों की आस्था की ख्याति पूरी दुनिया में है। 'दिल्ली जैसे महानगरों और चैनल संस्कृति के प्रभाव में देश के कुछ हिस्सों में रामलीलाओं के रूप पिछले एक दशक में इलेक्ट्रानिक साजो-सामान और प्रायोजकीय हितों के मुताबिक भले बदल रहे हैं। पर देश भर में होने वाली ज्यादातर लीलाओं ने अपने पारंपरिक बाने को आज भी कमोबेश बनाए रखा है', यह मानना है देश-विदेश की रामलीलाओं पर गहन शोध करने वाली डा. इंदुजा अवस्थी का।
लोक और परंपरा के साथ गलबहियां खेलती भारतीय संस्कृति की अक्षुण्णता का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है कि चाहे बनारस के रामनगर, चित्रकूट, अस्सी या काल-भैरव की रामलीलाएं हों या फिर भरतपुर और मथुरा की, राम-सीता और लक्ष्मण के साथ दशरथ, कौशल्या, उर्मिला, जनक, भरत, रावण व हनुमान जैसे पात्र के अभिनय 10-14 साल के किशोर ही करते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अब कस्बाई इलाकों में पेशेवर मंडलियां उतरने लगी है, जो मंच पर अभिनेत्रियों के साथ तड़क-भड़क वाले पारसी थियेटर के अंदाज को उतार रहे हैं। पर इन सबके बीच अगर रामलीला देश का सबसे बड़ा लोकानुष्ठान है तो इसके पीछे एक बड़ा कारण रामकथा का अलग स्वरूप है।
अवस्थी बताती हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम और लीला पुरुषोत्तम कृष्ण की लीला प्रस्तुति में बारीक मौलिक भेद है। रासलीलाओं में श्रृंगार के साथ हल्की-फुल्की चुहलबाजी को भले परोसा जाए पर रामलीला में ऐसी कोई गुंजाइश निकालनी मुश्किल है। शायद ऐसा दो ईश्वर रूपों में भेद के कारण ही है। पुष्प वाटिका, कैकेयी-मंथरा और रावण-अंगद या रावण-हनुमान आदि प्रसंगों में भले थोड़ा हास्य होता है, पर इसके अलावा पूरी कथा के अनुशासन को बदलना आसान नहीं है। कुछ लीला मंचों पर अगर कोई छेड़छाड़ की हिमाकत इन दिनों नजर भी आ रही है तो यह किसी लीक को बदलने की बजाय लोकप्रियता के चालू मानकों के मुताबिक नयी लीक गढ़ने की सतही व्यावसायिक मान्यता भर है।
तुलसी ने लोकमानस में अवधी के माध्यम से रामकथा को स्वीकृति दिलाई और आज भी इसका ठेठ रंग लोकभाषाओं में ही दिखता है। मिथिला में रामलीला के बोल मैथिली में फूटते हैं तो भरतपुर में राजस्थानी की बजाय ब्राजभाषा की मिठास घुली है। बनारस की रामलीलाओं में वहां की भोजपुरी और बनारसी का असर दिखता है पर यहां अवधी का साथ भी बना हुआ है। बात मथुरा की रामलीला की करें तो इसकी खासियत पात्रों की शानदार सज-धज है। कृष्णभूमि की रामलीला में राम और सीता के साथ बाकी पात्रों के सिर मुकुट से लेकर पग-पैजनियां तक असली सोने-चांदी के होते हैं। मुकुट, करधनी और बाहों पर सजने वाले आभूषणों में तो हीरे के नग तक जड़े होते हैं। और यह सब संभव हो पाता है यहां के सोनारों और व्यापारियों की रामभक्ति के कारण। आभूषणों और मंच की साज-सज्जा के होने वाले लाखों के खर्च के बावजूद लीला रूप आज भी कमोबेश पारंपरिक ही है। मानों सोने की थाल में माटी के दीये जगमग कर रहे हों।
आज जबकि परंपराओं से भिड़ने की तमीज रिस-रिसकर समाज के हर हिस्से में पहुंच रही है, ऐसे में रामलीलाओं विकास यात्रा के पीछे आज भी लोक और परंपरा का ही मेल है। राम कथा के साथ इसे भारतीय आस्था के शीर्ष पुरुष का गुण प्रसाद ही कहेंगे कि पूरे भारत के अलावा सूरीनाम, मॉरीशस, इंडोनेशिया, म्यांमार और थाईलैंड जैसे देशों में रामलीला की स्वायत्त परंपरा है। यह न सिर्फ हमारी सांस्कृतिक उपलब्धि की मिसाल है, बल्कि इसमें मानवीय भविष्य के कई मांगलिक संभावनाएं भी छिपी हैं।
शुक्रवार, 23 सितंबर 2011
बंग समाज की हर दूसरी बेटी का सच !
हाल में यूनिसेफ की एक रिपोर्ट आई है। इसमें बताया गया है कि इस पश्चिम बंगाल में हर दूसरी लड़की कच्ची उम्र में ही ब्याह दी जाती है। आज की स्थिति में यह आंकड़ा चौंकाता तो है ही, यह इस सूबे के सामाजिक-आर्थिक हालात पर नए सिरे से विचार करने की दरकार भी सामने रखता है। आखिर क्या ऐसा हुआ कि बाल और विधवा विवाह के खिलाफ देश में सामाजिक नवजागरण का बिगुल फूंकने वाला प्रदेश आज फिर से उन्हीं समस्याओं से जकड़ गया है। क्या अपनी परंपरा और संस्कृति से बेहद प्यार करने वाला बंग समाज अपनी रुढ़ताओं के प्रति भी आग्रही है या कि पिछले तीन-चार दशकों से एक विचार और एक शासन के वर्चस्वादी आग्रह ने यहां के जनजीवन को आधुनिकता की मुख्यधारा का हिस्सा बनने ही नहीं दिया। इतना तो साफ है कि यह समस्या अगर सामाजिक है तो इसके कारक एक-दो दिन में तो कम से कम नहीं खड़े हुए होंगे। सामाजिक अध्ययन की दृष्टि से बंग समाज का सामंती और मध्यकालीन मिजाज ठेठ हिंदी पट्टी से तो अलग है पर है यह उसका ही विस्तार।
बिहार के अंग और मैथिली क्षेत्र से बांग्लादेश की सीमा तक में फैला-समाया लोक और परंपरा पर एक तरफ जहां खेतिहर मलिकाव की हेकड़ी हावी रही है, तो वहीं दूसरी तरफ गांव-समाज का एक बड़ा हिस्सा और तबका भूख और गरीबी से बिलबिलाता रहा है। यह द्वंद्वात्मकता ही कहीं नक्सल हिंसा के रूप में फूटी है तो कहीं आधुनिकता से छिटकते चले जाने की नियति सामाजिक रुढताओं को और वज्र बनाती चली गई है। 21वीं सदी के नए दशक के आरंभ के साथ पश्चिम बंगाल में बहुत कुछ बदला है। यह बदलाव 'सरकारी' के साथ 'असरकारी' भी साबित होगी, ऐसा अभी कह पाना मुश्किल तो है ही, जल्दबाजी भी होगी। आज वहां एक महिला मुख्यमंत्री हैं। 'मां, माटी और मानुष' के प्रति अपनी जवाबदेही और संवेदना को बार-बार दोहराने वाली ममता बनर्जी अगर सचमुच वहां कारगर साबित हो रही हैं फिर तो वहां पितृसत्तात्मक समाज की कई वर्जनाएं भी दरकनी चाहिए।
गुरुवार, 10 मार्च 2011
डबल मीनिंग वाली होली
मि बुरा न मानो होली है। मस्ती की इस टेर पर होली की मस्ती ने जाने कितनी चुहल और कितनी शरारतों ने मन से अंगराइयां भरी हैं। मस्ती के इतने सारे रंगों को किसी एक रंग में रंगा दिखना हो तो भारत के महान लोकपर्व होली की परंपरा का अवगाहन कोई भी कर सकता है। होली संबंधों से लेकर स्वादिष्ट पकवानों तक अनेक रूपों और अर्थों में हमारी लोक परंपरा का हिस्सा रहा है। पर पिछले कुछ सालों-दशकों में होली बदरंग हुआ है। इस लोकपर्व की सबसे बड़ी थाती उसके गीत रहे हैं, जो आज भी तकरीबन सभी लोक और शास्त्रीय घरानों की पहचान में शुमार है।
दुर्भाग्य से होली के ये पारंपरिक गीत आधुनिक बयार में या तो बदल रहे हैं या फिर अपने को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नतीजतन जिन होली गीतों में स्त्री-पुरुष और पारिवारिक संबंधों को लेकर मर्यादित विनोद और हंसी-ठिठोली के रंगारंग आयोजन होते थे, वहां सतहीपन और अश्लीलता इतना बढ़ी है कि अर्थ की पिचकारी की जगह द्विअर्थी तीर सीधे कानों को बेधते हैं। दिल्ली की एक संस्था ने कुछ साल पहले कुछ ऐसे भाषाई कैसेटों-एलबमों का अध्ययन किया था, जिनकी बिक्री बाजार में लोकगीत-संगीत के नाम पर होती है। इनके कवर पर छपी तस्वीरों और टाइटल से कोई सहज ही इनके स्तर और कांटेंट का पता कर सकता है।
लोक के विलोप का खतरा बाजार के दौर में बढ़ा तो जरूर है पर इसका निपटना इतना आसान भी नहीं है। लिहाजा लोक छटा को बाजार अपनी तश्तरी में सजाकर मन-माफिक तरीके से बेच रहा है। लिहाजा लोक की विरासत कायम तो जरूर है पर यह इतनी विषाक्त जरूर हो जा रही है कि लोकगंगा के लिए अलग से सफाई अभियान की दरकार है।
पिछले साल रिलीज एक होली एलबम की बानगी देखिए- "का करता है तू सब रे। इ रंग लगा लगा रहा है कि लैकी के गाल पर पीडब्ल्यूडी का रोलर चला रहा है।' इस देशज डॉयलाग के बाद शुरू होता है होली गीत। गीत के बोल ऐसे जैसे लड़की को रंग लगाने का नहीं बल्कि सीधे बिस्तर पर आने का आमंत्रण दिया जा रहा हो। वैसे यह तो कम है, कई गीत तो अपनी मंशा से ज्यादा अपनी शब्दावली में ही इतने भोंडे होते हैं कि आप उन पर कोई चर्चा तक नहीं कर सकते। लोक गायिका मालिनी अवस्थी मानती हैं कि इन फूहड़ गीतों का बाजार लगातार बढ़ रहा है। श्रोता और दर्शक थोड़े कम दोषी इसलिए हैं क्योंकि उनके पास चुनाव अब अच्छे-बुरे के बीच रहा ही नहीं। लिहाजा, कान उन कंपनियों का ऐंठना चाहिए जो होली के रंग-बिरंगे आयोजन को बदरंग कर रहे हैं। निशाने पर लोक परंपरा तो है ही, उनसे ज्यादा महिलाएं हैं। क्योंकि सबसे ज्यादा फब्तियां और ओछी हरकतें उन्हें ही सहनी-उठानी पड़ती हैं। अगर यह लगाम जल्द ही कसी नहीं गई तो इस महान लोकपर्व को महिला विरोधी करार दिए जाने का खतरा है।
दुर्भाग्य से होली के ये पारंपरिक गीत आधुनिक बयार में या तो बदल रहे हैं या फिर अपने को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नतीजतन जिन होली गीतों में स्त्री-पुरुष और पारिवारिक संबंधों को लेकर मर्यादित विनोद और हंसी-ठिठोली के रंगारंग आयोजन होते थे, वहां सतहीपन और अश्लीलता इतना बढ़ी है कि अर्थ की पिचकारी की जगह द्विअर्थी तीर सीधे कानों को बेधते हैं। दिल्ली की एक संस्था ने कुछ साल पहले कुछ ऐसे भाषाई कैसेटों-एलबमों का अध्ययन किया था, जिनकी बिक्री बाजार में लोकगीत-संगीत के नाम पर होती है। इनके कवर पर छपी तस्वीरों और टाइटल से कोई सहज ही इनके स्तर और कांटेंट का पता कर सकता है।
लोक के विलोप का खतरा बाजार के दौर में बढ़ा तो जरूर है पर इसका निपटना इतना आसान भी नहीं है। लिहाजा लोक छटा को बाजार अपनी तश्तरी में सजाकर मन-माफिक तरीके से बेच रहा है। लिहाजा लोक की विरासत कायम तो जरूर है पर यह इतनी विषाक्त जरूर हो जा रही है कि लोकगंगा के लिए अलग से सफाई अभियान की दरकार है।
पिछले साल रिलीज एक होली एलबम की बानगी देखिए- "का करता है तू सब रे। इ रंग लगा लगा रहा है कि लैकी के गाल पर पीडब्ल्यूडी का रोलर चला रहा है।' इस देशज डॉयलाग के बाद शुरू होता है होली गीत। गीत के बोल ऐसे जैसे लड़की को रंग लगाने का नहीं बल्कि सीधे बिस्तर पर आने का आमंत्रण दिया जा रहा हो। वैसे यह तो कम है, कई गीत तो अपनी मंशा से ज्यादा अपनी शब्दावली में ही इतने भोंडे होते हैं कि आप उन पर कोई चर्चा तक नहीं कर सकते। लोक गायिका मालिनी अवस्थी मानती हैं कि इन फूहड़ गीतों का बाजार लगातार बढ़ रहा है। श्रोता और दर्शक थोड़े कम दोषी इसलिए हैं क्योंकि उनके पास चुनाव अब अच्छे-बुरे के बीच रहा ही नहीं। लिहाजा, कान उन कंपनियों का ऐंठना चाहिए जो होली के रंग-बिरंगे आयोजन को बदरंग कर रहे हैं। निशाने पर लोक परंपरा तो है ही, उनसे ज्यादा महिलाएं हैं। क्योंकि सबसे ज्यादा फब्तियां और ओछी हरकतें उन्हें ही सहनी-उठानी पड़ती हैं। अगर यह लगाम जल्द ही कसी नहीं गई तो इस महान लोकपर्व को महिला विरोधी करार दिए जाने का खतरा है।
बुधवार, 9 मार्च 2011
देखो कुंअर जी दूंगी गारी
होली पर्व प्रह्लाद और होलिका के पौराणिक प्रसंग से भले जुड़ता हो पर इसका असली रंग तो घर-परिवार और सामाज में ही देखने को मिलता है। भले अब होली का रंग थोड़ा बदरंग हो गया हो और खास तौर पर महिलाएं इसे मनाने से बचने लगी हैं। पर अब भी देश के ज्यादातर हिस्सों और परिवारों में होली उत्साह, मस्ती और आनंद का सौगात लेकर आता है। एक लोकपर्व के रूप में इस अनूठे त्योहार की लोकप्रियता पूरी दुनिया में इस कदर फैली है कि बिल Ïक्लटिंन की बेटी तक फगुनाहट की मस्ती में सराबोर होने के लिए राजस्थान पहुंचती है।
वैसे तो होली पूरे देश में मनाई जाती है पर अलग-अलग सांस्कृतिक अंचलों की होली की अपनी खासियत है। हां, एक बात जो सभी जगहों की होली में सामान्य है, वह है महिलाओं और पुरुषों के बीच रंग खेलने के बहाने अनूठे विनोदपूर्ण और शरारत से भरे प्रसंग। ये प्रसंग शुरू से होली की पहचान से जुड़े रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि इस मस्ती में नहाने वाले कोई एक धर्म या संप्रदाय के लोग हों। आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की लिखी होली आज भी लोग गाते हैं- 'क्यों मोपे मारे रंग की पिचकारी, देखो कुंअर जी दूंगी गारी।' फिल्मों के गीत याद करें तो चुहल और ठिठोली के कई बोल जेहन में एक के बाद एक आने लगते हैं। 'मदर इंडिया' के गीत 'होली आई रे कन्हाई रंग बरसे...सुना दे जरा बांसुरी' से लेकर "वक्त' फिल्म का माडर्न होली सांग 'गिव मी ए फेवर लेट्स प्ले होली...' तक फिल्मी होली गीतों की ऐसी पूरी श्रृंखला है, जहां होली के रंगों के बीच हीरो-हीरोइन के बीच दिलचस्प छेड़छाड़ चलती है। बात पूरबिया होली की करें तो यहां होली का रंग सबसे ठेठ और मस्ती से सराबोर है। यहां की होली का मस्ताना रंग यहां के पारंपरिक लोकगीतों में बी बखूबी मुखरित हुआ है। 'बंगला पे उड़ेला गुलाल...' से लेकर 'अंखिया लाले लाल...' तक कई ऐसे पारंपरिक गीत हैं जो आज भी गाए जाते हैं। दुखद है कि पारंपरिकता के इस अनमोल रंग में कुछ म्यूजिक कंपनियां और लोक गायक फूहड़ता और अश्लीलता का मिलावट कर रहे हैं, जिससे लोकरंग बदरंग हो रहा है। लोकगायिका मालिनी अवस्थी के मुताबिक, 'पारंपरिक होली गीतों की विरासत काफी समृद्ध और विविधता भरी है। बाजार के दौर में लोकगायकी को थोड़ा मिलावटी रंग जरूर दिया है पर आज भी पारंपरिक होली गीतों के कद्रदान ही ज्यादा हैं।'
इतिहासकार डॉ. शालिग्राम सिंह कहते हैं कि राधा-कृष्ण से लेकर जोधा-अकबर तक के विनोद पूर्ण होली प्रसंग देश में होली की परंपरा को रेखांकित करते हैं। आज भी होली में महिलाएं ही सबसे ज्यादा निशाने पर होती हैं और यह आलम घर-दफ्तर से लेकर स्कूल-कॉलेज तक सब जगह एक जैसी है। हाल के कुछ सालों में होली पर खुलकर नशा करने का प्रचलन बढ़ा है, जिससे अभद्रता से लेकर मारपीट तक की घटनाएं बढ़ गई हैं। दिल्ली के पालम इलाके में रहने वाली अमृता शर्मा बताती है कि वह होली पहले काफी उत्साह से मनाती थी क्योंकि उसे रंग बहुत पसंद हैं। पर अब वह घर से बाहर होली मनाने नहीं जाती क्योंकि इस दिन लड़कियों पर रंग भरे बैलून से लेकर कीचड़ तक फेंके जाते हैं, यही नहीं लड़के रंग लगाने के बहाने उनके साथ ओछी हरकत तक करने से बाज नहीं आते।
नोएडा निवासी सुमन भंडारी बताती हैं कि उनकी शादी दो साल पहले हुई है। होली के दिन उनके पति के दोस्त और देवर व उनके साथी होली करने की जिद करते हैं। सुमन बताती हैं कि ऐसे मौकों पर कई बार लोग नशे में भी रहते हैं और ऐसे में उन्हें अपनी सीमा का ख्याल नहीं रहता। इन अनुभवों से उलट आगरा की इंजीनियरिंग छात्रा नियति है, जिसे होली का इंतजार पूरे साल रहता है और वह अपनी सहेलियों के साथ इस दिन खूब मस्ती और हुड़दंग मचाती हैं। नियति कहती है कि होली रंग और उत्साह का त्योहार है और उसे अच्छा लगता है कि इस मौके पर वह अपनी सहेलियों के साथ खूब मस्ती करती हैं। वैसे नियति भी मानती है कि खास तौर पर होली पर युवतियों-महिलाओं का बाहर निकलना अब सहज नहीं रहा।
इस साल होली को शालीन, सभ्य और पारंपरिक तरीके से मनाने के लिए कई सामाजिक संगठनों मे पहल की है। होली मिलन की शक्ल में सामूहिक होली खेलकर सामाजिकता और पारिवारिकता के टूटते धागों को बांधने से लेकर बगैर पानी के होली खेलने के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। उम्मीद है इस बार हाथ में पिचकारी लिए अमृता और सुमन जैसी लड़कियां बगैर किसी डर के होली का आनंद उठाएंगी तो नियति जैसी किशोरियों की होली की मस्ती इस बार और बढ़ जाएगी।
वैसे तो होली पूरे देश में मनाई जाती है पर अलग-अलग सांस्कृतिक अंचलों की होली की अपनी खासियत है। हां, एक बात जो सभी जगहों की होली में सामान्य है, वह है महिलाओं और पुरुषों के बीच रंग खेलने के बहाने अनूठे विनोदपूर्ण और शरारत से भरे प्रसंग। ये प्रसंग शुरू से होली की पहचान से जुड़े रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि इस मस्ती में नहाने वाले कोई एक धर्म या संप्रदाय के लोग हों। आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की लिखी होली आज भी लोग गाते हैं- 'क्यों मोपे मारे रंग की पिचकारी, देखो कुंअर जी दूंगी गारी।' फिल्मों के गीत याद करें तो चुहल और ठिठोली के कई बोल जेहन में एक के बाद एक आने लगते हैं। 'मदर इंडिया' के गीत 'होली आई रे कन्हाई रंग बरसे...सुना दे जरा बांसुरी' से लेकर "वक्त' फिल्म का माडर्न होली सांग 'गिव मी ए फेवर लेट्स प्ले होली...' तक फिल्मी होली गीतों की ऐसी पूरी श्रृंखला है, जहां होली के रंगों के बीच हीरो-हीरोइन के बीच दिलचस्प छेड़छाड़ चलती है। बात पूरबिया होली की करें तो यहां होली का रंग सबसे ठेठ और मस्ती से सराबोर है। यहां की होली का मस्ताना रंग यहां के पारंपरिक लोकगीतों में बी बखूबी मुखरित हुआ है। 'बंगला पे उड़ेला गुलाल...' से लेकर 'अंखिया लाले लाल...' तक कई ऐसे पारंपरिक गीत हैं जो आज भी गाए जाते हैं। दुखद है कि पारंपरिकता के इस अनमोल रंग में कुछ म्यूजिक कंपनियां और लोक गायक फूहड़ता और अश्लीलता का मिलावट कर रहे हैं, जिससे लोकरंग बदरंग हो रहा है। लोकगायिका मालिनी अवस्थी के मुताबिक, 'पारंपरिक होली गीतों की विरासत काफी समृद्ध और विविधता भरी है। बाजार के दौर में लोकगायकी को थोड़ा मिलावटी रंग जरूर दिया है पर आज भी पारंपरिक होली गीतों के कद्रदान ही ज्यादा हैं।'
इतिहासकार डॉ. शालिग्राम सिंह कहते हैं कि राधा-कृष्ण से लेकर जोधा-अकबर तक के विनोद पूर्ण होली प्रसंग देश में होली की परंपरा को रेखांकित करते हैं। आज भी होली में महिलाएं ही सबसे ज्यादा निशाने पर होती हैं और यह आलम घर-दफ्तर से लेकर स्कूल-कॉलेज तक सब जगह एक जैसी है। हाल के कुछ सालों में होली पर खुलकर नशा करने का प्रचलन बढ़ा है, जिससे अभद्रता से लेकर मारपीट तक की घटनाएं बढ़ गई हैं। दिल्ली के पालम इलाके में रहने वाली अमृता शर्मा बताती है कि वह होली पहले काफी उत्साह से मनाती थी क्योंकि उसे रंग बहुत पसंद हैं। पर अब वह घर से बाहर होली मनाने नहीं जाती क्योंकि इस दिन लड़कियों पर रंग भरे बैलून से लेकर कीचड़ तक फेंके जाते हैं, यही नहीं लड़के रंग लगाने के बहाने उनके साथ ओछी हरकत तक करने से बाज नहीं आते।
नोएडा निवासी सुमन भंडारी बताती हैं कि उनकी शादी दो साल पहले हुई है। होली के दिन उनके पति के दोस्त और देवर व उनके साथी होली करने की जिद करते हैं। सुमन बताती हैं कि ऐसे मौकों पर कई बार लोग नशे में भी रहते हैं और ऐसे में उन्हें अपनी सीमा का ख्याल नहीं रहता। इन अनुभवों से उलट आगरा की इंजीनियरिंग छात्रा नियति है, जिसे होली का इंतजार पूरे साल रहता है और वह अपनी सहेलियों के साथ इस दिन खूब मस्ती और हुड़दंग मचाती हैं। नियति कहती है कि होली रंग और उत्साह का त्योहार है और उसे अच्छा लगता है कि इस मौके पर वह अपनी सहेलियों के साथ खूब मस्ती करती हैं। वैसे नियति भी मानती है कि खास तौर पर होली पर युवतियों-महिलाओं का बाहर निकलना अब सहज नहीं रहा।
इस साल होली को शालीन, सभ्य और पारंपरिक तरीके से मनाने के लिए कई सामाजिक संगठनों मे पहल की है। होली मिलन की शक्ल में सामूहिक होली खेलकर सामाजिकता और पारिवारिकता के टूटते धागों को बांधने से लेकर बगैर पानी के होली खेलने के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। उम्मीद है इस बार हाथ में पिचकारी लिए अमृता और सुमन जैसी लड़कियां बगैर किसी डर के होली का आनंद उठाएंगी तो नियति जैसी किशोरियों की होली की मस्ती इस बार और बढ़ जाएगी।
बुधवार, 2 फ़रवरी 2011
मुहब्बत का पहला पाठ नचनियों ने पढ़ाया था
एक ऐसे समय में जब छवियों की अतिशयता ने जीवन के एकांत तक को भर दिया है। यह बात समझनी थोड़ी असहज हो सकती है कि लोक की बनावट को जीवन रचना की तरह रेखांकित करने वाले सौंदर्यबोध की परंपरा ने हिंदी काव्य इतिहास को अनूठेपन को काफी हद तक और काफी दूर तक गढ़ा है। ऐसे में कई बार यह स्थिति विरोधाभासी लगती है कि पिछले तकरीबन दो दशकों में हिंदी के ठेठपन के हिमायती ज्यादातर नए कवियों के यहां इस परंपरा का न तो निर्वहन दिखाई पड़ता है और न ही उनकी कथित सामयिकता इस अनूठेपन का कोई विकल्प सूझाने का जोखिम ही उठाती है। बहरहाल, जिक्र हिंदी के वरिष्ठ कवि रवीन्द्र भारती के हालिया कविता संग्रह 'नचनिया' का।
इस संग्रह में लोक स्मृतियों का ऐसा जीवंत ताना-बाना बुना गया है कि आधुनिक समय में भी उनकी मौजूदगी का एहसास होता है। भारती के इस संग्रह की कविताओं का शीर्षक और आधार बिंब दोनों ही 'नाच' है। कुलीनता की नई शब्दावली से खारिज 'नाच' और 'नचनिया' जैसे शब्दों के बहाने लोकरंग की उस उत्सवी दुनिया से पहचान कराई गई है, जो महज फंतासी नहीं बल्कि एक ऐसा ठेठ और ठोस यथार्थ है, जिसके गुणधर्म और गुणसूत्र आज भी हमारी चेतना की जमीन को आद्र करते हैं- 'नाचो/ पीछे को आगे से जोड़े/ आगे को पीछे से बांधे/ नाचो कि नाचेगी दुनिया/ मियां यह नाच है।''नचनिया' से पहले अपने विलक्षण नाटक 'कंपनी उस्ताद' से खासी चर्चा और शोहरत पा चुके रवीन्द्र भारती चूंकि सामाजवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि से आते हैं, लिहाजा आधुनिकता के स्नो-पाउडर से चमकते चेहरे-मोहरों की बजाय वह 'धूल-धूसर गात' वाला लोक उन्हें ज्यादा खींचता है, जिसका विस्मरण अब काव्य अनुभूति के क्षेत्र की एक खतरनाक सचाई बनती जा रही है- 'उसके घूंघरू की आवाज/ यहां तक आ रही है छम्म, छम्म.../ बच्चे मुस्करा रहे हैं-/ लगता है जैसे वे नचनिया को नहीं/ विलुप्त हो रही किसी प्रजाति को देख रहे हैं।' 'नचनिया' जिस लोक का हिस्सा है या कि जिस लोक को रचता है, उसकी पदचाप भले पीछे छूट गई हो पर उसकी छाप को कवि ढोलक और मृदंग पर पड़ने वाली थाप की तरह महसूस करता है- 'मुहब्बत का पहला पाठ-/ किसी किताब ने नहीं, इन्हीं नचनियों ने पढ़ाया था।'
'नचनिया' के लोक में कवि सामयिक स्थितियों को पूरी तरह खारिज नहीं करता बल्कि वह आज के कई विरोधाभासी और विसंगतिपूर्ण स्थितियों को रेखांकित करता है। 'गुजरात' शीर्षक से संग्रह में दो कविताएं हैं। पर भारती के लिए गुजरात का टेक्स्ट नारावादी या प्रचारित बिंबों भर से महज नहीं बनता बल्कि उसकी लोकचेतना का कंपास ही यहां भी उसके दृष्टिकोण को तय करता है, तभी तो वह समकालीन 'गुजरात' की यात्रा पर जाते हुए हठात् कह उठता है- 'आगे क्या हुआ पता नहीं चला/ सिर्फ इतना मालूम हुआ कि सूत्रधार ने जैसे कहा-/ ग से गांधी/ व से वालदैन/ कि गोली चल गई।' मौजूदा गुजरात का रक्तिम यथार्थ कवि को विचलित भी करता है- 'गिद्ध कितना मंडरा रहे हैं.../ यह भी ससुरे हैं चिरई की जाति।'
लोकबोध की दरकार के साथ एक खतरा भी और वह खतरा है अतीतगामी होने का। भारती की काव्य चेतना ने भरसक इस खतरे का अतिक्रमण किया है पर वे यहां-वहां चूके भी हैं और ऐसा अनायास नहीं बल्कि जान-बूझकर हुआ दिखता है। 'नचनिया' संग्रह की एक कविता है 'दिल्ली में कथक'। वस्तुत: यह एक व्यंग्य कविता है जो केंद्रित विकास की भीतरी विरोधाभासी स्थितियों का खुलासा करती है। पर यहां भी कवि के भीतर का नचनिया न तो उसे ढ़ंग से आक्रोश से भरने देता है और न ही व्यंग्यात्मक अभिधा से आगे जाने देता है- 'बेलीक मत अलापिए राग, पकड़े रहिए/ संविधान की लय/ खैर छोड़िए राजनीति/ आजादी जवान भई/ कथक में आइए/ हां ता थई..तत/ थई..तत...थई।' वैसे इसे भारती के शिल्पगत मिजाज के रूप में भी देख सकते हैं, जहां एक कवि खुद से अपनी सीमा और मर्यादा दोनों तय करता है।
अंतिम तौर पर कोई राय 'नचनिया' को लेकर बनानी हो तो यही कह सकते हैं कि न सिर्फ समकालीन हिंदी काव्य चेतना बल्कि देश और समाज के बीच गढ़ी जा रही समकालीन चेतना के विरुद्ध यह संग्रह एक रचनात्मक हस्तक्षेप की तरह है। अच्छी बात यह है कि कवि की अंगुलियां समकालीन विसंगतियों की ओर कम बार उठी हैं। और जब भी उठी हैं तो ये अंगुलियां अपना लोक रचने, अपनी लोकमुद्राएं बनाने में ज्यादा दिलचस्पी लेती हैं। लोक अवहेलना और विस्मृति के दौर में नचनिया का नाच कोई स्वांग नहीं, जिस पर महज तालियां बजें और वाह-वाह हो। दरअसल यह एक निरगुनिया लोक संगीत है, जो लोक और परंपरा को एक सूर में अलापती है। हिंदी काव्य चेतना को इस सूर ने लंबे समय तक समृद्ध किया है, समकालीन स्थितियों में भी उसकी दरकार खारिज नहीं हुई हैं, ये बताती हैं भारती के नए संग्रह की 54 कविताएं।
नचनिया (कविता संग्रह) कवि : रवीन्द्र भारती प्रकाशक : राधाकृष्ण मूल्य : 150 रुपए
रविवार, 26 दिसंबर 2010
विरासत के नाम एक मनमोहन चिंता
भारत का एक राष्ट्र और संस्कृति के रूप में अभ्युदय नया नहीं है। यही नहीं लोक और परंपरा की गोद में दूध पीती यहां की बहुरंगी संस्कृति का कलेवर शुरू से सतरंगी रहा है। दुनियाभर में यही हमारी पहचान भी रही है और यही हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चिंता जताई है कि बहुसंस्कृति, संयम और भाईचारे की समृद्ध विरासत पर खतरा है और इसे हर हाल में बचाया जाना चाहिए। उन्होंने खासतौर पर बुद्धिजीवियों से अपील की है कि वे इस विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में योगदान करें। बुद्धिजीवियों की भूमिका और उनकी दरकार को इस तरह स्वीकार करना अगर ऊपरी या रस्मी नहीं है तो मौजूदा स्थितियों में यह बड़ी बात है और स्वागतयोग्य भी। यह और बात है कि विद्वानों और कला-संस्कृति के जानकारों के लिए बना ऊपरी सदन अब इनकी उपस्थिति को मोहताज है। वहां दाखिले के लिए अब दीनारी दमखम चाहिए। सो "संतन को कहां सीकरी सो काम" कहने वाले कैसे वहां पहुंच पाएंगे।
बहरहाल, बात प्रधानमंत्री के हालिया बयान की। दरअसल, मौजूदा दौर में संबंध, संवेदना और संयम को हर स्तर पर खारिज होते जाने का चलन प्रगाढ़ हुआ है और उसकी जगह जो पनप और पसर रहा है, वह है तात्कालिक उत्कर्ष और समृद्धि का उतावलापन। यहां तक की 21वीं सदी में विश्व शक्ति के रूप में भारत की जिस पहचान को विश्व मानचित्र पर उकेरने के उपक्रम चल रहे हैं, उनमें भी सार्वदेशिकता और सार्वकालिकता की बजाय तात्कालिक उत्कर्ष के तर्क ही ज्यादा हावी हैं। सुखद है कि विकास के ग्लोबल दौड़ में भारत को एक द्रुत धावक के रूप में तैयार करने की ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले मनमोहन सिंह को भी इस खतरे का अंदाजा है कि आगे निकलने की जल्दबाजी में कहीं कुछ बहुत महत्वपूर्ण पीछे न छूट जाए।
मनमोहन मानते हैं कि बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसंस्कृति वाले इस देश में एकता को बनाए रखने की दरकार है। उन्होंने उस अध्यात्म दर्शन का भी हवाला दिया, जिसके कारण हमारे देश को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा हासिल हुई है। भारतीय चित्त, मानस और काल के अध्येता धर्मपाल हों या लोक और परंपरा के कल्याणकारी संबंध की व्याख्या करने वाले वासुदेवशरण अग्रवाल और रामचंद्र शुक्ल। सबने भारतीय समाज में किसी बाजारू या आर्थिक की बजाय लोकादर्शों की संरक्षा और उसे आगे बढ़ाने वाले तत्वों को अन्यतम बताया है। हमारी यह अन्यतमता नए समय में हमारी महत्ता को सबसे काबिल तरीके से सिद्ध कर सकती है।
खतरा सिर्फ एक है कि चरम भोग की घुट्टी पिलाने वाले बाजारवादी मूल्यों के बीच शांति, संयम और समन्वय का धैर्यपूर्ण पाठ पढ़ने की ललक लोगों में कैसे पैदा की जाए। सरकार के मुखिया अगर स्कूल-कॉलेज के सिलेबसों में किसी फेरबदल या शोध अध्ययनों के साथ इस तरह की कोई गुंजाइश देखते हैं तो यह चिंता और चुनौती दोनों का सरलीकरण होगा।
दरअसल, भारत विकास और समृद्धि की जिस लीक पर अभी चल रहा है, वह उसकी आधुनिकता से तो जरूर मेल खाता है पर बुनियादी प्रकृति के खिलाफ है। दुखद है कि इस दुविधा को लेकर संसद और समाज कहीं भी कोई मंथन या बहस नहीं दिखती। अच्छा होता कि भारतीयता की पारंपरिक छवि को नए संभाल के साथ हम आगे बढ़ाते क्योंकि तब हमारी उपलब्धियां न सिर्फ हमारे रंगो-तेवर के मुताबिक होती बल्कि उसमें हमारी शर्तें भी शामिल होती। तब हम दुनिया के रंग में नहीं बल्कि दुनिया हमारे रंग में रंगती।
आगे बढ़कर पलटना खतरनाक है पर खतरनाक रास्ते पर आंख मूंदकर चल पड़ना भी कोई बुद्धिमानी नहीं। हमें यकीन करना चाहिए कि हमारे प्रधानमंत्री बुद्धिमान तो हैं ही, बड़े से बड़े खतरे के खिलाफ खड़े होने में हर लिहाज से सक्षम भी हैं। इसलिए अगर उनकी चिंता बस "मनमोहनी" न होकर जेहनी तौर पर जायज है तो सरकार के सांस्कृतिक सरोकारों की जमीन एक बार फिर हरीभरी हो सकती है। वैसे इस हरियाली की कामना और इसका दर्शन हो निहायत अलग चीचें हैं। यह "कामना" और "दर्शन" अगर एक सीध में आ जाए तो मौजूदा सदी का नया दशक सचमुच कई मायने में क्रांतिकारी साबित हो सकता है।
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