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मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

आप की सरकार को यहां से देखें


दिल्ली का राजनीतिक कुहासा छट गया है। अब आम आदमी पार्टी सरकार बनाने को राजी है। पर अब तक के घटनाक्रम में और कुछ हुआ हो या नहीं, पारंपरिक राजनीति के आगे एक वैकल्पिक लीक खींची जा सकती है, यह संभावना कहीं न सहीं संभव होती दिख रही है। दिल्ली विधानसभा के नतीजे जब आठ दिसंबर को आए तो उसके साथ यह धर्मसंकट भी आया कि यहां अगली सरकार कैसे बनेगी और कौन बनाएगा? त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति कोई देश में पहली बार नहीं बनी है। बल्कि सच तो यह है कि केंद्र में भी यह स्थिति एकाधिक बार रही है। पर सरकारें हर बार बनी हैं। कई बार आधे-अधूरे कार्यकाल के लिए तो कई बार पूरे कार्यकाल के लिए। पर दिल्ली में चुनकर आई त्रिशंकु विधानसभा से सरकार गठन की राह दुश्वार इसलिए हो गई क्योंकि एक साल पहले खड़ी हुई एक पार्टी ने 28 सीटें जीतकर एक बदली राजनीतिक स्थिति का संकेत सभी दलों को दे दिया।
दिल्ली में सरकार बनाने के लिए जरूरी आंकड़ा 36 का है। कांग्रेस महज आठ सीटें जीतकर पहले ही सत्ता के रेस से बाहर हो गई। भाजपा के अगुवाई वाली राजग भी बहुमत के आंकड़े से चार सीट पीछे रही। रही आप तो उसे आठ सीटें मिलीं। भाजपा के लिए दिल्ली में बहुमत का आंकड़ा जुगाड़ना कोई बड़ी बात नहीं होती। हाल के वर्षों में भी वह कर्नाटक से लेकर झारखंड तक जोड़तोड़ का यह खेल खेल चुकी है। पर दिल्ली में यह मुमकिन इसलिए नहीं हो सकता था क्योंकि पिछले कम से कम तीन सालों में आम आदमी के भ्रष्टाचार और महिला असुरक्षा के खिलाफ आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी ने राजनीतिक शुचिता की एक नई चुनौती खड़ी कर दी। देश में यह अपने तरह की संभवत: पहली सूरत थी जिसमें कोई भी दल सरकार बनाने के लिए आगे आने को तैयार नहीं दिखा। मीडिया ने इसे आम आदनी पार्टी द्बारा तय किए गए 'मॉरल इंडेक्स’ का नाम दिया। दिलचस्प है ऐसे दौर में जब किसी पॉलिटक डेवलेपमेंट के प्रभाव को सेंसेक्स के चढ़ने-उतरने से जोड़कर देखा जाना एक जरूरी दरकार बन गई हो, उस दौर में सेंसेक्स से बड़ी खबर और चर्चा उस मॉरल इंडेक्स की हो रही है, जो लोकतंत्र में जनता की एक दिन की मतदान की भागीदारी से आगे एक सतत प्रक्रिया को आजमाए जाने की वकालत कर रही है।
 पिछले 14 दिसंबर को दिल्ली के उपराज्यपाल ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के उपराज्यपाल ने सरकार बनाने की संभावना पर विचार करने के लिए बुलाया था। आप की तरफ से यह पहले ही साफ कर दिया गया था कि वह न तो किसी दल से समर्थन लेगी और न ही किसी को समर्थन देगी। पर देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने इस बीच एक नया सियासी दांव खेला। केजरीवाल उपराज्यपाल से मिलने पहुंचते इससे पहले वहां कांग्रेस की यह चिट्ठी पहुंच चुकी थी कि वह आप को सरकार बनाने के लिए बाहर से बिना शर्त समर्थन देने को तैयार है। कांग्रेस के इस दांव से आप को अपने पुराने स्टैंड पर थोड़ा विचार करना पड़ा। क्योंकि इस दौरान ये बातें भी खूब हुईं कि आम आदमा पार्टी ने बिजली दर आधी करने और हर घर को 7०० लीटर पानी देने जैसे जो चुनावी वादे किए हैं, उससे वह पूरा नहीं कर सकती है। क्योंकि ऐसा करना न तो संभव है और न ही व्यावहारिक। लिहाजा उसकी पूरी कोशिश होगी कि वह सरकार बनाने से बचे।
आप के नेताओं ने इस बदले राजनीतिक खेल को समझा।उसने तय किया कि वह इस पूरी स्थिति को एक बार फिर से जनता की अदालत में ले जाएगी और उससे ही पूछेगी कि क्या उसे सरकार बनानी चाहिए। जो खबरें हैं, उसमें आप ने दिल्ली में 25० से ज्यादा सभाएं की। जनता ने भारी बहुमत से आप को सरकार बनाने के लिए आगे बढ़ने को कहा। अब आप इस पॉलिटकल स्टैंड के साथ सरकार बनाने जा रही है कि वह किसी दल के समर्थन या विरोध के आधार पर नहीं बल्कि जनता की राय पर सरकार बनाने जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में पहली नजर में एक गैरजरूरी नाटकीयता आप के नेताओं की तरफ से नजर आती है। एक बार चुनाव संपन्न हो जाने के बाद फिर से जनता के पास जाने का क्या तुक है? ऐसी दरकार हमारी संवैधानिक व्यवस्था की भी देन नहीं है। फिर भी ऐसा किया गया। दरअसल, इसका जवाब वे मुद्दे हैं जो गुजरे दो-तीन सालों में बार-बार उठे। लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एक दिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से क्या पूरी हो जाती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद सर्वोच्च संस्था है पर क्या उसकी यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है? क्या सरकार और संसद सिर्फ नीतियों और योजनाओं का निर्धारण जनता के लिए करेंगे या फिर इस निर्णय प्रक्रिया में जनता की भी स्पष्ट भागीदारी सुनिश्चत होनी चाहिए? केंद्रीकृत सत्ता लोकतांत्रिक विचारधारा के मूल स्वभाव के खिलाफ है तो फिर उसका पुख्ता तौर पर विकेंद्रीकरण क्यों नहीं किया जा रहा है? पंचायती राज व्यवस्था को अब तक सरकार की तरफ से महज कुछ विकास योजनाओं को चलाने की एजेंसी बनाकर क्यों रखा गया है, उसका सशक्तिकरण क्यों नहीं किया जा रहा है?
ऐसा लगता है कि आप स्थानापन्नता की राजनीति की बजाय विकल्प की राजनीति को एक स्वरूप देने के मकसद से आगे बढ़ना चाहती है। देश में साढ़े छह दशक से भी लंबे दौर में जो सियासी व्यवस्था जड़ जमा चुकी है, उसे एक भिन्न समझ के साथ देखने-समझने की तैयारी और उस ओर अग्रसर होना कोई आसान काम नहीं है। पर आज बदलाव की जमीन पर शुरुआती तौर पर एक दल और उससे जुड़े लोग खड़े हैं तो यह जाहिर करता है कि इस विकल्प के प्रति जनता के मन में भी छटपटाहट कम नहीं है।
जनता के बीच जनता की राजनीति को तो शक्ल लेना ही चाहिए। यही तो जनतंत्र की बुनियादी दरकार है। पिछले कुछ दशकों में जनता के नाम पर भले खूब राजनीति हुई और उसे अस्मितावादी तर्किक निकष पर कसने की भी खूब कोशिश हुई पर जनतांत्रिक व्यवस्था में आमजन की स्पष्ट और प्रत्यक्ष प्रतिभागिता की चुनौती को स्वीकार करने से सब बचते रहे। आज अगर आप की दिल्ली की सरकार को इस प्रतिभागिता को सुनिश्चत करने की क्रांतिकारी पहल की बजाय अगर महज बिजली-पानी के भाव के मुद्दे पर केंद्रित करने की कोशिश हो रही है, तो इसलिए क्योंकि लोकतंत्र की राजनीति करने वाले दूसरे किसी दल के पास यह नैतिक साहस नहीं है कि वह जनता के नाम पर नहीं बल्कि जनता के साथ मिलकर अपनी राजनीति का गंतव्य तय करे। बहरहाल, आप की पहल एक नई राजनीति की शक्ल पूरी तरह ले पाएगी, इसमें संशय अब भी काफी है। पर इन संशयों के धुंध के बीच से ही कुछ सुनहरी किरणें अगर फूट रही हैं तो यह देश के भावी राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक शुभ संकेत है।
 

रविवार, 8 मई 2011

देस में मना परदेस में अन्ना


दूर होकर भी हम किसी के बेहद करीब हो सकते हैं और कोई बेहद नजदीक होकर भी हमारा नहीं होता। ये बातें प्रेमाख्यानों और कविताई में ही नहीं, जिंदगी की कई दूसरी सूरतों में भी हम बारहा महसूस करते हैं। असल में दूरी और नजदीकी का सच समय, स्थान और परिवेश के साथ बदलता है। कहा यह भी जाता है कि दूरी हमारी पहचान के गाढ़ेपन को तो हल्का करती है पर उसके दायरे को बढ़ा देती है। नजरिया, मजहब, राजनीति, स्थान और बोली के अंतर देश में जिस अनेकता की लकीरों के रूप में दिखते हैं, देश के बाहर वही अनेकता हमें एकता के सूत्र में बांधती है। दूरी और मनुष्य के रिश्ते का यह मनोवैज्ञानिक सच तो है ही उसके सामाजिक और सार्वजनिक सलूक से जुड़ी बुनियादी बात भी है।
जिस अन्ना हजारे को अपने देश में और अपनी सरकार से अपनी बातें कहने-मनवाने के लिए 98 घंटे का अनशन करना पड़ा, उसी को लेकर सरकार को जब देश के बाहर अपनी बातें कहनी होती है तो वह इसे किसी टकराव या मतभेद के बजाय बहुदलीय लोकतंत्र प्रणाली का नया आयाम बताती है। वित्त मंत्री प्रणव मुख़र्जी उस लोकपाल बिल प्रारूप समिति के अध्यक्ष हैं, जिनमें पांच सदस्य सरकार की तरफ से और पांच सदस्य नागरिक समाज की नुमाइंदगी कर रहे हैं। स्वतंत्र भारत की इतिहास में यह अभिनव प्रयोग है, जब कानून बनान के लिए सामज और सरकार एक साथ बैठी है। चूंकि प्रयोग नया है, लिहाजा इस पर प्रतिक्रियाएं भी कई तरह की हैं। सरकार के साथ राजनीतिक बिरादरी में अभी तक इस बात को लेकर बयानबाजी जारी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का प्रयोग सैद्धांतिक तकाजों पर कितना खरा या खतरनाक है। पर ये बातें देश के भीतर जिस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म दे रही हैं, देश की सीमा से बाहर उसका स्वरूप इससे नितांत भिन्न है। अमेरिका से लेकर यूके और फ्रांस तक में अन्ना के सत्याग्रही प्रयोग के कई प्रशंसक हैं और वे अपने-अपने तरह से इस पहल को ग्लोबल बनाने के लिए प्रयासरत भी हैं।

इस स्थिति से सरकार भी अवगत है और वह इसे लोकतांत्रिक ढांचे के सशक्तिकरण की कोशिश के रूप में ही दुनिया के आगे रखना चाहती है। तभी तो एशियाई विकास बैंक की बैठक के दौरान जब प्रणव मुखर्जी को जब अन्ना हजारे को लेकर प्रतिक्रिया जतानी पड़ी तो वह यह स्वीकार करने में जरा भी नहीं हिचके कि लोकपाल मुद्दे पर सामाजिक संगठनों के दबाव में सरकार को तत्काल कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि कोई भी जिम्मेदार और जवाबदेह सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकती। मुखर्जी एक वरिष्ठ राजनेता हैं। वह यह जानते हैं कि लोकतंत्र की मर्यादाएं क्या हैं और किस तरह असहमतियों के बीच सहमति की गुंजाइश निकालनी पड़ती है। तभी तो वे इस मौके पर यह कहना भी नहीं भूले कि सरकार की कार्यप्रणाली के विभिन्न पहलू पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त तो होना ही चाहिए।
देश के बाहर देश की जिस तस्वीर को हम निहायत ही भावुकता के साथ बनाते हैं, उस तस्वीर का सच देश के भीतर भी प्रकट हो तो विचार और वस्तुस्थिति की अनेकता के बीच एकता कायम होगी। लोकपाल बिल प्रारूप समिति की अभी तीन बैठकें हुई हैं। बैठक के टेबल से सहयोग और सौहार्द का संदेश ही बाहर जाए ऐसी कोशिश दोनों पक्षों की तरफ से रही है। देश के भीतर भी ऐसा ही माहौल रहे तो बड़ी बात होगी। क्योंकि परेदस में देस याद आना और देस में इस याद का बिसर जाना खतरनाक है। यह बात कोई और समझे न समझे प्रणव दा तो जरूर समझते होंगे।

गुरुवार, 5 मई 2011

अमूल बेबी की आरटीआई : जागरण में ‘पूरबिया’

राहुल का  भारतीय राजनीति के सबसे ख्यात और शक्तिशाली परिवार से आते हैं, उनकी पार्टी कांग्रेस भी देश की आज तक नंबर एक राजनीतिक पार्टी है। अगर लोगों के बीच जाना, उनसे जुड़ना, उन्हें समझना और लोक संवाद के जरिए लगातार संघर्ष के लिए तत्पर बने रहना राजनीति की कम से कम वह सीख तो नहीं ही है जिसमें एक तरफ जहां प्याली में क्रांति उबलती है, वहीं दूसरी तरफ लाल बत्ती से नेतृत्व का कद तय होता है। राहुल को लेकर एक राय यह भी है कि धैर्य और सरलता की राह उनकी नीति से ज्यादा रणनीति है। एक ऐसी रणनीति जो उनकी भविष्य में होने वाली ताजपोशी के लिए बनाई गई है। अगर यह बात सही है तो यह जनता के साथ एक और विश्वासघात होगा और लोकतंत्र में लोक की आस्था और भरोसे से खिलवाड़ का खामियाजा बहुत बड़ा है। राहुल को यह भी अभी से समझ लेना होगा...  


मंगलवार, 3 मई 2011

अमूल बेबी को भाई आरटीआई


संघर्ष लोकतंत्र में हमेशा जारी रहने वाली प्रक्रिया है। जिस राजनीति को हम सिर्फ सत्ता की दखली और बेदखली से जोड़कर देखते हैं, वह उस पूरी राजनीति के औचित्य का लेश मात्र भी नहीं, जिसकी एक बेहतर लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए दरकार है। यह बातें इसलिए भी समझनी होगी क्योंकि हमें यह लगता है कि नेता और जनता हमेशा एक-दूसरे के खिलाफ होते हैं, यही उनकी फितरत भी है और यही मौजूदा हालात में सतह पर आई सचाई भी है। दरअसल, राजनीति और संघर्ष के लोकतांत्रिक तकाजे जनता से जुड़े हैं, जनता के लिए हैं। इसलिए जन सरोकार से अलग या उसके उलट न तो कोई दूसरा सरोकार लोकतंत्र में मान्य है और न ही कोई दूसरा रास्ता। साफ है कि लोकतंत्र की ताकत अगर लोक है तो सत्ता और शक्ति के किसी दूसरे केंद्र का ताकतवर होना खतरनाक है। यही बात लोकतांत्रिक संघर्षों को लेकर भी है।
यह कहीं से मुनासिब नहीं कि 'राजपथ' का महत्व 'जनपथ' से ज्यादा हो। अगर जनता और नेता के संघर्ष के औजार भिन्न होंगे तो इसका मतलब है कि लोक के लोप की कीमत पर नेता नेतागीरी का स्कोप देख रहे हैं। जिन लोगों को भारतीय राजनीति में राहुल गांधी के आगमन और आगे बढ़ने के उनके सीधे-सरल लोकतांत्रिक तरीके पर जरा भी यकीन हो, उन्हें यह जानना अच्छा लगा होगा कि सरकारी योजनाओं में घपलों-घोटालों को उजागर करने के लिए उन्होंने ओरटीआई को हथियार बनाया है। इसके लिए उन्होंने न सिर्फ खुद से अर्जी लगाई बल्कि यह दिखाया भी कि नेतागीरी की धौंस और सत्ता की पागल कर देने वाली राजनीति में उनका कोई यकीन नहीं। कलावती की झोपड़ी में रात बिताकर परिवर्तन के सवेरे की बात करने वाले इस युवा नेता की कथनी और करनी अगर सचमुच एकमेक है तो यह बड़ी बात है।
राहुल भारतीय राजनीति के सबसे ख्यात और शक्तिशाली परिवार से आते हैं, उनकी पार्टी कांग्रेस भी देश की आज तक नंबर एक राजनीतिक पार्टी है। अगर लोगों के बीच जाना, उनसे जुड़ना, उन्हें समझना और लोक संवाद के जरिए लगातार संघर्ष के लिए तत्पर बने रहना राजनीति की कम से कम वह सीख तो नहीं ही है जिसमें एक तरफ जहां प्याली में क्रांति उबलती है, वहीं दूसरी तरफ लाल बत्ती से नेतृत्व का कद तय होता है। राहुल को लेकर एक राय यह भी है कि धैर्य और सरलता की राह उनकी नीति से ज्यादा रणनीति है। एक ऐसी रणनीति जो उनकी भविष्य में होने वाली ताजपोशी के लिए बनाई गई है। अगर यह बात सही है तो यह जनता के साथ एक और विश्वासघात होगा और लोकतंत्र में लोक की आस्था और भरोसे से खिलवाड़ का खामियाजा बहुत बड़ा है। राहुल को यह भी अभी से समझ लेना होगा।  
पिछले दिनों में कई ऐसी पहलें हुई हैं जिसमें आरटीआई सरकार के अपने कामकाज के साथ व्यवस्थापिका की कमजोरियों को तथ्यगत तौर पर उजागर करने का हथियार बना है। इस कारण कई मौके पर जहां जरूरी कदम उठाए गए, वहीं कई मामलों में अदालत तक ने सार्थक हस्तक्षेप किया। अभी नागरिक समाज की सजगता से भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल को लेकर जो मुहिम आगे बढ़ रही है उसके आगाज के पीछे भी आरटीआई कार्यकर्ताओं की सफलता ही है। दरअसल, यह एक ऐसी कानूनी ताकत है जिसके माध्यम से जनता सरकारी कामकाज, उसके खर्च ब्योरे और तौर-तरीकों पर सीधे सवाल उठा सकती है। सरकार और व्यवस्था के कामकाज का इस तरह सार्वजनिक होना, जहां उनकी विश्वसनीयता को बहाल करने का कारगर जरिया बना है, वहीं जनता को भी भरोसा हुआ है कि उसकी योजनाओं और उसके हक के साधनों की गिद्ध लूट अब संभव नहीं।