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मंगलवार, 26 नवंबर 2013

तहलकावादी तकनीक और मीडिया


तरुण तेजपाल जिस मामले में फंसे हैं, वह महिला अस्मिता से जुड़े कुछ जरूरी सामयिक सरोकारों की तरफ हमारा ध्यान तो ले ही जाता है, यह मीडिया के अंतजर्गत को भी लेकर एक जरूरी बहस छेड़ने का दबाव बनाता है। एक ऐसी बहस जिसमें खुद से मुठभेड़ करना का हौसला हो। मीडिया अगर खुद को देशकाल का आईना कहता है तो यह अपेक्षा तो उससे भी होनी चाहिए, वह इस आईने का इस्तेमाल खुद के लिए भी बराबर तौर पर करे। आईना अपनी तरफ हो या सामने की तरफ, सच को जैसे को तैसा देखने-दिखाने की उसकी फितरत नहीं बदलती। यह भी कि आईना कीमती हो या कम दामी, काम वह एक जैसा ही करता है। कृष्ण बिहारी नूर का एक शेर भी है-'चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो, आईना है कि झूठ बोलता ही नहीं।’
तरुण जिस तरह की पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं, उसमें तकनीक का बड़ा योगदान है। अब तक उन्होंने जो भी तहलका मचाया, वह तकनीकी मदद से ही संभव हुआ। लिहाजा, तकनीक के जोर पर चल रही पत्रकारिता के मानस को पढ़ने के लिए हमारे आगे कुछ बातें और स्थितियां साफ होनी चाहिए। दरअसल, सूचना के क्षेत्र में तकनीकी क्रांति के कारण मीडिया का अंतजर्गत वैसा ही नहीं रहा, जैसा इससे पूर्व था। यह फर्क इसलिए भी आया क्योंकि इसी दौर में बाजार ने प्रतिभा और विकास के साझे को अपनी ताकत बना लिया।
अस्सी-नब्बे के दशक में खोजी पत्रकारिता के दौर में जातीय और नक्सली हिंसा के साथ मुंबई जैसे शहरों में अंडरवर्ल्ड की रिपोर्टिंग के दौर के साझीदार और चश्मदीद अब भी कई लोग मीडिया क्षेत्र में विभिन्न भूमिकाओं में सक्रिय हैं। ये लोग बताते हैं कि सत्य और तथ्य की खोज के पीछे की पत्रकारीय ललक का पूरा व्याकरण ही तब बदल गया, जब इस काम के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल शुरू हुआ। ऐसा इसलिए क्योंकि तकनीक का अपना रोमांच होता है और कई बार यह रोमांच आपको अपने मकसद से डिगाता है। आज के दौर में तौ खैर तकनीक और सूचना को एक-दूसरे से अलगाया ही नहीं जा सकता है।
बात करें न्यू मीडिया या सोशल मीडिया की तो यह अलगाव वहां भी मुश्किल है। इस मुश्किल को इस तरह भी समझने की जरूरत है कि एक ऐसे दौर में जब अरब बसंत जैसी क्रांति की बात होती है तो उसके पीछे का इंधन और इंजन दोनों ही तकनीक के जोर पर चलने वाला न्यू मीडिया ही है। यानी तकनीकी क्रांति की दुनिया अपने चारों तरफ एक क्रांतिकारी दौर की रचना प्रक्रिया का सीधा हिस्सा है, उसकी जननी है।
ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर और खुफिया कैमरों ने सचाई को जितना नंगा किया है, उससे पत्रकारिता के साथ सामाजिक अध्ययन की तमाम थ्योरीज बदल गई हैं। सच में निश्चित रूप से अपना-पराया जैसा कुछ नहीं होता, पर इसके समानांतर एक सिद्धांत निजता का भी है। निजता के दायरे में व्यक्ति, परिवार और समाज का कौन सा हिस्सा आए और कौन सा नहीं, इसको लेकर कोई स्पष्ट लक्ष्मण रेखा नहीं खींची गई है। यह हमारे दौर की एक बड़ी चुनौती है। क्योंकि निजता का भंग होना व्यक्ति की कई तरह की जुगुप्साओं को जन्म देता है। फिर आप सिर्फ सत्य का साक्षात्कार भर नहीं करते, बल्कि गोपन के भंग होने का अमर्यादित खेल देखने की लालच से भर उठते हैं।
निजी और सार्वजनिक जीवन को एक ही कसौटी पर खरे उतारने का जोखिम एक दौर में गांधी से लेकर उनके कई साथियों ने उठाई। सत्य के इस प्रयोग ने जीवनादर्श को एक बड़ी ऊंचाई दी। पर यह समय और समाज का संस्कार नहीं बन सका। ऐसे में मानवीय दुर्बलताओं को स्वाभाविक मानकर चलने की समझ ही ज्यादा काम आई। इसे ही न्याय और विधान की व्यवस्थाओं में भी स्वीकारा गया। पर अब एक नई स्थिति है। 'द वर्ल्ड इज फ्लैट’ के रचयिता थॉमस फ्रिडमैन बताते हैं कि सूचना के उपकरण मनुष्य की स्वाभाविकता को बदलने वाले औजार तो हैं ही, ये बाजारवादी पराक्रम के बलिष्ठ माध्यम भी हैं। यह एक खतरनाक स्थिति है। खतरनाक इसलिए क्योंकि इस स्थिति के बाद स्वविवेक के लिए कुछ भी शेष नहीं रहा जाता। यों भी कह सकते हैं नए समय की पटकथा पहले से तय है, इसमें बस हमें यहां-वहां फिट भर हो जाना है, वह भी इतिहास और समाज के अपने अब तक को बोध को भूलकर।
तरुण तेजपाल तहलका की तरफ से गोवा में जो बौद्धिकीय विमर्श का आयोजन करा रहे थे, उसमें एक मुद्दा आधुनिक दौर में महिला अस्मिता की चुनौतियां भी था। दरअसल, आधुनिकता के खुले कपाटों में महिलाएं भी पुरुषों के साथ ही दाखिल हो रही हैं। लिहाज, लैंगिक स्तर पर उनके बीच मेलजोल के नए सरोकार विकसित हुए हैं। इसने एक तरफ स्त्री-पुरुष संबंधों की नई दुनिया रची है तो असुरक्षा का एक नया वातावरण भी पैदा हुआ है। निर्भया कांड को सामने रखकर समझना चाहें तो यह असुरक्षा बर्बरता की हद तक जाता है। नीति और विधान की नई व्याख्या और दलीलों के बीच इस बर्बरता का बढ़ता रकबा एक बड़ा खतरा है। डॉ. धर्मपाल के शब्दों में यह 'भारतीय चित्त, मानस और काल का नया यथार्थ’ है। ऐसा यथार्थ जिसका पर्दाफाश तेजपाल सरीखे लोग पारदर्शिता के नाम पर नीति और व्यवस्था से जुड़े बड़े जवाबदेह लोगों के जीवन के निजी एकांत तक पहुंच कर करते रहे हैं।
तकनीक के साथ एक विचित्र स्थिति यह भी है कि वह नैतिकता का कोई दबाव अपनी तरफ से नहीं बनाता है। ईमेल और सीसीटीवी फुटेज के जरिए जो सच अब तेजपाल को मुश्किल में डाल रहा है, उसमें तकनीक का अपना पक्ष तटस्थ है। यहां नैतिकताएं वही आड़े आ रही हैं, जो तेजपाल सरीखे नंगे सच के हिमायतियों ने खुद रचा है। जिन सवालों और तकाजों पर वे दूसरों को नंगा करते रहे हैं, वही सवाल और तकाजे अब उन्हें नहीं बख्श रहे।
यह स्थिति आंख खोलने वाली है। तकनीक के जोर पर बदलाव की संहिताएं रचने वाली पत्रकारिता भी एक ढोंग हो सकती है, इसका इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि आईना लेकर 'अंत:पुर’ तक दाखिल होने वाले खुद अपने अंत:पुर में शर्मनाक हरकतों के साथ पकड़े जा रहे हैं। गनीमत मानना चाहिए कि पर्दाफाश और सनसनी मार्का पत्रकारिता अब भी हिंदी या भारतीय पत्रकारिता का मूल स्वभाव नहीं है। खोजी दौर में सचाई को उसके मर्म के साथ सामने लाया गया था। दलित बस्तियों के कई मातमी विलापों को आज अगर हम एक विमर्शवादी अध्याय की तरह देख पा रहे हैं तो उसके पीछे इस तरह की पत्रकारिता का बहुत बड़ा हाथ है। पर सूचना को सनसनी और सत्य को महज तथ्य की तरह पेश करने की हवस ने न तो देश और समाज के आगे नीति और आचरण के कोई मानक रचे और न ही इससे पत्रकारिता धर्म का ही कोई कल्याण हुआ। यह एक मोहभंग की भी स्थिति है, जिसमें बदलाव का मुगालता पेश करने वाली कई कोशिशंे एक के बाद एक पिटती नजर आ रही हैं।
गुलामी के दौर में आजाद तेवर स्वतंत्र चेतना की लौ जगाने वाली पत्रकारिता के विरासत के बाद यह एक भटकाव की भी स्थिति है। आखिर में यही कि पत्रकारिता की तकनीक का परिष्कार तो जरूर हो पर तकनीक के परिष्कार को पत्रकारिता मान लेने के जोखिम को भी समझना चाहिए। क्योंकि इसमें तात्कालिक खलबली से आगे न तो कुछ पैदा किया जा सकता है, न ही हासिल। उलटे नौबत यहां तक आ सकती है कि खलबली के शिकार हम खुद हो जाएं। अरब बसंत के पत्ते भी अगर देखते-देखते झरने शुरू हो गए हैं तो इसी लिए कि इसमें बदलाव का यथार्थ तात्कालिक से आगे स्थायी नहीं बन सका।

nationalduniya.com

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

महानायक और लोकनायक के बीच

भारत के लिए आज चुनौती क्या है? इस सवाल का जवाब ही यह साफ करेगा कि हम देश और समाज को लेकर किस तरह की चेतना से भरे हैं। वह चेतना जो पूरी तरह बाजार प्रायोजित है या फिर ऐसी चेतना जो विचार और समाज को एक सीध में देखने की चुनौती सामने रखती है। अभी-अभी ग्यारह अक्टूबर बीता है। इस दिन कई महानायक एक साथ चर्चा में रहे। सबसे ज्यादा चर्चा में रहे मिलेनियम स्टार का रुतबा हासिल कर चुके अमिताभ बच्चन। बिग बी का यह जन्मदिन है। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर चर्चा में इसलिए रहे क्योंकि उन्होंने ट्वेंटी-2० और एकदिनी क्रिकेट के बाद टेस्ट क्रिकेट से भी अपनी विदाई की तारीख की घोषणा कर दी। इन दोनों नामों के साथ दो नाम या तो छूट गए या फिर इनकी चर्चा लोगों ने जरूरी ही नहीं समझी। इस चूक या नासमझी में मीडिया और न्यू मीडिया भी शामिल रहा, जिसे पिछले दो-तीन सालों से यह मुगालता रहा है कि वह देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए अपनी पहल को एक्टिविज्म की हद तक ले जाने का जोखिम मोल ले रहा है। छूट गए ये दो नाम हैं जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख। ग्यारह अक्टूबर को इनकी भी जयंती थी। जेपी को जनता ने ही कभी लोकनायक कहा था तो नानाजी आधुनिक राजनीति में संत छवि को जीने और निभाने वाले रहे। 
21वीं सदी के दूसरे दशक के आगाज के साथ भारतीय लोकतंत्र को सशक्त करने वाले कुछ शुभ संकेत प्रकट हुए। सड़कों पर तिरंगा लेकर देश के नवनिर्माण के लिए उतरने वाले नौजवानों की ललक में भले बहुत गंभीरता न हो और पर इस ललक की प्रासंगिकता और ईमानदारी पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। इस ललक के आलोक में ही देश में छह दशक बाद यह स्थिति आई कि हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसकी बुनियादी अवधारणा के साथ बहसीय मुठभेड़ कर सकें। इस मुठभेड़ ने ही यह साफ किया कि जो व्यवस्था राजनीतिक पथभ्रष्टता और भ्रष्टाचार की महामारी फैलाने की मशीनरी बन गई है, उसके कायम रहते राष्ट्रीय विकास और नवनिर्माण जैसे किसी लक्ष्य तक पहुंचने का संकल्प कैसे पूरा हो सकता है। 
जिस नई पीढ़ी की वैचारिक-सामाजिक संलग्नता को लेकर हम तरह-तरह के आग्रह-पूर्वाग्रह पाले बैठे हैं, उस फेसबुकिया पीढ़ी ने आगे आकर यह साफ किया कि सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स से आगे उसकी उड़ान देश और समाज के रचनात्मक उन्नयन से भी जुड़ी है। देश की युवाशक्ति की यह नई शिनाख्त राष्ट्रनिर्माण में उनकी प्रासंगिक भूमिका की नई पटकथा की तरह है, जिसमें अभी कई घटनाक्रम जुड़ने बाकी हैं। यहां तक की कहानी का क्लाइमेक्स तक आना अभी बाकी है। 
 अरब में बसंत का आना भले एक सुखद उत्तरआधुनिक परिघटना हो पर भारत में बसंत की कल्पना समाज और संस्कृति के बीच एक परंपरागत अनुशीलन है। पुराने पत्तों का झरना और नए पत्तों को आना हमारे लिए जीवन की नित-नूतन कल्पना की तरह है। इसमें निर्माण और विसर्जन का अलगाव नहीं है बल्कि यह एक सहअस्तित्ववादी जीवनदृष्टि है। अच्छी बात यह है कि सीख के ये पुराने सुलेख आज भी नष्ट नहीं हुए हैं, बचे हुए हैं। कसूर हमारा है कि बाजार का इश्तेहार तो हमारी जुबान पर चढ़ जाते हैं पर तारीख के कुछ जरूरी हर्फ पढ़ने की फुर्सत हमें नहीं। अभी टीवी पर एक विज्ञापन खूब चल रहा है जिसमें नेता और राजनीति में बदलाव के लिए माहौल को बदलने की बात जोर-शोर से की जाती है। विज्ञापन का संदेश है कि पुराने माहौल और पुरानी राहों ने अगर हमें निराश किया है तो निश्चित रूप से नए परिवेश और नए पथ की बात होनी चाहिए। यहां तक तो विज्ञापन की सैद्धांतिक टेक समझ में आती है पर क्षोभ तब यह होता है जब पता चलता है यह सब दिखाया-समझाया इसलिए जा रहा है क्योंकि एक महंगा प्लाई कवर बेचना है। जिस दौर में डेमोक्रेसी भी एड मैनेजमेंट का एक जरूरी सब्जेक्ट है, उस दौर के लिए इतनी बात तो जरूर कही जा सकती है लोकतंत्र की बेहतरी के लिए एक जरूरी रचनात्मक हस्तक्षेप की भूमिका बन चुकी है। अब तो बस इसके आगे के अध्याय लिखे जाने हैं। 
जेपी बिहार आंदोलन के दिनों में अकसर कहा करते थे कि जनता को 'कैप्चर ऑफ पावर’ के लिए नहीं बल्कि 'कंट्रोल ऑफ पावर’ के लिए संघर्ष करना चाहिए। यही बात आज प्रकारांतर से अण्णा हजारे कह रहे हैं। यही नहीं राजनीति की जगह लोकनीति और सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात अब फिर से होने लगी है। असंतोष की बात यह है कि लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के इन जरूरी मुद्दों को गिनाने वाले मुंह और खुले मंच तो आज कई हैं पर आमतौर पर इनका सरलीकृत भाष्य ही परोसा जाता है। 
यह सरलीकरण खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसमें एक्टिविज्म और मार्केट फोर्सेज की सरपरस्ती को एक साथ स्वीकार है। यह मलेरिया के मच्छर और उसके टीके को एक साथ लेकर चलने जैसी स्थिति है। यह एक छल है। यह छल ही है जो एक तरफ तो अमिताभ और सचिन के स्टारडम को पाए की तरह खड़ा करता है, वहीं दूसरी तरफ लोकनायक जैसी शख्सियत को भूलने की चालाक दरकार को भी अमल में लाता है। बदलाव न तो बिकाऊ हो सकता है और न चलताऊ। इसे एक चैरिटी की तरह भी आप नहीं चला सकते हैं। बदलाव एक कसौटी है जो विचार, उसकी दरकार और आचरण को एक कलेक्टिव एक्शन की शक्ल देता है। आज अगर कुछ मिसिंग है तो यही कलेक्टिव एक्शन। 
जेपी की लोकनीति और उसके लिए बनी लोक समिति ने कार्यकारी रूप में अपना प्रभाव भले न छोड़ा हो पर उनका यह सबक तो आज भी प्रासंगिक है कि ग्रामसभा से लोकसभा तक का लोकतांत्रिक पिरामिड देश में उलटा खड़ा है। इसमें सत्ता का केंद्र और इसकी नियामक ताकतें प्रातिनिधिक लोकतंत्र के नाम पर दिल्ली, मुंबई या लखनऊ, पटना जैसी राजधानियों में हैं। 
ग्राम पंचायतों का सशक्तिकरण देश में लोकतंत्र के प्रातिनिधिकता के ढ़ांचे को प्रत्यक्ष सहभागिता के ढ़ांचे में बदल सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि विधानसभा या लोकतसभा की तरह ग्रामसभा कभी विघटित नहीं होती। इसका अस्तित्व हमेशा कायम रहता है और संबंधित क्षेत्र के अठारह साल से ऊपर के सभी नागरिक इसके आजीवन सदस्य हैं। नीति और विधि की दरकारों को सरकारें अगर इस विकेंद्रित लोकतांत्रिक इकाई के सहभाग से तय करें तो इसमें पूरे देश का लोकतांत्रिक सहभाग होगा और यह नीतियों और कानूनों के अमल का स्पष्टधरातल तैयार करेगा। जेपी ने बिहर आंदोलन के दौरान ये बातें चीख-चीखकर कहीं। आज अण्णा हजारे और उनके साथ या अलग हुई जमातें चुनाव सुधार और लोकतांत्रिक सुधार का जो एजेंडा देश के सामने रख रहे हैं, उसमें भी ये बातें शामिल हैं। पर न तो देश का मीडिया और न ही देश में पिछले दो-तीन दशकों में तैयार हुई एक्टिविस्टों की जमात इन बातों को जनता के बीच खुलकर सामने ला पा रही हैं, उन्हें समझा पा रही हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हम अपने आइकनों को गढ़ने और उन्हें मान्यता देने में फौरी और बाजारवादी तकाजों की गिरफ्त में होते हैं। जबकि एक देश के जीवन में परंपरा और इतिहास के भी कुछ सबक जरूरी हैं। जेपी ऐसे ही एक सबक का नाम है, जिनको भूलने का मतलब लोकतांत्रिक सुधार की प्रक्रिया को एक तदर्थ नियति की तरफ ले जाएगा। क्या राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी जैसे नायक इस तदर्थवाद के खतरे को समझेंगे? 


सोमवार, 19 अगस्त 2013

ई-आजादी को सलाम!


देश में आजादी के मायने अब नए मुकाम पर हैं, उतने संकुचित नहीं जितने पिछले दशक तक थे। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी को नए आयाम दिए हैं। दुराग्रह के दौर में अन्ना हजारे के सत्याग्रह की बात हो या फिर जनता और संसद के बीच लोकतांत्रिक सर्वोच्चता पर बहस, पिछले दो-तीन सालों में इनकी जड़ में ई-आजादी यानी सोशल मीडिया ही रहा।
अरब बसंत की सफलता-विफलता से अलग है भारत में सोशल मीडिया का विस्तार और इस्तेमाल। कुछ साइबर पंडितों की नजर में भारत में ई-क्रांति का संदर्भ ज्यादा मौलिक और भरोसेमंद है। तहरीर चौक की क्रांति की मशाल अभी बुझी भी नहींं कि प्रतिक्रांति की लपट ने पिछली सारी इबारतें उलट दीं।
अभी उत्तराखंड में जो विपदा आई, उसमें देश के किसी नेता या दल से ज्यादा जवाबदेह भूमिका रही सोशल मीडिया की। इसने न सिर्फ आपदाग्रस्त इलाके की खबर दी बल्कि घर-परिवार से बिछड़े लोगों को मिलवाने में भी बड़ी भूमिका अदा की। खुद उत्तराखंड के लोग सामने आए और उन्होंने फेसबुक पेज और ब्लॉग संपर्क के जरिए लोगों की मदद के लिए राशि जुटाई।
इसके अलावा पिछले साल 16 दिसंबर को दिल्ली में चलती बस में गैंगरेप की घटना के बाद सोशल मीडिया यानी अभिव्यक्ति की उन्मुक्त आजादी ने सरकार के घुटने टिकवा दिए। उसने महिला सुरक्षा को लेकर सरकार को सख्त कानूनी पहल करने के लिए बाध्य किया।
दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के बाद दलित लेखक कंवल भारती की सरकार विरोधी टिप्पणी पर उनकी गिरफ्तारी का मामला हो या बाला साहब ठाकरे के निधन के बाद दो लड़कियों की टिप्पणी पर उनके खिलाफ भड़का सरकारी आक्रोश, सत्ता और सियासत को ये ई-मुखरता रास नहीं आती। केंद्र सरकार तक के स्तर पर सोशल मीडिया की मुखरता पर पहरे बैठाने की कोशिशें अगर चलती रही हैं, तो उसकी भी यही वजह है। पर स्वतंत्रता के इस पर्व पर ई-आजादी से आ रहे बदलाव को भी सलाम करना चाहिए।

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

जासूस है फेसबुक !


ऐसे पत्रकारों और  बौद्धिकों की कमी नहीं, जो अरब मुल्कों में राजशाही के खिलाफ भड़के जनसंघर्षों का बड़ा श्रेय सोशल नेटवर्किंग साइटों को दे रहे हैं। यही नहीं असांजे के विकीलीक्स खुलासे से लेकर स्लट वॉक तक कई आधुनिक तर्जो-तेवर वाली विरोधी मुहिमों की असली ताकत साइबर दुनिया ही रही है। दरअसल, मीडिया के चौबीस घंटों की निगहबानी के दौर में भी अल्टरनेट या न्यू मीडिया के तौर पर एक नया स्पेस तैयार हुआ, जहां स्वच्छंदता की हद तक पहुंची अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निर्भीकता तो है पर एक अभाव भी है। और यह अभाव है गंभीरता और जवाबदेही का। सवाल यह भी है कि जिस साइबर क्रांति को मनुष्य की चेतना और रचनात्मक मौलिकता का विरोधी बताया गया, वह रातोंरात मानवाधिकार का सबसे बड़ा पैरोकार कैसे बन गया, लोकतांत्रिक संघर्ष का एक जरूरी औजार  कैसे हो गया?  
बहरहाल, पिछले दो दशकों में न सिर्फ इंटरनेट यूजर्स की एक पूरी पीढ़ी समय और  समाज का हिस्सा बनी है बल्कि इनकी समझ और  भूमिका ने अपना असर भी दिखाया है। दोस्ती से लेकर परिणय तक का नया सामाजिक व्याकरण आज माउस के बटन से ही तय हो रहे हैं। कहीं 'गोपन' का 'ओपन' है तो कहीं दिली सुकून की तलाश। पर इस सचाई का एक दूसरा और स्याह पक्ष भी है। ज्यादा से ज्यादा कंज्यूमर आैर यूजर फ्रेंडली होने की बाजार की ललक अगर लोगों को आकर्षक और सुखद लगती है तो उन्हें शायद इससे जुड़े जोखिमों का अंदाजा नहीं है।
फेसबुक जो कि आज की तारीख में सबसे बड़ा और जिम्मेदार सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट मानी जाती है, उसके बारे में एक नया खुलासा सामने आया है कि वह अपने यूजर्स पर नजर साइट पर लॉग इन होने के दौरान ही नहीं बल्कि लॉग आफ होने के बाद भी रखती है। यही नहीं अगर आप फेसबुक परिवार में शामिल नहीं हैं लेकिन उसके वेबपेज को कभी विजिट कर चुके हैं तो भी आपकी गतिविधियों की फेसबुक जासूसी कर सकता है। वैसे फेसबुक से जुड़ा यह खुलासा साइबर दुनिया में नया नहीं है। इससे पहले भी याहू, गुगल, एडोब और माइक्रोसॉफ्ट जैसी आईटी कंपनियों द्वारा विवादस्पद ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की बात सामने आ चुकी है।
यह एक खतरनाक स्थिति है। ज्यादातर उपभोक्ता जो ईमेल या कुछ नए-पुराने संपर्कों के बीच बने रहने के लिए ऐसी वेबसाइटों का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें पता भी नहीं होता कि उनकी निजता की सुरक्षा यहां कैसे तार-तार होती है। कहते हैं कि बाजार के दौर में कुछ भी मुफ्त नहीं है। इसलिए अपनी एक या कई आईडी से साइबर दुनिया में अपना पता-ठिकाना मुफ्त हासिल करने वालों को इस बाबत सतर्क रहना चाहिए कि वह अनजाने ही अपनी निजता की ताला-चाबी कुछ शातिर हाथों में सौंप रहे हैं।
बाजार में उत्पादों की बिक्री के ट्रेंड से लेकर नए ऑफरों को फॉम्र्यूलेट करने में कंपनियों को उपभोक्ताओं के व्यापक डाटाबेस से काफी मदद मिलती है। यह जरूरत बैंकों से लेकर पहनने-खाने की चीचें तैयार करने वाली कंपनियों तक को तो पड़ती ही है, इसका इस्तेमाल इसके अलावा अन्यत्र भी संभव है। यह खतरनाक तथ्य कई बड़ी आईटी कंपनियों की विकासगाथा का दागदार सच है। अब समय आ गया है कि हम साइबर क्रांति को नए आलोचनात्मक नजरिए से देखें-समझें। भारत जैसे देश में तो अब तक ढंग का साइबर कानून भी नहीं है, सुरक्षा की बात तो दूर है। ऐसे में लोगों को ही अपनी आदतों को बेलगाम होने से रोकना होगा। नहीं तो सामान्य ईमेल फ्रॉड से आगे हमें कभी बड़े खामियाजे भी भुगतने भी पड़ सकते हैं।