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सोमवार, 16 दिसंबर 2013

सिंदूरी साथ का रिकॉर्ड

मौजूदा दौर में देह और संदेह के साझे ने संबंधों के पारंपरिक बनावट को पूरी तरह बदल दिया है। रिश्ते बंधने से ज्यादा खुलने लगे हैं, दरकने लगे हैं। यह एक ऐसे समय का यथार्थ है जिसे नाम ही दिया गया है 'खुलेपन’ का। यह नामकरण हुआ तो था वैसे आर्थिक लिहाज से पर आर्थिक सरोकारों की खुली दरकारों ने देखते-देखते समाज, संबंध और संस्कृति की पारंपरिक दुनिया को पूरी तरह उलट-पुलट दिया। इसलिए अब संबंधों के धागे खुलने पर उतनी हैरत नहीं होती जितना उनके धैर्यपूणã निर्वाह के बारे में जानकर।
बात संबंधों की करें तो विवाह संस्था का ध्यान सबसे पहले आता है। अभी ब्रिटेन से चलकर एक खबर हिंदुस्तान में काफी पढ़ी-देखी और सराही गई कि वहां रहने वाले भारतीय मूल के दंपति करमचंद और करतारी रिकॉर्ड 86 साल से एक-दूसरे के साथ हैं। यह ब्रिटेन की संस्कृति के लिहाज से बड़ी बात है। इसलिए इस जोड़ी के साथ और इनसे जुड़ी तमाम तरह की जानकारियों को लोगों ने चाव से पढ़ा-जाना। खुद करमचंद और करतारी के लिए भी यह एक सुखद अनुभूति है कि जिस सिंदूरी साथ को उन्होंने अपने प्रेम और संस्कार के कारण अब तक बरकरार रखा है, वही अब उन्हें पूरी दुनिया में सम्मान दिला रहा है।
पंजाब के एक छोटे से गांव में 19०5 में जन्मे करमचंद की करतारी से 19०5 में शादी हुई थी। पासपोर्ट में दर्ज जानकारी के मुताबिक इस समय करमचंद की उम्र 1०6 साल और उनकी पत्नी करतारी की उम्र 99 साल है। परिवार के साथ 1965 से रह रहे करमचंद से जब पूछा गया कि रिकार्ड समय तक चले उनके दांपत्य संबंध का क्या राज है तो उन्होंने कहा कि शादीशुदा जिंदगी जीने का कोई राज नहीं होता है। हालांकि यह कहते हुए वह यह भी कहते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी में भरपूर आनंद उठाया है। जो चाहा वो किया, जैसा चाहा वैसा खाया-पिया, पर सब कुछ एक संयम के साथ। आज अगर उनके बारे में और उनके पारिवारिक जीवन के बारे में पूरी दुनिया में बात हो रही है तो इसलिए क्योंकि उन्होंने जीवन और मर्यादा के बीच कोई सख्त रेखा खींचने की बजाय एक समन्वयी लोच बनाए रखा, अपनी सोच में भी और अपने आचरण में भी।
जानकर लोगों को हैरत होगी कि जिंदगी को जिंदादिली से जीने वाले करमचंद रोज शाम खाने से पहले एक सिगरेेट पीते हैं। यही नहीं हफ्ते में तीन-चार बार व्हिसकी या ब्रांडी भी पीते हैं। उनकी जिंदगी की ये आदतें मर्यादा या संयम से भटकाव नहीं बल्कि जिंदगी को साकारात्मकता के साथ जीने की ललक की तरफ इशारा है।
करमचंद और करतारी के सिंदूरी साथ को सिर्फ वे दोनों ही नहीं पूरा करते हैं बल्कि इसके साथ उनके बच्चे और उनका परिवार भी है। वे दोनों अपने छोटे बेटे सतपाल और उसकी पत्नी रानी और दो पोते-पोतियों के साथ रहते हैं। बहू कहती है कि उनके लिए सास-ससुर उस छाया की तरह है, जहां बहुत सारी शांति और खूब सारा प्यार और आशीर्वाद है। बेटा सतपाल भी खुश है कि उनके मां-पिता न सिर्फ जीवित हैं बल्कि उनके साथ स्वस्थ और प्रसन्न हैं। बेटे को खुशी इस बात की भी है कि उन्हें इतने लंबे समय तक मां-पिता की सेवा करने का अवसर ईश्वर ने दिया है।
फिल्मकार सूरज बड़जात्या और करण जौहर बार-बार फिल्मी पर्दे पर भारतीय परिवारों की संयुक्त परंपरा को उत्सवी रूप में दिखाते हैं और बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ते हैं। पर जीवन की सिनेमाई समझ रखने वाले उन जैसे तमाम दूसरे लोगों को भी यह बात समझनी चाहिए कि महत्वपूर्ण परिवार को साथ देखना-दिखाना नहीं बल्कि उन सरोकारों को समझना है, जिससे यह साथ अटूट बनता है और सालोंसाल निभता-टिकता है। टेकचंद और करतारी के जीवन में झांकना इन सरोकारों से परिचित होना है।
 

रविवार, 17 जून 2012

प्रेम : हमारे दौर का सबसे बड़ा संदेह

संबंधों के मनमाफिक निबाह को लेकर विकसित हो रही स्वच्छंद मानसिकता और पैरोकारी के ग्लोबल दौर में जिस एक चीज को लेकर सबसे ज्यादा संदेह और विरोध है, वह है प्रेम। इन दो विरोधाभासी स्थितियों को सामने रखकर ही मौजूदा दौर की देशकाल और रचना को समझा जा सकता है। हाल में अखबारों में ऑनर किलिंग के दो मामले आए। इनमें एक घटना बुलंदशहर और दूसरी मेरठ की है। ये मामले एक ही राज्य उत्तर प्रदेश के हैं पर ऐसी घटनाएं हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार या दिल्ली समेत देश के किसी भी सूबे में हो सकती हैं।
बुलंदशहर वाले मामले में प्रेमिका की आंखों के सामने उसकी ही चुन्नी से प्रेमी का सरेआम गला घोंट दिया गया। जान युवती की भी शायद ही बच पाती पर शुक्र है कि ग्रामीणों ने हत्यारों को घेर लिया। मेरठ में तो युवक की हत्या युवती के घर पर पीट-पीटकर कर दी गई। मामला कहीं न कहीं प्रेम प्रसंग का ही था। अभी 'सत्यमेव जयते' नाम से अभिनेता आमिर खान जो चर्चित टीवी शो पेश कर रहे हैं, उसके पिछले एपिसोड में भी इस मसले को उठाया गया था। कार्यक्रम में लोगों ने एक बार फिर देखा-समझा कि हमारा समय और समाज युवकों की अपनी मर्जी से शादी के फैसले के कितना खिलाफ है। यह विरोध कितना बर्बर हो सकता है, इसके लिए आज किसी आपवादिक मामले को याद करने की जरूरत भी नहीं। आए दिन ऐसा कोई न कोई मामला अखबारों की सुर्खी बनता है।
ऐसे में हमारी समाज रचना और दृष्टि को लेकर कुछ जरूरी सवाल खड़े होते हैं, जिनका सामना किसी और को नहीं बल्कि हमें ही करना है। पहला सवाल तो यही कि जिस पारिवारिक-सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर नौजवान प्रेमियों पर आंखें तरेरी जाती हैं, उस प्रतिष्ठा की रूढ़ अवधारणा को टिकाए रखने वाले लोग कौन हैं? समझना यह भी होगा कि स्वीकार की विनम्रता की जगह विरोध की तालिबानी हिमाकत के पीछे कहीं पहचान का संकट तो नहीं है? क्योंकि यह संकट उकसावे की कार्रवाई से लेकर हिंसक वारदात तक को अंजाम देने की आपराधिक मानसिकता को गढ़ने वाला आज एक बड़ा कारण है।
मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक; हर रोज ऐसी करतूतें सामने आती हैं, जब लोगों की दिमागी शैतानी लोकप्रियता की भूख में शालीनता और सभ्यता की हर हद को तोड़ने के तपाकीपन दिखाने पर उतारू हो जा रही है। समाज वैज्ञानिक बताते हैं कि समाज का समरस और समन्वयी चरित्र जब से व्यक्तिवादी आग्रहों से विघटित होना शुरू हुआ है, परिवार और परंपरा की रूढ़ पैरोकारी का प्रतिक्रियावादी जोर भी बढ़ा है। इसका प्रकटीकरण पढ़े-लिखे समाज में जहां ज्यादा चालाक तरीके से होता है, वहीं अपढ़ और निचले सामाजिक तबकों में ज्यादा नंगेपन में दिखाई दे जाता है। वैसे प्रेम को लेकर तेजाबी नफरत दिखाने के पीछे यह अकेला कारण नहीं है। हां, एक विलक्षण और सामयिक केंद्रीय कारण जरूर है।   

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

शेक्सपियर के नाटक और स्टीफेंस का बयान

ब्रह्मांड का रहस्य जटिल तो है पर अबूझ नहीं। इस रहस्यमयता का भेदन रोमांटिक तो हो सकता है पर डरावना कतई नहीं। इसलिए यह मानने का भी कतई कोई कारण नहीं है कि इस सृष्टि का स्रष्टा ईश्वर है। स्टीफन विलियम हॉकिंग जब यह कहते हैं तो उनकी वैज्ञानिक दृष्टि की सूक्ष्मता और उपलब्धि देखकर कोई भी कायल हो जाए। ब्राह्मांड की रचना को समझने और इसके रहस्य को आम आदमी की दिलचस्पी का विषय बनाने वाले हॉकिंग जितने बड़े भौतिकविज्ञानी हैं, उतने ही लोकप्रिय विचारक भी। उनकी शारीरिक विवशता उनकी जीवटता से लगातार हारी है। इस लिहाज से वे मानवीय संघर्ष क्षमता के भी जीवंत उदाहरण हैं।  
पर यहां इस महान प्रतिभा की आभा से बाहर निकलकर कुछ और बातें समझने की दरकार है। ज्ञान जब विज्ञान की  खड़ाऊं पहन ले तो अज्ञान की धुंध जितनी नहीं छंटती, उससे ज्यादा छंटता है वह स्पेस- जहां हमारी संवेदना, हमारा मन, हमारा प्रेम और उससे भी आगे हमारा जीवन अपनी स्वाभाविकता को प्राप्त करता है। मानवीय चेतना की विलक्षणता ही यही है कि वह दिल और दिमाग को कंपार्टमेंटली बिलगाती नहीं है बल्कि एक साथ बाएं और दाएं हाथ की तरह काम करती है। न तो साझीदारी का कोई आनुपातिक सिद्धांत और न ही एक-दूसरे के खिलाफ जाने और दिखने का कोई आग्रह।
हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डॉ. नगेंद्र की छायावाद को लेकर प्रसिद्ध उक्ति है कि यह 'स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह' है। दिलचस्प है कि यहां जिस सूक्ष्मता को रेखांकित किया गया है, वह हॉकिंग जैसे वैज्ञानिकों को महान बनाने वाली सूक्ष्मता से सर्वथा भिन्न है, विपरीत है। अपने जीवन के 70 वसंत पूरा करते हुए हॉकिंग ने सूक्ष्मता के अनंत को तलाशते हुए अचानक उस संवेदना और प्रेम के रहस्यवादी जाले में फंस गए, जिसे कलम और कूची थामने वालों ने सबसे ज्यादा धैर्य और दिलचस्पी के साथ समझने की कोशिश की है। रचना और कला क्षेत्र का यह धैर्य कोई समाधानकारी छोर को भले न छू पाए हों पर इसमें सवाल और जवाब के टकराव को ठहराव के चिंतन में बदलने की संवेदनशील कोशित तो दिखती ही है। हां, यह जरूर है कि यह ठहराव यहां भी कुछ दुराग्रहियों और पूर्वाग्रहियों के यहां सिरे से गायब है।  
हॉकिंग का यह कहना कि महिलाएं एक ऐसी रहस्य हैं, जिन्हें समझना नामुमकिन है। उनके वैज्ञानिक होने की कसौटी को नए सिरे से परिभाषित कर गया। विज्ञान और कला को प्रतिलोमी देखने की समझदारी नई नहीं है। विरोध के इस पूर्वाग्रह को पूरकता में देखने का समाधान काफी सुकूनदेह है। पर विज्ञान और कला में एक दूसरे की पूरकता तलाशने का समाधान कम से कम हॉकिंग के यहां तो उनके नए विवादास्पद बयान से नहीं दिखता है। आइंस्टीन की सापेक्षता से टकराने और एक हद तक उसे आगे ले जाने वाले हमारे समय की सबसे विलक्षण प्रतिभा हॉकिंग कम से कम मानवीय विमर्श में अपने पूर्वज को पीछे नहीं छोड़ पाए हैं। अपने जीवन के बाद के दिनों में आइंस्टीन की जिज्ञासाएं महात्मा गांधी की प्रार्थना और सत्य, अहिंसा और करुणा के दर्शन में अपना समाधान देखती थी। विज्ञान की सूक्ष्मता उन्हें मानवीय तरलता के आगे स्थूल और अपरिहार्य मालूम पड़ती थी।
कई सफल सिद्धांतों के जनक स्टीफेंस हॉकिंग के सत्तर साला जीवन में दो असफल शादियों के दुखद वृतांत दर्ज हैं। महिलाओं को अबूझ कहने की उनकी दलील उन हिंसक पात्रों की याद दिलाती है, जो शेक्सपियर के नाटकों में ऐसी ही जबान में अपने संवाद बोलते हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि महिलाओं को 'सभ्यता की भुक्तभोगिनी' की नियति देने वाला पुरुष आग्रह आज भी महिलाओं की छवि को कहीं न कहीं नकारात्मक और गैरभरोसेमंद बताने से बाज नहीं आता। कात्यायनी के शब्दों में इस आधुनिक 'पौरुषपूर्ण समय' में स्त्री अस्मिता का संकट ज्यादा जटिल, ज्यादा भयावह है। खतरनाक यह भी कम नहीं कि हमारे समय का सबसे ज्यादा तेज-तर्रार वैज्ञानिक दिमाग भी महिला मुद्दे पर खासा हिला दिखता है। 

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

‘फिर से’ में पूरबिया शादीनामा


1 नवंबर 2011 को दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण के नियमित स्तंभ ‘फिर से’ में पूरबिया शादीनामा

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

पहले राजीनामा फिर शादीनामा


बाजार की सीध में चले दौर ने परिवार संस्था को नई वैचारिक तमीज के साथ समझने की दरकार बार-बार रखी है। इस दरकार ने इस संस्था के मिथ और मिथक पर नई रौशनी डाली भी है। अलबत्ता, अब तक अब तक विवाह और परिवार के रूप में विकसित हुई संस्था की पारंपरिकता पर खीझ उतारने वाली सनक तो कई बार जाहिर हो चुकी है पर इसके विकल्प की जमीन अब भी वीरान ही है। साफ है कि मनुष्य की सामाजिकता का तर्क आज भी अकाट्य  है और इस पर लाख विवाद और वितंडा के बावजूद इसे खारिज कर पाना आसान नहीं है।
ऐसा ही एक सवाल संबंधों की रचना प्रक्रिया को लेकर बार-बार उठता है। विवाह की एक कानूनी व्याख्या भी है। इस व्याख्या और मान्यता की जरूरत भी है। पर यह भी उतना ही सही है कि कानूनी धाराओं से वैवाहिक संबंध को न तो गढ़ा जा सकता है और न ही इसके निर्वाह का गाढ़ापन इससे तय होता है। इसके लिए तो लोक और परंपरा की लीक ही पीढ़ियों की सीख रही है। दिलचस्प है कि इस सीख को ताक पर रखकर कानूनी ओट में विवाह संस्था को मन माफिक आकार देने की कोशिश हाल के सालों में काफी बढ़ी है। परिवार और समाज को दरकिनार कर जीवनसाथी के चुनाव का युवा तर्क आजकल सुनने में खूब आता है। स्वतंत्रता के रकबे को अगर स्वच्छंदता तक फैला दें तो यह तर्क आपको प्रभावशाली भी लग सकता है। पर यह आवेगी उत्साह कई खामियाजाओं का कारण बन सकता है।
अच्छी बात है कि अपने एक नए फैसले में अदालत ने भी तकरीबन ऐसी ही बात कही है। जो लोग सीधे कोर्ट और वकील के चक्कर से बचते हुए मंदिरों में विवाह रचाने का रास्ता चुनते रहे हैं, उनके लिए अदालत का नया फैसला महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट ने आर्य समाजी विवाह के एक मामले में साफ कहा है कि मंदिर में शादी करने का यह कतई मतलब नहीं कि दो व्यस्कों की सहमति भर को सात फेरे लेने का न्यूनतम आधार मान लिया जाए। इस फैसले में कहा गया है कि किसी भी विवाह के लिए दोनों पक्षों के माता-पिता या अभिभावक की सहमति जरूरी है। और अगर शादी मां-पिता की बगैर मर्जी के की जा रही है तो इस असहमति की वजह लिखित रूप में रिकार्ड पर होनी चाहिए। साथ ही ऐसी स्थिति में गवाह के तौर पर दोनों पक्षों की तरफ से अभिभावक के रूप में नजदीकी रिश्तेदार की मौजूदगी जरूरी है। यही नहीं मंदिर में विवाह संपन्न होने से पूर्व माता-पिता और संबंधित इलाके के थाने और सरकारी कार्यालयों को सूचित करना होगा।
साफ है कि अदालत ने विवाह को परिवारिकता और सामाजिकता से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना है। उसकी नजर में विवाह संस्था के महत्व का आधार और सरोकार दोनों व्यापक है। इस व्यापकता में सबसे महत्वपूर्ण रोल उन सहमतियों का है जो पारंपरिक शादियों में खासतौर पर महत्व रखती हैं। बच्चों को जन्म देने का विवेकपूर्ण फैसला करने वाले मां-बाप को एकबारगी अपने बच्चों के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण फैसले से बाहर नहीं किया जा सकता है। आज तक यह सीख परंपरा की गोद में दूध पीती रही है अब इसे कानूनी अनुमोदन भी हासिल हो गया है। 

सोमवार, 26 सितंबर 2011

होरी के देश में गोरी


हमारा समय दिलचस्प विरोधाभासों का है। तभी तो जिस दौर में काला धन को लाने के लिए लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, उसी दौर में सबसे ज्यादा ललक और समर्थन गोर तन को लेकर हैं। काला धन और गोरा तन, ये दोनों ही हमारे समय और समाज के नए शिष्टाचार को व्यक्त करने वाले सबसे जरूरी प्रतीक हैं। इन दोनों में आप चाहें तो अंदरूनी रिश्तों के कई स्तर भी देख-परख सकते हैं। अवलेहों और उबटनों की परंपरा अपने यहां कोई नई नहीं है। तीज-त्योहार से लेकर शादी-ब्याह तक में इस परंपरा के अलग-अलग रंग हमारे यहां आज भी देखने को मिलते हैं। हालांकि यह जरूर है कि इस परंपरा का ठेठ रंग अब जीवन-समाज का पहले की तरह हिस्सा नहीं है।
पिछले कुछ दशकों में जोर यह हावी हुआ है कि चेहरा अगर फेयर और फिगर शेप में नहीं हुआ तो प्यार से लेकर रोजगार तक कुछ भी हाथ नहीं आएगा। संवेदना का यह दैहिक और लैंगिक तर्क टीवी चैनलों की कृपा से आज घर-घर पहुंच रहा है। कुछ महीने पहले की ही बात है जब अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह ने यह कहते हुए फेयरनेस क्रीम का एड करने से इनकार कर दिया था कि उन्हें अपने सांवलेपन को लेकर फख्र है न कि अफसोस। चित्रांगदा के इस फैसले को रंगभेद का खतरा पैदा करने वाले सौंदर्य के बाजार के खिलाफ महिला अस्मिता की असहमति और विरोध के तौर पर देखा गया।
यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि जिस फिल्म इंडस्ट्री और मॉडलिंग दुनिया के कंधों पर गोरी त्वचा और छरहरी काया का पूरा बाजारवादी तिलिस्म रचा गया है, वहां आज भी तूती रंग और देह से ज्यादा तूती काबिलियत की ही बोलती है। और यह रंगविरोधी समझ न सिर्फ व्यवसाय के स्तर पर पर बल्कि संवेदना के स्तर पर भी एकाधिक बार प्रकट हुई है। लोग आज भी 1963 में फिल्म 'बंदिनी' के लिए लिखे गुलजार के लिखे इस गीत को गुनगुनाते हैं- 'मोरा गोरा अंग लेइ ले...मोहे श्याम रंग देइ दे...'।
आज भारत में फेयरनेस क्रीम, ब्लीच और दूसरे उत्पादों का बाजार करीब 2000 करोड़ रुपए का है, जिसमें अकेले रातोंरात त्वचा को गौरवर्णी बना देने वाले क्रीमों की हिस्सेदारी करीब 1800 करोड़ रुपए की है। यही नहीं यह पूरा बाजार किसी भी दूसरे क्षेत्र के बाजार के मुकाबले सबसे ज्यादा उछाल के साथ आगे बढ़ रहा है। नई खबर यह है कि पीएमओ का ध्यान गोरेपन की क्रीम और मोटापा घटाने की दवा बेचने वालों के विज्ञापनी झांसे की तरफ गया है। पीएमओ ऐसे विज्ञापनों को आपत्तिजनक और खतरनाक मानते हुए बाजाप्ता इनके खिलाफ दिशानिर्देश दिए हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रधान सचिव टीकेए नायर ने इसके लिए उपभोक्ता मामलों के अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में यह साफ किया गया कि विभाग को ऐसी नियामक प्रणाली विकसित करनी चाहिए जिससे ऐसे भ्रमित करने वाले विज्ञापनों के प्रसारण पर कारगर रोक लगे। बताया जा रहा है पीएमओ ने चूंकि इस मुद्दे को खासी गंभीरता से लिया है, लिहाजा महीने भर के भीतर इस मुद्दे पर जरूरी कदम उठा लिए जाएंगे।
सरकारी तौर पर इस तरह की पहल का निश्चित रूप से अपना महत्व है और इसके कारगर असर भी जरूर होंगे, एसी उम्मीद की जा सकती है। पर एक बड़ी जवाबदेही लोग और समाज के हिस्से भी आती है। यह कैसी विडंबना है कि रंगभेद के नाम पर सत्ता और समाज के वर्चस्ववादी दुराग्रहों को पीछे छोड़कर हम जिस आधुनिक युग में प्रवेश कर गए हैं, वहां देह और वर्ण को सुंदरता, सफलता और श्रेष्ठता की अगर कुंजी के रूप में अगर मान्यता मिलेगी तो यह मानवीय अस्मिता के लिए एक खतरनाक स्थिति है। लिहाजा, इनके खिलाफ एक एक मुखर सामाजिक चेतना की भी दरकार है। क्योंकि आखिरकार यह तय करना समाज को ही है कि उसके भीतर काले-गोरे को लेकर आग्रह का पैमाना क्या है। अलबत्ता यह तो साफ है कि श्याम-श्वेत के दौर से आगे निकल चुकी दुनिया आज भी अगर गोरे-काले के मध्यकालीन बंटवारे को तवज्जो देती है तो यह उसकी आधुनिकता के हवालों को भी सवालिया घेरे में ले आता है।

मंगलवार, 10 मई 2011

दुष्कर्म पर कामिनी लॉ


देश में कविताई तक के लिए इतनी गरिमा का ध्यान रखा गया  कि वर्णन अगर 'स्वकीया प्रेम' का है तब तो ठीक है, 'परकीया प्रेम' को अवहेलनीय करार दिया गया। रीति और प्रगति की बदलावकारी बेला में हालांकि साहित्य की ये मर्यादाएं भी टूटीं। व्यावहारिकता को सचाई की ऐसी कसौटी माना गया, जिसमें 'क्या हो' की बजाय 'क्या है' का वर्णन जरूरी करार दिया गया। साहित्य जिस समाज से स्याही और कागज लेता है अपनी अक्षर दुनिया रचने के लिए, आज उसका सच तल्ख ही नहीं काफी हद तक क्रूर और वीभत्स हो चुका है। यही वजह है कि प्रेम का सदेह और संदेह भरा होना, स्त्री-पुरुष संबंध की आखिरी इबारत हो गई। संबधों के बांध से छलकी इच्छाओं में क्या कुछ और कितना कुछ डूबा या डूबेगा, आज इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
महिला आयोग से लेकर पुलिस की अपराध शाखा तक दर्जनों रिपोर्ट इस बात की खुली गवाही देती हैं कि महिला यौन उत्पीड़न के सबसे ज्यादा मामले उस परिवार और सामाजिक दायरे के बीच से सामने आ रहे हैं, जहां सुरक्षा और देखरेख की गारंटी सबसे ज्यादा है। नाबालिग से दुष्कर्म के हालिया एक मामले में दिल्ली की एक अदालत की जज कामिनी लॉ ने ऐसे दोषियों का बंध्याकरण तक कराने की मांग को कानूनी मान्यता देने की सिफारिश की है। दिलचस्प है कि जिस मामले में दोषी पुरुष को इस तरह का सबक सिखाने की बात कही गई है, वह कोई और नहीं उस अभागी बेटी का बाप है, जिसके शील को उसके पिता ने ही भंग कर दिया। कहने के लिए अभियुक्त बेटी का पिता तो है लेकिन सौतेला। गौरतलब है कि इस मामले में पीड़ित बेटी की मां को भी पुलिस ने सहअपराधी बनाया था।
साफ है कि अपराध से पहले संबंधों के वे डोर उलझे और टूटे हैं, जिसमें गलती से एक गांठ भी लग जाए तो आजीवन उसकी ऐंठन बनी रहती है। समाज, परिवार और परंपरा की जिस पाकिजगी ने सामाजिकता के सर्वाधिक सुलेख और आख्यान लिखे हैं, मौजूदा दौर में वह त्रियक ही सबसे ज्यादा आहत और क्षिन्न-भिन्न है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि सुविधा और परमभोग की स्वीकार्यता आधुनिकता और विकास की सीढ़ियां बन चुके हैं। ये वही सीढ़ियां हैं, जो हमारे बेडरूम और डायनिंग रूम ही नहीं पहुंचते, सीधे-सीधे मन-मिजाज के भीतरी कोनों तक दाखिल होते हैं। अदालत और कानून के रास्ते जिस न्यायिक सक्रियता ने पिछले दिनों काफी चीजों को लीक पर लाने की कोशिश की है, उसकी भी अपनी सीमा है।
सरकार और समाज के हर दोष या अपराध के लिए कानून की देवी के आगे याचक बन जाना भी कोई बुद्धिमानी नहीं। जज कामिनी लॉ ने जिस सख्ती की वकालत की है, वह दुनिया के कई विकसित देशों में कानूनी तौर पर मान्य भी है। यह भी नहीं कह सकते कि इसका कोई असर वहां अपराध को कम करने पर नहीं पड़ा हो। कानूनी भय की एक अपनी भूमिका है और यह भूमिका जारी रहे, अपराधमुक्त नागरिक समाज के लिए यह जरूरी भी है। पर जिस खास मामले में जज ने इस तरह की दरकार को रेखांकित किया है, वह गंभीर तो है ही कई मायने में विलक्षण भी है। संबंधों के बांध स्वेच्छा से लांघते जाने की छूट अगर बनी रहेगी और विवाह-परिवार जैसी संस्थाओं को विघटनकारी हस्तक्षेपों से बचाने की हमारी तत्परता अगर प्रभावी नहीं होती, तब तक 'परकीया' का पराभव 'स्वकीया' के मुकाबले मुश्किल है।

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

सदन, सौंदर्य और सुनंदा


 बारहमासे का एक चक्र भी पूरा नहीं हुआ कि फसाने की दिलकशी फिर से न सिर्फ बहाल दिख रही है, बल्कि एक बार फिर अपने पूरे शबाब पर भी है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकसभा की दर्शक दीर्घा में नजर आई, उस उपस्थिति की, जिसकी चर्चा कॉफी टेबल से लेकर फुटकर चौपालों तक है। बुधवार को देश के तमाम अखबारों ने ये खबर प्रमुखता से छापी कि शादी के बाद पूर्व विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर के लोकसभा में पहले महत्वपूर्ण भाषण के दौरान उनकी पत्नी सुनंदा पुष्कर उनका हौसला बढ़ाने पहुंचीं। पति को हौसले और भरोसे का जो सिंदूरी समर्थन दर्शक दीर्घा में बैठकर सुनंदा पुष्कर जता रही थीं, उसकी अभिव्यक्ति इतनी खुली और खनकदार थी कि उसके आकर्षण पाश में लोकसभा तकरीबन घंटे भर तक अवगाहन करती रही।
भारतीय राजनीति और राजनेता अमेरिका और यूरोप से अलग हैं। हमारे यहां निजी प्रेम, साहर्चय और यहां तक कि दांपत्य तक को शालीन दोशाले के साथ ही पेश किया जाता है। बहुत गहरी छानबीन के बजाय एक विहंगम दृष्टि अगर गुजरे छह से ज्यादा दशकों के स्वतंत्र भारत की राजनीतिक यात्रा पर डालें तो अकेले राजनेता पंडित नेहरू दिखाई पड़ेंगे, जिनके स्वभाव और सलूक में यूरोपीय या अमेरिकी मन-मिजाज जब-तब झांकता था। इसके अलावा जो उदाहरण या प्रकरण गिनाए जा सकते हैं, उसमें प्रकट न होने का यत्नपूर्ण संकोच ही ज्यादा छलका है। दिलचस्प है कि उदारीकरण के तीस साला अनुभव के बाद संबंधों को लेकर खुलेपन का दायरा परिवार-समाज तक की दहलीज को लांघ रहा है, बावजूद इसके अगर सार्वजनिक जीवन की शुचिता कुछ संकोच और हिचक में ही बदहाल दिखती है तो इसे देश की बदली राजनीति की न बदलने वाली धज ही कहेंगे। पर अब यह धज समय सापेक्ष नहीं रही, नहीं तो दोशाले का इस्तेमाल शालीनता के लिए ही होता, मुंह ढांपने या छिपाने के लिए नहीं होता। बिहार और उत्तर प्रदेश सहित कुछ दूसरे सूबों के कई माननीय इन दिनों अपने जिन कुकृत्यों के कारण अदालत और जेल के चक्कर काट रहे हैं, वह भी पिछले कुछ दशकों में प्रकट हुई सार्वजनिक जीवन की सचाई का ही एक विद्रूप चेहरा है।
बहरहाल, बात एक बार फिर सुनंदा-शशि की। याददाश्त पर बहुत जोर देने की जरूरत नहीं है याद करने के लिए कि किन कारणों से थरूर को अपने मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था। जाहिर है, कारण कई थे पर थे सब समगोत्रीय ही। उन तमाम कारणों की अकेली धुरी रहीं सुनंदा, जो आज पूर्व विदेश मंत्री की पत्नी हैं। प्रेम के लिए आत्मोत्सर्ग के इस श्याम-श्वेत को लेकर चाहे हम जितनी बातें कर लें पर इसकी नाटकीयता में आकर्षण और सौंदर्य भी कम नहीं, इसकी साक्षी तो अब देश की संसद भी है।

साभार : राष्ट्रीय सहारा (17 मार्च, 2011)

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

हाँ मेरी संगिनी


पटरी पर
जब तक दौड़ती है रेल
बनी रहती है धड़कन 
जिंदगी की   
हाँ मेरी संगिनी
होकर तुम्हारे साथ
होता है यह एहसास 
कि पटरी के बिना रेल
और मैदान से बाहर
खेल का जारी रहना
यकीन नहीं
बस है एक मुगालता 
सुब कुछ ठीक होने का
अपनी ही लानत पर
निर्भीक होने का 
   

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

रियल फील और थ्रिल से लबरेज रिलेशन



रियलिटी शोज के जमाने का रिलेशन भी रियल फील और थ्रिल से लबरेज है और इस फील को डंके की चोट पर मुहैया करा रही हैं आई-पील और अनवांटेड 72 जैसी रंग-बिरंगी गोलियां बनाने वाली कंपनियां...

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

तू खा गोली, मैं करूंगा प्रेम


वेंडर मशीनों से कंडोम का मुफ्त वितरण उतना ही जरूरी है जितना गली-मोहल्ले में खुले एटीएम से पैसे निकालने की आसानी। गुजरात में पिछले गरबा महोत्सव को हॉट इवेंट का दर्जा दिलाने के लिए गरबा पांडालों में ये दोनों ही सुविधाएं एक साथ मौजूद  थीं। इससे पहले दिल्ली जैसे शहरों में रेड लाइट इलाकों को सेहत के लिहाज से कंडोम के मुफ्त वितरण के प्रयोग आजमाए जा चुके हैं। इस तरह की समझदारी अब नई नहीं रही, बात इससे आगे निकल चुकी है। कंडोम का बचावकारी मिथ अब टूट रहा है, उन पुरुषों के लिए जिनके लिए कभी भी यह स्वेच्छा का चुनाव नहीं रहा। हारे को हरिनाम और डरते को चलाना पड़े कंडोम से काम। हाल तक की स्थितियां यही थीं। पर अब बदल रहा है सब कुछ।
पिछले एक दशक में 'देह' को हर लिहाज से 'संदेहमुक्त' कराने की पराक्रमी कोशिशें हुई हैं। वैसे न तो ये कोशिशें नई हैं और न ही इनके पीछे की  मंशा। फर्क है तो बस उस व्यग्रता और तेजी में जो इन डरे-सहमे और छिपे उपक्रमों को आज खुलेआम धार चढ़ा रहे हैं, रैशनल कसौटियों पर कस रहे हैं। कंडोम का झल्लीदार अवरोध सुरक्षा की चाहे जितनी अचूक गारंटी हो, पर इसे स्वीकार करने वाला पुरुष मन आज तक भारी रहा है। यह भारीपन तकरीबन वैसा ही है, जैसा नसबंदी से भागने वाली पुरुषवादी झेंप। पहली सूरत में ऐसा लगता है जैसा यौन मोर्चे पर पौरुष तेज को जानबूझकर निस्तेज किया जा रहा है जबकि दूसरी सूरत पौरुषपूर्ण पराक्रम को आत्मघाती तरीके से कमजोर करने की है। पर अब ये सारी दुविधाएं, सारी समस्याएं बीती बातें हो चुकी हैं। रियलिटी शोज के जमाने का रिलेशन भी रियल फील और थ्रिल से लबरेज है और इस फील को डंके की चोट पर मुहैया करा रही हैं आई-पील और अनवांटेड 72 जैसी रंग-बिरंगी गोलियां बनाने वाली कंपनियां।
प्रेम का महापर्व आनेवाला है। नई सदी में यह महापर्व अपना पहला दशक पहले ही पूरा कर चुका है। इस बार तो इसके विस्तार का नया चरण शुरू होगा। याद आती है 'डेबोनियर' की तर्ज पर हिंदी में प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका का पहला संपादकीय। संपादक महोदय ने ओशोवादी लहजे में प्रेम की देहमुक्ति की मांग पर आंखें तरेरी थीं। लिखा था- 'प्रेम वासना की कलात्मक अभिव्यक्ति है'। आज तो ऐसे तर्कों की दरकार भी नहीं। हिंदी के बौद्धिक जगत में तो ये बातें कई तरीके से कही जा चुकी हैं कि हर संबंध की असलियत बिस्तर पर खुलती है। संबंधों की यह यात्रा चाहे किसी भी रास्ते शुरू हो, उसकी परिणति एक है।
कह सकते हैं कि यह परिणति देह और प्रेम को एक सीध में ला खड़ा करती है और यह सिंपल फिनोमेना ग्लोबल है। लिहाजा अब प्रेम की न तो नसें बंद की जाएंगी और न ही किसी निरोध-अवरोध से इसके मचलते प्रवाह को बांधने की मजबूरी होगी। अब तो महिलाओं के पर्स में ही पुरुष की प्रेमी देह का सुरक्षा मंत्र भी होता है। अब तक पति या प्रेमी के दीर्घायु होने के लिए महिलाएं उपवास रखती थीं, अब उसके  प्रेमाखेटन के लिए वह गोलियों का सेवन करती हैं, अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ की जोखिम भरी शर्त पर।
भूले न हों अगर आप तो याद करें मल्लिका सेहरावत की पहली हाहाकारी फिल्म 'ख्वाहिश'। कंडोम की डिब्बी दुकान से खरीदेने में लड़के की घिग्घी बंधती है और मल्लिका यही काम निस्संकोच तरीके से कर देती है, जिस पर सिनेमा हॉल के कुछ कोनों से तालियों भी उछलती है। नए दौर का वेलेंटाइन मार्का प्रेम अब इसी तरह की बेधड़की से परवान चढ़ेगा, जिसमें महिलाएं पुरुषों के सेफ खेलने के लिए इंतजाम अपने साथ रखेंगी और पुरुष लिंगवर्धक यंत्र और हाईपावर वियाग्रा डोज के सेवन से इस इंतजाम का भरपूर दोहन करेंगे। आखिर प्रेम के दैहिक भाष्य के दौर में संदेह की गुंजाइश है भी कहां? अगर किसी महिला के मन के कोने में संदेह है भी तो मान लीजिए कि न तो दफ्तर में बॉस उसे तरक्की देगा और न स्कूल-कॉलेज या पड़ोस का साथी उसे एकांत में मिलने के लिए प्रेमल मिस कॉल मारेगा।     

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

100 नंबर पर चर्मरोग


पांव से छिटककर दूर
जब बजने लगे पायल
तो उकताकर
सौ नंबर पर डॉयल

मनुहार का अत्याचारी सच
बयां करने वाली
पुलिस थाने में
धूल खा रही फाइल
चर्मरोग का
इलाज बताएं न बताएं
इस बीमारी के
गलगला गए यथार्थ को
मुहरबंद जरूर करती हैं

रविवार, 2 जनवरी 2011

वर्षकाल


एक बिन धुले
निगेटिव की तरह
था साल दो हजार दस
कैमरे की कई बार की
क्लिक के बाद भी
तस्वीर की कल्पना भर
दृश्य का महज आभास भर

विदा होते हुए बरस यह
पूरी तरह धुल चुके मुकम्मल
कोडेक इमेज की तरह
कहां गलत थे पांव
किसे बस यों ही मान बैठे
अपना गांव
कहां पथ प्रशस्त
कहां दु:स्वप्न के झार-कांटे
कहां मनमौजी
जिद्दी आत्मघाती रास्ते

हाथ वह जो
कड़ी जोड़ने
हथकड़ी तोड़ने की तरह
राह जिसने संभव किया
समय का हृदय से जुड़ाव
एहसास के कुछ गिनेचुने पड़ाव
कुछ देर तक गुदगुदाते लम्हे 
कुछ दूर तक सिहरते घाव

अनुभवों की बारीक
कसीदाकारी
मां को लपेटे
जैसे व्रत की साड़ी
भेंट अंतिम यह
गुजरे एक पूरे वर्ष का
परिस्थिति वह तब की
स्थिति यह अब की

ध्वंस की राख
कि भभूतिया चमत्कार
छंट चुकी पूरी तरह
रात एक अबीरी
बढ़कर थाम रही
सुबह एक सिंदूरी
कुछ आधी-अधूरी बात
कुछ भरपूर जज्बात
एक पूरा वर्षकाल

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

यह डिवोर्स मेड इन चाइना है


अखबारों के तकरीबन एक ही पन्ने पर साया हुईं  ये दो खबरें हैं। एक तरफ प्राचीन से नवीन होता चीन है तो दूसरी तरफ उत्तर आधुनिकता की जमीन पर परंपराओं और संबंधों के नए सरोकारों को विकसित कर रहा अमेरिका। दुनिया के दो महत्वपूर्ण हिस्सों में यह सामाजिक बदलाव का दौर है। लेकिन दिशा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग। एक तरफ खतरे का लाल रंग काफी तेजी से और गाढ़ा होता जा रहा है तो दूसरी तरफ मध्यकालीन बेड़ियों से झूल रहे बचे-खुचे तालों को तोड़ने का संकल्प।   
बाजार के साथ हाथ मिलाते हुए भी अपनी लाल ठसक को बनाए रखने वाले चीन की यह बिल्कुल वही तस्वीर नहीं है जो न सिर्फ सशक्त है बल्कि  सर्वाइवल और डेवलपमेंट का एक डिफरेंट मॉडल भी है। चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने सोशल रिसर्चर तंग जुन के हवाले से बताया है कि चीन में न सिर्फ अर्थव्यवस्था का बल्कि तलाक का ग्राफ भी बढ़ा है। ढाई दशक पहले तक चीन में हर हजार शादी पर 0.4 मामले तलाक के थे जबकि अब वहां नौबत यह आ गई है कि हर पांचवीं शादी का दुखांत होता है। चीनी समाज में स्थितियां किस तरह बदल रही हैं इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2009 में चीन में 2.42 करोड़ लोग परिणय सूत्र में बंधे लेकिन 24 लाख लोग अंतत:  इस बंधन से बाहर आ गए। अर्थ का विकास जीवन को कुछ सुकूनदेह बनाता हो या न, उसके अनर्थ का खतरा कभी मरता नहीं है।
चीनी विकास का अल्टरनेट मॉडल परिवार और समाज के स्तर पर भी कोई वैकल्पिक राह खोज लेता तो सचमुच बड़ी बात होती। लेकिन शायद ऐसा न तो संभव था और न ही ऐसी कोई कोशिश की गई। उलटे विकास और समृद्धि के चमकते आंकड़ों की हिफाजत के लिए वहां पोर्न इंडस्ट्री और सेक्स ट्वायज का नया बाजार खड़ा हो गया। दुनिया के जिस भी समाज  में सेक्स की सीमा ने सामाजिक संस्थाओं का अतिक्रमण कर सीधे-सीधे निजी आजादी का एजेंडा चलाया है, वहां सामाजिक संस्थाओं की बेड़ियां सबसे पहले झनझनाई हैं। चीन में आज अगर इस झनझनाहट को सुना जा रहा है तो वहां की सरकार को थ्यानमन चौक की घटना से भी बड़े खतरे के लिए तैयार हो जाना चाहिए। क्योंकि बाजार को अगर सामाजिक आधारों को बदलने का छुट्टा लाइसेंस मिल गया तो आगे जीवन और जीवनशैली के लिए सिर्फ क्रेता और विक्रेता के संबंधों का खतरनाक आधार बचेगा।
अमेरिका से आई खबर की प्रकृति बिल्कुल अलग है। वहां शादियों और मां बनने का न सिर्फ जोर बढ़ा है बल्कि इन सबके साथ कई क्रूर रुढ़ताएं भी खंडित हो रही हैं। जिस अमेरिका में राजनीति से लेकर फिल्म और शिक्षण संस्थाओं तक नस्लवाद का अक्स आज भी कायम है, वहां रंग, जाति और बिरादरी से बाहर जाकर प्यार करने और शादी करने का नया चलन जोर पकड़ रहा है। नस्ली सीमाओं को लांघकर विवाह करने का यह चलन कितना मजबूत है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पिछले तीन दशक में ऐसा करने वालों की गिनती दोगुनी हो चुकी है। अमेरिकी समाज के लिए यह एक बड़ी घटना है।                  
50-60 के दशक तक अमेरिका में दूसरी नस्ल के लोगों के साथ विवाह करने की इजाजत नहीं थी। बाद में वहां सुप्रीम कोर्ट का आर्डर आया जिसने ऐसे किसी एतराज को गलत ठहराया। बहरहाल, इतना तो कहना ही पड़ेगा कि दुनिया भर में नव पूंजीवाद व उदारवाद का अलंबरदार देश अपनी भीतरी बनावट में भी उदार होने के लिए छटपटा रहा है। यह सूरत आशाजनक तो है पर फिलहाल इसे क्रांतिकारी इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि अब भी वहां 37 फीसद सोशल हार्डकोर मेंटेलिटी के लोग हैं जो विवाह की नस्ली शिनाख्त में किसी फेरबदल के हिमायती नहीं हैं। जाहिर है चरमभोग के परमधाम में अभी स्वच्छंदता की मध्यकालीन मलिनता से छुटकारा मुश्किल है। लेकिन वहां जो बदलाव दिख रहा है उसमें आस और उजास दोनों हैं।     

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

डेढ़ लाख का सपना और इराक वार


कोख के हिस्से आया यह एक और शोक, एक और त्रासदी है। इंदौर में सरोगेसी के धंधे का तब एक और सियाह चेहरा सामने आया जब पता चला कि भ्रूण हिंसा ने यहां भी अपनी गुंजाइश निकाल ली है। इस शहर की एक महिला सपना नवीन झा ने एक डाक्टर के मार्फत एक बड़े कारोबारी के साथ डेढ़ लाख रुपए में किराए की कोख का मौखिक करार किया। शर्त के मुताबिक अगर गर्भ ठहरने के तकरीबन ढाई महीने बाद करवाई गई सोनोग्राफी में गर्भ में लड़के की जगह लड़की होने का पता चलता है तो अबार्शन कराना होगा। जिसका खतरा था, वही हुआ भी। सपना को ढाई महीने बाद गर्भ गिराने के लिए तैयार होना पड़ा। पर उसे अफसोस इसलिए नहीं था क्योंकि ऐसा करने पर भी उसे 25 हजार रुपए की आमदनी हुई। सपना ने यह सब अपनी तंगहाली से आजिज आकर किया था, सो 25 हजार रुपए की आमद भी उसके लिए कम सुकूनदेह नहीं थी।
इस पूरे मामले का खुलासा जिस तरह हुआ, वह एक और बड़ी ट्रेजडी है। इस बारे में लोगों को पता तब चला जब सपना का नाम धार के पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष और कांग्रेस नेता कैलाश अग्रवाल हत्याकांड में उछला और वह पुलिसिया गिरफ्त में आ गई।  जिंदगी के इस खतरनाक मोड़ पर सपना ने आपबीती में  बताया कि वह मुफलिसी से लड़ते हुए कैसे कोख के सौदे और फिर भ्रूण हत्या के लिए तैयार हो गई। उसने बताया कि किराए का गर्भ गिराने के बाद वह एक बार फिर से अपनी कोख को किराए पर देने के लिए तैयार थी लेकिन ऐसा करने के लिए उसे कम से कम पांच महीने रुकना पड़ता। सपना दोबारा सरोगेट मदर बनने का सोच ही रही थी कि अग्रवाल हत्याकांड ने उसे जिंदगी के एक और खतरनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया।
इस पूरे मामले में एक खास बात यह भी है कि सपना अपनी जिंदगी से परेशान जरूर है पर उसे अपने किए का कतई अफसोस नहीं है। शायद उसकी जिंदगी को मुफलिसी ने इस कदर उचाट बना दिया है कि ममता और संवेदना जैसे एहसास उसके लिए बेमतलब हो चुके हैं। एक महिला की जिंदगी क्या इतनी भी त्रास्ाद हो सकती है कि वह कोख से जुड़ी संवेदना को भी अपनी जिंदगी के शोक के आगे हार जाए। 
दरअसल, यह पूरा मामला औरत की जिंदगी के आगे पैदा हो रहे नए खतरों की बानगी भी है। सरोगेसी सपना के लिए शगल नहीं बल्कि उसकी मजबूरी थी। डेढ़ लाख रुपए की हाथ से जाती कमाई में से कम से कम 25 हजार उसकी अंटी में आ जाए, इसलिए गर्भ गिराने की क्रूरता को भी उसने कबूला। ...तो क्या एक महिला की संवेदना उसकी मुफलिसी के आगे हार गई या उसके संघर्ष के लिए एक पुरुष वर्चस्व वाली आर्थिक-सामाजिक स्थितियों में बहुत गुंजाइश बची ही नहीं थी। एक करोड़पति पुरुष का अपना वंश चलाने के सपने की सचाई कितने "सपनों' को रौंदने जैसी है, यह समझना जरूरी है।
याद आता है वह दौर जब अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश इराक को जंग के मैदान में सद्दाम हुसैन समेत अंतिम तौर पर रौंदने के लिए उतावले थे। अखबार के दफ्तर में रात से खबरें आने लगी कि अमेरिका बमबारी के साथ इराक पर हमला बोलने जा रहा है। इराक से संवाददाता ने खबर भेजी कि वहां के प्रसूति गृहों में मांएं अपने बच्चों को छोड़कर भाग रही हैं। खबर की कॉपी अंग्रेजी में थी, लिहाजा आखिरी समय में बिना पूरी खबर पढ़े उसके अनुवाद में जुट जाने का अखबारी दबाव था। अनुवाद करते समय जेहन में लगातार यही सवाल उठ रहा था कि ममता क्या इतनी निष्ठुर भी हो सकती है कि वह युद्ध जैसी आपद स्थिति में बच्चों की छोड़ सिर्फ अपनी फिक्र करने की खुदगर्जी पर उतर आए।
पूरी खबर से गुजरकर यह एहसास हुआ कि यह तो ममता की पराकाष्ठा थी। प्रसूति गृहों में समय से पहले अपने बच्चों को जन्म देने की होड़ मची थी। जिन महिलाओं की डिलेवरी हो चुकी थी, वह अपने बच्चों को  छोड़कर जल्द से जल्द घर पहुंचने की हड़बड़ी में थीं क्योंकि उन्हें अपने दूसरे बच्चों और घर के बाकी सदस्यों की फिक्र खाए जा रही थी। वे अस्पताल में नवजात शिशुओं को छोड़ने के फैसला इसलिए नहीं कर रही थी कि उनके आंचल का दूध सूख गया था। असल में युद्ध या बमबारी की स्थिति में कम से कम वह अपने नवजातों को नहीं खोना चाहती थीं। उन्हें भरोसा था कि अमेरिका इराक के खिलाफ जब हमला बोलेगा तो कम से कम इतनी नैतिकता तो जरूर मानेगा कि वह अस्पतालों और स्कूलों को बख्श दे। युद्ध छिड़ने से पहले प्रीमैच्योर डिलेवरी का महिलाओं का फैसला भी इसलिए था कि बम धमाकों के बीच कहीं गर्भपात जैसे खतरों का सामना उन्हें न करना पड़े। सचमुच मातृत्व संवेदना की परीक्षा की यह चरम स्थिति थी जिससे गुजरते हुए इराकी महिलाएं मानवीयता का सर्वथा भावपूर्ण सर्ग रच रही थीं।
सपना नवीन झा के मामले में पहली नजर में यह संवेदना दांव पर हारती दिखती है। पर अगर ऐसा दिखता है तो यह महिला स्थितियों को समझने में एक और बड़ा धोखा है। सपना से जुड़ा वाकिया दरअसल एक और खतरनाक मिसाल है कि हम एक महिला की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए किन-किन हदों तक जा सकते हैं। पैसे के बदले देहसुख मुहैया कराने के रूप में शुरू हुए दुनिया के सबसे पहले पेशे से लेकर किराए की कोख के सौदे तक की महायात्रा में आर्थिक मोर्चे पर महिलाओं की लाचारी के जितने भी पड़ाव हैं, वे सब एक पुरुष वर्चस्ववादी समय और समाज में महिला जीवन की विडंबनाओं की ही असलियत खोलते हैं।  सपना जैसी महिलाओं पर किसी पूर्वाग्रही और कठोर नजरिए से पहले हमें उन सचाइयों के प्रति ईमानदार होना होगा जो न सिर्फ महिला विरोधी हैं बल्कि संवेदना विरोधी भी।  याद रखें कि बहुत खतरनाक होता है किसी "सपने' का यूं ही  मर जाना।      

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

परंपरा और करवा


परंपरा जब आधुनिकता से गलबहियां डालकर डग भरती है तो जो "फ्यूजन' क्रिएट होता है, उसकी स्वीकार्यता आश्चर्यजनक रूप से काफी बढ़ जाती है। बात नवरात्र के गरबा रास की हो या करवा चौथ की, नए दौर में पुरानी परंपराओं से जुड़ने वालों की कमी नहीं है। करवा चौथ की कथा पारंपरिक पतिव्रता पत्नियों की चाहे जैसी भी छवि पेश करती रही हो, इस व्रत को करने वाली नई दौर की सौभाग्यवतियों ने न सिर्फ इस पुराकथा को बदला है बल्कि इस पर्व को मनाने के नए औचित्य भी गढ़े हैं। विवाह नाम की संस्था आज दांपत्य निर्वाह का महज संकल्प भर नहीं है, जहां स्त्री-पुरुष संबंध के तमाम  स्तरों और सरोकारों को महज संतानोत्पत्ति के महालक्ष्य के लिए तिरोहित कर दिए जाएं। संबंधों के स्तर पर व्यावहारिकता और व्यावहारिकता के स्तर पर एक-दूसरे के मुताबिक होने-ढलने की ढेर सारी हसरतें, नए दौर में विवाह संस्था के ईंट-गारे हैं।
करवा चौथ की पुरानी लीक आज विवाह संस्था की नई सीख है। खूबसूरत बात यह है कि इसे चहक के साथ सीखने और बरतने वालों में महज पति-पत्नी ही नहीं, एक-दूसरे को दोस्ती और प्यार के सुर्ख गुलाब भेंट करने वाले युवक-युवती भी शामिल हैं। दो साल पहले शादी के बाद बिहार से अमेरिका शिफ्ट होने वाले प्रत्यंचा और मयंक को खुशी इस बात की है कि वे इस बार करवा चौथ अपने देश में अपने परिवार के साथ मनाएंगे। तो वहीं नोएडा की प्राइवेट यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली प्रेरणा इस खुशी से भर रही है कि वह पहली बार करवा चौथ करेगी और वह भी अपने प्यारे दोस्त के लिए। दोनों ही मामलों में खास बात यह है कि व्रत करने वाले एक नहीं दोनों हैं, यानी ई·ार से अपने साथी के लिए वरदान मांगने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। सबको अपने प्यार पर फख्र है और सभी उसकी लंबी उम्र के लिए ख्वाहिशमंद। 
भारतीय समाज में दांपत्य संबंध के तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद उसे बनाए, टिकाए और निभाते चलने की वजहें ज्यादा कारगर हैं। यह बड़ी बात है और खासकर उस दौर में जब लिव-इन और समलैंगिक जैसे वैकल्पिक और खुले संबंधों की वकालत सड़क से अदालत तक गूंज रही है। अमेरिका और स्वीडन जैसे देशों में तलाक के मामले जहां 54-55 फीसद हैं, वहीं अपने देश में यह फीसद आज भी बमुश्किल 1.1 फीसद है। जाहिर है कि टिकाऊ और दीर्घायु दांपत्य के पीछे अकेली वजह परंपरा निर्वाह नहीं हो सकती। सचाई तो यह है कि नए दौर में पति-पत्नी का संबंध चर-अनुचर या स्वामी-दासी जैसा नहीं रह गया है। पूरे दिन करवा चौथ के नाम पर निर्जल उपवास के साथ पति की स्वस्थ और लंबी उम्र की कामना कुछ  दशक पहले तक पत्नियां इसलिए भी करती थीं कि क्योंकि वह अपने पति के आगे खुद को हर तरीके से मोहताज मानती थी, लिहाजा अपने "उनके' लंबे साथ की कामना उनकी मजबूरी भी थी। आज ये मजबूरियां मेड फॉर इच अदर के रोमांटिक यथार्थ में बदल चुकी हैं। परिवार के संयुक्त की जगह एकल संरचना एक-दूसरे के प्रति जुड़ाव को कई स्तरों पर सशक्त करते हैं। यह फिनोमिना गांवों-कस्बों से ज्यादा नगरों-महानगरों में ज्यादा इसलिए भी दिखता है कि यहां पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं, दोनों परिवार को चलाने के लिए घर से लेकर बाहर तक बराबर का योगदान करते हैं। इसलिए जब एक-दूसरे की फिक्र करने की बारी भी आती है तो उत्साह दोनों ओर से दिखता है। पत्नी की हथेली पर मेंहदी सजे, इसकी खुशी पति में भी दिखती है, पति की पसंद वाले ट्राउजर की खरीद के लिए पत्नी भी खुशी से साथ बाजार निकलती है। यही नहीं अब तो बच्चे पर प्यार उडे़लने में भी मां-पिता की भूमिका बंटी-बंटी नहीं बल्कि समान होती जा रही है।
करवा चौथ के दिन एक तरफ भाजपा नेता सुषमा स्वराज कांजीवरम या बनारसी साड़ी और सिंदूरी लाली के बीच पारंपरिक गहनों से लदी-फदी जब व्रत की थाली सजाए टीवी पर दिखती हैं तो वहीं देश के सबसे ज्यादा चर्चित और गौरवशाली परिवार का दर्जा पाने वाले बच्चन परिवार में भी इस पर्व को लेकर उतना ही उत्साह दिखता है। साफ है कि नया परिवार संस्कार अपनी-अपनी तरह से परंपरा की गोद में दूध पी रहा है। यह गोद किसी जड़ परंपरा की नहीं समय के साथ बदलते नित्य नूतन होती परंपरा की है। भारतीय लोक परंपरा के पक्ष में अच्छी बात यह है कि इसमें समायोजन की प्रवृत्ति प्रबल है। नए दौर की जरूरतों और मान्यताओं को आत्मसात कर बदलती तो है पर बिगड़ती नहीं। करवा चौथ का बदला स्वरूप ही ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है। अब यह पर्व कर्मकांडीय आस्था के बजाय उसी तरह सेलिब्रोट किया जा रहा है जैसे मदर्स-फादर्स और वेलेंटाइन डे। यह अलग बात है कि बदलाव के इस झोंके में बाजार ने अपनी भूमिका तलाश ली है, सबके साथ वह भी हमारी खुशियों में शामिल है।

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

सौभाग्य की सिंदूरी रेखा


विवाह संस्था की जरूरत पर बहस इसलिए भी बेमानी लगती है कि इसके लिए जो भी कच्चे-पक्के विकल्प सुझाए जाते हैं, उनके सरोकार ज्यादा व्यापक नहीं हैं। फिर अगर किसी एक वेल टेस्टेड रिलेशन की बात करें, जिसमें स्त्री-पुरुष संबंध के साथ उसका सामाजिक धर्म भी निभे तो विवाह की व्यवस्था का न तो कोई तोड़ है आैर न ही इसकी कोई सानी। बुरा यह लगता है कि जिस संस्था की बुनियादी शर्तों में लैंगिक समानता भी शामिल होनी चाहिए, वह या तो दिखता नहीं या फिर दिखता भी है तो खासे भद्दे रूप में। सबसे पहले तो यही देखें कि मंगलसूत्र से लेकर सिंदूर तक विवाह सत्यापन के जितने भी चिह्न हैं, वह महिलाओं को धारण करने होते हैं। पुरुष का विवाहित-अविवाहित होना उस तरह चिह्नित नहीं होता जिस तरह महिलाओं का। यही नहीं महिलाओं के लिए यह सब उसके सौभ्ााग्य से भी जोड़ दिया गया है, तभी तो एक विधवा की पहचान आसान है पर एक विधुर की नहीं। दिलचस्प तो यह है कि शादी टूटने के मामले में भी स्त्री की वैवाहिक स्थिति उसे देखकर जानी जा सकती है पर ऐसा ही पुरुष के मामले में नहीं है।
अपनी शादी का एक अनुभव आज तक मन में एक गहरे सवाल की धंसा है। मुझे शादी हो जाने तक नहीं पता था कि मेरी सास कौन है? जबकि ससुराल के ज्यादातर संबंधियों को इस दौरान न सिर्फ उनके नाम से मैं भली भांति जान गया था बल्कि उनसे बातचीत भी हो रही थी। बाद में जब मुझे सारी सचाई का पता चला तो आंखें भर आर्इं। दरअसल, मेरे ससुर का देहांत कुछ साल पहले हो गया था। लिहाजा, मांगलिक क्षण में किसी अशुभ से बचने के लिए वह शादी मंडप पर नहीं आर्इं। ऐसा करने का उन पर परिवार के किसी सदस्य की तरफ से दबाव तो नहीं था पर हां यह सब जरूर मान रहे थे कि यही लोक परंपरा है आैर इसका निर्वाह अगर होता है तो बुरा नहीं है। शादी के बाद मुझे आैर मेरी पत्नी को एक कमरे में ले जाया गया। जहां एक तस्वीर के आगे चौमुखी दिया जल रहा था। तस्वीर के आगे एक महिला बैठी थी। पत्नी ने आगे बढ़कर उनके पांव छुए। बाद में मैंने भी ऐसा ही किया। तभी बताया गया कि वह आैर कोई नहीं मेरी सास हैं। सास ने तस्वीर की तरफ इशारा किया। उन्होंने भरी आवाज में कहा कि सब इनका ही आशीर्वाद है आज वे जहां भी होंगे सचमुच बहुत खुश होंगे आैर अपनी बेटी-दामाद को आशीष दे रहे होंगे। दरअसल, वह मेरे दिवंगत ससुर की तस्वीर थी।
तब जो बेचैनी इन सारे अनुभवों से मन में उठी थी आज भी मन को भारी कर जाती है। सास-बहू मार्का या पारिवारिक कहे जाने वाले जिन धारावाहिकों की आज टीवी पर भरमार है, उनमें भी कई बार इस तरह के वाकिए दिखाए जाते हैं। मेरी मां आैर पिताजी दोनों जीवित हैं। पिता चूंकि लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में रहे, सो ऐसी परंपराओं को सीधे-सीधे दकियानूसी ठहरा देते हैं। पर आश्चर्य होता है कि मां को इसमें कुछ भी अटपटा नहीं लगता। उलटे वह कहती हैं कि नए लोग अब कहां इन बातों की ज्यादा परवाह करते हैं जबकि उनके समय में तो न सिर्फ शादी-विवाह में बल्कि बाकी समय में भी विधवाओं के बोलने-रहने के अपने विधान थे। मां अपनी दो बेटियों आैर दो बेटों की शादी करने के बाद उम्र के सत्तरवें पड़ाव को छूने को है। संत विनोबा से लेकर प्रभावती आैर जयप्रकाश नारायण तक कई लोगों के साथ रहने, मिलने-बात करने का मौका भी मिला है उन्हें। देश-दुनिया भी खूब देखी है। पर पति ही सुहाग-सौभाग्य है आैर उसके बिना एक ब्याहता के जीवन में अंधेरे के बिना कुछ नहीं बचता, वह सीख मन में नहीं बल्कि नस-नस में दौड़ती है।
कुछ साल पहले का वाकिया है। फिल्म अभिनेत्री रेखा को सबने सार्वजनिक रूप से सिंदूर लगाए आैर मंगलसूत्र पहने देखा तो खूब बातें होने लगी। लोगों ने कयास लगाने शुरू कर दिए कि रेखा की जिंदगी में जरूर कोई नया आया है। हालंकि किसी कयास की पुष्टि नहीं हो पाई आैर बात आई-गई हो गई आैर एक बार फिर रेखा के जीवन को रहस्यमय मान लिया गया। दरअसल, किसी पुरुष के साथ होने की प्रामाणिकता की मर्यादा आैर इसके नाम पर निभती आ रही परंपरा इतनी गाढ़ी आैर मजबूत है कि स्त्री स्वातंत्र्य के ललकार भरते दौर में भी पुरुष दासता के इन प्रतीकों की न सिर्फ स्वीकृति है बल्कि यह प्रचलन कम होने का नाम भी नहीं ले रहा। उत्सवधर्मी बाजार महिलाओं की नई पीढ़ी को तीज-त्योहारों के नाम पर अपने प्यार आैर जीवनसाथी के लिए सजने-संवरने की सीख अलग दे रहा है। दिलचस्प है कि आज हर तरफ एक तरफ स्वतंत्रता से आगे स्वच्छंदता की टेर सुनने को मिलती है, वहीं संबंधों को दासता में बदलने वाली सिंदूरी परंपरा भी बदस्तूर जारी है।

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

क्लिंटन पीढ़ी का मर्द


तुम्हें तो पंख मिले हैं फितरतन
जाओ न उड़ो तुम भी
कहो कि मेरा है आकाश

क्यों
आखिर क्यों चाहिए तुम्हें
उतनी ही हवा
जितनी उसके बांहों के घेरे में है
क्यों है जमीन उतनी ही तुम्हारी
जहां तक वह पीपल घनेरा है

सुनी नहीं बहस तुमने टीवी पर
बिन ब्याही भी पूरी है औरत
क्या बैर है तुम्हारा उन सहेलियों से
जिनके पर्स में रखी माचिस
कहीं भी और कभी भी
चिंगारी फेंकने के लिए रहती है तैयार

बताओ आखिर
क्या मतलब है इसका
कि एक आईना भी नहीं है तुम्हारे पास
उसे छोड़कर
जिसमें तुम संवर सको
मलिका बन सको दुनिया जहान की

तुमने तो देखी भी नहीं होगी
टांगें अपनी ऊपर से नीचे तक
पता भी है तुम्हें
कि जिन अलग-अलग नंबरों से
घेरती-बांधती हो खुद को
उसका जरूरत से ज्यादा बटनदार होना
आजादी की असीम संभावनाओं का गला घोंटना है

जानती नहीं तुम
कि छलनी से चांद निहारने की आदत तुम्हारी
आक्सीजन में मिलावट है उसके लिए
खांसने लगता है वह
हांफती है जिंदगी उसकी
तुम्हारे बस उसके कहलाने से

तुम भले बनना चाहो उसकी मैना
वह तुम्हारे दरख्त का तोता नहीं बन सकता
वन बचाओ मुहिम का एक्टिविस्ट वह
जंगली है पूरी तरह से

तुम्हें अहसास नहीं शायद
कि बेटी हो तुम उस सौतेली सोच की
जो पूरी जिंदगी सोखा आती है
अपने बाप का हुलिया जानने में
माफ करना साथिन
बिल क्लिंटन की पीढ़ी का मर्द
इससे ज्यादा ईमानदार नहीं हो सकता
कि रात ढले तक तुम्हें
अपनी दबोच से आजाद रखे

शनिवार, 24 जुलाई 2010

आवारा रंगोलीबाज के हाथों संवरी


थोड़ी खोई थोड़ी सकपकाई आंखें
संकोच से मुठभेड़ में झुकी गर्दन
कुछ चुभा कुछ चुका मन
मई-जून की गरमी सा तपा चेहरा
ताजे उतारे गए गोश्त की तरह
छाती पर रखा प्रेम
स्पर्श स्नान से
बेदाग होने का जतन फिर आजमाएगा
इस कुकुरधर्मी प्यार पर
फिकरा सांड बनारसी का धौल जमाएगा
दोनों बाजुओं से हार चुका प्रेम
दोनों जांघों में फंस जाएगा

तुम भले बनना चाहो चिड़िया
खूब तोलो पर
वो भुट्टे सा भुनेगा तुम्हें दांतों से चबाएगा
पाखी नहीं उसने एक आजाद उड़ान को चखा है
और यह अट्टहास एक बार फिर
'स्त्री उपेक्षिता' को सजिल्द कर जाएगा

किसी आवारा रंगोलीबाज के हाथों संवरी
दोपहर की अंगुली पकड़कर
शाम की गोद तक पसरी
दिनदहाड़े की अठखेलियां
रात की नीयत में बदली
रतजगे सपनों की हकीकत जैसी
तुम्हें शुरू करने वाला नहीं
कोई अनंत कर जाने वाला पाएगा
मध्यांतर का संगीत जैसा इस बार बजा
वैसा आगे भी बजता जाएगा

प्रेम के लिए होली पैंडेंट का सहारा
जय माता दी का डॉल्बी जयकारा
घर से निकलते ही मंदिर का नजारा
किसी महोदय को पाने के
आवेदन पत्र जैसा
थाने में मनमर्जी के खिलाफ अर्जी
मुंदरी में चमकते नक्षत्र जैसा
रोने का नहीं खुश होने का हक तुम्हारा
लड़ने का हौसला बार-बार देगा
जीत हो तुम्हारी अभिनंदन हो तुम्हारा
यकीन है कि अपडेट कर दोगी तुम
फ्रेंड फिलॉस्फर और गाइड का
घिसा मुहावरा
तब कच्ची शराब की खुमारी थी
अब शैंपन उफनाएगा
देसी पगडंडियों में खेला-खोया प्यार
अमेरिका रिटर्न कहलाएगा

23.07.10