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सोमवार, 16 जनवरी 2023

 जाना हिंदी के एक और मैनेजर का

- प्रेम प्रकाश

आपातकाल का अंधेरा तब थोड़ा दूर था, पर नेहरू युग जरूर किताब के पन्नों में प्रगतिशील आलोचकीय निकष पर आ चुका था। अगर नहीं थकी और झुकी थी तो हिंदी पत्रकारिता की वह असाधारण कलम, जिसने आजादी के आंदोलन के दौरान हासिल यशस्विता को इस दौरान भी विचार और लोकतंत्र की हिमायत में बहाल रखा। श्री कृष्ण किशोर पांडेय जी अब हमारे बीच नहीं रहे। हिंदी के घर-परिवार और संस्कार के बीच प्रखर आलोचक मैनेजर पांडेय के बाद शोक की यह दूसरी बड़ी खबर है। यह खबर और इससे जुड़ा संयोग और इस विदाई का पूरा समकाल नई चिंताओं और सवालों को जन्म देता है। यह हिंदी विमर्श और अभिव्यक्ति के एक और मैनेजर का जाना है, सर्द थपेड़ों के बीच एक और अलाव का ठंडा पड़ना है।

स्वर्णीय केके पांडेय का जीवन एक ऐसे प्रतिबद्ध हिंदी पत्रकार का सफरनामा है, जो 1968 से 2005 तक भरपूर सक्रियता के साथ अखबार के उस कक्ष को प्रतिष्ठा देता रहा, जिसे संपादकीय कक्ष कहा जाता है। मेरे जैसे पत्रकार के लिए उनकी स्मृति को नमन ऐसे विशाल वटवृक्ष के नीचे खड़ा होना है, जहां प्रशांत ऊर्जा की शालीन अनुभूति एक अक्षर मनोदशा को रचती है। उनके निधन पर सोशल मीडिया पर जिस तरह के संस्मरण लिखे जा रहे हैं, उन्हें लोग जिस लगाव और कचोट के साथ याद कर रहे हैं, वे ये जाहिर करते हैं कि पत्रकारिता की कम से कम दो पीढ़ी उनसे गहरे तौर पर जुड़ी रही। यह जुड़ाव पत्रकारिता के बदलते दौर में छपे शब्दों की अस्मिता को बहाल रखने के प्रशिक्षण के साथ हिंदी की अभिव्यक्ति और उसके सामर्थ्य को नए समकाल में ढालने की ईमानदार कोशिश थी।

गौरतलब है कि श्री कृष्ण किशोर पांडेय जब ‘हिंदुस्तान’ जैसे शीर्षस्थ अखबार के संपादकीय पृष्ठ को विचार और विमर्श के केंद्र में ला रहे थे, तब हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता पूरे लय में थी तो साथ ही खोजी पत्रकारिता की जमीन तेजी से पक रही थी। पत्र-पत्रिकाओं पर ताले झूलने का शोक तब किसी आशंका के गर्भ में भी नहीं था। हां, कई दूरद्रष्टा जरूर काल के क्षितिज पर छाते धुंधलके की बात कहने लगे थे। यह दौर अपने पूरे विस्तार में कुलदीप नैयर, बीजी वर्गीज, राजेंद्र माथुर, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, प्रभाष जोशी और सुरेंद्र प्रताप सिंह जैसी शख्सियतों की पत्रकारिता की लाजवाब पारी का साक्षी रहा।

इस दौरान दूरदर्शन ने जहां आंखें खोलीं, एशियाड दूसरी बार भारत लौटा, वहीं आगे चलकर श्रीमति इंदिरा गांधी के करिश्माई दौर का पटाक्षेप भारतीय राजनीति का सबसे दिलचस्प घटनाक्रम साबित हुआ। इतने सारे बदलावों और आगाजों के बीच कलम उठाना और अखबारी विमर्श का कंपास स्थिर करना आसान नहीं था। भाषाई संस्कार और हिंदी की अपनी धज और परंपरा के मुताबिक यह चुनौती कितनी बड़ी होगी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हिंदी सिनेमा का महानायक तब तक ‘पुष्पा के आंसू’ पर शोकाकुल होने के बजाय जमाने की नाइंसाफियों के खिलाफ सुलगते लावे की तरह एंग्री यंग मैन बन चुका था। बदलाव का दूसरा सिरा साहित्य को छू रहा था। हिंदी की किस्सागोई नई कहानी और कविताई नई कविता की शिनाख्त के साथ अपने होने को नई प्रतिबद्धता के सांचे में ढाल रही थी, नई चुनौतियों के बीच संवेदनशील सरोकारों को रच रही थी। कुल मिलाकर रचनात्मकता की दुनिया की हलचल हिंदी को नए प्रस्थान की ओर ले जा रही थी।

जिन लोगों ने भी उन्नत गौर ललाट और तिलकित भाल से सुशोभित पांडेय जी के साथ काम किया, उनके लिखने-पढ़ने की समझ और शैली को नजदीक से देखते-समझते रहे, वे ये बताते हैं कि उन्होंने भारतीय समाज और राजनीति के उत्तरायण और दक्षिणायन के बजाय उसके मध्याह्न को ज्यादा अहम माना। इसलिए विचार के तीखे कोणों के बजाए उन्होंने विमर्श और विरासत की दोमट मिट्टी पर अक्षर फूल खिलाए, नए समकोण खड़े किए।

इस अक्षर वाटिका की बड़ी बात यह रही कि इसमें नए चटख रंग और तासीर के फूलों ने हिंदी और हिंदुस्तान दोनों को एक साथ महकाया। नए कलम उठाने वालों ने लिखने के जोखिम और दायित्व को समझा। और इस तरह तैयार हुई नए लेखकों और पत्रकारों की एक पूरी खेंप। यह वह खेंप है जो भाषा से खिलवाड़, दो-तीन जीबी डेटा और अफवाह के दोस्ताने के बीच लिखने की मर्यादा को बचाए रखने के लिए अंतिम लश्कर के तौर पर आज भी कार्य कर रही है। 

इसके बाद हिंदी की बिंदी और मान को बचाए रखने के लिए न तो कोई लश्कर बचेगा और न ही बचेगा कोई संघर्ष। केके पांडेय की स्मृति और प्रेरणा को नमन के साथ यह बड़ा संकट बिल्कुल सामने दिख रहा है। बड़ी बात होगी कि इस संकट और अंधकार के बीच कहीं से एक नया कृष्ण किशोर होने की संभावना प्रकट हो। यह संभावना और इसके लिए बची-खुची उम्मीद हिंदी के पुराने कंगूरों और नए चबूतरों पर दीयों के बलने की अंतिम उम्मीद है। यह उम्मीद फलीभूत हो और इससे जुड़ा बोध चिरायु हो, ऐसी कामना है।

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

खबरिया चैनल बिगाड़ रहे राजस्थानी महिला की छवि


- प्रेम प्रकाश
सनसनी पैदा करने के चक्कर में मीडिया कई बार ऐसी हिमाकतों से गुजर जाता है, जिसका खामियाजा देश और समाज को आगे लंबे समय तक उठाना पड़ता है। बात करें महिला अपराध की तो यह एक ऐसा संवेदनशील मसला है, जिससे खबरिया आपाधापी में अकसर गंभीर चूक होती है। यह चूक कितनी बड़ी और घातक हो सकती है इसकी मिसाल हाल की जयपुर की एक घटना है। टीवी चैनलों पर आधे-आधे घंटे इस घटना पर विशेष शो दिखाए गए। बताया गया कि एक मां भी हत्यारी हो सकती है और वह भी अपने चार माह के दूधमुंहा बच्ची की। एंकर से लेकर रिपोर्टर इस घटना में एक मां की हिंसक जघन्यता को यह कहते हुए रेखांकित करने में लगे रहे कि कैसे एक मां की ममता इतनी कमजोर पड़ गई कि उसने अपनी गोद में खेलती बेटी की हत्या का फैसला ले लिया। जबकि जो खबर थी उसमें यह तथ्य भी शामिल था कि यह सब उस मां ने क्यों और किस दबाव में किया यह पूरी तरह साफ नहीं। क्योंकि एक अंदेशा यह भी जताया जा रहा कि संभव है कि वह मां ऐसा नहीं करना चाहती हो पर उसके ऊपर इसके लिए दबाव हो। पितृसत्तात्मक समाज में यह दबाव किस तरह पारिवारिक-सामाजिक स्तर पर स्त्री मन को तोड़ता-बदलता है, इसके तो अब कई चौंकाने वाले अध्ययन तक सामने आ चुके हैं। फिर बगैर मामले के पूरी तह में गए अगर किसी की छवि को निर्णायक तौर पर स्याह करार दे दिया जाए और वह भी किसी महिला की तो यह न सिर्फ एक गैरजिम्मेदार बल्कि खुद अपने में हिंसक रवैया है।  इस मामले में महिला मामलों में बरती जाने वाली संवेदनशीलता तो खैर नहीं ही दिखी, अव्वल ऐसी सोच जरूर हावी है कि अगर कोई महिला अपराध करती है तो वह पहली नजर में ही अक्षम्य है, नाकाबिले बर्दाश्त है। पलटकर यह सवाल अगर मीडिया के माननीयों से पूछा जाए कि एक ऐसे दौर में जब हर 18 मिनट में देश की कोई न कोई बेटी किसी पुरुष की हवस का शिकार बन रही है, अदालती हिदायतों और कानूनी सख्ती के बावजूद आधी दुनिया के चेहरे पर एसिड फेंकने की घटनाएं रुकी नहीं हैं, फिर एक महिला के अपराधी होने को लेकर इतनी दिलचस्पी आखिर क्यों? क्या यह दिलचस्पी उसी मानसिकता की देन नहीं है, जिससे महिलाएं घर-परिवार से लेकर कार्यस्थलों पर असुरक्षित हैं, शारीरिक से लेकर मानसिक उत्पीड़न का शिकार हैं।  जयपुर की जिस घटना को लेकर इतनी बातें हो रही हैं, वह घटना 26 अगस्त की है। पुलिस को उस दिन सूचना मिली कि शास्त्रीनगर इलाके मेंएक व्यक्ति की चार माह की बेटी घर में ही रखे हुये एसी कैबिनेट में मृत पायी गई है। मकान में रहने वाले एवं घटना के समय मौजूद लोगों से गहनता से पूछताछ की गयी तो बच्ची की मां की भूमिका पर संदेह हुआ। मृतका बच्ची अपनी मां नेहा के पास अपने बेडरूम में सोई थी। उसके बाद बच्ची लहुलुहान हालात में उसके बेडरूम से कुछ ही दूरी पर स्थित हॉल में रखे लोहे के एसी केबिनेट में मृत पायी गयी। लेकिन बच्ची के एसी केबिनेट में पहुंचने को लेकर मां कुछ भी नहीं बता सकी। अलबत्ता एफएसएल टीम द्बारा जुटाये गए सबूतों में पाया गया कि कि मृतका बच्ची की मां के नाखूनों में रक्त पाया गया व उसके बेडरूम से अटैच बाथरूम में भी रक्त पाया गया। इसमें कहीं दो मत नहीं कि इस दुर्भाग्यपूणã घटना की शुरुआती तफ्सील ही किसी को भी अंदर तक हिला देने वाली है। हर लिहाज से यह घटना पूरी तरह आपवादिक जान पड़ता है क्योंकि ऐसा किसी समान्य सामाजिक-पारिवारिक स्थिति में संभव ही नहीं।  पर दुर्भाग्य से इस आपवादिक खबर में सनसनी देखने वालों ने इस बहाने राजस्थान में बालिका भ्रूण हत्या से लेकर महिलाओं की असुरक्षित स्थिति तक कई नतीजे निकाल लिए। जबकि तथ्य और सच्चाई कुछ और है। राजस्थान में जहां वर्ष 2०11 की जनगणना में ० से 6 वर्ष तक का लिगानुपात महज 888 था, वह 2०15 आते-आते 37 अंक बढ़कर 925 हो गया है। दरअसल, प्रदेश में 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ ही, लिगानुपात बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। भामाशाह योजना, राजश्री योजना, आपणी बेटी योजना सहित अन्य कई योजनाएं प्रदेश में संचालित की गई हैं, जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रही हैं। साथ ही, जिन परिवारों में बेटी का जन्म होता है, उन्हें मुख्यमंत्री द्बारा हस्ताक्षरित बधाई पत्र भेजा जाता है। प्रदेश में लिगानुपात बढाने के लिये राज्य सरकार द्बारा प्रसव पूर्व लिग जांच की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए अपनी तरह की पहली मुखबिर योजना और जीपीएस युक्त सोनोग्राफी मशीनों जैसे नवाचार किए गए हैं। इन सब योजनाओं के आशातीत परिणाम आए हैं। ऐसे में महज एक खबर की नोक पर राज्य में महिलाओं के लिए सरकार और समाज की सारी तत्परता और बड़ी पहलों को नकार देना कितना गलत और घातक है, समझा जा सकता है।  राजस्थान से निकलकर पूरे देश की बात करें खासतौर पर निर्भया मामले के बाद कई स्तरों पर जागरुकता बढ़ी है। इस दौरान बलात्कार सहित महिलाओं के खिलाफ अपराध को रोकने को लेकर कई वैधानिक सख्तियां भी सरकारें लेकर आई हैं। इससे आगे महिलाएं पूजास्थलों में प्रवेश से रोके जाने जैसी मध्यकालीन सोच को भी समाज से लेकर अदालतों तक चुनौती दे रही हैं। बात करें मौजूदा केंद्र सरकार की तो उसने तो बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ से लेकर स्तनपान को प्रश्रय तक कई बड़े अभिक्रम एक के बाद एक शुरू किए हैं। ऐसे में देश में महिला सम्मान और सुरक्षा की राह पर सरकार और समाज के साथ मीडिया को कदम आगे बढ़ाने की दरकार है। यह दरकार इस लिहाज से जरूरीअमल की मांग करता है क्योंकि आजादी के आंदोलन के लंबे दौर से बाद तक मीडिया देश में जागरूकता के एक बड़े स्रोत और उपकरण के तौर पर काम करता रहा है। श्रेय और उपलब्धि से यशस्वी होने का गौरव अगर पत्रकारिता जगत महज कुछ बाजारू तकाजों के आगे खोता है तो यह अविवेक आगे किसी बड़े और खतरनाक प्रवृति की भी शक्ल ले सकता है। 

चैनलों ने बिगाड़ी राजस्थानी महिलाओं की छवि !

- प्रेम प्रकाश 
सनसनी पैदा करने के चक्कर में मीडिया कई बार ऐसी हिमाकतों से गुजर जाता है, जिसका खामियाजा देश और समाज को आगे लंबे समय तक उठाना पड़ता है। बात करें महिला अपराध की तो यह एक ऐसा संवेदनशील मसला है, जिससे खबरिया आपाधापी में अकसर गंभीर चूक होती है। यह चूक कितनी बड़ी और घातक हो सकती है इसकी मिसाल हाल की जयपुर की एक घटना है। टीवी चैनलों पर आधे-आधे घंटे इस घटना पर विशेष शो दिखाए गए। बताया गया कि एक मां भी हत्यारी हो सकती है और वह भी अपने चार माह के दूधमुंहा बच्ची की। एंकर से लेकर रिपोर्टर इस घटना में एक मां की हिंसक जघन्यता को यह कहते हुए रेखांकित करने में लगे रहे कि कैसे एक मां की ममता इतनी कमजोर पड़ गई कि उसने अपनी गोद में खेलती बेटी की हत्या का फैसला ले लिया। जबकि जो खबर थी उसमें यह तथ्य भी शामिल था कि यह सब उस मां ने क्यों और किस दबाव में किया यह पूरी तरह साफ नहीं। क्योंकि एक अंदेशा यह भी जताया जा रहा कि संभव है कि वह मां ऐसा नहीं करना चाहती हो पर उसके ऊपर इसके लिए दबाव हो। पितृसत्तात्मक समाज में यह दबाव किस तरह पारिवारिक-सामाजिक स्तर पर स्त्री मन को तोड़ता-बदलता है, इसके तो अब कई चौंकाने वाले अध्ययन तक सामने आ चुके हैं। फिर बगैर मामले के पूरी तह में गए अगर किसी की छवि को निर्णायक तौर पर स्याह करार दे दिया जाए और वह भी किसी महिला की तो यह न सिर्फ एक गैरजिम्मेदार बल्कि खुद अपने में हिंसक रवैया है। 
इस मामले में महिला मामलों में बरती जाने वाली संवेदनशीलता तो खैर नहीं ही दिखी, अव्वल ऐसी सोच जरूर हावी है कि अगर कोई महिला अपराध करती है तो वह पहली नजर में ही अक्षम्य है, नाकाबिले बर्दाश्त है। पलटकर यह सवाल अगर मीडिया के माननीयों से पूछा जाए कि एक ऐसे दौर में जब हर 18 मिनट में देश की कोई न कोई बेटी किसी पुरुष की हवस का शिकार बन रही है, अदालती हिदायतों और कानूनी सख्ती के बावजूद आधी दुनिया के चेहरे पर एसिड फेंकने की घटनाएं रुकी नहीं हैं, फिर एक महिला के अपराधी होने को लेकर इतनी दिलचस्पी आखिर क्यों? क्या यह दिलचस्पी उसी मानसिकता की देन नहीं है, जिससे महिलाएं घर-परिवार से लेकर कार्यस्थलों पर असुरक्षित हैं, शारीरिक से लेकर मानसिक उत्पीड़न का शिकार हैं। 
जयपुर की जिस घटना को लेकर इतनी बातें हो रही हैं, वह घटना 26 अगस्त की है। पुलिस को उस दिन सूचना मिली कि शास्त्रीनगर इलाके मेंएक व्यक्ति की चार माह की बेटी घर में ही रखे हुये एसी कैबिनेट में मृत पायी गई है। मकान में रहने वाले एवं घटना के समय मौजूद लोगों से गहनता से पूछताछ की गयी तो बच्ची की मां की भूमिका पर संदेह हुआ। मृतका बच्ची अपनी मां नेहा के पास अपने बेडरूम में सोई थी। उसके बाद बच्ची लहुलुहान हालात में उसके बेडरूम से कुछ ही दूरी पर स्थित हॉल में रखे लोहे के एसी केबिनेट में मृत पायी गयी। लेकिन बच्ची के एसी केबिनेट में पहुंचने को लेकर मां कुछ भी नहीं बता सकी। अलबत्ता
एफएसएल टीम द्बारा जुटाये गए सबूतों में पाया गया कि कि मृतका बच्ची की मां के नाखूनों में रक्त पाया गया व उसके बेडरूम से अटैच बाथरूम में भी रक्त पाया गया। इसमें कहीं दो मत नहीं कि इस दुर्भाग्यपूणã घटना की शुरुआती तफ्सील ही किसी को भी अंदर तक हिला देने वाली है। हर लिहाज से यह घटना पूरी तरह आपवादिक जान पड़ता है क्योंकि ऐसा किसी समान्य सामाजिक-पारिवारिक स्थिति में संभव ही नहीं। 
पर दुर्भाग्य से इस आपवादिक खबर में सनसनी देखने वालों ने इस बहाने राजस्थान में बालिका भ्रूण हत्या से लेकर महिलाओं की असुरक्षित स्थिति तक कई नतीजे निकाल लिए। जबकि तथ्य और सच्चाई कुछ और है। राजस्थान में जहां वर्ष 2०11 की जनगणना में ० से 6 वर्ष तक का लिगानुपात महज 888 था, वह 2०15 आते-आते 37 अंक बढ़कर 925 हो गया है। दरअसल, प्रदेश में 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ ही, लिगानुपात बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। भामाशाह योजना, राजश्री योजना, आपणी बेटी योजना सहित अन्य कई योजनाएं प्रदेश में संचालित की गई हैं, जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रही हैं। साथ ही, जिन परिवारों में बेटी का जन्म होता है, उन्हें मुख्यमंत्री द्बारा हस्ताक्षरित बधाई पत्र भेजा जाता है। प्रदेश में लिगानुपात बढाने के लिये राज्य सरकार द्बारा प्रसव पूर्व लिग जांच की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए अपनी तरह की पहली मुखबिर योजना और जीपीएस युक्त सोनोग्राफी मशीनों जैसे नवाचार किए गए हैं। इन सब योजनाओं के आशातीत परिणाम आए हैं। ऐसे में महज एक खबर की नोक पर राज्य में महिलाओं के लिए सरकार और समाज की सारी तत्परता और बड़ी पहलों को नकार देना कितना गलत और घातक है, समझा जा सकता है। 
राजस्थान से निकलकर पूरे देश की बात करें खासतौर पर निर्भया मामले के बाद कई स्तरों पर जागरुकता बढ़ी है। इस दौरान बलात्कार सहित महिलाओं के खिलाफ अपराध को रोकने को लेकर कई वैधानिक सख्तियां भी सरकारें लेकर आई हैं। इससे आगे महिलाएं पूजास्थलों में प्रवेश से रोके जाने जैसी मध्यकालीन सोच को भी समाज से लेकर अदालतों तक चुनौती दे रही हैं। बात करें मौजूदा केंद्र सरकार की तो उसने तो बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ से लेकर स्तनपान को प्रश्रय तक कई बड़े अभिक्रम एक के बाद एक शुरू किए हैं। ऐसे में देश में महिला सम्मान और सुरक्षा की राह पर सरकार और समाज के साथ मीडिया को कदम आगे बढ़ाने की दरकार है। यह दरकार इस लिहाज से जरूरीअमल की मांग करता है क्योंकि आजादी के आंदोलन के लंबे दौर से बाद तक मीडिया देश में जागरूकता के एक बड़े स्रोत और उपकरण के तौर पर काम करता रहा है। श्रेय और उपलब्धि से यशस्वी होने का गौरव अगर पत्रकारिता जगत महज कुछ बाजारू तकाजों के आगे खोता है तो यह अविवेक आगे किसी बड़े और खतरनाक प्रवृति की भी शक्ल ले सकता है। 

सोमवार, 24 नवंबर 2014

प्रतिभा की द्रौपदी...!


ज्ञानपीठ पुरस्कार को इस साल पचास साल पूरे हो रहे हैं। यह अलग बात है कि इस साल 49वें ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हुई है, जो वरिष्ठ हिदी कवि केदारनाथ सिह को दिया गया है। वर्ष के हिसाब से केदारजी को यह सम्मान 2०13 के लिए दिया गया है।
अपनी अर्धशती लंबी इस यात्रा में भारतीय भाषाओं के इस सर्वोच्च और सर्वमान्य माने जाने वाले पुरस्कार को लेकर हर हलके में एक सम्मान का भाव रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण इसका कम विवादित रहना रहा है। पुरस्कारों के अवमूल्यन के दौर में यह उपलब्धि बड़ी बात है।
मुझे याद है कि 2०11 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हुई तो एक साथ मोबाइल फोन और ईमेल पर कई मैसेज आने लगे। इनमें ज्यादातर इस सूचना को साझा करने वाले थे कि इस बार ज्ञानपीठ सम्मान के लिए चुनी गई हैं वरिष्ठ उडिèया कथाकार प्रतिभा राय।
ताज्जुब हुआ कि गूगल के सर्च इंजन पर एक हफ्ते के अंदर इतनी सारी सामग्री इकट्ठा हो गई कि जिन्होंने पहले प्रतिभा जी को नहीं पढ़ा था, वे भी इस बारे में कई रचनात्मक तथ्यों से अवगत होने लगे। हिदीप्रेमियों के फ़ेसबुक वाल पर प्रतिभा जी की नई-पुरानी तस्वीरें साझा होने लगीं। साथ में सबके अपने मूल्यांकन और टिप्पणियां। हिदी की कई पत्रिकाओं ने इस अवसर पर या तो अपने विशेषांक निकाले या फिर प्रतिभा राय की कहानियों को पुनर्पाठ के लिए पाठकों को प्रस्तुत किया। ईमानदारी से कहूं तो पुरस्कार की घोषणा के बाद ही मैंने भी प्रतिभा जी के बारे में काफी कुछ पढ़ा और जाना-समझा। खासतौर पर उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'द्रौपदी’
को लेकर।
प्रतिभा राय भारतीय साहित्यकारों की उस पीढ़ी की हैं, जिन्होंने गुलाम नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में अपनी आंखें खोलीं। लिहाजा, अपनी अक्षर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने स्वतंत्र लीक गढ़ने का हौसला दिखाया। उडिèया से बाहर का रचना संसार उनके इस हौसले से ज्यादा करीब से तब परिचित हुआ, जब उनका उपन्यास आया- 'द्रौपदी’। भारतीय पौराणिक चरित्रों को लेकर नवजागरण काल से 'सुधारवादी साहित्य’ लिखा जा रहा है, जिसमें ज्यादा संख्या काव्य कृतियों की है। कथा क्षेत्र में इस तरह का कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ।
समकालीन जीवन के गठन और चिताओं को लेकर एक बात इधर खूब कही जाती है कि साहित्य के मौजूदा सरोकारों पर खरा उतरने के लिए अब 'बिबात्मक’ औजार से ज्यादा जरूरी है- 'कथात्मक हस्तक्षेप’। मौजूदा भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी दुराग्रहों पर हमला बोलने के लिए प्रतिभा राय ने इस दरकार को समझा। 'द्रौपदी’ में वह विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर सामाजिक नजरिया, पति-पत्नी संबंध और स्त्री प्रेम को लेकर काफी ठोस धरातल पर संवाद करती हैं। इस संवाद में वह एक तरफ जहां पुरुषवादी आग्रहों को चुनौती देती हैं, वहीं भारतीय स्त्री के गृहस्थ जीवन को रचने वाली विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर भी वह संवेदनात्मक सवाल खड़ी करती हैं।
बहरहाल, 'द्रौपदी’ उपन्यास की रचयिता का रचना संसार काफी विषद और विविधतापूर्ण है। कथा साहित्य के साथ कविता के क्षेत्र में भी वह अधिकारपूर्वक दाखिल हुई हैं। उनका रचनाकर्म अभी न तो थका है और न ही विराम के करीब है, इसलिए उनसे आगे और महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों की उम्मीद है।

सोमवार, 17 नवंबर 2014

ऐसे तो लौटने से रहे महात्मा


समय से हम सब बंधे हैं पर समय को बांधने की भी हमारी ललक रहती है। तभी तो समय को जीने से पहले ही हम उसके नाम का फैसला कर लेते हैं। यह ठीक उसी तरह है, जैसे बच्चे के जन्म के साथ उसका नामकरण संस्कार पूरा कर लिया जाता है। यह परंपरा हमारी स्वाभाविक वृत्तियों से मेल खाती है।
जिस 21वीं सदी में हम जी रहे हैं, उसका आगमन बाद में हुआ नामकरण पहले कर दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी इसे कंप्यूटर और सूचना क्रांति की सदी बताते थे। उनकी पार्टी आज भी इस बात को भूलती नहीं और देश को जब-तब इस बात की याद दिलाती रहती है। बहरहाल, बात इससे आगे की। 21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिसक प्रयोगों को आजमाया गया तो फिर से एक बार समय के नामकरण की जल्दबाजी देखी गई। भारतीय मीडिया की तो छोड़ें अमेरिका और इंग्लैंड से निकलने वाले जर्नलों और अखबारों में कई लेख छपे, बड़ी-बड़ी हेडिग लगी कि भारत में एक बार फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण और उन्हें सशक्त बनाने के लिए खासतौर पर देशभर के युवा एकजुट हो रहे हैं। सूचना और तकनीक के साझे के जिस दौर को गांधीवादी मूल्यों का विलोमी बताया जा रहा था, अचानक उसे ही इसकी ताकत और नए औजार बताए जाने लगे। नौबत यहां तक आई कि थोड़ी हिचक के साथ देश के कई गांवों-शहरों में रचनात्मक कामों में लगी गांधीवादी कार्यकर्ताओं की जमात भी इस लोक आलोड़न से अपने को छिटकाई नहीं रख सकी। वैसे कुछ ही महीनों के जुड़ाव के साथ इनमें से ज्यादातर लोगों ने अपने को इससे अलग कर लिया।
इस सिलसिले में एक उल्लेख और। भाजपा के थिक टैंक में शामिल रहे सुधींद्र कुलकर्णी ने अपनी किताब 'म्यूजिक ऑफ द स्पीनिग व्हील’ में तो इंटरनेट को गांधी का आधुनिक चरखा तक बता दिया। कुलकर्णी ने अपनी बात सिद्ध करने के लिए तमाम तर्क दिए और यहां तक कि खुद गांधी के कई उद्धरणों का इस्तेमाल किया। कुलकर्णी के इरादे पर बगैर संशय किए यह बहस तो छेड़ी ही जा सकती है कि जिस गांधी ने अपने 'हिद स्वराज’ में मशीनों को शैतानी ताकत तक कहा और इसे मानवीय श्रम और पुरुषार्थ का अपमान बताया, उसकी सैद्धांतिक टेक को कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी परावलंबी तकनीक और भोगवादी औजार के साथ कैसे मेल खिलाया जा सकता है।
संयोग से गांधी के 'हिद स्वराज’ के भी सौ साल पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर गांधीवादी विचार के तमाम अध्येताओं ने एक सुर में यही बात कही कि इस पुस्तक में दर्ज विचार को गांधी न तब बदलने को तैयार थे और न आज समय और समाज की जो नियति सामने है, उसमें कोई इसमें फ़ेरबदल की गंुजाइश देखी जा सकती है।
अब ऐसे में कोई यह बताए कि साधन और साध्य की शुचिता का सवाल आजीवन उठाने वाले गांधी की प्रासंगिकता और उनके मूल्यों की 'रिडिस्कवरी’ की घोषणा ऐसे ही तपाक से कैसे की जा सकती है? तो क्या गांधी के मूल्य, उनके अहिसक संघर्ष के तरीकों की वापसी की घोषणा में जल्दबाजी की गई। अगर आप देश में 'आप’ की राजनीति पर नजदीकी नजर रख रहे होंगे तो इस सवाल का जवाब आपको जरूर मिल गया होगा।

सोमवार, 3 नवंबर 2014

व्रत नहीं एक जरूरी सबक भी है छठ


कुछ साल पहले 'बेस्ट फॉर नेक्स्ट कल्चरल ग्रुप’ से जुड़े कुछ लोगों ने बिहार में गंगा, गंडक, कोसी और पुनपुन नदियों के घाटों पर मनने वाले छठ व्रत पर एक डॉक्यूमेट्री बनाई। इन लोगों को यह देखकर खासी हैरत हुई कि घाट पर उमड़ी भीड़ कुछ भी ऐसा करने से परहेज कर रही थी, जिससे नदी का जल प्रदूषित हो। लोक विवेक की इससे बड़ी पहचान क्या होगी कि जिन नदियों के नाम तक को हमने इतिहास बना दिया है, उनके नाम आज भी छठ गीतों में सुरक्षित हैं। कविताई के अंदाज में कहें तो छठ पर्व आज परंपरा या सांस्कृतिक पर्व से ज्यादा सामयिक सरोकारों से जुड़े जरूरी सबक याद कराने का अवसर है। एक ऐसा अवसर जिसमें पानी के साथ मनमानी पर रोक, प्रकृति के साथ साहचर्य के साथ जीवन जीने का पथ और शपथ दोनों शामिल हैं। कविताई के अंदाज में कहें तो- पनघट-पनघट पूरबिया बरत / बहुत दूर तक दे गई आहट /शहरों ने तलाशी नदी अपनी/ तलाबों पोखरों ने भरी पुनर्जन्म की किलकारी / गाया रहीम ने फिर दोहा अपना / ऐतिहासिक धोखा है पानी के पूर्वजों को भूलना...।
प्रकृति के साथ छेड़छाड़ रोकने और जल-वायु को प्रदूषणमुक्त रखने के लिए किसी भी पहल से पहले यूएन चार्टरों की मुंहदेखी करने वाली सरकारें अगर अपने यहां परंपरा के गोद में खेलते लोकानुष्ठानों के सामथ्र्य को समझ लें तो मानव कल्याण के एक साथ कई अभिक्रम पूरे हो जाएं। पर सबक की पुरानी लीक छोड़कर बार-बार गलती और फिर नए सिरे से सीखने की दबावी पहल ही आज हमारे शिक्षित और जागरूक होने की शर्त हो गई है। एक ऐसा शर्तनामा जिसने मानवीय जीवन के हिस्से निखार कम बिगाड़ के रास्ते को ज्यादा सुदीर्घ और चौड़ा किया है। 
बावजूद इसके गनीमत यह है कि लोक और माटी से जुड़े होने की ललक अब भी ढेर नहीं हुई है। बात करें छठ व्रत की तो दिल्ली, मुंबई, पुणे, चंडीगढ़, अहमदाबाद और सूरत के रेलवे स्टेशनों का नजारा वैसे तो दशहरे के साथ ही बदलने लगता है। पर दिवाली के आसपास तो स्टेशनों पर तिल रखने तक की जगह नहीं होती है। इन दिनों पूरब की तरफ जानेवाली ट्रेनों के लिए उमड़ी भीड़ यह जतलाने के लिए काफी होती हैं कि इस देश में आज भी लोग अपने लोकोत्सवों से किस कदर भावनात्मक तौर पर जुड़े हैं। तभी तो घर लौटने के लिए उमड़ी भीड़ और उत्साह को लेकर देश के दूसरे हिस्से के लोग कहते हैं, अब तो छठ तक ऐसा ही 
चलेगा, भैया लोगों का 'बड़का पर्व’ जो शुरू हो 
गया है।’
वैसे इस साल छठ अच्छे दिनों के सांस्कृतिक आहट के रूप में भी महसूस किया जा रहा है। एक ऐसी आहट जिसे न तो किसी मोबाइल क्लिप में सुना जा सकता है, न ही सौ करोड़ी फिल्मी तमाशे की 'किक’ में। कुछ साल पहले भैया लोगों के विरोध का भी हिसक आलम देश ने देखा है। नफरत और विरोध का यह सिलसिला अब पूरब से हटकर पूर्वोत्तरी हो गया है। यह देश की सामासिक सांस्कृतिक बनावट को तहस-नहस करने वाली स्थिति है। समय रहते अगर इस बारे में हम नहीं चेते तो समाज, परंपरा और संस्कृति के सामासिक साझे ेकी हमारी विरासत पूरी तरह से छिन्न-भिन्न 
हो जाएगी। 
बहरहाल, इन स्थितियों के बावजूद जब सार्वजनिक जीवन में शुचिता और स्वच्छता जैसे मुद्दे राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बनें और यह ललक दिल्ली के लाल किले से पूरे देश में पहुंचे तो यह भी कम संतोषप्रद स्थिति नहीं है। यह देश आजादी के बाद पहली बार ऐसा अनुभव कर रहा है जब नदियों खासतौर पर गंगा की स्वच्छता और सफाई जैसे मुद्दे राष्ट्रीय एजेंडे का हिस्सा बने हैं और वह भी सरकारी समझ-बूझ के कारण। 
यहां यह समझना भी जरूरी है कि सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स के उफानी दौर में 'विकसित हठ’ और 'पारंपरिक छठ’ की आपसदारी अगर किसी स्तर पर एक साथ टिकी है तो यह किसी गनीमत से कम नहीं। यह ग्लोबल दौर में सब कुछ गोल हो जाने के खतरे से हमें उबारता भी है और अपने जुड़ाव की पुरानी जमीन के अब तक पुख्ता होने के सबूत भी देता है। 
दिलचस्प है कि छठ के आगमन से पूर्व के छह दिनों में दिवाली, फिर गोवर्धन पूजा और उसके बाद भैया दूज जैसे तीन बड़े पर्व एक के बाद एक आते हैं। इस सिलसिले को अगर नवरात्र या दशहरे से शुरू मानें तो कहा जा सकता है कि अक्टूबर और नवंबर का महीना लोकानुष्ठानों के लिए लिहाज से खास है। एक तरफ साल भर के इंतजार के बाद एक साथ पर्व मनाने के लिए घर-घर में जुटते कुटुंब और उधर मौसम की गरमाहट पर ठंड और कोहरे की चढ़ती हल्की चादर। 
भारतीय साहित्य और संस्कृति के मर्मज्ञ वासुदेवशरण अग्रवाल ने इसी मेल को 'लोकरस’ और 'लोकानंद’ कहा है। इस रस और आनंद में डूबा मन आज भी न तो मॉल में मनने वाले फ़ेस्ट से भरता है और न ही किसी बड़े ब्रांड या प्रोडक्ट के सेल ऑफर को लेकर किसी आंतरिक हुल्लास से भरता है।
पिछले करीब दो दशकों में एक छतरी के नीचे खड़े होने की होड़ के बीच इस लोकरंग की एक वैश्विक छटा भी उभर रही है। हॉलैंड, सूरीनाम, मॉरिशस , त्रिनिडाड, नेपाल और दक्षिण अफ्रीका से आगे छठ के अघ्र्य के लिए हाथ अब अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में भी उठने लगे हैं। अपने देश की बात करें तो जिस पर्व को ब्रिटिश गजेटियरों में पूर्वांचली या बिहारी पर्व कहा गया है, उसे आज बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और असम जैसे राज्यों में खासे धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
बिहार और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इस साल भी नदियों ने त्रासद लीला खेली है। जानमाल को हुए नुकसान के साथ जल स्रोतों और प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंधों को लेकर नए सिरे से बहस पिछले कुछ सालों में और मुखर हुई है। कहना नहीं होगा कि लोक विवेक के बूते कल्याणकारी उद्देश्यों तक पहुंचना सबसे आसान है। 
याद रखें कि छठ पूरी दुनिया में मनाया जाने वाला अकेला ऐसा लोकपर्व है जिसमें उगते के साथ डूबते सूर्य की भी आराधना होती है। यही नहीं चार दिन तक चलने वाले इस अनुष्ठान में न तो कोई पुरोहित कर्म होता है और न ही किसी तरह का पौराणिक कर्मकांड। यही नहीं प्रसाद के लिए मशीन से प्रोसेस किसी भी खाद्य पदार्थ का इस्तेमाल निषिद्ध है। और तो और प्रसाद बनाने के लिए व्रती महिलाएं कोयले या गैस के चूल्हे की बजाय आम की सूखी लकड़ियों को जलावन के रूप में इस्तेमाल करती हैं। कह सकते हैं कि आस्था के नाम पर पोंगापंथ और अंधविश्वास के खिलाफ यह पर्व भारतीय लोकसमाज की तरफ से एक बड़ा हस्तक्षेप भी है, जिसका कारगर होना सबके हित में है। 

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

राम को रोमियो बनाने की सनक


भारत आज भी ईश्वर की लीलाभूमि जरूर है पर इसमें परंपरा की दो समानांतर और स्वतंत्र धाराएं हैं। एक तरफ मर्यादा पुरुषोत्तम की छवि है, तो दूसरी तरफ लीला पुरुषोत्तम की इमेज। राम और कृष्ण काव्य के जानकार इस अंतर को जीवन के दो शेड के रूप में देखते हैं। मर्यादा की ऊंचाई और व्यवहार के धरातल के बीच का अंतर ही जीवन सत्य है। इस सत्य से मुठभेड़ कभी कबीर जैसे फकीर ने की तो कभी गांधी जैसे महात्मा ने। हर बार निचोड़ यही निकला कि जीवन की सीध साध्य और साधन के एका के साथ जब तक तय होगी तब तक वह कल्याणकारी है। यही नहीं प्रेम और »ृंगार का लालित्य जीवन को सौरभ से भर देने के लिए जरूरी है पर यह दरकार भी तभी तक जीवन गीत के प्रेरक शब्द बन सकते हैं, जब तक यह दैहिकता की आग से बची रहे।
सांवले रंग के दो ईश्वर रूपों को हमारी आस्था और परंपरा के बीच इसलिए बड़ी जगह मिली है क्योंकि इन्हें हम दो जीवनशैलियों के रूप में देखते हैं। एक तरफ आरोहण और दूसरी तरफ अवगाहन। एक ही जीवन को जीने के दो भरपूर तरीके। पर इस समानांतरता को समाप्त करने का मतलब जीवन के द्बैत को अद्बैत में बदलना है। प्रतीकों को तोड़ना उतना ही कठिन है जितना उसे गढ़ना। न तो किसी प्रतीक को आप रातोंरात गढ़ सकते हैं और न उसे तोड़ सकते हैं। राम की मर्यादा से मुठभेड़ खतरनाक है। मर्यादा से छेड़छाड़ मर्यादित तो नहीं ही कही जाएगी, एक कमअक्ल हिमाकत भले इसे कह लें। संजय लीला भंसाली ने ऐसी ही हिमाकत की। उनकी फिल्म 'राम-लीला’ में गांव की लड़कियों से अपनी मर्दानगी के बारे में पूछने का मशविरा देने वाला नायक किसी टोले-मोहल्ले का टपोरी लगता है। पर पटकथा ऐसी लिखी गई है जैसे रामलीला का नया नाटकीय भाष्य चल रहा हो। पता नहीं भंसाली को क्या सूझी कि उन्होंने रोमियो को राम बनाना चाहा और सीता को जुलियट। उनकी फिल्म रामकथा पर आधारित नहीं है लेकिन नाम और बैकड्रॉप इमेजज से उन्होंने यह मुगालता दर्शकों के बीच जानबूझकर बनाए रखा है कि वे कोई नई रामकथा कह रहे हैं। यह कोई नई साहसिक उड़ान नहीं बल्कि सीधे-सीधे रचनात्मक दगाबाजी थी।

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

परिवर्तन का दारोमदार महज आप पर नहीं


संभावनाओं के पूरे होने से ज्यादा जरूरी है, उनका बने रहना। जीवन और समाज का संभावना रहित होना खतरनाक है। ये बातें आज भारतीय राजनीति के संदर्भ में समझनी जरूरी है। इन दिनों देश में राजनीति काफी गरमाई हुई है। दो-तीन महीने में लोकसभा चुनाव होने हैं। दल और विचार की साझा ताकत सत्ता के गणित के आगे कमजोर पड़ रही है। बदलाव और विकल्प की सामयिक दरार को रेखांकित करने से तो किसी सियासी जमात को गुरेज नहीं है, पर इस पर पूरा जोर भी किसी का नहीं है। यह सब संभावनाओं के बड़े कैनवस को फिर से पुराने रंगों और चित्रों से भर जाने के अंदेशे की तरह है।
इस पूरी स्थिति को समझने के लिए थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो कई बातें साफ होंगी। बीते तीन सालों में भ्रष्टाचार को लेकर जो देशभर में आक्रोश दिखा, उसकी अगुवाई करने वाले नागरिक समाज के एक धड़े ने अपने सांगठनिक सामथ्र्य को राजनीतिक दल का रूप दिया। पर सत्ता तक पहुंचकर सत्तावादी आचरण को बदलने की अधीरता ने एक बड़ी कोशिश को कुछ ही महीनों में पटरी से उतार दिया। आम आदमी पार्टी के कार्यकताã और शुभचिंतक भी अब उससे कट रहे हैं। सदस्यता अभियान के नाम पर करोड़ का आंकड़ा छूने का दावा जरूर किया जा रहा है पर कमिटेड वर्क फोर्स के नाम पर पार्टी के पास गिनती के नाम हैं। यही नहीं महिला अस्मिता जैसे मुद्दे पर पार्टी की सोच और उसकीसरकार के मंत्री के आचरण की हर तरफ कठोर निंदा हो रही है। पार्टी के संस्थापक सदस्याओं में से एक मधु भादुड़ी सीधा आरोप लगा रही हैं कि पार्टी को कुछ लोगों ने हाईजैक कर लिया है। पार्टी के अंदर चुनाव जीतने और सत्ता की राजनीति करने का पागलपन इस कदर बढ़ गया है कि भिन्न स्वरों और वैकल्पिक रायों को पार्टी के अंदर कोई सुनने को तैयार नहीं है।
मधु आगे बढ़कर यहां तक कहती हैं कि इस पार्टी में और बातें तो छोड़ दीजिए महिलाओं को 'इंसान’ तक नहीं समझा जा रहा। गौरतलब है कि मधु आप के राष्ट्रीय अधिवेशन में खिड़की एक्सटेंशन में आधी रात को दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की अगुवाई में हुए महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक सलूक के मामले को उठाना चाहती थीं। उनकी मांग और मंशा इतनी भर थी कि पार्टी को इस मामले में अपनी चूक मान लेनी चाहिए और खुद से आगे बढ़कर माफी मांगनी चाहिए। पर माफी की बात तो दूर उन्हें इस मामले में पार्टी फोरम पर अपनी पूरी बात कहने तक से रोका गया।
आप से निकाले गए विधायक विनोद कुमार बिन्नी की राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को देखते हुए उनके उठाए सवालों को अगर एक किनारे कर भी दें तो भी एक बात तो साफ जाहिर हो रही है कि इस पार्टी ने अपने लिए जो उच्च राजनीतिक मानदंड तय किए थे, वह आज उस पर खुद खरी नहीं उतर रही है। ऐसा नहीं होता तो सरकार बनाने और तमाम अहम मुद्दों पर जनता की राय से अपना रुख तय करने वाली पार्टी अपने विधायक को बिना जनता से राय लिए कम से कम बाहर का रास्ता नहीं दिखाती।
आप को लेकर ये सारी बातें इसलिए क्योंकि उसके उदय और संघर्ष की परिघटना ने ही देश में राजनीतिक बदलाव और विकल्प की संभावना को रेखांकित किया था। भूले नहीं हैं लोग कि जब इस पार्टी ने दिल्ली में डेढ़ दशक से चल रही कांग्रेस सरकार को महज आठ सीट तक सीमित कर दिया तो राहुल गांधी ने मीडिया के सामने आकर बयान दिया कि आप से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। खासकर उसने जिस तरह कम समय में लोगों को अपने से जोड़ा। आज उसी राहुल गांधी की तरफ से अखबारों में विज्ञापन छप रहा है- 'अराजकता नहीं प्रशासन सुधार’। साफ है कि निशाने पर सीधे-सीधे खुद को अराजक कहने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार है। इससे पहले गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भी परोक्ष रूप से दिल्ली सरकार के कामकाज पर टिप्पणी कर चुके हैं।
दरअसल, अब सवाल यह नहीं है कि क्या आम आदमी पार्टी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और इतिहास बदलने की जल्दबाजी में देश में लोकतांत्रिक परिवर्तन की एक बड़ी संभावना हाशिए पर खिसकती जा रही है, खारिज होती जा रही है? नया सवाल तो यह है कि क्या संभावना और उसके बूते परिवर्तन की ऐतिहासिक पटकथा लिखने का लाइसेंस सिर्फ आप और उसके मुट्ठी भर नेताओं के पास है। पिछले एक महीने में दिल्ली की सड़कों से लेकर सचिवालय के अंदर-बाहर दिखी नौटंकी ही क्या देश के भविष्य के चित्र हैं? निश्चित रूप से इसका जवाब नहीं है।
देश में परिवर्तन की गहराती संभावनाओं की बात इसलिए नहीं शुरू हुई कि ऐसा सिविल सोसायटी की नुमाइंदगी करने वाले कुछ लोग या कोई पार्टी ऐसा कह रही थी। दरअसल, इसके पीछे बीते कुछ सालों में देश की सड़कों पर बार-बार खुलकर प्रकट हुई वह जनाकांक्षा रही, जिसने लोकतंत्र में जन साझीदारी की दरकार के लिए सियासी जमातों के आगे खासा दबाव बनाया। बाकी दलों औरआप में फर्क बस यह रहा कि बाकी ने इस सामयिक दरकार को गंभीरता से नहीं लिया और आप ने इसे अपना एजेंडा बना लिया। यह अलग बात है कि सत्ता की राजनीति में उतरी यह नई पार्टी भी अब अपने इस एजेंडे को लेकर पहले की तरह गंभीर नहीं है।
यह स्थिति उन तमाम दलों के लिए चूक सुधार के एक मौके की तरह है जो कल तक आप के सियासी उदय को अपने लिए कहीं न कहीं खतरा मान रहे थे। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से लेकर कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय ठहराए जाने वाले नेता राहुल गांधी को इस बाबत खासतौर पर ध्यान देना चाहिए। इन दोनों नेताओं पर ही कहीं न कहीं दारोमदार है कि वे लोकसभा चुनाव के एजेंडे को क्या शक्ल देते हैं। जनता पर नहीं बल्कि जनता के साथ मिलकर शासन चलाना, सत्ता का विकेंद्रीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर पहल के साथ अगर देश की दोनों चोटी की पार्टियां अपनी तैयारी और सोच के साथ इस बार जनता के सामने वोट मांगने जाएं तो यह जनभावना के अनुरूप होगा। साथ ही यह देश में पारंपरिक की जगह वैकल्पिक राजनीति के प्रयोग की बड़ी मुश्किल से बनी संभावना को एक अंजाम तक पहुंचाने के ऐतिहासिक अभिक्रम से जुड़ने जैसा भी होगा।
चुनाव के दौरान स्वार्थपूणã गठजोड़ और एक दूसरे के खिलाफ तीखे व घटिया आरोप-प्रत्यारोप का अतिवाद अब निश्चित रूप से दरकना चाहिए। इतिहास और विचार के तमाम सुलेखों को अपने नाम दर्ज होने का दावा करने वाली देश की दोनों महत्वपूर्ण पार्टियों को यह साहस दिखाना चाहिए कि वे एक-दूसरे से बेहतर संभावना के नाम पर भिड़ें न कि घटिया सियासी सलूक के नाम पर।
 

बुधवार, 22 जनवरी 2014

आप नहीं बदलाव का सारथी


बीते तीन-चार दिनों के घटनाक्रम में देश की राजनीति ने अपने लिए नई व्याख्या और विमर्श की चौहद्दी को और बढ़ा दिया है। निराश वे लोग ज्यादा हैं जिन्हें अब भी लोकतंत्र की व्यवस्था 'इनक्लूसिव’ की जगह 'इंपोजिंग’ ही पसंद आ रही है। 21वीं सदी का दूसरा दशक देश में जिस तरह के लोकतांत्रिक तकाजे को बहस के केंद्र में लेकर आया है, उसकी बुनियादी दरकार ही यही है कि जनकल्याण का ढिंढ़ोरा पीटकर सियासी रोटियां सेंकने के दिन बीत गए। अब तो विकास का कोरा नारा भी व्यापक लोकमत के निर्माण में कारगर औजार साबित होगा, ऐसा कहना जोखिम भरा है। ये तमाम स्थितियां एक ही सवाल को बार-बार रेखांकित कर रही हैं कि जनता और सरकार का अस्तित्व एक दूसरे से जुदा या एक के ऊपर एक की बजाय साझा क्यों नहीं हो सकता? और अगर ऐसा नहीं हो सकता तो फिर लोकतंत्र में लोक की उपस्थिति कहां है और किस भूमिका के साथ है?
जिन बीते तीन-चार दिनों की हम बात कर रहे हैं उसमें एक तरफ कांग्रेस पार्टी और उनके सबसे लोकप्रिय करार दिए जाने वाले नेता राहुल गांधी बार-बार ये समझाने में लगे रहे कि उनकी सरकार ने जनता को जितना अधिकार संपन्न बनाया है, उसके लिए जितने प्रत्यक्ष लाभाकरी कदम उनकी सरकार ने उठाए हैं, उतना किसी ने नहीं किया है। आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी अपनी इन उपलब्धियों के नाम पर जनता से वोट के रूप में अपने लिए श्रेय चाह रही है।
2००9 में जब कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए दोबारा सत्ता में आई थी तो सबने एक तरफ से कहा था कि मनरेगा का जादू काम कर गया। अब जबकि इस साल फिर चुनाव होने हैं तो मनरेगा जैसी मेगा योजना तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। यही नहीं इस दौरान यूपीए-एक और दो के कार्यकाल के कई बड़े घोटाले और वित्तीय अनियमितताओं के मामले भी इस दौरान सामने आए। सूचना के अधिकार कानून के तहत एक के बाद एक खुलासे हुए कि सरकार जिस तरह काम कर रही है, उसमें भ्रष्टाचार से चुनौती से निपटने का कोई कारगर मैकेनिज्म नहीं है। एकाधिक मामलों में सीएजी ने कहा कि फैसले लेने के तरीके में ही नहीं मंशा में भी गलतियां हुई हैं। ऐसे में 'पॉवर वैक्यूम’ से लेकर 'पॉलिसी पैरालाइज’ तक के तमगे सरकार को मिले। फिर इस बीच जिस तरह जनता महंगाई और विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार से जूझती रही, उससे कुल मिलाकर एक मोहभंग की स्थिति पैदा हुई।
दिलचस्प है कि राहुल गांधी इन स्थितियों के बावजूद चीजों को कामचलाऊ तरीके से समझना चाह रहे हैं। सुधार और परिवर्तन के नाम पर वे महज रफ्फूगिरी से काम चलाना चाहते हैं। अपनी गलतियों और असफलताओं को वे उपलब्धियां गिनाकर ढकना चाहते हैं। यह एक आत्मघाती सोच है। पहले उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में फिर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में जिस तरह पार्टी को मुंह की खानी पड़ी, उससे कांग्रेस उपाध्यक्ष की आंख अब तक खुल जानी चाहिए थी।
इस मोहभंग का भाजपा अपने तरीके से लाभ उठाना चाहती है। नरेंद्र मोदी के दबंग और सम्मोहक नेतृत्व को सामने लाकर पार्टी को लगता है कि केंद्र में दस साल की सत्ता की केंद्रित जड़ता को वह तोड़ देगी। मोदी अपनी तरह से विकास की बात करते हैं, देश के लोगों खासतौर पर युवाओं के पुरुषार्थ में भरोसा दिखलाते हैं, साथ भी बिजली, सड़क, पानी, उद्योग और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में गुजरात में किए गए अपने सफल प्रयोगों से लोगों में इस बार के चुनाव में परिवर्तन का विकल्प अपनी तरफ स्थिर करने का यत्न करते हैं। रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में जब वे बोलने के लिए खड़े हुए तो उनकी नजर में देश के नवनिर्माण का एक पूरा ब्लू प्रिंट था। उन्होंने लंबा भाषण ही नहीं दिया, तकरीबन सभी मुद्दों पर अपनी राय और सोच भी सबके सामने रखी।
पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही एक बात में चूक कर रही है। वह चूक यह है कि जिस मतदाता के पास आखिरकार उन्हें जाना है, उसकी बदली सोच को रीड करने में दोनों से कहीं न कहीं भूल हो रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन के बाद मीडिया से लेकर देश में बहस के तमाम चौपालों पर अगर यह बात हो रही है कि देश वैकल्पिक राजनीति की तरफ बढ़ रहा है तो यह बात देश की दोनों बड़ी पार्टियों को न सिर्फ समझ में आनी चाहिए बल्कि इसका फर्क उनकी कार्यनीति और आचरण में भी आना चाहिए। सिर्फ यह कह देना कि प्रातिनिधिक की जगह प्रतिभाग के लोकतंत्र की तरफ हम कदम बढ़ाएंगे, काम नहीं चलेगा। देश की जनता के इस आंदोलनात्मक रुझान को पार्टियों को अपने विजन और एक्शन दोनों में ट्रांसलेट करके दिखाना होगा।
दोनों दलों को याद रखना पड़ेगा कि बीते तीन-चार सालों में जनता अगर एकाधिक बार भ्रष्टाचार और महिला असुरक्षा के खिलाफ उतरी है तो यह कौल किसी पार्टी या नेता का नहीं था। देश की सिविल सोसाइटी ने अपने को आगे किया और देश में व्यवस्था परविर्तन की छटपटाहट को सड़क पर ला दिया। आम आदमी पार्टी इसी छटपटाहट का नतीजा है। यह पार्टी अपनी नीति और एजेंडे को लेकर आज जरूर कंफ्यूज्ड जरूर दिखाई पड़ती है पर उसके उन्नयन में कहीं न कहीं वैकल्पिक राजनीति की तलाश शामिल है।
आप से घबराए दलों के लिए शुक्र की बात यह है कि विचार और संगठन के स्तर पर उसकी लड़खड़ाहट साफ तौर पर जाहिर हो रही है। दिल्ली में सरकार बनाने के बाद गवर्नेंस के स्तर पर उसे उम्दा प्रदर्शन करके मिसाल पेश करनी चाहिए थी पर वह अब एक अराजकतावादी राह पर है। आप दिल्ली विधानसभा चुनाव के रिफ्लेक्शन को लोकसभा चुनाव में भी देखना चाहती है। इसलिए वह और उसकी सरकार फिर से सड़क पर प्रतिरोधी तेवर के साथ दिखना चाह रही है। यह आप की रणनीति कम असफलता ज्यादा है। यह उस उम्मीद के साथ भी नाइंसाफी है, जो आप ने लोगों के मन में राजनीतिक बदलाव के नाम पर जगाई थी।
पर आप के भटकाव के बावजूद यह कहीं से साबित नहीं होता कि देश की राजनीति में विकल्प का खाली स्पेस भरने की दरकार ही खारिज हो गई। भारतीय जन-गण का नया मन परंपरावादी राजनीति से वाकई तंग आ चुका है। देश की राजनीति में एक नई ताजी बयार को महसूस करने की तड़प मुट्ठियां बांध चुकी हैं। इन बंधी मुट्ठियों की ताकत को समझना होगा। भाजपा और कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह एक ही तरह के पॉलिटिकल कल्चर में कहीं न कहीं ढ़ल चुकी हैं। नई स्थितियों में जनता के बीच, जनता के साथ और जनता के बल पर ये पार्टियां अगर अपनी ताकत को गुणित नहीं करती हैं तो वह अपने सामथ्र्य के साथ बेईमानी करेंगी। खासतौर पर यह उम्मीद भाजपा को लेकर ज्यादा है क्योंकि वह केंद्र में पिछले दस सालों से सत्ता से बाहर है। वह देश के नागरिक समाज के साथ बेहतर संवाद कर अपनी संभावना में जादुई पंख लगा सकती है।
एक बात और यह कि परिवर्तन का पेटेंटे किसी एक नेता या आदमी के नाम पर दर्ज नहीं होता है। इसलिए सिविल सोसायटी की सक्रियता और आप के उभार को लेकर घबड़ाई हुई प्रतिक्रिया वही लोग दे रहे हैं, जिन्हें लग रहा है कि जनता इस उभार के साथ बंधक की तरह साथ है। दरअसल, देश में जनतांत्रिक सशक्तिकरण एक सामयकि दरकार है और इस दरकार को अपने सारोकारों में शामिल कर जो भी दल या नेता आगे बढ़ेंगे जनता उसके साथ होगी।
 

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

आप की सरकार को यहां से देखें


दिल्ली का राजनीतिक कुहासा छट गया है। अब आम आदमी पार्टी सरकार बनाने को राजी है। पर अब तक के घटनाक्रम में और कुछ हुआ हो या नहीं, पारंपरिक राजनीति के आगे एक वैकल्पिक लीक खींची जा सकती है, यह संभावना कहीं न सहीं संभव होती दिख रही है। दिल्ली विधानसभा के नतीजे जब आठ दिसंबर को आए तो उसके साथ यह धर्मसंकट भी आया कि यहां अगली सरकार कैसे बनेगी और कौन बनाएगा? त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति कोई देश में पहली बार नहीं बनी है। बल्कि सच तो यह है कि केंद्र में भी यह स्थिति एकाधिक बार रही है। पर सरकारें हर बार बनी हैं। कई बार आधे-अधूरे कार्यकाल के लिए तो कई बार पूरे कार्यकाल के लिए। पर दिल्ली में चुनकर आई त्रिशंकु विधानसभा से सरकार गठन की राह दुश्वार इसलिए हो गई क्योंकि एक साल पहले खड़ी हुई एक पार्टी ने 28 सीटें जीतकर एक बदली राजनीतिक स्थिति का संकेत सभी दलों को दे दिया।
दिल्ली में सरकार बनाने के लिए जरूरी आंकड़ा 36 का है। कांग्रेस महज आठ सीटें जीतकर पहले ही सत्ता के रेस से बाहर हो गई। भाजपा के अगुवाई वाली राजग भी बहुमत के आंकड़े से चार सीट पीछे रही। रही आप तो उसे आठ सीटें मिलीं। भाजपा के लिए दिल्ली में बहुमत का आंकड़ा जुगाड़ना कोई बड़ी बात नहीं होती। हाल के वर्षों में भी वह कर्नाटक से लेकर झारखंड तक जोड़तोड़ का यह खेल खेल चुकी है। पर दिल्ली में यह मुमकिन इसलिए नहीं हो सकता था क्योंकि पिछले कम से कम तीन सालों में आम आदमी के भ्रष्टाचार और महिला असुरक्षा के खिलाफ आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी ने राजनीतिक शुचिता की एक नई चुनौती खड़ी कर दी। देश में यह अपने तरह की संभवत: पहली सूरत थी जिसमें कोई भी दल सरकार बनाने के लिए आगे आने को तैयार नहीं दिखा। मीडिया ने इसे आम आदनी पार्टी द्बारा तय किए गए 'मॉरल इंडेक्स’ का नाम दिया। दिलचस्प है ऐसे दौर में जब किसी पॉलिटक डेवलेपमेंट के प्रभाव को सेंसेक्स के चढ़ने-उतरने से जोड़कर देखा जाना एक जरूरी दरकार बन गई हो, उस दौर में सेंसेक्स से बड़ी खबर और चर्चा उस मॉरल इंडेक्स की हो रही है, जो लोकतंत्र में जनता की एक दिन की मतदान की भागीदारी से आगे एक सतत प्रक्रिया को आजमाए जाने की वकालत कर रही है।
 पिछले 14 दिसंबर को दिल्ली के उपराज्यपाल ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के उपराज्यपाल ने सरकार बनाने की संभावना पर विचार करने के लिए बुलाया था। आप की तरफ से यह पहले ही साफ कर दिया गया था कि वह न तो किसी दल से समर्थन लेगी और न ही किसी को समर्थन देगी। पर देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने इस बीच एक नया सियासी दांव खेला। केजरीवाल उपराज्यपाल से मिलने पहुंचते इससे पहले वहां कांग्रेस की यह चिट्ठी पहुंच चुकी थी कि वह आप को सरकार बनाने के लिए बाहर से बिना शर्त समर्थन देने को तैयार है। कांग्रेस के इस दांव से आप को अपने पुराने स्टैंड पर थोड़ा विचार करना पड़ा। क्योंकि इस दौरान ये बातें भी खूब हुईं कि आम आदमा पार्टी ने बिजली दर आधी करने और हर घर को 7०० लीटर पानी देने जैसे जो चुनावी वादे किए हैं, उससे वह पूरा नहीं कर सकती है। क्योंकि ऐसा करना न तो संभव है और न ही व्यावहारिक। लिहाजा उसकी पूरी कोशिश होगी कि वह सरकार बनाने से बचे।
आप के नेताओं ने इस बदले राजनीतिक खेल को समझा।उसने तय किया कि वह इस पूरी स्थिति को एक बार फिर से जनता की अदालत में ले जाएगी और उससे ही पूछेगी कि क्या उसे सरकार बनानी चाहिए। जो खबरें हैं, उसमें आप ने दिल्ली में 25० से ज्यादा सभाएं की। जनता ने भारी बहुमत से आप को सरकार बनाने के लिए आगे बढ़ने को कहा। अब आप इस पॉलिटकल स्टैंड के साथ सरकार बनाने जा रही है कि वह किसी दल के समर्थन या विरोध के आधार पर नहीं बल्कि जनता की राय पर सरकार बनाने जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में पहली नजर में एक गैरजरूरी नाटकीयता आप के नेताओं की तरफ से नजर आती है। एक बार चुनाव संपन्न हो जाने के बाद फिर से जनता के पास जाने का क्या तुक है? ऐसी दरकार हमारी संवैधानिक व्यवस्था की भी देन नहीं है। फिर भी ऐसा किया गया। दरअसल, इसका जवाब वे मुद्दे हैं जो गुजरे दो-तीन सालों में बार-बार उठे। लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एक दिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से क्या पूरी हो जाती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद सर्वोच्च संस्था है पर क्या उसकी यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है? क्या सरकार और संसद सिर्फ नीतियों और योजनाओं का निर्धारण जनता के लिए करेंगे या फिर इस निर्णय प्रक्रिया में जनता की भी स्पष्ट भागीदारी सुनिश्चत होनी चाहिए? केंद्रीकृत सत्ता लोकतांत्रिक विचारधारा के मूल स्वभाव के खिलाफ है तो फिर उसका पुख्ता तौर पर विकेंद्रीकरण क्यों नहीं किया जा रहा है? पंचायती राज व्यवस्था को अब तक सरकार की तरफ से महज कुछ विकास योजनाओं को चलाने की एजेंसी बनाकर क्यों रखा गया है, उसका सशक्तिकरण क्यों नहीं किया जा रहा है?
ऐसा लगता है कि आप स्थानापन्नता की राजनीति की बजाय विकल्प की राजनीति को एक स्वरूप देने के मकसद से आगे बढ़ना चाहती है। देश में साढ़े छह दशक से भी लंबे दौर में जो सियासी व्यवस्था जड़ जमा चुकी है, उसे एक भिन्न समझ के साथ देखने-समझने की तैयारी और उस ओर अग्रसर होना कोई आसान काम नहीं है। पर आज बदलाव की जमीन पर शुरुआती तौर पर एक दल और उससे जुड़े लोग खड़े हैं तो यह जाहिर करता है कि इस विकल्प के प्रति जनता के मन में भी छटपटाहट कम नहीं है।
जनता के बीच जनता की राजनीति को तो शक्ल लेना ही चाहिए। यही तो जनतंत्र की बुनियादी दरकार है। पिछले कुछ दशकों में जनता के नाम पर भले खूब राजनीति हुई और उसे अस्मितावादी तर्किक निकष पर कसने की भी खूब कोशिश हुई पर जनतांत्रिक व्यवस्था में आमजन की स्पष्ट और प्रत्यक्ष प्रतिभागिता की चुनौती को स्वीकार करने से सब बचते रहे। आज अगर आप की दिल्ली की सरकार को इस प्रतिभागिता को सुनिश्चत करने की क्रांतिकारी पहल की बजाय अगर महज बिजली-पानी के भाव के मुद्दे पर केंद्रित करने की कोशिश हो रही है, तो इसलिए क्योंकि लोकतंत्र की राजनीति करने वाले दूसरे किसी दल के पास यह नैतिक साहस नहीं है कि वह जनता के नाम पर नहीं बल्कि जनता के साथ मिलकर अपनी राजनीति का गंतव्य तय करे। बहरहाल, आप की पहल एक नई राजनीति की शक्ल पूरी तरह ले पाएगी, इसमें संशय अब भी काफी है। पर इन संशयों के धुंध के बीच से ही कुछ सुनहरी किरणें अगर फूट रही हैं तो यह देश के भावी राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक शुभ संकेत है।
 

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

सलाम मदीबा

नेल्सन मंडेला के बारे में जिक्र करते हुए महात्मा गांधी का नाम स्वाभाविक तौर पर आता है। पर बीसवीं सदी के इन दोनों महानायकों को सीधे तौर पर एक-दूसरे की छाया बता देना एक असावधान कृत्य होगा। फिर दो बड़ी शख्सियतों का ऐसे भी आमने-सामने रखकर मूल्यांकन करना उनके साथ ज्यादती है। मंडेला निश्चत तौर पर गांधीवादी परंपरा के बड़े नायक थे। उनके संघर्ष ने साम्राज्यवाद और नस्लभेद की चूलें हिला दीं। दक्षिण अफ्रीका आज अगर विश्व के बाकी देशों के साथ बैठकर विकास और समृद्धि की बात कर रहा है तो इसके पीछे मंडेला का तीन दशक से भी लंबा संघर्ष है।
नस्लवाद साम्राज्यवाद का ऐतिहासिक तौर पर सबसे कारगर औजार रहा है। जब गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे तो रंगभेदी घृणा के वे खुद शिकार हुए थे। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए इस घृणा और हिंसा के खिलाफ लोगों को जागरूरक करने और संगठित संघर्ष शुरू करने का पहला श्रेय गांधी को ही है। बाद में संघर्ष की इस विरासत ने वहां एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप लिया।
मंडेला को इस बात का श्रेय जाता है कि दबे-सताए लोगों को संघर्ष की राह पर आगे बढ़ाने और फिर निर्णायक सफलता हासिल करने तक धैर्य और संयम बनाए रखना कितना जरूरी है, यह सीख उन्होंने अपने आचरण से दी। इस तरह का सकर्मक नायकत्व हासिल करना बड़ी उपलब्धि है। मंडेला आज अगर पूरी दुनिया में अन्याय और मानवीय दुराव के खिलाफ संघर्ष करने वालों के हीरो हैं तो अपनी इसी धैर्यपूणã शपथ के कारण।
27 साल का जीवन जेल की सलाखों के पीछे बीताने के बावजूद अपने संघर्ष की अलख को जलाए रखना कोई मामूली बात नहीं है। 199० में जब वे जेल से रिहा हुए तो देखते-देखते दुनिया के हर हिस्से में अन्याय के खिलाफ संघर्ष और क्रांतिकारी-वैचारिक गोलबंदी के जीवित प्रतीक बन गए। एक ऐसे दौर में जब दुनिया भले कहने को एक छतरी में खड़ी हो पर लैंगिक और नस्ली विभेद से लेकर मानवाधिकार हनन तक के मामले हमारी तमाम तरक्की और उपलब्धि को सामने से आंखें दिखा रहे हैं, संघर्ष के प्रतीक और नायक का बने और टिके रहना बहुत जरूरी है। आज अगर मंडेला हमारे बीच नहीं हैं तो सबसे बड़ा संकट यही है कि संघर्ष और व्यक्तित्व के करिश्माई मेल को देखने के लिए अब हमारी आंखें कहां टिकेंगी। संकट की इस घड़ी में आन सान स ूकी की तरफ बरबस ध्यान जाता है। हमारे लिए यह संतोष की बात है कि सू की हमारे बीच अभी हैं।
बहरहाल, एक बार फिर से जिक्र गांधी और मंडेला की। गांधी और मंडेला के बीच तमाम साम्य के बीच कुछ मौलिक भेद भी हैं। गांधी जिस तरह के'सत्यान्वेषी’ रहे उसमें सत्य-प्रेम और करुणा का साझा पहली शर्त है। इसकी अवहेलना करके गांधीवादी मूल्यों की बात नहीं की जा सकती। अलबत्ता, गांधी के कई अध्येताओं ने भी जरूर यह कबूला है कि यह एक ऐसा आदर्शवाद है, जिसे मानवीय दुर्बलताओं के बीच एक प्रवृत्ति की शक्ल देना कोई साधारण बात नहीं।
मंडेला के यहां गांधी का धैर्य और अटूट संघर्ष तो है पर वे साधन और साध्य की शुचिता के मामले में गांधी से थोड़े अलग खड़े दिखाई पड़ते हैं। इस अंतर को जैसे ही हम रेखांकित करते हैं तो हमारी समझ में यह बात आती है कि गांधी जिस रास्ते पर चले उस पर चलने वाले वे संभवत: अकेले पथिक थे। आइंस्टीन के शब्द भी हैं कि आने वाली नस्लों को तो यह भरोसा भी न हो कि हाड़-मांस के देह में गांधी जैसा व्यक्तित्व कभी जन्मा भी होगा।
मंडेला ने अपने जीवन में गांधी का स्मरण कई मौकों पर किया। वे महात्मा को एक शक्ति देने वाले प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में देखते थे। पर खुद मंडेला ने भी अपने को 'दूसरा गांधी’ कहे या माने जाने के नजरिए को एक भावुक सोच भर माना। उनके कई संस्मरणों में ऐसा जिक्र आता भी है। मंडेला के आगे एक ही मकसद था उस धरती को नस्लवादी जड़ता से मुक्त कराना, जो उनकी मातृभूमि है। आज अगर 'मदीबा’ दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपिता हैं, तो इसलिए क्योंकि आधुनिक विश्व के नक्शे पर इस देश को उन्होंने वह स्थान दिलाया, जिससे वह लंबे समय तक वंचित रहा था। दक्षिण अफ्रीका के इस महान सपूत ने तारीख के उन हर्फों को लिखा है, जिसने मनुष्य और मनुष्य के बीच खिंची हर लकीर को पूरी तरह अमान्य ठहरा दिया है।
 

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

एक बर्बर कृत्य


तेजाबी हमले के रूप में जिस तरह की घटना पर चर्चा और विमर्श की दरकार की बात आज हर तरफ हो रही है, वह एक बर्बर कृत्य के रूप में हमारे समय और समाज का तेजी से हिस्सा बनता जा रहा है। लड़कियों के चेहरे और शरीर पर तेजाब फेंककर उसकी पूरी जिंदगी तबाह करने की घटनाएं निश्चित तौर पर आपवादिक नहीं कही जा सकती हैं। पर इसके खिलाफ पहल करने के लिए न तो सरकार कभी सामने आई और न ही समाज ने अपनी तरफ से कुछ किया।
अगर किसी ने पहल की तो उस लड़की लक्ष्मी ने जो खुद ऐसी ही एक घटना की शिकार हुई थी। लक्ष्मी की 2००6 में दायर जनहित याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट का इसी साल 18 जुलाई को एक महत्वपूर्ण फैसला आया था। सर्वोच्च अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में तेजाब खरीदने और बेचने को लेकर सख्त नियम-कायदों का प्रावधान किया था। सुप्रीम कोर्ट ने बिना पहचान पत्र देखे तेजाब बेचने को गैरकानूनी बताया था। साथ ही केंद्र और राज्य की सरकारों से यह भी सुनिश्चित करने को कहा था कि कोई नाबालिग इसे किसी भी सूरत में नहीं खरीद सके। इसका मतलब यह कतई नहीं था कि बाजार में तेजाब बिकेगा ही नहीं, बल्कि जो तेजाब बाजार में खुले तौर पर बिकेगा वह त्वचा पर बेअसर होगा।
इस मामले में जस्टिस आरएम लोढ़ा और जस्टिस फकीर मोहम्मद की बेंच ने राज्य सरकारों से दो टूक लहजे में कहा था कि वे तेजाबी हमलों को लेकर गंभीरता दिखाएं और इसे गैरजमानती अपराध घोषित करें। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बाबत राज्य सरकारों को तीन महीने के भीतर नीतिगत स्पष्टता लाने और सारी प्रक्रियाएं तय करने को कहा था। सरकारों को ऐसे अपराध के मामले में पुनर्वास को लेकर भी नीति बनाने को कहा गया था।
इस पूरी सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने तेजाबी हमले की शिकार महिलाओं की जिंदगी को लेकर जहां एक गंभीर और संवेदनशील नजरिया बनाए रखा, वहीं सरकारों को इस मामले से कड़ाई से निपटने के लिए कहा। न्यायालय ने यही दरकार सरकारों के आगे भी रखी थी। यही कारण है कि अब जो सूरत बन रही है उसमें यह मुमकिन होता दिख रहा है कि केंद्र सरकार तेजाब को लेकर एक सख्त कानून का ड्राफ्ट देश के सामने लेकर आए। इस बारे में केंद्र सरकार अटार्नी जनरल से राय पहले ही मांग चुकी है। वैसे इस मामले में एक पेंच भी है। तेजाब की खरीद-बिक्री के आधार और तरीके तय करने का मामला राज्य सरकारों के अधीन है। इसलिए दो ही स्थितियां केंद्र सरकार के सामने है कि वह इस मामले में एक मॉडल कानून देश के सामने रखे और दूसरा यह कि वह राज्य सरकारों को ऐसी कानूनी पहल के लिए सख्त दिशानिर्देश दे।
सुप्रीम कोर्ट में इस बारे में अगली सुनवाई चार महीने बाद होनी थी। सर्वोच्च न्यायालय को उम्मीद थी कि इस दौरान सरकारों की तरफ से इस गंभीर मामले में उसके दिशानिर्देश के मुताबिक तेजी से कदम उठाए जाएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने 31 मार्च 2०14 तक की नई समयावधि इस काम के लिए तय की है। पर इस लापरवाही का क्या जो इतने संवेदनशील मामले में अब तक केंद्र और राज्य की सरकारों की तरफ से दिखाई गई है। नई मिली मोहलत में ये लापरवाही दूर हो जाएगी, ऐसी उम्मीद भले कर ली जाए पर इस पर यकीन तो कतई नहीं होता।
इसी साल संसद में यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून बनाते समय भी सरकार ने तेजाबी हमलों को एक गंभीर अपराध मानते हुए इस अपराध में कसूरवारों के खिलाफ सख्त सजा की बात कही थी। पर अब यह पूरा संदर्भ सुप्रीम कोर्ट के नए दिशानिर्देश आ जाने के बाद बदल गया है। केंद्र सरकार को पूरी स्थिति पर अब नए सिरे से गौर करना होगा।
वैसे यह पूरा मामला सिर्फ कानून से जुड़ा नहीं है। अगर इस तरह के कृत्य एक तेजी से बढ़ रही कुप्रवृत्ति की शक्ल अख्तियार कर रहे हैं तो इसके बारे में समाज को भी एक जागरूक पहल करनी होगी। सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स के दौर में यह समझना मुश्किल नहीं है कि तेजाबी हमले की शिकार अगर लड़कियों को बनाया जा रहा है तो इसके पीछे वजहें क्या हैं। बहुत गंभीर विमर्श की तरफ न भी जाएं तो इतनी बात तो जरूर हम समझ सकते हैं कि संबंध जब दैहिकता की शर्तों पर ही तय होंगे तो प्रेम संवेदनाओं के लिए स्पेस कहां रह जाएगा। टीवी-सिनेमा, विज्ञापन और लोकप्रियता के दायरे में आना वाला हर कंटेंट अगर हमें बस यही समझाए-बताए कि प्यार हासिल करके भोगने की चीज है और प्रेम वस्तुत: कलात्मक अभिव्यक्ति है तो फिर हसरत अगर हासिल होने से रह जाए तो कार्रवाई तो हिंसक और बर्बर ही होगी। हमारे समय का यह सच वाकई भयावह है और इस भयावहता को लंबे समय तक मानवता शायद ही सहन कर सके। लक्ष्मी ने तेेजाबी हमलों के खिलाफ जो संघर्ष छेड़ा है, उसका निर्णायक मुकाम तक पहुंचना मौजूदा समय की मांग है।

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

गांधीवादी दौर की वापसी का खंडित मिथक


समय को जीने से पहले ही हम उसके नाम का फैसला कर लेते हैं। यह ठीक उसी तरह है, जैसे बच्चे के जन्म के साथ उसका नामकरण संस्कार पूरा कर लिया जाता है। यह परंपरा हमारी स्वाभाविक वृत्तियों से मेल खाता है। समय की बात शुरू में इसलिए क्योंकि जिस 21वीं सदी में हम जी रहे हैं, उसका आगमन बाद में हुआ नामकरण पहले कर दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी इसे कंप्यूटर और सूचना क्रांति की सदी बताते थे। उनकी पार्टी आज भी इस बात को भूलती नहीं और देश को जब-तब इस बात की याद दिलाते रहते हैं।
बहरहाल, बात इससे आगे की। 21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिंसक प्रयोगों को आजमाया गया तो फिर से एक बार समय के नामकरण की जल्दबाजी देखी गई। भारतीय मीडिया की तो छोड़ें अमेरिका और इंग्लैंड से निकलने वाले जर्नलों और अखबारों में कई लेख छपे, बड़ी-बड़ी हेडिंग लगी कि भारत में एक बार फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण और उन्हें सशक्त बनाने के लिए खासतौर पर देशभर के युवा एकजुट हो रहे हैं। सूचना और तकनीक के साझे के जिस दौर को गांधीवादी मूल्यों का विलोमी बताया जा रहा था, अचानक उसे ही इसकी ताकत और नए औजार बताए जाने लगे। नौबत यहां तक आई कि थोड़ी हिचक के साथ देश के कई गांवों-शहरों में रचनात्मक कामों में लगी गांधीवादी कार्यकताओं की जमात भी इस लोक आलोड़न से अपने को छिटकाई नहीं रख सकी। वैसे कुछ ही महीनों के जुड़ाव के साथ इनमें से ज्यादातर लोगों ने अपने को इससे अलग कर लिया।
इस सिलसिले में एक उल्लेख और। भाजपा के थिंक टैंक में शामिल सुधींद्र कुलकर्णी ने अपनी किताब 'म्यूजिक ऑफ द स्पीनिंग व्हील’ में तो इंटरनेट को गांधी का आधुनिक चरखा तक बता दिया। कुलकर्णी ने अपनी बात सिद्ध करने के लिए तमाम तर्क दिए और यहां तक कि खुद गांधी के कई उद्धरणों का इस्तेमाल किया। कुलकर्णी के इरादे पर बगैर संशय किए यह बहस तो छेड़ी ही जा सकती है कि जिस गांधी ने अपने 'हिंद स्वराज’ में मशीनों को शैतानी ताकत तक कहा और इसे मानवीय श्रम और पुरुषार्थ का अपमान बताया, उसकी सैद्धांतिक टेक कोकंप्यूटर और इंटरनेट जैसी परावलंबी तकनीक और भोगवादी औजार के साथ कैसे मेल खिलाया जा सकता है।
संयोग से गांधी के 'हिंद स्वराज’ के भी चार साल पहले सौ साल पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर गांधीवादी विचार के तमाम अध्येताओं ने एक सुर में यही बात कही कि इस पुस्तक में दर्ज विचार को गांधी न तब बदलने को तैयार थे और न आज समय और समाज की जो नियति सामने है, उसमें कोई इसमें फेरबदल की गंुजाइश देखी जा सकती है। अब ऐसे में कोई यह बताया कि साधन और साध्य की शुचिता का सवाल आजीवन उठाने वाले गांधी की प्रासंगिकता और उनके मूल्यों की 'रिडिस्कवरी’ की घोषणा ऐसे ही तपाक से कैसे की जा सकती है। तो क्या गांधी के मूल्य, उनके अहिंसक संघर्ष के तरीकों की वापसी की घोषणा में जल्दबाजी की गई। और अगर ऐसा हुआ तो इस जल्दबाजी के कसूरवार तो मीडिया से लेकर राजनीतिक दल तक सभी हैं।
इस जल्दबाजी के नुकसान पर आगे चर्चा से पहले कुछ बातें उस चेहरे को लेकर जिसे समय के परिवर्तन का चेहरा बताया गया था, बनाया गया था। आज अण्णा हजारे क्या हैं और क्या कर रहे हैं इस पर जरूर अलग-अलग तरीके से टिप्पणियां की जा सकती हैं। उनके कई शुभचिंतकों और मुरीदों को भी इस बात का अफसोस है कि बदलाव की एक बड़ी लोक अंगराई के वे अगुवा होने के बावजूद वे आज देखते-देखते नेपथ्य में चले गए। पर बड़ा सवाल यह है कि क्या उनके द्बारा या उनके आंदोलन के जरिए उठाए गए मुद्दे भी नेपथ्य में चले गए हैं या बस कुछ महीने बीतते-बीतते पिट गए। वैसे खुद अण्णा अफने को चुका हुआ नहीं मानते हैं। आगामी 1० दिसंबर से वे फिर से अनशन पर बैठने वाले हैं सरकार पर शीतकालीन सत्र में जनलोकपाल बिल पास कराने का दबाव बनाने के लिए। कहना मुश्किल है कि इस बार उनके अनशन का असर क्या होगा, क्योंकि इस संघर्ष के उनके पुराने साथी आज उनके साथ नहीं हैं।
बहरहाल बात उन कुछ सवालों और मुद्दों की जो गुजरे दो-तीन सालों में बार-बार उठे। लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एक दिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से क्या पूरी हो जाती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद सर्वोच्च संस्था है पर क्या उसकी यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है? क्या सरकार और संसद सिर्फ नीतियों और योजनाओं का निर्धारण जनता के लिए करेंगे या फिर इस निर्णय प्रक्रिया में जनता की भी स्पष्ट भागीदारी सुनिश्चत होनी चाहिए? केंद्रीकृत सत्ता लोकतांत्रिक विचारधारा के मूल स्वभाव के खिलाफ है तो फिर उसका पुख्ता तौर पर विकेंद्रीकरण क्यों नहीं किया जा रहा है? पंचायती राज व्यवस्था को अब तक सरकार की तरफ से महज कुछ विकास योजनाओं को चलाने की एजेंसी बनाकर क्यों रखा गया है, उसका सशक्तिकरण क्यों नहीं किया जा रहा है?
ये तमाम वे मुद्दे और सवाल हैं, जो बीते कुछ सालों में जनता के बीच उभरे, खुली बहस का हिस्सा बने। जनता के मूड को देखते हुए या तो ज्यादातर राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने इनका समर्थन किया या फिर विरोध की जगह एक चालाक चुप्पी साध ली। पारदर्शी सरकारी कामकाज और उस पर निगरानी के लिए अधिकार संपन्न लोकपाल की नियुक्ति जैसे सवालों पर तो संसद तक ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी। चुनाव सुधार के मुद्दे पर भी तकरीबन एक सहमति हर तरफ दिखी। पर अब जब चुनाव हो रहे हैं। पहले पांच राज्यों के विधानसभाओं के और फिर अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं, तो इनमें से शायद ही कोई मुद्दा हो जो किसी राजनीतिक दल के चुनावी एजेंडे में शुमार हो। चुनावी वादे के नाम पर कच्ची-पक्की सड़कों के या तो किलोमीटर गिनाए जा रहे हैं या फिर मुफ्त अनाज या लैपटॉप बांटने के लालची वादे। अण्णा आंदोलन से छिटकर कर बनी आम आदमी पार्टी जरूर इनमें से कुछ मुद्दों को लेकर दिल्ली विधानसभा चुनाव में उतरी है, पर उनकी महत्वाकांक्षा और जल्दबाजी से उनके आदर्शवादी कदमों की व्यावहारिकता पर सवाल उठते हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि अपने दौर को पहचानने और उसे नाम देने में हम एक बार फिर से धोखा खा गए? क्या हमारा समय अभी किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था परविर्तन के लिए तैयार नहीं है। क्या देश की जनता की लोकतांत्रिक जागरुकता एक भावावेश भर है, जो देखते-देखते बीत जाता है।
दरअसल, ये सवाल चाहे जैसे भी पूछे जाएं उसका केंद्रीय उत्तर एक ही है। वह उत्तर यह है कि परिवर्तन कोई फैशनेबल चीज नहीं, जिसे जब चाहे प्रचलन में ला दिया और जब चाहे प्रयोग से बाहर कर दिया। फिर यह टू मिनट नूडल्स भी नहीं कि बस कुछ ही समय में बस जो चाहा हासिल कर लिया। यही नियति हाल में बनी परिवर्तनकारी स्थितियों की भी हुई। इसके नाम और परिणाम तय करने की भावुक स्वाभाविकता में हम भूल गए कि समय के तारीख के हर्फ ऐसे नहीं बदलते। फिर जिस राजनीतिक व्यवस्था ने पिछले छह दशकों से ज्यादा के समय में अपनी पकड़ का रकबा हमारे मानस तक फैला रखा है, उसकी बाहें मरोड़ना कोई आसान बात नहीं। निचोड़ यह कि संभावना तभी यकीनी है जब उसके संभव होने के आसार हों और नाम से नहीं बलिक कोई चीज अपने अंजाम से जानी-मानी जाती है।

सोमवार, 17 जून 2013

चलो अमेरिका

1999 में पीयूष झा की एक फिल्म आई थी चलो अमेरिका। इसमें वह पूरी मानसिकता चित्रित की गई थी कि आज के भारतीय युवाओं के लिए अमेरिका और वहां जाने का मतलब क्या है। यही नहीं अगर वह अमेरिका की धरती पर पैर नहीं रखता है तो कैसे उसके जीवन के सारे अरमान बिखर जाते हैं। जिंदगी की बड़ी से बड़ी जद्दोजहद से बड़ा है अमेरिका जाने का वीजा हासिल करना। फिल्म के तीन प्रमुख किरदार निभा रहे निठल्ले नौजवानों की भी जिंदगी का यही सच है। उन्हें साफ लगता है कि अगर वे अमेरिका नहीं पहुंच पाते हैं तो उनकी जिंदगी का कोई मतलब नहीं है। अमेरिका से झंडे से लेकर वहां सबसे ज्यादा बिकने वाले मारलबोरो सिगरेट की बात हो, ये सब इन युवकों को आकर्षित करते हैं।
फिल्म चूंकि हास्य प्रधान है इसलिए फिल्मकार पीयूष ने कई जगहों पर चुहलबाजी के बीच यह दिखाया गया है कि अमेरिका महज एक देश नहीं बल्कि एक ब्रांड भी है, जिसको लेकर युवाओं में एक जुनून है। तभी तो फिल्म में युवा अमेरिकी झंडे की प्रिंटिंग वाले रुमाल रखते हैं। और तो और चूंकि फिल्म में इन युवाओं के पास पैसे नहीं होते हैं इसलिए वे तमाम तरीके अपनाकर अपने को अमेरिकापरस्त दिखाने की कोशिश करते हैं। ऐसी ही एक कोशिश में वे मारलबोरो सिगरेट के खाली डिब्बे में देसी सिगरेट रखकर पीते हैं।
इस फिल्म को बने एक दशक से ज्यादा का समय बीत गया है। क्लिंटन के बाद अब ओबामा में लोग ग्लोबल लीडर की छवि देख रहे हैं, उनके चित्रों वाले टीशर्ट पहन रहे हैं, घरों में उनकेे पोस्टर चिपका रहे हैं, बाजार से उनकी जीवनी खरीदकर पढ़ रहे हैं। इस दौरान अगर नहीं कुछ बदला है तो वह है भारतीय युवाओं में अमेरिका के प्रति बढ़ा लगाव। चेतन भगत की शब्दावली में कहें तो अमेरिका उनके लिए ड्रीम और डेस्टिनेशन एक साथ है। हालांकि जब हम ऐसा कहते हैं तो हमारी आंखों के सामने वे युवा होते हैं जो शहरी हैं और जिन्होंने भारत में ग्लोबल विकास के दौर में अपनी आंखें खोली हैं। 

रविवार, 4 नवंबर 2012

एक भट्टी का शांत हो जाना


मौजूदा दौर की एकिक और सामूहिक मानवीय प्रवृतियों पर गौर करें तो कहना पड़ेगा कि यह दौर कड़वाहट और फूहड़ता के साझे का है। साझे के इस मांझे में ही निजी से लेकर सार्वजनिक जिंदगी उलझी हुई है। सुलझाव की कोशिशें इतनी सतही और बेइमान हैं कि उलझन में और नई गांठ ही पड़ती जा रही हैं। गंभीर विमर्श के खालीपन को आरोप-प्रत्यारोप, तर्क-कुतर्क और ज्ञान के वितंडावादी प्रदर्शन भर रहे हैं, तो हास्य-व्यंग्य की चुटीलता भोंडेपन में तब्दील हो रही है।
ऐसे में जो काम जसपाल भट्टी कर रहे थे और जिस तरह की उनकी सोच और रचनाधर्मिता थी, वह महत्वपूर्ण तो थी ही समय और परिवेश की रचना के हिसाब से एक जरूरी दरकार भी थी। भट्टी का सड़क दुर्घटना में असमय निधन काफी दुखद है। इसने तमाम क्षेत्र के लोगों को मर्माहत किया है। अपनी ऊर्जा और लगन के साथ वे लगातार सक्रिय थे। उनके जेहन और एजेंडे में तमाम ऐसे आइडिया और प्रोजेक्ट थे, जिस पर वे काम कर रहे थे।
जसपाल भट्टी ने पढ़ाई तो इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग की थी पर उनकी हास्य-व्यंग्य के प्रति दिलचस्पी कॉलेज के दिनों से ही थी, जो बाद में और प्रखर हुई। भट्टी का हास्य नाहक नहीं बल्कि सामाजिक सोद्देश्यता से लैश था और उनकी चिंता के केंद्र में आम आदमी हमेशा रहा। आमजन के जीवन की बनावट, उसका संघर्ष और उसकी चुनौतियों को उन्होंने न सिर्फ उभारा बल्कि इस पर उनके चुटीले व्यंग्यों ने व्यवस्था और सत्ता के मौजूदा चरित्र पर भी खूब सवाल खड़े किए।
नाटक से टीवी और सिनेमा तक पहुंचने के उनके रास्ते का आगाज दरअसल एक कार्टूनिस्ट के तौर पर हुआ। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि एक जमाने में जसपाल भट्टी 'द ट्रिब्यून' अखबार के लिए कार्टून बनाया करते थे। काटूर्निस्ट सुधीर तैलंग ने उनके निधन पर सही ही कहा कि एक ऐसे दौर में जब लोग हंसना भूल गए हैं और कार्टून और व्यंग्य की दूसरी विधाओं के जरिए सिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोल रहे लोग शासन के कोप का शिकार हो रहे हैं, भट्टी की हास्य-व्यंग्य शैली का अनोखापन न सिर्फ उन्हें लोकप्रिय बनाए हुए था बल्कि वे अपनी बातों को लोगों तक पहुंचाने में सफल भी हो रहे थे।
जसपाल भट्टी के सरोकार जिस तरह के थे और जिस तरह के विषयों को वे सड़क से लेकर, नाटकों, टेलीविजन सीरियलों और फिल्मों में उठाते थे, वह उन्हें एक कॉमेडी आर्टिस्ट के साथ एक एक्टिविस्ट के रूप में भी गढ़ता था। विज्ञापन जगत और सिने दुनिया ने उनकी लोकप्रियता का व्यावसायिक जरूर किया पर खुद भट्टी कभी लीक और सरोकारों से नहीं डिगे। उनकी यह उपलब्धि खास तो है ही यह उन लोगें के आगे एक मिसाल भी है, जो प्रसिद्धि की मचान पर चढ़ते ही अपनी जमीन से रिश्ता खो देते हैं। गौरतलब है कि भट्टी का वयक्तित्व पंजाबियत की रंग में रंगा था। उनके हास्य-व्यंग्य में भी यह पंजाबियत झांकती है। पंजाब की जमीन और लोगों से उनका रिश्ता आखिरी समय तक कायम रहा, जबकि इस बीच मुंबई की माया ने उन्हें अपनी तरफ खींचने के लिए हाथ खूब लंबे किए।

रविवार, 20 मई 2012

चीन है नया गोताखोर


वैश्विक अर्थव्यवस्था के सुस्त पड़ने को लेकर अब तक भारत में चिंता ऊपरी थी पर रुपए के डॉलर के मुकाबले रिकार्ड स्तर तक गोता लगाने से चिंता यहां भी गहरा गई है। डॉलर से लेकर यूरोजोन तक की इकोनमी इसकी जद में पहले ही आ चुकीहैं। हां, चीन और भारत को लेकर एक उम्मीद यह जरूर जताई जा रही थी पर अब इन दोनों देशो के हालत भी पहले की तरह बेहतर नहीं रहे। रुपए के कमजोर होने और उससे पहले एस एंड पी और मूडीज की जो नई रेटिंग आई है, उसमें कहीं न कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने का खतरा जताया गया है।
जहां तक सवाल चीन का है तो जिस विदेश व्यापार के बूते वह अब तक एक सक्षम इकोनमी की मिसाल बना रहा है, उसे लेकर अब वहां चुनौतियां बढ़ गई हैं। हाल तक वहां की सरकार यही जता रही थी कि बीते महीनों में उसके लिए बढ़े संकट वैश्विक बाजार की बढ़ी चुनौतियों की देन हैं। पर नहीं लगता कि महज बाहर की गड़बडि़यों की वजह से ही चीनी अर्थव्यवस्था की जड़ें हिली हैं। दरअसल, चीन की शासन व्यवस्था के साथ उसकी अर्थव्यवस्था को लेकर विरोधाभासी राय शुरू से रही है। पूरी दुनिया को एक छतरी के नीचे ला देने वाले बाजारवादी दौर में जहां यह विरोधभास बढ़ा, वहीं इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था का एक नया रूप दुनिया को देखने को मिला।
पहले इलेक्ट्रानिक्स जैसे कुछेक क्षेत्रों में अपनी उत्पादकता और स्तरीयता के लिए जाना जानेवाला देश अचानक आम जरूरत की तमाम चीजों के सस्ते और उन्नत विकल्प मुहैया कराने वाला देश बन गया। फिर यह सब चीन ने बिल्कुल वैसे ही नहीं किया, जैसे उदारवादी अर्थव्यवस्था की पैरोकारी करने वाले दूसरे मुल्कों ने किया। बताया यही गया कि चीन में साम्यवादी शासन भले हो अधिनायकवादी चरित्र का और लोकतांत्रिक व मानवाधिकारवादी कसौटियों पर चाहे उसकी जितनी खिल्ली उड़ाई जाए, पर उसकी अर्थव्यवस्था केंद्रित न होकर विकेंद्रित जमीन पर ही फल-बढ़ रही है। यह प्रयोग वहां हाल तक सफल भी रहा है। वैश्विक मंदी के कारण 2009 में जहां पूरी दुनिया की जीडीपी का औसत नकारात्मक दिखा, उस दौरान भी चीन ने तकरीबन नौ फीसद का विकास दर हासिल किया।
पर अब यह आर्थिक मजबूती चीन में भी दरक रही है। वहां श्रम और कच्चे माल की लागत एकदम से बढ़ गई है। विदेशों से मांग न होने से भी उत्पादन पर असर पड़ा है। सरकार अपने स्तर पर इस स्थिति से उबड़ने के भरसक उपाय तो कर रही है पर स्थिति अब काबू होने की सूरत से ज्यादा बिगड़ चुकी है। स्थानीय स्तर पर छोटे-मध्यम श्रेणी के उद्योगों की तरफ से रियायती कर्ज की जो बड़ी मांग एकदम से उठी है, उसे पूरा करने में सरकार के हाथ-पांव फूल रहे हैं।
चीनी वाणिज्य मंत्रालय तक आज खुद ही यह मान रहा है कि जो स्थिति और चुनौतियां  हैं, वह खतरे की आशंका से बहुत ज्यादा बड़ी हैं। ऐसे में भारत और चीन में जो स्थितियां बन रही है वह अगर आगे भी जारी रहती है तो यह विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाली दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के ढहने का खामियाजा भी बड़ा होगा और वैश्विक भी।

रविवार, 25 मार्च 2012

सौ साल का बिहार

बिहार अपनी राज्य स्थापना के सौ साल जिस सरकारी-असरकारी तौर पर मना रहा है, उसमें सिर्फ हर्ष या गौरवबोध शामिल नहीं है। दरअसल, यह एक ऐसा मौका है, जब यह प्रदेश अपनी शिनाख्त को नए सिरे से गढ़ना चाहता है। पिछले दो-तीन दशकों में बिहारी होना जिस तरह गरीब, अशिक्षित, असभ्य और पिछड़े होने की लांछना में तब्दील हुआ है, उसने इस प्रदेश को लेकर नए सांस्कृतिक विमर्श की दराकर पैदा की है। यह विमर्श अब बौद्धिक के साथ राजनीतिक चेतना की भी शक्ल ले रहा है। आलम यह है कि अब बिहार में हर स्तर पर विकास और समृद्धि का अपवाद होने के बजाय इसका उदाहरण बनने की भूख है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देश की राजधानी में जब राज्य स्थापना के शताब्दी समारोह के शुभारंभ के मौके पर यह कहा कि अगर बिहारी दिल्ली में एक दिन काम बंद कर दें तो यह महानगर ठहर जाएगा, कहीं न कहीं उस लांछना का ही राजनीतिक शैली में दिया गया जवाब था, जो पिछले वर्षों में दिल्ली और मुंबई में बिहारी अस्मिता को चोटिल करने के लिए लगाए गए थे। इस तरह की राजनीतिक प्रतिक्रिया को एक स्वस्थ परंपरा भले न ठहराया जाए पर इसके पीछे की वजहों को खारिज तो नहीं ही किया जा सकता है। आज जबकि भारतीय संघ में शामिल एक महत्वपूर्ण प्रदेश अपनी अस्मिता पर रोशनाई को रौशन पहलू में बदलने को ललक रहा है तो कुछ बातों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है।
सबसे पहली बात तो यह कि बिहार में राजनीति से लेकर शिक्षा और कारोबार के क्षेत्र में एक बेहतर शुरुआत की अभी भूमिका भर तैयार हुई है। यह भूमिका भी जरूरी है इसलिए पिछले पांच-सात साल अगर इसमें लगे हैं तो वे फिजूल नहीं गए हैं। पर अब यहां से इस प्रदेश को आगे के लिए कदम बढ़ाने शुरू करने होंगे, साथ ही इस यात्रा में एक सातत्य भी जरूरी है। कई बार इतिहास और परंपरा का मोह मौजूदा चुनौतियों से मुंह ढांपने का बहाना भी बनता है। यह खतरा नया बिहार का सपना आंज रही सरकार के साथ उन तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों के आगे भी है, जिनमें आज गजब का उत्साह देखने को मिल रहा है।
दूसरी बात यह कि बिहार में पिछले दो विधानसभा चुनावों के नतीजे ने जो नया और आशावादी सत्ता समीकरण पैदा किया है, वह आगे भी सशक्त और कारगर रहे इसके लिए जरूरी है कि इसके नतीजे प्रदेश की जनता को देखने को मिलें। अभी गरीबी को लेकर एक आंकड़ा योजना आयोग ने पेश किया है, इसमें बिहार सबसे नीचले पायदान पर है। विकास दर के आंकड़े और सत्ता के वर्ष गिनाने से बिहार के हिस्से आई परेशानी दूर नहीं हो सकती। उम्मीद करनी चाहिए कि बिहार को अपने शताब्दी वर्ष में जितना इतिहास से सीखने का मौका मिलेगा, उतना ही भविष्य को भी सुंदर और सुफल बनाने का भी।      

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

मेरे अंदर एक कायर टूटेगा

क्या आपने कभी ऐसे सोचा है कि सचाई से ज्यादा मक्कारी हमारे जेहन और चिंतन को क्यों घेरता है। अपने हिस्से के अंधेरे को दूर करने की बजाय हम आसपास के अंधेरे को लेकर आलोचकीय प्रबुद्धता क्यों दिखाते हैं। बिजली के लट्टुओं ने भले चिराग तले अंधेरे के मुहावरे को खारिज कर दिया हो पर नए दौर के टॉर्च वियररों की जमीरी बेईमानी को देखकर इस मुहावरे का विकसित और आधुनिक भाष्य समझ में आता है। आज की तारीख में भ्रष्टाचार अगर सबसे बड़ा मुद्दा है तो इसकी असली वजह महज न तो सिविल सोसाइटी की मुहिम है और न ही कोई राजनीतिक-सामाजिक जागरूकता। दरअसल, पिछले छह दशकों में सरकार, राजनीति, प्रशासन और न्याय प्रक्रिया के जो अनुभव आम आदमी के हिस्से आए हैं, उसमें सदाचार की भारतीय संस्कृति के सच को नंगा करके रख दिया है। यह नंगापन पिछले तीन दशकों के उदारवादी दौर में सबसे ज्यादा बढ़ा है।
व्यक्ति और समूह से शुरू हुए लालच और भ्रष्टाचार का अपने यहां जहां अपना वर्ग चरित्र है, वहीं शिक्षा, शहरीकरण, आमदनी और आधुनिकता जैसे भ्रष्टाचार निरोधी तर्क भी कहीं से कारगर नहीं मालूम पड़ते। दरअसल, अहम यह नहीं है कि हम भ्रष्टाचार के मुद्दे के साथ हैं कि नहीं। असली सवाल इस जुड़ाव के वाह्य या आंतरिक होने को लेकर है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के एक हालिया सर्वे में भारतीयों ने खादी और खाकी को भ्रष्टाचार की वर्दी करार दिया है। सेवा और स्वाबलंबन की सूत से कभी भ्रष्टाचार की कताई भी हो सकती है, यह बात गांधी को पता होती तो उनका चरखा भी शायद ही घूमता।
खद्दर और खाकी को लेकर जनमानस की पीड़ा और रोष को समझा जा सकता है। पर इस सर्वे में दर्ज यह भी हुआ है कि भ्रष्टाचार से भिड़ने की बजाय उसके आगे घुटने टेकने की हमारी लाचारी भी पिछले सालों में बढ़ी है। भ्रष्टाचार की काली स्लेट पर सदाचार उकेरने में उत्साही लोगों को भी यह समझ तो होगी कि इसकी शुरुआत शिकायत से नहीं पश्चाताप और सत्याग्रह से ही संभव है। ऐसी शिकायत करते हुए सामने की तरफ उठने वाली एक अंगुली अगर तनी है तो बाकी की दिशा भी किस तरफ है, यह नहीं भूलना चाहिए।
दरअसल, भ्रष्टाचार को लाचारी की स्वाभाविक परिणति बताकर हम अपने हिस्से के भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष को स्थगित कर देते हैं। यह स्थगन एक बड़े मुद्दे के हल को रोष और प्रचार के खल में किस तरह बदल देता है, यह अनुभव देश आज संसद से लेकर सड़क तक कर रहा है। दिलचस्प है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सच बयानी को लेकर एक टीवी रियलिटी शो भी शुरू हुआ है। जहां अपने भ्रष्ट कर्मों के प्रायश्चित के लिए लोग कैमरे के सामने आ रहे हैं और इनामी साहस के साथ बता रहे हैं कि उन्होंने लालच में आकर क्या-क्या और कितने गलत काम किए हैं। दरअसल, आत्मप्रतीति के ऐसे इसी तरीके की नाटकीयता की मांग करते हैं जबकि साध्य और साधन की शुद्धता का सत्याग्रह प्रशांत धैर्य और चिंतन की दरकार रखता है।
हिंदी के प्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की शब्दावली में आधुनिक समय में परिवर्तन का इतिहास रातोंरात नहीं रचा जा सकता बल्कि इसकी प्रक्रिया 'व्यक्तित्वांतरण' की इकाई से शुरू होकर समय और समाज की दहाई, सैकड़े-हजार तक पहुंचेगी। पूरी दुनिया में परिवर्तन की परतें उतनी नहीं जमीं जितनी उनके नाम पर तारीखें दर्ज हैं। लिहाजा, भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष को परिवर्तन की ऐसी एक और तारीख के रूप में हम देखना चाहते हैं तो यह इतिहास आज अपने देश में जरूर लिखा जा रहा है। पर इसके बाद भ्रष्टाचार का मर्ज हमारे सलूक और सिस्टम से बाहर हो जाएगा, इस दावे को लेकर सोचना भी मूढ़ता होगी। व्यक्ति के सदाचार का अपना कद जब तक नहीं उठता, भ्रष्टाचार का दैत्याकार हमेशा हमें डराता और हमारा मुंह चिढ़ाता रहेगा।
साफ है कि यह लड़ाई बाहरी नहीं बल्कि भीतरी है। अब तक इस लड़ाई को हम बाहरी मैदान पर खूब बहादुरी से लड़ रहे हैं। पर यह बहादुरी खुद से मुंह चुराने की चालाकी ज्यादा साबित हो रही है। जब तक पाप और संताप के भीतरी ताप में हम डूबे-उतराएंगे नहीं, भ्रष्टाचार भले कहीं से मिटे हमारे अंदर जिंदा और जावेद रहेगा। इसलिए सड़कों पर मुट्ठियां लहराने और नारों के शोर को हम कहीं और नहीं खुद तक पहुंचने का जरिया मानें क्योंकि तब... 'न टूटे तिलिस्म सत्ता का, मेरे अंदर एक कायर टूटेगा।' (कुछ तो होगा/ रघुवीर सहाय)  

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

समय से मुठभेड़ करने वाले अदम

फटे कपड़ों में तन ढांके गुजरता है जिधर कोई।
समझ लेना वो पगडंडी अदम के गांव जाती है।।
जगजीत सिंह, सुल्तान खां, भूपेन हजारिका, श्रीलाल शुक्ल, इंदिरा गोस्वामी, देवानंद... यह साल अपनी विदाई बेला में भी शायद उतना रुदन न लिख सके, जितना जीवन और समाज की संवेदनाओं को अपनी उपस्थिति से नम करने वाली कुछ अजीम शख्सियतों को हमसे छीनकर हमारे दिलों पर लिख दिया है। अभी गम को पुराने बादल छटे भी नहीं थे कि जनकवि अदम गोंडवी का साथ हमेशा के लिए छूट जाने की खबर ने सबको मर्माहत कर दिया। इसे हिंदी पत्रकारिता के दिलो-दिमाग में उतरा देशज संस्कार कहें या जमीनी सरोकार कि तमाम अखबारों ने अदम के देहांत की खबर को स्थान देना जरूरी समझा।
अदम जनता के शायर थे और अपनी शख्सियत में भी वे आमजन की तरह ही सरल और साधारण थे। पुराने गढ़न की ठेहुने तक की मटमैली छह-छत्तीस धोती, मोटी बिनाई का कुर्ता और गले में सफेद गमछा लपेटे अदम को जिन लोगों ने कभी मुशायरों-कवि सम्मेलनों में सुना होगा, उन्हें इस निपट गंवई शायर के मुखालफती तेवर के ताव और घाव आज ज्यादा महसूस हो रहे होंगे। हिंदी की कुलीन बिरादरी इस भाषा को किताबों और सभाकक्षों में चाहे जो स्वरूप देकर अपना सारस्वत धर्म निबाहे, इसकी आत्मा तो हमेशा लोक और परंपरा के मेल में ही बसती है। यही कारण है कि अपने समय की सबसे चर्चित और स्मृतियों का हिस्सा बनी काव्य पंक्तियों के रचयिता इस जनकवि को अदबी जमात ने अपने हिस्से के तौर पर मन से कभी नहीं कबूला।
अदम काफी हद तक कबीराई मन-मिजाज के शायर थे।  इसलिए उन्हें इस बात का कभी अफसोस रहा भी नहीं कि उन्हें उनके समकालीन साहित्यकार और आलोचक किस खांचे में रखते हैं। कवि सम्मेलनों और मुशायरों का हल्का और बाजारू चरित्र उन्हें खलता तो बहुत था पर वे इन मंचों को जनता तक पहुंचने का जरिया मानकर स्वीकार करते रहे। अपने कीब 63 साल के जीवन में उन्होंने हिंदुस्तान की उम्मीद और तकदीर का वह हश्र सबसे ज्यादा महसूस किया जिसने आमजन के भरोसे और उम्मीद को कुम्हलाकर रख दिया। सत्ता, सियासत और दौलत के गठबंधन ने गांव और गरीब को जैसे और जितनी तरह से ठगा, उसका जीवंत चित्र अदम की शायरी का सबसे बड़ा सरमाया है। अपने समय में सत्ता के खिलाफ वे सबसे हिमाकती और मुखालफती आवाज थे।
'काजू भुने प्लेट में व्हिसकी गिलास में/ उतरा है रामराज्य विधायक निवास में', 'इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया/ सेक्स की रंगीनियां या गोलियां सल्फास की', 'जो न डलहौजी कर पाया वो ये हुक्मरान कर देंगे/ कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे'....जैसे नारे और बगावती बयाननुमा पंक्तियों को लोगों की जुबान पर छोड़ जाने वाले अदम गोंडवी के बाद जनभावनाओं को निर्भीक अभिव्यक्ति देने वाली जनवादी काव्य परंपरा की निडरता शायद ही कहीं नजर आए।
जहां तक कथन के साथ काव्य शिल्प का सवाल है तो हिंदी में दुष्यंत कुमार के बाद अदम गोंडवी अकेले ऐसे शायर हैं, जिन्होंने न सिर्फ हिंदी शायरी की जमीन का रकबा बढ़ाया बल्कि उसे मान्यता और लोकप्रियता भी दिलाई। हिंदी के काव्य हस्ताक्षरों की कबीराई परंपरा में अदम नागार्जुन और त्रिलोचन की परंपरा के कवि थे। अदम हिंदी और उर्दू की साझी विरासत के भी खेवनहार थे, यही कारण है कि हिंदी के साथ उर्दू बिरादरी भी उन्हें अपना मानती है। अपने समकालीन उर्दू शायरों में वे बशीर बद्र, मुन्नवर राणा, निदा फाजली, राहत इंदौरी और  वसीम बरेलवी जैसे ताजदार नामों  की तरह जनता की जुबां पर चढ़े शायर थे। शेर लिखने और अर्ज करने का उनका अंदाज बहुत नाटकीय नहीं था। उन्हें सुनने वाले उनके सीधे-सपाट पर बेलाग अंदाज के कायल थे। मानवीय अस्मिता के बढ़ते खतरों के बीच एक खरी और ईमानदार आवाज को मुखालफती जज्बों में बदलने का जोखिम उठाने वाले रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी को विनम्र श्रद्धांजलि।