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रविवार, 20 मई 2012

चीन है नया गोताखोर


वैश्विक अर्थव्यवस्था के सुस्त पड़ने को लेकर अब तक भारत में चिंता ऊपरी थी पर रुपए के डॉलर के मुकाबले रिकार्ड स्तर तक गोता लगाने से चिंता यहां भी गहरा गई है। डॉलर से लेकर यूरोजोन तक की इकोनमी इसकी जद में पहले ही आ चुकीहैं। हां, चीन और भारत को लेकर एक उम्मीद यह जरूर जताई जा रही थी पर अब इन दोनों देशो के हालत भी पहले की तरह बेहतर नहीं रहे। रुपए के कमजोर होने और उससे पहले एस एंड पी और मूडीज की जो नई रेटिंग आई है, उसमें कहीं न कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने का खतरा जताया गया है।
जहां तक सवाल चीन का है तो जिस विदेश व्यापार के बूते वह अब तक एक सक्षम इकोनमी की मिसाल बना रहा है, उसे लेकर अब वहां चुनौतियां बढ़ गई हैं। हाल तक वहां की सरकार यही जता रही थी कि बीते महीनों में उसके लिए बढ़े संकट वैश्विक बाजार की बढ़ी चुनौतियों की देन हैं। पर नहीं लगता कि महज बाहर की गड़बडि़यों की वजह से ही चीनी अर्थव्यवस्था की जड़ें हिली हैं। दरअसल, चीन की शासन व्यवस्था के साथ उसकी अर्थव्यवस्था को लेकर विरोधाभासी राय शुरू से रही है। पूरी दुनिया को एक छतरी के नीचे ला देने वाले बाजारवादी दौर में जहां यह विरोधभास बढ़ा, वहीं इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था का एक नया रूप दुनिया को देखने को मिला।
पहले इलेक्ट्रानिक्स जैसे कुछेक क्षेत्रों में अपनी उत्पादकता और स्तरीयता के लिए जाना जानेवाला देश अचानक आम जरूरत की तमाम चीजों के सस्ते और उन्नत विकल्प मुहैया कराने वाला देश बन गया। फिर यह सब चीन ने बिल्कुल वैसे ही नहीं किया, जैसे उदारवादी अर्थव्यवस्था की पैरोकारी करने वाले दूसरे मुल्कों ने किया। बताया यही गया कि चीन में साम्यवादी शासन भले हो अधिनायकवादी चरित्र का और लोकतांत्रिक व मानवाधिकारवादी कसौटियों पर चाहे उसकी जितनी खिल्ली उड़ाई जाए, पर उसकी अर्थव्यवस्था केंद्रित न होकर विकेंद्रित जमीन पर ही फल-बढ़ रही है। यह प्रयोग वहां हाल तक सफल भी रहा है। वैश्विक मंदी के कारण 2009 में जहां पूरी दुनिया की जीडीपी का औसत नकारात्मक दिखा, उस दौरान भी चीन ने तकरीबन नौ फीसद का विकास दर हासिल किया।
पर अब यह आर्थिक मजबूती चीन में भी दरक रही है। वहां श्रम और कच्चे माल की लागत एकदम से बढ़ गई है। विदेशों से मांग न होने से भी उत्पादन पर असर पड़ा है। सरकार अपने स्तर पर इस स्थिति से उबड़ने के भरसक उपाय तो कर रही है पर स्थिति अब काबू होने की सूरत से ज्यादा बिगड़ चुकी है। स्थानीय स्तर पर छोटे-मध्यम श्रेणी के उद्योगों की तरफ से रियायती कर्ज की जो बड़ी मांग एकदम से उठी है, उसे पूरा करने में सरकार के हाथ-पांव फूल रहे हैं।
चीनी वाणिज्य मंत्रालय तक आज खुद ही यह मान रहा है कि जो स्थिति और चुनौतियां  हैं, वह खतरे की आशंका से बहुत ज्यादा बड़ी हैं। ऐसे में भारत और चीन में जो स्थितियां बन रही है वह अगर आगे भी जारी रहती है तो यह विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाली दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के ढहने का खामियाजा भी बड़ा होगा और वैश्विक भी।

रविवार, 8 अप्रैल 2012

दो साला हार और शिक्षा का अधिकार

 दो साल हो गए शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए । यहां से पलटकर देखने पर रास्ता भले बहुत लंबा न दिखे पर अब तक के अनुभव कई बातें जरूर साफ करती हैं। मनरेगा जैसा ही हश्र इस कानून का भी होता दिख रहा है। प्रथम संस्था द्वारा तैयार की गई प्राथमिक शिक्षा की सालाना स्थिति पर तैयार 'असर' रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों में नामांकन दर तो 96.7 फीसद तक पहुंच गई है पर उपस्थिति के मामले में यह बढ़त नहीं दिखती है। 2007 की स्थिति से तुलना करें तो स्कूलों में पढ़ने पहुंचने वाले बच्चों का फीसद 2011 में 73.4 से खिसक कर 70.9 पर आ गया है। यही नहीं मुफ्त खाने का प्रलोभन परोसकर प्राथमिक शिक्षा का स्तर सुधारने का दावा करने वाली सरकारी समझ का नतीजा यह है कि न तो बच्चों को ढंग से भोजन मिल रहा है
और न ही अच्छी शिक्षा। ग्रामीण इलाकों में हालत यह है कि तीसरी जमात में पढ़ने वाले हर दस में से बमुश्किल एक या दो बच्चे ऐसे हैं, जो अक्षर पहचानत हैं। 27 फीसद ऐसे हैं जो ढंग से गिनती नहीं जानते हैं। 60 फीसद को अंकों का तो कुछ ज्ञान जरूर है पर जोड़-घटाव में उनके हाथ तंग हैं।
उत्तर भारत के कई राज्यों में खासतौर पर इस तरह की शिकायतें दर्ज की गई  और बताया गया कि कागजी खानापूर्ति के दबाव में बच्चों को कक्षाएं फलांगने की छूट जरूर दे दी जा रही हैं पर तमाम ऐसे बच्चे हैं जो पांचवीं जमात में पहुंचकर भी कक्षा दो की किताबें ढंग से नहीं पढ़ पाते। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल लगातार शिक्षा के विस्तार और तरीके में सुधार के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। धरातल पर जो सचाई है उसका भी पता मंत्री महोदय को है पर इस नाकामी के कारणों में जाने के बजाय वे आगे की योजनाओं की गिनती बढ़ाने में व्यस्त हैं। अब जब वह यह कहते हैं कि उनका सारा जोर रटंत तालीम की जगह रचनात्मक दक्षता उन्नयन पर है तो यह समझना मुश्किल है कि वे इस लक्ष्य को आखिर हासिल कैसे करेंगे।
आंकड़े यह भी बताते हैं कि ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों का नेटवर्क ठप पड़ता जा रहा है। देश के 25 फीसद बच्चे अभी ही प्राइवेट स्कूलों का रुख कर चुके हैं आगे यह प्रवृत्ति और बढ़ेगी ही। केरल और मणिपुर में यह आंकड़ा अभी ही साठ फीसद के ऊपर पहुंच चुका है। लिहाजा सरकारी स्तर पर यह योजनागत सफाई जरूरी है कि वह सर्व शिक्षा का लक्ष्य अपने भरोसे पूरा करना चाहते हैं या निजी स्कूलों से। क्योंकि यह एक और खतरनाक स्थिति गांव से लेकर बड़े शहरों तक पिछले कुछ सालों में बनी है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मानक ही प्राइवेट स्कूल हो गए हैं। जबकि सचाई यह है कि यह सिर्फ प्रचारात्मक तथ्य है। अगर दसवीं और बारहवीं के सीबीएसई नतीजे को एक पैमाना मानें तो साफ दिखेगा कि सरकारी ही अब भी तालीम के मामले में असरकारी है। लिहाजा सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार के बगैर देश में शिक्षा का कोई बड़ा लक्ष्य हासिल कर पाना नामुमकिन है।  और इस नामुमकिन को बदलने के लिए हर मुमकिन कोशिश होनी ही चाहिए।

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

अपसेट कर गया लांसेट


लांसेट की रिर्पोट हमेशा से ही हंगामाखेज रही हैं। इससे पहले जब उसने युवाओं में लैंगिक रूप में सेक्स प्रवृत्तियों में आए बदलाव का जिक्र किया था, तो आरोप यहां तक लगे थे कि वह कंडोम बनाने वाले एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के लिए काम कर रही है। सेक्स सर्वे चर्चा को सतह पर लाने का आज एक माना हुआ जरिया हो गया है  और इसका इस्तेमाल ठंडे कमरों में क्रांति की आंच पैदा करने वाले एक्टिविस्टों से लेकर मीडिया तक के लिए दौड़ में बने रहने का सबसे आसन्न औजार बन गया है।
बहरहाल, बात लांसेट के हालिया अध्ययनों की। महज कुछ ही दिनों के अंतराल पर उसकी यह दूसरी रिपोर्ट है, जिसने भारत सहित कई देशों की एक ऐसी तस्वीर दुनिया के सामने रखी है, जो न सिर्फ चिंता बढ़ाने वाली है बल्कि आईना दिखाने वाली भी है। दिल्ली में मिलने वाले पेयजल में सुपरबग मिलने के खुलासे पर बवाल अभी थमा भी नहीं था कि इस प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल ने यह आकलन छापकर सनसनी मचा दी कि दुनिया में हर रोज सात हजार से ज्यादा मृत बच्चे पैदा होते हैं। दिलचस्प है कि इनमें 68 फीसद मृत बच्चे मारत, चीन और बांग्लादेश सहित दस देशों में पैदा होते हैं। लांसेट ने अपने विश्लेषण में इस समस्या को सीधे आमदनी से जोड़ा है। उसके मुताबिक 98 फीसद मृत बच्चे उन देशों में पैदा हुए जहां आमदनी कम है।
भारत की गिनती भी अगर विपन्नता के मारे ऐसे देशों में होती है तो इसकी वजह  यह नहीं है कि हमारे यहां अरबपतियों या धनकुबेरों की कोई कमी है। फोर्ब्स जो सूचियां दुनियाभर के रइसों की छापती है, उनमें भारतीयों का दबदबा लगातार कायम है। पर अमीरी और संपन्नता की गाढ़ी मलाई जिस दूध-पानी पर तैर रही है, उसकी सचाई अब भी खासी स्याह है। लांसेट के नए खुलासे भी इस तथ्य पर मुहर लगाते हैं। आलम यह है कि जो देश अपनी शिनाख्त को पिछले तकरीबन दो-ढ़ाई दशकों में लगातार एक बड़ी इकोनमी पावर के रूप में शिद्दत से गढ़ने में लगा है, वह कोख में नौ माह तक पलने के बाद एक नवजात को दुनिया का मुंह तक देख पाने की वांछित स्थिति और  सुविधाएं मुहैया कराने में सबसे पिछड़ा है।
विकास का यह कोढ़ कम से कम हमारे उद्यम और संपन्नता के आंकड़ों  और दावों को तो किसी सूरत में मानवीय नहीं ठहराते। अच्छी बात यह है कि अब विकास के इस विरोधाभास को सरकार  और  उसके योजनकार भी नकारने की बजाय मानने लगे हैं तभी तो विकास की सरपट और प्रतिस्पर्धी दौर में मैदान मारने के बजाय बात अब हो रही है इन्कलूसिव डेवलपमेंट यानी समावेशी विकास की। पंचायतों के सशक्तिकरण से विकास योजनाओं को अमली जाम पहनाने के तंत्र का जो विकेंद्रित रूप सामने आया है, उससे अब गैरबराबरी वाले विकास की खाई को पाटने में मदद मिल रही है। पर अभी यह आगाज मात्र है। सरकार को अपने प्रयासों को इस दिशा में अभी और सघन और कारगर बनाना पड़ेगा तभी गांव-देहातों में स्वास्थ्य सुविधा की बात करें या जच्चा-बच्चा की सुरक्षा की, हमारे देश-समाज का हर हिस्सा हर लिहाज से संपन्न, सुरक्षित और  विकसित हो सकेगा। 'गरीबी हटाओ' भारतीय लोकतंत्र में लोकप्रियता हासिल करने का अब तक का सबसे कारगर नारा रहा है। दिल्ली में अभी जो सरकार सत्ता में अपनी दूसरी पारी खेल रही है, उसने भी अपनी सफलता की वजह गांव और गरीब तक पहुंचने वाली मनरेगा जैसी योजना को ही माना है। पिछले कई चुनावों में वोटरों ने तमाम दूसरे वादों के बजाय क्षेत्र के विकास को ज्यादा महत्व देकर अपनी मानसिकता और इरादे में आए फर्क को दर्ज कराया है। क्या अगले कुछ सालों में भारत की खुशहाली का वह चेहरा दुनिया के सामने होगा, जिसमें उसका हर वर्ग, हर इलाका इतना संपन्न आैर खुशहाल हो कि उसका कोई विलोमी पक्ष कहीं से भी रेखांकित न हो। अगर उम्मीद की यह तस्वीर अब भी बेरंग और  बेनूर है तो यह सचमुच एक खतरनाक स्थिति है।