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सोमवार, 16 जनवरी 2023

 जाना हिंदी के एक और मैनेजर का

- प्रेम प्रकाश

आपातकाल का अंधेरा तब थोड़ा दूर था, पर नेहरू युग जरूर किताब के पन्नों में प्रगतिशील आलोचकीय निकष पर आ चुका था। अगर नहीं थकी और झुकी थी तो हिंदी पत्रकारिता की वह असाधारण कलम, जिसने आजादी के आंदोलन के दौरान हासिल यशस्विता को इस दौरान भी विचार और लोकतंत्र की हिमायत में बहाल रखा। श्री कृष्ण किशोर पांडेय जी अब हमारे बीच नहीं रहे। हिंदी के घर-परिवार और संस्कार के बीच प्रखर आलोचक मैनेजर पांडेय के बाद शोक की यह दूसरी बड़ी खबर है। यह खबर और इससे जुड़ा संयोग और इस विदाई का पूरा समकाल नई चिंताओं और सवालों को जन्म देता है। यह हिंदी विमर्श और अभिव्यक्ति के एक और मैनेजर का जाना है, सर्द थपेड़ों के बीच एक और अलाव का ठंडा पड़ना है।

स्वर्णीय केके पांडेय का जीवन एक ऐसे प्रतिबद्ध हिंदी पत्रकार का सफरनामा है, जो 1968 से 2005 तक भरपूर सक्रियता के साथ अखबार के उस कक्ष को प्रतिष्ठा देता रहा, जिसे संपादकीय कक्ष कहा जाता है। मेरे जैसे पत्रकार के लिए उनकी स्मृति को नमन ऐसे विशाल वटवृक्ष के नीचे खड़ा होना है, जहां प्रशांत ऊर्जा की शालीन अनुभूति एक अक्षर मनोदशा को रचती है। उनके निधन पर सोशल मीडिया पर जिस तरह के संस्मरण लिखे जा रहे हैं, उन्हें लोग जिस लगाव और कचोट के साथ याद कर रहे हैं, वे ये जाहिर करते हैं कि पत्रकारिता की कम से कम दो पीढ़ी उनसे गहरे तौर पर जुड़ी रही। यह जुड़ाव पत्रकारिता के बदलते दौर में छपे शब्दों की अस्मिता को बहाल रखने के प्रशिक्षण के साथ हिंदी की अभिव्यक्ति और उसके सामर्थ्य को नए समकाल में ढालने की ईमानदार कोशिश थी।

गौरतलब है कि श्री कृष्ण किशोर पांडेय जब ‘हिंदुस्तान’ जैसे शीर्षस्थ अखबार के संपादकीय पृष्ठ को विचार और विमर्श के केंद्र में ला रहे थे, तब हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता पूरे लय में थी तो साथ ही खोजी पत्रकारिता की जमीन तेजी से पक रही थी। पत्र-पत्रिकाओं पर ताले झूलने का शोक तब किसी आशंका के गर्भ में भी नहीं था। हां, कई दूरद्रष्टा जरूर काल के क्षितिज पर छाते धुंधलके की बात कहने लगे थे। यह दौर अपने पूरे विस्तार में कुलदीप नैयर, बीजी वर्गीज, राजेंद्र माथुर, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, प्रभाष जोशी और सुरेंद्र प्रताप सिंह जैसी शख्सियतों की पत्रकारिता की लाजवाब पारी का साक्षी रहा।

इस दौरान दूरदर्शन ने जहां आंखें खोलीं, एशियाड दूसरी बार भारत लौटा, वहीं आगे चलकर श्रीमति इंदिरा गांधी के करिश्माई दौर का पटाक्षेप भारतीय राजनीति का सबसे दिलचस्प घटनाक्रम साबित हुआ। इतने सारे बदलावों और आगाजों के बीच कलम उठाना और अखबारी विमर्श का कंपास स्थिर करना आसान नहीं था। भाषाई संस्कार और हिंदी की अपनी धज और परंपरा के मुताबिक यह चुनौती कितनी बड़ी होगी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हिंदी सिनेमा का महानायक तब तक ‘पुष्पा के आंसू’ पर शोकाकुल होने के बजाय जमाने की नाइंसाफियों के खिलाफ सुलगते लावे की तरह एंग्री यंग मैन बन चुका था। बदलाव का दूसरा सिरा साहित्य को छू रहा था। हिंदी की किस्सागोई नई कहानी और कविताई नई कविता की शिनाख्त के साथ अपने होने को नई प्रतिबद्धता के सांचे में ढाल रही थी, नई चुनौतियों के बीच संवेदनशील सरोकारों को रच रही थी। कुल मिलाकर रचनात्मकता की दुनिया की हलचल हिंदी को नए प्रस्थान की ओर ले जा रही थी।

जिन लोगों ने भी उन्नत गौर ललाट और तिलकित भाल से सुशोभित पांडेय जी के साथ काम किया, उनके लिखने-पढ़ने की समझ और शैली को नजदीक से देखते-समझते रहे, वे ये बताते हैं कि उन्होंने भारतीय समाज और राजनीति के उत्तरायण और दक्षिणायन के बजाय उसके मध्याह्न को ज्यादा अहम माना। इसलिए विचार के तीखे कोणों के बजाए उन्होंने विमर्श और विरासत की दोमट मिट्टी पर अक्षर फूल खिलाए, नए समकोण खड़े किए।

इस अक्षर वाटिका की बड़ी बात यह रही कि इसमें नए चटख रंग और तासीर के फूलों ने हिंदी और हिंदुस्तान दोनों को एक साथ महकाया। नए कलम उठाने वालों ने लिखने के जोखिम और दायित्व को समझा। और इस तरह तैयार हुई नए लेखकों और पत्रकारों की एक पूरी खेंप। यह वह खेंप है जो भाषा से खिलवाड़, दो-तीन जीबी डेटा और अफवाह के दोस्ताने के बीच लिखने की मर्यादा को बचाए रखने के लिए अंतिम लश्कर के तौर पर आज भी कार्य कर रही है। 

इसके बाद हिंदी की बिंदी और मान को बचाए रखने के लिए न तो कोई लश्कर बचेगा और न ही बचेगा कोई संघर्ष। केके पांडेय की स्मृति और प्रेरणा को नमन के साथ यह बड़ा संकट बिल्कुल सामने दिख रहा है। बड़ी बात होगी कि इस संकट और अंधकार के बीच कहीं से एक नया कृष्ण किशोर होने की संभावना प्रकट हो। यह संभावना और इसके लिए बची-खुची उम्मीद हिंदी के पुराने कंगूरों और नए चबूतरों पर दीयों के बलने की अंतिम उम्मीद है। यह उम्मीद फलीभूत हो और इससे जुड़ा बोध चिरायु हो, ऐसी कामना है।

शनिवार, 26 जनवरी 2019

जिद्दी प्रतिरोध की अक्षर दुनिया


- प्रेम प्रकाश

भारत में महिला लेखन के जरिए स्त्री संघर्ष, चेतना और अस्मिता की जो अक्षर दुनिया पिछले कुछ दशकों में आबाद हुई है, उस दुनिया में रचनात्मक हस्तक्षेप की जो सबसे बड़ी धुरी है, उसे चिन्हित करने में कृष्णा सोबती का बड़ा योगदान रहा है। कृष्णा जी ने महिलावादी आंदोलन की वैश्विकता के बीच स्त्री, समाज और परंपरा को अपने तरीके से एक सीध में रखकर देखा। 1950 में कहानी ‘लामा’ से साहित्यिक सफर शुरू करने वाली इस महान लेखिका ने महिला पक्ष के साथ अपने समय के हस्तक्षेप को भी काफी निर्भीक तरीके से लिखा और बोला। इसलिए उनके लेखन और जीवन की रचनात्मक चौहद्दी को बांधना आसान नहीं है।

उनके लेखन में अगर किसी पहाड़ी नदी की तरह आधी दुनिया की हहराती संवेदना है तो समय और समाज की उस चिंता से भी वह हरसंभव मुठभेड़ करती हैं, जिसके लिए कलम को सीधे-सीधे आंदोलन और प्रतिरोध का हथियार बनना पड़ता है।

यह नहीं कि आज जब कृष्णा सोबती हमारे बीच नहीं हैं, तो उनके लेखन और जीवन को लेकर हम भावनात्मक रूप से अतिरिक्त रूप से विवश या सम्मोहन का शिकार हुए जा रहे हैं, बल्कि यह तो उनके जीते-जी ही हो गया था कि समकालीन भारतीय साहित्य की कोई भी कतार बगैर उनके नाम के पूरी नहीं होती है। उनकी नाक पर चढ़े बड़े ऐनक में हम सब अपनी दुनिया को आलोचकीय विवेक के साथ देखने-समझने के आदी बहुत पहले हो गए हैं।

उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए हम अगर उस दौर की स्थितियों को देखें-समझें, जब वो अपनी स्वीकृति और उभार के लिए संघर्ष कर रही थीं तो साफ दिखता है कि नई कहानी आंदोलन के भीष्म साहनी और कमलेश्वर से लेकर राजेंद्र यादव जैसे नामवर सितारों के बीच एक लेखिका कैसे अपने जिद्दी महिला किरदारों के साथ कथा और जीवन का एक नया साझा रचने का जोखिम उठाती है। हिंदी संवेदना की अक्षर दुनिया में यह एक बड़ा मोड़ ही नहीं, एक साहसी हस्तक्षेप भी था। मृदुला गर्ग से लेकर ममता कालिया, नासिरा शर्मा और उनके बाद की कथाकारों तक यह दुनिया अगर लागातार आबाद और सघन होती चली गई तो इसलिए क्योंकि इस विस्तार को कृष्णा जी पाठकों के बीच बड़ी स्वीकृति दिला चुकी थीं। हिंदी आलोचना ने इस रचनात्मक स्वीकृति के दमखम को भले देर-सबेर पहचाना हो पर स्त्री विमर्श का समकालीन सर्ग आज अगर एक बड़ी आलोचकीय दरकार का नाम है तो इसलिए क्योंकि इसने जीवन और लेखन के पुरुषवादी मिथ को निणार्यक रूप से तोड़ दिया है।

कृष्णा जी को पिछले साल ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था। इससे पहले उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ के लिए उन्हें वर्ष 1980 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उन्हें 1996 में अकादमी के उच्चतम सम्मान साहित्य अकादमी फेलोशिप से भी नवाजा गया था। इसके अलावा पद्मभूषण, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान जैसे अलंकरण उनकी यशस्विता को बढ़ाते हैं। उन्होंने अपने लेखन से हिंदी की कम से कम दो पीढ़ियों को रचनात्मक संवेदना से जोड़ा है। उनके कालजयी उपन्यासों में ‘सूरजमुखी अंधेरे के’, ‘दिलोदानिश’, ‘जिंदगीनामा’, ‘ऐ लड़की’, ‘समय सरगम’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘जैनी मेहरबान सिंह’, ‘हम हशमत’, ‘बादलों के घेरे’ ने कथा साहित्य को अप्रतिम ताजगी और स्फूर्ति प्रदान की है।

उनकी रचनात्मक सक्रियता के आखिरी दिनों में आई ‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख’ और ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ जैसी पुस्तकें ये दिखाती हैं कि वह मौजूदा देशकाल और परिस्थिति को देखते-समझते हुए किस तरह अपने रचनात्मक शिल्प और कथ्य को लगातार विचार और लोकतंत्र की हिफाजत के औजार के तौर पर मांज रही थीं।

18 फरवरी 1924 को गुजरात (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मीं कृष्णा सोबती हमेशा साहसपूर्ण रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती रहेंगी। निजी जिंदगी से लेकर अपने शब्दों की दुनिया को वे लगातार इस काबिल बनाए रखने में सफल रहीं, जिस कारण उनके प्रति सम्मान रखने वालों का समाज हर तरह के इकहरेपन का अतिक्रमण करता है। दिलचस्प है कि यह अतिक्रमण खुद उनके जीवन और लेखन का भी हिस्सा रहा है। 94 साल का जीवन जिस दुनिया में उन्होंने जिया, उसमें जब-जब कोई महिला आजादख्याली की बात करेगी, जब-जब लेखकों-बौद्धिकों की जमात अभिव्यक्ति की निर्भीक आजादी की बात करेगी, तब-तब उनकी स्मृति हमें रचनात्मक ऊर्जा से समृद्ध करती रहेगी।

शुक्रवार, 24 जून 2016

जयप्रकाश आंदोलन का भी अपना साहित्य था

-प्रेम प्रकाश
केरल में अपनी सरकार बनाने की खुशी को बड़ी कामयाबी के तौर पर जाहिर करते हुए माकपा ने अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के रंगीन विज्ञापन दिए। इससे पहले इस तरह का आत्मप्रचार वामदलों की तरफ से शायद ही देखने को मिला हो। दरअसल, पिछले दो दशकों में और उसमें भी हालिया दो सालों में सियासी तौर पर उनका रास्ता जिस तरह तंग और उनकी काबिज जमीन का रकबा इकहरा होता जा रहा है, उसमें यह अस्तित्व बचाने का आखिरी दांव जैसा है। वाम जमात ने इतिहास से लेकर साहित्य तक जिस तरह अपने वर्चस्व को भारत में दशकों तक बनाए रखा, वह दौर अब हांफने लगा है। खासतौर पर हिदी आलोचना में नया समय उस गुंजाइश को लेकर आया है, जब मार्क्सवादी दृष्टि पर सवाल उठाते हुए साहित्येहास पर नए सिरे से विचार हो। असहिष्णुता पर बहस और विरोध के दौरान यह खुलकर सामने आया था कि सत्तापीठ से उपकृत होने वाले कैसे अब तक अभिव्यक्ति और चेतना के जनवादी तकाजों को सिर पर लेकर घूम रहे थे। नक्सलवाद तक को कविता का तेवर और प्रासंगिक मिजाज ठहराने वालों ने देश में उस धारा और चेतना का रचनात्मक अभिव्यक्ति को कैसे दरकिनार और अनसुना किया, उसकी तारीखी मिसाल हैजयप्रकाश आंदोलन। इस आंदोलन को लेकर वाम शिविर शुरू से शंकालु और दुविधाग्रस्त रहा। यहां तक कि लोकतंत्र के हिफाजत में सड़कों पर उतरने के जोखिम के बजाय उनकी तरफ से आपातकाल के समर्थन तक का पाप हुआ। 
अब जबकि वाम शिविर की प्रगतिशीलता अपने अंतर्विरोधों के कारण खुद- ब-खुद अंतिम ढलान पर है तो हमें एक खुली और धुली दृष्टि से इतिहास के उन पन्नों पर नजर दौड़ानी चाहिए, जिस पर अब तक वाम पूर्वाग्रह की धूल जमती रही है। जयप्रकाश नारायण 74 आंदोलन के दिनों में अकसर कहा करते थे कि कमबख्त क्रांति भी आई तो बुढ़ापे में। पर इसे बुढ़ापे की पकी समझ ही कहेंगे कि संपूर्ण क्रांति का यह महानायक अपने क्रांतिकारी अभियान में संघर्षशील युवाओं और रचनात्मक कार्यकर्ताओं की जमात के साथ कलम के उन सिपाहियों को भी भूला नहीं, जो जन चेतना की अक्षर ज्योति जलाने में बड़ी भूमिका निभा सकते थे। संपूर्ण क्रांति का शीर्ष आह्वान गीत 'जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है’ रचने वाले रामगोपाल दीक्षित ने तो लिखा भी कि 'आओ कृषक श्रमिक नागरिकों इंकलाब का नारा दो/ गुरुजन शिक्षक बुद्धिजीवियों अनुभव भरा सहारा दो/ फिर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है/ तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्बार पर आई है।’ दरअसल जेपी उन दिनों जिस समग्र क्रांति की बात कह रहे थे, उसमें तीन तत्व सर्वप्रमुख थे- शिक्षा, संस्कृति और अध्यात्म। कह सकते हैं कि यह उस जेपी की क्रांतिकारी समझ थी जो मार्क्स और गांधी-विनोबा के रास्ते 74 की समर भूमि तक पहुंचे थे। दिलचस्प है कि सांतवें और आठवें दशक की हिन्दी कविता में आक्रोश और मोहभंग के स्वर एक बड़ी व्याप्ति के स्तर पर सुने और महसूस किए जाते हैं। अकविता से नयी कविता की तक की हिन्दी काव्ययात्रा के सहयात्रियों में कई बड़े नाम हैं, जिनके काव्य लेखन से तब की सामाजिक चेतना की बनावट पर रोशनी पड़ती है। पर दुर्भाग्य से हिन्दी आलोचना के लाल साफाधारियों ने देश में 'दूसरी आजादी की लड़ाई’ की गोद में रची गई उस काव्य रचनात्मकता के मुद्दे पर जान-बुझकर चुप्पी अखितियार कर ली है, जिसमें कलम की भूमिका कागज से आगे सड़क और समाज के स्तर पर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की हो गई थी। न सिर्फ हिन्दी ब्लकि विश्व की दूसरी भाषा के इतिहास में भी यह एक अनूठा अध्याय, एक अप्रतिम प्रयोग था।
जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े कवियों के 1978 में प्रकाशित हुए रचना संग्रह 'समर शेष है’ की प्रस्तावना में प्रख्यात आलोचक डा. रघुवंश कहते भी हैं, 'मैं नयी कविता के आंदोलन से जोड़ा गया हूं क्योंकि तमाम पिछले नये कवियों के साथ रहा हूं, परंतु उनकी रचनाओं पर बातचीत करता रहा हूं। परंतु 'समर शेष है’ के रचनाकारों ने जेपी के नेतृत्व में चलने वाले जनांदोलन में अपने काव्य को जो नयी भूमिका प्रदान की है, उनका मूल्यांकन मेरे लिए एकदम नयी चुनौती है।’ कागज पर मूर्तन और अमूर्तन के खेल को अभिजात्य सौंदर्यबोध और नव परिष्कृत चेतना का फलसफा गढ़ने वाले वाम आलोचक अगर इस चुनौती को स्वीकार करने से आज तक बचते रहे हैं तो इसे हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए एक दुर्भाग्यपूणã स्थिति ही कहेंगे। मौन कैसे मुखरता से भी ज्यादा प्रभावशाली है, इसे आठ अप्रैल 1974 को आंदोलन को दिए गए जेपी के पहले कार्यक्रम से भलीभांति समझा जा सकता है।यह पहला कार्यक्रम एक मौन जुलूस था। 'हमला चाहे जैसा होगा हाथ हमारा नहीं उठेगा’ जैसे लिखे नारों वाली तख्तियों को हाथों में उठाए और हाथों में पट्टी बांधे हुए सत्याग्रहियों की जो जमात पटना की सड़कों पर चल रही रही थी, उसमें संस्कृतिकर्मियों की टोली भी शामिल थी। इस जुलूस में हिस्सा लेने वालों में फणीश्वरनाथ 'रेणु’ का नाम सर्वप्रमुख था। संपूर्ण क्रांति आंदोलने के लिए दर्जनों लोकप्रिय गीत रचने वाले गोपीवल्लभ सहाय ने तो समाज, रचना और आंदोलन को एक धरातल पर खड़ा करने वाले इस दौर को 'रेणु समय’ तक कहा है। अपने प्रिय साहित्यकारों को आंदोलनात्मक गतिविधियों से सीधे जुड़ा देखना जहां सामान्य लोगों के लिए एक सामान्य अनुभव था, वहीं इससे आंदोलनकारियों में भी शील और शौर्य का तेज बढ़ा। व्यंग्यकार रवींद्र राजहंस की उन्हीं दिनों की लिखी पंक्तियां हैं, 'अनशन शिविर में कुछ लोग/ रेणु को हीराबाई के रचयिता समझ आंकने आए/ कुछ को पता लगा कि नागार्जुन नीलाम कर रहे हैं अपने को/ इसलिए उन्हें आंकने आए।’ बाद के दिनों में आंदोलन की रौ में बहने वाले कवियों और उनकी रचनाओं की गिनती भी बढ़ने लगी। कई कवियों-संस्कृतिकर्मियों को इस वजह से जेल तक की हवा खानी पड़ी। लोकप्रियता की बात करें तो तब परेश सिन्हा की 'खेल भाई खेल/सत्ता का खेल/ बेटे को दिया कार कारखाना/ पोसपुत के हाथ आई भारत की रेल’, सत्यनारायण की 'जुल्म का चक्का और तबाही कितने दिन’, गोपीवल्लभ सहाय की 'जहां-जहां जुल्मों का गोल/ बोल जवानों हल्ला बोल', रवींद्र राजहंस की 'सवाल पूछता है जला आदमी/ अपने शहर में कहां रहता है भला आदमी।’ कवियों ने जब नुक्कड़ गोष्ठियां कर आम लोगों के बीच आंदोलन का अलख जगाना शुरू किया तो इस अभिक्रम का हिस्सा बाबा नागार्जुन जैसे वरिष्ठ कवि भी बने। बाबा तब डफली बजाते हुए नाच-नाचकर गाते- 'इंदूजी-इंदूजी क्या हुआ आपको/ सत्ता के खेल में भूल गई बाप को...।’ दिलचस्प है कि चौहत्तर आंदोलन में मंच और मुख्यधारा के कवियों के साथ सर्वोदयी-समाजवादी कार्यकर्ताओं के बीच से भी कई काव्य प्रतिभाएं निकलकर सामने आईं। जयप्रकाश अमृतकोष द्बारा प्रकाशित ऐतिहासिक स्मृति ग्रंथ 'जयप्रकाश’ में भी इनमें से कई गीत संकलित हैं। इन गीतों में रामगोपाल दीक्षित के 'जयप्रकाश का बिगूल बजा’ के अलावा 'हम तरुण हैं हिद के/ हम खेलते अंगार से’ (डा. लल्लन), 'आज देश की तरुणाई को अपना फर्ज निभाना है’ (राज इंकलाब), 'युग की जड़ता के खिलाफ एक इंकलाब है’ (अशोक भार्गव) आदि जयप्रकाश आंदोलन की गोद से पैदा हुए ऐसे ही गीत हैं।
हिन्दी कविता की मुख्यधारा के लिए यह साठोत्तरी प्रभाव का दौर था। आठवें दशक तक पहुंचते-पहुंचते जिन कविताओं की शिननाख्त 'मोहभंग की कविताओं’ या क्रुद्ध पीढ़ी की तेजाबी अभिव्यक्ति के तौर पर की गई, जिस दौर को अपने समय की चुनौती और यथार्थ से सीधे संलाप करने के लिए याद किया जाता है, इसे विडंबना ही कहेंगे कि वहां समय की शिला पर ऐसा कोई भी अंकन ढूंढ़े नहीं मिलता है जहां तात्कालिक स्थितयों कोे लेकर प्रत्यक्ष रचनात्मक हस्तक्षेप का साहस दिखाई पड़े। नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती और दुष्यंत कुमार जैसे कुछ कवियों को छोड़ दें तो उक्त नंगी सचाई से मंुह ढापने के लिए शायद ही कुछ मिले। अलबत्ता यह भी कम दिलचस्प नहीं हैकि तब मुख्यधारा से अलग हिन्दी काव्य मंचों ने भी पेशेवर मजबूरियों की सांकल खोलते हुए तत्कालीन चेतना को स्वर दिया। मंच पर तालियों के बीच नीरज ने साहस से गाया- 'संसद जाने वाले राही कहना इंदिरा गांधी से/ बच न सकेगी दिल्ली भी अब जयप्रकाश की आंधी से।’ कहना नहीं होगा कि हर आंदोलन का एक साहित्य होता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी भाषा के साहित्येतिहास में कई आंदोलन होते हैं। इस लिहाज से जयप्रकाश आंदोलन का भी अपना साहित्य था। पर बात शायद यहीं पूरी नहीं होती है। अगर जयप्रकाश आंदोलन और उससे जुड़े साहित्य का आलोचनात्मक मूल्यांकन हो तो निष्कर्ष आंख खोलने वाले साबित हो सकते हैं। एक बार फिर डा. रघुवंश के शब्दों की मदद लें तो जयप्रकाश आंदोलन के 'कवियों ने लोकचेतना की रक्षा की लड़ाई में अगर अपने रचनाधर्म को उच्चतम स्तर पर
विसर्जित-प्रतिष्ठित किया।’ 

बुधवार, 17 सितंबर 2014

सन्निधि संगोष्ठी


सन्निधि संगोष्ठी दिल्ली में होने वाली साहित्यक गतिविधियों का अब एक जरूरी पन्ना बनता जा रहा है। इसका सतत आयोजन एक उपलब्धि की तरह है। मेरे पुराने साथी और वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत की इस आयोजन को सफल और सतत बनाने में बड़ी भूमिका रही है। इस बारे में समय-समय पर उनसे बातचीत भी होती रही। यह मैं अपना दुर्भाग्य या पत्रकारीय पेशे की मजबूरी मानता हूं कि अब तक मैं इस गोष्ठी में शरीक नहीं हो सका।
इस बार 21 सितंबर को यह गोष्ठी होगी। मेरे लिए संतोष और खुशी की बात है इस बार मैं भी इसका हिस्सा बनने जा रहा हूं।
इस बार की गोष्ठी में की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र कर रहे हैं। 'सिनेमा और हिंदी’ विषय पर मुख्य वक्ता हैं विनोद भारद्बाज। मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित हैं प्रसिद्ध कथाकार नासिरा शर्मा।
विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. किरण पाठक और मुझ कलम घसीट को आयोजकों ने बुलाया है। 

सोमवार, 15 सितंबर 2014

पत्थर फेंकने वाला अकवि


वरिष्ठ कवि चंद्रकांत देवताले ने अपने समकालीन कई कवियों के साक्षात्कार लिए हैं, जो अब पुस्ताकार रूप में सामने आया है। इन साक्षात्कारों से गुजरते हुए देवताले के अपने कविकर्म को लेकर कई बातें बरबस जेहन को घेरती चली गईं। देवताले पचास के दशक के आखिर में हिदी कविता जगत में एक हस्तक्षेप के रूप में उभरते हैं और उनका यह हस्तक्षेप आगे चलकर भी न तो कभी स्थगित हुआ और न ही कमजोर पड़ा। उनकी काव्य संवेदना पर वीरेन डंगवाल की चर्चित टिप्पणी है कि वे 'हाशिए’ के नहीं बल्कि 'परिधि’ के कवि हैं।
देवताले की कविताओं में स्वातंत्रोत्तर भारत में जीवनमूल्यों के विघटन और विरोधाभासों को लेकर चिता तो है ही, एक गंभीर आक्रोश और प्रतिकार भी है। अपने रचनाकर्म को लेकर उनकी तत्पर प्रतिबद्धता इस कारण कभी कम नहीं हुई कि उनके कई समकालीनों के मुकाबले आलोचकों ने उनको लेकर एक तंग नजरिया बनाकर रखा। जाहिर है कि इस कारण अर्धशती से भी ज्यादा व्यापक उनके काव्य संसार को लेकर एक मुकम्मल राय तो क्या बनती, उलटे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सरोकारों को लेकर सवाल उठाए गए। किसी ने उन्हें 'अकवि’ ठहराया तो किसी ने उनकी वैचारिक समझ पर अंगुली उठाई। देवताले के मू्ल्यांकन को लेकर रही हर कसर उन्हें 2०12 के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुने जाने के बाद पूरी हो जानी चाहिए थी, पर ऐसा हुआ नहीं।
चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार उनके 2०1० में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूं’ के लिए दिया गया था। यह उनकी एक महत्वपूर्ण काव्य पुस्तक है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं। 'भूखंड तप रहा है’ और 'लकड़बग्घा हंस रहा है’, 'पत्थर की बेंच’ और 'आग हर चीज में बताई गई थी’ जैसे उनके काव्य संकलन उनकी रचनात्मक शिनाख्त को कहीं ज्यादा गढ़ते हैं। बहरहाल, यह विवाद का विषय नहीं है। वैसे भी अकादमी सम्मान के बारे में कहा जाता है कि यह भले किसी एक कृति के लिए दिया जाता हो, पर यह कहीं न कहीं पुरस्कृत साहित्यकार के संपूर्ण कृतित्व का अनुमोदन है। बहरहाल, एक दरकार तो इस विलक्षण कवि को लेकर अब भी शेष है कि उनके काव्य बोध और विपुल कवि कर्म का पुनरावलोकन करने की आलोचकीय चुनौती को आगे बढ़कर कोई गंभीर आलोचकीय स्वीकार्य से भर देगा। इस तरह की दरकारों का जीवित रहना और उनका पूरा होना मौजूदा दौर में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समय, समाज और संवेदना का अंतर्जगत आज सर्वाधिक विपन्नता का संकट झेल रहा है। मानव मूल्यों के विखंडन को नए विकासवादी सरोकारों के लिए जरूरी मान लिया गया है।
हिदी का मौजूदा रचना जगत सार्वकालिकता के बजाय तात्कालिक मूल्य बोधों को पकड़ने के प्रति ज्यादा मोहग्रस्त है। यही कारण है कि टिकाऊ रचनाकर्म का अभाव आज हिदी साहित्य की एक बड़ी चिता है। देवताले इस चिता का समाधान तो देते ही हैं, वे हमें उस चेतना से भी लैस करते हैं, जिसकी दरकार एक जीवंत और तत्पर नागरिक बोध के लिए है- 'मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/ और मैंने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया/ जो घृणित युद्ध में शामिल हैं।’ (पत्थर फेंक रहा हूं)

सोमवार, 8 सितंबर 2014

...तो मैं ही क्यों बदनाम हो गई!


जब इस देश के नेताओं में लूट प्रवृति आम हो गई।
पूछ रही है चंबल घाटी मैं ही क्यों बदनाम हो गई।
यह गीत बिहार के वरिष्ठ सर्वोदयी साथी रामशरण भाई का है। इसे वे जेपी आंदोलन और बाद के दिनों में गाते थे। डफली के साथ झूम-झूमकर जब वे गाते थे...तो लोग बस उनसे जुड़ते चले जाते थे। उनके इस जादू के साक्षी विनोबा-जेपी के दौर के लाखों-हजारों लोगों से लेकर जेएनयू कैंपस तक रहा है। अपने तकरीबन दस साल के सामाजिक सेवा और शोध कार्य के दौरान रामशरण भाई से कई मर्तबा मिला और उन्हें सुना।
एक झोले में एक मोटी बिनाई का कुर्ता-धोती, एक पुरानी डायरी और एक-दो और सामान। उनके साथ उनका जीवन इतना ही सरल और बोझरहित था। जहां तक मुझे याद है, अपने जीवन में वे दर्जनों संस्थाओं के सैकड़ों अभिक्रमों से जुड़े पर कभी वेतनभोगी नहीं बने। जीवन को जीने का यह कबीराई अंदाज ही था, जिसने उन्हें आजीवन तत्पर और कार्यरत तो बनाए रखा पर संलग्नता का मोह कहीं से भी बांध न सका, न परिवार से और न ही संस्थाओं से। तभी तो उनके कंठ से जो स्वर फूटे, वे न सिर्फ धुले हुए थे बल्कि सच्चे भी थे। शादी-ब्याह में दिखावे के बढ़े चलन पर उनका गीत याद आता है-
दुई हाथी के मांगै छै दाम,
बेचै छै कोखी के बेटा के चाम
बड़का कहाबै छै कलजुग के कसाई...
एमफिल के लिए चूंकि मैं 'जयप्रकाश आंदोलन और हिदी कविता’ पर काम कर रहा था, लिहाजा आंदोलन के दौर के कई ऐसे लोगों से मिलने का मौका मिला, जो रामशरण भाई जैसे तो पूरी तरह नहीं, पर थे उनके ही समगोत्रीय।
सर्वोदय-समाजवादी आंदोलन में क्रांति गीतों की भूमिका कार्यकताã तैयार करने में सबसे जरूरी और कारगर रही है। 'जय हो...’ और 'चक दे इंडिया...’ गाकर जो तरुणाई जागती है, उसका 'फेसबुक’ कभी भी इतना विश्वसनीय, दृढ़ और जुझारू नहीं हो सकता, जितना किसी आंदोलन की आंच को बनाए और जिलाए रखने के लिए जरूरी है।
रामचंद्र शुक्ल की शब्दावली में कहें तो 'लोक’ की 'परंपरा’ या तो आज कहीं पीछे छूट गई है या फिर बदले दौर में इसकी दरकार को ही खारिज मान लिया गया है। देश में जनगायकों या लोकगायकों की ऐसी परंपरा का अब सर्वथा अभाव दिखता है। दक्षिण भारत में एक स्वर गदर का सुनाई पड़ता है, जो अपनी सांगठनिक और वैचारिक प्रतिबद्धताओं के कारण जन के बजाय कैडर की आवाज ज्यादा लगता है।
दिलचस्प है कि खुद को प्रगतिशील मानने वाले छात्रों की जमात विश्वविद्यालयों में अपनी सांगठनिक-वैचारिक गतिविधियों के दौरान कुछ कवियों की काव्य पंक्तियां तख्तियों पर लिखकर आज भी लहराती हैं तो इसके जवाब में राष्ट्रवादी या दक्षिणपंथी कहे जाने वाले संगठनों से जुड़े छात्र राष्ट्रीयता से ओतप्रोत काव्य पंक्तियों का सहारा लेते हैं। पिछले दिनों अण्णा के आंदोलन के दौरान भी या तो देशप्रेम के फिल्मी गाने बजे या फिर गिटार पर कुछ बेसधी धुन।
आंदोलन का जन चेहरा जन औजारों से ही गढ़ा जा सकता है। यह बात रामशरण भाई जैसे जनगायकों को देखने-जानने के बाद और ज्यादा समझ में आती है।

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

अदम की शायरी का दम


अभी मैनेजर पांडे की कई किताबें आई हैं। उन्हीं में एक में अदम गोंडवी पर उनका लेख है। याद हो आया कि अखबार के दफ्तर में काम के दौरान ही अदम के देहांत की खबर मिली थी। अखबार के ही एक साथी ने दौड़कर आकर बताया था। इसे हिदी पत्रकारिता के दिलो-दिमाग में उतरा देशज संस्कार कहें या जमीनी सरोकार कि तमाम अखबारों ने अगले दिन अदम के देहांत की खबर को स्थान देना जरूरी समझा।
अदम जनता के शायर थे और अपनी शख्सियत में भी वे आमजन की तरह ही सरल और साधारण थे। पुराने गढ़न की ठेहुने तक की मटमैली छह-छत्तीस धोती, मोटी बिनाई का कुर्ता और गले में सफेद गमछा लपेटे अदम को जिन लोगों ने कभी मुशायरों-कवि सम्मेलनों में सुना होगा, उन्हें इस निपट गंवई शायर के मुखालफती तेवर के ताव और घाव आज ज्यादा महसूस हो रहे होंगे।
हिदी की कुलीन बिरादरी इस भाषा को किताबों और सभाकक्षों में चाहे जो स्वरूप देकर अपना सारस्वत धर्म निबाहे, इसकी आत्मा तो हमेशा लोक और परंपरा के मेल में ही बसती है। यही कारण है कि अपने समय की सबसे चर्चित और स्मृतियों का हिस्सा बनी काव्य पंक्तियों के रचयिता इस जनकवि को अदबी जमात ने अपने हिस्से के तौर पर मन से कभी नहीं कबूला।
अदम काफी हद तक कबीराई मन-मिजाज के शायर थे। इसलिए उन्हें इस बात का कभी अफसोस रहा भी नहीं कि उन्हें उनके समकालीन साहित्यकार और आलोचक किस खांचे में रखते हैं। कवि सम्मेलनों और मुशायरों का हल्का और बाजारू चरित्र उन्हें खलता तो बहुत था पर वे इन मंचों को जनता तक पहुंचने का जरिया मानकर स्वीकार करते रहे।
अपने करीब 63 साल के जीवन में उन्होंने हिदुस्तान की उम्मीद और तकदीर का वह हश्र सबसे ज्यादा महसूस किया जिसने आमजन के भरोसे और उम्मीद को कुम्हलाकर
रख दिया।
सत्ता, सियासत और दौलत के गठबंधन ने गांव और गरीब को जैसे और जितनी तरह से ठगा, उसका जीवंत चित्र अदम की शायरी का सबसे बड़ा सरमाया है। अपने समय में सत्ता के खिलाफ वे सबसे हिमाकती और मुखालफती आवाज थे।
'काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में/ उतरा है रामराज्य विधायक निवास में’, 'इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया/ सेक्स की रंगीनियां या गोलियां सल्फास की’, 'जो न डलहौजी कर पाया वो ये हुक्मरान कर देंगे/ कमीशन दो तो हिदुस्तान को नीलाम कर देंगे’....जैसे नारे और बगावती बयाननुमा पंक्तियों को लोगों की जुबान पर छोड़ जाने वाले अदम गोंडवी के बाद जनभावनाओं को निर्भीक अभिव्यक्ति
देने वाली जनवादी काव्य परंपरा की निडरता शायद ही कहीं नजर आए।
जहां तक कथन के साथ काव्य शिल्प का सवाल है तो हिदी में दुष्यंत कुमार के बाद अदम गोंडवी अकेले ऐसे शायर हैं, जिन्होंने न सिर्फ हिदी शायरी की जमीन का रकबा बढ़ाया बल्कि उसे मान्यता और लोकप्रियता भी दिलाई। हिदी के काव्य हस्ताक्षरों की कबीराई परंपरा में अदम नागार्जुन और त्रिलोचन की परंपरा के कवि थे।

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

अंत नहीं अनंत खुशवंत


खुशवंत सिंह अपनी उम्र की गिनती को दहाई से सैकड़े तक नहीं ले जा सके। यह अफसोस उनके चाहने वालों को हमेशा रहेगा। अलबत्ता जिस जिदादिली से वह जीते रहे उसे देखकर तो किसी को भी रक्स होगा। विवाद, यश, प्रतिष्ठा, सम्मान और संतोष सब कुछ भरपूर था उनके जीवन में।
उन्होंने अपने 99 साल के जीवन में न सिर्फ स्वाधीन भारत के लिए संघर्ष और नए राष्ट्र का निर्माण देखा बल्कि वे विभाजन और सिख दंगों समेत इतिहास के कई दुखद प्रसंगों के भी साक्षी रखे। उनके लेखन में ये दोनों तरह के अनुभव बखूबी दर्ज हुए हैं।
खुशवंत की जिंदादिली का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि वे विवादों में बेशक हमेशा रहे पर लोगों की नफरत के शिकार कभी नहीं हुए। इसके उलट उन्हें हर क्षेत्र के लोगों से बेपनाह मोहब्बत मिलती रही। शराब और औरतों को लेकर वे भले बढ़-चढ़कर बातें करते हों, पर उनके चरित्र को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा। बदनामी के जोखिम के बीच नाम और शोहरत पाने की उनकी ललक को देखकर तो कई बार हैरत होती थी।
दिल्ली से उन्हें बहुत प्रेम था। यहां के कई प्रसिद्ध परिवारों से उनके काफी नजदीकी रिश्ते थे। यह सब उनके पिता के जमाने से चला आ रहा था। दिल्ली के सिख समुदाय के लोगों के तो वे काफी आत्मीय थे। वैसे बात चाहने वालों की करें तो क्या कोलकाता और क्या मुंबई, उनके मुरीद देश में हर जगह थे।
खुशवंत जितने भारत में लोकप्रिय थे, उतने ही पाकिस्तान में भी। उनकी किताब 'ट्रेन टु पाकिस्तान’ बेहद लोकप्रिय हुई। इस पर फिल्म भी बन चुकी है। उन्हें 1974 पद्मभूषण और 2००7 में पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया गया था। उनके पिता का नाम सर सोभा सिह था, जो अपने समय के प्रसिद्ध रईस और जमींदार थे। एक जमाने में सोभा सिह को आधी दिल्ली का मालिक कहा जाता था।
खुशवंत ने गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से तालीम हासिल की। पसंद नहीं आने के बावजूद उन्हें कानून की पढ़ाई करनी पड़ी। उनका विवाह कंवल मलिक के साथ हुआ। उनके बेटे का नाम राहुल सिह और पुत्री का नाम माला है।
एक पत्रकार के तौर पर खुशवंत सिह ने काफी ख्याति अर्जित की। 1951 में वे आकाशवाणी से जुड़े और 1951 से 1953 तक भारत सरकार के पत्र 'योजना’ का संपादन किया। मुंबई से प्रकाशित प्रसिद्ध अंग्रेजी साप्ताहिक 'इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ के और 'न्यू देहली’ के वे 198० तक संपादक थे। वे 'नेशनल हेराल्ड’ के भी संपादक रहे। 1983 तक दिल्ली के अंग्रेजी दैनिक 'हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादक भी वही थे। तभी से वे प्रति सप्ताह एक लोकप्रिय कॉलम लिखते थे, जो अनेक भाषाओं के दैनिक पत्रों में प्रकाशित होता था।
उनके तीन उपन्यास खासे प्रसिद्ध हैं- 'देहली’, 'ट्रेन टु पाकिस्तान’ और 'दि कंपनी ऑफ वूमन’। वर्तमान संदर्भों और प्राकृतिक वातावरण पर भी उनकी कई रचनाएं हैं। दो खंडों में प्रकाशित 'सिखों का इतिहास’ उनकी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति है। साहित्य के क्षेत्र में पिछले सात दशकों में खुशवंत सिह का विविध आयामी योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1947 से कुछ सालों तक खुशवंत सिह ने भारत के विदेश मंत्रालय में विदेश सेवा के महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। 198० से 1986 तक वे राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। सेक्स, मजहब, भाषा खासतौर पर हिंदी और ऐसे ही कुछ विषयों पर की गई टिप्पणियों के कारण वे हमेशा आलोचना के केंद्र में रहे। पर यह सब शायद जिंदादिली से जीवन जीने का उनका तरीका था। भीतर से वे खासे संवेदनशील इनसान थे और देश-समाज की चिंताओं से हमेशा गहराई से जुड़े रहे।
यह अलग बात है कि अपने सरोकारों और रास्तों को तय करते हुए वे कभी लकीर के फकीर नहीं बने। अपने लेखन की तरह अपनी शख्सियत को भी उन्होंने अपने तरीके से ही गढ़ा। जीवन और रचना के बीच आत्मविश्वास का ऐसा गाढ़ा मेल शायद ही कहीं और देखने को मिले।

रविवार, 25 अगस्त 2013

मीडिया और नियमन



मीडिया और नियमन। बहस का यह मुद्दा पिछले कुछ सालों में देश में जिस तरह उठा है, उसके एक नहीं बल्कि कई निहितार्थ हैं। सरकार का एक बड़बोला मंत्री जब यह कहता है कि बार काउंसिल के लाइसेंस की तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में उतरने से पहले पत्रकारों को लाइसेंसशुदा होना जरूरी होना चाहिए तो समझ में यही बात आती है कि यह सुझाव से ज्यादा चिढ़ है देश की मीडिया के प्रति। यह चिढ़ पूर्वाग्रहग्रस्त भी है।
दरअसल, 21वीं सदी लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए कई नई चुनौती लेकर आई है। इस सदी के दूसरे दशक से तो इन चुनौतियों ने सड़कों पर अपने तेवर एकाधिक बार दिखाए। मुद्दा भ्रष्टाचार का हो कि संसद और जनता के बीच सर्वोच्चता को लेकर छिड़ी बहस, इन तमाम सवालों पर जनता घरों से बाहर निकली। और वह भी बिना किसी राजनीतिक छतरी के नीचे आए। जो सूरत बनी उसमें लोकतांत्रिक सशक्तिकरण की असीम संभावनाएं थीं। ये संभावनाएं आज भी बहाल हैं। इसी दौर में देश और राज्यों की राजधानियों में बैठे जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों और उनके समर्थन से बनी सरकारों को लगने लगा कि यह प्रखर नागरिक चेतना उनके पूरे अस्तित्व को मिट्टी की भीत की तरह भर-भराकर गिरा देगी। लिहाजा इस नागरिक सशक्तिकरण को तीव्र और प्रभावी बनाने वाले हाथ को मरोड़ा जाए। मीडिया इसी हाथ का नाम है। लोकतंत्र का चौथा खंभा कहकर जिसे सरकारें अब तक इज्जत तो बख्शती रही हैं पर उसकी अतिशय संलग्नता और तत्परता को कभी गले नहीं उतार पाई हैं। इमरजेंसी के दिनों में इसका सबसे क्रूर रूप हम देख चुके हैं।
जनता के लिए लोकतांत्रिक साझेदारी का मतलब सिर्फ पांच साल में एक बार मतदान केंद्र के बाहर कतार में खड़े होना भर नहीं है। उसकी साझेदारी तो इससे आगे की है और इसी दरकार ने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को जन्म दिया है। पर दुर्भाग्य से इस दरकार को निर्वाचित जनों और संस्थाओं ने अपने लिए ज्यादा सुरक्षित बनाने का उपक्रम बना लिया और अब तो सूरत यह है कि जनता की लोकतांत्रिक प्रतिभागिता पूरी व्यवस्था में इतनी भर रह गई है कि उसके नाम पर भले सब कुछ होता है पर उसकी मर्जी का कुछ भी नहीं। अखबारों-टीवी चैनलों के बढ़े प्रसार के साथ सोशल मीडिया के नए दमखम ने दुनिया भर के शासक वर्ग के सामने अनुशासन और अनुशीलन का दबाव बढ़ाया है। भारत में इस खतरे को बढ़ते देख सरकार ने कई बार अलग-अलग तरीके से मीडिया पर आंखें तरेरी हैं, उसकी आलोचना की है। चूंकि देश सेंसरशिप और इमरजेंसी के दौर से काफी आगे निकल आया है इसलिए आज मीडिया के मुंह पर जाबी पहनाने की हिमाकत तो शायद ही कोई करे। पर अगर कोई यह कहे कि पत्रकारों के भी लाइसेंस बनने चाहिए, उनके लिए भी एप्टिट्यूड टेस्ट होने चाहिए तो इतना तो लगता ही है कि उसे देश के पत्रकारिता आंदोलन के बारे में जानकारी थोड़ी कम है।
अगर हम बात करें प्रिंट मीडिया की तो देश में पत्रकारिता के लिहाज से दो दौर खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। एक आजादी से पूर्व का दूसरा ग्लोबलाइजेशन के बाद का। अगर एक पराधीन देश की जनता ने जिद पर आने पर दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी सत्ता की चूलें हिलाकर रख दीं तो उसके पीछे देश की भाषाई पत्रकारिता का बहुत बड़ा हाथ था। साहित्यकारों-पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी ने देश के आत्मसम्मान को जगाया और स्वाधीनता की ललक जन-जन में पैदा की। बाद में ग्लोबलाइजेशन के दौर में लगने लगा कि खुरदरे कागजों पर खबर पढ़ने का दौर अब पीछे छूट जाएगा क्योंकि उपभोक्तावादी सनक के साथ टीवी चैनलों की खुलती छतरियों और इंटरनेट के बढ़े जोर के बाद इतनी फुर्सत किसे होगी कि वह घर में बैठकर अखबार बांचे। पर हुआ ठीक इसके उलटा। भाषाई पत्रकारिता ने इस दौर में अपना सबसे बड़ा आरोहण दिखाया। प्रसार के साथ कमाई दोनों में उसने कुबेरी आख्यान रचे। और यह सफलता उस देश में मायने रखती है जहां सरकार को अभी सर्वशिक्षा का प्रण ही दोहराना पड़ रहा है।
ऐसी स्थिति में महज इस कारण से कि जनता के मुद्दे अगर मीडिया की ताकत के साथ देश का एजेंडा बनने लगे तो खतरनाक है, यह सोच कमजोर सत्ता प्रतिष्ठानों में ही उभर सकती है। एक गांधीवादी सामाजिक कार्यकताã के अनशन के आगे मजबूर होकर जब देश की संसद को अपनी कार्यवाही चलानी पड़ी, प्रस्ताव पारित करने पड़े तो उसके साथ यह भी साफ हो गया कि लोकमत और मीडिया के साझे से देश में लोकतंत्र की नई लहर शुरू हो सकती है। फिर क्या था, नेताओं के एक के बाद एक बयान आए कि मीडिया ने अण्णा आंदोलन को ओवरएक्सपोज किया। यही स्थिति तब भी सामने आई जब पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ की गई बर्बरता के खिलाफ पूरे देश के युवा आक्रोशित होकर घरों से बाहर आए।
देश की राजनीतिक जमात को अभी तक यही लगता रहा है कि उनके मुद्दे और उनकी सोच और पहल से ही देश में लोकतंत्र की गाड़ी आगे बढ़नी चाहिए। जनता बस इस गाड़ी में सवारी की तरह बैठ जाए, वह ड्राइविंग सीट पर आने की हिमाकत ना करे। यहां तक कि प्रेस परिषद के मुखिया जस्टिस काटजू जैसे लोगों के दिमाग में भी यही बात आती है कि पत्रकारिता के पेशे में कूप-मंडूक लोग भरे पड़े हैं।
नक्सल हिंसा से लेकर किसानों की आत्महत्या तक को लेकर जमीनी रिपोर्टों और इन पर बहस का दुस्साहस देश के पत्रकारों ने दिखाया है। इस कवरेज के साथ प्रबंधकीय मुठभेड़ भी पत्रकारों को करनी पड़ी है। बावजूद इसके आज अगर भ्रष्टाचार को लेकर केंद्र से लेकर कई सूबों की सरकारें हलकान हैं तो उसके पीछे भी मीडिया की चौकस नजर ही है। पिछले दो-तीन सालों में चले नागरिक सशक्तिकरण के अभिक्रम को भी मीडिया का संबल इसलिए मिला क्योंकि यह समय की मांग है। देश की राजनीतिक बिरादरी अगर आज जनता की नजरों में अपना इकबाल खोती जा रही है तो उसकी वजह ये लोग खुद हैं। आप आईने पर यह दबाव नहीं डाल सकते कि वह आपको मनमाफिक तरीके से दिखाए। यह बात मनीष तिवारी के साथ उन तमाम लोगों को समझनी चाहिए जिन्हें उनके जैसा बोलना-सोचना अच्छा लगता है। यह बात उन जस्टिस साहब को भी समझनी चाहिए जिन्हें मीडिया मीडियाकरों की जमात लगती है और देश के नब्बे फीसद लोग जाहिल। परिवर्तन का हरकारा इस देश में मीडिया हमेशा रहा है और आज उसके लिए कई बिजनेस कंपल्शन बढ़ जाने के बावजूद अगर उसके भीतर यह जज्बा बहाल है, फिर तो सूचना और खबरों के इस पूरे तंत्र को सलाम। नियमन और लाइसेंस की दरकार तो वहां ज्यादा है जहां निर्वाचित निर्वाचकों के स्वयंभू स्वामी बने फिर रहे हैं।

http://www.nationalduniya.com/

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

पत्थर फेंक रहा हूं द्रौपदी

चंद्रकांत देवताले
देवताले पचास के दशक के आखिर में हिंदी कविता जगत में एक हस्तक्षेप के रूप में उभरते हैं और उनका यह हस्तक्षेप आगे चलकर भी न तो कभी स्थगित हुआ और न ही कमजोर पड़ा। देवताले की काव्य संवेदना पर वीरेन डंगवाल की चर्चित टिप्पणी है, कि वे 'हाशिए' के नहीं बल्कि 'परिधि' के कवि हैं। उनकी कविताओं में स्वातंत्रोत्तर भारत में जीवनमूल्यों के विघटन और विरोधाभासों को लेकर चिंता तो है ही, एक गंभीर आक्रोश और प्रतिकार भी है। अपनी रचनाधर्मिता के प्रति उनकी संलग्नता इस कारण कभी कम नहीं हुई कि अपने कई समकालीनों के मुकाबले आलोचकों ने उनको लेकर एक तंग नजरिया बनाकर रखा।
जाहिर है कि इस कारण अर्धशती से भी ज्यादा व्यापक उनके काव्य संसार को लेकर एक मुकम्मल राय तो क्या बनती, उलटे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सरोकारों को लेकर सवाल उठाए गए। किसी ने उन्हें 'अकवि' ठहराया तो किसी ने उनकी वैचारिक समझ पर अंगुली उठाई। देवताले के मू्ल्यांकन को लेकर रही हर कसर उन्हें 2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुने जाने के बाद पूरी हो जाएगी, ऐसा तो नहीं कह सकते। हां, यह जरूर है कि इस कारण उनको लेकर नई पीढ़ी को एक आग्रहमुक्त राय बनाने में मदद मिलेगी। देवताले को यह सम्मान उनके 2010 में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूं' के लिए दिया गया है। यह उनकी एक महत्वपूर्ण काव्य पुस्तक है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं। 'भूखंड तप रहा है' और 'लकड़बग्घा हंस रहा है', 'पत्थर की बेंच' और 'आग हर चीज में बताई गई थी' जैसे उनके काव्य संकलन उनकी रचनात्मक शिनाख्त को कहीं ज्यादा गढ़ते हैं।
बहरहाल, यह विवाद का विषय नहीं है। वैसे भी अकादमी सम्मान के बारे में कहा जाता है कि यह भले किसी एक कृति के लिए दिया जाता हो, पर यह कहीं न कहीं पुरस्कृत साहित्याकार के संपूर्ण कृतित्व का अनुमोदन है। इस कारण एक उम्मीद यह जरूर बंधती है कि देवताले के काव्य बोध और उनके विपुल कवि कर्म का पुनरावलोकन करने की आलोचकीय दरकार देर से ही सही लेकिन अब पूरी होगी। इस तरह की दरकारों का जीवित रहना और उनका पूरा होना मौजूदा दौर में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समय, समाज और संवेदना का अंतजर्गत आज सर्वाधिक विपन्नता का संकट झेल रहा है। मानव मूल्यों के विखंडन को नए विकासवादी सरोकारों के लिए जरूरी मान लिया गया है। यह एक खतरनाक स्थिति है पर इस खतरे को रेखांकित करने का जोखिम कोई लेना नहीं चाहता है।
देवताले हिंदी की अक्षर संवेदना को बनाए और बचाए रखने वाले महत्वपूर्ण कवियों में हैं। हिंदी का मौजूदा रचना जगत  सार्वकालिकता के बजाय तात्कालिक मूल्य बोधों को पकड़ने के प्रति ज्यादा मोहग्रस्त मालूम पड़ता है। यही कारण है कि टिकाऊ रचानकर्म का अभाव आज हिंदी साहित्य की एक बड़ी चिंता बनकर उभर रही है। देवताले इस चिंता का समाधान तो देते ही हैं, वे हमें उस चेतना से भी लैस करते हैं, जिसकी दरकार एक जीवंत आैर तत्पर नागरिक बोध के लिए है- 'मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/ आैर मैंने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया/ जो घृणित युद्ध में शामिल हैं।' (पत्थर फेंक रहा हूं)
प्रतिभा राय
2011 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हो गई है और इस बार इसके लिए चुनी गई हैं वरिष्ठ उडि़या कथाकार प्रतिभा राय। प्रतिभा राय भारतीय साहित्यकारों की उस पीढ़ी की हैं, जिन्होंने गुलाम नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में अपनी आंखें खोलीं। लिहाजा, अपनी अक्षर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें स्वतंत्र लीक गढ़ने का हौसला दिखाया। उडि़या से बाहर का रचना संसार उनके इस हौसले से ज्यादा करीब से तब परिचित हुआ, जब उनका उपन्यास आया- 'द्रौपदी'। भारतीय पौराणिक चरित्रों को लेकर नवजागरण काल से 'सुधारवादी साहित्य' लिखा जा रहा है, जिसमें ज्यादा संख्या काव्य कृतियों की है। कथा क्षेत्र में इस तरह का कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ।
समाकालीन जीवन के गठन और चिंताओं को लेकर एक बात इधर खूब कही जाती है कि साहित्य के मौजूदा सरोकारों पर खरा उतरने के लिए अब 'बिंबात्मक' औजार से ज्यादा जरूरी  है- 'कथात्मक हस्तक्षेप'। मौजूदा भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी दुराग्रहों पर हमला बोलने के लिए राय ने इस दरकार को समझा। 'द्रौपदी' में वह विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर सामाजिक नजरिया, पति-पत्नी संबंध और स्त्री प्रेम को लेकर काफी ठोस धरातल पर संवाद करती हैं। इस संवाद में वह एक तरफ जहां पुरुषवादी आग्रहों को चुनौती देती हैं, वहीं भारतीय स्त्री के गृहस्थ जीवन को रचने वाली विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर भी वह संवेदनात्मक सवाल खड़ी करती हैं।
बहरहाल, 'द्रौपदी' उपन्यास की रचयिता का रचना संसार काफी विषद और विविधतापूर्ण है। कथा साहित्य की विविध विधाओं के साथ कविता के क्षेत्र में भी वह अधिकारपूर्वक दाखिल हुई हैं। यही कारण है कि आज जब उन्हें भारतीय साहित्य क्षेत्र के सर्वाधिक सम्मानित आैर मान्य पुरस्कार के लिए चुना गया है तो निर्णय प्रक्रिया की तटस्थता पर भी कोई सवाल नहीं उठ रहा है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि सुप्रसिद्ध उडि़या लेखक डॉ. सीताकांत महापात्र चूंकि ज्ञानपीठ चयन समिति के अध्यक्ष थे, इसलिए प्रतिभा राय के कृतित्व पर विचार करने और सर्वसम्मत निर्णय लेने में सहुलियत हुई होगी।
राय को इससे पूर्व साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ का ही एक और महत्वपूर्ण पुरस्कार मूर्तिदेवी सम्मान मिल चुका है। लिहाजा उनके साहित्य को नए सिरे अनुमोदित होने की जरूरत नहीं है। उनका रचनाकर्म अभी न तो थका है और न ही विराम के करीब है, इसलिए उनसे आगे और महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों की उम्मीद की जा सकती है।     

रविवार, 9 सितंबर 2012

सोशल मीडिया को अराजक कहने से पहले

सरकार ने एकाधिक मौकों पर यह चिंता जाहिर की है कि सोशल मीडिया का अराजक इस्तेमाल खतरनाक है और इस पर निश्चित रूप से रोक लगनी चाहिए। हाल में असम हिंसा में अफवाह और भ्रामक सूचना फैलाने के पीछे भी बड़ा हाथ सोशल मीडिया का रहा है, यह बात अब विभिन्न स्तरों पर पड़ताल के बाद सामने आई है। इसी तरह का एक दूसरा मामला है, जिसमें पता चला कि लोग पीएमओ के नाम पर ट्वीटर पर फेक एकाउंट खोलकर लोगों में भ्रम फैला रहे हैं। इससे पहले सरकार ने शीर्षस्थ नेताओं को लेकर आपत्तिजनक गुस्से को लेकर इस तरह की साइट चलाने वाले फर्मों को नोटिस तक थमाया था। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि सोशल मीडिया पर सरकार की नीति और कार्यक्रमों पर टिप्पणी की तल्खी अब बढ़ती जा रही है। इसका फायदा अन्ना आंदोलन को भी मिला। आंदोलन की रणनीति बनाने वालों ने लोगों को सड़क पर उतारने के लिए एसएमएस के अलावा सोशल मीडिया का जबरदस्त इस्तेमाल किया। 
बहरहाल, सरकार एक बार फिर जहां साइट प्रबंधनों को इस बाबत चेताने की सोच रही है, वहीं वह अपने उन तामम विभागों को जो सोशल साइटों का किसी भी रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें ताकीद किया है कि वे इन पर गोपनीय व अपुष्ट तथ्य न डालें। सवाल यह है कि क्या साइबर क्रांति की देन अभिव्यक्ति की इस नई स्वतंत्रता के खतरे क्या आज सचमुच इतने बढ़ गए हैं कि बार-बार उस पर नकेल कसने की बात उठने लगी है।
दरअसल, सोशल मीडिया के स्वरूप और विस्तार को लेकर पिछले कुछ सालों में कई स्तरों पर बहस चल रही है। एक तरफ अरब मुल्कों का अनुभव है, जहां आए बदलाव के 'वसंत' का यह एक तरह से सूत्रधार रहा तो वहीं अमेरिका की इराक, ईरान और अफगानिस्तान को लेकर विवादास्पद नीतियों पर तथ्यपूर्ण तार्किक अभियान पिछले करीब एक दशक से 'न्यू मीडिया' के हस्तक्षेप को रेखांकित कर रहा है। इसके अलावा मानवाधिकार हनन से लेकर पर्यावरण सुरक्षा तक कई मुहिम पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति के इस ई-अवतार के जरिए चलाई जा रही है। ऐसे में यह एकल और अंतिम राय भी नहीं बनाई जा सकती कि सोशल नेटवर्किंग साइटों का महज दुरुपयोग ही हो रहा है।
समाज और सोच की विविधता का अंतर और असर सिनेमा से लेकर साहित्य तक हर जगह दिखता है। यही बात सोशल मीडिया को लेकर भी कही जा सकती है। फिर जिस रूप में भूगोल और सरहद की तमाम सीमाएं लांघकर इसका विकास और विस्तार हो रहा है, उसमें इसके कानूनी दायरे को स्पष्ट रूप से रेखांकित कर पाना भी किसी देश के अकेले बूते की बात नहीं है। कोशिश यह होनी चाहिए की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस बड़े जरिए को लेकर दुनिया के तमाम देश मिलकर एक साथ मिल-बैठकर कोई राय बनाएं। यहां यह भी गौरतलब है कि अभिव्यक्ति की आजादी का मुद्दा आज एक तरफ अत्यंत मुखरता के कारण चर्चा में है तो वहीं जन-अभिव्यक्ति और जनपक्षधरता की अभिव्यक्ति की गर्दन पर फांस चढ़ाने की कोशिश दुनिया की कई लोकप्रिय सरकारें कर रही हैं। ऐसे में नियम-कायदों की कमान थामने वालों को भी अपने चरित्र से कहीं न कहीं यह दिखाना होगा कि अपनी जनता के बीच उतना इकबाल इतना भी कमजोर नहीं कि उसे कुछ क्लिक और कुछ पोस्ट डिगा दें।   

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

समय से मुठभेड़ करने वाले अदम

फटे कपड़ों में तन ढांके गुजरता है जिधर कोई।
समझ लेना वो पगडंडी अदम के गांव जाती है।।
जगजीत सिंह, सुल्तान खां, भूपेन हजारिका, श्रीलाल शुक्ल, इंदिरा गोस्वामी, देवानंद... यह साल अपनी विदाई बेला में भी शायद उतना रुदन न लिख सके, जितना जीवन और समाज की संवेदनाओं को अपनी उपस्थिति से नम करने वाली कुछ अजीम शख्सियतों को हमसे छीनकर हमारे दिलों पर लिख दिया है। अभी गम को पुराने बादल छटे भी नहीं थे कि जनकवि अदम गोंडवी का साथ हमेशा के लिए छूट जाने की खबर ने सबको मर्माहत कर दिया। इसे हिंदी पत्रकारिता के दिलो-दिमाग में उतरा देशज संस्कार कहें या जमीनी सरोकार कि तमाम अखबारों ने अदम के देहांत की खबर को स्थान देना जरूरी समझा।
अदम जनता के शायर थे और अपनी शख्सियत में भी वे आमजन की तरह ही सरल और साधारण थे। पुराने गढ़न की ठेहुने तक की मटमैली छह-छत्तीस धोती, मोटी बिनाई का कुर्ता और गले में सफेद गमछा लपेटे अदम को जिन लोगों ने कभी मुशायरों-कवि सम्मेलनों में सुना होगा, उन्हें इस निपट गंवई शायर के मुखालफती तेवर के ताव और घाव आज ज्यादा महसूस हो रहे होंगे। हिंदी की कुलीन बिरादरी इस भाषा को किताबों और सभाकक्षों में चाहे जो स्वरूप देकर अपना सारस्वत धर्म निबाहे, इसकी आत्मा तो हमेशा लोक और परंपरा के मेल में ही बसती है। यही कारण है कि अपने समय की सबसे चर्चित और स्मृतियों का हिस्सा बनी काव्य पंक्तियों के रचयिता इस जनकवि को अदबी जमात ने अपने हिस्से के तौर पर मन से कभी नहीं कबूला।
अदम काफी हद तक कबीराई मन-मिजाज के शायर थे।  इसलिए उन्हें इस बात का कभी अफसोस रहा भी नहीं कि उन्हें उनके समकालीन साहित्यकार और आलोचक किस खांचे में रखते हैं। कवि सम्मेलनों और मुशायरों का हल्का और बाजारू चरित्र उन्हें खलता तो बहुत था पर वे इन मंचों को जनता तक पहुंचने का जरिया मानकर स्वीकार करते रहे। अपने कीब 63 साल के जीवन में उन्होंने हिंदुस्तान की उम्मीद और तकदीर का वह हश्र सबसे ज्यादा महसूस किया जिसने आमजन के भरोसे और उम्मीद को कुम्हलाकर रख दिया। सत्ता, सियासत और दौलत के गठबंधन ने गांव और गरीब को जैसे और जितनी तरह से ठगा, उसका जीवंत चित्र अदम की शायरी का सबसे बड़ा सरमाया है। अपने समय में सत्ता के खिलाफ वे सबसे हिमाकती और मुखालफती आवाज थे।
'काजू भुने प्लेट में व्हिसकी गिलास में/ उतरा है रामराज्य विधायक निवास में', 'इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया/ सेक्स की रंगीनियां या गोलियां सल्फास की', 'जो न डलहौजी कर पाया वो ये हुक्मरान कर देंगे/ कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे'....जैसे नारे और बगावती बयाननुमा पंक्तियों को लोगों की जुबान पर छोड़ जाने वाले अदम गोंडवी के बाद जनभावनाओं को निर्भीक अभिव्यक्ति देने वाली जनवादी काव्य परंपरा की निडरता शायद ही कहीं नजर आए।
जहां तक कथन के साथ काव्य शिल्प का सवाल है तो हिंदी में दुष्यंत कुमार के बाद अदम गोंडवी अकेले ऐसे शायर हैं, जिन्होंने न सिर्फ हिंदी शायरी की जमीन का रकबा बढ़ाया बल्कि उसे मान्यता और लोकप्रियता भी दिलाई। हिंदी के काव्य हस्ताक्षरों की कबीराई परंपरा में अदम नागार्जुन और त्रिलोचन की परंपरा के कवि थे। अदम हिंदी और उर्दू की साझी विरासत के भी खेवनहार थे, यही कारण है कि हिंदी के साथ उर्दू बिरादरी भी उन्हें अपना मानती है। अपने समकालीन उर्दू शायरों में वे बशीर बद्र, मुन्नवर राणा, निदा फाजली, राहत इंदौरी और  वसीम बरेलवी जैसे ताजदार नामों  की तरह जनता की जुबां पर चढ़े शायर थे। शेर लिखने और अर्ज करने का उनका अंदाज बहुत नाटकीय नहीं था। उन्हें सुनने वाले उनके सीधे-सपाट पर बेलाग अंदाज के कायल थे। मानवीय अस्मिता के बढ़ते खतरों के बीच एक खरी और ईमानदार आवाज को मुखालफती जज्बों में बदलने का जोखिम उठाने वाले रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी को विनम्र श्रद्धांजलि।

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

पानी बरसने का सबूत महिलाएं दे रही हैं



बढ़ती गरमी बारिश की याद ही नहीं दिलाती, उसकी शोभा भी बढ़ाती है। केरल तट पर मानसून की दस्तक हो कि राजधानी दिल्ली में उमस भरी गरमी के बीच हल्की बूंदा-बांदी, खबर के लिहाज से दोनों की कद्र है और दोनों के लिए स्पेस भी। अखबारों-टीवी चैनलों पर जिन खबरों में कैमरे की कलात्मकता के साथ स्क्रिप्ट के लालित्य की थोड़ी-बहुत गुंजाइश होती है, वह बारिश की खबरों को लेकर ही। पत्रकारिता में प्रकृति की यह सुकुमार उपस्थिति अब भी बरकरार है, यह गनीमत नहीं बल्कि उपलब्धि जैसी है। पर इसका क्या करें कि इस उपस्थिति को बचाए और बनाए रखने वाली आंखें अब धीरे-धीरे या तो कमजोर पड़ती जा रही हैं या फिर उनके देखने का नजरिया बदल गया है। 
दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ अब तो सूरत, इंदौर, पटना, भोपाल जैसे शहरों में भी बारिश दिखाने और बताने का सबसे आसान तरीका है, किसी किशोरी या युवती को भीगे कपड़ों के साथ दिखाना। कहने को बारिश को लेकर यह सौंदर्यबोध पारंपरिक है। पर यह बोध लगातार सौंदर्य का दैहिक भाष्य बनता जा रहा है। और ऐसा मीडिया और सिनेमा की भीतरी-बाहरी दुनिया को साक्षी मानकर समझा जा सकता है। कई अखबारी फोटोग्राफरों के अपने खिंचे या यहां-वहां से जुगाड़े गये ऐसे फोटो की बाकायदा लाइब्रोरी है। समय-समय पर वे हल्की फेरबदल के साथ इन्हें रिलीज करते रहते हैं और खूब वाहवाही लूटते हैं। नये मॉडल और एक्ट्रेस अपना जो पोर्टफोलियो लेकर प्रोडक्शन हाउसों के चक्कर लगाती हैं, उनमें बारिश या पानी से भीगे कपड़ों वाले फोटोशूट जरूर शामिल होते हैं। बताते हैं कि नम्रता शिरोडकर की बहन शिल्पा शिरोडकर को कई बड़े बैनरों को फिल्में एक दौर में इसलिए मिलीं कि उसे कैमरे के आगे पानी में किसी भी तरह से भीगने से गुरेज नहीं था। खबरें तो यहां तक आर्इं कि उसे एक फिल्म में इतनी बार नहलाया-धुलाया गया कि अगले कई महीनों तक वह निमोनिया से बिस्तर पर पड़ी रही। हीरोइनों के परदे पर भीगने-भिगाने का चलन वैसे बहुत नया भी नहीं है। पर पहले उनका यह भीगना-नहाना ताल-तलैया, गांव-खेत से लेकर प्रेम के पानीदार क्षणों को जीवित करने के भी कलात्मक बहाने थे। 
वह दौर गया, जब रिमझिम फुहारों के बीच धान रोपाई के गीत या सावनी-कजरी की तान फूटे। जिन कुछ लोक अंचलों में यह सांगीतिक-सांस्कृतिक परंपरा थोड़ी-बहुत बची है, वह मीडिया की निगाह से दूर है। इसे उस सनक या समझ का ही कमाल कहेंगे कि टूथपेस्ट बेचना हो या मानसून आने की खबर देनी हो, तरीका चाहे जो भी हो होता दैहिक ही है। बारहमासा गाने वाले देश में आया यह परिवर्तन काफी कुछ सोचने को मजबूर करता है। यह फिनोमना सिर्फ हमारे यहां नहीं पूरी दुनिया का है। पूरी दुनिया में किसी भी पारंपरिक परिधान से बड़ा मार्केट स्विम कॉस्टयूम का है। दिलचस्प तो यह कि अब शहरों में घर तक कमरों की साज-सज्जा या लंबाई-चौड़ाई के हिसाब से नहीं, अपार्टमेंट में स्विमिंग पूल की उपलब्धता की लालच पर खरीदे जाते हैं। इस पानीदार दौर को लेकर इतनी चिंता तो जरूर जायज है कि पानी के नाम पर हमारी आंखों और सोच में कितना पानी बचा है। अगर पानी होने या बरसने का सबूत महिलाएं दे रही हैं तो फिर पुरुषों की दुनिया कितनी प्यासी है। 

रविवार, 10 जुलाई 2011

सत्यजीत रे नहीं होना चाहते थे मणि कौल

अभिव्यक्ति की तमाम विधाएं हैं तो अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र और सक्षम  पर इनके भीतरी सरोकार के धागे पूरी तरह सुलझाए नहीं जा सकते। क्योंकि अगर ऐसा सभंव होता तो फिर उमा शर्मा का कत्थक मिर्जा गालिब की गजलों से नहीं थिरकता और न ही हुसैन राममनोहर लोहिया के कहने पर रामायण पर अपनी विख्यात श्रृंखला को कैनवस पर उतारते।  इस लिहाज से माना यही जाता है कि ये माध्यम स्वतंत्र जरूर हैं पर स्वायत्त या पूरी तरह मुक्त नहीं। पर मामला इससे आगे नजर और नजरिए का भी है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर प्रेमचंद तक को सेल्योलाइड तक ले जाने वाले सत्यजीत रे आजीवन यह समझाते रहे कि वह किसी भी कृति पर फिल्म बनाने की शुरुआत शून्य से करते हैं। उनका तकाजा विधा बदलने के साथ कृति के आस्वाद को बदल जाने की जरूरत को खारिज नहीं करता। जबकि मणि कौल जैसे फिल्मकार ने इस तकाजे को दरकिनार कर न सिर्फ कृति को केंद्र में लाया बल्कि साहित्यक रचनाओं के फिल्मांकन का नया व्याकरण भी रचा।
कौल अब हमारे बीच नहीं हैं पर 66 वर्ष का उनका जीवन और उस दौरान की उनकी उपलब्धियां हमारे बीच है। बीप...बीप... और बोल्डनेस की नई कायिक और भाषिक समझ के बीच जिस भारतीय सिने जगत का कद आज ग्लोबली तय हो रहा है, उसमें मणि कौल के फिल्म बनाने के तरीके और उससे जुड़े सरोकार एक जलती मशाल की तरह है, जिससे अंधकार और भटकाव के दौरान हम रौशनी ले सकते हैं। दिलचस्प है कि कौल का फिल्मी सफर निर्देशन के बजाय राजेंद्र यादव की कहानी 'सारा आकाश' में अभिनय से शुरू हुई थी। यह आगाज ही साहित्य से उनको आगे और गहरे जोड़ते चला गया। 'घासीराम कोतवाल' , 'आषाढ़ का एक दिन, 'दुविधा, जैसे इंडियन क्लासिक्स से लेकर दास्तोवस्की के 'इडियट' जैसी महान रचना का फिल्मांकन उन्होंने किया।
कौल की यह खासियत तो रही ही कि वह साहित्यकि कृतियों की मूलात्मा को फिल्म में भी भरसक बहाल रखना चाहते थे, उन्होंने प्रचलित और लोकप्रिय की बजाय विभिन्न शैलियों की कई आपवादिक रचनाओं पर काम करने का जोखिम भी लिया। जिस मुक्तिबोध पर बोलते और लिखते हुए आज भी हिंदी साहित्य के दिग्गजों तक के पसीने छूटते हैं, कौल ने उनकी 'सतह से उठता हुआ आदमी' को परदे पर उतारने का चैलेंज न सिर्फ लिया बल्कि उसे बखूबी पूरा भी किया।  मणि कौल के काम करने के ढ़ंग और उनके सरोकारों की जानकार नए भारतीय सिनेमा के इस बड़े हस्ताक्षर को उनके सौंदर्यबोध के लिए भी याद करते हैं। यह अलग बात है कि यह सौंदर्यबोध सनसनी उभारने के बजाय संवेदना के आत्मिक स्पर्श का धैर्य लिए थे। यही कारण है कि कौल के कई आलोचक यह भी कहते रहे हैं कि उनके साहित्यप्रेम ने उन्हें कभी सौ फीसद फिल्मकार बनने ही नहीं दिया। क्योंकि कैमरे में क्या बेहतर और कितना समा सकता है, इसके उसूलों की उन्होंने कभी परवाह नहीं की।
 अलबत्ता यह भी है कि लैंस की नजरों पर भरोसा करने वाले उसे पीछे से देख रही मानवीय आंखों के चढ़ते-उतरते पानी को अगर खारिज कर सकते हैं तो उन्हें कौल जैसे फिल्मकार को ज्यादा समझने का खतरा भी नहीं लेना चाहिए। दरअसल, कौल इन्हीं आंखों को नम और चमक से भर देने वाले फिल्मकार थे। कौल के जाने के साथ ही नया सिनेमा का मणि भी कहीं खो गया, ऐसा लगता है।

गुरुवार, 10 मार्च 2011

डबल मीनिंग वाली होली


मि बुरा न मानो होली है। मस्ती की इस टेर पर होली की मस्ती ने जाने कितनी चुहल और कितनी शरारतों ने मन से अंगराइयां भरी हैं। मस्ती के इतने सारे रंगों को किसी एक रंग में रंगा दिखना हो तो भारत के महान लोकपर्व होली की परंपरा का अवगाहन कोई भी कर सकता है। होली संबंधों से लेकर स्वादिष्ट पकवानों तक अनेक रूपों और अर्थों में हमारी लोक परंपरा का हिस्सा रहा है। पर पिछले कुछ सालों-दशकों में होली बदरंग हुआ है। इस लोकपर्व की सबसे बड़ी थाती उसके गीत रहे हैं, जो आज भी तकरीबन सभी लोक और शास्त्रीय घरानों की पहचान में शुमार है।
दुर्भाग्य से होली के ये पारंपरिक गीत आधुनिक बयार में या तो बदल रहे हैं या फिर अपने को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नतीजतन जिन होली गीतों में स्त्री-पुरुष और पारिवारिक संबंधों को लेकर मर्यादित विनोद और हंसी-ठिठोली के रंगारंग आयोजन होते थे, वहां सतहीपन और अश्लीलता इतना बढ़ी है कि अर्थ की पिचकारी की जगह द्विअर्थी तीर सीधे कानों को बेधते हैं। दिल्ली की एक संस्था ने कुछ साल पहले कुछ ऐसे भाषाई कैसेटों-एलबमों का अध्ययन किया था, जिनकी बिक्री बाजार में लोकगीत-संगीत के नाम पर होती है। इनके कवर पर छपी तस्वीरों और  टाइटल से कोई सहज ही इनके स्तर और कांटेंट का पता कर सकता है।
लोक के विलोप का खतरा बाजार के दौर में बढ़ा तो जरूर है पर इसका निपटना इतना आसान भी नहीं है। लिहाजा लोक छटा को बाजार अपनी तश्तरी में सजाकर मन-माफिक तरीके से बेच रहा है। लिहाजा लोक की विरासत कायम तो जरूर है पर यह इतनी विषाक्त जरूर हो जा रही है कि लोकगंगा के लिए अलग से सफाई अभियान की दरकार है।
पिछले साल रिलीज एक होली एलबम की बानगी देखिए- "का करता है तू सब रे। इ रंग लगा लगा रहा है कि लैकी के गाल पर पीडब्ल्यूडी का रोलर चला रहा है।' इस देशज डॉयलाग के बाद शुरू होता है होली गीत। गीत के बोल ऐसे जैसे लड़की को रंग लगाने का नहीं बल्कि सीधे बिस्तर पर आने का आमंत्रण दिया जा रहा हो। वैसे यह तो कम है, कई गीत तो अपनी मंशा से ज्यादा अपनी शब्दावली में ही इतने भोंडे होते हैं कि आप उन पर कोई चर्चा तक नहीं कर सकते। लोक गायिका मालिनी अवस्थी मानती हैं कि इन फूहड़ गीतों का बाजार लगातार बढ़ रहा है। श्रोता और दर्शक थोड़े कम दोषी इसलिए हैं क्योंकि उनके पास चुनाव अब अच्छे-बुरे के बीच रहा ही नहीं। लिहाजा, कान उन कंपनियों का ऐंठना चाहिए जो होली के रंग-बिरंगे आयोजन को बदरंग कर रहे हैं। निशाने पर लोक परंपरा तो है ही, उनसे ज्यादा महिलाएं हैं। क्योंकि सबसे ज्यादा फब्तियां और ओछी हरकतें उन्हें ही सहनी-उठानी पड़ती हैं। अगर यह लगाम  जल्द ही कसी नहीं गई तो इस महान लोकपर्व को महिला विरोधी करार दिए जाने का खतरा है।

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

मुहब्बत का पहला पाठ नचनियों ने पढ़ाया था

एक ऐसे समय में जब छवियों की अतिशयता ने जीवन के एकांत तक को भर दिया है। यह बात समझनी थोड़ी असहज हो सकती है कि लोक की बनावट को जीवन रचना की तरह रेखांकित करने वाले सौंदर्यबोध की परंपरा ने हिंदी काव्य इतिहास को अनूठेपन को काफी हद तक और काफी दूर तक गढ़ा है। ऐसे में कई बार यह स्थिति विरोधाभासी लगती है कि पिछले तकरीबन दो दशकों में हिंदी के ठेठपन के हिमायती ज्यादातर नए कवियों के यहां इस परंपरा का न तो निर्वहन दिखाई पड़ता है और न ही उनकी कथित सामयिकता इस अनूठेपन का कोई विकल्प सूझाने का जोखिम ही उठाती है। बहरहाल, जिक्र हिंदी के वरिष्ठ कवि रवीन्द्र भारती के हालिया कविता संग्रह 'नचनिया' का।
इस संग्रह में लोक स्मृतियों का ऐसा जीवंत ताना-बाना बुना गया है कि आधुनिक समय में भी उनकी मौजूदगी का एहसास होता है। भारती के इस संग्रह की कविताओं का शीर्षक और आधार बिंब दोनों ही 'नाच' है। कुलीनता की नई शब्दावली से खारिज 'नाच' और  'नचनिया' जैसे शब्दों के बहाने लोकरंग की उस उत्सवी दुनिया से पहचान कराई गई है, जो महज फंतासी नहीं बल्कि एक ऐसा ठेठ और ठोस यथार्थ है, जिसके गुणधर्म और गुणसूत्र आज भी हमारी चेतना की जमीन को आद्र करते हैं- 'नाचो/ पीछे को आगे से जोड़े/ आगे को पीछे से बांधे/ नाचो कि नाचेगी दुनिया/ मियां यह नाच है।'
'नचनिया' से पहले अपने विलक्षण नाटक 'कंपनी उस्ताद' से खासी चर्चा और शोहरत पा चुके रवीन्द्र भारती चूंकि सामाजवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि से आते हैं, लिहाजा आधुनिकता के स्नो-पाउडर से चमकते चेहरे-मोहरों की बजाय वह 'धूल-धूसर गात' वाला लोक उन्हें ज्यादा खींचता है, जिसका विस्मरण अब काव्य अनुभूति के क्षेत्र की एक खतरनाक सचाई बनती जा रही है- 'उसके घूंघरू की आवाज/ यहां तक आ रही है छम्म, छम्म.../ बच्चे मुस्करा रहे हैं-/ लगता है जैसे वे नचनिया को नहीं/ विलुप्त हो रही किसी प्रजाति को देख रहे हैं।' 'नचनिया' जिस लोक का हिस्सा है या कि जिस लोक को रचता है, उसकी पदचाप भले पीछे छूट गई हो पर उसकी छाप को कवि ढोलक और मृदंग पर पड़ने वाली थाप की तरह महसूस करता है- 'मुहब्बत का पहला पाठ-/ किसी किताब ने नहीं, इन्हीं नचनियों ने पढ़ाया था।'
'नचनिया' के लोक में कवि सामयिक स्थितियों को पूरी तरह खारिज नहीं करता बल्कि वह आज के कई विरोधाभासी और विसंगतिपूर्ण स्थितियों को रेखांकित करता है। 'गुजरात' शीर्षक से संग्रह में दो कविताएं हैं। पर भारती के लिए गुजरात का टेक्स्ट नारावादी या प्रचारित बिंबों भर से महज नहीं बनता बल्कि उसकी लोकचेतना का कंपास ही यहां भी उसके दृष्टिकोण को तय करता है, तभी तो वह समकालीन 'गुजरात' की यात्रा पर जाते हुए हठात् कह उठता है- 'आगे क्या हुआ पता नहीं चला/ सिर्फ इतना मालूम हुआ कि सूत्रधार ने जैसे कहा-/ ग से गांधी/ व से वालदैन/ कि गोली चल गई।' मौजूदा गुजरात का रक्तिम यथार्थ कवि को विचलित भी करता है- 'गिद्ध कितना मंडरा रहे हैं.../ यह भी ससुरे हैं चिरई की जाति।'
लोकबोध की दरकार के साथ एक खतरा भी और वह खतरा है अतीतगामी होने का। भारती की काव्य चेतना ने भरसक इस खतरे का अतिक्रमण किया है पर वे यहां-वहां चूके भी हैं और ऐसा अनायास नहीं बल्कि जान-बूझकर हुआ दिखता है। 'नचनिया' संग्रह की एक कविता है 'दिल्ली में कथक'। वस्तुत: यह एक व्यंग्य कविता है जो केंद्रित विकास की भीतरी  विरोधाभासी स्थितियों का खुलासा करती है। पर यहां भी कवि के भीतर का नचनिया न तो उसे ढ़ंग से आक्रोश से भरने देता है और न ही व्यंग्यात्मक अभिधा से आगे जाने देता है- 'बेलीक मत अलापिए राग, पकड़े रहिए/ संविधान की लय/ खैर छोड़िए राजनीति/ आजादी जवान भई/ कथक में आइए/ हां ता थई..तत/ थई..तत...थई।'  वैसे इसे भारती के शिल्पगत मिजाज के रूप में भी देख सकते हैं, जहां एक कवि खुद से अपनी सीमा और  मर्यादा दोनों तय करता है।
अंतिम तौर पर कोई राय 'नचनिया' को लेकर बनानी हो तो यही कह सकते हैं कि न सिर्फ समकालीन हिंदी काव्य चेतना बल्कि देश और समाज के बीच गढ़ी जा रही समकालीन चेतना के विरुद्ध यह संग्रह एक रचनात्मक हस्तक्षेप की तरह है। अच्छी बात यह है कि कवि की अंगुलियां समकालीन विसंगतियों की ओर कम बार उठी हैं। और जब भी उठी हैं तो ये अंगुलियां अपना लोक रचने, अपनी लोकमुद्राएं बनाने में ज्यादा दिलचस्पी लेती हैं। लोक अवहेलना और विस्मृति के दौर में नचनिया का नाच कोई स्वांग नहीं, जिस पर महज तालियां बजें और वाह-वाह हो। दरअसल यह एक निरगुनिया लोक संगीत है, जो लोक और परंपरा को एक सूर में अलापती है। हिंदी काव्य चेतना को इस सूर ने लंबे समय तक समृद्ध किया है, समकालीन स्थितियों में भी उसकी दरकार खारिज नहीं हुई हैं, ये बताती हैं भारती के नए संग्रह की 54 कविताएं।

नचनिया (कविता संग्रह)   कवि : रवीन्द्र भारती   प्रकाशक : राधाकृष्ण   मूल्य : 150 रुपए

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

बिंदी के साथ जयपुर की हिंदी


नेपीली की एक कविता है हिंदी को लेकर। नेपाली इस कविता में हिंदी के भविष्य के प्रति उम्मीद से भरे दिखते हैं। हालांकि इस भविष्य और विकास के लिए वह दो बातें कहते हैं- 'पहले पीड़ा से कंपने दोऔर 'अपने आप पनपने दो" दरअसल, यह हिंदी का वह मिजाज है जिसमें एक तरफ उसकी फटेहाली और प्रतिपक्षी तेवर है तो दूसरी ओर उसकी जातीय बनावट की ताकत। याद आती है कुछ साल पहले साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे  जाने पर कवि राजेश जोशी का दिया गया औपचारिक वक्तव्य। उन्होंने कहा था कि बाजार के दौर में भी हिंदी बेजार है और यह उसकी नियति से ज्यादा मिजाज और तेवर है। अभी जयपुर में पांच सितारा साहित्योत्सव हुआ। हिंदी वालों को विधवा विलाप नहीं करना चाहिए। हिंदी में संभावनाएं भी हैं और  इन संभावनाओं का विस्तार भी। उसे अपनी क्षमताओं को आधुनिक और अद्यतन बनाने का संकल्प दिखाना चाहिए...पूरी तैयारी से बाजार में उतरना चाहिए। कुल मिलाकार यही लब्बो-लुआब रहा इस लिटरेचर फेस्टिबल में शामिल उन सेलिटीज का, जो हिंदी को सिनेमा से लेकर टीवी और विज्ञापन की दुनिया में छाते देखना चाहते हैं। शुद्ध लेखकीय प्रतिबद्धता वाली जो इक्की-दुक्की आवाजें इस फेस्टिबल में सुनी-अनसुनी रहीं, उनके तेवर भले बदले थे लेकिन हिंदी की बाजार कल्प की दरकार से गुरेज वे भी नहीं कर पाए।  
2006 में शुरू हुआ जयपुर लिटरेचर फेस्टिबल अब देश के सालाना टूरिज्म कैलेंडर का बड़ा इवेंट है। इसने पूरे दक्षिण एशिया में अपनी ब्रांडिंग साख बना ली है। पर जहां तक सवाल ऐसे आयोजनों और  उनमें जताई जाने वाली चिंताओं का है, तो इस पर अंतिम राय बनाना सहज नहीं है। महज कुछ दशक पहले तक जिस भाषा की शिनाख्त लोक और परंपरा की वाहक भाषा और कई दर्जन बोलियों को एक साथ बहा ले चलने वाली सांस्कृतिक धारा के रूप में होती थी, आज उस हिंदी के माथे पर देशज आंचलिकता की बजाय बाजार की बिंदी सजे, यह सोच प्रकारांतर से हर स्तर पर कायम हो रही है। यह तो तय है कि समय निरपेक्ष होकर आप तो किसी संस्कृति के और  ही उसके अभिव्यक्ति के जरियों का विकास सुनिश्चत कर सकते हैं। पर क्या यह मान लिया जाए कि हम आज सचमुच उस दौर पहुंच गए हैं जिसमें विकास और समृद्धि का एकमात्र विकल्प बाजार और उससे होकर गुजरने वाले रास्ते हैं। मार्केटिंग और ब्रांडिंग की दरकार किसी तेल-साबुन को बेचने के लिए जिस तरह होती है, क्या वही जरूरत एक भाषा की भी हो सकती है। सवाल का जवाब हां और ना दोनों हो सकता है। वैसे ज्यादा जरूरी है उन स्थितियों का आकलन जो ऐसे सवालों से दो-चार होने की नौबत लाती हैं।
 जिस भाषा को यह फख्र हासिल हो कि उसने साम्राज्यवादी दासता के खिलाफ संघर्ष की चेतना का प्रसार ऐतिहासिक रूप से किया और वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से लगातार जुड़ी रही, उसका भविष्य अचानक अंधकारमय कैसे हो सकता है? शायद जिस संकट की दुहाई दी जा रही है, वह हिंदी की नहीं बल्कि उन पेशेवरों की है, जो इस भाषा को रातोंरात हॉट औरसेलेबल बनाने की फिराक में हैं। पेशेवर दरकारों के मुताबिक भाषा का रुपांतरण गलत नहीं है। खास तौर पर उनके लिए तो और भी नहीं जो भाषा की कीमत इसी नजरिए से तय करते हैं। लेकिन यह भी साफ है कि भाषा को पेशेवर  और  बाजारोनुकूल होने की बजाय उसका जीवन से भरा होना ज्यादा जरूरी है। हिंदी के पास आज भी जिन्दगी  और जिन्दादिली की कमी नहीं, वह लोक, परंपरा और परिवार को एक सीध में लेकर चलने वाली अकेली और सबसे अनूठी भाषा है। फेस्टिव मूड में अगर यह अन्यतमता किसी को नहीं दिखती, तो दोष हिंदी का नहीं उसके शुभचिंतकों का है।