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सोमवार, 16 जनवरी 2023

 जाना हिंदी के एक और मैनेजर का

- प्रेम प्रकाश

आपातकाल का अंधेरा तब थोड़ा दूर था, पर नेहरू युग जरूर किताब के पन्नों में प्रगतिशील आलोचकीय निकष पर आ चुका था। अगर नहीं थकी और झुकी थी तो हिंदी पत्रकारिता की वह असाधारण कलम, जिसने आजादी के आंदोलन के दौरान हासिल यशस्विता को इस दौरान भी विचार और लोकतंत्र की हिमायत में बहाल रखा। श्री कृष्ण किशोर पांडेय जी अब हमारे बीच नहीं रहे। हिंदी के घर-परिवार और संस्कार के बीच प्रखर आलोचक मैनेजर पांडेय के बाद शोक की यह दूसरी बड़ी खबर है। यह खबर और इससे जुड़ा संयोग और इस विदाई का पूरा समकाल नई चिंताओं और सवालों को जन्म देता है। यह हिंदी विमर्श और अभिव्यक्ति के एक और मैनेजर का जाना है, सर्द थपेड़ों के बीच एक और अलाव का ठंडा पड़ना है।

स्वर्णीय केके पांडेय का जीवन एक ऐसे प्रतिबद्ध हिंदी पत्रकार का सफरनामा है, जो 1968 से 2005 तक भरपूर सक्रियता के साथ अखबार के उस कक्ष को प्रतिष्ठा देता रहा, जिसे संपादकीय कक्ष कहा जाता है। मेरे जैसे पत्रकार के लिए उनकी स्मृति को नमन ऐसे विशाल वटवृक्ष के नीचे खड़ा होना है, जहां प्रशांत ऊर्जा की शालीन अनुभूति एक अक्षर मनोदशा को रचती है। उनके निधन पर सोशल मीडिया पर जिस तरह के संस्मरण लिखे जा रहे हैं, उन्हें लोग जिस लगाव और कचोट के साथ याद कर रहे हैं, वे ये जाहिर करते हैं कि पत्रकारिता की कम से कम दो पीढ़ी उनसे गहरे तौर पर जुड़ी रही। यह जुड़ाव पत्रकारिता के बदलते दौर में छपे शब्दों की अस्मिता को बहाल रखने के प्रशिक्षण के साथ हिंदी की अभिव्यक्ति और उसके सामर्थ्य को नए समकाल में ढालने की ईमानदार कोशिश थी।

गौरतलब है कि श्री कृष्ण किशोर पांडेय जब ‘हिंदुस्तान’ जैसे शीर्षस्थ अखबार के संपादकीय पृष्ठ को विचार और विमर्श के केंद्र में ला रहे थे, तब हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता पूरे लय में थी तो साथ ही खोजी पत्रकारिता की जमीन तेजी से पक रही थी। पत्र-पत्रिकाओं पर ताले झूलने का शोक तब किसी आशंका के गर्भ में भी नहीं था। हां, कई दूरद्रष्टा जरूर काल के क्षितिज पर छाते धुंधलके की बात कहने लगे थे। यह दौर अपने पूरे विस्तार में कुलदीप नैयर, बीजी वर्गीज, राजेंद्र माथुर, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, प्रभाष जोशी और सुरेंद्र प्रताप सिंह जैसी शख्सियतों की पत्रकारिता की लाजवाब पारी का साक्षी रहा।

इस दौरान दूरदर्शन ने जहां आंखें खोलीं, एशियाड दूसरी बार भारत लौटा, वहीं आगे चलकर श्रीमति इंदिरा गांधी के करिश्माई दौर का पटाक्षेप भारतीय राजनीति का सबसे दिलचस्प घटनाक्रम साबित हुआ। इतने सारे बदलावों और आगाजों के बीच कलम उठाना और अखबारी विमर्श का कंपास स्थिर करना आसान नहीं था। भाषाई संस्कार और हिंदी की अपनी धज और परंपरा के मुताबिक यह चुनौती कितनी बड़ी होगी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हिंदी सिनेमा का महानायक तब तक ‘पुष्पा के आंसू’ पर शोकाकुल होने के बजाय जमाने की नाइंसाफियों के खिलाफ सुलगते लावे की तरह एंग्री यंग मैन बन चुका था। बदलाव का दूसरा सिरा साहित्य को छू रहा था। हिंदी की किस्सागोई नई कहानी और कविताई नई कविता की शिनाख्त के साथ अपने होने को नई प्रतिबद्धता के सांचे में ढाल रही थी, नई चुनौतियों के बीच संवेदनशील सरोकारों को रच रही थी। कुल मिलाकर रचनात्मकता की दुनिया की हलचल हिंदी को नए प्रस्थान की ओर ले जा रही थी।

जिन लोगों ने भी उन्नत गौर ललाट और तिलकित भाल से सुशोभित पांडेय जी के साथ काम किया, उनके लिखने-पढ़ने की समझ और शैली को नजदीक से देखते-समझते रहे, वे ये बताते हैं कि उन्होंने भारतीय समाज और राजनीति के उत्तरायण और दक्षिणायन के बजाय उसके मध्याह्न को ज्यादा अहम माना। इसलिए विचार के तीखे कोणों के बजाए उन्होंने विमर्श और विरासत की दोमट मिट्टी पर अक्षर फूल खिलाए, नए समकोण खड़े किए।

इस अक्षर वाटिका की बड़ी बात यह रही कि इसमें नए चटख रंग और तासीर के फूलों ने हिंदी और हिंदुस्तान दोनों को एक साथ महकाया। नए कलम उठाने वालों ने लिखने के जोखिम और दायित्व को समझा। और इस तरह तैयार हुई नए लेखकों और पत्रकारों की एक पूरी खेंप। यह वह खेंप है जो भाषा से खिलवाड़, दो-तीन जीबी डेटा और अफवाह के दोस्ताने के बीच लिखने की मर्यादा को बचाए रखने के लिए अंतिम लश्कर के तौर पर आज भी कार्य कर रही है। 

इसके बाद हिंदी की बिंदी और मान को बचाए रखने के लिए न तो कोई लश्कर बचेगा और न ही बचेगा कोई संघर्ष। केके पांडेय की स्मृति और प्रेरणा को नमन के साथ यह बड़ा संकट बिल्कुल सामने दिख रहा है। बड़ी बात होगी कि इस संकट और अंधकार के बीच कहीं से एक नया कृष्ण किशोर होने की संभावना प्रकट हो। यह संभावना और इसके लिए बची-खुची उम्मीद हिंदी के पुराने कंगूरों और नए चबूतरों पर दीयों के बलने की अंतिम उम्मीद है। यह उम्मीद फलीभूत हो और इससे जुड़ा बोध चिरायु हो, ऐसी कामना है।

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

हिंदी की नामवरी ठाठ

अक्षर स्मृति
डॉ. नामवर सिंह (1927-2019)

- प्रेम प्रकाश
एक ऐसे दौर में जब किसी भी तरह के विमर्श और प्रतिरोध को नासमझ वाचालता और असभ्य प्रतिक्रियाओं का फौरी आखेट चुनौती दे रहा है, हिंदी के आलोचकीय विवेक को लोकिप्रियता और स्वीकृति के सबसे ऊंचे आसन तक ले जाने वाले नामवर सिंह का न होना महज एक खबर नहीं है। दरअसल, स्वाधीन भारत की हिंदी चेतना को लोक और परंपरा के साझे के साथ समझने की चुनौती बड़ी रही है। इस बड़ी चुनौती का महत्व आज की तारीख में तब ज्यादा समझा सकता है, जब भाषा, कला और संस्कृति के पूरे विवेक को ही आवारा पूंजी की ताकत गौरजरूरी करार देने पर तुली है। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए हिंदी साहित्य के रचनात्मक विकास के साथ इस भाषा से जुड़ी संपूर्ण सांस्कृतिक निर्मिति को नामवर जी ने जो आलोचकीय धार दी, वह अद्वीतीय है। 
नामवर सिंह का जन्म 1927 में हुआ था। उनकी तरुणाई और देश की स्वाधीनता को अगर एक साथ देखें तो उस स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है, जब देश के साथ एक प्रखर युवा मन अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास की गोद में अपनी नई शिनाख्त की छटपटाहट से जूझ रहा होगा। गौरतलब है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ 1929 में लिख चुके थे। यानी देश की स्वाधीनता के साथ देश की सबसे प्रमुख भाषा के साहित्य और इतिहास का आलोचकीय निकष गढ़ा जा चुका था। यही नहीं ‘लोकमंगल’ और ‘परंपरा’ जैसे बीज शब्दों के साथ हिंदी रचनात्मकता को देखने-परखने के उपकरण सामने आ चुके थे। आगे अगर कोई चुनौती थी तो इन आलोचकीय उपकरणों के साथ हिंदी की रचनात्मक अस्मिता को और गहरे पहचानने की, उसे नए संदर्भों और नए मुहावरों से लैस करने की।
बड़ी बात यह भी है कि रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा के यहां हिंदी साहित्य की जो आलोचना भक्तिकाल, छायावाद और राष्ट्रीय भावधारा तक आते-आते ठहर जाती है। जाहिर है कि आजादी के बाद के भारतीय समाज के विरोधाभासी यथार्थों के बीच रचे गए नए साहित्य को लेकर आलोचकीय समझ बनाने की चुनौती बड़ी थी। नामवर जी अपने जिन आलोचकीय प्रतिमानों के कारण लोकिप्रय रहे और हिंदी आलोचना के शिखर आलोचक होने तक की स्वीकृति अपने जीते-जी पा गए, उन प्रतिमानों का एक सिरा अगर लोक और परंपरा के मस्तूलों से बंधा है, तो वहीं उसमें समाकालीन जीवन संदर्भों के बीच प्रगतिशील संवेदनात्मक तत्वों को पहचाने का आलोचकीय विवेक भी है।   
हिंदी साहित्य के साथ पूरे हिंदी समाज के लिए यह वाकई बड़े शोक की घड़ी है। हमारे दौर के महत्वपूर्ण कवियों में शामिल मंगलेश डबराल ने कहा भी कि यह हिंदी के प्रतिमानों की विदाई का त्रासद समय है। सोलह महीनों के छोटे से अंतराल में कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, कृष्णा सोबती और अब नामवर सिंह के निधन से जो जगहें खाली हुई हैं वे हमेशा खाली ही रहेंगी।
बनारसे के एक छोटे से गांव जायतपुर में जन्मे नामवर सिंह की चर्चा के साथ दो बातें हमेशा जुड़ी रहेंगी। एक तो उनकी भाषा से लेकर पूरे व्यक्तित्व को अपने गहन में लेनेवाला बनारसीपन और दूसरा अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिली आलोचकीय सीख को अमिट और अपराजेय बनाए रखने की उनकी जीवट जद्दोजहद। उनके व्यक्तित्व के ये दोनों रंग खासे ठेठ हैं। यहां तक कि नामवर जी खुद अपने जीवन संघर्षों के बीच भी इस ठेठ ठसक के साथ ही जीवट बने रहे।
आज पूरे देश में विश्वविद्यालयों में हिंदी विभागों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। नामवर सिंह को भुलाया इसिलए भी नहीं जा सकता क्योंकि उन्होंने स्वाधीन भारत में हिंदी आलोचना और विमर्श के केंद्र में विश्वविद्यालयों को लाने की दरकार को सबसे पहले समझा था। नए दौर में उच्च शिक्षा केंद्रों में हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाए बगैर हिंदी ज्ञान परंपरा का विकास असंभव है, वे इस बात को समझते थे। देश के सबसे प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्विविद्यालय में अपनी अगुआई में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना कराने और फिर उसे आकादमिक स्वीकृति दिलाने में उनका अध्यापकीय योगदान ऐतिहासिक है।
‘नई कविता’ और ‘नई कहानी’ को लेकर हिंदी आलोचना का जो नया प्रतिमान लेकर नामवर सिंह लेकर आए, वह नए भारतीय समाज और संस्कार के लिए भी एक मार्गदर्शक सिद्धांत की तरह है। यह सिद्धांत हमें लगातार इस बात के लिए आगाह करता रहेगा कि लोक, परंपरा और आधुनिकता हमारी संस्कृति के आलग-आलग टापू नहीं बल्कि एक ऐसी साझी विरासत हैं, जिसमें से एक का भी अलगाव हमें भाषा, समाज और संस्कृति के मजबूत साझेपन से अलग-थलग कर देगा। यह भी कि बात सैद्धांतिक प्रतिबद्धता की हो कि सामाजिक सुधार के आंदोलनात्मक तकाजों की, इनके लिए हमें कहीं और ताकने-निहारने की जरूरत नहीं बल्कि इनके बीज संस्कार हमारी परंपराओं में पहले से हैं।
आज जब नामवर जी हमारे बीच नहीं हैं, तो जो एक बात हमें सबसे ज्यादा सालेगी वह यह कि भाषा को सारस्वत रूप से धन्य करने वाली ऐसी नामवरी प्रतिभा अब हमारे बीच नहीं होगी, जिसने विमर्श और आलोचना को लेखन और पठन-पाठन के साथ वाचिक रूप से लगातार सशक्त बनाए रखा, उसे लगातार नई धार और तेवर देता रहा। 
‘छायावाद’, ‘इतिहास और आलोचना’, ‘दूसरी परंपरा की खोज’, ‘कविता के नए प्रतिमान’, ‘कहानी नई कहानी’ जैसे लोकप्रिय पुस्तकों के लेखक के साथ हमारे समय में हिंदी की अस्मिता को गरिमा और स्वीकृति की सबसे समादृत पहचान को खोना, हिंदी भाषा से आगे पूरी हिंदी संस्कृति के लिए एक बड़ा आघात है। यह आघात इसलिए भी बड़ा है क्योंकि हमारे दौर का लोकतांत्रिक सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श आज गहरे संकट में है। संकट की इस घड़ी में नामवर जी के लिखे-कहे की ताकत हमारी चेतना और विवेक के हौसले को हारने नहीं देगी, इस उम्मीद के साथ डॉ. नामवर सिंह को असंख्य हिंदी जनों का साझा नमन।

रविवार, 15 जुलाई 2012

प्रभाष जोशी के बहाने हिंदी पत्रकारिता से एक मुठभेड़


हिंदी की आलोचकीय बहस में अकसर दो बातों की चर्चा होती है- लोक और परंपरा। हिंदी के निर्माण और इसकी रचना प्रक्रिया में ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भ देखने की तार्किक दरकार पर जोर देने वाले डॉ. रामविलास शर्मा ने जरूर इससे आगे बढ़कर कुछ जातीय तत्वों और सरोकारों पर ध्यान खींचा है। पर कायदे से हिंदी की यह जातीय शिनाख्त भी लोक और परंपरा के बाहर का नहीं बल्कि उसके भीतर का ही गुणतत्व है। इसी तरह, गौर करने लायक एक बात यह भी है कि हिंदी में पत्रकारिता का विकास भी उसके बाकी तमाम रचनात्मक रूपों के तकरीबन साथ ही हुआ। भारतेंदु और द्विवेदी के दौर की रचनात्मकता के साथ पत्रकारिता के विकास को अलगाकर नहीं देखा जा सकता बल्कि बाद में अस्सी के दशक के आसपास जब खबर और साहित्य ने अलग से अपनी जगह घेरनी शुरू की तो भी दोनों जगह कलम चलाने वालों का गोत्र एक ही रहा।
फिर यह विभाजन अलगाववादी न होकर लोकतांत्रिक तौर पर एक-दूसरे के लिए भरपूर सम्मान, स्थान और अवसर मुहैया कराने के लिए था। यही कारण रहा कि इस दौर में एक तरफ जहां धूम मचाने वाली आधुनिक धज की साहित्यिक पत्रिकाओं ने ऐतिहासिक सफलता पाई तो वहीं उस दौरान की समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने लोकप्रियता और श्रेष्ठता के सार्वकालिक मानक रचे। खासतौर पर देशज भाषा, संवेदना और चिंता के स्तर पर इस दौर की हासिल मानकीय श्रेष्ठता ने आधुनिक हिंदी पत्रकारिता की संभावना की ताकत को जाहिर किया। राष्ट्रीय आंदोलन के बाद स्वतांत्र्योत्तर भारत का यह सबसे सुनहरा दौर था हिंदी पत्रकारिता के लिए और विशुद्ध साहित्य से आगे की वैकल्पिक रचनात्मकता के लिए। इसके बाद आया ज्ञान को सूचना आैर खबर की तात्कालिकता में समाचार की पूरी अवधारणा को तिरोहित करने वाला ग्लोबल दौर : जिसमें एक तरफ नजरअंदाज हो रही सामाजिक और सांस्कृतिक अस्मिताओं का संघर्ष सतह पर आया तो वहीं चेतना और अभिव्यक्ति के पारंपरिक लोक के लोप का खतरा बढ़ता चला गया।
हिंदी के रचनात्मक लेखन और पत्रकारिता के इस संक्षिप्त सफर को ध्यान में रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि इसके बिना हम हर दस माइल पर एक नया संस्करण बेचने वाले हिंदी अखबारों के आज से मुठभेड़ नहीं कर सकते। जिसे हम भाषाई पत्रकारिता कहते हैं, वह अंग्रेजी से नितांत अलग है। खड़ी बोली के तौर पर तनी हिंदी की मुट्ठी उस राष्ट्रप्रेम की भी प्रतीक है, जिसमें देश की कोई सुपर इंपोज्ड या इंलाज्र्ड छवि नहीं बल्कि गंवई-कस्बाई निजता मौलिकता को अखिल भारतीय हैसियत की छटा देने की क्रांतिकारी रचनात्मकता हमेशा जोर मारती रही है। बोलियां अगर हिंदी की ताकत है तो इसे बोलने वालों की जाति और समाज ही हिंदी की दुनिया है।
खुद को बाद करने की शर्त पर नहीं संवाद
यहां यह भी साफ होने का है कि विचार और संवेदना के स्तर पर हिंदी विश्व संवाद के लिए हमेशा तैयार रही है पर यह संवाद कभी भी खुद को बाद करने की शर्त पर नहीं हुआ है। इसे एक उदाहरण से समझें। सुरेंद्र प्रताप सिंह तब 'नवभारत टाइम्स" में थे। संस्करण के लिए खबरों की प्राथमिकता तय करने के लिए न्यूज रूम में संपादक और समाचार संपादकों की टीम बैठी। एक खबर थी कि दिल्ली के किसी इलाके में कार में युवक-युवती 'आपत्तिजनक' स्थिति में पकड़े गए। सवाल उठा कि इस खबर की हेडिंग क्या हो? किसी ने सुझाया कि खबर में आपत्तिजनक शब्द आया है, यही हेडिंग में आ जाए पर बात नहीं बनी। कहा गया कि अगर दोनों बालिग हैं और उनकी राजी-खुशी है तो फिर उनके कृत्य पर आपत्ति किसे है? इस पर किसी ने खबर के भारीपन को थोड़ा हल्का करने के लिए कहा कि लिख दिया जाए कि युवक-युवती 'मनोरंजन' करते धरे गए। फिर बात उठी कि कृत्य को तन के बजाय मन से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। आखिर में तय हुआ कि 'तनोरंजन' शब्द लिखा जाए। भाषा को अभिव्यक्ति की ऐसी दुरुस्त कसौटी पर कसने की तमीज और समझ को आज अनुवाद और अनुकरण की दरकार के आगे घुटने टेकने पड़ रहे हैं।
आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण की अलख तकरीबन दो दशकों तक हिंदी में कलम के सिपाहियों ने उठाई। पर यहां यह समझना जरूरी है कि हिंदी की प्रखरता का एक मौलिक तेवर विरोध और असहमति है। दशकों की आैपनिवेशिक गुलामी से मुठभेड़ कर बनी भाषा की यह ताकत स्वाभाविक है। इसलिए अपने यहां नेहरू युग के अंत होते-होते राष्ट्र निर्माण की एक 'असरकारी' और वैकल्पिक दृष्टि की खोज हिंदी के लेखक-पत्रकार करने लगे और उन्हें डॉ. राम मनोहर लोहिया की समाजवादी राह मिली। राष्ट्रीय आंदोलन के बाद हिंदी में यह रचनात्मक प्रतिबद्धता से सज्जित सिपाहियों की पहली खेप थी। जिन लोगों ने 'दिनमान' के जमाने में फणीश्वरनाथ रेणु जैसे साहित्यकारों की रपट और लेख पढ़े हैं, उन्हें मालूम है कि अपने हाल को बताने के लिए भाषाई औजार भी अपने होने चाहिए। बाद में विचारवान लेखकों-पत्रकारों के इस जत्थे में जयप्रकाश आंदोलन से प्रभावित ऊर्जावान छात्रों की खेप शामिल हुई।
पत्रकारिता या सामाजिक कार्यकर्ता
आज यह बहस अकसर होती है कि क्या एक जर्नलिस्ट को एक्टिविस्ट की भूमिका निभाने की लक्ष्मण रेखा लांघनी चाहिए यानी यह जोखिम मोल लेना चाहिए? दुर्भाग्य से पत्रकारिता को 'मिशन' और 'प्रोफेशन' बताने वाली उधार की समझ रखने वाले आज मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींचने से बाज नहीं आते और देश-समाज का जीवंत हाल बताने वालों को उनकी सीमाओं से सबसे पहले अवगत कराते हैं। जबकि अपने यहां लिखने-पढ़ने वालों की एक पूरी परंपरा है, जिनकी वैचारिक प्रतिबद्धता महज 'कागद कारे' करने से कभी पूरी नहीं हुई। बताते हैं कि चंडीगढ़ में प्रभाष जोशी नए संवाददाताओं की बहाली के लिए साक्षात्कार ले रहे थे। एक युवक से उन्होंने पूछा कि पत्रकार क्यों बनना चाहते हो? युवक का जवाब था, 'आंदोलन करने के लिए। परिवर्तन की ललक हो तो हाथ में कलम, कुदाल या बंदूक में से कोई एक तो होना ही चाहिए।' कहने की जरूरत नहीं कि युवक ने प्रभाष जी को प्रभावित किया। आज किसी इंटरव्यू पैनल के आगे ऐसा जवाब देने वालों के लिए अखबार की नौकरी का सपना कितना दूर चला जाएगा, पता नहीं।
न्यू मीडिया
आखिर में बात सूचना तकनीक के उस भूचाली दौर की जिसमें  कंप्यूटर और इंटरनेट ने भाषा और अभिव्यक्ति ही नहीं विचार के एजेंडे भी अपनी तरफ से तय करने शुरू कर दिए हैं। अंग्रेजी के लिए यह भूचाल ग्लोबल सबलता हासिल करने का अवसर बना तो हिंदी की भाषाई ताकत को सीधे वरण, अनुकरण और अनुशीलन के लिए बाध्य किया जा रहा है। कमाल की बात है कि इस मजबूरी के गढ़ में भी पहली विद्रोही मुट्ठी तनी तो उन हिंदी के उन कस्बाई-भाषाई शूरवीरों ने जिन्हें ग्लोब पर बैठने से ज्यादा ललक अपनी माटी-पानी को बचाने की रही। जिसे आज पूरी दुनिया में 'न्यू मीडिया' कहा जा रहा है, उसका हिंदी रूप ग्लोबल एकरूपता की दरकार के बावजूद काफी हद तक मौलिक है। यहां अभी थोड़ी भटकाव की स्थिति जरूर है पर यहां से थोड़ी रोशनी जरूर छिटकती दिखती है, उस मान्यता पर अब भी अटूट आस्था रखने वालों के लिए जिनकी परंपरा का दूध पीने से हासिल बलिष्ठता को किसी भी अखाड़े में उतरने से डर नहीं लगता।


 हस्तक्षेप (राष्ट्रीय सहारा) 14.07.2012

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

मुहब्बत का पहला पाठ नचनियों ने पढ़ाया था

एक ऐसे समय में जब छवियों की अतिशयता ने जीवन के एकांत तक को भर दिया है। यह बात समझनी थोड़ी असहज हो सकती है कि लोक की बनावट को जीवन रचना की तरह रेखांकित करने वाले सौंदर्यबोध की परंपरा ने हिंदी काव्य इतिहास को अनूठेपन को काफी हद तक और काफी दूर तक गढ़ा है। ऐसे में कई बार यह स्थिति विरोधाभासी लगती है कि पिछले तकरीबन दो दशकों में हिंदी के ठेठपन के हिमायती ज्यादातर नए कवियों के यहां इस परंपरा का न तो निर्वहन दिखाई पड़ता है और न ही उनकी कथित सामयिकता इस अनूठेपन का कोई विकल्प सूझाने का जोखिम ही उठाती है। बहरहाल, जिक्र हिंदी के वरिष्ठ कवि रवीन्द्र भारती के हालिया कविता संग्रह 'नचनिया' का।
इस संग्रह में लोक स्मृतियों का ऐसा जीवंत ताना-बाना बुना गया है कि आधुनिक समय में भी उनकी मौजूदगी का एहसास होता है। भारती के इस संग्रह की कविताओं का शीर्षक और आधार बिंब दोनों ही 'नाच' है। कुलीनता की नई शब्दावली से खारिज 'नाच' और  'नचनिया' जैसे शब्दों के बहाने लोकरंग की उस उत्सवी दुनिया से पहचान कराई गई है, जो महज फंतासी नहीं बल्कि एक ऐसा ठेठ और ठोस यथार्थ है, जिसके गुणधर्म और गुणसूत्र आज भी हमारी चेतना की जमीन को आद्र करते हैं- 'नाचो/ पीछे को आगे से जोड़े/ आगे को पीछे से बांधे/ नाचो कि नाचेगी दुनिया/ मियां यह नाच है।'
'नचनिया' से पहले अपने विलक्षण नाटक 'कंपनी उस्ताद' से खासी चर्चा और शोहरत पा चुके रवीन्द्र भारती चूंकि सामाजवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि से आते हैं, लिहाजा आधुनिकता के स्नो-पाउडर से चमकते चेहरे-मोहरों की बजाय वह 'धूल-धूसर गात' वाला लोक उन्हें ज्यादा खींचता है, जिसका विस्मरण अब काव्य अनुभूति के क्षेत्र की एक खतरनाक सचाई बनती जा रही है- 'उसके घूंघरू की आवाज/ यहां तक आ रही है छम्म, छम्म.../ बच्चे मुस्करा रहे हैं-/ लगता है जैसे वे नचनिया को नहीं/ विलुप्त हो रही किसी प्रजाति को देख रहे हैं।' 'नचनिया' जिस लोक का हिस्सा है या कि जिस लोक को रचता है, उसकी पदचाप भले पीछे छूट गई हो पर उसकी छाप को कवि ढोलक और मृदंग पर पड़ने वाली थाप की तरह महसूस करता है- 'मुहब्बत का पहला पाठ-/ किसी किताब ने नहीं, इन्हीं नचनियों ने पढ़ाया था।'
'नचनिया' के लोक में कवि सामयिक स्थितियों को पूरी तरह खारिज नहीं करता बल्कि वह आज के कई विरोधाभासी और विसंगतिपूर्ण स्थितियों को रेखांकित करता है। 'गुजरात' शीर्षक से संग्रह में दो कविताएं हैं। पर भारती के लिए गुजरात का टेक्स्ट नारावादी या प्रचारित बिंबों भर से महज नहीं बनता बल्कि उसकी लोकचेतना का कंपास ही यहां भी उसके दृष्टिकोण को तय करता है, तभी तो वह समकालीन 'गुजरात' की यात्रा पर जाते हुए हठात् कह उठता है- 'आगे क्या हुआ पता नहीं चला/ सिर्फ इतना मालूम हुआ कि सूत्रधार ने जैसे कहा-/ ग से गांधी/ व से वालदैन/ कि गोली चल गई।' मौजूदा गुजरात का रक्तिम यथार्थ कवि को विचलित भी करता है- 'गिद्ध कितना मंडरा रहे हैं.../ यह भी ससुरे हैं चिरई की जाति।'
लोकबोध की दरकार के साथ एक खतरा भी और वह खतरा है अतीतगामी होने का। भारती की काव्य चेतना ने भरसक इस खतरे का अतिक्रमण किया है पर वे यहां-वहां चूके भी हैं और ऐसा अनायास नहीं बल्कि जान-बूझकर हुआ दिखता है। 'नचनिया' संग्रह की एक कविता है 'दिल्ली में कथक'। वस्तुत: यह एक व्यंग्य कविता है जो केंद्रित विकास की भीतरी  विरोधाभासी स्थितियों का खुलासा करती है। पर यहां भी कवि के भीतर का नचनिया न तो उसे ढ़ंग से आक्रोश से भरने देता है और न ही व्यंग्यात्मक अभिधा से आगे जाने देता है- 'बेलीक मत अलापिए राग, पकड़े रहिए/ संविधान की लय/ खैर छोड़िए राजनीति/ आजादी जवान भई/ कथक में आइए/ हां ता थई..तत/ थई..तत...थई।'  वैसे इसे भारती के शिल्पगत मिजाज के रूप में भी देख सकते हैं, जहां एक कवि खुद से अपनी सीमा और  मर्यादा दोनों तय करता है।
अंतिम तौर पर कोई राय 'नचनिया' को लेकर बनानी हो तो यही कह सकते हैं कि न सिर्फ समकालीन हिंदी काव्य चेतना बल्कि देश और समाज के बीच गढ़ी जा रही समकालीन चेतना के विरुद्ध यह संग्रह एक रचनात्मक हस्तक्षेप की तरह है। अच्छी बात यह है कि कवि की अंगुलियां समकालीन विसंगतियों की ओर कम बार उठी हैं। और जब भी उठी हैं तो ये अंगुलियां अपना लोक रचने, अपनी लोकमुद्राएं बनाने में ज्यादा दिलचस्पी लेती हैं। लोक अवहेलना और विस्मृति के दौर में नचनिया का नाच कोई स्वांग नहीं, जिस पर महज तालियां बजें और वाह-वाह हो। दरअसल यह एक निरगुनिया लोक संगीत है, जो लोक और परंपरा को एक सूर में अलापती है। हिंदी काव्य चेतना को इस सूर ने लंबे समय तक समृद्ध किया है, समकालीन स्थितियों में भी उसकी दरकार खारिज नहीं हुई हैं, ये बताती हैं भारती के नए संग्रह की 54 कविताएं।

नचनिया (कविता संग्रह)   कवि : रवीन्द्र भारती   प्रकाशक : राधाकृष्ण   मूल्य : 150 रुपए

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

बिंदी के साथ जयपुर की हिंदी


नेपीली की एक कविता है हिंदी को लेकर। नेपाली इस कविता में हिंदी के भविष्य के प्रति उम्मीद से भरे दिखते हैं। हालांकि इस भविष्य और विकास के लिए वह दो बातें कहते हैं- 'पहले पीड़ा से कंपने दोऔर 'अपने आप पनपने दो" दरअसल, यह हिंदी का वह मिजाज है जिसमें एक तरफ उसकी फटेहाली और प्रतिपक्षी तेवर है तो दूसरी ओर उसकी जातीय बनावट की ताकत। याद आती है कुछ साल पहले साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे  जाने पर कवि राजेश जोशी का दिया गया औपचारिक वक्तव्य। उन्होंने कहा था कि बाजार के दौर में भी हिंदी बेजार है और यह उसकी नियति से ज्यादा मिजाज और तेवर है। अभी जयपुर में पांच सितारा साहित्योत्सव हुआ। हिंदी वालों को विधवा विलाप नहीं करना चाहिए। हिंदी में संभावनाएं भी हैं और  इन संभावनाओं का विस्तार भी। उसे अपनी क्षमताओं को आधुनिक और अद्यतन बनाने का संकल्प दिखाना चाहिए...पूरी तैयारी से बाजार में उतरना चाहिए। कुल मिलाकार यही लब्बो-लुआब रहा इस लिटरेचर फेस्टिबल में शामिल उन सेलिटीज का, जो हिंदी को सिनेमा से लेकर टीवी और विज्ञापन की दुनिया में छाते देखना चाहते हैं। शुद्ध लेखकीय प्रतिबद्धता वाली जो इक्की-दुक्की आवाजें इस फेस्टिबल में सुनी-अनसुनी रहीं, उनके तेवर भले बदले थे लेकिन हिंदी की बाजार कल्प की दरकार से गुरेज वे भी नहीं कर पाए।  
2006 में शुरू हुआ जयपुर लिटरेचर फेस्टिबल अब देश के सालाना टूरिज्म कैलेंडर का बड़ा इवेंट है। इसने पूरे दक्षिण एशिया में अपनी ब्रांडिंग साख बना ली है। पर जहां तक सवाल ऐसे आयोजनों और  उनमें जताई जाने वाली चिंताओं का है, तो इस पर अंतिम राय बनाना सहज नहीं है। महज कुछ दशक पहले तक जिस भाषा की शिनाख्त लोक और परंपरा की वाहक भाषा और कई दर्जन बोलियों को एक साथ बहा ले चलने वाली सांस्कृतिक धारा के रूप में होती थी, आज उस हिंदी के माथे पर देशज आंचलिकता की बजाय बाजार की बिंदी सजे, यह सोच प्रकारांतर से हर स्तर पर कायम हो रही है। यह तो तय है कि समय निरपेक्ष होकर आप तो किसी संस्कृति के और  ही उसके अभिव्यक्ति के जरियों का विकास सुनिश्चत कर सकते हैं। पर क्या यह मान लिया जाए कि हम आज सचमुच उस दौर पहुंच गए हैं जिसमें विकास और समृद्धि का एकमात्र विकल्प बाजार और उससे होकर गुजरने वाले रास्ते हैं। मार्केटिंग और ब्रांडिंग की दरकार किसी तेल-साबुन को बेचने के लिए जिस तरह होती है, क्या वही जरूरत एक भाषा की भी हो सकती है। सवाल का जवाब हां और ना दोनों हो सकता है। वैसे ज्यादा जरूरी है उन स्थितियों का आकलन जो ऐसे सवालों से दो-चार होने की नौबत लाती हैं।
 जिस भाषा को यह फख्र हासिल हो कि उसने साम्राज्यवादी दासता के खिलाफ संघर्ष की चेतना का प्रसार ऐतिहासिक रूप से किया और वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से लगातार जुड़ी रही, उसका भविष्य अचानक अंधकारमय कैसे हो सकता है? शायद जिस संकट की दुहाई दी जा रही है, वह हिंदी की नहीं बल्कि उन पेशेवरों की है, जो इस भाषा को रातोंरात हॉट औरसेलेबल बनाने की फिराक में हैं। पेशेवर दरकारों के मुताबिक भाषा का रुपांतरण गलत नहीं है। खास तौर पर उनके लिए तो और भी नहीं जो भाषा की कीमत इसी नजरिए से तय करते हैं। लेकिन यह भी साफ है कि भाषा को पेशेवर  और  बाजारोनुकूल होने की बजाय उसका जीवन से भरा होना ज्यादा जरूरी है। हिंदी के पास आज भी जिन्दगी  और जिन्दादिली की कमी नहीं, वह लोक, परंपरा और परिवार को एक सीध में लेकर चलने वाली अकेली और सबसे अनूठी भाषा है। फेस्टिव मूड में अगर यह अन्यतमता किसी को नहीं दिखती, तो दोष हिंदी का नहीं उसके शुभचिंतकों का है।