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शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

प्यार का नया देशकाल

प्यार और दोस्ती जीवन से जुड़े ऐसे सरोकार हैं जिनको निभाने के लिए हमारी आपकी फिक्रमंदी भले कम हुई हो पर इसे उत्सव की तरह मनाने वाली सोच बकायदा संगठित उद्योग का रूप ले चुका है। दिलचस्प यह भी है कि कल तक लक्ष्मी के जिन उल्लुओं की चोंच और आंखें सबसे ज्यादा परिवार और परंपरा का दूध पीकर बलिष्ठ हो रहे संबंधों पर भिंची रहती थी, अब वही कलाई पर दोस्ती और प्यार का धागा बांधने का पोस्टमार्डन फंडा हिट कराने में लगे हैं।
प्यार और दोस्ती के महापर्व
लव, फ्रेंड और फ्रेंडशिप का जो जश्न पूरी दुनिया में वेलेंटाइन डे के नाम पर शुरू हुआ है, उसका अतीत मानवीय संवेदनाओं को खुरचने वाली कई क्रूर सचाइयों पर से परदा उठाता है। सेंट वेलेंटाइन को भी नहीं पता होगा कि उनके बाद की पीढ़ियां उनके प्यार और समर्पण के संदेश को महज प्यार की सनसनाहट और रोमांच तक सीमित कर देंगे।
आज तो आलम यह है कि पिछले कई दशकों से दुनिया के सबसे समृद्ध देशों से लेकर गरीब और पिछड़े मुल्कों में वेलेंटाइन डे को उत्सव दिवस के रूप में मनाने की परंपरा कैलेंडर की कुछ खास तारीखें हैं। पिछले एक-डेढ़ दशक में प्यार और दोस्ती के महापर्व के रूप में वेलेंटाइन डे के साथ फ्रेंडशिप डे का भी प्रचलन काफी बढ़ गया है। अलबत्ता यह बात जरूर थोड़ी चौकाती है कि सेक्स और सेंसेक्स के बीच झूलती दुनिया में संबंधों को कलाई पर बांधकर दिखाने की रस्मी रिवायत से किसका भला ज्यादा हो रहा है।
राजेंद्र यादव कहा करते थे
स्वर्गीय लेखक राजेंद्र यादव दोस्ती की बात छेड़ने पर अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत दोहराते थे- 'बूट्स एंड फ्रेंडशिप शुड बी पॉलिश्ड रेग्युलरली।’ जाहिर है संबंधों को एक दिन के उल्लास और उत्सव की रस्म अदायगी के साथ निपटाने के खतरे को वे बखूबी समझते थे।
बात प्यार और दोस्ती की हो और बात युवाओं की न हो बात पूरी नहीं होती है। आर्चीज जैसी कार्ड और गिफ्ट बनाने और बेचने वाली कंपनियां इन्हीं युवाओं के मानस पर प्रेम, ख्वाब, यादें और दोस्ती जैसे शब्द लिखकर तो अपनी अंटी का वजन रोज ब रोज बढ़ा रही हैं। फिर बात दोस्ती और प्यार के महापर्व की हो तो युवाओं को कैसे भूला जा सकता है।
तुनक गए जावेद साहब
कुछ अर्से पहले टीवी पर दिखाए जा रहे एक शो में जज बने जावेद अख्तर तब तुनक गए जब गायिका वसुंधरा दास ने अपने एक गाने को यूथफूल होने की दलील उनके सामने रखी। जावेद साहब ने थोड़े तल्ख लहजे में उस मानसिकता पर चुटकी ली जिसमें देह की अवधारणा को संदेह से अलगाने की कोशिश हो या किसी बेसिर-पैर के म्यूजिकल कंपोजिशन को मार्डन या यूथफूल ठहराने का कैलकुलेटेड एफर्ट, यूथ सेंटीमेंट की बात छेड़कर सब कुछ जायज और जरूरी ठहरा दिया जाता है। उनके शब्द थे 'इस तरह की दलीलों को सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे यूथ कोई 21वीं सदी का इन्वेंशन हो और इससे पहले ये होते ही नहीं थे।’ इस वाकिए को सामने रखकर यह समझने में थोड़ी सहुलियत हो सकती है कि नई पीढ़ी को सीढ़ी बनाकर संबंधों के केक काटने वाला बाजार किस कदर अपने मकसद में क्रूर है। यहां यह भूल करने से बचना चाहिए कि नई पीढ़ी की संवेदनशीलता कोरी और कच्ची है। हां, यह जरूर है कि उसके आसपास का वातावरण उससे वह मौका भरसक हथिया लेने में सफल हो रहा है जो निभाए जाने वाले मानवीय सरोकारों को दिखाए जाने वाला रोमांच भर बना रहे हैं।
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ग्लोबल नहीं हैं भारतीय युवा

लोक और परंपरा के कल्याणकारी मिथकों पर भरोसा करने वाले आचार्यों की ाातें आ विश्वविद्यालयों के शोधग्रंथों तक सिमट कर रह गई हैं। इन पर मनन-चितन करने का भारतीय समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक विवेक बीते दौर की बात हो चुकी है। ऐसा अगर हम कह रहे हैं तो इसलिए क्योंकि ऐसा मानने वाले आज ज्यादा है। पर तथ्य और सत्य भी यहीं आकर ठहरता है, ऐसा नहीं है। दिलचस्प है कि खुले बाजार ने अपने कपाट जितने नहीं खोले, उससे ज्यादा हमने भारतीय युवाओं के बारे में आग्रहों को खोल दिया। सेक्स, सेंसेक्स और सक्सेस के त्रिकोण में कैद नव भारतीय युवा की छवि और उपलधि पर सरकार और कॉरपोरेट जगत सबसे ज्यादा फिदा है। ऐसा हो भी भला क्यों नहीं क्योंकि इसमें से एक ग्लोबल इंडिया का रास्ता बुहारने और दूसरा रास्ता बनाने में लगा है। यह भूमिका और सचाई उन सब को भाती है जो भारत में विकास और बदलाव की छवि को पिछले दो दशकों में सबसे ज्यादा चमकदार बताने के हिमायती हैं। ऐसे में कोई यह समझे कि देश की युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा न सिर्फ इन बदलावों के प्रति पीठ किए बैठा है बल्किइंडिया शाइनिग का मुहावरा ही उसके लिए अब तक अबूझ है तो हैरानी जरूर होगी।
सर्वे में सामने आया सच
कुछ साल पहले 'इंडियन यूथ इन ए ट्रांसफॉमिग वर्ल्ड : एटीटरूड्स एंड परसेप्शन’ नाम से एक शोध अध्ययन खूब चर्चा में आई थी। इसमें बताया गया था कि देश के 29 फीसदी युवा ग्लोबलाइजेशन या मार्केट इकोनमी जैसे शब्दों और उसके मायने से अपरिचित हैं। यही नहीं देश की जिस युवा पीढ़ी को इस इमîजग फिनोमेना से अकसर जोड़कर देखा जाता है कि उनकी आस्था चुनाव या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं व मूल्यों के प्रति लगातार छीजती जा रही है, उसके विवेक का धरातल इस पूर्वाग्रह से बिल्कुल अलग है। शोध के मुताबिक देश के तकरीबन आधे यानी 48 फीसद युवक ऐसे हैं, जिनका न सिर्फ भरोसा अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रति है बल्कि वे जीवन और विकास को इससे सर्वथा जुड़ा मानते हैं।
साफ है कि पिछले दो दशकों में देश बदला हो कि नहीं बदला हो, हमारा नजरिया समय और समाज को देखने का जरूर बदला है। नहीं तो ऐसा कतई नहीं होता कि अपनी परंपरा की गोद में खेली पीढ़ी को हम महज डॉलर, करियर, पिज्जा-बर्गर और सेलफोन से मिलकर बने परिवेश के हवाले मानकर अपनी समझदारी की पुलिया पर मनचाही आवाजाही करते। जमीनी बदलाव के चरित्र को जब भी सामाजिक और लोकतांत्रिक पुष्टि के साथ गढ़ा गया है, वह कारगर रहा है, कामयाब रहा है।
एक गणतांत्रिक देश के तौर पर छह दशकों के गहन अनुभव और उसके पीछे दासता के सियाह सर्गों ने हमें यह सबक तो कम से कम नहीं सिखाया है कि विविधता और विरोधाभास से भरे इस विशाल भारत में ऊपरी तौर पर किसी बात को बिठाना आसान है। तभी तो हमारे यहां बदलाव या क्रांति की भी जो संकल्पना है, वह जड़मूल से क्रांति की है, संपूर्ण क्रांति की है।
आज पिछले तीस सालों के विकास की अंधाधुंध होड़ के बजबजाते यथार्थ को देखने के बाद यह मानने वालों की तादाद आज ज्यादा है जो यह समझते हैं कि किसानों, दस्तकारों के इस देश को अचानक ग्लोबल छतरी में समाने की नौबत पैदा की गई और यह नौबत इतनी त्रासद रही कि कम से कम ढ़ाई लाख किसान खुदकुशी के मोहताज हुए। साफ है कि ग्लोब पर इंडिया को इमîजग इकोनमी पॉवर के तौर पर देखने के लिए जिन तथ्यों और तर्कों का हम सहारा ले रहे हैं, उसकी विद्रूप सचाई हमें सामने से आईना दिखाती है। सस्ते श्रम की विश्व बाजार में नीलामी कर आंकड़ों के खाने में विदेशी मुद्रा का वजन जरूर बढ़ सकता है पर यह सब देश के हर काबिल युवा के हाथ में काम के लक्ष्य और सपने को पूरा करने की राह में महज कुछ कदम ही हैं। ये कदम भी आगे जाने की बजाय या तो अब ठिठक गए हैं या फिर पीछे जाएंगे क्योंकि मेहरबानी बरसाने वाले अमेरिका जैसे देश एक बार फिर संरक्षणवादी आर्थिक हितों को अमल में लाने लगे हैं।
पब के दौर में लव
आखिर में एक बात और देश की लोक, परंपरा और संस्कृति के हवाले से। रूढ़ियां तोड़ने से ज्यादा सांस्कृतिक स्वीकृतियों को खारिज करने के लिए बदनाम पब और लव को बराबरी का दर्जा देने वाले युवाओं की जो तस्वीर हमारी आंखों के आगे जमा दी गई है, उसके लिए शराब का सुर्ख सुरूर बहुत जरूरी है। पर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चंडीगढ़ आदि से आगे जैसे ही हम इंडिया से भारत की दुनिया में कदम रखते हैं, यह युवा दरकार खारिज होती चली जाती है। नए भारत के युवाओं को लेकर यहां भी एक पूर्वाग्रह टूटता है क्योंकि जिस अध्ययन का हवाला हम पहले दे चुके हैं, उसमें उभरा एक बड़ा तथ्य यह भी है 66 फीसदी युवाओं के लिए आज भी शराब को हाथ लगाना जिदगी का सबसे कठिन फैसला है।
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लद गया सीटियों का जमाना
सीटियों का जमाना लदने को है। सूचना क्रांति ने सीटीमारों के लिए स्पेस नहीं छोड़ी है। इसी के साथ होने वाला है युगांत संकेत भाषा के सबसे लंबे खिचे पॉपुलर युग का। बहरहाल, कुछ बातें सीटियों और उसकी भूमिका को लेकर। कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं पर पहली सीटी किसी लड़की ने नहीं बल्कि किसी लड़के ने किसी लड़की के लिए ही बजाई होगी। बाद के दौर में सीटीमार लड़कों ने सीटी के कई-कई इस्तेमाल आजमाए। जिसे आज ईव-टीðजग कहते हैं, उसका भी सबसे पुराना औजार सीटियां ही रही हैं। वैसे सीटियों का कैरेक्टर शेड ब्लैक या व्हाइट न होकर हमेशा ग्रे ही रहा है। इस ग्रे कलर का परसेंटेज जरूर काल-पात्र-स्थान के मुताबिक बदलता रहा है।
बात किशोर या नौजवान उम्र की लड़के-लड़कियों की करें तो सीटी ऐसी कार्रवाई की तरह रही है, जिसमें 'फिजिकल’ कुछ नहीं है यानी गली-मोहल्लों से शुरू होकर स्कूल-कॉलेजों तक फैली गुंडागर्दी का चेहरा इतना वीभत्स तो कभी नहीं रहा कि असर नाखूनी या तेजाबी हो। फिर भी सीटियों के लिए प्रेरक -उत्प्रेरक न बनने, इससे बचने और भागने का दबाव लड़कियों को हमारे समाज में लंबे समय तक झेलना पड़ा है। सीटियों का स्वर्णयुग तब था, जब नायक और खलनायक, दोनों ही अपने-अपने मतलब से सीटीमार बन जाते थे।
किशोर कुमार की सीटी
इसी दौरान सीटियों को कलात्मक और सांगीतिक शिनाख्त भी मिली। किशोर कुमार की सीटी से लिप्स मूवमेंट मिला कर राजेश खन्ना जैसे परदे के नायकों ने रातोंरात न जाने कितने दिलों में अपनी जगह बना ली। आज भी जब नाच-गाने का कोई आइटमनुमा कार्यक्रम होता है तो सीटियां बजती हैं। स्टेज पर परफॉर्म करने वाले कलाकारों को लगता है कि पब्लिक का थोक रिस्पांस मिल रहा है। वैसे सीटियों को लेकर झीनी गलतफहमी शुरू से बनी रही है। संभ्रांत समाज में इसकी असभ्य पहचान कभी मिटी नहीं। यूं भी कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय के बदले दौर में भी इस कथित अमर्यादा का शुद्धिकरण कभी इतना हुआ नहीं कि सीटियों को बड़ी स्वीकृति स्वीकृति मिल जाए।
सीटियों से लाइन पर आए प्रेम प्रसंगों के कर्ताधताã आज अपनी गृहस्थी की दूसरी-तीसरी पीढ़ी की क्यारी को पानी दे रहे हैं। लिहाजा संबंधों की हरियाली को कायम रखने और इसके रकबे के बढ़ाने में सीटियों ने भी कोई कम योगदान नहीं किया है। यह अलग बात है कि इस तरह की कोशिशें कई बार सिरे नहीं चढ़ने पर बेहूदगी की भी अव्वल मिसालें बनी हैं।

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प्यार का झूठ और लव गुरु
शादी के बाद पति-पत्नी के रिश्ते में कितनी पारदर्शिता रहे, इसका अव्यावहारिक रास्ता निकाला जाना चाहिए। रेडियो-टीवी पर बैठे लव गुरुओं और मैरिटल काउंसलरों की भी सलाह ऐसी ही है। साफ तौर पर हिदायत दी जा रही है कि जो कहने-बताने से रिश्ते पर आंच न आए, वही सही है। पर यहां भी एक पेंच है। शेखी की तरह सचाई बघारने वाले ज्यादातर पुरुषों को अपने पिछले रिलेशन और अफेयर के बावजूद अपनी पत्नियों से परेशानी का खतरा न के बराबर रहता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि महिलाओं को घर-बाहर हर जगह यही हिदायत दी जाती है कि पुरुष तो ऐसे ही होते हैं, यहां-वहां और जहां-तहां मुंह मारने वाले। सो उसके किए पर अफसोस क्यों? चाहे जैसे हो बचा लो रिश्ता और इस तरह पेश आओ कि तुम्हारा पति तुम्हारे काबू में रहे, बहके नहीं और अगर बहके भी तो लौट के बुद्धु घर को आए की तरह।
केस स्टडी
शालिनी टीचर है और उसका पति इंश्योरेंस एजेंट। रजनी ने टीवी पर आने वाले मैरिटल काउंसिलिग के कार्यक्रम में बैठे विशेषज्ञों के आगे अपनी परेशानी रखी। उसकी शादी उसके साथ पढ़ने वाले लड़के से होनी थी। दोनों के बीच तकरीबन चार-पांच साल नजदीकी ताल्लुकात रहे। अफेयर भी कह सकते हैं। पर जब शादी की बात चली तो लड़के के घर वाले नहीं माने। शालिनी आज अपने शादीशुदा जीवन के आगे सब कुछ भूल चुकी है। उसकी एक बेटी स्कूल जाती है। पर उसका पति आज भी उसे अपने प्रति पूरी तरह वफादार नहीं मानता। उसे इस बात पर आए दिन पति से प्रताड़ित होना पड़ता है।
दरअसल, शालिनी ने एक ही गलती कि उसने अपने जीवनसाथी को शादी के कुछ ही दिनों बाद सब कुछ बता दिया। छह साल पहले कहा सच आज भी उसकी शादीशुदा जिदगी को ग्रास रहा है। शालिनी जैसी युवतियों से हमदर्दी रखने वाले भी यही कहते हैं कि पति के साथ सब कुछ शेयर करना जरूरी नहीं है। पुरुषों के लिए तो बदचलनी की गाली भी गिनती के ही हैं, पर महिलाओं की बोलती बंद करने के लिए उन्हें बदचलन ठहराना घर से बाहर क्या घर के अंदर भी सबसे आसान औजार है।
भूले नहीं हैं लोग अब भी टीवी पर स्वयंवर के उस ड्रामे को जिसमें राहुल महाजन शादी रचाते हैं। राहुल के लिए शादी का यह पहला मौका नहीं था। अफेयर के मामले में वह पहले से काफी विवादास्पद रहा था। पर उससे शादी का ख्वाब सजाने वाली किसी भी लड़की को इस बात से शिकायत नहीं थी। इस मुद्दे पर कोई चर्चा भी नहीं हुई।
आप सोचकर देखें, राहुल का सच किसी लड़की का होता तो क्या होता? अव्वल तो उसे इस टीवी शो का हिस्सा ही नहीं बनाया जाता। अगर बनाया भी जाता तो वरमाला कम से कम उसके गले में तो राहुल नहीं डालता। यह एक तरफ तो नए दौर का टीआरपी मार्का मनोरंजन का सच है तो वहीं दूसरी ओर यह रियलिटी उस पुरुष मानसिकता की भी है जिसे अपने ऊपर कभी कोई खरोंच बर्दाश्त नहीं भले खुद उसके नाखून बढ़ते रहें।
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चीनी प्रोडक्ट क्या
रिलेशन भी टिकाऊ नहीं

अखबारों के तकरबीन एक ही पन्ने पर साया हुईं ये दो खबरें हैं। एक तरफ प्राचीन से नवीन होता चीन है तो दूसरी तरफ उत्तर आधुनिकता की जमीन पर परंपराओं और संबंधों के नए सरोकारों को विकसित कर रहा अमेरिका। दुनिया के दोनों महत्वपूर्ण हिस्सों में यह सामाजिक बदलाव का दौर है। लेकिन दिशा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग। एक तरफ खतरे का लाल रंग काफी तेजी से और गाढ़ा होता जा रहा है तो दूसरी तरफ मध्यकालीन बेड़ियों से झूल रहे बचे-खुचे तालों को तोड़ने का संकल्प।
बाजार के साथ हाथ मिलाते हुए भी अपनी लाल ठसक को बनाए रखने वाले चीन की यह बिल्कुल वही तस्वीर नहीं है, जो न सिर्फ सशक्त है बल्कि सर्वाइवल और डेवलपमेंट का एक डिफरेंट मॉडल भी है। चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने सोशल रिसर्चर तंग जुन के हवाले से बताया कि चीन में न सिर्फ अर्थव्यवस्था का बल्कि तलाक का ग्राफ भी बढ़ा है। ढाई दशक पहले तक चीन में हर हजार शादी पर ०.4 मामले तलाक के थे जो कि आ वहां नौबत यह आ गई है कि हर पांचवीं शादी का दुखांत होता है। चीनी समाज में स्थितियां किस तरह बदल रही हैं, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2००9 में चीन में 2.42 करोड़ लोग परिणय सूत्र में बंधे लेकिन 24 लाख लोग अंतत: इस बंधन से बाहर आ गए। अर्थ का विकास जीवन को कुछ सुकूनदेह बनाता हो या न, उसके अनर्थ का खतरा कभी मरता नहीं है।
चीनी विकास का अल्टरनेटिव मॉडल परिवार और समाज के स्तर पर भी कोई वैकल्पिक राह खोज लेता तो सचमुच बड़ी बात होती। लेकिन शायद ऐसा न तो संभव था और न ही ऐसी कोई कोशिश की गई। उलटे विकास और समृद्धि के चमकते आंकड़ों की हिफाजत के लिए वहां पोर्न इंडस्ट्री और सेक्स ट्वॉयज का नया बाजार खड़ा हो गया। दुनिया के जिस भी समाज में सेक्स की सीमा ने सामाजिक संस्थाओं का अतिक्रमण कर सीधे-सीधे निजी आजादी का एजेंडा चलाया है, वहां सामाजिक संस्थाओं की बेड़ियां सबसे पहले झनझनाई हैं। चीन में आज अगर इस झनझनाहट को सुना जा रहा है तो वहां की सरकार को थ्यानमन चौक की घटना से भी बड़े खतरे के लिए तैयार हो जाना चाहिए। क्योंकि बाजार को अगर सामाजिक आधारों को बदलने का छुट्टा लाइसेंस मिल गया तो आगे जीवन और जीवनशैली के लिए सिर्फ क्रेता और विक्रेता के संबंधों का खतरनाक आधार बचेगा।
अमेरिका से आई खबर की प्रकृति बिल्कुल अलग है। वहां शादियों और मां बनने का न सिर्फ जोर बढ़ा है बल्कि इन सबके साथ कई क्रूर रुढ़ताएं भी खंडित हो रही हैं। जिस अमेरिका में राजनीति से लेकर फिल्म और शिक्षण संस्थाओं तक नस्लवाद का अक्स आज भी कायम है, वहां रंग, जाति और बिरादरी से बाहर जाकर प्यार करने और शादी करने का नया चलन जोर पकड़ रहा है। नस्ली सीमाओं को लांघकर विवाह करने का यह चलन कितना मजबूत है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पिछले तीन दशक में ऐसा करने वालों की गिनती दोगुनी हो चुकी है। अमेरिकी समाज के लिए यह एक बड़ी घटना है।
5०-6० के दशक तक अमेरिका में दूसरी नस्ल के लोगों के साथ विवाह करने की इजाजत नहीं थी। बाद में वहां सुप्रीम कोर्ट का आर्डर आया जिसने ऐसे किसी एतराज को गलत ठहराया। बहरहाल, इतना तो कहना ही पड़ेगा कि दुनिया भर में नव पूंजीवाद व उदारवाद का अलांरदार देश अपनी भीतरी बनावट में भी उदार होने के लिए छटपटा रहा है। यह सूरत आशाजनक तो है पर फिलहाल इसे क्रांतिकारी इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि अब भी वहां 37 फीसद सोशल हार्डकोर मेंटेलिटी के लोग हैं, जो विवाह की नस्ली शिनाख्त में किसी फेरबदल के हिमायती नहीं हैं।
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सोमवार, 20 जनवरी 2014

फेयर-अफेयर मेहर

मेहर तरार। कल तक यह नाम भले अनसुना-अनजाना सा था। पर अब ऐसा नहीं है। यह नाम आज भारत और पाकिस्तान से लेकर दुबई तक पूरे मीडिया जगत की सुर्खियों में है। अलबत्ता यह जरूर है कि खुद मेहर को भी यह लोकप्रियता बहुत रास आ रही है, ऐसा आप नहीं कह सकते हैं। उस पर आरोप भी लगा कि वह पांच मिनट की सस्ती लोकप्रियता के लिए मर्यादा की सीमाएं लांघ रही है। उसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का एजेंट तक ठहराया गया। मेहर चाहे जैसी भी है, उसने चाहे जो भी किया है पर इतना तो जरूर कह सकते हैं कि वह अपने इस अफसाने को इस दुखांत तक तो शायद नहीं ही ले जाना चाहती है, जहां आज यह पहुंच चुका है। सच कहें तो जिन वजहों से मेहर की चर्चा आज हर तरफ है, उसकी कल्पना शायद उसने भी नहीं की होगी। शुरुआत में उसका नाम आया केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री शशि थरूर के साथ उसके कथित अफेयर को लेकर। बाद में इस मामले में थरूर की स्वर्गीय पत्नी सुनंदा पुष्कर कूद पड़ीं।
सोशल मीडिया के जरिए चली इस लड़ाई में सुनंदा और मेहर ने एक दूसरे को खूब खरी खोटी सुनाई। एक तरफ उलाहना यह था कि कोई उनके पति पर डोरे डाल रहा है तो दूसरी तरफ से जवाब यह था कि यह सब कोरी बकवास है। आज जबकि सुनंदा इस दुनिया में नहीं हैं तो इससे मेहर भी कम दुखी नहीं हैं। सुनंदा की मौत के बाद जो कुछ शुरुआती प्रतिक्रियाएं ट्विटर के जरिए आईं, उसमें मेहर की तरफ से जताया गया अफसोस भी शामिल था। मेहर पाकिस्तान के लाहौर में रहती हैं। वह स्वतंत्र पत्रकार हैं और मशहूर अखबार 'डेली टाइम्स’ में काम कर चुकी हैं। दो मार्च 1968 को पाकिस्तान के लाहौर में जन्मी मेहर की शुरुआती पढ़ाई लाहौर के ही प्रेजेंटशन कॉलेज में हुई। इसके बाद उसने वहीं के किनैड़ कॉलेज से इंग्लिश लिटरेचर से एमए की डिग्री हासिल की।
शशि थरूर से अपने अफेयर को लेकर मेहर ने माना है कि वह उनसे दो बार मिल चुकी हैं। थरूर से उनकी पहली मुलाकात भारत में हुई और दूसरी बार वह दुबई में उनसे मिली थी। पर इससे ज्यादा शशि थरूर और अपने रिलेशन के बारे में कुछ भी मानने से इनकार करती है। जबकि सुनंदा ने जो खुलासे किए हैं ट्विटर पर उसमें मेहर शशि को पाने के लिए मचलती दिखती हैं। दरअसल यह पूरा मामला शशि थरूर के एक ट्वीट से शुरू हुआ, जिसमें एक पाकिस्तानी पत्रकार से उनके अफेयर की बात कही गई थी। बाद में पता चला कि शशि थरूर की जगह उनकी पत्नी इस तरह के ट्विट कर रही थीं। अफेयर की बात सामने आने पर मेहर ने कहा था कि वह एक मां हैं और उनके लिए परिवार पहली प्रथामिकता है। इस विवाद के बाद मेहर ने अपनी प्रोफाइल में खुद को एक मां और पत्रकार बताया।
मेहर पाकिस्तानी पंजाबी हैं। दुनिया भर में घूमने वाली मेहर अपनी फोटो भी ट्विटर पर शेयर करती रहती हैं। वह भारतीय फिल्मों और संगीत की दीवानी हैं और हिदी गानों के नए वीडियो अक्सर शेयर करती रहती है। हालांकि अब उनका नाम जिस दुखद प्रसंग से जुड़ गया है, उसमें कहना मुश्किल है कि वर्चुुअल वर्ल्ड को लेकर उसका आकर्षण यों ही बरकरार रहेगा कि नहीं।

 

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

सिंदूरी साथ का रिकॉर्ड

मौजूदा दौर में देह और संदेह के साझे ने संबंधों के पारंपरिक बनावट को पूरी तरह बदल दिया है। रिश्ते बंधने से ज्यादा खुलने लगे हैं, दरकने लगे हैं। यह एक ऐसे समय का यथार्थ है जिसे नाम ही दिया गया है 'खुलेपन’ का। यह नामकरण हुआ तो था वैसे आर्थिक लिहाज से पर आर्थिक सरोकारों की खुली दरकारों ने देखते-देखते समाज, संबंध और संस्कृति की पारंपरिक दुनिया को पूरी तरह उलट-पुलट दिया। इसलिए अब संबंधों के धागे खुलने पर उतनी हैरत नहीं होती जितना उनके धैर्यपूणã निर्वाह के बारे में जानकर।
बात संबंधों की करें तो विवाह संस्था का ध्यान सबसे पहले आता है। अभी ब्रिटेन से चलकर एक खबर हिंदुस्तान में काफी पढ़ी-देखी और सराही गई कि वहां रहने वाले भारतीय मूल के दंपति करमचंद और करतारी रिकॉर्ड 86 साल से एक-दूसरे के साथ हैं। यह ब्रिटेन की संस्कृति के लिहाज से बड़ी बात है। इसलिए इस जोड़ी के साथ और इनसे जुड़ी तमाम तरह की जानकारियों को लोगों ने चाव से पढ़ा-जाना। खुद करमचंद और करतारी के लिए भी यह एक सुखद अनुभूति है कि जिस सिंदूरी साथ को उन्होंने अपने प्रेम और संस्कार के कारण अब तक बरकरार रखा है, वही अब उन्हें पूरी दुनिया में सम्मान दिला रहा है।
पंजाब के एक छोटे से गांव में 19०5 में जन्मे करमचंद की करतारी से 19०5 में शादी हुई थी। पासपोर्ट में दर्ज जानकारी के मुताबिक इस समय करमचंद की उम्र 1०6 साल और उनकी पत्नी करतारी की उम्र 99 साल है। परिवार के साथ 1965 से रह रहे करमचंद से जब पूछा गया कि रिकार्ड समय तक चले उनके दांपत्य संबंध का क्या राज है तो उन्होंने कहा कि शादीशुदा जिंदगी जीने का कोई राज नहीं होता है। हालांकि यह कहते हुए वह यह भी कहते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी में भरपूर आनंद उठाया है। जो चाहा वो किया, जैसा चाहा वैसा खाया-पिया, पर सब कुछ एक संयम के साथ। आज अगर उनके बारे में और उनके पारिवारिक जीवन के बारे में पूरी दुनिया में बात हो रही है तो इसलिए क्योंकि उन्होंने जीवन और मर्यादा के बीच कोई सख्त रेखा खींचने की बजाय एक समन्वयी लोच बनाए रखा, अपनी सोच में भी और अपने आचरण में भी।
जानकर लोगों को हैरत होगी कि जिंदगी को जिंदादिली से जीने वाले करमचंद रोज शाम खाने से पहले एक सिगरेेट पीते हैं। यही नहीं हफ्ते में तीन-चार बार व्हिसकी या ब्रांडी भी पीते हैं। उनकी जिंदगी की ये आदतें मर्यादा या संयम से भटकाव नहीं बल्कि जिंदगी को साकारात्मकता के साथ जीने की ललक की तरफ इशारा है।
करमचंद और करतारी के सिंदूरी साथ को सिर्फ वे दोनों ही नहीं पूरा करते हैं बल्कि इसके साथ उनके बच्चे और उनका परिवार भी है। वे दोनों अपने छोटे बेटे सतपाल और उसकी पत्नी रानी और दो पोते-पोतियों के साथ रहते हैं। बहू कहती है कि उनके लिए सास-ससुर उस छाया की तरह है, जहां बहुत सारी शांति और खूब सारा प्यार और आशीर्वाद है। बेटा सतपाल भी खुश है कि उनके मां-पिता न सिर्फ जीवित हैं बल्कि उनके साथ स्वस्थ और प्रसन्न हैं। बेटे को खुशी इस बात की भी है कि उन्हें इतने लंबे समय तक मां-पिता की सेवा करने का अवसर ईश्वर ने दिया है।
फिल्मकार सूरज बड़जात्या और करण जौहर बार-बार फिल्मी पर्दे पर भारतीय परिवारों की संयुक्त परंपरा को उत्सवी रूप में दिखाते हैं और बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ते हैं। पर जीवन की सिनेमाई समझ रखने वाले उन जैसे तमाम दूसरे लोगों को भी यह बात समझनी चाहिए कि महत्वपूर्ण परिवार को साथ देखना-दिखाना नहीं बल्कि उन सरोकारों को समझना है, जिससे यह साथ अटूट बनता है और सालोंसाल निभता-टिकता है। टेकचंद और करतारी के जीवन में झांकना इन सरोकारों से परिचित होना है।
 

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

तुम सीटी बजाना छोड़ दो !


सीटियों का जमाना लदने को है। सूचना क्रांति ने सीटीमारों के लिए स्पेस नहीं छोड़ी है। इसी के साथ होने वाला है युगांत संकेत भाषा के सबसे लंबे खिंचे पॉपुलर युग का। बहरहाल, कुछ बातें सीटियों और उसकी भूमिका को लेकर। कोई ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं पर पहली सीटी किसी लड़की ने नहीं बल्कि किसी लड़के ने किसी लड़की के लिए ही बजाई होगी। बाद के दौर में सीटीमार लड़कों ने सीटी के कई-कई इस्तेमाल आजमाए। जिसे आज ईव-टीजिंग कहते हैं, उसका भी सबसे पुराना औजार सीटियां ही रही हैं। वैसे सीटियों का कैरेक्टर शेड ब्लैक या व्हाइट न होकर हमेशा ग्रे ही रहा है। इस ग्रे कलर का परसेंटेज जरूर काल-पात्र-स्थान के मुताबिक बदलता रहा है।
बात किशोर या नौजवान उम्र की लड़के-लड़कियों की करें तो सीटी ऐसी कार्रवाई की तरह रही है, जिसमें 'फिजिकल' कुछ नहीं है यानी गली-मोहल्लों से शुरू होकर स्कूल-कॉलेजों तक फैली गुंडागर्दी का चेहरा इतना वीभत्स तो कभी नहीं रहा कि असर नाखूनी या तेजाबी हो। फिर भी सीटियों के लिए प्रेरक -उत्प्रेरक न बनने, इससे बचने और भागने का दबाव लड़कियों को हमारे समाज में लंबे समय तक झेलना पड़ा है। सीटियों का स्वर्णयुग तब था जब नायक और खलनायक, दोनों ही अपने-अपने मतलब से सीटीमार बन जाते थे। इसी दौरान सीटियों को कलात्मक और सांगीतिक शिनाख्त भी मिली। किशोर कुमार की सीटी से लिप्स मूवमेंट मिला कर राजेश खन्ना जैसे परदे के नायकों ने रातोंरात न जाने कितने दिलों में अपनी जगह बना ली। आज भी जब नाच-गाने का कोई आइटम नुमा कार्यक्रम होता है तो सीटियां बजती हैं। स्टेज पर परफॉर्म करने वाले कलाकारों को लगता है कि पब्लिक का थोक रिस्पांस मिल रहा है। वैसे सीटियों को लेकर झीनी गलतफहमी शुरू से बनी रही है। संभ्रांत समाज में इसकी असभ्य पहचान कभी मिटी नहीं। यूं भी कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय के बदले दौर में भी इस कथित अमर्यादा का शुद्धिकरण कभी इतना हुआ नहीं कि सीटियों को शंखनाद जैसी जनेऊधारी स्वीकृति मिल जाए। सीटियों   से लाइन पर आए प्रेम प्रसंगों के कर्ताधर्ता आज अपनी गृहस्थी की दूसरी-तीसरी पीढ़ी की क्यारी को पानी दे रहे हैं। लिहाजा संबंधों की हरियाली को कायम रखने और इसके रकबे के बढ़ाने में सीटियों ने भी कोई कम योगदान नहीं किया है। यह अलग बात है कि इस तरह की कोशिशें कई बार सिरे नहीं चढ़ने पर बेहूदगी की भी अव्वल मिसालें बनी हैं।
रेट्रो दौर की मेलोड्रामा मार्का कई फिल्मों के गाने प्रेम में हाथ आजमाने की सीटीमार कला को समर्पित हैं। एक गाने के बोल तो हैं- 'जब लड़का सीटी बजाए और लड़की छत पर आ जाए तो समझो मामला गड़बड़ है।' 1951 आयी फिल्म 'अलबेला' में चितलकर और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ में 'शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो' तो आज भी सुनने को मिल जाता है  
साफ है कि नौजवान लड़के-लड़कियों को सीटी से ज्यादा परेशानी कभी नहीं रही और अगर रही भी तो यह परेशानी कभी सांघातिक या आतंकी नहीं मानी गई। मॉरल पुलिसिंग हमारे समाज में अलग-अलग रूप में हमेशा से रही है और इसी पुलिसिंग ने सीटी प्रसंगों को गड़बड़ या संदेहास्पद मामला करार दिया। चौक-चौबारों पर कानोंकान फैलने वाली बातें और रातोंरात सरगर्मियां पैदा करने वाली अफवाहों को सबसे ज्यादा जीवनदान हमारे समाज को कथित प्रेमी जोड़ों ने ही दिया है। सीटियां आज गैरजरूरी हो चली हैं। मॉरल पुलिसिंग का नया निशाना अब पब और पार्क में मचलते-फुदकते लव बर्डस हैं। सीटियों पर से टक्नोफ्रेंडी युवाओं का डिगा भरोसा इंस्टैंट मैसेज, रिंगटोन और मिसकॉल को ज्यादा भरोसेमंद मानता है।
मोबाइल, फेसबुक और आर्कुट के दौर में सीटियों की विदाई स्वाभाविक तो है पर यह खतरनाक भी है। इस खतरे का 'टेक्स्ट' आधी दुनिया के पल्ले पड़ना अभी शुरू भी नहीं हुआ था कि वह इसकी शिकार होने लगी। सीटियों की विदाई महिला सुरक्षा का शोकगीत भी है क्योंकि उनके लिए अब हल्के-फुल्के खतरों का दौर लद गया है। बेतार खतरों के जंजाल में फंसी स्त्री अस्मिता और सुरक्षा के लिए यह बड़ा सवाल है।

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

महात्मा की लीक पर ब्रह्मचारी प्रतीक


गांधी के ब्रह्मचर्य  प्रयोग पर सवाल और विवाद की धुंध आज भी छटी नहीं है। किताबें जो महात्मा के जीवन को लेकर लगातार आ रही हैं, उनमें उनके इस प्रयोग को हॉट सेक्सुअल टॉपिक  की तरह उठाया गया है। किताब को बेस्ट सेलर का तमगा दिलाने के लिए लेखकों ने गांधी के लिखे पत्र और लेख तो क्या हर उस वाक्य को खंगाला है जहां कहीं भी उन्होंने किसी महिला का नाम लिया है या फिर उनको लेकर शब्दों और भावों में किसी तरह की लैंगिक संवेदना के संकेत मिले हैं। गांधी अपने किए को लेकर खासे खुले थे। उनके 'गोपन' का यह 'ओपन' उनके जीवन संदर्भों और प्रयोगों को समझने में जितने कारगर नहीं हुए, उससे ज्यादा इनका इस्तेमाल विषय को विषयी बनाने में किया गया। नहीं तो यह कतई नहीं होता कि आत्मानुशासन को अपनी अहिंसक जीवनशैली का सबसे जरूरी औज़ार की तरह इस्तेमाल करने वाले महात्मा के जीवन को हम महज एक सेक्सुअल बिहेवेरियल लेबोरेटरी की तरह देखते।
बहरहाल गांधी और ब्रह्मचर्य से शुरू हुई चर्चा में बात एक नए और सामयिक संदर्भ की।  टीवी पर बिग बॉस का सीजन फाइव शुरू हो चुका है। उधर, बॉलीवुड के नए और उभरते कलाकार प्रतीक बब्बर इन दिनों अपनी फिल्म के हिट होने के लिए एक अनोखी प्रतिज्ञा के लिए चर्चा में हैं।  बिग बॉस की रियलिटी का धरातल पिछले सीजन में जितना बदला था, नए सीजनमें वह बदलाव प्रायोगिक हिमाकतों की नई दहलीज छू रहा है। शो का पौरुष और चारित्रिक बल बनाए रखने का जिम्मा शक्ति कपूर को दिया गया है तो, वहीं उनकी जिम्मेदारी का इम्तहान लेने के लिए बारह यौवनाओं का हुजूम इकट्ठा किया गया है। पिछले सीजन में लिहाफ की हलचल देखकर दर्शकों ने प्रेमी युगल की अंदरूनी कार्रवाई के रोमांच का अनुभव किया था। नए सीजन में अंदरूनी हलचल को खुले में लाने की मंशा साफ जाहिर होती है। पर तारीफ करनी होगी उन सितारे होस्ट्स की जिन्होंने शो की मेजबानी का फैसला तो बतौर प्रोफेशनल किए पर शक्ति कपूर की बिग बॉस के घर में एंट्री से पहले न तो उनसे कोई सीधी बात की और न ही दर्शकों से उनका कोई औपचारिक परिचय कराया। और तो और उनकी एंट्री के बाद बगैर उनका नाम लिए यहां तक कह दिया कि अच्छा हुआ बिग बॉस ने उन्हें (शक्ति को) अपने घर बुला लिया, नहीं तो वे किसी के घर जाने लायक नहीं थे। करीब 700 फिल्में करने के बाद एक सिने आर्टिस्ट का कद जितना दमदार और ऊंचा होना चाहिए था शक्ति ने उसे अपने ढीले कैरेक्टर के कारण ही कहीं न कहीं गंवाया है। देखना अब यह होगा कि इस रियलिटी शो में वे इस दाग को कुछ कम करना पसंद करेंगे या और ज्यादा दागदार हो जाएंगे।
शक्ति के बाद बात प्रतीक प्रसंग की। यह प्रसंग हमारे समय की युवा चेतना को समझने का नया प्रस्थान बिंदु भी बन सकता है। प्रतीक बब्बर हिंदी सिनेमा का नया चेहरा तो हैं ही उन्होंने कुछ ही दिनों और कुछ ही फिल्मों के बाद एक प्रतिभाशाली कलाकार की शिनाख्त पा ली है। प्रतीक ने अपनी नई रिलीज होने वाली फिल्म 'माई फ्रेंड पिंटो' की सफलता की कामना कुछ अनूठे अंदाज में की। उन्होंने यह प्रण उठाया है कि जब तक उनकी फिल्म रिलीज नहीं हो जाती, वे सेक्स नहीं करेंगे। दिलचस्प है कि यह प्रण एक युवा और अविवाहित कलाकार का  है। आमतौर पर सितारे अपनी फिल्म की सफलता के लिए दरगाहों और मंदिरों की दहलीज चूमते हैं पर प्रतीक इस मामले में सबसे अलग निकले। बताया जा रहा है कि अपने प्रण को जोखिम में नहीं डालने के लिए वे एहतियाती तौर पर बॉलीवुड. की आए दिन होने वाली लेट नाइट पार्टियों और फंक्शनों में जाने से बच रहे हैं।
प्रतीक का प्रण कहीं न कहीं उनकी और उनके जैसे युवाओं की जिंदगी की सच को भी बेबाकी से बयां करता है। मेल-मुलाकात और दोस्ती के दायरे में आज सब कुछ जायज है, कुछ भी वज्र्य या त्याज्य नहीं। यह दायरा न सिर्फ नए संबंधों के नए धरातल को चौड़ा और मजबूत कर रहा है बल्कि तरोताजगी से भरी उस युवा मानसिकता को भी बयां करता है, जो संबंध, परिवार और परंपरा की लीक को अपनी सीख के साथ बदल रहा है।
ऊपर बयां किए गए सारे हवाले हमारे सामने कई सवाल उठाते हैं। हमारे समय की ताकत और दिलचस्पी किन बातों में है? समाज और देश की सरहद लांघ चुके नफरत के दौर में प्रेम जिन अंत:करणों में आज भी महफूज है, उनके लिए इसका महत्व क्या है? क्या संबंधों का दैहिक तकाजा इतना भारी है कि उसके लिए संयम की कसौटी का सर्वथा त्याग जरूरी मांग हो गया है? ऐसा क्यों है कि देह को लेकर संदेह को मिटाने वाले हिमायतियों में हम, हमारे समय और हमारे समाज से भी आगे वह बाजार है जिसकी भूमिका को लेकर अपने तरह के संदेहों का जाला आज भी बना हुआ है।
एक बात जो इस पूरे संदर्भ में कही जा सकती है कि सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स के दौर में संबंध और संवेदना के हवाले भी बदल गए हैं। ये आत्मीय प्रसंग अपनी धीरता और गंभीरता को गंवाते जा रहे हैं। फौरीपन के नशे ने कॉफी और प्रेम दोनों को चुस्कीदार जायके में बदल दिया है। मन का सफर लंबी डग से नहीं पूरा किया जा सकता और फौरी आवेग से हासिल होने वाला स्पर्श दैहिक ही हो सकता है आत्मीय तो कदापि नहीं। तभी तो आत्मानुशासन की धीरता के हमारे समय के सबसे बड़े पैरोकार महात्मा को भी लोगों ने नहीं बख्शा। हम अपने समय और उसकी संवेदना को किस 'शक्ति' और किस 'प्रतीक' से बयां करना चाहेंगे, यह हमारे ऊपर है। 

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

सदन, सौंदर्य और सुनंदा


 बारहमासे का एक चक्र भी पूरा नहीं हुआ कि फसाने की दिलकशी फिर से न सिर्फ बहाल दिख रही है, बल्कि एक बार फिर अपने पूरे शबाब पर भी है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकसभा की दर्शक दीर्घा में नजर आई, उस उपस्थिति की, जिसकी चर्चा कॉफी टेबल से लेकर फुटकर चौपालों तक है। बुधवार को देश के तमाम अखबारों ने ये खबर प्रमुखता से छापी कि शादी के बाद पूर्व विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर के लोकसभा में पहले महत्वपूर्ण भाषण के दौरान उनकी पत्नी सुनंदा पुष्कर उनका हौसला बढ़ाने पहुंचीं। पति को हौसले और भरोसे का जो सिंदूरी समर्थन दर्शक दीर्घा में बैठकर सुनंदा पुष्कर जता रही थीं, उसकी अभिव्यक्ति इतनी खुली और खनकदार थी कि उसके आकर्षण पाश में लोकसभा तकरीबन घंटे भर तक अवगाहन करती रही।
भारतीय राजनीति और राजनेता अमेरिका और यूरोप से अलग हैं। हमारे यहां निजी प्रेम, साहर्चय और यहां तक कि दांपत्य तक को शालीन दोशाले के साथ ही पेश किया जाता है। बहुत गहरी छानबीन के बजाय एक विहंगम दृष्टि अगर गुजरे छह से ज्यादा दशकों के स्वतंत्र भारत की राजनीतिक यात्रा पर डालें तो अकेले राजनेता पंडित नेहरू दिखाई पड़ेंगे, जिनके स्वभाव और सलूक में यूरोपीय या अमेरिकी मन-मिजाज जब-तब झांकता था। इसके अलावा जो उदाहरण या प्रकरण गिनाए जा सकते हैं, उसमें प्रकट न होने का यत्नपूर्ण संकोच ही ज्यादा छलका है। दिलचस्प है कि उदारीकरण के तीस साला अनुभव के बाद संबंधों को लेकर खुलेपन का दायरा परिवार-समाज तक की दहलीज को लांघ रहा है, बावजूद इसके अगर सार्वजनिक जीवन की शुचिता कुछ संकोच और हिचक में ही बदहाल दिखती है तो इसे देश की बदली राजनीति की न बदलने वाली धज ही कहेंगे। पर अब यह धज समय सापेक्ष नहीं रही, नहीं तो दोशाले का इस्तेमाल शालीनता के लिए ही होता, मुंह ढांपने या छिपाने के लिए नहीं होता। बिहार और उत्तर प्रदेश सहित कुछ दूसरे सूबों के कई माननीय इन दिनों अपने जिन कुकृत्यों के कारण अदालत और जेल के चक्कर काट रहे हैं, वह भी पिछले कुछ दशकों में प्रकट हुई सार्वजनिक जीवन की सचाई का ही एक विद्रूप चेहरा है।
बहरहाल, बात एक बार फिर सुनंदा-शशि की। याददाश्त पर बहुत जोर देने की जरूरत नहीं है याद करने के लिए कि किन कारणों से थरूर को अपने मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था। जाहिर है, कारण कई थे पर थे सब समगोत्रीय ही। उन तमाम कारणों की अकेली धुरी रहीं सुनंदा, जो आज पूर्व विदेश मंत्री की पत्नी हैं। प्रेम के लिए आत्मोत्सर्ग के इस श्याम-श्वेत को लेकर चाहे हम जितनी बातें कर लें पर इसकी नाटकीयता में आकर्षण और सौंदर्य भी कम नहीं, इसकी साक्षी तो अब देश की संसद भी है।

साभार : राष्ट्रीय सहारा (17 मार्च, 2011)

रविवार, 6 मार्च 2011

निर्वस्त्र नियति


बीज का बीजक
प्रकृति के लिए पुराना
मानवीय ग्रंथियों के लिए
नया समाजशास्त्र भी है

एक पूरी पौध
याकि अव्वल एक गाछ
मटमैली निश्चिंत छाया
चहचहाटों की
चोंच से बने घोसले
कुछ रेंगती सचाइयों को
छिपाए कोटर

रंगीन सज
फलदार धज की
संवेदनशील संभावना
होती है हर बीज में
साथ में  होती है
एक काली कठोर
आशंका भी
उजड़ जाने की
परती पर पर्यावरण
रचने से पहले
बिखर जाने की

होता है हर संबंध
अपनी यात्रा से पहले
एक बीज ही
भरोसे की अनंत
चढ़ाई और ढलान
संभावना-आशंका की
निर्वस्त्र नियति

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

मथभुकनी


 (1)
मथभुकनी
कोई लांछन नहीं
बजाप्ता अब नाम है उसका
लाड़ के साथ पुकारा 
शख्सियत के साथ
काढ़ा जानेवाला नाम

(2)
बहनों में दो उससे पहले
एक उसके बाद
और आखिर में
भाइयों की युगलबंदी
सबसे पहले मां ने कहा
अपनी सबसे अलग
इस बेटी को
मथभुकनी
फिर बहनों ने
बाद में चलकर
रक्षा बंधन के लिए
कलाई आगे करने वाले
उम्र में आधे भाइयों ने
किया विकास
इस पुकारू परंपरा का

(3)
दूध पीने से ज्यादा
दूध काटने की आदत
प्यार पाने से ज्यादा
प्यार को ना बांटने की
जिद्दी फितरत
अलगाती चली गई उसे
अपने ही सहोदरों से
पहले तो घरेलू परिवेश ने ही
फूंका शंख
फिर कुछ स्वायत्त किताबों ने
बांधे पंख
और आजाद होता चला गया
एक ख्यालात
मजबूत होती चली गई
एक कस्बाई लड़की का
तांबई हालात

(4)
सांस की गुदगुदी
मन की फुलझड़ी
किसी नाजुक पंखुरी पर लिखे
स्त्रीवादी सुलेख की तरह
मजबूत इरादों में ढलते गए
मथभुकनी के इर्द-गिर्द
प्यार को
अपनी जिंदगी के प्रति
एतराज जताने का
जरिया बना लेने के
खतरनाक जज्बे ने
बना दिया बालिग उसे
संविधान की सहमति का
मोहताज हुए बगैर
फूल और पराग पर
मचलने के
ककहरे अनुभव से पहले
वह खुद ही हो गई आस्वाद

(5)
मुझे क्यों
कहा गया मथभुकनी
क्यों नहीं बरसे
सिर्फ मेरे लिए मेघ
क्यों भींगाई जाती रही मैं
साझे प्यार की बरसात में
क्यों नहीं गूंजा
सिर्फ मेरा नाम
पुश्तैनी जज्बात में
सवालों का तकिया
नींद से ज्यादा सपने दे गई
मैं भुकाती रहूं माथा
और कोई देता रहे साथ
प्यार का
प्यार की
कभी न खत्म होने वाली
तालाश का

(6)
मथभुकनी को देखना
तीन दशकों में एक साथ
तौलना
उसके अनुभवों की मात्रा को
कोई मामूली लेखाजोखा नहीं
कुछ कहना ही हो अंदाजन 
तो कह सकते हैं महज इतना
कि कई बार साना गया आटा
गूंथी गई बार-बार मिट्टी
है इंतजार में अब भी
गर्म तबे  के
घूमती चाक के  

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

हाँ मेरी संगिनी


पटरी पर
जब तक दौड़ती है रेल
बनी रहती है धड़कन 
जिंदगी की   
हाँ मेरी संगिनी
होकर तुम्हारे साथ
होता है यह एहसास 
कि पटरी के बिना रेल
और मैदान से बाहर
खेल का जारी रहना
यकीन नहीं
बस है एक मुगालता 
सुब कुछ ठीक होने का
अपनी ही लानत पर
निर्भीक होने का 
   

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

रियल फील और थ्रिल से लबरेज रिलेशन



रियलिटी शोज के जमाने का रिलेशन भी रियल फील और थ्रिल से लबरेज है और इस फील को डंके की चोट पर मुहैया करा रही हैं आई-पील और अनवांटेड 72 जैसी रंग-बिरंगी गोलियां बनाने वाली कंपनियां...

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा



शादी के बाद पति-पत्नी के रिश्ते में कितनी पारदर्शिता रहे, इसका अब व्यावहारिक रास्ता निकाल लिया गया है। रेडियो-टीवी पर बैठे लव गुरुओं और मैरिटल काउंसलरों की भी सलाह ऐसी ही है। साफ तौर पर हिदायत दी जा रही है कि जो कहने-बताने से रिश्ते पर आंच न आए, वही सही है। पर यहां भी एक पेच है। शेखी की तरह सचाई बघारने वाले ज्यादातर पुरुषों को अपने पिछले रिलेशन और अफेयर के बावजूद अपनी पत्नियों से परेशानी का खतरा न के बराबर होता है। इसके उलट महिलाओं को यह हिदायत दी जाती है कि पुरुष ऐसे ही होते हैं, यहां-वहां और जब-तब मुंह मारने वाले। सो उसके किए पर अफसोस क्यों? चाहे जैसे हो बचा लो रिश्ता और इस तरह पेश आओ कि तुम्हारा पति तुम्हारे काबू में रहे, बहके नहीं। और अगर बहके भी तो लौट के बुद्धु घर को आए की तरह।
रजनी एक अध्यापिका है और उसका पति इंश्योरेंस एजेंट। रजनी ने टीवी पर आने वाले  मैरिटल काउंसिलिंग के कार्यक्रम में बैठे विशेषज्ञों के आगे अपनी परेशानी रखी। उसकी शादी उसके साथ पढ़ने वाले लड़के से होनी थी। दोनों के बीच तकरीबन चार-पांच साल नजदीकी ताल्लुकात रहे। अफेयर भी कह सकते हैं। पर जब शादी की बात चली तो लड़के के घर वाले नहीं माने। रजनी आज अपने शादीशुदा जीवन के आगे सब कुछ भूल चुकी है। उसकी एक बेटी स्कूल जाती है। पर उसका पति आज भी उसे अपने प्रति पूरी तरह वफादार नहीं मानता। उसे इस बात पर आए दिन पति से प्रताड़ित होना पड़ता है। दरअसल, रजनी ने एक ही गलती कि उसने अपने जीवनसाथी को शादी के कुछ ही दिनों बाद सब कुछ बता दिया। छह साल पहले कहा सच आज भी उसकी शादीशुदा  जिंदगी को ग्रास रहा है। रजनी जैसी युवतियों से हमदर्दी रखने वाले भी यही कहते हैं कि पति के साथ सब कुछ शेयर करना जरूरी नहीं है। पुरुषों के लिए तो बदचलनी की गाली भी गिनती के ही हैं, पर महिलाओं की बोलती बंद करने के लिए उन्हें बदचलन ठहराना घर से बाहर कया घर के अंदर भी सबसे आसान औजार है।
हाल में स्वयंवर सीजन में लोगों ने राहुल महाजन की शादी का रियल ड्रामा टीवी पर देखा। राहुल के लिए शादी का यह पहला मौका नहीं था। और लड़कियों से अफेयर के मामले में तो वह और भी पहुंचा हुआ रहा है। पर उससे शादी का ख्वाब सजाने वाली किसी भी लड़की को इस बात से शिकायत नहीं थी। इस मुद्दे पर कोई चर्चा भी नहीं हुई। आप सोचकर देखें, राहुल का सच किसी लड़की का होता तो क्या होता? अव्वल तो उसे इस टीवी शो का हिस्सा ही नहीं बनाया जाता। अगर बनाया भी जाता तो वरमाला कम से कम उसके गले में तो राहुल नहीं डालता। यह एक तरफ तो नए दौर का टीआरपी मार्का मनोरंजन का सच है तो दूसरी ओर यह रियलिटी उस पुरुष मानसिकता की भी है जिसे अपने उपर कभी कोई खरोंच बर्दाश्त नहीं भले खुद उसके नाखून बढ़ते रहें। 

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

तू खा गोली, मैं करूंगा प्रेम


वेंडर मशीनों से कंडोम का मुफ्त वितरण उतना ही जरूरी है जितना गली-मोहल्ले में खुले एटीएम से पैसे निकालने की आसानी। गुजरात में पिछले गरबा महोत्सव को हॉट इवेंट का दर्जा दिलाने के लिए गरबा पांडालों में ये दोनों ही सुविधाएं एक साथ मौजूद  थीं। इससे पहले दिल्ली जैसे शहरों में रेड लाइट इलाकों को सेहत के लिहाज से कंडोम के मुफ्त वितरण के प्रयोग आजमाए जा चुके हैं। इस तरह की समझदारी अब नई नहीं रही, बात इससे आगे निकल चुकी है। कंडोम का बचावकारी मिथ अब टूट रहा है, उन पुरुषों के लिए जिनके लिए कभी भी यह स्वेच्छा का चुनाव नहीं रहा। हारे को हरिनाम और डरते को चलाना पड़े कंडोम से काम। हाल तक की स्थितियां यही थीं। पर अब बदल रहा है सब कुछ।
पिछले एक दशक में 'देह' को हर लिहाज से 'संदेहमुक्त' कराने की पराक्रमी कोशिशें हुई हैं। वैसे न तो ये कोशिशें नई हैं और न ही इनके पीछे की  मंशा। फर्क है तो बस उस व्यग्रता और तेजी में जो इन डरे-सहमे और छिपे उपक्रमों को आज खुलेआम धार चढ़ा रहे हैं, रैशनल कसौटियों पर कस रहे हैं। कंडोम का झल्लीदार अवरोध सुरक्षा की चाहे जितनी अचूक गारंटी हो, पर इसे स्वीकार करने वाला पुरुष मन आज तक भारी रहा है। यह भारीपन तकरीबन वैसा ही है, जैसा नसबंदी से भागने वाली पुरुषवादी झेंप। पहली सूरत में ऐसा लगता है जैसा यौन मोर्चे पर पौरुष तेज को जानबूझकर निस्तेज किया जा रहा है जबकि दूसरी सूरत पौरुषपूर्ण पराक्रम को आत्मघाती तरीके से कमजोर करने की है। पर अब ये सारी दुविधाएं, सारी समस्याएं बीती बातें हो चुकी हैं। रियलिटी शोज के जमाने का रिलेशन भी रियल फील और थ्रिल से लबरेज है और इस फील को डंके की चोट पर मुहैया करा रही हैं आई-पील और अनवांटेड 72 जैसी रंग-बिरंगी गोलियां बनाने वाली कंपनियां।
प्रेम का महापर्व आनेवाला है। नई सदी में यह महापर्व अपना पहला दशक पहले ही पूरा कर चुका है। इस बार तो इसके विस्तार का नया चरण शुरू होगा। याद आती है 'डेबोनियर' की तर्ज पर हिंदी में प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका का पहला संपादकीय। संपादक महोदय ने ओशोवादी लहजे में प्रेम की देहमुक्ति की मांग पर आंखें तरेरी थीं। लिखा था- 'प्रेम वासना की कलात्मक अभिव्यक्ति है'। आज तो ऐसे तर्कों की दरकार भी नहीं। हिंदी के बौद्धिक जगत में तो ये बातें कई तरीके से कही जा चुकी हैं कि हर संबंध की असलियत बिस्तर पर खुलती है। संबंधों की यह यात्रा चाहे किसी भी रास्ते शुरू हो, उसकी परिणति एक है।
कह सकते हैं कि यह परिणति देह और प्रेम को एक सीध में ला खड़ा करती है और यह सिंपल फिनोमेना ग्लोबल है। लिहाजा अब प्रेम की न तो नसें बंद की जाएंगी और न ही किसी निरोध-अवरोध से इसके मचलते प्रवाह को बांधने की मजबूरी होगी। अब तो महिलाओं के पर्स में ही पुरुष की प्रेमी देह का सुरक्षा मंत्र भी होता है। अब तक पति या प्रेमी के दीर्घायु होने के लिए महिलाएं उपवास रखती थीं, अब उसके  प्रेमाखेटन के लिए वह गोलियों का सेवन करती हैं, अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ की जोखिम भरी शर्त पर।
भूले न हों अगर आप तो याद करें मल्लिका सेहरावत की पहली हाहाकारी फिल्म 'ख्वाहिश'। कंडोम की डिब्बी दुकान से खरीदेने में लड़के की घिग्घी बंधती है और मल्लिका यही काम निस्संकोच तरीके से कर देती है, जिस पर सिनेमा हॉल के कुछ कोनों से तालियों भी उछलती है। नए दौर का वेलेंटाइन मार्का प्रेम अब इसी तरह की बेधड़की से परवान चढ़ेगा, जिसमें महिलाएं पुरुषों के सेफ खेलने के लिए इंतजाम अपने साथ रखेंगी और पुरुष लिंगवर्धक यंत्र और हाईपावर वियाग्रा डोज के सेवन से इस इंतजाम का भरपूर दोहन करेंगे। आखिर प्रेम के दैहिक भाष्य के दौर में संदेह की गुंजाइश है भी कहां? अगर किसी महिला के मन के कोने में संदेह है भी तो मान लीजिए कि न तो दफ्तर में बॉस उसे तरक्की देगा और न स्कूल-कॉलेज या पड़ोस का साथी उसे एकांत में मिलने के लिए प्रेमल मिस कॉल मारेगा।     

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

100 नंबर पर चर्मरोग


पांव से छिटककर दूर
जब बजने लगे पायल
तो उकताकर
सौ नंबर पर डॉयल

मनुहार का अत्याचारी सच
बयां करने वाली
पुलिस थाने में
धूल खा रही फाइल
चर्मरोग का
इलाज बताएं न बताएं
इस बीमारी के
गलगला गए यथार्थ को
मुहरबंद जरूर करती हैं

बुधवार, 12 जनवरी 2011

लड़की, बेडरूम और प्यार


 (1)
प्यार
प्यार का पुनर्पाठ
अभिनय की तरह
कई बार के रिटेक में
फाइनल शॉट का अभ्यास
एक जनतांत्रिक मसला तो है
पर संवैधानिक नहीं
सवाल उगाती समझदारी है यह
उस अधीर लड़की की
जो भूल से प्यार भले न सही
पर प्यार में चूक जरूर कबूलती है
प्यार का मर्म कोमल धर्म
उसे रह-रहकर कचोटता है
अपने ही किए को
कसौटी बनाने के जोखिम से

(2)
पिछले दरवाजे से स्वाधीन हुआ प्रेम
सामने के दरवाजे पर खड़ा
बड़ा सवाल है
वह लड़की आज भी अधीर है
बाल को संवारने जैसा
जिंदगी की संभाल के लिए

(3)
प्यार को रोक नहीं पाना
एहसास की सिहरन जागते ही
तकिया और रजाई हो जाना
महज समय के दोशाले में लिपटी
खरगोशी गरमाहट नहीं
समय के सबसे तेज साफ्टवेयर पर
डाउनलोड किया गया एप्लीकेशन भी है

(4)
...तो क्या एक अधीर लड़का ही
आखिरकार गढ़ता है
एक अधीर लड़की का प्रेम
उसका मन उसका मिजाज
उसका पूर्व उसका आज
बहस हंसकर करें या डूबकर
गर्दन की नाप तो लेनी होगी
उन छोकरों की ही
जिनके माइक्रोसॉफ्टी दिमाग के
खुले विंडो पर
बालिगाना खेल के लिए
तैयार हैं कई गेमप्लान
समय से ऊंची मचान
तीखे तीर शातिर कमान

(5)
अबला को
बला की संभावनाओं से भर देना
आजादी के नाम पर की गई
मालफंक्शनिंग नहीं तो और क्या है

(6)
लैंगिक समता के अलंबरदारों बताओ
एक लड़की का बेडरूम की तरह इस्तेमाल
उसे जिस हाल तक देता है पहुंचा 
वहां कितना बचता ही है दमखम
एक अधीर हुई
अबीर हुई लड़की के पास
कि वह फिर से करे प्यार
अपने किए-कराए पर पुनर्विचार
या कि आंखों को काजल कर देने वाले
आंसुओं पर एतबार

रविवार, 2 जनवरी 2011

वर्षकाल


एक बिन धुले
निगेटिव की तरह
था साल दो हजार दस
कैमरे की कई बार की
क्लिक के बाद भी
तस्वीर की कल्पना भर
दृश्य का महज आभास भर

विदा होते हुए बरस यह
पूरी तरह धुल चुके मुकम्मल
कोडेक इमेज की तरह
कहां गलत थे पांव
किसे बस यों ही मान बैठे
अपना गांव
कहां पथ प्रशस्त
कहां दु:स्वप्न के झार-कांटे
कहां मनमौजी
जिद्दी आत्मघाती रास्ते

हाथ वह जो
कड़ी जोड़ने
हथकड़ी तोड़ने की तरह
राह जिसने संभव किया
समय का हृदय से जुड़ाव
एहसास के कुछ गिनेचुने पड़ाव
कुछ देर तक गुदगुदाते लम्हे 
कुछ दूर तक सिहरते घाव

अनुभवों की बारीक
कसीदाकारी
मां को लपेटे
जैसे व्रत की साड़ी
भेंट अंतिम यह
गुजरे एक पूरे वर्ष का
परिस्थिति वह तब की
स्थिति यह अब की

ध्वंस की राख
कि भभूतिया चमत्कार
छंट चुकी पूरी तरह
रात एक अबीरी
बढ़कर थाम रही
सुबह एक सिंदूरी
कुछ आधी-अधूरी बात
कुछ भरपूर जज्बात
एक पूरा वर्षकाल

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

सेक्स फैंटेसी का ओवरडोज


खबरिया चैनलों के सनसनी मार्का लहजे में कहें तो यह दुनिया कहने के लिए तो काल्पनिक है पर इसका नीला रंग उतना ही नीला या खतरनाक है जितना दिल्ली के पालिका बाजार में बिकने वाली किसी ब्लू फिल्म का। दरअसल हम बात कर रहे हैं 'हेंताई' की। हेंताई यानी बच्चों के लिए बनाए गए कामूक कार्टून किरदार या कथानक। हेंताई की दुनिया बच्चों के लिए तो जरूर है पर इस दुनिया ने जिस कदर भोंडी कामुकता के बाजार में वर्चस्व बढ़ाया है, वह अमेरिका जैसे कई शक्तिशाली देशों की चिंताएं भी बढ़ा रहा है। हेंताई की पूरी दुनिया में बढ़ी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गूगल सर्च पर हेंताई लिखते ही पलक झपकते ही करीब 5 करोड़ पन्ने हाजिर हो जाते हैं। इसमें तो कई ऐसे वेब ठिकाने हैं जहां विजिट करते ही कार्टून किरदारों की चपल कामुक क्रीड़ाएं शुरू हो जाती हैं।
बता दें कि हेंताई एक जापानी मूल का शब्द है। इसका मौजूदा अर्थ इसके मूल अर्थ से खासा भिन्न है। आज पूरी दुनिया में हेंताई का मतलब ऐसी एनिमेटेड सामग्री से लिया जाता है जो विकृत सेक्स किरदारों और कथानकों की काल्पनिक दुनिया से जुड़ा है।  हेंताई आज पोर्न मार्केट को लीड कर रहा है और इसका प्रसार जापान, चीन और अमेरिका में तो है ही भारत सहित कई एशियाई और यूरोपीय देश में भी इसका प्रसार तेजी से बढ़ रहा है। जापान में हेंताई को दो प्रमुख श्रेणियों में बांटकर देखा जाता है। ये श्रेणियां हैं यॉई और यूरी। याई के तहत होमोसेक्सुअल और यूरो के तहत हेट्रोसेक्सुअल एनिमेटेड फिक्शन या फैंटेसी आते हैं। साफ्ट पोर्न की कैटेगरी को एक्की कहते हैं। इसी तरह बाकूनयू कैटगरी में वैसे कार्टून किरदारों की कामुक क्रीड़ाएं और कथाएं शामिल की जाती हैं जिनके स्तन बड़े-बड़े होते हैं। इनसेक्ट एक और कैटेगरी है जिसमें एक ही घर या परिवार के सदस्यों के बीच के सेक्सुअल रिलेशन को बताया जाता है।
दिलचस्प है कि हेंताई की दुनिया चूंकि पूरी तरह काल्पनिक या वच्र्युअल है इसलिए यहां कुछ भी असंभव नहीं है। आमतौर पर जैसे बाकी कार्टून किरदारों की दुनिया में कोरी कल्पना से रोमांच और हास्य पैदा किया जाता है, वैसे ही यहां भी कई रंग-रूप और आकार के किरदारों के साथ घोस्ट और रोबोट तक कहानी का हिस्सेदार होते हैं। अलबत्ता यह जरूर है कि विषयवस्तु चूंकि सेक्स आधारित है इसलिए कल्पना और फैंटेसी की सारी उड़ान की परिणति आखिरकार एक तरह की क्रूरता और फूहड़ता में होती है। यहां कुछ भी असंभव नहीं है। आपको कभी अलग-अलग प्रकृति और आकार के किरदारों के यौन संसर्ग देखने को मिलेंगे तो कभी जननांगों के अस्वाभाविक रूप आपको इस दुनिया की विचित्रता से अवगत कराएंगे। 
शोध अध्ययनों में यह बताया गया है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से हेंताई को एनिमेटेड सेक्सुआल फेंटैसी के रूप में भुनाने में बाजार की कई ताकतें सक्रिय हुईं। आज हेंताई का विश्व बाजार अरबों डॉलर का है और यह कॉमिक बुक, एनिमेटेड फिल्म से लेकर खिलौनों और कंप्यूटर व मोबाइल वालपेपर और स्क्रीन सेवर तक कई रूपों में अपने चाहने वालों की संख्या बढ़ा रहा है। भारत में हेंताई का चलन अभी नया है। पर इंटरनेट ने इसकी पहुंच के दरवाजे जिस तरह खोले हैं, उससे इस खतरे के बढ़ने के आसार कितने ज्यादा हैं, यह समझा जा सकता है। हेंताई की लोकप्रियता के पीछे एक बड़ी वजह इसका रियल की जगह वच्र्युअल होना है। इसके वच्र्युअल होने के कारण पोर्न मैटेरियल के रूप में इसका इस्तेमाल करने वालों को कोई गिल्टी भी नहीं होती है। और यही कारण है कि हेंताई को पसंद करने वालों में बच्चों-किशोरों के साथ बड़ी तादाद में व्यस्क भी शामिल हैं।
बहरहाल, इतना तो साफ है कि बाजार के वर्चस्व के दौर में इस खतरे को कोई नहीं समझ रहा है कि विशुद्ध कामुकता का यह ओवरडोज हमारे बच्चों के साथ किशोरों और युबाओं के विकास को कितना और किस-किस स्तर पर प्रभावित करेगी।

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

डेढ़ लाख का सपना और इराक वार


कोख के हिस्से आया यह एक और शोक, एक और त्रासदी है। इंदौर में सरोगेसी के धंधे का तब एक और सियाह चेहरा सामने आया जब पता चला कि भ्रूण हिंसा ने यहां भी अपनी गुंजाइश निकाल ली है। इस शहर की एक महिला सपना नवीन झा ने एक डाक्टर के मार्फत एक बड़े कारोबारी के साथ डेढ़ लाख रुपए में किराए की कोख का मौखिक करार किया। शर्त के मुताबिक अगर गर्भ ठहरने के तकरीबन ढाई महीने बाद करवाई गई सोनोग्राफी में गर्भ में लड़के की जगह लड़की होने का पता चलता है तो अबार्शन कराना होगा। जिसका खतरा था, वही हुआ भी। सपना को ढाई महीने बाद गर्भ गिराने के लिए तैयार होना पड़ा। पर उसे अफसोस इसलिए नहीं था क्योंकि ऐसा करने पर भी उसे 25 हजार रुपए की आमदनी हुई। सपना ने यह सब अपनी तंगहाली से आजिज आकर किया था, सो 25 हजार रुपए की आमद भी उसके लिए कम सुकूनदेह नहीं थी।
इस पूरे मामले का खुलासा जिस तरह हुआ, वह एक और बड़ी ट्रेजडी है। इस बारे में लोगों को पता तब चला जब सपना का नाम धार के पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष और कांग्रेस नेता कैलाश अग्रवाल हत्याकांड में उछला और वह पुलिसिया गिरफ्त में आ गई।  जिंदगी के इस खतरनाक मोड़ पर सपना ने आपबीती में  बताया कि वह मुफलिसी से लड़ते हुए कैसे कोख के सौदे और फिर भ्रूण हत्या के लिए तैयार हो गई। उसने बताया कि किराए का गर्भ गिराने के बाद वह एक बार फिर से अपनी कोख को किराए पर देने के लिए तैयार थी लेकिन ऐसा करने के लिए उसे कम से कम पांच महीने रुकना पड़ता। सपना दोबारा सरोगेट मदर बनने का सोच ही रही थी कि अग्रवाल हत्याकांड ने उसे जिंदगी के एक और खतरनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया।
इस पूरे मामले में एक खास बात यह भी है कि सपना अपनी जिंदगी से परेशान जरूर है पर उसे अपने किए का कतई अफसोस नहीं है। शायद उसकी जिंदगी को मुफलिसी ने इस कदर उचाट बना दिया है कि ममता और संवेदना जैसे एहसास उसके लिए बेमतलब हो चुके हैं। एक महिला की जिंदगी क्या इतनी भी त्रास्ाद हो सकती है कि वह कोख से जुड़ी संवेदना को भी अपनी जिंदगी के शोक के आगे हार जाए। 
दरअसल, यह पूरा मामला औरत की जिंदगी के आगे पैदा हो रहे नए खतरों की बानगी भी है। सरोगेसी सपना के लिए शगल नहीं बल्कि उसकी मजबूरी थी। डेढ़ लाख रुपए की हाथ से जाती कमाई में से कम से कम 25 हजार उसकी अंटी में आ जाए, इसलिए गर्भ गिराने की क्रूरता को भी उसने कबूला। ...तो क्या एक महिला की संवेदना उसकी मुफलिसी के आगे हार गई या उसके संघर्ष के लिए एक पुरुष वर्चस्व वाली आर्थिक-सामाजिक स्थितियों में बहुत गुंजाइश बची ही नहीं थी। एक करोड़पति पुरुष का अपना वंश चलाने के सपने की सचाई कितने "सपनों' को रौंदने जैसी है, यह समझना जरूरी है।
याद आता है वह दौर जब अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश इराक को जंग के मैदान में सद्दाम हुसैन समेत अंतिम तौर पर रौंदने के लिए उतावले थे। अखबार के दफ्तर में रात से खबरें आने लगी कि अमेरिका बमबारी के साथ इराक पर हमला बोलने जा रहा है। इराक से संवाददाता ने खबर भेजी कि वहां के प्रसूति गृहों में मांएं अपने बच्चों को छोड़कर भाग रही हैं। खबर की कॉपी अंग्रेजी में थी, लिहाजा आखिरी समय में बिना पूरी खबर पढ़े उसके अनुवाद में जुट जाने का अखबारी दबाव था। अनुवाद करते समय जेहन में लगातार यही सवाल उठ रहा था कि ममता क्या इतनी निष्ठुर भी हो सकती है कि वह युद्ध जैसी आपद स्थिति में बच्चों की छोड़ सिर्फ अपनी फिक्र करने की खुदगर्जी पर उतर आए।
पूरी खबर से गुजरकर यह एहसास हुआ कि यह तो ममता की पराकाष्ठा थी। प्रसूति गृहों में समय से पहले अपने बच्चों को जन्म देने की होड़ मची थी। जिन महिलाओं की डिलेवरी हो चुकी थी, वह अपने बच्चों को  छोड़कर जल्द से जल्द घर पहुंचने की हड़बड़ी में थीं क्योंकि उन्हें अपने दूसरे बच्चों और घर के बाकी सदस्यों की फिक्र खाए जा रही थी। वे अस्पताल में नवजात शिशुओं को छोड़ने के फैसला इसलिए नहीं कर रही थी कि उनके आंचल का दूध सूख गया था। असल में युद्ध या बमबारी की स्थिति में कम से कम वह अपने नवजातों को नहीं खोना चाहती थीं। उन्हें भरोसा था कि अमेरिका इराक के खिलाफ जब हमला बोलेगा तो कम से कम इतनी नैतिकता तो जरूर मानेगा कि वह अस्पतालों और स्कूलों को बख्श दे। युद्ध छिड़ने से पहले प्रीमैच्योर डिलेवरी का महिलाओं का फैसला भी इसलिए था कि बम धमाकों के बीच कहीं गर्भपात जैसे खतरों का सामना उन्हें न करना पड़े। सचमुच मातृत्व संवेदना की परीक्षा की यह चरम स्थिति थी जिससे गुजरते हुए इराकी महिलाएं मानवीयता का सर्वथा भावपूर्ण सर्ग रच रही थीं।
सपना नवीन झा के मामले में पहली नजर में यह संवेदना दांव पर हारती दिखती है। पर अगर ऐसा दिखता है तो यह महिला स्थितियों को समझने में एक और बड़ा धोखा है। सपना से जुड़ा वाकिया दरअसल एक और खतरनाक मिसाल है कि हम एक महिला की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए किन-किन हदों तक जा सकते हैं। पैसे के बदले देहसुख मुहैया कराने के रूप में शुरू हुए दुनिया के सबसे पहले पेशे से लेकर किराए की कोख के सौदे तक की महायात्रा में आर्थिक मोर्चे पर महिलाओं की लाचारी के जितने भी पड़ाव हैं, वे सब एक पुरुष वर्चस्ववादी समय और समाज में महिला जीवन की विडंबनाओं की ही असलियत खोलते हैं।  सपना जैसी महिलाओं पर किसी पूर्वाग्रही और कठोर नजरिए से पहले हमें उन सचाइयों के प्रति ईमानदार होना होगा जो न सिर्फ महिला विरोधी हैं बल्कि संवेदना विरोधी भी।  याद रखें कि बहुत खतरनाक होता है किसी "सपने' का यूं ही  मर जाना।      

सोमवार, 15 नवंबर 2010

नामर्दों के लिए कोई जगह नहीं


(1)
याद आता है
अभिनेता महान का हिट संवाद
मर्द को दर्द नहीं होता जनाब
गूंजती है आवाज
सनसनाहट से भरी एमएमएस क्लिप में
बांग्ला की कुलीन अभिनय परंपरा की बेटी की
आई वांट ए परफेक्ट गाइ  
और फिर उतरने लगते हैं पर्दे पर
एक के बाद एक दृश्य
शालिनी ने लकवाग्रस्त पति को
दिया त्याग रातोंरात
अधेड़ मंत्री के यहां पड़े छापे में मिली
पौरुष शास्त्र की मोटी किताब
वियाग्रे की गोलियां
मुस्टंड मर्दानगी के लिए ख्यात
हकीम लुकमान के लिखे अचूक नुस्खे
मिस वाडिया ने अपनी आत्मकथा में
उड़ाया इंच दर इंच मजाक
अपने सहकर्मी की गोपनीय अंगुली का

(2)
नामर्दों के लिए कोई जगह नहीं
उन्हें नहीं मिलेगी तोशक न मिलेगी रजाई
न वे झूल सकेंगे झूला न बना सकेंगे रंगोली
और न खेल सकेंगे होली
अवैध मोहल्लों के किसी गली-कूचे या मैदान में
 ऊंची एड़ी पर खड़ी दुनिया
 नहीं देखना चाहती किसी नामर्द की शक्ल
अपनी किसी संतान में

(3)
मर्द न होना किसी मर्द के लिए
बिल्कुल वैसा ही नहीं है
जैसा किसी औरत का न होना औरत
स्त्री-पुरष का लिंग भेद मेडिकल रिपोर्ट नहीं
बीसमबीस क्रिकेट का स्कोर बोर्ड
करता है जाहिर
पुरुष इस खेल को सबसे तेज और
जोरदार खेलकर ही साबित हो सकते हैं जवां मर्द
और तभी मछली की तरह उतरेगी
उसके कमरे में कैद तलाब में कोई औरत

(4)
मर्दाना पगड़ी की कलगी खिलती रहे
अब ये चाहत नहीं चुनौती है पुरुषों के आगे
उसे हर समय दिखना होगा
सख्त और मुस्तैद
नहीं तो सुनना पड़ सकता है ताना
वंशी बजाते हुए नाभी में उतर जाने वाले कन्हाई
कहीं पीछे छूट गए
औरतों ने देना शुरू कर दिया है
पुरुष को पौरुष से भरपूर होने की सजा
जिस औजार से गढ़ी जाती थीं  
अब तक मन माफिक मूर्तियां
अब उनका इस्तेमाल मिस्त्री नहीं
बल्कि करने लगे हैं बुत
मैदान वही
बस  योद्धाओं के बदल गए हैं पाले
मर्दाना तर्क जनाना हाथों में
ज्यादा कारगर और उत्तेजक रणनीति है
जैसे को तैसा...
जनाना न्याय का उध्बोधन गीत है