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मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

खाकी पर भारी खादी

देश में इन दिनों सियासत खूब गरमाई हुई है। लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी दल ही सिर्फ अपने पत्ते फेंटने में नहीं लगे हैं बल्कि समाज के विभिन्न हिस्सों-तबकों में भी इसको लेकर दिलचस्पी खासी बढ़ गई है। सब कह रहे हैं कि इस बार का चुनाव देश की राजनीतिक धारा को वैकल्पिक मोड़ देगा, सो चुनावी मैदान में क्रांतिकारी मंसूबे के साथ कई अराजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग भी कूद रहे हैं। ऐसे ही नामों में एक बड़ा नाम है सत्यपाल सिंह का। सिंह ने अपनी सियासी पारी के लिए मुंबई पुलिस कमिश्नर के पद से इस्तीफा दे दिया है। माना जा रहा है कि वह भाजपा या आम आदमी पार्टी के टिकट पर अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर सत्यपाल सिह का कहना इतना भर है कि वह राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और विश्व शांति के लिए काम करना चाहते हैं। उनके ही शब्दों में, 'मैंने अभी यह तय नहीं किया है कि मैं किस पार्टी में शरीक होऊंगा। आपको दो से तीन दिन में इसके बारे में जानकारी मिल जाएगी।’ वैसे सत्यपाल भले अपने मुंह से कुछ न कहें पर उनको लेकर कयासबाजी खूब चल रही है। सूत्रों की मानें तो वे भाजपा के टच में हैं और पार्टी उन्हें उत्तर प्रदेश के मेरठ या बागपत सीट से लोकसभा उम्मीदवार बना सकती है। बता दें कि इससे पहले उन्होंने इशरतजहां एनकाउंटर केस में गुजरात हाईकोर्ट की एसआईटी की अगुवाई करने से इनकार कर दिया था।
इन संभावनाओं को पर लगने के पीछे कुछ और वजहें भी हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो पार्टी के बड़े नेताओं के साथ सिह की बातचीत पहले ही हो चुकी है। उनका भाजपा में शामिल होना तकरीबन तय है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पिछले दिनों उनकी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिह व पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ बातचीत हो चुकी है। इस बातचीत के बाद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को सिह से संपर्क साधने के लिए कहा था। सत्यपाल सिह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के भी करीबी बताए जाते हैं। वैसे उन्हें आम आदमी पार्टी से भी मुंबई से लोकसभा चुनाव लड़ने का ऑफर मिला है, ऐसी खबरें भी मीडिया के कुछ हल्कों में चल रही हैं।
29 नवंबर 1955 में मेरठ के बसौली में पैदा हुए सत्यपाल सिह की स्कूली पढ़ाई बागपत में हुई। इसके बाद उन्होंने मेरठ से रसायन विज्ञान में एमएससी और फिर एमफिल किया। रसायन शास्त्र के वैज्ञानिक बनने की ओर बढ़ रहे सिह पीएचडी करना चाहते थे, लेकिन अचानक उनका मूड बदल गया और उन्होंने आईपीएस की तैयारी शुरू कर दी। इस बीच वे ऑस्ट्रेलिया चले गए और वहां पर एमबीए करने लगे। एमबीए करने के दौरान भी उन्होंने आईपीएस बनने के लक्ष्य को छोड़ा नहीं। वापस भारत आए तो लोक प्रशासन में एमए किया और फिर इसी विषय में पीएचडी में दाखिला लिया। इसी दौरान उन्होंने आईपीएस की तैयारी तेज कर दी और परीक्षा पास कर ली।
सत्यपाल सिह महाराष्ट्र पुलिस में कई पदों पर रह चुके हैं। मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनाए जाने से पहले वह महाराष्ट्र के एडिशनल डीजीपी (लॉ एंड ऑर्डर) थे। इसके पहले वह पुणे और नागपुर के पुलिस कमिश्नर भी रह चुके हैं। इसके अलावा डेप्युटेशन पर वह सीबीआई में भी काम कर चुके हैं।
धर्म और अध्यात्म में तो खासतौर पर उनकी गहरी रुचि है। उन्होंने अध्यात्म व नैतिक मूल्यों पर कई किताबें भी लिखी हैं। पिछले साल उनकी किताब 'तलाश इंसान की’ का विमोचन अमिताभ बच्चन और जावेद अख्तर ने किया था।
बहरहाल, एक बात तो तय है कि सिंह ने जिस उम्मीद के साथ अपनी सियासी पारी खेलने का मन बनाया होगा, उसके पूरे होने के इस बार के लोकसभा चुनाव में आसार काफी हैं। अलबत्ता यह इस बात पर जरूर निर्भर करेगा कि वह किस पार्टी का झंडा थामते हैं। एक बात और यह कि सत्यपाल सिंह जैसे लोग अगर सियासी मैदान में उतर रहे हैं तो इससे देश की राजनीति के साफ-सुथरा और प्रभावी होने के आसार काफी बढ़
गए हैं।

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

मेरे अंदर एक कायर टूटेगा

क्या आपने कभी ऐसे सोचा है कि सचाई से ज्यादा मक्कारी हमारे जेहन और चिंतन को क्यों घेरता है। अपने हिस्से के अंधेरे को दूर करने की बजाय हम आसपास के अंधेरे को लेकर आलोचकीय प्रबुद्धता क्यों दिखाते हैं। बिजली के लट्टुओं ने भले चिराग तले अंधेरे के मुहावरे को खारिज कर दिया हो पर नए दौर के टॉर्च वियररों की जमीरी बेईमानी को देखकर इस मुहावरे का विकसित और आधुनिक भाष्य समझ में आता है। आज की तारीख में भ्रष्टाचार अगर सबसे बड़ा मुद्दा है तो इसकी असली वजह महज न तो सिविल सोसाइटी की मुहिम है और न ही कोई राजनीतिक-सामाजिक जागरूकता। दरअसल, पिछले छह दशकों में सरकार, राजनीति, प्रशासन और न्याय प्रक्रिया के जो अनुभव आम आदमी के हिस्से आए हैं, उसमें सदाचार की भारतीय संस्कृति के सच को नंगा करके रख दिया है। यह नंगापन पिछले तीन दशकों के उदारवादी दौर में सबसे ज्यादा बढ़ा है।
व्यक्ति और समूह से शुरू हुए लालच और भ्रष्टाचार का अपने यहां जहां अपना वर्ग चरित्र है, वहीं शिक्षा, शहरीकरण, आमदनी और आधुनिकता जैसे भ्रष्टाचार निरोधी तर्क भी कहीं से कारगर नहीं मालूम पड़ते। दरअसल, अहम यह नहीं है कि हम भ्रष्टाचार के मुद्दे के साथ हैं कि नहीं। असली सवाल इस जुड़ाव के वाह्य या आंतरिक होने को लेकर है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के एक हालिया सर्वे में भारतीयों ने खादी और खाकी को भ्रष्टाचार की वर्दी करार दिया है। सेवा और स्वाबलंबन की सूत से कभी भ्रष्टाचार की कताई भी हो सकती है, यह बात गांधी को पता होती तो उनका चरखा भी शायद ही घूमता।
खद्दर और खाकी को लेकर जनमानस की पीड़ा और रोष को समझा जा सकता है। पर इस सर्वे में दर्ज यह भी हुआ है कि भ्रष्टाचार से भिड़ने की बजाय उसके आगे घुटने टेकने की हमारी लाचारी भी पिछले सालों में बढ़ी है। भ्रष्टाचार की काली स्लेट पर सदाचार उकेरने में उत्साही लोगों को भी यह समझ तो होगी कि इसकी शुरुआत शिकायत से नहीं पश्चाताप और सत्याग्रह से ही संभव है। ऐसी शिकायत करते हुए सामने की तरफ उठने वाली एक अंगुली अगर तनी है तो बाकी की दिशा भी किस तरफ है, यह नहीं भूलना चाहिए।
दरअसल, भ्रष्टाचार को लाचारी की स्वाभाविक परिणति बताकर हम अपने हिस्से के भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष को स्थगित कर देते हैं। यह स्थगन एक बड़े मुद्दे के हल को रोष और प्रचार के खल में किस तरह बदल देता है, यह अनुभव देश आज संसद से लेकर सड़क तक कर रहा है। दिलचस्प है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सच बयानी को लेकर एक टीवी रियलिटी शो भी शुरू हुआ है। जहां अपने भ्रष्ट कर्मों के प्रायश्चित के लिए लोग कैमरे के सामने आ रहे हैं और इनामी साहस के साथ बता रहे हैं कि उन्होंने लालच में आकर क्या-क्या और कितने गलत काम किए हैं। दरअसल, आत्मप्रतीति के ऐसे इसी तरीके की नाटकीयता की मांग करते हैं जबकि साध्य और साधन की शुद्धता का सत्याग्रह प्रशांत धैर्य और चिंतन की दरकार रखता है।
हिंदी के प्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की शब्दावली में आधुनिक समय में परिवर्तन का इतिहास रातोंरात नहीं रचा जा सकता बल्कि इसकी प्रक्रिया 'व्यक्तित्वांतरण' की इकाई से शुरू होकर समय और समाज की दहाई, सैकड़े-हजार तक पहुंचेगी। पूरी दुनिया में परिवर्तन की परतें उतनी नहीं जमीं जितनी उनके नाम पर तारीखें दर्ज हैं। लिहाजा, भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष को परिवर्तन की ऐसी एक और तारीख के रूप में हम देखना चाहते हैं तो यह इतिहास आज अपने देश में जरूर लिखा जा रहा है। पर इसके बाद भ्रष्टाचार का मर्ज हमारे सलूक और सिस्टम से बाहर हो जाएगा, इस दावे को लेकर सोचना भी मूढ़ता होगी। व्यक्ति के सदाचार का अपना कद जब तक नहीं उठता, भ्रष्टाचार का दैत्याकार हमेशा हमें डराता और हमारा मुंह चिढ़ाता रहेगा।
साफ है कि यह लड़ाई बाहरी नहीं बल्कि भीतरी है। अब तक इस लड़ाई को हम बाहरी मैदान पर खूब बहादुरी से लड़ रहे हैं। पर यह बहादुरी खुद से मुंह चुराने की चालाकी ज्यादा साबित हो रही है। जब तक पाप और संताप के भीतरी ताप में हम डूबे-उतराएंगे नहीं, भ्रष्टाचार भले कहीं से मिटे हमारे अंदर जिंदा और जावेद रहेगा। इसलिए सड़कों पर मुट्ठियां लहराने और नारों के शोर को हम कहीं और नहीं खुद तक पहुंचने का जरिया मानें क्योंकि तब... 'न टूटे तिलिस्म सत्ता का, मेरे अंदर एक कायर टूटेगा।' (कुछ तो होगा/ रघुवीर सहाय)  

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

खादी से चलकर खाकी तक


गिरावट खादी से शुरू होकर खाकी तक पहुंच गई है। सार्वजनिक जीवन में पतित आचरण का रोना तो अब कोई रोना भी नहीं चाहता। सब मान चुके हैं कि इस स्यापे का कोई मतलब नहीं। आखिर अपनी नाक को किसी दूसरे के चेहरे पर देखने की हसरत कभी पूरी हो भी  नहीं सकती। राजनीति को लेकर हमारी शिकायत का मतलब कुछ ऐसा ही है। बहरहाल खाकी को लेकन रुदन अभी जारी है। खादी के बाद बारी खाकी की। सब चाहते हैं कि पुलिस की लाठी और नाक दोनों बची रही ताकि हम बचे रहें, सुरक्षित रहें। अलबत्ता यहां भी अपेक्षा और सचाई के बीच खतरनाक घालमेल है, जो कि जाहिरा तौर पर नहीं होना चाहिए।  नागरिक सुरक्षा का खाकी रंग अब उतना भरोसेमंद नहीं रहा, जितना वह पहले था या उससे अपेक्षित है। दरअसल, यह तथ्य जितना सत्यापित नहीं है, उससे ज्यादा प्रचारित। आलम यह है कि पुलिस महकमे को लेकर हमारे अनुभव चाहे जैसे भी हों, पूर्वाग्रह खासे नकारात्मक हैं।
राजधानी दिल्ली में अपराध की घटनाएं तेजी से सुर्खी बनती हैं। लिहाजा, हर घटना को लेकर पुलिस कार्रवाई पर सबकी नजर रहती है। सफलता का श्रेय यहां की पुलिस को मिले न मिले, नाकामी पर खरी-खोटी सुनाने की उदारता मीडिया और समाज साथ-साथ बरतता है। जबकि एक तटस्थ और तुलनात्मक नजरिए से देखें तो दिल्ली पुलिस की कुशलता देश में सबसे बेहतर मानी जाएगी। और यह स्थिति तब है जबकि देश की राजधानी में तैनाती के कारण उसके आगे चुनौतियां भी सबसे ज्यादा हैं।
कुछ महीने पहले पुलिस सुधार की हिमायत करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंशा भी जाहिर की थी कि वह दिल्ली पुलिस को हर लिहाज से देश के पुलिस महकमे के लिए आदर्श बनाना चाहते हैं। हाल में दिल्ली की एक व्यस्ततम सड़क पर एक दुर्घटना में बुरी तरह घायल हुए चार्टड बस के ड्राइवर की जिस जांबाजी के साथ जान बचाई, उसे देखकर प्रधानमंत्री के इरादे की वजह समझ में आती है। दरअसल, नागरिक जीवन में तेजी से पसरती और गाढ़ी होती संवेदनहीनता के नजारे हम अक्सर सड़कों और अस्पतालों में देखते हैं। जब कोई दुर्घटना या बीमारी के कारण जिंदगी से जूझ रहा होता है और हम सब कुछ देख-समझकर भी खिसक लेने की चालाक पर बर्बर बर्ताव आसानी से दिखाते हैं।
पुलिस का महकमा इस लिहाज से खासा जवाबदेह और महत्वपूर्ण है कि संकट की आसन्न स्थितियों में सबसे पहले मदद की अपेक्षा उसी से होती है। यह उम्मीद आज इस कारण भी बढ़ गई है कि हमारे आसपास का समाज हमें हर लिहाज से नाउम्मीद कर रहा है। दिल्ली के दरियागंज थाने में तैनात इंस्पेक्टर प्रमोद जोशी की बहादुरी इस उम्मीद पर जिस तरह खरी उतरी है, वह हर लिहाज से प्रशंसनीय है। मीडिया ने भी इस खबर को जिस तरह दिखाया और छापा, वह काबिले तारीफ है।
दिलचस्प है कि प्रमोद जोशी के कंधे पर न तो फीते कम होते और न ही उसे इस कारण लाइन हाजिर किया जाता कि उसने अपनी आंखों के सामने घटी घटना पर संवेदनशील रवैया क्यों नहीं अपनाया। पर यह सोच अगर खाकी वर्दी पहने हर जवान के जमीर पर हावी हो जाए तो वह विश्वसनीयता सिरे से ही गायब हो जाएगी जो आज भी पुलिस के किसी जवान को देखकर कमोबेश हमारे दिलोदिमाग में पैदा होती है। जोशी अपने पुलिसिया ओहदे में बहुत बड़े नहीं हैं, लेकिन जिस तरह उसने आग लगी बस के पास से उसके ड्राइवर को बगैर जान की परवाह किए बगैर बचाया, वह फर्ज अदायगी जरूर इतनी बड़ी है जिसकी न सिर्फ तारीफ हो बल्कि उससे जरूरी सबक भी लिया जाए। खाकी रंग भरोसे का है, यह भरोसा एक बार फिर से गाढ़ा किया है प्रमोद की बहादुरी ने।