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सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

रामलीला 2015

बीते साल में दिल्ली में दो नई सरकारें आईं, एक केंद्र की तो दूसरी दिल्ली प्रदेश की। दोनों सरकारों ने बदलाव के बड़े-बड़े दावे किए। इन दावों की राजनीतिक व्याख्या और समीक्षा तो खैर मीडिया में हर दिन चल रही है पर सांस्कृतिक स्तर पर इसे देखें-समझें तो समय और समाज का ऐसा चित्र सामने आएगा, जिस पर हम कम से कम सीधे-सीधे तो नाज नहीं कर सकते। जाहिर है कि ये अफसोस से भर देनेवाला परिदृश्य है।
दिल्ली में कांग्रेस के बड़े नेता जेपी अग्रवाल को यह गंवारा नहीं था कि वे जिस रामलीला कमेटी के प्रमुख थे, वह कमेटी अपने आयोजन में प्रधानमंत्री को बुलाए। बस क्या था, उन्होंने रामलीला कमेटी को ही राम-राम कह दिया। दिल्ली की ही एक दूसरी घटना में रामलीला देखने गई दो साल की बच्ची के साथ बदमाशों ने दुष्कर्म किया। बात देश की राजधानी की चल ही रही है तो साथ में यह जोड़ते चलें कि इस बार चमक-दमक और ग्लैमर ने रामलीला का एक तरह उत्तर-आधुनिक कल्प ही रच दिया। टीवी कलाकार रामकथा के पात्र बनकर मंच पर उतरे तो मोनिका बेदी से लेकर बार डांसरों तक ने रामलीला के मंच पर ठुमके लगाए।

पुरस्कार वापसी की लीला

रामलीला की चर्चा से पूर्व यह प्रसंग इसलिए कि हमें उस देशकाल को समझने का अंदाजा हो जाता है कि जिसमें आस्था का निर्वाह और उसके साथ खिलवाड़ दोनों ही एक बराबर हैं। कमाल की बात है कि इस बीच, देशभर के कथित तौर पर प्रगतिशील खेमे के साहित्यकारों के बीच साहित्य अकादमी और पद्म पुरस्कारों को लौटाने की होड़ मची है। और यह सब हो रहा है दादरी कांड के बहाने असहिष्णुता और सांप्रदायिकता के नाम पर। सांस्कृतिक स्फीति की चिंता यहां उस तरह नहीं है, जिस तरह की चिंता कम से कम कला और साहित्य के क्षेत्र के लोगों के बीच होनी चाहिए।
वैसे यह पूरा न तो आखिरी है और न ही अंतिम। क्योंकि यही और महज इतना ही सच नहीं है। वैसे भी महज दिल्ली-मुंबई को देखकर इस देश के सांस्कृतिक चरित्र पर कोई अंतिम राय नहीं बनाई जा सकती। लोक, आस्था और परंपराओं को हृदय से लगाकर रखने वाला हमारा देश विशिष्ट और महान इसलिए है कि यहां नए और पुराने के बीच अलगाव नहीं बल्कि एक समन्वयीय रेखा हमेशा से खींचती रही है। यह रेखा ही बहुलता और विविधता के इस देश को एकरंगता या एकरसता से नहीं भरने देती।
अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन कैरी को नहीं लगता कि भारत में कोई सर्वधमã समभाव की स्थिति है। वे भारत में धर्म विशेष को लेकर भय की स्थिति की भी बात करते हैं। ये सारी बातें अमेरिका ही नहीं, देश के भीतर भी कही-सुनी जा रही हैं, खासतौर पर हाल के दादरी कांड के बाद। पर सांप्रदायिकता के नाम पर होने वाली राजनीति और अतिरेक से भरी बयानबाजी का ही असर है कि इस बार मीडिया ने कई ऐसी खबरें/स्टोरीज कीं, जिसमें देश-समाज का पारंपरिक सद्भाव बिना किसी अतिरिक्त कोशिश के आज भी कायम है। यूपी के सहारनपुर से लेकर बिहार के बक्सर तक सद्भाव के अनेकानेक उदाहरण देखने को मिलते हैं, जो सांस्कृतिक तौर पर खासे जीवंत और प्रेरक हैं।
दिलचस्प है कि यह सद्भाव सबसे ज्यादा रामलीला खेलने के मौके पर दिखाई देते हैं। कहीं लीला मंच पर सारे कलाकार मुस्लिम समुदाय के हैं, तो कहीं लीला आयोजन को नियामकीय स्तर पर संभालने वालों में गैरहिंदू समुदाय के लोग हैं। यह अलग बात है कि भारतीय संस्कृति की इस आंतरिक बलिष्ठता-श्रेष्ठता को न तो सियासी जमातें अपने लिए फलदायी पाती हैं और न ही संस्कृति के अलंबरदारों ने इस दिशा में अपनी तरफ से कुछ सोचा-किया।
बहरहाल, राई को पहाड़ कहकर बेचने वाले सौदागर भले अपने मुनाफे के खेल के लिए कुछ खिलवाड़ के लिए आमादा हों, पर अब भी उनकी ताकत इतनी नहीं बढ़ी है कि हम सब कुछ खोने का रुदन शुरू कर दें। देशभर में रामलीलाओं की परंपरा करीब साढेè चार सौ साल पुरानी है। आस्था और संवेदनाओं के संकट के दौर में अगर भारत आज भी ईश्वर की लीलाभूमि है तो यह यहां के लोकमानस को समझने का नया विमर्श बिदु भी हो सकता है।

रामनगर की लीला

 बनारस के रामनगर में पिछले करीब 18० सालों से रामलीला खेली जा रही है। दिलचस्प है कि यहां खेली जानेवाली लीला में आज भी लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल नहीं होता है। यही नहीं लीला की सादगी और उससे जुड़ी आस्था के अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता है। खुले मैदान में यहां-वहां बने लीला स्थल और इसके साथ दशकों से जुड़ी लीला भक्तों की आस्था की ख्याति पूरी दुनिया में है।
'दिल्ली जैसे महानगरों और चैनल संस्कृति के प्रभाव में देश के कुछ हिस्सों में रामलीलाओं के रूप पिछले एक दशक में इलेक्ट्रॉनिक साजो-सामान और प्रायोजकीय हितों के मुताबिक भले बदल रहे हैं। पर देश भर में होने वाली ज्यादातर लीलाओं ने अपने पारंपरिक बाने को आज भी कमोबेश बनाए रखा है’, यह मानना है देश-विदेश की रामलीलाओं पर गहन शोध करने वाली डॉ. इंदुजा अवस्थी का।

परंपरा ही हावी

लोक और परंपरा के साथ गलबहियां खेलती भारतीय संस्कृति की बहुलता और अक्षुण्णता का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है कि चाहे बनारस के रामनगर, चित्रकूट, अस्सी या काल-भैरव की रामलीलाएं हों या फिर भरतपुर और मथुरा की, राम-सीता और लक्ष्मण के साथ दशरथ, कौशल्या, उर्मिला, जनक, भरत, रावण व हनुमान जैसे पात्र के अभिनय 1०-14 साल के किशोर ही करते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अब कस्बाई इलाकों में पेशेवर मंडलियां उतरने लगी हैं, जो मंच पर अभिनेत्रियों के साथ तड़क-भड़क वाले पारसी थियेटर के अंदाज को उतार रहे हैं। पर इन सबके बीच अगर रामलीला देश का सबसे बड़ा लोकानुष्ठान है तो इसके पीछे एक बड़ा कारण रामकथा का अलग स्वरूप है।
अवस्थी बताती हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम और लीला पुरुषोत्तम कृष्ण की लीला प्रस्तुति में बारीक मौलिक भेद है। रासलीलाओं में »ृंगार के साथ हल्की-फुल्की चुहलबाजी को भले परोसा जाए पर
रामलीला में ऐसी कोई गुंजाइश निकालनी मुश्किल है। शायद ऐसा दो ईश्वर रूपों में भेद के कारण ही है। पुष्प वाटिका, कैकेयी-मंथरा और रावण-अंगद या रावण-हनुमान आदि प्रसंगों में भले थोड़ा हास्य होता है, पर इसके अलावा पूरी कथा के अनुशासन को बदलना आसान नहीं है।

हर बोली-संस्कृति में राम

तुलसी ने लोकमानस में अवधी के माध्यम से रामकथा को स्वीकृति दिलाई और आज भी इसका ठेठ रंग लोकभाषाओं में ही दिखता है। मिथिला में रामलीला के बोल मैथिली में फूटते हैं तो भरतपुर में राजस्थानी की बजाय ब्रजभाषा की मिठास घुली है। बनारस की रामलीलाओं में वहां की भोजपुरी और बनारसी का असर दिखता है पर यहां अवधी का साथ भी बना हुआ है। बात मथुरा की रामलीला की करें तो इसकी खासियत पात्रों की शानदार सज-धज है। कृष्णभूमि की रामलीला में राम और सीता के साथ बाकी पात्रों के सिर मुकुट से लेकर पग-पैजनियां तक असली सोने-चांदी के होते हैं। मुकुट, करधनी और बांहों पर सजने वाले आभूषणों में तो हीरे के नग तक जड़े होते हैं। और यह सब संभव हो पाता है यहां के सोनारों और व्यापारियों की रामभक्ति के कारण। आभूषणों और मंच की साज-सज्जा के होने वाले लाखों के खर्च के बावजूद लीला रूप आज भी कमोबेश पारंपरिक ही है। मानो सोने की थाल में माटी के दीये जगमग कर रहे हों।
आज जबकि परंपराओं से भिड़ने की तमीज रिस-रिसकर समाज के हर हिस्से में पहुंच रही है, ऐसे में रामलीलाओं विकास यात्रा के पीछे आज भी लोक और परंपरा का ही मेल है। रामकथा के साथ इसे भारतीय आस्था के शीर्ष पुरुष का गुण प्रसाद ही कहेंगे कि पूरे भारत के अलावा सूरीनाम, मॉरिशस, इंडोनेशिया, म्यांमार और थाईलैंड जैसे देशों में रामलीला की स्वायत्त परंपराएं हैं। यह न सिर्फ हमारी सांस्कृतिक उपलब्धि की मिसाल है, बल्कि इसमें मानवीय भविष्य की कई मांगलिक संभावनाएं भी छिपी हैं।

बुधवार, 3 सितंबर 2014

एक शब्द के चोरी होने का दर्द


हिदी का एक शब्द आजकल मुझे बहुत परेशान करता है। खासतौर पर उसका इस्तेमाल। यह शब्द है- 'उदार’। इसी से बना दूसरा शब्द है- 'उदारवाद’। 'उदार’ शब्द का इस्तेमाल हाल तक मानवता के श्रेष्ठ गुण के लिए किया जाता था। ईश्वर और ईश्वर तुल्यों के लिए जिस गुण विशेष का आज तक इस्तेमाल होता रहा, वह शब्द हमारे देखते-देखते समय और परंपरा के सबसे संवेदनहीन दौर के लिए समर्पित कर दिया गया।
दरअसल, शब्दों का भी अपना लोकतंत्र होता है और यह लोकतंत्र किसी भी राजकीय या शासकीय लोकतंत्र के मॉड्यूल से ज्यादा लोकतांत्रिक होता है। शब्दों की दुनिया में वर्चस्व या एकाधिकार की गुंजाइश नहीं। परंपरा और व्यवहार का समर्थन या विरोध ही यह तय करता है कि कौन सा शब्द चलेगा और कौन सा नहीं।
शब्द हमारी अभिव्यक्ति के साथ-साथ हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास, हमारी परंपरा और हमारे समाज से गहरे जुड़े हैं। शब्दों का अध्ययन हमारे चित्त, मानस और काल के कलर और कलई की सचाई को सबसे बारीकी से पकड़ सकता है।
'उदार’ शब्द के अपहरण -चोरी भी कह सकते हैं- की स्थितियों को थोड़ा समझना चाहें तो कई बातें साफ होती हैं। आंखों से काजल चुराने वाले सियाने भले अब पुरानी कहानियों, कविताई और मुहावरों में ही मिलें पर ग्लोबल दौर की चोरी और चोर भी कम नहीं हैं।
चोरी एक ऐसा कर्म है जिसका इस्तेमाल विचार से लेकर संस्कार तक हर क्षेत्र में होता रहा है। जाहिर है, जिस परंपरा का विस्तार और प्रसार इतना व्यापक हो, उसके डाइमेंशन भी एक-दो नहीं बल्कि अनगिनत होंगे। नए दौर में चोरी को लेकर एक फर्क यह जरूर आया है कि अब चोरी अपनी परंपरा से विलग कर आधुनिक और ग्लोबल कार्रवाई हो गई है। इस फर्क ने चोरी के नए और बदलावकारी आयामों को हमारे सामने खोला है।
अब इस काम को करने के लिए किसी तरह के शातिराना तर्जुबे की दरकार नहीं बल्कि इसे ढोल-धमाल के साथ उत्सवी रूप में किया जा रहा है।
जाहिर है कि चोरी अब सभ्य नागरिक समाज के लिए कोई खारिज कर्म नहीं रह गया है और न ही इसका संबंध अब धन-संपदा पर हाथ साफ करने भर से रह गया है। स्वीकार और प्रसार के असंख्य हाथ अब एक साथ चोर-चोर चिल्ला रहे हैं पर खौफ से नहीं बल्कि खुशी-खुशी। वैसे यहां यह गौर करने वाली बात होगी कि 'उदारवाद’ के विरोधी भले विकास के नाम पर बाजार की चालाकी और उपभोक्ता क्रांति के नाम पर चरम भोग की प्रवृत्ति को मुद्दा बनाएं, पर विरोध के उनके एजेंडे में भी इस तरह की चोरी शामिल नहीं है।
बात ज्यादा दूर की नहीं बल्कि अपने ही देश और उसके सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बोली-भाषा की की जाए तो ग्लोबल चोरी सर्ग में इसके कई शब्द देखते-देखते अपने अर्थ को छोड़ अनर्थ के संग हो लिए। मानवीय सुंदरता की जगह, बात सड़कों की और शहरों की सुंदरता की होती है। विकास और बाजार ने मिलकर सबके ऊपर एक ऐसा छाता ताना है कि इसके भीतर समाने के लिए सारे मरे जा रहे हैं। शब्दों से खिलवाड़ हो ही रहा है तो आप खेल-खेल में इसे सबको ललचाने वाली 'ग्लोबल छत्रछाया’भी कह सकते हैं।

मंगलवार, 10 जून 2014

घाट कारपोरेट


नदी की निर्मल कथा टुकड़े-टुकड़े में लिखी तो जा सकती है, सोची नहीं जा सकती। कोई नदी एक अलग टुकड़ा नहीं होती। नदी सिर्फ पानी भी नहीं होती। नदी एक पूरी समग्र और जीवंत प्रणाली होती है। अत: इसकी निर्मलता लौटाने का संकल्प करने वालों की सोच में समग्रता और दिल में जीवंतता का होना जरूरी है। नदी हजारों वषोर्ं की भौगोलिक उथल-पुथल का परिणाम होती है। अत: नदियों को उनका मूल प्रवाह और गुणवत्ता लौटाना भी बरस-दो बरस का काम नहीं हो सकता। हां,संकल्प निर्मल हो, सोच समग्र हो, कार्ययोजना ईमानदार और सुस्पष्ट हो, सातत्य सुनिश्चित हो, तो कोई भी पीढ़ी अपने जीवनकाल में किसी एक नदी को मृत्युशय्या से उठाकर उसके पैरों पर चला सकती है। इसकी गारंटी है। दरअसल ऐसे प्रयासों को धन से पहले धुन की जरूरत होती है। नदी को प्रोजेक्ट बाद में, वह कशिश पहले चाहिए, जो पेटजाए को मां के बिना बेचैन कर दे।
इस बात को भावनात्मक कहकर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। कालीबेईं की प्रदूषण मुक्ति का संत प्रयास, सहारनपुर पांवधोई का पब्लिक-प्रशासन प्रयास और अलवर के 7० गांवों द्बारा अपने साथ अरवरी नदी का पुनरोद्धार इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं।
नदी की समग्र सोच यह है कि झील, ग्लेशियर आदि मूल स्रोत हो सकते हैं, लेकिन नदी के प्रवाह को जीवन देने का असल काम नदी बेसिन की छोटी-बड़ी वनस्पतियां और उससे जुड़ने वाली नदियां, झरने, लाखों तालाब और बरसाती नाले करते हैं। इन सभी को समृद्ध रखने की योजना कहां है? हर नदी बेसिन की अपनी एक अनूठी जैव विविधता और भौतिक स्वरूप होता है। ये दोनों ही मिलकर नदी विशेष के पानी की गुणवत्ता तय करते हैं।
नदी का ढाल, तल का स्वरूप, उसके कटाव, मौजूद पत्थर, रेत, जलीय जीव-वनस्पतियां और उनके प्रकार मिलकर तय करते हैं कि नदी का जल कैसा होगा? नदी प्रवाह में स्वयं को साफ कर लेने की क्षमता का निर्धारण भी ये तत्व ही करते हैं। सोचना चाहिए कि एक ही पर्वत चोटी के दो ओर से बहने वाली गंगा-यमुना के जल में क्षार तत्व की मात्रा भिन्न क्यों है?
ताकि नदी ले सके सांस
गाद सफाई के नाम पर हम अमेठी की मालती और उज्जयिनी जैसी नदियों के तल को जेसीबी लगाकर छील दें। उनके ऊबड़-खाबड़ तल को समतल बना दें। प्रवाह की तीव्रता के कारण मोड़ों पर स्वाभाविक रूप से बने 8-8 फुट गहरे कंुडों को खत्म कर दें। वनस्पतियों को नष्ट कर दें और उम्मीद करें कि नदी में प्रवाह बचेगा, उम्मीद करें कि नदी संजय गांधी अस्पताल व एचएएल के बहाए जहर को स्वयं साफ कर लेगी, यह संभव नहीं है।
ऐसी नासमझी को नदी पर सिर्फ स्टॉप डैम बनाकर नहीं सुधारा जा सकता। कानपुर की पांडु के पाट पर इमारत बना लेना, पश्चिम उत्तर प्रदेश में हिंडन को औद्योगिक कचरा डंप करने का साधन मान लेना और मेरठ का काली नदी में बूचड़खानों के मांस मज्जा और खून बहाना तथा नदी को एक्सप्रेस वे नामक तटबंधों से बांध देना नदियों को नाला बनाने के काम है। प्राकृतिक स्वरूप ही नदी का गुण होता है। गुण लौटाने के लिए नदी को उसका प्राकृतिक स्वरूप लौटाना चाहिए। नाले को वापस नदी बनाना होगा।
जैव विविधता लौटाने के लिए नदी के पानी की जैव ऑक्सीजन मांग घटाकर 4-5 लानी होगी, ताकि नदी को साफ करने वाली मछलियां, मगरमच्छ, घड़ियाल और जीवाणुओं की बड़ी फौज इसमें जिंदा रह सके। नदी को इसकी रेत और पत्थर लौटाने होंगे, ताकि नदी सांस ले सके। कब्जे रोकने होंगे, ताकि नदियां आजाद बह सके। नहरी सिंचाई पर निर्भरता कम करनी होगी। नदी से सीधे सिंचाई अक्टूबर के बाद प्रतिबंधित करनी होगी, ताकि नदी के ताजा जल का कम से कम दोहन हो। भूजल पुनर्भरण हेतु तालाब, सोखता पिट, कुंड और अपनी जड़ों मंे पानी संजोने वाली पंचवटी की एक पूरी खेप ही तैयार करनी होगी, भूजल को निर्मल करने वाले जामुन जैसे वृक्षों को साथी बनाना होगा। इस दृष्टि से प्रत्येक नदी जलग्रहण क्षेत्र की एक अलग प्रबंध एवं विकास योजना बनानी होगी।
कितनी बिजली : कैसी बिजली
वैज्ञानिक सूर्य प्रकाश कपूर दावा करते हैं कि आज भारत में जितनी बिजली बनती है, उससे पांच गुना अधिक बिजली उत्पादन क्षमता हवा और अंडमान द्बीप समूह से भू-तापीय स्रोतों में मौजूद है। सबसे अच्छी बात तो यह कि हवा, सूर्य और भू-तापीय स्रोतों से खींच ली गई ऊर्जा वैश्विक तापमान के वर्तमान के संकट को तो नियंत्रित करेगी ही, भूकंप और सुनामी के खतरों को भी नियंत्रित करने में मददगार होगी।
कहना न होगा कि नदी की निर्मलता और अविरलता सिर्फ पानी, पर्यावरण, ग्रामीण विकास और ऊर्जा मंत्रालय का विषय नहीं है; यह उद्योग, नगर विकास, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, रोजगार, पर्यटन, गैर परंपरागत ऊर्जा और संस्कृति मंत्रालय के बीच भी आपसी समन्वय की मांग करता है।
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इस समय केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय में गंगा को लेकर खूब काम हो रहा है। इनमें सबसे ऊपर बनारस में गंगा घाटों की साफ-सफाई और रखरखाव को लेकर बनने वाली योजनाएं हैं। देश की कुछ बड़ी कंपनियां यहां घाटों को गोद लेंगी। घाटों के कुछ हिस्सों में हुई टूट-फूट को भी दुरुस्त करना उनकी जिम्मेदारी होगी। यह अभियान विशेष तौर पर उन घाटों को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है, जहां विदेशी सैलानियों का ज्यादा आना-जाना है। केंद्रीय पर्यटन मंत्री श्रीपद नायक के मुताबिक इस अभियान का मकसद घाट की साफ-सफाई में अहम प्राइवेट कंपनियों को शामिल करना है। ये गतिविधियां कंपनियों की कारपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) का हिस्सा होंगी।
मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक घाटों की को गोद लेने वाली इकाइयों में ताज और ललित होटल ग्रुप शामिल हैं। पर्यटन मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव गिरीश शंकर ने बताया कि इस अभियान में कारपोरेट की भूमिका कोऑर्डिनेटर की होगी। उन्होंने इस बात से इनकार किया कि इसे कारपोरेट के कामों की आउटसोîसग माना जाया। इस अभियान में जिन 12 घाटों को शामिल किया जाना है, उनमें दशाश्वमेध, राजेंद्र प्रसाद, शीतला, केदार, मन मंदिर, त्रिपुरभैरवी, विजयनगरम, राणा, चौसट्टी, मुंशी, अहिल्याबाई और दरभंगा घाट शामिल हैं। दशाश्वमेध घाट पर हर शाम होने वाली गंगा आरती काफी मशहूर है। यहीं से नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया था कि उनकी प्राथमिकता इस शहर के साथ बाकी देश को स्वच्छबनाने की है।
 

मंगलवार, 3 जून 2014

आज ब्लू है पानी और दिन भी सनी


मौसम विभाग तो अभी देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून के पहुंचने का कैलेंडर ही बनाने में लगा है पर इस बीच बारिश ने अपनी रिमझिम दस्तक दे दी। मौसम की इस खुशमिजाजी को देखकर सभी खुश हैं। पर एक बात जरूर अखरती है कि बारहमासा गाने वाले देश में बारिश का मतलब अब हनी सिंह जैसे रैपर बता रहे हैं।
देश की राजधानी के अलावा कई दूसरे हिस्सों में गरमी बढ़ने के साथ ही राहत की फुहारें भी पड़ने लगीं। गरमी को कूलर, एसी, फ्रिज, वाटर पार्क आदि जैसे कृत्रिम साधनों से दूर भगाने का कारोबार करने वालों को जरूर यह सुहानी राहत आफत जैसी लगी हो पर आमजन तो मौसम की इस खुशगवारी का भरपूर आनंद ही उठा रहे हैं।
बढ़ती गरमी बारिश की याद ही नहीं दिलाती, उसकी शोभा भी बढ़ाती है। केरल तट पर मानसून की दस्तक हो कि दिल्ली में उमस भरी गरमी के बीच हल्की बूंदा-बांदी, खबर के लिहाज से दोनों की कद्र है और दोनों के लिए पर्याप्त स्पेस भी। अखबारों-टीवी चैनलों पर जिन खबरों में कैमरे की कलात्मकता के साथ स्क्रिप्ट के लालित्य की थोड़ी-बहुत गुंजाइश होती है, वह बारिश की खबरों को लेकर ही। पत्रकारिता में प्रकृति की यह सुकुमार उपस्थिति अब भी बरकरार है, यह गनीमत नहीं बल्कि उपलब्धि जैसी है। पर इसका क्या करें कि इस उपस्थिति को बचाए और बनाए रखने वाली आंखें अब धीरे-धीरे या तो कमजोर पड़ती जा रही हैं या फिर उनके देखने का नजरिया बदल गया है।
दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ अब तो सूरत, इंदौर, पटना, भोपाल जैसे शहरों में भी बारिश दिखाने और बताने का सबसे आसान तरीका है, किसी किशोरी या युवती को भीगे कपड़ों के साथ दिखाना। कहने को बारिश को लेकर यह सौंदर्यबोध पारंपरिक है। पर यह बोध लगातार सौंदर्य का दैहिक भाष्य बनता जा रहा है। और ऐसा मीडिया और सिनेमा की भीतरी-बाहरी दुनिया को साक्षी मानकर समझा जा सकता है।
कई अखबारी फोटोग्राफरों के अपने खींचे या यहां-वहां से जुगाड़े गए ऐसे फोटो की बाकायदा लाइब्रेरी है। समय-समय पर वे हल्की फेरबदल के साथ इन्हें रिलीज करते रहते हैं और खूब वाहवाही लूटते हैं। नए मॉडल और एक्ट्रेस अपना जो पोर्टफोलियो लेकर प्रोडक्शन हाउसेज के चक्कर लगाती हैं, उनमें बारिश या पानी से भीगे कपड़ों वाले फोटोशूट जरूर शामिल होते हैं।
हीरोइनों के परदे पर भीगने-भिगाने का चलन वैसे बहुत नया भी नहीं है। पर पहले उनका यह भींगना-नहाना ताल-तलैया, गांव-खेत से लेकर प्रेम के पानीदार क्षणों को जीवित करने के भी कलात्मक बहाने थे।
खो गई सावनी-कजरी
मिर्जापुर की एक बहुत मशहूर कजरी है, 'बदरिया घिर आई ननदी...।’ पारंपरिक तौर पर चले आ रहे सावनी गीत-संगीत का शायद ही कोई कार्यक्रम हो, जो बिना इस गीत के माधुर्य के पूरा होता हो। पर शोभा गुर्टू और गिरिजा देवी से लेकर मालिनी अवस्थी तक को मशहूर करने वाली इस कजरी को अब अपने नए कद्रदानों की तलाश है। अलबत्ता 'आज ब्लू है पानी...पानी...’ की धुन पर थिरकने और लड़खड़ाने वाली पीढ़ी से इस बारे में कोई उम्मीद करना बेमानी है। ऐसे में बरसात और समाज के बीच के बदले तानेबाने को नए सिरे से समझना तो जरूरी है, नए सरोकारों और प्रचलनों पर भी गौर करना होगा। वह दौर गया, जब रिमझिम फुहारों के बीच धान रोपाई के गीत या सावनी-कजरी की तान फूटे। जिन कुछ लोक अंचलों में यह सांगीतिक-सांस्कृतिक परंपरा थोड़ी-बहुत बची है, वह मीडिया की निगाह से दूर है।
बारहमासा गाने वाले देश में आया यह परिवर्तन काफी कुछ सोचने को मजबूर करता है। यह फिनोमना सिर्फ हमारे यहां नहीं, पूरी दुनिया का है। पूरी दुनिया में किसी भी पारंपरिक परिधान से बड़ा मार्केट स्विम कास्ट्यूम का है। दिलचस्प तो यह कि अब शहरों में घर तक कमरों की साज-सज्जा या लंबाई-चौड़ाई के हिसाब से नहीं, अपार्टमेंट में स्विमिग पूल की उपलब्धता की लालच पर खरीदे जाते हैं।
इस पानीदार दौर को लेकर इतनी चिता तो जरूर जायज है कि पानी के नाम पर हमारी आंखों और सोच में कितना पानी बचा है। अगर पानी होने या बरसने का सबूत महिलाएं दे रही हैं तो फिर पुरुषों की दुनिया कितनी प्यासी है।
आज ब्लू है पानी और दिन भी सनी
 फिल्म 'यारियां’ का बीच सांग 'आज ब्लू है पानी...पानी...’ ने इस साल बारिश आने से पहले से रिमझिम फुहारों के अहसास से भर दिया। बात अगर शहरी नौजवानों की करें उन्होंने कम से कम इस साल के लिए इस गाने को रेनी सीजन का एंथम सांग का दर्जा दे
दिया है।
इस गाने में पंजाबी रैपर यो यो हनी सिंह की आवाज का जादू सिर चढ़कर बोलता है। इस गाने में उन्होंने खुद परफार्म भी किया है। पर इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है इस गाने का बोल्ड और यूथफुल फिल्मांकन। गरमी में पानी का भीगा अहसास अब मनमानी का भी अहसास है। मनमानी यानी मस्ती के लिए हर दहलीज को एक बार में लांघ जाना। सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स के दौर की यही तो खासियत है कि वह हर मौके को सेलिब्रेट करती है, फिर इससे फुहारों का मौसम कैसे बाहर रह सकता है।

सोमवार, 12 मई 2014

मदर इंडिया 2०14



 किसी को अगर यह शिकायत है कि परंपरा, परिवार, संबंध और संवेदना के लिए मौजूदा दौर में स्पेस लगातार कम होते जा रहे हैं, तो उसे नए बाजार बोध और प्रचलन के बारे में जानकारी बढ़ा लेनी चाहिए। जो सालभर हमें याद दिलाते चलते हैं कि हमें कब किसके लिए ग्रीटिग कार्ड खरीदना है और कब किसे किस रंग का गुलाब भेंट करना है। बहरहाल, बात उस दिन की जिसे मनाने को लेकर हर तरफ चहल-पहल है। मदर्स डे वैसे तो आमतौर पर मई के दूसरे रविवार को मनाने का चलन है। पर खासतौर पर स्कूलों में इसे एक-दो दिन पहले ही मना लिया गया ताकि हफ्ते की छुट्टी बर्बाद न चली जाए। रही बात भारतीय मांओं की स्थिति की तो गर्दन ऊंची करने से लेकर सिर झुकाने तक, दोनों तरह के तथ्य सामने हैं। कॉरपोरेट दुनिया में महिला बॉसों की गिनती अब अपवाद से आगे कार्यकुशलता और क्षमता की एक नवीन परंपरा का रूप ले चुकी है।
सिनेजगत में तो आज बकायदा एक पूरी फेहरिस्त है, ऐसी अभिनेत्रियों की जो विवाह के बाद करियर को अलविदा कहने के बजाय और ऊर्जा-उत्साह से अपनी काबिलियत साबित कर रही हैं। देश की राजनीति में भी बगैर किसी विरासत के महिला नेतृत्व की एक पूरी खेप सामने आई है। पर गदगद कर देने वाली इन उपलब्धियों के बीच जीवन और समाज के भीतर परिवर्तन का उभार अब भी कई मामलों में असंतोषजनक है।
आलम यह है कि मातृत्व को सम्मान देने की बात तो दूर देश में आज तमाम ऐसे संपन्न, शिक्षित और जागरूक परिवार हैं, जहां बेटियों की हत्या गर्भ में ही कर दी जाती है। इस मुद्दे को अभिनेता आमिर खान ने अपने टीवी शो 'सत्यमेव जयते’ के पिछले सीजन में काफी जोर-शोर से उठाया था। इसकी देश की संसद तक में चर्चा हुई।
रही जहां तक प्रसव और शिशु जन्म की बात तो यहां भी सचाई कम शर्मनाक नहीं है। देश में आज भी तमाम ऐसे गांव-कस्बे हैं, जहां प्रसव देखभाल की चिकित्सीय सुविधा नदारद है। जहां इस तरह की सुविधा है भी वहां भी व्यवस्थागत कमियों का अंबार है।
सेव द चिल्ड्रेन ने अपनी सालाना रिपोर्ट वल्डर््स मदर्स-2०12 में भारत को मां बनने के लिए खराब देशों में शुमार करते हुए उसे 8० विकासशील देशों में 76वें स्थान पर रखा है। स्थिति यह है कि देश में 14० महिलाओं में से एक की प्रसव के दौरान मौत हो जाती है।
स्वास्थ्य सेवा की स्थिति इतनी बदतर है कि मात्र 53 फीसद प्रसव ही अस्पतालों में होते हैं। ऐसे में जो बच्चे जन्म भी लेते हैं, उनकी भी स्थिति अच्छी नहीं है। पांच साल की उम्र तक के बच्चों में 43 फीसद बच्चे अंडरवेट हैं।
टीयर-2 देशों की बात करें तो सर्वाधिक बाल कुपोषित बच्चे भारत में ही हैं। ऐसी दुरावस्था में हमारी सरकार अगर देशवासियों को मदर्स डे की शुभकामनाएं देती है और समाज का एक वर्ग इस एक दिनी उत्साह में मातृत्व के प्रति औपचारिक आभार की शालीनता प्रकट करने में विनम्र होना नहीं भूलता तो यह देश की तमाम मांओं के प्रति हमारी संवेदना के सच को बयां करने के लिए
काफी है।
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हमारा दौर बुजुर्ग विरोधी!
यह दौर युवाओं का है। यह बात ऐसे कही जाती है जैसे युवा पहली बार किसी दौर की अगुवाई कर रहे हैं यानि कि युवाओं की मौजूदगी को महसूस करना कोई आविष्कारिक घटना सरीखा है। दरअसल, यह एक आशावादी दृष्टिकोण है भविष्य के प्रति। युवाओं के बहाने हम अपने भविष्य को बेहतर गढ़ना चाहते हैं, इसलिए ऐसा कहते हैं। वैसे कोई दौर उन तमाम लोगों का होता है, जो उस दौर के जीवनकाल को जीते हैं। यह अलग बात है कि नायकत्व की दावेदारी और अवधारणा दोनों ही समवेत की जगह भेड़िया और गड़ेरिया वाली समझ से बनती है। बहरहाल, ये बातें यहीं तक... आगे एक सीधा सवाल कि क्या हमारा दौर बुजुर्ग विरोधी है? क्या नई पीढ़ी का मानस इतना आधुनिक और विकसित हो गया है कि वह अपने जनकों की परवाह किए बगैर भविष्य का रास्ता तय करना चाहते हैं?
अगर हम ऐसे कुछ सवालों से दो-चार होना चाहें तो अपने समय की एक अनुदार और निराशाजनक स्थिति की पूरी बुनावट समझ में आएगी। शहरों से लेकर गांव तक बुजुर्गों के अकेले और निहत्थे पड़ते जाने की नियति घनी होती जा रही है। कुछ साल पहले केंद्र सरकार का ध्यान इस ओर गया और उसे जरूरी लगा कि वह बच्चों को अपने मां-पिता के प्रति कानूनी तौर पर जवाबदेह बनाए। केंद्र ने तब इस मुद्दे को लेकर जो पहल की वह आज भी पूरी तरह कारगर नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह राज्य सरकारों का गैरजिम्मेदार रवैया रहा। महज दस राज्यों में ही यह कानून पूरी तरह लागू हो पाया। पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में सबसे ज्यादा बुजुर्ग आबादी है। पर इन राज्यों ने बच्चों को अपने माता-पिता के प्रति जवाबदेह बनाने वाले कानून को अपने यहां लागू करने की जरूरत ही नहीं समझी। रही जहां तक केंद्र सरकार की बात तो वह केंद्र शासित राज्यों से भी अपनी बात मनवाने में नाकाम रही।
नतीजतन तीन साल पुरानी पहल के अनपेक्षित हश्र के बाद केंद्र के स्तर पर भी अब बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर किसी नई पहल या एजेंडे को लेकर कोई चिता, कोई बहस नहीं चल रही है। आलम यह है कि 1999 के बाद से राष्ट्रीय बुजुर्ग नीति की न तो समीक्षा हुई और न ही नई नीति पेश करने को लेकर कोई अंतिम सूरत सामने है। गौरतलब है कि देश में दस करोड़ से ज्यादा बुजुर्गों को इस कानून के तहत संरक्षण दिए जाने का लक्ष्य था। अब जबकि बुजुर्गों के भरण-पोषण और कल्याण के लिए बना यह कानून अपने लक्ष्य और उद्देश्यों को कहीं से भी पूरा करता नहीं दिखता तो एक सवाल तो जरूर कचोटता है कि क्या हम सचमुच इतने असंवेदनशील और क्रूर समय को जी रहे हैं, जिनमें उम्र की लाचारी की तरफ न देखना हमारी आदत और खुदगर्ज जरूरत का हिस्सा बन गया है।
वरिष्ठ नागरिकों के नाम पर बैंकों के जमा खाते में कुछ फीसद का ब्याज बढ़ा देने और रेल यात्रा टिकटों में कुछ रियायत देकर हमारी सरकारें बुजुर्गों के प्रति जो टोकन रूप में फर्ज निभा रही हैं, उसकी एक असलियत यह भी है कि देश में अपराधी तो अपराधी, अपने बच्चों तक से इन उम्रदराज लोगों को जीवन का सबसे ज्यादा खतरा है। परिवार की संयुक्त अवधारणा के विसर्जन ने जहां नौजवानों के लिए सुविधाजनक एकल परिवार की संकल्पना सामने रखी, वहीं एक उम्र के बाद समय और समाज के लिए गैरजरूरी बोझ बनने की खतरनाक नियति को भी रच दिया। अगर हम सचमुच एक जागरूक, जवाबदेह और संवेदनशील भविष्य की कामना करते हैं तो हमारी सरकारों के साथ समाज को भी बुजुर्गों के प्रति ईमानदार और जवाबदेह होना पड़ेगा।



सोमवार, 16 दिसंबर 2013

सिंदूरी साथ का रिकॉर्ड

मौजूदा दौर में देह और संदेह के साझे ने संबंधों के पारंपरिक बनावट को पूरी तरह बदल दिया है। रिश्ते बंधने से ज्यादा खुलने लगे हैं, दरकने लगे हैं। यह एक ऐसे समय का यथार्थ है जिसे नाम ही दिया गया है 'खुलेपन’ का। यह नामकरण हुआ तो था वैसे आर्थिक लिहाज से पर आर्थिक सरोकारों की खुली दरकारों ने देखते-देखते समाज, संबंध और संस्कृति की पारंपरिक दुनिया को पूरी तरह उलट-पुलट दिया। इसलिए अब संबंधों के धागे खुलने पर उतनी हैरत नहीं होती जितना उनके धैर्यपूणã निर्वाह के बारे में जानकर।
बात संबंधों की करें तो विवाह संस्था का ध्यान सबसे पहले आता है। अभी ब्रिटेन से चलकर एक खबर हिंदुस्तान में काफी पढ़ी-देखी और सराही गई कि वहां रहने वाले भारतीय मूल के दंपति करमचंद और करतारी रिकॉर्ड 86 साल से एक-दूसरे के साथ हैं। यह ब्रिटेन की संस्कृति के लिहाज से बड़ी बात है। इसलिए इस जोड़ी के साथ और इनसे जुड़ी तमाम तरह की जानकारियों को लोगों ने चाव से पढ़ा-जाना। खुद करमचंद और करतारी के लिए भी यह एक सुखद अनुभूति है कि जिस सिंदूरी साथ को उन्होंने अपने प्रेम और संस्कार के कारण अब तक बरकरार रखा है, वही अब उन्हें पूरी दुनिया में सम्मान दिला रहा है।
पंजाब के एक छोटे से गांव में 19०5 में जन्मे करमचंद की करतारी से 19०5 में शादी हुई थी। पासपोर्ट में दर्ज जानकारी के मुताबिक इस समय करमचंद की उम्र 1०6 साल और उनकी पत्नी करतारी की उम्र 99 साल है। परिवार के साथ 1965 से रह रहे करमचंद से जब पूछा गया कि रिकार्ड समय तक चले उनके दांपत्य संबंध का क्या राज है तो उन्होंने कहा कि शादीशुदा जिंदगी जीने का कोई राज नहीं होता है। हालांकि यह कहते हुए वह यह भी कहते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी में भरपूर आनंद उठाया है। जो चाहा वो किया, जैसा चाहा वैसा खाया-पिया, पर सब कुछ एक संयम के साथ। आज अगर उनके बारे में और उनके पारिवारिक जीवन के बारे में पूरी दुनिया में बात हो रही है तो इसलिए क्योंकि उन्होंने जीवन और मर्यादा के बीच कोई सख्त रेखा खींचने की बजाय एक समन्वयी लोच बनाए रखा, अपनी सोच में भी और अपने आचरण में भी।
जानकर लोगों को हैरत होगी कि जिंदगी को जिंदादिली से जीने वाले करमचंद रोज शाम खाने से पहले एक सिगरेेट पीते हैं। यही नहीं हफ्ते में तीन-चार बार व्हिसकी या ब्रांडी भी पीते हैं। उनकी जिंदगी की ये आदतें मर्यादा या संयम से भटकाव नहीं बल्कि जिंदगी को साकारात्मकता के साथ जीने की ललक की तरफ इशारा है।
करमचंद और करतारी के सिंदूरी साथ को सिर्फ वे दोनों ही नहीं पूरा करते हैं बल्कि इसके साथ उनके बच्चे और उनका परिवार भी है। वे दोनों अपने छोटे बेटे सतपाल और उसकी पत्नी रानी और दो पोते-पोतियों के साथ रहते हैं। बहू कहती है कि उनके लिए सास-ससुर उस छाया की तरह है, जहां बहुत सारी शांति और खूब सारा प्यार और आशीर्वाद है। बेटा सतपाल भी खुश है कि उनके मां-पिता न सिर्फ जीवित हैं बल्कि उनके साथ स्वस्थ और प्रसन्न हैं। बेटे को खुशी इस बात की भी है कि उन्हें इतने लंबे समय तक मां-पिता की सेवा करने का अवसर ईश्वर ने दिया है।
फिल्मकार सूरज बड़जात्या और करण जौहर बार-बार फिल्मी पर्दे पर भारतीय परिवारों की संयुक्त परंपरा को उत्सवी रूप में दिखाते हैं और बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ते हैं। पर जीवन की सिनेमाई समझ रखने वाले उन जैसे तमाम दूसरे लोगों को भी यह बात समझनी चाहिए कि महत्वपूर्ण परिवार को साथ देखना-दिखाना नहीं बल्कि उन सरोकारों को समझना है, जिससे यह साथ अटूट बनता है और सालोंसाल निभता-टिकता है। टेकचंद और करतारी के जीवन में झांकना इन सरोकारों से परिचित होना है।
 

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

पधारो म्हारे देस


राजस्थान की लोक परंपरा में 'पधारो म्हारे देस’ का अलाप इसलिए तो कम से कम नहीं ही गूंजा होगा कि लोग देस-दुनिया से यहां आएं और यहां की संस्कृति पर रीझें, मुस्कराएं और आगे निकल जाएं। हैरत ही है कि जो गीत राजस्थानी परिवार-समाज की सदियों से चली आ रही आतिथ्यि उदारता को शब्द दे रहे थे, वे आज सैलानियों को यहां लाने-जुटाने के लिए हांक भर हैं।

रविवार, 1 जुलाई 2012

मां को एक दिवसीय प्रणाम

किसी को अगर यह शिकायत है कि परंपरा, परिवार, संबंध और संवेदना के लिए मौजूदा दौर में स्पेस लगातार कम होते जा रहे हैं, तो उसे नए बाजार बोध और प्रचलन के बारे में जानकारी बढ़ा लेनी चाहिए। जो सालभर हमें याद दिलाते चलते हैं कि हमें कब किसके लिए ग्रीटिंग कार्ड खरीदना है और कब किसे किस रंग का गुलाब भेंट करना है। बहरहाल, बात उस दिन की जिसे मनाने को लेकर हर तरफ चहल-पहल है। मदर्स डे वैसे तो आमतौर पर मई के दूसरे रविवार को मनाने का चलन है। पर खासतौर पर स्कूलों में इसे एक-दो दिन पहले ही मना लिया गया ताकि हफ्ते की छुट्टी बर्बाद न चली जाए।
रही बात भारतीय मांओं की स्थिति की तो गर्दन ऊंची करने से लेकर सिर झुकाने तक, दोंनो तरह के तथ्य सामने हैं। कॉरपोरेट दुनिया में महिला बॉसों की गिनती अब अपवाद से आगे कार्यकुशलता और क्षमता की एक नवीन परंपरा का रूप ले चुकी है। सिनेजगत में तो आज बकायदा एक पूरी फेहरिस्त है, ऐसी अभिनेत्रियों की जो विवाह के बाद करियर को अलविदा कहने के बजाय और ऊर्जा-उत्साह से अपनी काविलियत साबित कर रही हैं। देश की राजनीति में भी बगैर किसी विरासत के महिला नेतृत्व की एक पूरी खेप सामने आई है। पर गदगद कर देने वाली इन उपलब्धियों के बीच जीवन और समाज के भीतर परिवर्तन का उभार अब भी कई मामलों में असंतोषजनक है।
आलम यह है कि मातृत्व को सम्मान देने की बात तो दूर देश में आज तमाम ऐसे संपन्न, शिक्षित और जागरूक परिवार हैं, जहां बेटियों की हत्या गर्भ में ही कर दी जाती है। अभी इसी मुद्दे पर टीवी पर अभिनेता आमिर खान के शो की हर तरफ चर्चा है। रही जहां तक प्रसव और शिशु जन्म की बात तो यहां भी सचाई कम शर्मनाक नहीं है। देश में आज भी तमाम ऐसे गांव-कस्बे हैं, जहां प्रसव देखभाल की चिकित्सीय सुविधा नदारद है। जहां इस तरह की सुविधा है भी वहां भी व्यवस्थागत कमियों का अंबार है। सेव द चिल्ड्रेन ने अपनी सालाना रिपोर्ट वल्ड्र्स मदर्स-2012 में भारत को मां बनने के लिए खराब देशों में शुमार करते हुए उसे 80 विकासशील देशों में 76वें स्थान पर रखा है। स्थिति यह है कि देश में 140 महिलाओं में से एक की प्रसव के दौरान मौत हो जाती है। स्वास्थ्य सेवा की स्थिति इतनी बदतर है कि मात्र 53 फीसद प्रसव ही अस्पतालों में होते हैं। ऐसे में जो बच्चे जन्म भी लेते हैं, उनकी भी स्थिति अच्छी नहीं है। पांच साल की उम्र तक के बच्चों में 43 फीसद बच्चे अंडरवेट हैं।
टीयर-2 देशों की बात करें तो सर्वाधिक बाल कुपोषित बच्चे भारत में ही हैं। ऐसी दुरावस्था में हमारी सरकार अगर देशवासियों को मदर्स डे की शुभकामनाएं देती है और समाज का एक वर्ग इस एक दिनी उत्साह में मातृत्व के प्रति आैपचारिक आभार की शालीनता प्रकट करने में विनम्र होना नहीं भूलता तो यह देश की तमाम मांओं के प्रति हमारी संवेदना के सच को बयां करने के लिए काफी है।   

रविवार, 1 जनवरी 2012

जागरण में पूरबिया की रात

मौसम का बारहमासी चित्त और चरित्र तक अब पहले जैसे नहीं रहे। जेठ की धूप और पूस की रात के परंपरागत अनुभव आज दूर तक खारिज हो चुके हैं। लिहाजा मौसम और प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता अब वैसा नहीं रहा, जैसा हमारे पुरखों का था...
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31 दिसंबर 2011 को दैनिक जागरण, राष्ट्रीय स्तंभ के नियमित स्तंभ 'फिर से' में पूरबिया की रात

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

पूस वैसा ना रात वैसी

यह दौर जितना बदलाव का नहीं, उससे ज्यादा अस्थिरता का है। स्थितियों को बदलतीं अस्थिरताएं हमारे आसपास से लेकर अंदर तक पसर चुकी हैं। आलम यह है कि मौसम का बारहमासी चित्त और चरित्र तक अब पहले जैसे नहीं रहे। जेठ की धूप और पूस की रात के परंपरागत अनुभव आज दूर तक खारिज हो चुके हैं। लिहाजा मौसम और प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता अब वैसा नहीं रहा, जैसा हमारे पुरखों का था। जलवायु मुद्दे पर विश्व सम्मेलनों से लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही गैरसरकारी संस्थाएं, पिछले दो दशकों में इस खतरे को लगातार रेखांकित कर रही हैं कि मनुष्य ने अपनी लालच और बेलगाम जरूरतों पर अगर ध्यान नहीं दिया तो जीवन के लिए अनुकूलताएं तय करने वाले कारक एक-एक कर उससे छिनते जाएंगे। पर इस दिशा में कोई पहला, बड़ा और निर्णायक कदम अब तक इसलिए नहीं उठाया जा सका क्योंकि दुनियाभर की सरकारों को उस विकास की ज्यादा फिक्र है, जो उनकी जनता को उपभोग और व्यय का आधुनिक अनुशासन सिखाती है। 
सर्दी का आगाज इस साल भी वैसे तो पिछले कुछ सालों की तरह ही हुआ। इस बार भी सर्दी की शुरुआती दस्तक के साथ खबरें आने लगीं कि इस साल ठंड अपेक्षा से ज्यादा पड़ेगी और पारा गिरने के पुराने कई रिकार्ड धराशायी होंगे। हुआ भी ऐसा ही। दिसंबर बीतते-बीतते सर्दी ने समय को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया। उन इलाकों से भी पारे के खतरनाक स्तर तक गिर जाने की खबरें आ रही हैं, जो कोल्ड जोन से बाहर माने जाते थे। कश्मीर और हिमाचल में बर्फानी सर्दी ने अपने खतरनाक मंसूबे इस तरह जाहिर किए और यहां पड़ने वाली ठंड से निपटने के पारंपरिक अनुभव और तरीके लाचार साबित हो रहे हैं।
विडंबना ही है कि की तपिश महंगाई की हो या मौसम की बेरहमी, पहली मार पड़ती है गरीबों पर। उसकी ही जिंदगी सबसे पहले दूभर होती है, सबसे पहले उसकी ही सांसें उखड़ती हैं। रहा सवाल, सरकारी प्रयासों और उसकी संवेदनशीलता का तो आज अदालत को यह फिक्र करनी पड़ रही है कि रैनबसेरे न तोड़े जाएं और सड़कों पर जीवन गुजारने को मजबूर लोगों की हिफाजत के लिए सर्दी के मौसम में जगह-जगह अलाव जलाए जाएं। हाड़ तक अकड़ा देने वाली ठंड ने जहां बड़े शहरों की देर रात पार्टियों की रौनकी आंच और शराब दुकानों की कतारें बढ़ा दी है, वहीं विकास और सरकार दोनों ही दृष्टि से नजरअंदाज लोगों का हाल बुरा है। सर्दी को सह न पाने के कारण मौत की नींद सोने वालों की अखबारों में बजाप्ता तालिका छप रही है। लेकिन फर्क किसी को नहीं पड़ रहा है। समाज और सरकार दोनों के लिए यह इतनी चौंकाने वाली स्थिति नहीं कि वह अपना चैन लुटाएं।
उधर, बाजार में सर्दी और गरमी दोनों का सामना करने वाले एक से बढ़कर एक उत्पाद आ गए हैं। आप में अगर भोग की परम लिप्सा है और बीच बाजार खड़ा होने की इजाजत आपकी जेब आपको देती है तो फिर मौसम का बदलता बारहमासा भी आपके लिए हर सूरत में सुहाना है, आरामदायक है। पर यह स्थिति ठीक नहीं है। अगर हम अब भी बदले मौसम के खतरे को पढ़ने को तैयार नहीं हैं तो भविष्य के हिस्से हम एक तरफ तो खतरों का बोझ बढ़ा देंगे, वहीं दूसरी तरफ अपनी नीति और नीयत को लेकर ऐतिहासिक रूप से गुनहगार ठहराए जाएंगे। क्योंकि हरित पट्टियों का रकबा लगातार कम होते जाने का खतरा हो या पर्यावरणीय संतुलन को जानबूझकर बिगाड़ने की हिमाकत, इसके नतीजे अगर अभी ही खतरनाक साबित हो रहे हैं तो दूरगामी तौर पर तो ये पूरी तरह असह्य और प्रतिकूल साबित होंगे। लिहाजा, यह समय है निर्णायक रूप से चेतने और  कारगर कदम उठाने का। दरकार सिर्फ प्रकृति पर हावी होने की बजाय उसका साथी होने की है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस साथ की चाह हम सबके अंदर पैदा होगी।

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

पनघट-पनघट पूरबिया बरत


पानी पर तैरते किरणों का दूर जाना
और तड़के ठेकुआ खाने रथ के साथ दौड़ पड़ना
भक्ति का सबसे बड़ा रोमांटिक यथार्थ है
आलते के पांव नाची भावना
ईमेल के दौर में ईश्वर से संवाद है

मुट्ठी में अच्छत लेकर मंत्र तुम भी फूंक दो
पश्चिम में डूबे सूरज की पूरब में कुंडी खोल दो...


दिल्ली, मुंबई, पुणे, चंडीगढ़, अहमदाबाद और सूरत के रेलवे स्टेशनों का नजारा वैसे तो दशहरे के साथ ही बदलने लगता है। पर दिवाली के आसपास तो स्टेशनों पर तिल रखने तक की जगह नहीं होती है। इन दिनों पूरब की तरफ जानेवाली ट्रेनों के लिए उमड़ी भीड़ यह जतलाने के लिए काफी होती हैं कि इस देश में आज भी लोग अपने लोकोत्सवों से किस कदर भावनात्मक तौर पर जुड़े हैं। तभी तो घर लौटने के लिए उमड़ी भीड़ और उत्साह को लेकर देश के दूसरे हिस्से के लोग कहते हैं, अब तो छठ तक ऐसा ही चलेगा, भइया लोगों का बड़का पर्व जो शुरू हो गया है।'
वैसे इस साल दिवाली के साथ छठ की रौनक में कुछ भारीपन भी है। एक तरफ जहां देश कुछ हिस्सों में भइया लोगों के विरोध का सिलसिला जारी तो वहीं महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़क पर उतरने वाली जनता ने अपने लिए जो उम्मीद जुटाई, सियासी आकाओं ने उस उम्मीद को सफेद से स्याह करने में अपनी पूरी ताकत झांक दी। फिर सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स के उफानी दौर में जिस दुनिया में रौनक और  चहल-पहल ज्यादा बढ़ी है  उसके 'विकसित हठ' और 'पारंपरिक छठ' की आपसदारी रिटेल बिजनेस तक तो पहुंच चुकी है पर दिलों के दरवाजों पर दस्तक होनी अभी बाकी है।
दिलचस्प है कि छठ के आगमन से पूर्व के छह दिनों में दिवाली, फिर गोवर्धन पूजा और उसके बाद भैया दूज जैसे तीन बड़े पर्व एक के बाद एक आते हैं। इस सिलसिले को अगर नवरात्र या दशहरे से शुरू मानें तो कहा जा सकता है कि अक्टूबर और नवंबर का महीना लोकानुष्ठानों के लिए लिहाज से खास है। एक तरफ साल भर के इंतजार के बाद एक साथ पर्व मनाने के लिए घर-घर में जुटते कुटुंब और उधर मौसम की गरमाहट पर ठंड और कोहरे की चढ़ती हल्की चादर। भारतीय साहित्य और संस्कृति के मर्मज्ञ भगवतशरण अग्रवाल ने इसी मेल को 'लोकरस' और 'लोकानंद' कहा है। इस रस और आनंद में डूबा मन आज भी न तो मॉल में मनने वाले फेस्ट से चहकार भरता है और न ही किसी बड़े ब्रांड या प्रोडक्ट का सेल ऑफर को लेकर किसी आंतरिक हुल्लास से भरता है ।
हां, यह जरूर है कि पिछले करीब दो दशकों में एक छतरी के नीचे खड़े होने की ग्लोबल होड़ ने बाजार के बीच इस लोकरंग की वैश्विक छटा उभर रही है। हॉलैंड, सूरीनाम, मॉरीशस , त्रिनिडाड, नेपाल और दक्षिण अफ्रीका से आगे छठ के अर्घ्य के लिए हाथ अब अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में भी उठने लगे हैं। अपने देश की बात करें तो जिस पर्व को ब्रिटिश गजेटियरों में पूर्वांचली या बिहारी पर्व कहा गया है, उसे आज बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और असम जैसे राज्यों में खासे धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
बिहार और उत्तर प्रदेश के कई कई जिलों में इस साल भी नदियों ने त्रासद लीला खेली है। जानमाल को हुए नुकसान के साथ जल स्रोतों और प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंधों को लेकर नए सिरे से बहस पिछले कुछ सालों में और मुखर हुई है। गंगा को उसके मुहाने पर ही बांधने की सरकारी कोशिश के विरोध के स्वर उत्तरांचल से लेकर दिल्ली तक सुने जा सकते हैं। पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र कहते हैं कि छठ जैसे पर्व लोकानुष्ठान की मर्यादित पदवी इसलिए पाते हैं क्योंकि ये हमें जल और जीवन के संवेदनशील रिश्ते को जीने का सबक सिखाते हैं।

पनघट-पनघट पूरबिया बरत
बहुत दूर तक दे गयी आहट

शहरों ने तलाशी नदी अपनी
तलाबों पोखरों ने भरी पुनर्जन्म की किलकारी
गाया रहीम ने फिर दोहा अपना
ऐतिहासिक धोखा है पानी के पूर्वजों को भूलना...


बिहार के सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रभूषण अपने तरीके से बताते हैं, 'लोक सहकार और मेल का जो मंजर छठ के दौरान देखने को मिलता है, उसका लाभ उठाकर जल संरक्षण जैसे सवाल को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में उठाया जा सकता है।  और यही पहल बिहार के कई हिस्सों में कई स्वयंसेवी संस्थाएं इस साल मिलकर कर रही हैं।' कहना नहीं होगा कि लोक विवेक के बूते कल्याणकारी उद्देश्यों तक पहुंचना सबसे आसान है। याद रखें कि छठ पूरी दुनिया में मनाया जाने वाला अकेला ऐसा लोकपर्व है जिसमें उगते के साथ डूबते सूर्य की भी आराधना होती है। यही नहीं चार दिन तक चलने वाले इस अनुष्ठान में न तो कोई पुरोहित कर्म होता है और न ही किसी पौराणिक कर्मकांड। यही नहीं प्रसाद के लिए मशीन से प्रोसेस किसी भी खाद्य पदार्थ का इस्तेमाल निषिद्ध है। और तो और प्रसाद बनाने के लिए व्रती महिलाएं कोयले या गैस के चूल्हे की बजाय आम की सूखी लकड़ियों को जलावन के रूप में इस्तेमाल करती हैं। कह सकते हैं कि आस्था के नाम पर पोंगापंथ और अंधविश्वास से यह पर्व आज भी सर्वथा दूर है।
कुछ साल पहले बेस्ट फॉर नेक्स्ट कल्चरल ग्रुप से जुड़े कुछ लोगों ने बिहार में गंगा, गंडक, कोसी और पुनपुन नदियों के घाटों पर मनने वाले छठ वर्त पर एक डाक्यूमेट्री बनाई। इन लोगों को यह देखकर खासी हैरत हुई कि घाट पर उमड़ी भीड़ कुछ भी ऐसा करने से परहेज कर रही थी, जिससे नदी जल प्रदूषित हो। लोक विवेक की इससे बड़ी पहचान क्या होगी कि जिन नदियों के नाम तक को हमने इतिहास बना दिया है, उसके नाम आज भी छठ गीतों में सुरक्षित हैं। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ रोकने और जल-वायु को प्रदूषणमुक्त रखने के लिए किसी भी पहल से पहले यूएन चार्टरों की मुंहदेखी करने वाली सरकारें अगर अपने यहां परंपरा के गोद में खेलते लोकानुष्ठानों के सामर्थ्य को समझ लें तो मानव कल्याण के एक साथ कई अभिक्रम पूरे हो जाएं।

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

चर्चिल का सिगार और गांधी की लंगोट


गांधीजी की लंगोट चर्चिल तक को अखरती थी क्योंकि इस सादगी का उनके पास कोई तोड़ नहीं था। सो गुस्से में वे गांधी का जिक्र आते ही ज्यादा सिगार पीने लगते और उन्हें नंगा फकीर कहने लगते। आए दिन गांधीजी की ऐनक, घड़ी और चप्पल की नीलामी की खबरें आती रहती हैं। सरकार से गुहार लगाई जाती है कि गांधी हमारे हैं और उनकी सादगी के उच्च मानक गढ़ने में मददगार चीजों को भारत में ही रहना चाहिए। बीते साल मीडिया वालों ने अहमदाबाद में उस विदेशी शख्स को खोज निकाला जो गांधीजी की ऐसी चीजों का पहले तो जिस-तिस तिकड़म से संग्रह करता और फिर उन्हें करोड़ों डॉलर के नीलामी बाजार में पहुंचा देता।  फिर नीलामी आज सिर्फ गांधीजी के सामानों की नहीं हो रही। यहां और भी बहुत कुछ हैं। पुरानी से पुरानी शराब की बोतल से लेकर शर्लिन चोपड़ा की हीरे जड़ी चड्ढ़ी तक। खरीदार दोनों के हैं, सो बाजार में कद्र भी दोनों की  है। यानी नंगा फकीर बापू और हॉट बिकनी बेब शर्लिन दोनों एक कतार में खड़े हैं।
हमारे दौर की सबसे खास बात यही है कि यहां सब कुछ बिकता है- धर्म से लेकर धत्कर्म तक। आप अपने घर बटोर-बटोर कर खुशियां लाएं, इसके  लिए झमाझम ऑफर और सेल की भरमार है। इस बाबत आप और जानकारी बढ़ाना चाहें तो 24 घंटे आपका पीछा करने वाले रेडियो-टीवी-अखबार तो हैं ही। गुजरात के समुद्री किनारों पर जो नया टूरिज्म इंडस्ट्री डेवलप हो रहा है, वह अपने सम्मानित अतिथियों को गांधी के मिनिएचर चरखे और अंगूर की बेटी का आकर्षण एक साथ परोसता है। बस इतना लिहाज रखा जाता है कि क्रूज पर शराब तभी परोसी जाती हैं, जब वह गुजरात की सीमा से बाहर निकल आते हैं। गुजरात सीमा के भीतर ऐसा नहीं  किया जा सकता क्योंकि वहां शराबबंदी है। यानी आत्मानुशासन का जनेऊ पहनना जरूरी है पर उसे उतारकर उसके  साथ खिलवाड़ की भी पूरी छूट है।
ये बाजार द्वारा की गई मेंटल कंडिशनिंग का ही नतीजा है कि कल तक जिसे हम महज अंत:वस्त्र कहकर निपटा देते थे, उनका बाजार किसी भी दूसरे परिधान के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है।  मां की ममता पर भारी पहने वाले डिब्बाबंद दूध का इश्तेहार बनाने वाले आज अंत:वस्त्रों को सेकेंड स्किन से लेकर सेक्स सिंबल तक बता रहे हैं। जैनेंद्र की एक कहानी में नायक अपना अंडरबियर-बनियान बाहर अलगनी पर सुखाने में संकोच करता है कि नायिका देख लेगी। आज नायक तो नायक नायिकाएं और लेडी मॉडल स्टेज से लेकर टीवी परदे तक इन्हें धारण कर ग्लैमर दुनिया की चौंध बढ़ाती हैं।
बालीवुड की मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान कहती हैं, 'सब कुछ हॉट हो गया, अब कुछ भी नरम या मुलायम नहीं रहा। गुजरे जमाने की हीरोइनों के नजर झुकाने और फिर अदा के उसे उठाते हुए फेर लेने से जितनी बात हो जाती थी, वह आज की हीरोइनों के पूरी आंख मार देने के बाद भी नहीं  बनती।'  साफ है कि देह दर्शन के तर्क ने लिबासों की भी परिभाषा बदल दी। और इसी के साथ बदल गई हमारी अभिव्यक्ति और सोच-समझ की तमीज भी। पचास शब्द की खबर के लिए पांच कॉलम की खबर छापने का दबाव किसी अखबार की एडिटोरियल गाइडलाइन से ज्यादा मल्लिका का राखी जैसी बिंदास बालाओं का मुंहफट बिंदासपन बनाता है। रही पुरुषों की बात तो नंगा होने से आसान उन्हें नंगा देखने के लिए उकसाता रहा है। तभी तो महिलाओं के अंत:वस्त्र के बाजार का साइज पुरुषों के के मुकाबले कई  गुना है।  यह सिलसिला इंद्रसभा से लेकर आईपीएल ग्राउंड तक देखा जा सकता है। 'अंत:दर्शन' अब 'अनंतर' तक सुख देता है और पुरुष मन के इस सुख के लिए महिलाओं को फीगर से लेकर कपड़ों तक की बारीक काट-छांट करनी पड़ रही है।
बात चूंकि गांधी के नाम से शुरू हुई इसलिए आखिर में बा को भी याद कर लें।  खरीद-फरोख्त और चरम भोग के परम दौर की इस माया को नमन ही करना चाहिए कि उसकी दिलचस्पी न तो बा की साड़ी में है और न ही उसकी जिंदगी में। अव्वल यह अफसोस से ज्यादा सुकूनदेह है। और ऐसा अब भी है, यह किसी गनीमत से कमतर नहीं।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

बंग समाज की हर दूसरी बेटी का सच !


चाव के साथ चुनाव और राजनीति की बात करने वाले कह सकते हैं कि पश्चिम बंगाल में बदलाव आ गया है। पर यह बात यहां की राजनीति के लिए भले सही बैठे लेकिन जहां तक यहां के जीवन और समाज का सवाल है, उसकी तबीयत को तारीखी रौशनी में ही पढ़ा जा सकता है।  दरअसल, बंगाल की धरती परंपरा और परिवर्तन दोनों की साझी रही है। बात नवजागरण की करें कि जंगे आजादी की इस क्रांतिकारी धरती ने देश के इतिहास के कई सुनहरे सर्ग रचे हैं। पर इस सुनहलेपन के साथ यहां के जीवन और समाज का अंतर्द्वंद्व और विरोधाभास भी पर प्रकट होता रहा है। बांग्ला साहित्य को तो इस बात का श्रेय है कि उसने यहां के सामाजिक अंतविर्रोधों को खासी खूबी के साथ अभिव्यक्ति दी है।
हाल में यूनिसेफ की एक रिपोर्ट आई है। इसमें बताया गया है कि इस पश्चिम बंगाल में हर दूसरी लड़की कच्ची उम्र में ही ब्याह दी जाती है। आज की स्थिति में यह आंकड़ा चौंकाता तो है ही, यह इस सूबे के सामाजिक-आर्थिक हालात पर नए सिरे से विचार करने की दरकार भी सामने रखता है। आखिर क्या ऐसा हुआ कि बाल और विधवा विवाह के खिलाफ देश में सामाजिक नवजागरण का बिगुल फूंकने वाला प्रदेश आज फिर से उन्हीं समस्याओं से जकड़ गया है। क्या अपनी परंपरा और संस्कृति से बेहद प्यार करने वाला बंग समाज अपनी रुढ़ताओं के प्रति भी आग्रही है या कि पिछले तीन-चार दशकों से एक विचार और एक शासन के वर्चस्वादी आग्रह ने यहां के जनजीवन को आधुनिकता की मुख्यधारा का हिस्सा बनने ही नहीं दिया। इतना तो साफ है कि यह समस्या अगर सामाजिक है तो इसके कारक एक-दो दिन में तो कम से कम नहीं खड़े हुए होंगे। सामाजिक अध्ययन की दृष्टि से बंग समाज का सामंती और मध्यकालीन मिजाज ठेठ हिंदी पट्टी से तो अलग है पर है यह उसका ही विस्तार।
बिहार के अंग और मैथिली क्षेत्र से बांग्लादेश की सीमा तक में फैला-समाया लोक और परंपरा पर एक तरफ जहां खेतिहर मलिकाव की हेकड़ी हावी रही है, तो वहीं दूसरी तरफ गांव-समाज का एक बड़ा हिस्सा और तबका भूख और गरीबी से बिलबिलाता रहा है। यह द्वंद्वात्मकता ही कहीं नक्सल हिंसा के रूप में फूटी है तो कहीं आधुनिकता से छिटकते चले जाने की नियति सामाजिक रुढताओं को और वज्र बनाती चली गई है। 21वीं सदी के नए दशक के आरंभ के साथ पश्चिम बंगाल में बहुत कुछ बदला है। यह बदलाव 'सरकारी' के साथ 'असरकारी' भी साबित होगी, ऐसा अभी कह पाना मुश्किल तो है ही, जल्दबाजी भी होगी। आज वहां एक महिला मुख्यमंत्री हैं। 'मां, माटी और मानुष' के प्रति अपनी जवाबदेही और संवेदना को बार-बार दोहराने वाली ममता बनर्जी अगर सचमुच वहां कारगर साबित हो रही हैं फिर तो वहां पितृसत्तात्मक समाज की कई वर्जनाएं भी दरकनी चाहिए।

रविवार, 28 अगस्त 2011

सोमवार, 22 अगस्त 2011

हांडी में अनशन और देह दर्शन

 कृष्ण जन्माष्टमी का हर्षोल्लास इस बार भी बीते बरसों की तरह ही दिखा। मंदिरों-पांडालों में कृष्ण जन्मोत्सव की भव्य तैयारियां और दही-हांडी फोड़ने को लेकर होने वाले आयोजनों की गिनती और बढ़ गई। मीडिया में भी जन्माष्टमी का क्रेज लगता बढ़ता जा रहा है। पर्व और परंपरा के मेल को निभाने या मनाने से ज्यादा उसे देखने-दिखाने की होड़ हर जगह दिखी। जब होड़ तगड़ी हो तो उसमें शामिल होने वालों की ललक कैसे छलकती है, वह इस बार खास तौर पर दिखा। दिलचस्प है कि कृष्ण मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं बल्कि लीला पुरुषोत्तम हैं, उनकी यह लोक छवि अब तक कवियों-कलाकारों को उनके आख्यान गढ़ने में मदद करती रही है। अब यही छूट बाजार उठा रहा है।      
हमारे लोकपर्व अब हमारे कितने रहे, उस पर हमारी परंपराओं का रंग कितना चढ़ा या बचा हुआ है और इन सब के साथ उसके संपूर्ण आयोजन का लोक तर्क किस तरह बदल रहा है, ये सवाल चरम भोग के दौर में भले बड़े न जान पड़ें पर हैं ये बहुत जरूरी। मेरे एक सोशल एक्टिविस्ट साथी अंशु ने ईमेल के जरिए सूचना दी कि उन्हें  कृष्णाष्टमी पर नए तरह की ई-ग्रीटिंग मिली। उन्हें किसी रिती देसाई का मेल मिला। मेल में जन्माष्टमी की शुभकामनाएं हैं और साथ में है उसकी एस्कार्ट कंपनी का विज्ञापन, जिसमें एक खास रकम के बदले दिल्ली, मुंबई और गुजरात में कार्लगर्ल की मनमाफिक सेवाएं मुहैया कराने का वादा किया गया है। मेल के साथ मोबाइल नंबर भी है वेब एड्रेस भी। मित्र को जितना मेल ने हैरान नहीं किया उससे ज्यादा देहधंधा के इस हाईटेक खेल के तरीके ने परेशान किया।
लगे हाथ जन्माष्टमी पर इस साल दिखी एक और छटा का जिक्र। एक तरफ जहां गोविंदाओं की टोलियों ने अन्ना मार्का टोपी पहनकर भ्रष्टाचार की हांडी फोड़ी। अन्ना का अनशन दिल्ली के रामलीला मैदान में जनक्रांति का जो त्योहारी-मेला संस्करण दिखा वह मुंबई तक पहुंचते-पहुंचते प्रोटेस्ट का फैशनेबल ब्रांड बन गया। यही नहीं बार बालाओं से एलानिया मुक्ति पा चुकी मायानगरी मुंबई से पिछले साल की तरह इस बार भी खबर आई कि चौक-चारौहों पर होने वाले दही-हांडी उत्सव अब पब्स और क्लब्स तक पहुंच चुके हैं। देह का भक्ति दर्शन एक पारंपरिक उत्सव को जिस तरह अपने रंग में रंगता जा रहा है, वह हाल के सालों में गरबा के बाद यह दूसरा बड़ा मामला है, जब किसी लोकोत्सव पर बाजार ने मनचाहे तरीके से डोरे डाले हैं। ऐसा भला हो भी क्यों नहीं क्योंकि आज भक्ति का बाजार सबसे बड़ा है और इसी के साथ डैने फैला रहा है भक्तिमय मस्ती का सुरूर। मामला मस्ती का हो और देह प्रसंग न खुले ऐसा तो संभव ही नहीं है।   
बात कृष्णाष्टमी की चली है तो यह जान लेना जरूरी है कि देश में अब तक कई शोध हो चुके हैं जो कृष्ण के साथ राधा और गोपियों की संगति की पड़ताल करते हैं। महाभारत में न तो गोपियां हैं और न राधा। इन दोनों का प्रादुर्भाव भक्तिकाल के बाद रीतिकाल में हुआ। रवींद्र जैन की मशहूर पंक्तियां हैं- 'सुना है न कोई थी राधिका/ कृष्ण की कल्पना राधिका बन गई/ ऐसी प्रीत निभाई इन प्रेमी दिलों ने/ प्रेमियों के लिए भूमिका बन गई।' दरअसल राम और कृष्ण लोक आस्था के सबसे बड़े आलंबन हैं। पर राम के साथ माधुर्य और प्रेम की बजाय आदर्श और मर्यादा का साहचर्य ज्यादा स्वाभाविक दिखता है। इसके लिए गुंजाइश कृष्ण में ज्यादा है। वे हैं भी लीलाधारी, जितना लीक पर उतना ही लीक से उतरे हुए भी। सो कवियों-कलाकारों ने उनके व्यक्तित्व के इस लोच का भरसक फायदा उठाया। लोक इच्छा भी कहीं न कहीं ऐसी ही थी।
नतीजतन किस्से-कहानियों और ललित पदों के साथ तस्वीरों की ऐसी अनंत परंपरा शुरू हुई, जिसमें राधा-कृष्ण के साथ के न जाने कितने सम्मोहक रूप रच डाले गए। आज जबकि प्रेम की चर्चा बगैर देह प्रसंग के पूरी ही नहीं होती तो यह कैसे संभव है कि प्रेम के सबसे बड़े लोकनायक का जन्मोत्सव 'बोल्ड' न हो। इसलिए भाई अंशु की चिंता हो या मीडिया में जन्माष्टमी के बोल्ड होते चलन पर दिखावे का शोर-शराबा। इतना तो समझ ही लेना होगा  कि भक्ति अगर सनसनाए नहीं और प्रेम मस्ती न दे, तो सेक्स और सेंसेक्स के दौर में इनका टिक पाना नामुमकिन है।

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

पानी बरसने का सबूत महिलाएं दे रही हैं



बढ़ती गरमी बारिश की याद ही नहीं दिलाती, उसकी शोभा भी बढ़ाती है। केरल तट पर मानसून की दस्तक हो कि राजधानी दिल्ली में उमस भरी गरमी के बीच हल्की बूंदा-बांदी, खबर के लिहाज से दोनों की कद्र है और दोनों के लिए स्पेस भी। अखबारों-टीवी चैनलों पर जिन खबरों में कैमरे की कलात्मकता के साथ स्क्रिप्ट के लालित्य की थोड़ी-बहुत गुंजाइश होती है, वह बारिश की खबरों को लेकर ही। पत्रकारिता में प्रकृति की यह सुकुमार उपस्थिति अब भी बरकरार है, यह गनीमत नहीं बल्कि उपलब्धि जैसी है। पर इसका क्या करें कि इस उपस्थिति को बचाए और बनाए रखने वाली आंखें अब धीरे-धीरे या तो कमजोर पड़ती जा रही हैं या फिर उनके देखने का नजरिया बदल गया है। 
दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ अब तो सूरत, इंदौर, पटना, भोपाल जैसे शहरों में भी बारिश दिखाने और बताने का सबसे आसान तरीका है, किसी किशोरी या युवती को भीगे कपड़ों के साथ दिखाना। कहने को बारिश को लेकर यह सौंदर्यबोध पारंपरिक है। पर यह बोध लगातार सौंदर्य का दैहिक भाष्य बनता जा रहा है। और ऐसा मीडिया और सिनेमा की भीतरी-बाहरी दुनिया को साक्षी मानकर समझा जा सकता है। कई अखबारी फोटोग्राफरों के अपने खिंचे या यहां-वहां से जुगाड़े गये ऐसे फोटो की बाकायदा लाइब्रोरी है। समय-समय पर वे हल्की फेरबदल के साथ इन्हें रिलीज करते रहते हैं और खूब वाहवाही लूटते हैं। नये मॉडल और एक्ट्रेस अपना जो पोर्टफोलियो लेकर प्रोडक्शन हाउसों के चक्कर लगाती हैं, उनमें बारिश या पानी से भीगे कपड़ों वाले फोटोशूट जरूर शामिल होते हैं। बताते हैं कि नम्रता शिरोडकर की बहन शिल्पा शिरोडकर को कई बड़े बैनरों को फिल्में एक दौर में इसलिए मिलीं कि उसे कैमरे के आगे पानी में किसी भी तरह से भीगने से गुरेज नहीं था। खबरें तो यहां तक आर्इं कि उसे एक फिल्म में इतनी बार नहलाया-धुलाया गया कि अगले कई महीनों तक वह निमोनिया से बिस्तर पर पड़ी रही। हीरोइनों के परदे पर भीगने-भिगाने का चलन वैसे बहुत नया भी नहीं है। पर पहले उनका यह भीगना-नहाना ताल-तलैया, गांव-खेत से लेकर प्रेम के पानीदार क्षणों को जीवित करने के भी कलात्मक बहाने थे। 
वह दौर गया, जब रिमझिम फुहारों के बीच धान रोपाई के गीत या सावनी-कजरी की तान फूटे। जिन कुछ लोक अंचलों में यह सांगीतिक-सांस्कृतिक परंपरा थोड़ी-बहुत बची है, वह मीडिया की निगाह से दूर है। इसे उस सनक या समझ का ही कमाल कहेंगे कि टूथपेस्ट बेचना हो या मानसून आने की खबर देनी हो, तरीका चाहे जो भी हो होता दैहिक ही है। बारहमासा गाने वाले देश में आया यह परिवर्तन काफी कुछ सोचने को मजबूर करता है। यह फिनोमना सिर्फ हमारे यहां नहीं पूरी दुनिया का है। पूरी दुनिया में किसी भी पारंपरिक परिधान से बड़ा मार्केट स्विम कॉस्टयूम का है। दिलचस्प तो यह कि अब शहरों में घर तक कमरों की साज-सज्जा या लंबाई-चौड़ाई के हिसाब से नहीं, अपार्टमेंट में स्विमिंग पूल की उपलब्धता की लालच पर खरीदे जाते हैं। इस पानीदार दौर को लेकर इतनी चिंता तो जरूर जायज है कि पानी के नाम पर हमारी आंखों और सोच में कितना पानी बचा है। अगर पानी होने या बरसने का सबूत महिलाएं दे रही हैं तो फिर पुरुषों की दुनिया कितनी प्यासी है। 

बुधवार, 6 जुलाई 2011

किंतु परंतु के साथ उदार हम


भारत विशिष्टताओं से ज्यादा विलक्षणताओं का देश है। इसी तर्ज पर आप चाहे तो यह भी कह सकते हैं अपना देश विविधताओं से ज्यादा अंतर्विरोधों से भरा है। यह बात न सिर्फ सधी जुमलेबाजी में बेखटके चलती है बल्कि समय और समाज के वरिष्ठ टीकाकारों ने भी अपने अनुभव से इस तथ्य पर मुहर लगाई है। यही कारण है कि पूरी दुनिया में जो हवा एक दिशा से बहती है, उसका रुख भी यहां आकर बदल जाता है। दलित राजनीति के कागजी धुरंधरों से लेकर प्रगतिशील समाजविज्ञानियों तक ने माना है सामाजिक गैरबराबरी के पीछे एक बड़ी वजह आर्थिक गैरबराबरी है।
यह भी खासा दिलचस्प ही है कि अपने यहां बाजार और सामाजिक न्याय का मुद्दा एक साथ राजनीति, संसद और समाज के एजेंडे में शुमार हुअा। पिछले तीन दशकों में जहां विकसित और चमकदार भारत के छालीदार इमेज को अपनी सफलता में शामिल करने वाली सरकारें आई, वहीं देश में एक नवसंपन्न वर्ग अचानक शहरों से लेकर कस्बों तक पसरता चला गया। पर कहते हैं न कि लिखावट बदलने से भाषा नहीं बदलती, सो भारतीय समाज का अंतर्विरोध भी इस दौरान कम होने के बजाय नई जटिलताओं के साथ और बढ़ीं। जिस दौर में आप महज एक फोन कॉल पर पिज्जा-बर्गर और आइसक्रीम का स्वाद आप ले सकते हैं, उसी दौर में सिर पर मैला ढ़ोने को अभिशप्त एक समाज हमारे बीच रहता है, यह सचाई हमारे विकास और संपन्नता के हर दावे को धोकर रख देता है।
अच्छा लगता है कि अब भी कुछ लोगों, समूहों और संगठनों को यह लगता है कि नए समय का नया समाज भी सर्वथा विभेदमुक्त होना चाहिए। ऐसे  ही एक प्रयास के तहत दो सौ से ज्यादा अछूत महिलाओं का शिवनगरी काशी ने मुक्त और खुले ह्मदय से न सिर्फ स्वागत किया बल्कि यह संदेश भी दिया कि इंसान और भगवान दोनों की नजर में सब सामान्य हैं। सिर पर मैला ढोने वाली इन महिलाओं ने न सिर्फ जिंदगी में पहली बार मंदिर की देहरी लांघी बल्कि उस पात में बैठकर साथ में खाना भी खाया जिनके बीच अछूत होने की उसकी शिनाख्त न जाने कितनी पीढ़ियों से गाढ़ी होती आ रही थी। यहां यह बात भी गौरतलब है कि भारत की विश्व पहचान में उसके धार्मिक और आध्यात्मिक बिरसे का भी खासा योगदान रहा है। इसलिए अगर किसी कर्मकांडी या सामाजिक जहालत के नाम पर चले आ रही विभेदकारी मध्यकालीन मलीनता अगर आज भी हमारी मानसिकता को घेरता है तो यह सचमुच एक शर्मनाक स्थिति है और इसका बचाव किसी भी सूरत में करना एक बर्बर कार्रवाई होगी। आखिर जिस पूरे दौर को ही उदारवादी और हर स्तर पर खुले होने का ग्लोबल तमगा हासिल है, उस दौर में अनुदारता समाज या विचार के भीतर किसी सूरत बनी रहे, यह मुनासिब नहीं।

गुरुवार, 19 मई 2011

बिग बी को बताओ, जीती कैसे आशा


ऑक्सफोर्ड की लाइब्रोरी में मैग्ना कार्टा चार्टर देखकर अमिताभ बच्चन जब अभिभूत होते हैं तो अखबारों, टीवी चैनलों के लिए यह न छोड़ी जा सकने वाली खबर होती है। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है कि पूरब में खड़े होकर कोई पश्चिम को सूर्य का घर माने और उसकी लाली से अपनी चेतना और इतिहास बोध को रंग ले। दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र की उन जड़ों की जिसकी डालियों पर झूला डालने वाले परिंदे आपको आज पूरी दुनिया में मिल जाएंगे। पर लोकतंत्र महज एक शासनतंत्र नहीं, एक जीवनशैली और मानवीय इच्छाशक्ति भी है। अगर यह बोध और सोच किसी को भावनात्मक अतिरेक लगे तो उसे भारत के पांच लाख गांवों के सांस्कृतिक गणतंत्र की परंपरा से परिचित होना चाहिए। परंपरा का यह प्रवाह आज जरूर पहले की तरह सजल नहीं रहा, पर है वह आज भी कायम अपने जीवन से भरे बहाव के साथ। अगर यकीन नहीं हो तो चलिए उस छोटे से गांव में जहां गणतंत्र आज भी सबसे बड़ी 'आशा' है, सबसे बड़ा यकीन है कल को आज से बेहतर होने का।
पिछले तीन दशकों में घाटी में उतनी बर्फ नहीं गिरी, जितनी आंच दिल्ली से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वहां के हालात को लेकर महसूस की गई। यह भारत की लोकतांत्रिक निष्ठा की कहीं न कहीं जीत ही है कि उसने अपने इस सबसे अशांत सूबे में भी लोकतांत्रिक शासन को लगातार बहाल रखा। जम्मू कश्मीर के हालात और राजनीति पर फारूख अब्दुल्ला ने कभी कहा था कि उनकी मजबूरी है कि वह हमेशा दिल्ली की सत्ता का साथ दें। पक्ष और विरोध के लोकतंत्र में दरअसल, यह तकाजा महज राजनीति का नहीं बल्कि उस तकाजे का भी है जो जम्मू कश्मीर को देश की मुख्यधारा के साथ एकमेक रहने की दरकार पेश करता है।  पिछले दिनों जब देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां चल रही थी, उसी दौरान जम्मू कश्मीर सहित कई प्रदेशों में लोकतंत्र का एक और बड़ा अनुष्ठान पंचायत चुनाव के रूप में चल रहा था। विधानसभा चुनावों, भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालती कार्रवाई और नागरिक समाज की मांगों और आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन के खात्मे के शोरगुल में इस अनुष्ठान की तरफ कम ही लोगों का ध्यान गया। अलबत्ता स्थानीय लोगों की दिलचस्पी जरूर इसमें बनी रही। दिलचस्प तो यह रहा कि अशांत घाटी में इन चुनावों का औपचारिक निर्वाह ही जहां बड़ी कामयाबी ठहराई जा सकती थी, वहां अस्सी फीसद तक मतदान हुए। यही नहीं बिहार जैसे सूबे में जहां पंचायत की परंपरा को ऐतिहासिक मान्यता हासिल है, वहां भी यह चुनाव संगीनों के साए में होने के बावजूद खून के छीटों से बचे नहीं रहे। वहीं घाटी की वादियों में ये चुनाव तकरीबन शांतिपूर्ण संपन्न हुए।

दरअसल, पंचायत के बहाने इस चुनाव में घाटी के लोगों ने न सिर्फ लोकतांत्रिक सरोकारों की अपनी मिट्टी को एक बार फिर से तर किया है बल्कि दुनिया के आगे यह साफ भी किया है उनका जीवन, उनका समाज, उनकी संस्कृति उतनी उलझी या बंटी हुई नहीं है, जितनी बताई या समझाई जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कहीं से मुमकिन नहीं था कि कश्मीरी पंडित परिवार की एक महिला उस गांव से पंच चुनी जाती, जो पूरी तरह मुस्लिम बहुल है। यहां विख्यात पर्यटन स्थल गुलमर्ग जाने के रास्ते में एक छोटा सा गांव है- वुसान। आशा इसी गांव से पंच चुनी गई है जबकि यहां से इस पद के लिए मैदान में उतरी वह अकेली कश्मीरी पंडित महिला थी। इस सफलता को स्थानीय, आपवादिक या कमतर ठहराने वालों के लिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि घाटी से 1980 में करीब दो लाख कश्मीरी पंडित परिवारों को पलायन कर जाना पड़ा था।
इस बार भी जब यहां पंचायत चुनाव चल रहे थे तो आतंकी धमकियां मिली थी पर यहां के लोगों ने तमाम उन मंसूबों को धूल चटा दिया, जो बंटवारे और कट्टरता की भड़काऊ बातें करते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि वुसान का संदेश घाटी के सच को नए पूर्वाग्रहरहित नजरिए से देखने की जरूरत को तो रेखांकित करेगा ही यहां से बही लोकतंत्र की धारा को देश की मुख्यधारा बनने की प्रेरणा भी देगा।  फिर फारूख साहब भी कहेंगे अपनी लोकतांत्रिक मजबूरी का रोना रोने की बजाय अपनी मजबूती का बखान करेंगे, सगर्व और खुशी-खुशी।