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शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

विकल्पहीनता के विरोध का विमर्श

- प्रेम प्रकाश

विकल्पहीन नहीं है दुनिया - किशन पटनायक

नीदरलैंड्स इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस की सोशल न्यूरोलॉजिस्ट एमिली कैस्पर ने एक दिलचस्प शोध किया है। कैस्पर जानना चाहती थीं कि सत्ता के विरोध का निर्णय लोग निर्भीकता से करते हैं या ऐसा करते हुए वे किसी भय से दबे होते हैं। शोध के नतीजे से यह बात जाहिर हुई है कि अनजाने ही सत्ता के साथ सहमति की मनोवैज्ञानिक स्वाभाविकता हाल के दौर में बढ़ी है। अपने शोध अध्ययन की व्याख्या करते हुए कैस्पर कहती हैं कि बगैर उचित प्रशिक्षण और जागरुकता के लोग सत्ता के खिलाफ अपनी असहमति को खुले विरोध के मोर्चे तक ले जाने से भागते हैं। कैस्पर के अध्ययन और उसके नतीजे को अगर भारत के मौजूदा हालात से जोड़कर देखें तो विमर्श का एक नया आधार विकसित हो सकता है।

इस आधार को विकसित करने की पहल में पहला संदर्भ अगर मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के 325 के मुकाबले 126 वोटों के भारी अंतर से गिरने का लें तो इस परिणाम का प्रोजेक्शन सीधे 2019 के लोकसभा चुनाव पर करने के बजाय, इस पूरी स्थिति को इतिहास की रोशनी में धैर्य के साथ देखना होगा। भारतीय संसद के इतिहास में पहला अविश्वास प्रस्ताव पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में अगस्त 1963 में जेबी कृपलानी ने रखा था। तब इस प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट पड़े थे और विरोध में 347 वोट पड़े थे। पर इस प्रस्ताव का महत्व महज इसलिए कम नहीं हो जाता कि वह गिर गया, बल्कि इसकी अहमियत इसलिए है क्योंकि इससे देश में कहीं न कहीं विपक्षी राजनीति की वह सैद्धांतिकी तय हुई, जिसे गैर-कांग्रेसवाद के रूप में हम जानते हैं। विपक्षी राजनीति की यह सैद्धांतिक धुरी आज भी कायम है। बस उसका नाम बदलकर गैर-भाजपावाद हो गया है। देश में राजनीतिक विरोध का यह सैद्धांतिक तकाजा विपक्ष और जनता दोनों के सामने है। लिहाजा इस तकाजे पर कौन अपनी भूमिका कैसे तय करता है, यह ज्यादा बड़ा सवाल है।

लोकतंत्र में विकल्पहीनता की बात एक खतरनाक स्थिति है। इसलिए आज जब नरेंद्र मोदी की विकल्पहीनता पर बहस के कई सिरे एक साथ खुले हैं तो उसमें हमें लोकतंत्र के कुछ बुनियादी सरोकारों की भी फिक्र करनी चाहिए। कैस्पर ने भी अपने अध्ययन में इस खतरे का जिक्र किया है। अंग्रेजी में इस खतरनाक स्थिति के लिए ‘टीना’ नाम से एक टर्म काफी लोकप्रिय है और इन दिनों काफी इस्तेमाल भी हो रहा है। ‘टीना’ यानी ‘देअर इज नो अल्टरनेटिव’। यहां यह साफ हो जाना चाहिए कि सत्ता और उसे हासिल करने का गणित ही लोकतंत्र में सब कुछ नहीं है। आज भी इस मुल्क की तारीख में अगर महात्मा गांधी से लेकर राममनोहर लोहिया, जेबी कृपलानी और जयप्रकाश नारायण जैसे राजनेताओं के नामों के आगे उनके लोकतांत्रिक संघर्ष और राजनीतिक विवेक के कई-कई उल्लेख दर्ज हैं तो इसलिए क्योंकि उनके लिए लोकतंत्र में शक्ति का केंद्र सत्ता नहीं बल्कि लोकशक्ति है। 

कैस्पर ने अपने अध्ययन का संदर्भ बड़ा रखा है। लिहाजा उसके आधार पर अगर भारतीय राजनीतिक स्थिति का हम मूल्यांकन कर रहे हैं तो हमें तात्कालिकता से आगे एक बड़े परिप्रेक्ष्य में विमर्श को ले जाना होगा। पहली बात तो यही कि यह शोध अध्ययन कहीं न कहीं इस बात को रेखांकित करता है कि दुनिया भर में सत्ता का ढांचा हाल के दशकों में मजबूत हुआ है। लिहाजा उसके खिलाफ विरोध की जमीन तैयार करना और उस जमीन पर टिक कर खड़ा होना एक बड़ी चुनौती बन गई है। अमेरिका से लेकर भारत तक जिस तरह सत्ता और राजनीति का सूर्य एक साथ दक्षिणायन हुआ है, उसने सत्ता पर अधिकार के लोकतांत्रिक संघर्ष को सीधे-सीधे राजनीतिक वर्चस्व में बदल दिया है। इस बदलाव ने लोकतंत्र के बुनियादी सत्य को भी पीछे धकेला और आगे आ गया है ‘पोस्ट ट्रूथ'। 

‘पोस्ट ट्रूथ’ यानी सत्य से ज्यादा प्रभावी प्रचार और शोरगुल। प्रचार का यह शोर बीते चार वर्षों में हर तरफ सुना जा सकता है। कैस्पर जिसे सत्ता की मजबूती के तौर पर देख रही हैं, वह सत्ता से ज्यादा उस सोच की मजबूती है कि जिसमें सरकारें विरोध और हस्तक्षेप के हर लोकतांत्रिक स्पेस को खत्म कर अपने शक्तिशाली होने के भान को पुष्ट करती हैं। किसी नेतृत्व को लेकर विकल्पहीनता का भान अगर सुनियोजित और प्रचारित है तो फिर इस पोस्ट ट्रूथ फिनोमेना को लोकतंत्र के बुनियादी सरोकारों को मिल रही चुनौती के रूप में देखना होगा। 

आखिर में एक बात यह कि 2019 का लोकसभा चुनाव निश्चित तौर पर अहम है, पर यह वर्ष देश के लिए अपने राष्ट्रपिता की 150वीं जयंती मनाने का भी होगा। संघर्ष और सद्भाव के बीच सत्य और अहिंसा जैसे उच्च मूल्यों को जीनेवाले देश में नेतृत्व और विकल्प की बात अगर महज व्यक्तिवादी चौंध में खो जाए तो यह विचार और मूल्य के स्तर पर बहुत बड़ी स्फीति होगी। 

(लेख 2019 के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में लिखा गया था। अब 2024 के चुनाव नतीजे भी सामने हैं। पर लोकतंत्र में विकल्प को लेकर चिंताएं अब भी उसी तरह कायम हैं।)

सोमवार, 12 मार्च 2018

अलग झंडा क्यों चाहिए कर्नाटक सरकार को!


- प्रेम प्रकाश

नब्बे के दशक से जोर पकड़ी अस्मितावादी राजनीति 2014 तक आते-आते हांफने लगी। बिहार विधानसभा चुनाव में इसका नया प्रभावी संस्करण देखने को जरूर मिला, पर आज नीतीश और लालू जिस तरह राजनीति के दो छोर पर खड़े हैं, उसने इस संस्करण की आगामी संभावना को पूरी तरह ढहा दिया। कहने को उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की नई दोस्ती भी अस्मितावादी राजनीति के इसी संस्करण की नकल है, पर इसका एक तो रकबा अभी बहुत कम है, दूसरे दोनों दल की तरफ से अभी इस बारे में बहुत कुछ साफ होना बाकी है। इन सारे घटनाक्रमों के बीच क्षेत्रीय अस्मिता की जमीन को बीते एक वर्ष से जिस तरह कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी सींचने में लगी है, वह एक खतरनाक संकेत है।

तमिलनाडु के साथ कावेरी जल विवाद के बाद कर्नाटक ने अपना अलग झंडा तैयार कर लिया है। कर्नाटक में इसी वर्ष अप्रैल-मई में चुनाव होने हैं। वहां कांग्रेस का जो रुख है, उसमें क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रवाद का चुनावी संघर्ष पहली बार जमीन पर आमने-सामने होगा। ताज्जुब है कि राष्ट्रवादी राजनीति के सामने क्षेत्रीय स्वाभिमान और अस्मिता की जो सियासी जमीन पूर्वोत्तर राज्यों, प. बंगाल, तमिलनाडु और केरल में भी नहीं तैयार हो सकी, उसका उदाहरण कर्नाटक बनने जा रहा है। देश के इन तमाम सूबों में क्षेत्रीय राजनीति का एक अपना गणित जरूर रहा है, पर इस गणित से राष्ट्रवादी घोड़े पर सवार भाजपा का विजय रथ रोकने के लिए कोई सियासी प्रयोग अगर कहीं सीधे तौर पर आजमाई जा रही है, तो आज की तारीख में देश का वह अकेला राज्य कर्नाटक है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दांव खेला है, उसने निस्संदेह भाजपा की उलझनें बढ़ा दी हैं। सिद्धारमैया ने कर्नाटक के लिए एक झंडे का डिजाइन कैबिनेट से पास कराया है, जिसको अब वह केंद्र सरकार को भेजने जा रहे हैं ताकि इसको संवैधानिक मंजूरी मिल सके। कन्नड़ संगठनों के साथ अपने कैंप दफ्तर में बैठक के दौरान सिद्धारमैया ने इस झंडे को दिखाया, जो तीन रंगों का है। झंडे में ऊपर पीली पट्टी, बीच में सफेद और नीचे लाल पट्टी है। बीच में सफेद पट्टी पर राज्य का प्रतीक चिन्ह गंद्दु भेरुण्डा (दो बाज) बना है। अपने दांव को किसी संवैधानिक चुनौती से बचाने और अलगाववादी हिमाकत से अलग दिखाने की कोशिश में सिद्धारमैया कह रहे हैं वे इस झंडे को राष्ट्रीय ध्वज से नीचे ही फहराएंगे।

पर जिस तरह सिद्धारमैया इस पूरे प्रकरण को बता रहे हैं, उसमें उनकी मंशा को पढ़ना आसान है। वे जब कहते हैं कि उनका यह झंडा कन्नड़ अभिमान के लिए है और तकराबन सभी कन्नड़ संगठनों का समर्थन उन्हें इसके लिए हासिल है, तो साफ दिख जाता है कि वे एक बड़ा सियासी दांव खेल रहे हैं। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झंडे को लेकर सामने आने की टाइमिंग भी इसी बात की तरफ इशारा कर रही है। 

दिलचस्प है कि कर्नाटक कई तरह की राजनीति की प्रयोगशाला पहले से रहा है। सरकारी भ्रष्टाचार के भी बड़े-बड़े मामले वहां उठे हैं। पर राज्य के लिए अलग झंडे की मांग उठाकर वहां की कांग्रेस सरकार ने जो हिमाकत की है, उसका खामियाजा कांग्रेस की सियासी नैतिकता को तो अपनी तरह से उठाना ही पड़ेगा। देश में इन दिनों प. बंगाल और जम्मू-कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों और केरल में जिस तरह की अशांति है, उसका प्रतिफलन अगर अलग-अलग या साझे तौर पर देश के आगे एक नए क्षेत्रीयतावादी या प्रांतवादी संकट के तौर पर सामने आए तो यह देश की अखंडता के लिए वाकई बहुत बड़ी चुनौती होगी। यह चुनौती कैसी बड़ी हो सकती है, वह आंध्र सरकार के विशेष राज्य का दर्जा मांगने से शुरू हुई सियासी लपट के देखते-देखते बिहार तक पहुंचने के घटनाक्रम के तौर पर भी समझा जा सकता है। मूर्तिभंजक पागलपन के दौर में क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर भड़काने वाली मानसिकता के प्रकटीकरण से राष्ट्रीय सद्भाव के बुरी तरह चोटिल होने का खतरा है।

भारत में राष्ट्रवादी दरकारों और उसके उसूलों को लेकर बहस आजादी मिलने से पहले ही शुरू हो गई थी। एक समय जब देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल रियासतों के विलय के लिए कठिन चुनौतियों का समाना कर रहे थे तो एक तरह से यह राष्ट्रीय सम्मति भी बनी थी कि देश की भौगोलिक, राजनीतिक एकता के लिए तमाम ऐसे विवादों को एक किनारे रखना होगा, जिससे देश की संघवादी रचना कमजोर हो सकती है। पर दुर्भाग्य से अस्सी-नब्बे के दशक के बाद से देश में राजनीतिक स्फीति इतनी ज्यादा हुई कि सत्ता की सीढ़ी बनाने के लिए सियासी जमातें और उनके नेता आज किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं। बीते सालों में विधानसभाओं में बजाप्ता प्रस्ताव लाए और पास किए गए हैं कि उन आतंकियों को क्षमादान मिले, जिसे देश की न्यायिक व्यवस्था आजीवन कारावास या फांसी की सजा सुना चुकी है। याकूब मेनन, अफजल गुरु से लेकर देविंदर पाल सिंह भुल्लर के लिए सियासी आंसू रोने वालों को कभी यह फिक्र नहीं रही कि उनकी इस हिमाकत का देर-सबेर देश को कितनी बड़ी कीमत चुकानी होगी।   

यहां एक बात जो और समझनी है, वह यह कि बीते चार सालों में देश की राजनीति का सूर्य पूरी तरह से दक्षिणायन हो चुका है। देश की राजनीति में यह बड़ा शिफ्ट है। जिस कांग्रेस के खिलाफ कभी डॉ. राम मनोहर लोहिया सरीखे नेताओं को विपक्षी मोर्चा तैयार करने और फिर उसे चुनावी समर में शिकस्त से बचाने में पसीने छूट जाते थे, उस कांग्रेस का जनाधार आज इतना कमजोर हो चुका है कि नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व भी चाहकर कुछ नहीं कर पा रहा है। ज्यादा बुरी स्थिति यह है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने खिलाफ बने इस माहौल को समझने-परखने के बजाय उन तिकड़मों पर भरोसा कर रही है, जो उन्हें जड़मूल से और कमजोर कर देगी।

बहरहाल, अगर बात करें कर्नाटक की तो वहां अलग झंडे की मांग को लेकर जो कुछ भी हुआ, वह गंभीर मामला होने के साथ हास्यास्पद भी है। एक तो भारत जिस देश का संघीय राष्ट्र है, उसमें संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा सिर्फ जम्मू-कश्मीर को ही प्राप्त है। इसलिए सिर्फ जम्मू कश्मीर के पास ही अपना अलग झंडा है। अलग झंडे की मांग एक तरह से अलग राष्ट्रीयता की मांग की तरह है, जिसे कम से कम देश की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के तहत मंजूरी नहीं मिल सकती। ऐसी कुछ मांगें आरक्षण जैसे मसलों पर भी आई हैं, जिसमें चुनावी फायदे के लिए राजनीतिक दलों ने जनता के बीच जाकर यह वादा कर दिया कि वह संवैधानिक और घोषित न्यायिक व्यवस्था और सीमा से बाहर जाकर भी कुछ समुदायों को आरक्षण देंगे। अलबत्ता इस चुनावी दांव में यह समझ भी शामिल रहती है कि ऐसा कुछ चाहकर भी इसलिए भी नहीं किया जा सकता क्योंकि विधानसभा या राज्य सरकार की मंजूरी के बावजूद इसे न्यायिक चुनौती दी जाएगी, जहां उसे मान्यता मिलने का सवाल ही नहीं है।

एक जो आखिरी बात इस पूरे मसले पर गौर करने की है, वह यह कि कर्नाटक में झंडे की मांग कोई आज नई नहीं उठी है, बल्कि इससे पहले जब वहां भाजपा की सरकार थी तो कांग्रेस की तरफ से यह मांग उठी थी और इसके लिए विधानसभा में प्रस्ताव लाया गया था। मामला न्यायालय भी पहुंचा और तब सदानंद गौड़ा की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने कर्नाटक उच्च न्यायालय को बताया कि उसने दो रंग वाले कन्नड़ झंडे को राज्य का आधिकारिक झंडा घोषित करने के सुझाव को स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि अलग झंडा ‘देश की एकता एवं अखंडता के खिलाफ’  होगा। साफ है कि नए सिरे से इस मांग को उठाकर कांग्रेस देश में सांप्रदायिक से आगे प्रांतवादी या अलगाववादी ध्रुवीकरण का खतरनाक दांव खेलना चाहती है।

रविवार, 31 जुलाई 2016

इरोम शर्मिला का संघर्ष और अफ्सपा कानून

-प्रेम प्रकाश 
मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) के खिलाफ 16 सालों से अनशन पर बैठीं इरोम शर्मिला ने अब अपना इरादा बदल लिया है। वह नौ अगस्त को अपना अनशन तोड़कर चुनावी राजनीति में उतरेंगी। व्यवस्था के खिलाफ लड़ने के लिए व्यवस्था का हिस्सा बनना जरूरी है, इरोम डेढ़ दशक लंबे अपने संघर्ष के बाद इसी नतीजे पर पहुंची हैं। बहरहाल, उनके अनशन तोड़ने के फैसले ने अफ्सपा को लेकर बहस को एक बार फिर से सतह पर ला दिया है। यह भी संयोग ही है कि इरोम ने ऐसे समय अपना अनशन तोड़ने का फैसला किया है जब मणिपुर तो नहीं पर देश के सबसे अशांत कहे जाने वाले सूबे जम्मू कश्मीर से अफ्सपा हटाने के संकेत स्तर पर संकेत मिल रहे हैं। 
जम्मू-कश्मीर में अफ्सपा 199० में लागू किया गया था। वहां आतंक और अलगाव की दहक वहां नए सिरे से महसूस की जा रही है। कश्मीर दौरे पर पहुंचे गृहमंत्री राजनाथ सिह से मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का यह कहना कि अफस्पा कानून को धीरे-धीरे खत्म करने की जरूरत है, इस बात की तरफ साफ इशारा है अब केंद्र सरकार भी इस दिशा में आगे बढ़ने को लेकर राजी है। गृहमंत्री ने कहा भी कि हम कश्मीर के साथ मजबूरी का नहीं बल्कि भावनात्मक रिश्ता विकसित करना चाहते हैं। 
पिछली यूपीए सरकार ने वार्ताकारों के एक समूह को जम्मू कश्मीर भेजा था। इस समूह ने वहां विभिन्न समूहों और तबकों से घाटी के हालात और उसके समाधान को लेकर बात की थी। वार्ताकारों के समूह का भी यह मानना रहा कि अफ्सपा को लेकर वहां के लोगों के मन में काफी असंतोष है। यहां तक कि परस्पर विरोधी दल होने के बावजूद पीडीपी और नेशनल कांफ्रेस इस बात पर शुरू से एकमत रहे हैं कि इस अतिवादी सैन्य कानून के खिलाफ लोगों के गुस्से के कारण प्रतिक्रियावादी और अलगाववादी तत्वों को कश्मीक घाटी में अपना आधार मजबूत करने में मदद मिल रही है। इसी माह की आठ जुलाई को अफ्सपा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 32 का उपयोग करते हुए व्यवस्था दी कि सुरक्षाकर्मी अत्यधिक अथवा प्रतिशोध की भावना से ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकते। अनुच्छेद 32 संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों से संबंधित है। इसके तहत हर भारतीय नागरिक को अपने बुनियादी अधिाकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका की पनाह लेने का मूल अधिकार मिला हुआ है। साफ है कि सुप्रीम कोर्ट भी इस कानून की आड़ में मनमाने सैन्य कार्रवाई के खिलाफ है। 
इस समय देश में अफस्पा कानून जम्मू कश्मीर, असम, मणिपुर, नगालैंड एवं अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में लागू है। मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 355 में ही इस कानून के बने रहने का औचित्य मिलता है। इस अनुच्छेद में केंद्र को सभी राज्यों को आतंरिक गड़बड़ियों से बचाने की जिम्मेदारी है। जाहिर है कि जब जिम्मेदारी है तो अधिकार भी चाहिए। नतीजतन सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून 1958 में 1972 में एक संशोधन कर केंद्र सरकार को भी किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के पूरे या किसी भी भाग को अशांत क्षेत्र घोषित करने का अधिकार मिल गया। पहले सिर्फ राज्यों को ही किसी क्षेत्र को अशांत घोषित करने का हक था। 
चूंकि अफ्सपा सिर्फ अशांत क्षेत्र में ही लगाया जा सकता है। इसलिए सरकार के साथ नागरिकों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने स्थान और परिवेश में शांति और सहअस्तित्व की स्थिति बहाल रखने के प्रति हमेशा तत्पर और जागरूक रहें। मसलन, पंजाब में 1983 में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून लगाया गया था। आतंकवाद के खिलाफ वहां सरकार एवं आम जनता ने लंबी लड़ाई लड़ी। जब पंजाब के लोगों ने यह तय किया कि वहां शांति बहाल हो तो स्थितियां तेजी से बदलीं। आखिरकार 1997 में वहां से यह कानून वापस लिया गया।
इसी तरह स्वच्छ तथा भ्रष्टाचार रहित प्रशासन के सामने उग्रवाद कैसे पराजित होता है, हाल में ही त्रिपुरा ने इसका उदाहरण देश के सामने रखा है। 27 मई 2०15 को राज्य से अफ्सपा हटा लिया गया। वहां की जनता के साथ मुख्यमंत्री माणिक सरकार को इस बात का साझा श्रेय जाता है कि वे इस बात को लेकर जागरूक और तत्पर हुए कि शांति व्यवस्था उनके लिए एक सामान्य और स्वाभाविक स्थिति हो, न कि थोपी हुई। पिछले लोकसभा चुनाव में त्रिपुरा में 84 फीसदी मतदान हुआ, जो इस बात का प्रमाण है कि लोग वहां निर्भीक रूप से देश की लोकतांत्रिक मुख्यधारा में रहने के हिमायती हैं और अलगाववादी शक्तियों को अपने हित के खिलाफ मानते हैं। 
इस सिलसिले में मणिपुर की भी चर्चा जरूरी है। वहां इरोम शर्मिला इस कानून को हटाने की मांग को लेकर 2००० से उपवास पर बैठी हैं। पर उन्हें अब नहीं लगता कि उनके इस विरोध के तरीके से मणिपुर को इस कानून से आजादी मिलेगी । एक सचाई यह भी है कि इरोम का प्रभाव वहां सक्रिय अलगाववादियों समूहों पर नहीं है और सरकार भी इस दिशा में कोई कारगर पहल नहीं कर पा रही है, इसलिए हालात जस के तस हैं। वहां सैन्य मनमानी की शिकायतों के बाद 2०13 में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच के लिए पूर्व जज संतोष हेगड़े की अध्यक्षता में एक समिति बनाई। समिति ने जेढ़ हजार से ज्यादा शिकायतों में से 62 मामलों में फर्जी मुठभेड़ की पुष्टि की थी।
दरअसल, अशांत करार दिए क्षेत्रोें में हालात को काबू करने के लिए सेना को उतारना आज एक आम प्रचलन है। सेना के आगे मजबूरी है कि वह बगैर विशेषाधिकार के नागरिक क्षेत्रों में कोई बड़ी और कारगर कारवाई नहीं कर सकती। इसलिए बेहतर हो कि अफस्पा को सैन्य अतिवाद से जोड़कर देखने के बजाय कानून व्यवस्था की स्थिति बहाल करने में सरकार और नागरिक प्रशासन की नाकामी के तौर पर देखा जाए। इस लिहाज से देखें तो बड़ा सवाल यह है कि देश में लोकतंंत्र सरकार और समाज के साझ विवेक से चलेगा या सेना के खौफ से। आपातकाल के दंश को याद कर आज भी कराह उठने वाले देश में सरकार के साथ यह समाज की भी जिम्मेजारी है कि वह अपने बीच किसी तरह के सैन्य हस्तक्षेप को हर लिहाज से गैरजरूरी साबित करे। यही लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के हित में भी है। वैसे भी एक ऐसे दौर में जब नागरिक स्वतंत्रता की तार्किक हिमायत के लिए उठने वाली आवाजें ज्यादा मुखर हैं, आप शांति व्यवस्था को खतरे के नाम पर किसी कानूनी अतिवाद की छतरी को लंबे समय तक ताने नहीं रह सकते हैं।
चौहत्तर आंदोलन के दिनों में जयप्रकाश नारायण ने कई मौकों पर पुलिस और सेना को देशहित में आंदोलन के साथ आने की अपील की थी। उनकी इस अपील के कारण उन्हें अराजक तक ठहराया गया। पर उनका साफ मत था कि सेना-पुलिस और नागरिकों को आमने-सामने खड़ी कर देने वाली स्थितियां एक तरफ जहां सरकार की असफलता है, वहीं यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के भी खिलाफ है। आज जबकि सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफ्सपा) को जम्मू कश्मीर जैसे अशांत सूबे से हटाने को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है तो जेपी की तब कही गईं बातें ज्यादा समझ में आती हैं। 

सोमवार, 11 अगस्त 2014

और सैम हो गए विश्वकर्मा


अमेरिका में जब बराक ओबामा राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने में सफल हुए थे, तो वहां की और भारत की स्थितियों को राजनैतिक और बौद्धिक जमात के बीच कई तुलनात्मक नजरिए सामने आए। बार-बार अमेरिका के उदाहरण को सामने रखकर यह समझने की कोशिश की गई कि भारत उस उदार और विकसित राजनीतिक-सामाजिक स्थिति तक पहुंचने से कितनी दूर है, जब हम भी अपने यहां एक दलित को या एक मुसलमान को प्रधानमंत्री पद पर बैठा देखेंगे। जो बात ज्यादा भरोसे से और तार्किक तरीके से समझ में आई वह यही कि विकास और संपन्नता मध्यकालीन और जातीय बेडिèयों को तोड़ने के सबसे मुफीद औजार हंै। अमेरिका में ये औजार सबसे ज्यादा तेजी से काम कर रहे हैं। इसलिए वहां चेंज को अलग से चेज करने की जरूरत अब नहीं है। पर क्या भारत भी अपनी विकासयात्रा में उन्हीं सोपानों पर पहुंच रहा है, जहां चेंज कोई चैलेंज न होकर एक स्वाभाविक स्थिति बन जाती है। शायद नहीं।
दरअसल, हम बात करना चाह रहे हैं 2०12 में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों की। इस साल हुए आम चुनाव में यूपी के चुनावी गणित कितने काम आए, सबके सामने है। पर तब सभी सियासी पार्टियां इसे दिल्ली की सत्ता के सेमीफाइनल के तौर पर ही लड़ रही थीं। आरक्षण का खुर्शीदी-बेनी खेल पहले ही बोतल से बाहर आ गया तो रही-सही कसर जातीय राजनीति को लेकर खेले गए नंगे खेल ने पूरी कर दी।
क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले दलों की मजबूरी तो छोड़ दें, कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय प्रभाव और विस्तार वाले दलों ने भी विकास व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को छोड़कर क्षेत्र और जाति की राजनीति पर अपना यकीन ज्यादा दिखाया। बाबू सिह कुशवाहा मामले में भाजपा ने जहां आंतरिक विरोध तक को सुनना गंवारा नहीं किया, वहीं रियल और फेयर पॉलिटिक्स के हिमायती राहुल गांधी ने चुनावी सभा में सैम पैत्रोदा को विश्वकर्मा जाति का बताकर केंद्र में अपने पिता राजीव गांधी के कार्यकाल के आईटी विकास को जातीय तर्कों पर उतारने को मजबूर हुए।
विकास को सामाजिक न्याय की समावेशी संगति पर खरा उतारना तो समझ में आता है पर इसे सीधे-सीधे जातीयता की जमीन पर ला पटकना खतरनाक है। इस लिहाज से कांग्रेस पार्टी की इस हिमाकत को तब सबसे बड़ा मर्यादा उल्लंघन ठहराया गया था, जब उसने देश में आईटी क्रांति के प्रणेता रहे सैम पैत्रोदा को जातीय राजनीति के चौसर पर पासे की तरह फेंका। यह गलती नहीं बल्कि कांग्रेस की सोची-समझी चुनावी रणनीति थी, यह तब ज्यादा समझ में आया जब पार्टी ने अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी करते हुए सैम को मीडिया से मुखातिब कराया। सैम अगर सबके सामने कैलकुलेटेड ढिठाई से यह कहते कि 'मैं बढ़ई का बेटा हूं और अपनी जाति पर मुझे फL है’, तो कांग्रेस का उनको लेकर खेला गया चुनावी खेल तो समझ में आता है पर सैम को क्या पड़ी थी कि वह खुद को इस खेल में इस्तेमाल हो जाने दिया, समझना थोड़ा मुश्किल है। क्या सैम की यह 'बढ़ईगिरी’ विकास को भी जातिगत शिनाख्त देने की दरकार को खतरनाक अंजामों तक ले जाने के लिए थी। राजीव गांधी के जमाने का आईटी 21वीं सदी के एक दशक बीतते-बीतते कहां पहुंच गई, आप नहीं समझ पा रहे तो राहुल बाबा से मिलें।

सोमवार, 21 जुलाई 2014

कश्मीरी आशा और बिग बी


कश्मीर का मुद्दा एक बार फिर गरमाया है। याद आता है तकरीबन तीन साल पहले का एक वाकया। अपने महानायक तब इंग्लैंड के दौरे पर थे। ऑक्सफोर्ड की लाइब्रेरी में मैग्ना कार्टा चार्टर देखकर अमिताभ बच्चन जब अभिभूत होते हैं तो अखबारों, टीवी चैनलों के लिए यह न छोड़ी जा सकने वाली खबर थी। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है कि पूरब में खड़े होकर कोई पश्चिम को सूर्य का घर माने और उसकी लाली से अपनी चेतना और इतिहास बोध को रंग ले।
दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र की उन जड़ों की जिसकी डालियों पर झूला डालने वाले परिदे आपको आज पूरी दुनिया में मिल जाएंगे। पर लोकतंत्र महज एक शासनतंत्र नहीं, एक जीवनशैली और मानवीय इच्छाशक्ति भी है। अगर यह बोध और सोच किसी को भावनात्मक अतिरेक लगे तो उसे भारत के पांच लाख से ज्यादा गांवों के सांस्कृतिक गणतंत्र की परंपरा से परिचित होना चाहिए। परंपरा का यह प्रवाह आज जरूर पहले की तरह सजल नहीं रहा, पर है वह आज भी कायम अपने जीवन से भरे बहाव के साथ।
अमिताभ बच्चन जब आधुनिक विश्व में लोकतंत्र के ऐतिहासिक उद्भव की गाथा को देख-सुनकर गदगद हो रहे थे, उसी समय देश के कुछ सूबों में पंचायत के चुनाव हो रहे थे। इन सूबों में जम्मू कश्मीर भी शामिल था। यह एक बड़ा अनुष्ठान था। लेकिन तब विधानसभा चुनावों, भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालती कार्रवाई और नागरिक समाज की मांगों और आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन के खात्मे के शोरगुल में इसकी तरफ कम ही लोगों का ध्यान गया। अलबत्ता स्थानीय लोगों की दिलचस्पी जरूर इसमें बनी रही।
दिलचस्प तो यह रहा कि अशांत घाटी में इन चुनावों का औपचारिक निर्वाह ही जहां बड़ी कामयाबी ठहराई जा सकती थी, वहां अस्सी फीसद तक मतदान हुए। यही नहीं बिहार जैसे सूबे में जहां पंचायत की परंपरा को ऐतिहासिक मान्यता हासिल है, वहां भी ये चुनाव तब संगीनों के साए में होने के बावजूद खून के छीटों से बचे नहीं रहे थे। जबकि जम्मू-कश्मीर में ये चुनाव तकरीबन शांतिपूर्ण संपन्न हुए थे।
दरअसल, पंचायत के बहाने इस चुनाव में घाटी के लोगों ने न सिर्फ लोकतांत्रिक सरोकारों की अपनी मिट्टी को एक बार फिर से तर किया बल्कि दुनिया के आगे यह साफ भी किया था कि उनका जीवन, उनका समाज, उनकी संस्कृति उतनी उलझी या बंटी हुई नहीं है, जितनी बताई या समझाई जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कहीं से मुमकिन नहीं था कि कश्मीरी पंडित परिवार की एक महिला उस गांव से पंच चुनी जाती, जो पूरी तरह मुस्लिम बहुल है। यहां विख्यात पर्यटन स्थल गुलमर्ग जाने के रास्ते में एक छोटा सा गांव है- वुसान।
आशा इसी गांव से पंच चुनी गई थी जबकि यहां से इस पद के लिए मैदान में उतरी वह अकेली कश्मीरी पंडित महिला थी। इस सफलता को आपवादिक या कमतर ठहराने वालों के लिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि घाटी से 199० के करीब दो लाख कश्मीरी पंडित परिवारों को पलायन करना पड़ा था। दुर्भाग्यपूणã है कि देश में संसदीय परंपरा के धुरर्Þ बिखेर देने वाली खबरें तो मीडिया की आंखों की चमक बढ़ा देती हैं पर इन परंपराओं की जमीन तर करने वाली खबरों पर हम गौर नहीं फरमाते।

शुक्रवार, 13 जून 2014

चोमस्की के मोदी विरोध का तर्क-कुतर्क


सोलह मई को 16वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव के नतीजे आए थे। उस दिन सबके अवाक रहने की स्थिति थी। विरोधी इस बात से हतप्रभ थे कि नमो का जादू इतना कारगर कैसे रहा, तो हिमयती इस बात पर दंग थे कि उम्मीद से बड़ी सफलता आखिर मिली कैसे। प्रतिक्रियों के इन अतिरेक के बीच एक खामोशी भी पसरी थी। समय और परिस्थिति के मुताबिक अपनी निष्ठाएं बदलने वाले बौद्धिकों को छोड़ दें तो कुछ ढीठ किस्म के प्रगतिशील ऐसे भी थे, जिनसे इस चुनाव परिणाम को देखकर कुछ बोलते नहीं बन रहा था। पर यह बोलती बंद की नौबत विचार परिवर्तन की चौखट को खटखटा नहीं सकी।
फिर क्या था कि जैसे-जैसे 16 मई पीछे छूटती गई, इन प्रखर जनों ने अपनी टेक नए सिरे से लेनी शुरू कर दी। बहुमत के आंकड़े को झुठलाया नहीं जा सकता और न ही लोकतंत्र में जनता की राय को लेकर आप सार्वजनिक तौर पर कोई नकारात्मक राय रख सकते हैं। पर विचार और तर्क की दुनिया में इससे बच निकलने के चोर रास्ते भी हैं। ऐसा ही एक चोर रास्ता खोला गया है विश्व प्रसिद्ध चिंतक, विचारक और भाषाविद नोम चोमस्की का नाम लेकर। चोमस्की ने भारत में नमो उदय को लेकर कुछ तीखी बातें कही हैं। खासतौर पर सोशल मीडिया पर वैचारिक वाम की अलंबरदारी करने वालों ने चोमस्की के बयान को आपस में खूब पढ़ा-पढ़ाया है। अब तो चोमस्की की टिप्पणी के साथ भाई लोग अपनी पूरक टिप्पणी भी जोड़ते चले जा रहे हैं। इस तरह एक बयान अब भरे-पूरे आख्यान की शक्ल लेता जा रहा है। आख्यान मोदी विरोध का, देश की राजनीति में मोदी के धूमकेतु की तरह उदय को लेकर जरूरी संशय का।
बहरहाल, इस बारे में आगे और बात करने से पहले यह देख लेना जरूरी है कि आखिर चोमस्की ने कहा क्या है। नोम चोमस्की के बयान से जुड़ी यह टिप्पणी देश के एक प्रगतिशील बौद्धिक के फेसबुक वाल से उठाई गई है। नाम का जिक्र इसलिए नहीं कि ऐसा किया नहीं जा सकता बल्कि इससे अनावश्यक एक ऐसे विवाद का जन्म होगा, जिसका चोमस्की के बयान प्रसंग को लेकर खड़ी हुई बहस से कोई सीधा लेना-देना नहीं है। फेसबुक पर जो टिप्पणी की गई है, वह कुछ इस तरह है-'नोम चोमस्की ने भारत के संभावित राजनीतिक परिवर्तन पर टिप्पणी करते हुए आज बोस्टन में कहा कि भारत में जो कुछ हो रहा है, वह बहुत बुरा है। भारत खतरनाक स्थिति से गुजरेगा। आरएसएस और भाजपा के नेतृत्व में जो बदलाव भारत में आने वाला है, ठीक इसी अंदाज में जर्मनी में नाजीवाद आया था। नाजी शक्तियों ने भी सस्ती व सिद्धांतहीन लोकप्रियता का सहारा लिया था। भाजपा ने भी वही हथकंडा अपनाया है। कांग्रेस पार्टी ही इन सबके लिए जिम्मेदार है। अब भारत के वामपंथी और प्रगतिशील शक्तियों को संगठित होकर इस चुनौती का सामना करना पड़ेगा। नोम चोमस्की आज शाम को कैंब्रिज पब्लिक लाइब्रेरी में अमेरिका की विदेश नीति पर अपना डेढ़ घंटे का भाषण दे रहे थे। इसके पश्चात उन्होंने अलग से मेरी अनौपचारिक संक्षिप्त बातचीत में अपनी यह प्रतिक्रिया व्यक्त की।’
अब कोई चोमस्की से यह पूछे कि लोग उन्हें एंटी-स्टैबलिशमेंट की पैरोकारी करने वाले तो मानते हैं पर लोकतंत्र विरोधी नहीं। फिर एक देश में चुनाव के जरिए बहाल हुई नई सरकार और उसके जरिए उभरे नए राजनीतिक नेतृत्व को वे इतने संशय की नजर से क्यों देख रहे हैं। क्या वैचारिक प्रखरता और प्रगतिशीलता की एक शर्त यह भी है कि वह हर उभार के खिलाफ हो। क्योंकि तभी विरोध को वैचारिक तौर पर वजनी माना जाएगा और उस पर चर्चा होगी।
नोम चोमस्की जिस देश से आते हैं और जहां उन्हें थिंक टैंक तो माना जाता है पर वहां भी वे मुख्यधारा के बौद्धिकों और विचारकों की अगुवाई नहीं कर सके। कहने को भले ऐसा करना उनकी महात्वाकांक्षा का हिस्सा न हो, पर उनके आलोचक तो इसे उनकी असफलता के तौर पर ही देखते हैं।
चोमस्की भारत को लेकर पहले भी विभिन्न मुद्दों पर अपनी बातें मुखरता से कहते रहे हैं। पर उनकी हालिया टिप्पणी से नहीं लगता कि वे भारत की राजनीतिक सचाई से पूरी तरह वाकिफ हैं। वाम की तरफ उनका झुकाव स्वाभाविक है पर भारत में वाम अपने गढ़ में ही ढह गया, इस स्थिति को समझने का विवेक वे नहीं दिखा रहे हैं। सोवियत संघ के विघटन के पुराने जिक्र को छोड़ भी दें तो भी चोमस्की यह बताने से तो बच ही रहे हैं कि बाजार के दौर में मनुष्य के अंदर उन्नति और विकास की एक नई सोच पैदा हुई है, उसके आगे कोई वैकल्पिक लकीर कैसे खिंची जाए।
बाजारवादी व्यवस्था के हिमायती भारत में भी बहुत लोग नहीं हैं। यहां तक कि नरेंद्र मोदी जिस पार्टी और विचारधारा से आते हैं, उसकी भी बुनियादी अवधारणा इसके खिलाफ है। पर इससे देश और समाज में विकास और उन्नति की जगी भूख और उससे पैदा लेने वाले नए तरह के राजनैतिक नेतृत्व का तकाजा कहां से खारिज हो जाता है।
चोमस्की की इस बात में जरूर थोड़ा दम है कि भारत में मोदी के उभार और कांग्रेस के बुरे हश्र को देखकर कई लोगों को यह लगता है कि देश में विचार और सत्ता से जुड़े तमाम सरोकार एकध्रुवीय न हो जाएं। एक अच्छे लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष का होना बहुत जरूरी है। असहमति के लिए लोकतंत्र में गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिए, यह क्रियात्मक रूप में भी सामने आना चाहिए।
वाम और क्षेत्रीय दलों के एक मंच पर आने की बात देश में चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान भी उठी पर कुछ भी ठोस सामने नहीं आया। अब एक ही उम्मीद है कि मोदी सरकार के काम करते कुछ दिन बीतते हैं तो फिर उनको लेकर सहमति-असहमति की सही जमीन चिह्नत होगी। इस इम्तहान में दोनों पक्षों को खरा उतरने की चुनौती होगी।
मोदी अभी देश में उम्मीद और भरोसे का नाम है। जिस तरह की स्थितियां पूरे देश में व्यवस्था से लेकर समाज तक है, उसमें रातोंरात कोई क्रांतिकारी बदलाव आसान बात नहीं होगी। यह बात उनके विरोधियों के भी समझ में आ रही है। पर विरोध के इस संभावित रकबे को घेरने के लिए उन्हें अभी थोड़ा धैर्य दिखाना होगा। यही नहीं उन्हें इस बीच जनता की अपेक्षाओं के मुताबिक अपनी राजनीति की बनावट को भी नए सिरे से गढ़ना होगा।
क्या चोमस्की की बातों पर उछाल भरने वालों को लोकतांत्रिक राजनीति की इस कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती मंजूर है। अगर हां, तो फिर यह उनसे ज्यादा इस महान लोकतांत्रिक मर्यादाओं वाले देश के हित में होगा और अगर नहीं, तो फिर यही साफ होगा कि बड़ी लकीर (मोदी) के आगे उससे भी बड़ी लकीर खींचना एक बात है और लकीर पीटते रहना दूसरी।
 

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

हांक का नहीं हुंकार का लोकतंत्र चाहिए


बिहार आंदोलन के दिनों में जेपी ने आंदोलनकारियों के लिए पहला कार्यक्रम दिया था मौन जुलूस का। जेपी इस मौन जुलूस के जरिए अपने आंदोलन की अहिंसक लीक को तय करना चाहते थे। हुआ भी ऐसा ही। संपूर्ण क्रांति आंदोलन के पुराने साथी बताते हैं कि मौन जुलूस से पहले रातभर इस बात के लिए छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथी मशक्कत करते रहे कि कल जब लोग मुंह पर पट्टी बांधे सरकार के खिलाफ उतरेंगे तो उनका संदेश क्या होगा। आखिरकार दो नारे तय हुए। पहला, 'क्षुब्ध हृदय, बंद जुबान’ और दूसरा, 'हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’ अगले दिन मौन जुलूस में शामिल होने वालों ने इन्हीं नारों की तख्तियां हाथों में उठा रखी थीं। 
दिलचस्प है कि जुलूस में सबको शामिल होने की इजाजत नहीं थी। इसके लिए एक फार्म भरना था, जिसके जरिए लोकतंत्र में अहिंसक संघर्ष के प्रति निष्ठा की घोषणा करनी थी। 
तब इस मौन जुलूस को कवर करने आए बीबीसी के संवाददाता मार्क टुली अपने अनुभव को शेयर करते हुए बताते हैं कि उनके लिए मुश्किल यह थी कि उन्हें रेडियो के लिए रिपोर्ट करनी थी। इसलिए विजुअल सपोर्ट उनके लिए था नहीं और रही बात जुलूस की तो वह मौन थी इसलिए किसी आंदोलनकारी से भी बात नहीं कर सकते थे। इस जुलूस में साहित्यकारों से लेकर सर्वोदयी जमात के कई बड़े नाम शामिल थे। लिहाजा, उन्हें सड़कों पर सिर झुकाए और मुंह पर काली पट्टी बांधे कतारबद्धबढ़ते देख आसपास के लोग भी काफी शांत थे। 
ऐसे में जुलूस की खबर रेडियो के श्रोताओं तक पहुंचाने के लिए टुली ने अपना माइक आंदोलनकारियों के पांव के करीब किया। जुलूस इतना अनुशासित थी कि तकरीबन एक साथ उनके कदम उठ और गिर रहे थे। यह आवाज कैमरे ने कैच की और कहा गया कि विरोध का संकल्प इतना अहिंसक, अनुशासित और धैर्य से भरा था, इसका अनुभव भारत गांधी के स्वाधीनता संघर्ष के बाद पहली बार कर रहा है। बाद में इस आंदोलन को दूसरी आजादी का आंदोलन कहा भी गया। 
कहने का कुल मतलब सिर्फ इतना कि विरोध और विकल्प की अहिसक राजनीति की बात करना आसान हो सकता है पर इस पर अमल खासा चुनौतीपूर्ण है। अण्णा के आंदोलन से निर्भया कांड तक देश की सड़कों पर जो गुस्सा फूटा उसमें नागरिक कार्रवाई के लोकतांत्रिक रास्तों के मुहाने नए सिरे से तो जरूर खोले पर साथ में कुछ सवाल भी खड़े किए। एक सवाल तो यही कि विचार और आचरण के साझे के बिना क्या कोई कार्रवाई विकल्प या बदलाव का आंदोलनकारी संकल्प बन सकती है। 
पिछले महीनों में टीवी पर होने वाली 'विंडो विमर्श’में विचारधारा के सवाल भ्रष्टाचार के विरोध की दरकार के सामने खारिज होते जा रहे हैं। अलबत्ता आम आदमी पार्टी की सियासी जमात में शामिल कुछ नेता जरूर इस तरह की बात कहने के बजाय गांधी-लोहिया और जेपी की वैचारिक विरासत और सीख की बात कहते हैं। पर ये बातें अब तक इस नई नवेली पार्टी की वैचारिक मन:स्थिति को तय करने में असमर्थ रही है। यह कमी कार्यकताã प्रशिक्षण आदि के स्तर पर भी देखी जा सकती है। 
किसी देश का लोकतंत्र अगर अपने शील-स्वभाव को लेकर ही दुविधा में हो तो यह कोई अच्छी स्थिति तो कतई नहीं है। ओपिनियन पोल से लेकर नेताओं के चुनावी दौरे में दस-दस लाख की भीड़ के जुटने की बातोंको लेकर जिरह करके हम देश के लोकतांत्रिक मानस को कोई सार्थक बनावट नहीं दे सकते। 
यहां एक और बात समझने की है कि सूचना का दौर दरअसल प्रचार का दौर है। प्रचार का सच अकसर 'बड़ा धोखा’ होता है। ओपिनियन पोल से लेकर वर्चुअल वर्ल्ड की दोस्ती और प्यार तक इस धोखे के आज हजारों अफसाने आपको मिल जाएंगे। धोखे के इस खेल में एक बड़ा रोल अदा किया है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने। तस्वीर और आवाज के मेल से जो चौबीसों घंटे हमारे जेहन में उतरता है, उससे ही हमारी सोच-समझ, हमारी मन:स्थिति आज कहीं न कहीं तय होने लगी है। ऐसे में सब कुछ एक दिशा में बढ़ता, एक रंग में रंगा अगर दिखने लगे तो फिर विकल्प, विरोध या बदलाव के लिए गुंजाइश कहां रह जाती है। 
हिंदी के एक बड़े साहित्यकार हैं। वे खूब टीवी देखते हैं और ज्यादातर हॉलीवुड की क्लासिक फिल्में। पर इस दौरान म्यूट का बटन दबाए रखते हैं। पूछने पर उन्होंने कहा कि ऐसा वह इसलिए करते हैं ताकि घटना को अपनी कल्पना और संवेदना के शब्द दे सकें। असल में यह टीवी के वायरल इफेक्ट को कम करने का प्रयोग तो है ही, अपनी सोच-समझ और कल्पना की स्वायत्तता को बहाल रखने की कोशिश भी। पर यह अवेयर एक्शन कितनों के वश की बात है। आमतौर पर तो लोग इस वायरल इफेक्ट से पीड़ित होकर ही खुश हैं। इस बार के आम चुनाव की 'लहर’ और 'डर’ के जरिए जो वायरल इमेज टीवी मीडिया के द्बारा खड़ी की जा रही है, वह वाकई काफी खतरनाक है। यह देश और समाज को सूचना और प्रचार के नाम पर वास्तविकता से काटने जैसा अपराध है। इस आपराधिक स्वीकृति के बाद जो इबारत तारीख के पन्नों पर दर्ज होगी, दरअसल वही इस चुनाव का हासिल होगा। एक बात और यह कि समर्थन को विरोध पर भारी बताना और बहुमत के आगे अल्पमत की दास जैसी स्थिति न तो लोकतंत्र का सही भाष्य है और न ही उसका अभ्यास। एक व्यवस्था को चलाने की दरकार के लिए बहुमत को जरूर नियामक संस्था या सरकार के गठन का अधिकार दिया गया है, पर इसका यह कतई मतलब नहीं कि इस संस्था की जवाबदेहियों के रकबे से विरोधी बाहर रहेंगे। दरअसल, लोकतंत्र में बहुमत का मतलब आगे बढ़कर सबको साथ लेकर चलने की पहल का नाम है, न कि जो छूट गए उन्हें यह एहसास दिलाने का कि विरोध का खामियाजा तो उठाना ही पड़ेगा। यों भी कह सकते हैं कोई व्यवस्था तब तक तानाशाही ही मानी जाती है,जब तक एक हांक पर सब कुछ चलता है। हांक के खिलाफ हुंकार भरने के जज्बे का नाम ही लोकशाही है। इसीलिए पश्चिमी अवधारणा में जहां डेमोक्रेसी की कार्यकारी बनावट को पिरामिड की शक्ल में दिखाया गया है, वहीं गांधी ने इसके लिए ओसएनिक सर्किल की बात कही। यानी हर लहर अगली लहर को जन्म दे और इस तरह व्यक्ति से समष्टि की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया न सिर्फ संवेदनशील हो बल्कि बिंदु से लेकर सिंधु तक सभी इसमें अपने को महत्वपूर्ण मानें। 
बहरहाल, आज की विद्रूपताओं को देखते हुए ये तो काफी दूर की बातें हो गईं, अभी तो इम्तिहान सिर्फ इस बात का है कि मेल जोल व गठबंधन के दौर की भारतीय राजनीति और उससे शक्ल लेने वाला लोकतंत्र महज एक हांक से चलेगा या ललकारी हुंकार से। 


बुधवार, 9 अप्रैल 2014

रायबरेली में अजय

 प्रेम प्रकाशअनजाने वे कल भी नहीं थे पर अब अचानक चर्चित हो गए हैं। टीवी चैनलों पर बैठकर इंटरव्यू दे रहे हैं। गूगल सर्च इंजन पर उनके नाम के साथ रायबरेली जोड़ दें तो 65 हजार से ऊपर वेब पेज खुल जाते हैं। भारतीय विज्ञापन की दुनिया के पुरोधा कहे जाने वाले एलेक पद्मसी के शब्दों में कहें तो यह लाइफ का एक ऐसा टर्न है जिससे आपकी शख्सियत का टर्नओवर आसमान छूने लगता है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं जाने-माने वकील अजय अग्रवाल की। इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें रायबरेली से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ उतारा है। भाजपा का यह फैसला सोनिया के लिए कितनी चुनौती भरा है, इसके विश्लेषण की बहुत दरकार नहीं है। अन्य पार्टियां भी अजय की उम्मीदवारी को सोनिया के खिलाफ बहुत गंभीरता से नहीं ले रही हैं। पर अगर बात करें अग्रवाल की तो वे रायबरेली के चुनाव में अभी से अपने को अजय मानकर चल रहे हैं।
दरमियाना कद-काठी। आमतौर पर मुखरता के साथ बातें करने वाले। पर आत्मविश्वास से ज्यादा बड़बोले अजय अग्रवाल रायबरेली की चुनावी जंग में उतरने से पहले तब-तब चर्चा में आते रहे जब-जब देश में भ्रष्टाचार का कोई मामला खुला। अपने करीबियों के बीच पीआईएल के चैंपियन माने जाने वाले अग्रवाल बोफोर्स स्कैंडल से लेकर अब्दुल करीम तेलगी के फर्जी स्टांप घोटाले तक में अदालत में याचिकाकर्ता हैं। बीते कुछ सालों में कई बार मीडिया की सुर्खियों में आए सीडब्ल्यूजी घोटाला और बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ ताज कोरिडोर मामले को भी अदालत तक ले जाने वाले वही हैं। उन्होंने सिर्फ इन मामलों पर अदालती कार्यवाही के रास्ते खोले बल्कि आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई को भी मुमकिन अंजाम तक पहुंचाकर दम लिया।
इस तरह से 49 बरस के अग्रवाल की एक इमेज भ्रष्टाचार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वाले एक योद्धा की भी बनती है। पर शायद खुद अग्रवाल को अपनी पहचान के इतने सीमित रकबे पर संतोष नहीं। तभी तो जैसे ही रायबरेली से उनके भाजपा कैंडिडेचर पर मुहर लगी, उनकी महत्वाकांक्षा सातवें आसमान पर पहुंच गई। मीडिया से बातचीत में उन्होंने सोनिया के खिलाफ अपनी जीत को तो पक्का माना ही, यह भी कह डाला कि उनके चुनावी मैदान में उतरने से जो एक पॉलिटिकल वाइब्रेशन हुआ है, उसमें भाजपा यूपी में 5० से 6० सीटें तक अपनी झोली में डाल सकती है। दिलचस्प है कि अग्रवाल आज पॉपुलरिटी चार्ट में अपनी मौजूदगी से भले गद्गद हों पर उनकी इस तरह की बड़बोली प्रतिक्रियाएं उनके व्यक्तित्व के हलकेपन को जाहिर करती हैं।
अजय अग्रवाल लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व एसिस्टेंट प्रोफेसर चंद्र प्रकाश अग्रवाल के बेटे हैं। चंद्र प्रकाश आरएसएस से जुड़े रहे। वे भूतपर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा से सीनियर थे। जाहिर है कि अजय अग्रवाल को अपने घर-परिवार से एक ऐसी विरासत तो मिली ही, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र में लोकप्रिय होने की ललक उनके अंदर स्वाभाविक तौर पर पैदा होती। अस्वाभाविक संघ और भाजपा से उनकी नजदीकी भी नहीं, क्योंकि पिता के कारण यह उनके लिए सबसे सुलभ राह थी। यूपी के शाहजहांपुर और मुरादाबाद से निकलकर अग्रवाल आज एक जुआरी की तरह उस मैदान में उतर गए हैं, जहां दांव अगर थोड़े भी ठीक पड़े तो फिर बल्ले-बल्ले। राजनीति की माया है ही ऐसी।
बात करें सोनिया से अग्रवाल के मुकाबले की तो इसकी पटकथा बहुत नई भी नहीं है। बोफोर्स दलाली के खिलाफ जब वे अदालती लड़ाई लड़ रहे थे तभी से कहीं न कहीं कांग्रेस अध्यक्ष उनके निशाने पर रहीं। इस सौदे में हुए भ्रष्टाचार की सीधी आंच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक पहुंची थी। यही नहीं, इस घोटाले के सीधे तार सोनिया से जुड़े होने का दावा किया गया था। इसी कारण से अग्रवाल कहते भी हैं कि सोनिया के खिलाफ उनका संघर्ष आज का नहीं बल्कि सालों पुराना है। बहरहाल, यह देखना तो वाकई दिलचस्प होगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष के खिलाफ उतरने वाले अग्रवाल रायबरेली के चुनाव को एकतरफा से दोतरफा बनाने में कितने कामयाब होते हैं।
 

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

लोकतांत्रिक मर्यादा को जीत-हार में न बांटें

अब तक के जितने ओपिनियन पोल आए हैं उसमें बिहार में नीतीश कुमार का ग्राफ गिरता दिख रहा है। जदयू के भाजपा से अलग हो जाने के बाद नीतीश और उनके साथियों ने भले जो भी सोचा हो पर अब कहीं न कहीं इस फैसले को लेकर उनकी मुखरता फीकी पड़ी है। अलबत्ता यह चुनाव नतीजे बताएंगे कि बिहार में कौन कितने पानी में है।
बहरहाल, इस सियासी जोड़-तोड़ से बाहर एक बात, जिस पर नीतीश इन दिनों खासा जोर दे रहे हैं। वे कहते हैं, गठबंधन राजनीति के दौर में किसी को यह कहने का हक नहीं है कि उसके पक्ष में हवा बह रही है। यह गठबंधन के दौर में प्रकट हुए समावेशी जनादेश की कहीं न कहीं अवमानना है। इस मुद्दे पर चर्चा महज इसलिए नहीं कि इसे बिहार के मुख्यमंत्री रेखांकित कर रहे हैं बल्कि इसलिए कि यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर वाकई विचार होना चाहिए। यही नहीं, इस विमर्श में राजनीति व समाज के सभी वर्गों-इकाइयों में शरीक होना चाहिए। इस विमर्श से जुड़े दो-तीन प्रमुख प्रस्थानबिंदु हैं या यह कह लें कि सवाल हैं। एक तो यही कि 1989 के बाद से देश में किसी एक दल के बहुमत की सरकार नहीं बनी है।
इसी दौर में कांग्रेस और भाजपा ने अपने को बहुमत के बजाय सबसे बड़े दल होने की एक-दूसरे से होड़ लेने लगे। ऐसे में कोई दल या नेता यह कैसे कह सकता है कि उसके पक्ष में पूरे देश में हवा है। इसी तरह सामाजिक न्याय से शुरू होकर अस्मितावादी राजनीति ने जिस तरह भारत के संघीय ढांचे में राज्य सरकारों की भूमिका नए सिरे से रेखांकित की है, वह काफी महत्वपूर्ण है। दिलचस्प है कि इसी दौरान देश में विकास का उदार चरित्र देखने को मिला। नव-विकास के आंध्र से लेकर गुजरात मॉडल तक इसी दौरान सामने आए। इससे पहले तो चर्चा होती थी बस पंजाब-हरियाणा की हरित क्रांति की या फिर केरल में आए एजुकेशनल रिवोल्यूशन की।
इस तथ्य के बाद कोई यह कैसे आरोप लगा सकता है कि गठबंधन की मजबूरियों या अस्थिरता से देश में विकास पटरी से उतर जाता है। पर आज अगर देश की दोनों पार्टियां जनता को इस बात का खौफ दिखा रही हैं कि त्रिशंकु संसद चुनी गई या उन्हें सबसे ज्यादा सीटें नहीं मिलीं तो देश विकास के रास्ते से दूर हो जाएगा तो यह जनता को गुनराह करना नहीं है तो और क्या है।
भारतीय लोकतंत्र की प्रशस्ति गाने में हम काफी आगे रहते हैं। सबसे बड़ा, सबसे प्राचीन, सबसे सघन और सबसे कारगर अगर हमारा गणतंत्र है तो महज इसलिए नहीं कि इतिहास
के कुछ सुलेख उसके नाम दर्ज हैं बल्कि इसलिए कि बीते तीन दशकों में जब पूरी दुनिया में 'उदारता’ की स्वीकृति ने सबको एक छाते में आने के लिए मजबूर कर दिया, हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में आज भी विकल्प और विरोध की गुंजाइश बची हुई है। यही नहीं, ऐसा करते हुए जनता और सरकार के बीच रिश्तों को बुनने वाले बुनकर और करघे दोनों दक्षता से लगे हैं। विकास के क्षेत्र में सर्व समावेशी के तकाजे को समझने के लिए अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अगर मजबूर होना पड़ा तो भी इसलिए कि देश में वर्ण, जाति और धर्म से शुरू होने वाली विविधता सोच और विचार के स्तर तक पहुंचती है।
यह अलग बात है कि प्रतिविचारों
और प्रतिधारणाओं के बीच सामंजस्य की ताकत का आज भी हम सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। अगर ऐसा होता तो फिर सियासी जमातों में सत्ता के वर्चस्व की ललक नहीं जगती बल्कि विरोध और अस्वीकार को जीवित रखने के लिए भी वे इतने ही संकल्पित दिखाई देते।
समकालीन राजनीति में इस जुमले को बार-बार उछाला जाता है कि राजनीति तो सत्ता को पाने के लिए ही होती है। जबकि यह सरासर गलत है। बात देश की लोकतांत्रिक विरासत की हम पहले कर चुके हैं, इसलिए इस मुद्दे पर कौटिल्य की एक सूत्रोक्ति का स्मरण जरूरी है। कौटिल्य कहते हैं विरोध की पतवार थामने वाले ही अपनी नाव को मनमुताबिक दिशा में मोड़ सकते हैं। चाणक्य ने ऐसा करके भी दिखाया। विरोध की रणनीति से ही चंद्रगुप्त मगध की सत्ता तक पहुंचा। यही नहीं, इस रणनीति में 'विरोधों का सामंजस्य’ किस तरह समर्थन की 'एकाधिकारवादी सत्ता’ के दंभ से टकराती है, उसे चकनाचूर करती है, इन बातों की गवाही इतिहास देता है।
इसी तरह संख्याबल को सत्ता का
औजार मानना लोकतंत्र की एक स्थिति में तो सही है पर इससे लोकतांत्रिक अवधारणा की दरकार को नहीं समझा जा सकता है। थोड़ा और पीछे लौटें तो महाभारत के कुछ सबक सामने आएंगे। एक पक्ष जिसके पास सामथ्र्य और सत्ता दोनों थी, वह सत्य के आग्रह
के सामने घुटने टेकता है। गांधीवादी मुहावरे
में कहें तो सत्य के लिए जरूरी नहीं कि वह सत्ता के शिविर में ही वास करे बल्कि सत्य तो वहां टिकता है जहां नीयत और इरादे कल्याणकारी होते हैं।
अब सोलहवीं लोकसभा के लिए प्रथम चरण का मतदान शुरू होगा। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस दौरान तमाम छोटे-बड़े मुद्दों को जनता के सामने रखा है। इस दौरान वादे-इरादे और नीयत की भी बात कही गई है। पर इस सबके बीच यह बात खटकती है कि विरोध और अस्वीकार के जोखिम के साथ कोई नहीं बढ़ना चाहता। सबने सत्ता का बीजमंत्र ही जपा है। ऐसे में यह जनता के विवेक पर है कि वे अपनी परंपरा और संस्कार से आए लोकतांत्रिक सबकों को कैसे अपने निर्णय में बदलती है। जाहिर है, गठबंधन के दौर की राजनीति की या तो एक और गांठ जनता इस बार खोलेगी या फिर वह देश की सियासी जमातों को कुछ अलग तरीके से आईना दिखाएगी। इस लिहाज से जब सोलहवीं लोकसभा बैठेगी तो उसका कंपोजिशन देखना होगा और तब समझ में यह बात आएगी कि
इस चुनाव से देश में लोकतंत्र की जड़ें पहले से और मजबूत हुई हैं या कमजोर।
आखिर में एक बात और यह कि सूचना क्रांति के प्रतापी दौर में लोकतंत्र का चुनावी भाष्य करने वाले पंडित आपको आज हर जगह बैठे मिल जाएंगे, टीवी चैनलों से अखबारों तक। पर इनमें से बहुत कम ऐसे हैं जो बहुमत-अल्पमत, पक्ष-विपक्ष और वोट शेयर से आगे की बात करते हैं। लोकतंत्र के महायज्ञ में जनता जिन संस्कारों की समिधा लेकर उतरती है, उसे ज्यादा धुली और आग्रहहीन आंखों से देखे जाने की जरूरत है।
जीत और हार के बीच एक तीसरी
रेखा भी जनता हर चुनाव में खींचती है, जिससे पक्ष और विपक्ष दोनों को एक ही अनुशासन में बांधा जा सके। कहने की जरूरत नहीं कि यह अनुशासन व्यापक जनहित का है, लोककल्याण का है।
 

मंगलवार, 25 मार्च 2014

कहां खो गए समर्थन और विरोध के तकाजे


भारतीय गणतंत्र के जब पचास साल पूरे हुए थे तो देशभर में इसको लेकर कई कार्यक्रम हुए थे। ऐसे मौकों को एक पवित्रवादी आग्रह के साथ मनाने की भारतीय परंपरा काफी पुरानी है। गांधी जयंती से लेकर हिंदी दिवस तक ऐसे कई उदाहरण हैं। अलबत्ता ये उदारहरण अपने प्रदेयों और उपोयिगता को लेकर कितने बहुमूल्य हैं, यह भी हम जानते हैं। गणतंत्र के स्वर्णिम सर्ग में दर्ज होने के लिए संसद भी अलग से बैठी। तत्कालीन सांसदों ने लंबी-लंबी तकरीरें कीं। कुछ ने नए संकल्प लिए तो कुछ ने पुराने सबक दोहाराए।
यह अलग बात है कि माननीयों को न तो सबक भूलने में देर लगी और न संकल्प। उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर भारतबाला प्रोडक्शन ने एक छोटा सा एडनुमा कार्यक्रम बनाया था, बमुश्किल 3० सेकेंड का। इसमें टीवी स्क्रीन पर एक-एक शब्द करके एक वाक्य उभरता है- चलो हम इस बात पर सहमत हैं कि हम एक दूसरे से असहमत हैं। इसके थोड़े अंतराल के बाद दूसरा वाक्य- असहमति पर सहमति लोकतंत्र की नींव है। अब जबकि 16वीं लोकसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है तो इन दो पुराने उल्लेखों से कुछ बातें नए सिरे से समझी जा सकती हैं।
हिंदी साहित्य के प्रखर आलोचक और इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल कविता में विरोधों के सामंजस्य की बात करते थे। कविता संवेदनाओं का लोकतंत्र है। इसलिए विरोधों के सामंजस्य की दरकार को एक लोकतांत्रिक दरकार ठहराया जा सकता है। पक्ष और विपक्ष के बीच तटस्थ जैसी स्थिति को न तो महाभारत में कृष्ण ने स्वीकार किया और न ही आधुनिक लोकतंत्र में इस स्टैंड को राइट एप्रोच माना
गया। अलबत्ता देश में अस्मितावादी राजनीति के दौर-दौरे के बीच विरोध से ज्यादा अंतर्विरोध की राजनीतिक ध्वनियों ने लोकतांत्रिक स्पेस को भरा।
बहरहाल, लोकसभा चुनावों में उतरने की पार्टियों और उनके नेताओं की तैयारियों को देखें तो कुछ बातें अभी से साफ हो गई हैं। भले लोकतंत्र के सुलेखवादी विमर्श में हम लाख बातें कहें-समझें पर सत्ता की राजनीति ने समर्थन और विरोध के बीच की लक्ष्मणरेखा को कब का अमान्य कर दिया है। यह सब हो रहा है जीत और सत्तारोहण के गणित के नाम पर। बाजार ने हमें बीते दो दशकों में सिखाया कि जेब में जिसके पैसा है, उसके लिए ही दुनिया है और अब राजनीति हमें सीखा रही है कि जो जीते वही सिकंदर। यानी विरोध का मतलब
अगर हार है तो ऐसा विरोध त्याज्य है। इसी
तरह समर्थन का अर्थ सत्ता नहीं तो फिर ऐसे समर्थन की दरकार और सरोकार दोनों ही बेमानी हैं।
दिल्ली की एक लोकसभा सीट से इस बार आम आदमी पार्टी की तरफ से राजमोहन गांधी चुनाव लड़ रहे हैं। वे काफी विनम्र और विज्ञजन हैं। पर राजनीति तो शुरू ही मजबूरी से होती है। आम आदमी पार्टी में शामिल होने से पहले उनका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक बयान आया था। तब मोदी को भाजपा ने अपना पीएम कैंडिडेट नहीं बनाया था। राजमोहन ने मोदी का बहुत नामोल्लेख तो नहीं किया पर दुनिया की सबसे ऊंची सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा बनाने के उनके अभियान पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस अभियान से एक वर्टिकल होड़ शुरू होगी अपने-अपने नेताओं और प्रतीक पुरुषों की भव्य प्रतिमा स्थापित करने की।
कुल मिलाकर सम्मान के नाम पर शुरू होने वाली इस प्रतियोगिता में क्षेत्र और समुदायों के बीच एक ऐसी हिंसक भिड़ंत होगी जो देश और समाज के लिए सर्वथा अनिष्टकारी होगी। राजमोहन के इस बयान की सराहना में भले बहुत हाथ तब नहीं उठे पर उनके विरोध में भी शायद ही कोई बयान आया। पर अब राजमोहन आप के नेता हैं। एक-दो महीने तक उनके विचारों का चरित्र जितना मुक्त था, अब शायद नहीं। तभी तो आप को लेकर और उसके नेता अरविंद केजरीवाल के उतावलेपन को लेकर वह कोई सीधी टिप्पणी करने से बचते हैं यानी उन्होंने जानबूझकर एक चुप्पी ओढ़ रखी है। यानी राजमोहन भी समझते हैं कि अभी जनता से वोट लेने की बारी है। सो अभी नापतौल कर बोलना होगा। समर्थन और विरोध की मुद्रा एकदम से तटस्थ हो गई है।
यह हमारे गणतंत्र का एक ऐसा विरोधाभासी सच है जो गणतंत्र के लिए समर्थन और विरोध की जरूरी दरकार को ही खारिज करते हैं। राजमोहन गांधी का नाम इसलिए नहीं कि वे इसके कोई बहुत बड़े कसूरवार हैं बल्कि इसलिए कि उनके जैसा समझदार और चारित्रिक सुदृढ़ता वाला व्यक्ति भी भारतीय गणतंत्र के इस अंतरविरोध को चुनौती
देने में संकोच करता है। उन्हें छोड़ दें फिर तो राहुल गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक और दिग्विजय सिंह से लेकर जगदंबिका पाल तक, सभी समर्थन और विरोध के अपने एजेंडे को जब जैसे चाहें बदल देते हैं, रद्द कर देते हैं। सामान्य समझ में यही तो है मौकापरस्ती की राजनीति।
इस बार के चुनावों को लेकर कहा जा रहा था कि ये देश में कुछ मुद्दों को लेकर राजनीतिक जमीन को इतनी ठोस कर देंगे कि अगले कुछ दशकों की देश की राजनीति इसी जमीन पर होगी। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार को माना जा रहा था। जनता से राजनीतिक विमर्श करने वाले सभी लोग इस बात को अपने-अपने तरीके से मान रहे थे। यहां तक कि हाल तक के ओपिनियन पोल में भी भ्रष्टाचार को बड़ा चुनावी मुद्दा माना गया।
पर अगर दलों के टिकट वितरण के आधारों को देखें या फिर दल छोड़ने व नए दल
में शामिल होने के कारणों को देखें तो कम से कम भ्रष्टाचार कहीं से कोई मुद्दा नहीं है। इसी के साथ भ्रष्टाचार के समर्थन और विरोध को लेकर अंतिम रूप से लकीर खींचने की संभावना भी क्षीण हो गई, जिसे लेकर काफी उम्मीदें थीं।
अब ऐसी स्थिति में चुनावी राजनीति से इतर मौकों पर राजनेताओं की उन तकरीरों का क्या, जिसमें देश की लोकतांत्रिक महानता को बनाए और बचाए रखने के लिए खूब सारी बातें होती हैं, शपथें होती हैं। इसी तरह लोकतंत्र की अवधारणा को साफ करने वाली उन बुनियादी बातों का भी क्या जिसमें समर्थन और विरोध के बीच दुराव के बजाय समन्वय की तो बात होती है पर किसी मुद्दे को लेकर तटस्थतावादी घालमेल की कोई गुंजाइश नहीं। मुद्दा भ्रष्टाचार का हो, महंगाई का हो, चुनाव सुधार का हो या फिर विकास का, नहीं लगता कि जनता इस चुनाव में यह निर्णय ले पाएगी कि वह किस मुद्दे पर किसके साथ जाए और किसके विरोध में। जनता की यह मुश्किल ही आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसी स्थिति में इस बार के चुनावों में तारीख के हर्फ कितने बदलेंगे, कहना मुश्किल नहीं।
 

बुधवार, 19 मार्च 2014

बेल्लारी की चुनावी सुषमा


बेल्लारी लोकसभा सीट 13वीं लोकसभा चुनावों के दौरान अचानक काफी चर्चा में आ गई और पूरे देश की निगाहें यहां के चुनावी नतीजे पर आकर ठहर गईं। दरअसल, यहां से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चुनाव लड़ने का एलान किया और उनके इस फैसले को भाजपा ने चुनौती देने की ठान ली। दिलचस्प है कि यह सोनिया का पहला चुनाव था। इस चुनाव में भाजपा ने अपनी तेज-तर्रार नेता सुषमा स्वराज को सोनिया के खिलाफ उतारने का फैसला किया। देखते-देखते यह मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन गया। भाजपा इस चुनाव को रणनीतिक तौर पर देख रही थी। क्योंकि अगर सोनिया वहां से चुनाव हार जातीं तो उनका पॉलिटिकल करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता। इसके उलट सुषमा इसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी लोकप्रियता के बड़े मौके के रूप में देख रही थीं। सोनिया को हराने के लिए जनता दल और कुछ दूसरे दलों ने भी सुषमा का साथ दिया।
भाजपा ने इस चुनाव में स्वदेशी बनाम विदेशी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। बेल्लारी के वोटरों को यह बात रेखांकित करके बताई गई कि इंदिरा गांधी की बहू और राजीव गांधी की पत्नी इटली की रहने वाली हैं। भाजपा को सोनिया के विदेशी होने का मुद्दा सूट कर रहा था और वह इसी मुद्दे पर सोनिया को घेर रही थी।
1952 से यहां महज दो बार कांग्रेस हारी थी। यही देखते हुए सोनिया को बेल्लारी एक सुरक्षित सीट लगी और वह यहां से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गईं। बहरहाल, सुषमा इस चुनाव में सोनिया से हार गईं। अलबत्ता उन्होंने यहां मुकाबले को जरूर दिलचस्प स्थिति में ला दिया था। उन्होंने सोनिया को घेरने के लिए बेल्लारी के गांवों-कस्बों की खूब खाक छानी। यहां तक कि उन्होंने कन्नड़ भी थोड़ी-बहुत इस दौरान सीख ली।
इसके जवाब में राहुल गांधी और खासतौर पर प्रियंका गांधी ने सोनिया के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी। एक बात और यह कि सोनिया बेल्लारी के अलावा उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से भी चुनाव मैदान में उतरी थीं। उन्हें दोनों जगह से जीत मिली। हालांकि बाद में उन्होंने बेल्लारी की सीट से इस्तीफा दे दिया था।
 

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

संभावित बदलाव के साथ नई राजनीति का दौर

इस बार के लोकसभा चुनाव में फैसला महज इस बात का नहीं होगा कि दिल्ली में सरकार कौन बनाएगा, बल्कि यह चुनाव देश की राजनीति को भी नए निकष पर कसने जा रहा है। यह इस लिहाज से जरूरी भी है कि बीते कुछ दशकों में जनता को राजनीतिक विचारधारा और उसके प्रति दिखाई जाने वाली प्रतिबद्धता के नाम पर खतरनाक तरीके से बहलाया-भड़काया और बांटा जाता रहा है।
दरअसल, देश की राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व के खिलाफ आई गैरकांग्रेसवाद की डॉ. राममनोहर लोहिया की अवधारणा के बाद जिस तरह सेक्यूलर और अस्मितावादी राजनीति ने अपना रकबा बढ़ाया, उसने भारतीय राजनीति के अखिल चरित्र को क्षेत्र, जाति और वर्ग के खांचों में पूरी तरह बांटकर रख दिया। सोशल इंजीनियरिंग की सामयिकता और दरकार की वकालत करने वालों की नजर में लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक अन्याय के खिलाफ यह एक जरूरी राजनीतिक कार्रवाई है। पर यह कार्रवाई कई तरह की प्रतिक्रियावादी अनीतियों-कुतर्कों की जिस तरह शिकार हुई, वह काफी चिंताजनक है।
चिंता की इस जमीन को समझने के लिए खासतौर पर बीते दो दशकों में उत्तर प्रदेश में बसपा की राजनीति को देखा जा सकता है। दलित या बहुजन समाज की बात करने वाली पार्टी की नेता मायावती ने नई सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर ब्राह्मणों-क्षत्रियों सबके मंच पर गईं और अपने लिए वोट का जुगाड़ किया। बात बनी तो सनक इस तरह सवार हुई की बहनजी सरकार में आने पर सूबे में कई जगहों पर करोड़ों रुपयों की लागत से अपनी मूर्तियां लगवाने लगीं। इसी तरह की राजनीति अपनी-अपनी सुविधा से बिहार में लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान करते रहे हैं। थोड़े किंतु-परंतु के साथ इस सूची में आप चाहें तो नीतीश कुमार को भी गिन सकते हैं।
अब जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव के दिन करीब आते जा रहे हैं अस्मितावाद के नाम पर क्षेत्रवाद की राजनीति करने वालों के पांव के नीचे से जमीन खिसकती जा रही है। इस स्थिति को और समझने के लिए आपको मायावती के पिछले दिनों आए उस बयान पर गौर करना होगा, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए सांप्रदायिकता विरोधी ताकतों की एकजुटता की बात की थी। बहनजी ने कितने दफे भाजपा के साथ आकर यूपी में सत्ता सुख भोगा है, यह कोई ज्यादा पुराना इतिहास नहीं है। अब जब उन्हें लग रहा है कि एक व्यक्ति गुजरात से निकलकर पूरे देश में विकास और देश के नवनिर्माण की बात कर रहा है तो उन्हेंयह खौफ खाए जा रहा है कि कहीं यह लोकप्रियता उनकी सियासी जमीन को ही न हड़प ले।
बात यूपी की निकली है तो राजनीति के पुराने पहलवान मुलायम सिंह यादव का भी जिक्र जरूरी है। अपनी सेक्यूलर छवि के लिए मुस्लिम तुष्टि की हर हद को छूने वाले नेताजी को इन दिनों सबसे ज्यादा आक्रोश इसी बिरादरी से देखने को मिल रहा है। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद 'मुल्ला मुलायम’ का सियासी तिलिस्म किस कदर दरका है, इसकी मिसाल है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जाने का दौरा नेताजी को रद्द करना पड़ा। वहां के छात्र उनके विरोध में सड़कों पर उतर आए थे। छात्रों का आक्रोश मुजफ्फरनगर दंगे को लेकर सपा सरकार के अगंभीर रवैए को लेकर था। दिलचस्प है कि यह वही विश्वविद्यालय है, जहां एक जमाने में मुसलमानों के सबसे बड़े रहनुमा के तौर पर मुलायम की आवभगत होती थी। इस सबसे घबड़ाए नेताजी सांप्रदायिकता का खौफ दिखाकर भरसक कोशिश कर रहे हैं कि मुसलमानों का साथ उन्हें फिर से मिल जाए। तीसरे मोर्चे का तंबू एक बार फिर तानकर वे आखिरी सियासी दांव चल रहे हैं। पर शायद अब बहुत देर हो गई है।
नया ताजा पॉलिटकल ड्रामा बिहार में खेला जा रहा है। उत्तर प्रदेश में दलित नेता उदित राज के भाजपा में शामिल होने के साथ ही खबर आई कि दलित राजनीति के पुराने सूरमा रामविलास पासवान भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ सकते हैं। इन दोनों खबरों ने हिंदी पट्टी में बीते कम से कम से कम दो दशकों से चली आ रही दलित राजनीति के अस्मितावादी तकाजे को एक तरह से अप्रासंगिक ठहरा दिया।
दिलचस्प तो यह रहा कि इस बड़े सियासी उलटफेर के साथ खबर यह भी आई कि बिहार में लालू यादव की राजनीति का लालटेन अचानक बुझने लगा है। एक जमाने में बैलेट बॉक्स से 'जिन्न’ निकालने का दावा करने वाले लालू प्रसाद यादव को अपनी ही पार्टी में
विरोध की आग को ठंडा करने में पसीना बहाना पड़ रहा है।
इन तमाम सियासी घटनाक्रमों को एक सीध में रखकर देखें तो कुछ बातों के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। पहला संकेत तो यही है कि गठबंधन राजनीति के दौर में क्षेत्रीय राजनीति की जो गुंजाइश बढ़ गई थी, वह अब सिमटती जा रही है। न सिर्फ यूपीए और एनडीए बल्कि अब देश की नई राजनीति कांग्रेस और भाजपा के दो ध्रुवों में बंटती नजर आ रही है। भारत की बहुलतावादी एकता के सूत्रों को समझने वालों की नजर में यह एक पॉजिटव पॉलिटकल डेवलपमेंट है।
इससे आगे की बात करें तो पूरे देश में नमो को लेकर आकर्षण है। इस स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पहले जो बात कांग्रेस के कुछ नेता अलग-अलग कह रहे थे, वह बात अब अरविंद केजरीवाल तक कह रहे हैं कि मोदी की कहीं न कहीं लहर तो जरूर है। हालांकि इसे समझने के लिए ग्राउंड रिपोट्र्स का ही भरोसा ज्यादा करना चाहिए क्योंकि ओपिनियन पोल्स पर नए स्टिंग ने इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठा दिए हैं।
अगर यह स्थिति वाकई है तो इसके चुनावी फलित को इस रूप में देखा जा सकता है कि इस बार मोदी की छतरी के नीचे कई ऐसे दल और नेता आ सकते हैं, जो अब तक दलित-पिछड़ा या सेक्यूलरवाद की आड़ में अपनी राजनीति खेलते रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो वाकई देश की राजनीति को देखने-समझने का पिछले दो-तीन दशकों का नजरिया बदल जाएगा। नए नजरिए में न तो कथित अस्मितावादी तकाजों के लिए कोई जगह होगी और न ही छद्म सेक्यूलरवाद के लिए कोई गुंजाइश।
यह नया बदलाव देश में राजनीति के तर्क को जहां और ठोस करेगा, वहीं पक्ष या विरोध की राजनीति के लिए स्टैंड लेने वालों को ज्यादा गंभीर लोकतांत्रिक विवेक दिखलाना होगा। अपने साढ़े छह दशक से भी लंबे सफरनामे के बाद अगर भारतीय राजनीति इस मुकाम तक पहुंची है, तो यह सचमुच काफी सुखद है। कह यह भी सकते हैं कि इस संभावित बदलाव के साथ देश में 21वीं सदी की नई राजनीति का दौर शुरू होगा।
 

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

खाकी पर भारी खादी

देश में इन दिनों सियासत खूब गरमाई हुई है। लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी दल ही सिर्फ अपने पत्ते फेंटने में नहीं लगे हैं बल्कि समाज के विभिन्न हिस्सों-तबकों में भी इसको लेकर दिलचस्पी खासी बढ़ गई है। सब कह रहे हैं कि इस बार का चुनाव देश की राजनीतिक धारा को वैकल्पिक मोड़ देगा, सो चुनावी मैदान में क्रांतिकारी मंसूबे के साथ कई अराजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग भी कूद रहे हैं। ऐसे ही नामों में एक बड़ा नाम है सत्यपाल सिंह का। सिंह ने अपनी सियासी पारी के लिए मुंबई पुलिस कमिश्नर के पद से इस्तीफा दे दिया है। माना जा रहा है कि वह भाजपा या आम आदमी पार्टी के टिकट पर अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर सत्यपाल सिह का कहना इतना भर है कि वह राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और विश्व शांति के लिए काम करना चाहते हैं। उनके ही शब्दों में, 'मैंने अभी यह तय नहीं किया है कि मैं किस पार्टी में शरीक होऊंगा। आपको दो से तीन दिन में इसके बारे में जानकारी मिल जाएगी।’ वैसे सत्यपाल भले अपने मुंह से कुछ न कहें पर उनको लेकर कयासबाजी खूब चल रही है। सूत्रों की मानें तो वे भाजपा के टच में हैं और पार्टी उन्हें उत्तर प्रदेश के मेरठ या बागपत सीट से लोकसभा उम्मीदवार बना सकती है। बता दें कि इससे पहले उन्होंने इशरतजहां एनकाउंटर केस में गुजरात हाईकोर्ट की एसआईटी की अगुवाई करने से इनकार कर दिया था।
इन संभावनाओं को पर लगने के पीछे कुछ और वजहें भी हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो पार्टी के बड़े नेताओं के साथ सिह की बातचीत पहले ही हो चुकी है। उनका भाजपा में शामिल होना तकरीबन तय है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पिछले दिनों उनकी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिह व पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ बातचीत हो चुकी है। इस बातचीत के बाद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को सिह से संपर्क साधने के लिए कहा था। सत्यपाल सिह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के भी करीबी बताए जाते हैं। वैसे उन्हें आम आदमी पार्टी से भी मुंबई से लोकसभा चुनाव लड़ने का ऑफर मिला है, ऐसी खबरें भी मीडिया के कुछ हल्कों में चल रही हैं।
29 नवंबर 1955 में मेरठ के बसौली में पैदा हुए सत्यपाल सिह की स्कूली पढ़ाई बागपत में हुई। इसके बाद उन्होंने मेरठ से रसायन विज्ञान में एमएससी और फिर एमफिल किया। रसायन शास्त्र के वैज्ञानिक बनने की ओर बढ़ रहे सिह पीएचडी करना चाहते थे, लेकिन अचानक उनका मूड बदल गया और उन्होंने आईपीएस की तैयारी शुरू कर दी। इस बीच वे ऑस्ट्रेलिया चले गए और वहां पर एमबीए करने लगे। एमबीए करने के दौरान भी उन्होंने आईपीएस बनने के लक्ष्य को छोड़ा नहीं। वापस भारत आए तो लोक प्रशासन में एमए किया और फिर इसी विषय में पीएचडी में दाखिला लिया। इसी दौरान उन्होंने आईपीएस की तैयारी तेज कर दी और परीक्षा पास कर ली।
सत्यपाल सिह महाराष्ट्र पुलिस में कई पदों पर रह चुके हैं। मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनाए जाने से पहले वह महाराष्ट्र के एडिशनल डीजीपी (लॉ एंड ऑर्डर) थे। इसके पहले वह पुणे और नागपुर के पुलिस कमिश्नर भी रह चुके हैं। इसके अलावा डेप्युटेशन पर वह सीबीआई में भी काम कर चुके हैं।
धर्म और अध्यात्म में तो खासतौर पर उनकी गहरी रुचि है। उन्होंने अध्यात्म व नैतिक मूल्यों पर कई किताबें भी लिखी हैं। पिछले साल उनकी किताब 'तलाश इंसान की’ का विमोचन अमिताभ बच्चन और जावेद अख्तर ने किया था।
बहरहाल, एक बात तो तय है कि सिंह ने जिस उम्मीद के साथ अपनी सियासी पारी खेलने का मन बनाया होगा, उसके पूरे होने के इस बार के लोकसभा चुनाव में आसार काफी हैं। अलबत्ता यह इस बात पर जरूर निर्भर करेगा कि वह किस पार्टी का झंडा थामते हैं। एक बात और यह कि सत्यपाल सिंह जैसे लोग अगर सियासी मैदान में उतर रहे हैं तो इससे देश की राजनीति के साफ-सुथरा और प्रभावी होने के आसार काफी बढ़
गए हैं।

बुधवार, 15 जनवरी 2014

कई विधाओं की अकेली मल्लिका

मल्लिका साराभाई। इस नाम को लोग अलग-अलग वजहों से जानते हैं। जानने वालों के बीच उनकी छवि भी एकाधिक है। खुद मल्लिका भी अपनी शख्सियत के किसी एक रंग को नहीं बल्कि उन तमाम रंगों को पसंद करती हैं, जिनमें उनकी रुचि और इच्छा का इंद्रधनुषी मेल हो। यही वजह है कि कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम की कुशल नृत्यांगना के अलावा मल्लिका की ख्याति नाट्य कलाकार, अभिनेत्री, लेखिका, समाज सेविका तथा महिला असुरक्षा और सांप्रदायिकता जैसे ज्वलंत मुद्दों पर मुखरता के साथ सामने आने वाली एक प्रभावशाली महिला के रूप में भी है। मल्लिका अपनी इन तमाम दिलचस्पियों और खुबियों को एक शब्द में यह कहते हुए बयां करती हैं कि वे कुल मिलाकर एक कम्यूनिकेटर हैं। चूंकि वह खुद को एक बेहतर कम्यूनिकेटर के रूप में लोगों के सामने लाना चाहती हैं, इसलिए वह तमाम विधाओं में हाथ आजमाती हैं।
मल्लिका इन दिनों चर्चा में इसलिए हैं कि वे आम आदमी पार्टी में शामिल हो रही हैं। वह कह रही हैं कि देश में अब तक की राजनीतिक व्यवस्था और उसमें शामिल दल फेल साबित हुए हैं, लोगों की उम्मीद पर खरा उतरने में। यह जनता की उम्मीदों के साथ एक धोखे की तरह है। मल्लिका इससे पहले भी भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता विरोध के मुद्दे पर काफी मुखरता से पेश आई हैं। गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार से इसलिए उनका छत्तीस का संबंध है क्योंकि वह गुजरात दंगों को लेकर सरकार और प्रशासन की भूमिका के बारे में लगातार सवाल उठाती रही हैं।
मल्लिका की शख्सियत में जिस तरह की निर्भीकता और जीवंतता है, उसमें उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी काफी योगदान है। वह प्रसिद्ध नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई और ख्यातिलब्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई की बेटी हैं। नौ मई 1954 को को अहमदाबाद में जन्मी मल्लिका को घर में ही काफी सुसंस्कृत और सुशिक्षित माहौल मिला। आगे के जीवन में मल्लिका के जीवन में इसका असर देखने में भी आया। उन्हें नजदीक से जानने वाले भी कहते हैं कि उनके जीवन की कई छटाएं हैं। कभी तो वह अपनी बातचीत और पहनावे से एक अति आधुनिक महिला लगती हैं तो कभी परंपरा और संस्कृति के प्रति उनका प्रेम देखकर दंग रह जाना पड़ता है। एक समृद्ध और जानेमाने परिवार से ताल्लुक रखने वाले के बावजूद आमजन की चिंताओं से भी वह लगातार जुड़ी रही हैं। यही कारण है कि उनकी गिनती एक समर्पित समाज सेविका के रूप में भी होती है।
नृत्य कला और अभिनय के क्षेत्र में तो उनके दखल का लोगा सब मानते हैं। उन्होंने दुनिया के कई देशों में अपनी इस निपुणता से लोगों की सराहना बटोरी है। इसू तरह समानांतर सिनेमा में उनके योगदान को सभी रेखांकित करते हैं। कहकशां, कथा, मुट्ठी भर चावल, हिमालय से ऊंचा और सोनल उनकी यादगार फिल्में हैं। रंगमंच पर उनका अभिनय काफी सम्मोहन भरा रहा है। 1989 में जब वह सोलो परफार्मेंस के साथ 'शक्ति’ नाटक लेकर लोगों के सामने आईं तो उनकी प्रशंसा दर्शकों ने तो की ही, आलोचकों की नजर में भी खरी उतरीं। उन्होंने हर्ष मंदर की अनहर्ड वॉयसेज का नाट्य रुपांतरण 'अनसुनी’ नाम से किया। इसी तरह ब्रेख्त के एक नाटक का भी उन्होंने भारतीय संदर्भ में रुपांतरण किया।
बात करें राजनीति की तो इस क्षेत्र में मल्लिका का नाम तब अचानक पूरे देश में चर्चा में आ गया जब उन्होंने 2००9 में भाजपा के दिग्गज लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ गांधीनगर से चुनाव लड़ने का फैसला किया। विभिन्न क्षेत्रों में अपने अवदानों के लिए भारत सराकर की तरफ से पद्म भूषण सम्मान से नवाजी जा चुकीं मल्लिका साराभाई कई बार विवादों में भी फंसी है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है कबूतरबाजी का मामला। हालांकि मल्लिका का कहना है कि यह सब उनकी वैचारिक प्रतिब्धदता और मुखरता के कारण उनके खिलाफ एक साजिश भर है।
बहरहाल, मल्लिका साराभाई आज भी देश की उन गिनी चुनी शख्सियतों में शामिल हैं, जिनकी उपस्थिति को कहीं भी गरिमामय माना जाता है और जिनके विचार और काम के पीछे एक सार्थक तर्क होता है।

बुधवार, 8 जनवरी 2014

चुनाव महज मोदी और राहुल के बीच नहीं


नरेंद्र मोदी अगर 2०14 में देश के प्रधानमंत्री होते हैं तो यह अनिष्टकारी होगा। नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन के बाद हाल में मनमोहन सिंह इस बात को अलग-अलग तरीके से कह चुके हैं। इस सिलसिले में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता और रणनीतिकार योगेंद्र यादव के बयान का भी जिक्र जरूरी है। उनके कहने का तरीका थोड़ा भिन्न है। वे लोकसभा चुनाव को मोदी बनाम राहुल के तौर पर देखने पर ही लानत भरते हैं। उनका बयान अमत्र्य और मनमोहन के बयान के करीब से जरूर गुजरता है पर उसकी मंजिल कहीं और है। वे सिर्फ व्यक्ति केंद्रित राजनीति पर सवाल नहीं उठाते बल्कि साथ ही इस दरकार को भी तार्किक रूप से रेखांकित करते हैं कि लोकतंत्र में चुनाव का मतलब सीएम या पीएम चुनना भर नहीं है और न ही इस या उस पार्टी की हार भर है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो चुनाव उस महापर्व का नाम है, जिसमें देश और समाज का हर वर्ग बराबरी के साथ शिरकत करता है। यह शिरकत सरकार बनाने या गिराने से ज्यादा उस गुंजाइश को बहाल रखने के लिए अहम है, जिसमें एक समान्य जन भी अपने हाथ में सत्ता की चाबी संभाल सकता है। यही लोकतंत्र की महानता है, उसकी ताकत है।
बहरहाल, बात इस चर्चा के जरिए उस लोकतांत्रिक मानस की जिसमें बदलाव की बात आज हर तरफ हो रही है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की बनी सरकार ने इस बदलाव की संभावना को कहीं न हीं ज्यादा पुष्ट कर दिया है। देश में पिछले कम से कम तीन सालों के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में जनता की ताकत और उसका निर्णायक सहभाग कैसे सुनिश्चित हो, यह एक बड़ा मुद्दा बना है। बात विकास की हो, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य की हो तो स्थानीय जनता की जरूरत की सर्वोपरिता समझी जा सकती है। नागरिक समाज को खड़ा करने से निश्चित रूप से एक अनुशासित लोकतंत्र को खड़ा होने में मदद मिलेगी।
देश में अब तक आम आदमी पांच साल में एक बार मतदान की कतार में खड़ा होकर अपने लोकतांत्रिक अधिकार और कर्तव्य को पूरा करता रहा है। इससे आगे उसके करने और समझने की कोई गुंजाइश छोड़ी ही नहीं गई है। इस कारण सत्ता से जनता की दूरी बढ़ी है और सत्ता को लेकर एक अविश्वास का जनमानस भी बना है। ऐसी स्थिति लोकतंत्र की मौलिक अवधारणा के भी खिलाफ है। पिछले दिनों जन प्रतिनिधियों से लेकर संसद की सर्वोच्चता पर जब बहस छिड़ी तो मौजूदा राजनीति के माहिरों को यह काफी अखड़ा भी। भारत में जिस तरह का लोकतंत्र है और हमारा संविधान जिसकी व्याख्या करता है उसमें संसद निस्संदेह सर्वोच्च नियामक संस्था है। पर इससे यह आशय कैसे निकल सकता है कि संसद की यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है। और अगर जनता सर्वोच्च है तो फिर उसे अपनी यह सर्वोच्चता साबित करने का मौका पांच साल में महज एक बार क्यों मिले। लिहाजा, आज अगर इस सवाल को लोग लोकसभा चुनाव से पहले उठा रहे हैं कि देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, तो इसमें नामों को लेकर आग्रह-दुराग्रह तो दिख रहा है, पर यह सवाल कहीं पीछे छूट जा रहा है कि नामों और दलों की शिनाख्त के आधार पर देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए हो रही कोशिशों के सिलसिले को एक कारगर अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता है।
जेपी चौहत्तर आंदोलन के दिनों में बार-बार कहते रहे कि हमें 'कैप्चर ऑफ पॉवर’ नहीं बल्कि 'कंट्रोल ऑफ पॉवर’ चाहिए। घटनाक्रमों में तेजी से आए बदलाव के कारण जेपी का लोक समिति और लोक उम्मीदवार का प्रयोग बहुत कारगर नहीं हो सका। संपूर्ण क्रांति के शीर्ष व्याख्याकार आचार्य राममूर्ति ने भी माना कि चौहत्तर के लोकनायक के प्रयोग को महज सत्ता परविर्तन के तौर पर देखना, उन तमाम मुद्दों और संभावनाओं के प्रति अन्याय है, जिसने जनता को तब काफी मथा था। केंद्र में जनता सरकार का आना महज इसका प्रतिफल कतई नहीं था।
आज जब बात हो रही है 2०14 के लोकसभा चुनाव की तो इसमें पिछले कुछ सालों में नागरिक समाज की उस पहल का तो अक्श दिखना ही चाहिए जिसने लोकतंत्र की ज्यादा सार्थक व्याख्या और भूमिका के प्रति लोगों के बीच भरोसा जगाया, जिनका धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्थाओं और उसके निर्वाचन प्रक्रिया के प्रति ही मोहभंग होना शुरू हो गया था। आज मुद्दा यह नहीं है कि देश के अगले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होंगे या राहुल गांधी। न ही यह मुद्दा है कि अगली सरकार केंद्र में यूपीए की बनती है कि एनडीए की। यहां तक कि मुद्दा यह भी नहीं है कि गठबंधन राजनीति के दौर में कौन किस गोद से छिटककर किस गोद में जाकर बैठ जाता है। बल्कि मुद्दा तो यह है कि क्या आगामी लोकसभा चुनाव वैकल्पिक राजनीति की बढ़ी संभावना को बढ़ाता है कि नहीं,जनता और सरकार के बीच की दूरी कम होती है कि नहीं। देखने वाली बात यह भी होगी कि केंद्र में सत्तारूढ़ होने वाली पार्टी या उसका गठबंधन राजनीति को लोकनीति की तरफ ले जाने के लिए कितनी तत्पर दिखती है।
यहां यह साफ होने का है कि विकल्प और स्थानापन्न होने में फर्क है। कांग्रेस और भाजपा के बीच केंद्र के अलावा कई राज्यों में इतने भर का ही राजनीतिक संघर्ष है कि जनता अगर एक से दुखी होती है तो दूसरे को सत्ता सौंप देती है। ऐसा इसलिए नहीं कि जनता को इसके अलावा कुछ सूझता नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि उसके आगे चुनाव ही यही है कि वह इन दोनों में से किसी एक की तरफ जाए। यह तो विकल्प की नहीं बल्कि स्थानापन्नता की राजनीति हुई। मतदान के दौरान चुनाव के विकल्प से जनता को दूर रखने की जड़ता को जो राजनीतिक शक्तियां बहाल रखना चाहती हैं, वो इस लिहाज से तो कमजोर जरूर हैं कि वे अपने आगे किसी अपारंपरिक विकल्प के खड़ा होने से घबड़ाती है।
पारंपरिक राजनीति के प्रतिष्ठान कितना ढहते हैं, यह इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव का सबसे दिलचस्प प्रतिफल होगा। यह प्रतिफल ही यह तय करेगा कि इस देश की जनता अपने लिए और अपने नाम पर चलने वाले तंत्र को पराए हाथों से कितना अपने हाथों में ला पाती है। पंजाबी के क्रांतिकारी कवि पाश सबसे खतरनाक स्थिति उसे मानते हैं जब हमारे सपने मर जाते हैं। आने वाला लोकसभा चुनाव देश के जन, गण और मन के लिए सुखद ही होगा, खतरनाक नहीं ऐसी कामना है। भले अमत्र्य सेन या मनमोहन सिंह इस कामना पर भरोसा न करें। योगेंद्र यादव की कामना जरूर ऐसी दिखती है और न भी दिखती हो तो इस देश का आम आदमी तो 16वीं लोकसभा के गठन को इन्हीं कामनाओं से आकार लेता देखना चाह रहा है।