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सोमवार, 23 मई 2011

बाय-बाय ओबामा


भारत के लिए अमेरिका महज एक सुपर पावर नहीं, एक आईना भी है और एक सपना भी। आईना जिसमें खुद की साज-संवार देखकर मन अघाए और सपना इस मायने में कि हम सब अमेरिका जैसा होना या दिखना चाहते हैं, यह हमारा ख्वाब भी है और मंजिल भी है। पर इस अमेरिकान्मुख सोच और सचाई का दूसरा रुख भी है, जो खासा दिलचस्प है। भूले नहीं होंगे लोग अंकल सैम का वह गुस्सा जो उन्होंने अपने यहां के स्कूलों पर उतारा था। उन्होंने स्कूल मैनेजमेंटों को सरकारी फंडिंग बंद करने की धमकी दी थी क्योंकि वहां बच्चे लगातार अंग्रेजी में फेल हो रहे थे। कितना दिलचस्प है यह जानना कि एक देश जिसकी अंग्रेजी क्या, उसके बोलने तक का लहजा पूरी दुनिया में नकल की जाती हो, वहीं के बच्चे अंग्रेजी की परीक्षा तक न पास कर पाएं। मामला यहीं निपटता तो भी गनीमत थी, अमेरिका की इस स्थिति का लाभ उठाया कुछ भारतीय कोचिंग संस्थानों ने। उन्होंने सस्ते में ट्यूशन आउटसोर्स के जरिए अमेरिकी बच्चों को अंग्रेजी सिखाने का बीड़ा उठाया और यह धंधा रातोंरात चल निकला। 
दरअसल, यह एक शुरुआत थी भारत और अमेरिका में भीतरी तौर पर बदल रही स्थितियों की। गौरतलब है कि आईटी सेक्टर के जरिए जिस इकोनमी बूम ने रातोंरात भारतीय अर्थ जगत की तस्वीर बदल दी, उससे पहले का दौर भारतीय प्रतिभाओं के विदेश पलायन का था। भारतीय प्रतिभा का प्रतिस्पर्धी होना और यहां श्रम का सस्ता होना, दुनियाभर में इनके छाने और भाने का बड़ा कारण रहा है। पर अब सूरत बदल रही है। आलम यह है कि भारत को दुनिया की तरफ देखने के बजाय दुनिया को भारत की तरफ देखने की दरकार सामने आई है। यह नई और विश्व अर्थव्यवस्था में एक क्रांतिकारी स्थिति है।
असल में भारत और चीन ये दो ऐसे देश हैं, जिन्होंने अपनी आर्थिक कुव्वत को पिछले दशकों में जिस तर्ज पर बढ़ाया और मजबूत किया है, वह कई लिहाज से बाकी दुनिया से अलग है। एक तो इन दोनों देशों का विस्तार आबादी और क्षेत्रफल दोनों लिहाज से ज्यादा है, दूसरे ग्लोबल इकोनमी का फंडा यहां स्थानीय प्रभावों और बदलावों के बाद ही सरजमीं पर उतरा है। आलम यह है अमेरिका के राष्ट्रपति को अपनी राजनीतिक स्थिरता के लिए बार-बार अपने लोगों को इस मुद्दे पर भरोसे पर लेना होता है कि भारत और चीन के 'अर्थपूर्ण आकर्षण' से बचाव के लिए सख्त कदम उठाएंगे।
जाहिर है ऐसी सूरत में जब घर के हालात ज्यादा बेहतर और संभावनाओं से भरे दिख रहे हैं, परदेस का रुख करने वाली प्रतिभाओं की दर में तो गिरावट आएगी ही, पहले ही पलायन कर चुके लोगों की वापसी की रफ्तार भी बढ़ जाएगी। इस रुझान को तथ्यगत रूप में मान्यता दी है हाल में ही किए गए एक अध्ययन में। कॅाफमैन फाउंडेशन ने तीन अमेरिकी विश्वविद्यालयों हार्वर्ड, कैलिफोर्निया और ड्यूक की मदद से किए गए अध्ययन में पाया है कि दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति का की शिनाख्त पाने वाले अमेरिका को मौजूदा सूरत में भारी खामियाजा उठाना पड़ रहा है।
दिलचस्प है कि इस अध्ययन का शीर्षक ही है- 'स्वदेश वापसी करने वाले उद्यमियों के लिए वास्तव में भारत और चीन में घास अधिक हरी है'। यह अध्ययन कबूलता है कि एशिया के इन दो बड़े देशों में इन दिनों उद्यमशीलता की लहर चल रही है। किसी समय प्रतिभा पलायन से अपनी अंटी भारी करने वाली अमेरिकी कंपनियों के लिए यह स्थिति सीधे-सीधे गंगा के उलटी बहने जैसी है।
स्वदेश वापसी कर चुके 153  कुशल भारतीय और 111 चीनी कामगारों के बीच कराए गए सर्वेक्षण में तकरीबन आधे ने कहा कि वे अपने देश में अपनी कंपनी स्थापित करेंगे। यह अध्ययन वैसे यह तो साफ नहीं करता कि पिछले दिनों कितने कुशल कामगार स्वदेश लौटे हैं। वैसे इस बाबत इस अध्ययन से ही जुड़े एक लेखक विवेक वाधवा के दावों को अगर सही मानें तो पिछले दो दशकों में डेढ़ लाख लोग भारत और तकरीबन इतने ही लोग चीन वापस लौट चुके हैं। पिछले पांच सालों में इस रुझान में जबरदस्त तेजी दर्ज की गई है। वाधवा इस रुझान को आपवादिक नहीं मानते क्योंकि उनके शब्दों में अब झुंड के झुंड प्रतिभाए एक साथ अमेरिका को गुड बॉय कह रही हैं। कह सकते हैं कि प्रतिभाओं की पसंद और आकर्षण में आया यह बदलाव और कुछ नहीं सीधे-सीधे घर के हालात बेहतर होने के जीते-जागते सबूत हैं। आगे भी ये सबूत यों ही साबुत बने रहेंगे, अभी की सूरत में यही भरोसा भी है। 

गुरुवार, 19 मई 2011

बिग बी को बताओ, जीती कैसे आशा


ऑक्सफोर्ड की लाइब्रोरी में मैग्ना कार्टा चार्टर देखकर अमिताभ बच्चन जब अभिभूत होते हैं तो अखबारों, टीवी चैनलों के लिए यह न छोड़ी जा सकने वाली खबर होती है। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है कि पूरब में खड़े होकर कोई पश्चिम को सूर्य का घर माने और उसकी लाली से अपनी चेतना और इतिहास बोध को रंग ले। दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र की उन जड़ों की जिसकी डालियों पर झूला डालने वाले परिंदे आपको आज पूरी दुनिया में मिल जाएंगे। पर लोकतंत्र महज एक शासनतंत्र नहीं, एक जीवनशैली और मानवीय इच्छाशक्ति भी है। अगर यह बोध और सोच किसी को भावनात्मक अतिरेक लगे तो उसे भारत के पांच लाख गांवों के सांस्कृतिक गणतंत्र की परंपरा से परिचित होना चाहिए। परंपरा का यह प्रवाह आज जरूर पहले की तरह सजल नहीं रहा, पर है वह आज भी कायम अपने जीवन से भरे बहाव के साथ। अगर यकीन नहीं हो तो चलिए उस छोटे से गांव में जहां गणतंत्र आज भी सबसे बड़ी 'आशा' है, सबसे बड़ा यकीन है कल को आज से बेहतर होने का।
पिछले तीन दशकों में घाटी में उतनी बर्फ नहीं गिरी, जितनी आंच दिल्ली से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वहां के हालात को लेकर महसूस की गई। यह भारत की लोकतांत्रिक निष्ठा की कहीं न कहीं जीत ही है कि उसने अपने इस सबसे अशांत सूबे में भी लोकतांत्रिक शासन को लगातार बहाल रखा। जम्मू कश्मीर के हालात और राजनीति पर फारूख अब्दुल्ला ने कभी कहा था कि उनकी मजबूरी है कि वह हमेशा दिल्ली की सत्ता का साथ दें। पक्ष और विरोध के लोकतंत्र में दरअसल, यह तकाजा महज राजनीति का नहीं बल्कि उस तकाजे का भी है जो जम्मू कश्मीर को देश की मुख्यधारा के साथ एकमेक रहने की दरकार पेश करता है।  पिछले दिनों जब देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां चल रही थी, उसी दौरान जम्मू कश्मीर सहित कई प्रदेशों में लोकतंत्र का एक और बड़ा अनुष्ठान पंचायत चुनाव के रूप में चल रहा था। विधानसभा चुनावों, भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालती कार्रवाई और नागरिक समाज की मांगों और आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन के खात्मे के शोरगुल में इस अनुष्ठान की तरफ कम ही लोगों का ध्यान गया। अलबत्ता स्थानीय लोगों की दिलचस्पी जरूर इसमें बनी रही। दिलचस्प तो यह रहा कि अशांत घाटी में इन चुनावों का औपचारिक निर्वाह ही जहां बड़ी कामयाबी ठहराई जा सकती थी, वहां अस्सी फीसद तक मतदान हुए। यही नहीं बिहार जैसे सूबे में जहां पंचायत की परंपरा को ऐतिहासिक मान्यता हासिल है, वहां भी यह चुनाव संगीनों के साए में होने के बावजूद खून के छीटों से बचे नहीं रहे। वहीं घाटी की वादियों में ये चुनाव तकरीबन शांतिपूर्ण संपन्न हुए।

दरअसल, पंचायत के बहाने इस चुनाव में घाटी के लोगों ने न सिर्फ लोकतांत्रिक सरोकारों की अपनी मिट्टी को एक बार फिर से तर किया है बल्कि दुनिया के आगे यह साफ भी किया है उनका जीवन, उनका समाज, उनकी संस्कृति उतनी उलझी या बंटी हुई नहीं है, जितनी बताई या समझाई जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कहीं से मुमकिन नहीं था कि कश्मीरी पंडित परिवार की एक महिला उस गांव से पंच चुनी जाती, जो पूरी तरह मुस्लिम बहुल है। यहां विख्यात पर्यटन स्थल गुलमर्ग जाने के रास्ते में एक छोटा सा गांव है- वुसान। आशा इसी गांव से पंच चुनी गई है जबकि यहां से इस पद के लिए मैदान में उतरी वह अकेली कश्मीरी पंडित महिला थी। इस सफलता को स्थानीय, आपवादिक या कमतर ठहराने वालों के लिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि घाटी से 1980 में करीब दो लाख कश्मीरी पंडित परिवारों को पलायन कर जाना पड़ा था।
इस बार भी जब यहां पंचायत चुनाव चल रहे थे तो आतंकी धमकियां मिली थी पर यहां के लोगों ने तमाम उन मंसूबों को धूल चटा दिया, जो बंटवारे और कट्टरता की भड़काऊ बातें करते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि वुसान का संदेश घाटी के सच को नए पूर्वाग्रहरहित नजरिए से देखने की जरूरत को तो रेखांकित करेगा ही यहां से बही लोकतंत्र की धारा को देश की मुख्यधारा बनने की प्रेरणा भी देगा।  फिर फारूख साहब भी कहेंगे अपनी लोकतांत्रिक मजबूरी का रोना रोने की बजाय अपनी मजबूती का बखान करेंगे, सगर्व और खुशी-खुशी। 

रविवार, 2 जनवरी 2011

वर्षकाल


एक बिन धुले
निगेटिव की तरह
था साल दो हजार दस
कैमरे की कई बार की
क्लिक के बाद भी
तस्वीर की कल्पना भर
दृश्य का महज आभास भर

विदा होते हुए बरस यह
पूरी तरह धुल चुके मुकम्मल
कोडेक इमेज की तरह
कहां गलत थे पांव
किसे बस यों ही मान बैठे
अपना गांव
कहां पथ प्रशस्त
कहां दु:स्वप्न के झार-कांटे
कहां मनमौजी
जिद्दी आत्मघाती रास्ते

हाथ वह जो
कड़ी जोड़ने
हथकड़ी तोड़ने की तरह
राह जिसने संभव किया
समय का हृदय से जुड़ाव
एहसास के कुछ गिनेचुने पड़ाव
कुछ देर तक गुदगुदाते लम्हे 
कुछ दूर तक सिहरते घाव

अनुभवों की बारीक
कसीदाकारी
मां को लपेटे
जैसे व्रत की साड़ी
भेंट अंतिम यह
गुजरे एक पूरे वर्ष का
परिस्थिति वह तब की
स्थिति यह अब की

ध्वंस की राख
कि भभूतिया चमत्कार
छंट चुकी पूरी तरह
रात एक अबीरी
बढ़कर थाम रही
सुबह एक सिंदूरी
कुछ आधी-अधूरी बात
कुछ भरपूर जज्बात
एक पूरा वर्षकाल

बुधवार, 24 नवंबर 2010

ओबामा को क्यों चाहिए गांधी


अमेरिकी राष्ट्रपति का दौरा महज आर्थिक हितों से जुड़ा था या भारत के लिए इसके अन्य निहितार्थ भी थे।  बहस का यह आलम बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान या उसके बाद नहीं, उनके राष्ट्रपति चुनाव लड़ने और जीतने के समय से ही शुरू हो गया था। और इस सब की चर्चा सिर्फ भारत में ज्यादा रही हो ऐसा भी नहीं है। दिलचस्प है कि इस बारे में बताने या जताने की सबसे ज्यादा होड़ भी अमेरिकी मीडिया में ही दिखी। बहरहाल,  ओबामा का गांधी प्रेम जरूर एक ऐसा मुद्दा है, जिसने राष्ट्रपति चुनाव से लेकर विश्व शांति के अग्रदूत के रूप में नोबेल सम्मान से नवाजे गए इस बिरले राजनेता को न सिर्फ चर्चित बनाए रखा है बल्कि जब वह अपने हालिया भारत दौरे पर थे तो भी सबसे ज्यादा चर्चा इसी विषय को लेकर रही। देश के गांधीजनों से जब इस बाबत बात की गई तो उन्होंने ओबामा के गांधी प्रेम को सराहा तो पर वे इसे एक राष्ट्राध्यक्ष के ह्मदय परिवर्तन होने की कसौटी मानने को तैयार नहीं दिखे। दरअसल, जिन दो कारणों से ओबामा गांधी को नहीं भूलते या उन्हें याद रखना जरूरी मानते हैं, वे हैं गांधी की वह क्षमता जो साधारण को असाधरण के रूप में तब्दील करने व होने की प्रेरणा देता है और वह पाठ जो विश्व को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए निर्णायक तौर पर जागरूक होने की जरूरत बताता है।
वर्ष 2008 के शुरुआत में जब ओबामा अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए यहां-वहां चुनाव प्रचार कर रहे थे  तो उन्होंने एक लेख में लिखा, '...मैंने महात्मा गांधी को हमेशा प्रेरणास्रोत  के रूप में देखा है क्योंकि वह एक ऐसे बदलाव के प्रतीक हैं, जो बताता है कि जब आम लोग साथ मिल जाते हैं तो वे असाधारण काम कर सकते हैं।" अपनी भारत यात्रा की शुरुआत में उन्होंने एक बार फिर गांधी को भारत का ही नहीं पूरी दुनिया का हीरो बताया। दरअसल, 21वीं सदी में पूंजी के जोर पर विकास की जिस धुरी पर पूरी दुनिया घूमने को बाध्य है, उसमें भय और अशांति का संकट सबसे ज्यादा बढ़ा है। भोग और लालच की नई वैश्विक होड़ और मानवीय सहअस्त्वि का साझा बुनियादी रूप से असंभव है। इसलिए मौजूदा दौर में जिन लोगों को भी गांधी की सत्य, अहिंसा और सादगी चमत्कृत करती है, उन्हें गांधी की उस 'ताबीज" को भी नहीं भूलना चाहिए, जो व्यक्ति और समाज को हर दुविधा और चुनौती की स्थिति में 'अंतिम आदमी" की याद दिलाता है। लिहाजा, ओबामा का गांधी प्रेम शांति और प्रेम की अभिलाषी दुनिया की संवेदना को स्पर्श करने की रणनीति भर नहीं है तो दुनिया के सबसे ताकतवर कहे जाने वाले इस राष्ट्राध्यक्ष को अपनी पहलों और संकल्पों में ज्यादा  दृढ़ और बदलावकारी दिखना होगा। 9/11 के जख्म से आहत अमेरिका को अगर 26/11 का हमला भी गंभीर लगता है और आतंक रहित विश्व परिदृश्य की रचना उसकी प्राथमिकता में शुमार है तो उसका संकल्प हथियारों की खरीद-फरोख्त से ज्यादा मानवीय सौहार्द को बढ़ाने वाले अन्य मुद्दों पर होना चाहिए। इस बाबत अमेरिकी रक्षा मंत्री का हालिया बयान कि भारत उसका सबसे बड़ा रक्षा साझीदार है, परिवर्तन के कोई अच्छे संकेत नहीं देता। इस मामले में कुछ गांधीजनों की तरफ से आई यह प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण है कि गांधी की लोकप्रियता और उनकी प्रासंगिकता को ओबामा से जोड़कर देखना मुनासिब नहीं क्योंकि जब तक हिंसा और भय का आतंक देश-दुनिया को तबाह करता रहेगा गांधी की प्रेरणा और  उसकी जरूरत सभी को महसूस होती रहेगी। हां, ओबामा के बहाने ये प्रेरणा अगर पूरी दुनिया में और तेजी से फैलती है तो यह जरूर स्वागतयोग्य है। 

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

डेढ़ लाख का सपना और इराक वार


कोख के हिस्से आया यह एक और शोक, एक और त्रासदी है। इंदौर में सरोगेसी के धंधे का तब एक और सियाह चेहरा सामने आया जब पता चला कि भ्रूण हिंसा ने यहां भी अपनी गुंजाइश निकाल ली है। इस शहर की एक महिला सपना नवीन झा ने एक डाक्टर के मार्फत एक बड़े कारोबारी के साथ डेढ़ लाख रुपए में किराए की कोख का मौखिक करार किया। शर्त के मुताबिक अगर गर्भ ठहरने के तकरीबन ढाई महीने बाद करवाई गई सोनोग्राफी में गर्भ में लड़के की जगह लड़की होने का पता चलता है तो अबार्शन कराना होगा। जिसका खतरा था, वही हुआ भी। सपना को ढाई महीने बाद गर्भ गिराने के लिए तैयार होना पड़ा। पर उसे अफसोस इसलिए नहीं था क्योंकि ऐसा करने पर भी उसे 25 हजार रुपए की आमदनी हुई। सपना ने यह सब अपनी तंगहाली से आजिज आकर किया था, सो 25 हजार रुपए की आमद भी उसके लिए कम सुकूनदेह नहीं थी।
इस पूरे मामले का खुलासा जिस तरह हुआ, वह एक और बड़ी ट्रेजडी है। इस बारे में लोगों को पता तब चला जब सपना का नाम धार के पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष और कांग्रेस नेता कैलाश अग्रवाल हत्याकांड में उछला और वह पुलिसिया गिरफ्त में आ गई।  जिंदगी के इस खतरनाक मोड़ पर सपना ने आपबीती में  बताया कि वह मुफलिसी से लड़ते हुए कैसे कोख के सौदे और फिर भ्रूण हत्या के लिए तैयार हो गई। उसने बताया कि किराए का गर्भ गिराने के बाद वह एक बार फिर से अपनी कोख को किराए पर देने के लिए तैयार थी लेकिन ऐसा करने के लिए उसे कम से कम पांच महीने रुकना पड़ता। सपना दोबारा सरोगेट मदर बनने का सोच ही रही थी कि अग्रवाल हत्याकांड ने उसे जिंदगी के एक और खतरनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया।
इस पूरे मामले में एक खास बात यह भी है कि सपना अपनी जिंदगी से परेशान जरूर है पर उसे अपने किए का कतई अफसोस नहीं है। शायद उसकी जिंदगी को मुफलिसी ने इस कदर उचाट बना दिया है कि ममता और संवेदना जैसे एहसास उसके लिए बेमतलब हो चुके हैं। एक महिला की जिंदगी क्या इतनी भी त्रास्ाद हो सकती है कि वह कोख से जुड़ी संवेदना को भी अपनी जिंदगी के शोक के आगे हार जाए। 
दरअसल, यह पूरा मामला औरत की जिंदगी के आगे पैदा हो रहे नए खतरों की बानगी भी है। सरोगेसी सपना के लिए शगल नहीं बल्कि उसकी मजबूरी थी। डेढ़ लाख रुपए की हाथ से जाती कमाई में से कम से कम 25 हजार उसकी अंटी में आ जाए, इसलिए गर्भ गिराने की क्रूरता को भी उसने कबूला। ...तो क्या एक महिला की संवेदना उसकी मुफलिसी के आगे हार गई या उसके संघर्ष के लिए एक पुरुष वर्चस्व वाली आर्थिक-सामाजिक स्थितियों में बहुत गुंजाइश बची ही नहीं थी। एक करोड़पति पुरुष का अपना वंश चलाने के सपने की सचाई कितने "सपनों' को रौंदने जैसी है, यह समझना जरूरी है।
याद आता है वह दौर जब अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश इराक को जंग के मैदान में सद्दाम हुसैन समेत अंतिम तौर पर रौंदने के लिए उतावले थे। अखबार के दफ्तर में रात से खबरें आने लगी कि अमेरिका बमबारी के साथ इराक पर हमला बोलने जा रहा है। इराक से संवाददाता ने खबर भेजी कि वहां के प्रसूति गृहों में मांएं अपने बच्चों को छोड़कर भाग रही हैं। खबर की कॉपी अंग्रेजी में थी, लिहाजा आखिरी समय में बिना पूरी खबर पढ़े उसके अनुवाद में जुट जाने का अखबारी दबाव था। अनुवाद करते समय जेहन में लगातार यही सवाल उठ रहा था कि ममता क्या इतनी निष्ठुर भी हो सकती है कि वह युद्ध जैसी आपद स्थिति में बच्चों की छोड़ सिर्फ अपनी फिक्र करने की खुदगर्जी पर उतर आए।
पूरी खबर से गुजरकर यह एहसास हुआ कि यह तो ममता की पराकाष्ठा थी। प्रसूति गृहों में समय से पहले अपने बच्चों को जन्म देने की होड़ मची थी। जिन महिलाओं की डिलेवरी हो चुकी थी, वह अपने बच्चों को  छोड़कर जल्द से जल्द घर पहुंचने की हड़बड़ी में थीं क्योंकि उन्हें अपने दूसरे बच्चों और घर के बाकी सदस्यों की फिक्र खाए जा रही थी। वे अस्पताल में नवजात शिशुओं को छोड़ने के फैसला इसलिए नहीं कर रही थी कि उनके आंचल का दूध सूख गया था। असल में युद्ध या बमबारी की स्थिति में कम से कम वह अपने नवजातों को नहीं खोना चाहती थीं। उन्हें भरोसा था कि अमेरिका इराक के खिलाफ जब हमला बोलेगा तो कम से कम इतनी नैतिकता तो जरूर मानेगा कि वह अस्पतालों और स्कूलों को बख्श दे। युद्ध छिड़ने से पहले प्रीमैच्योर डिलेवरी का महिलाओं का फैसला भी इसलिए था कि बम धमाकों के बीच कहीं गर्भपात जैसे खतरों का सामना उन्हें न करना पड़े। सचमुच मातृत्व संवेदना की परीक्षा की यह चरम स्थिति थी जिससे गुजरते हुए इराकी महिलाएं मानवीयता का सर्वथा भावपूर्ण सर्ग रच रही थीं।
सपना नवीन झा के मामले में पहली नजर में यह संवेदना दांव पर हारती दिखती है। पर अगर ऐसा दिखता है तो यह महिला स्थितियों को समझने में एक और बड़ा धोखा है। सपना से जुड़ा वाकिया दरअसल एक और खतरनाक मिसाल है कि हम एक महिला की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए किन-किन हदों तक जा सकते हैं। पैसे के बदले देहसुख मुहैया कराने के रूप में शुरू हुए दुनिया के सबसे पहले पेशे से लेकर किराए की कोख के सौदे तक की महायात्रा में आर्थिक मोर्चे पर महिलाओं की लाचारी के जितने भी पड़ाव हैं, वे सब एक पुरुष वर्चस्ववादी समय और समाज में महिला जीवन की विडंबनाओं की ही असलियत खोलते हैं।  सपना जैसी महिलाओं पर किसी पूर्वाग्रही और कठोर नजरिए से पहले हमें उन सचाइयों के प्रति ईमानदार होना होगा जो न सिर्फ महिला विरोधी हैं बल्कि संवेदना विरोधी भी।  याद रखें कि बहुत खतरनाक होता है किसी "सपने' का यूं ही  मर जाना।